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मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

षष्ठोऽङ्कः ४११

बुदो एदं ज्जेव अणुगच्छामि । ( अरे ! निष्क्रामतो मम प्रियवयस्यः शर्विलकः पृष्ठत एवानुलग्नो गतः। भवतु, प्रधानदण्डधारको वीरको राजप्रत्ययकारी विरोधितः । तद्यावदहमपि पुत्रभ्रातृपरिवृत एतमेवानुगच्छामि ।) (इति निष्क्रान्तः।)

इति प्रवहणविपर्ययो नाम षष्ठोऽङ्कः ।

— : ० : —

पात्र प्रधान दण्डाधिकारी से मैंने विरोध कर लिया है । अतः मैं भी पुत्र, भाई आदि के साथ होकर इस [ शर्विलक अथवा आर्यक ] के ही पीछे-पीछे जाता हूँ ।

॥ इस प्रकार गाड़ी बदलना नामक छठा अंक समाप्त हुआ ॥

टीका—निष्क्रामतः=अस्मात् स्थानात् निःसरतः, अनुलग्नः=अनुगतः, प्रधानः=प्रमुखः, दण्डधारकः = रक्षापुरुषः, विरोधितः=विरोधं प्रापितः, पुत्रभ्रातृपरिवृतः=पुत्रभ्रात्रादिसमेतः, एतम् एव = शर्विलकम्, आर्यकम् एव वा, अनुगच्छामि=अनुसरामि ।

॥ इस प्रकार जयशङ्करलाल-त्रिपाठिविरचित 'भावप्रकाशिका' हिन्दी-संस्कृत-व्याख्या में मृच्छकटिक का छठां अंक समाप्त हुआ ॥

— : ० : —

सप्तमोऽङ्कः (आर्यकापहरण)

सप्तमोऽङ्कः

( ततः प्रविशति चारुदत्तो विदूषकश्च । )

विदूषकः—भो ! पेक्ख पेक्ख पुप्फकरण्डअ-जिण्णुज्जाणस्य सस्सिरी-अदं । ( भोः ! प्रेक्षस्व, प्रेक्षस्व, पुष्पकरण्डक-जीर्णोद्यानस्य सश्रीकताम् । )

चारुदत्तःवयस्य ! एवमेवैतत् । तथाहि—

वणिज इव भान्ति तरवः पण्यानीव स्थितानि कुसुमानि ।
शुल्कमिव साधयन्तो मधुकर-पुरुषाः प्रविचरन्ति ॥ १ ॥

( इसके बाद चारुदत्त और विदूषक प्रवेश करते हैं । )

अर्थविदूषक—देखिये, देखिये, पुष्पकरण्डक जीर्णोद्यान की शोभा तो देखिये।

चारुदत्त—मित्र ! हां, ऐसा ही है। क्योंकि—

अन्वयः—तरवः, वणिजः, इव, भान्ति, कुसुमानि, पण्यानि, इव, स्थितानि, मधुकरपुरुषाः, शुल्कम्, साधयन्तः, इव, प्रविचरन्ति ॥ १ ॥

शब्दार्थ—तरवः=वृक्ष, वणिजः=व्यापारियों के, इव=समान, भान्ति=शोभित हो रहे हैं, कुसुमानि=फूल, पण्यानि=बेचने योग्य वस्तुओं के, इव=समान, स्थितानि=स्थित हैं; मधुकरपुरुषाः=पुरुषों के समान भौंरे, शुल्कम् = शुल्क को साधयन्तः इव=वसूल करते हुये से, प्रविचरन्ति=घूम रहे हैं॥ १ ॥

अर्थ—वृक्ष बनियों के समान शोभित हो रहे हैं, फूल बेचने योग्य वस्तुओं के समान लगे हुये हैं, पुरुषों के समान भौंरे कर [ टैक्स ] को वसूल करते हुये से घूमते फिर रहे हैं ॥ १ ॥

टीका—उद्यानस्य सौन्दर्यमापणमिव वर्णयति-—वणिज इति । तरवः=वृक्षाः, वणिजः=व्यापारिवर्गाः, विक्रेतार इति यावत्, इव=यथा, भान्ति=शोभन्ते, कुसुमानि=पुष्पाणि, पण्यानि=विक्रेयद्रव्याणि, इव = यथा, स्थितानि=विद्यमानानि, सन्ति, मधुकरपुरुषाः = मधुकराः पुरुषा इव, उपमितसमासः, शुल्कम्=राजग्राह्यं करम्, साधयन्तः =गृह्णन्तः, इव, उत्प्रेक्षाबोधकम्, प्रविचरन्ति=इतस्ततः भ्रमन्ति । अत्रोपमोत्प्रेक्षयोः संसृष्टिः । आर्या वृत्तम् ॥ १ ॥

विमर्श—चारुदत्त उपवन का सौन्दर्य देखकर उसे एक सजी-सजायी बाजार के समान समझता है। जहाँ दूकानदार बनियाँ हैं, अनेक बिक्रीयोग्य चीजें हैं,

सप्तमोऽङ्कः ४१३

**विदूषकः--**भो ! इमं असक्कार-रमणोअं सिलाअलं उपविसदु भवं !
(भोः ! इदमसंस्काररमणीयं शिलातलमुपविशतु भवान् ।)
चारुदत्त:-- ( उपविश्य ) वयस्य ! चिरयति वर्द्धमानकः ।
विदूषकः-- भणिदो मए 'वढ्ढमाणओ ! वसन्तसेणं गेण्हिअ लहुं लहुं आअच्छ' त्ति । ( भणितो मया-'वर्द्धमानक ! वसन्तसेनां गृहीत्वा लघु लघु आगच्छ' इति )
चारुदत्त:-- तत् किं चिरयति ? ।

किं यात्यस्य पुरः शनैः प्रवहणं तस्यान्तरं मार्गते ?
भग्नेऽक्षे परिवर्तनं प्रकुरुते ? छिन्नोऽथवा प्रग्रहः ?
वर्त्मन्तोज्झित-दारु-वारित-गतिर्मार्गान्तरं याचते ?
स्वैरं प्रेरितगोयुगः किमथवा स्वच्छन्दमागच्छति ? ॥ २ ॥


राजा के पुरुष कर वसूल रहे हैं। यहाँ वृक्ष, पुष्प और भौंरे उक्त तीन कार्य सम्पादित कर रहे हैं ॥ १ ॥

**शब्दार्थ--**असंस्काररमणीयम् = स्वभावतः मनोहारी, शिलातलम्=चट्टान का आसन, चिरयति=देर कर रहा है, लघु-लघु=जल्दी जल्दी ।

**अर्थ--विदूषक--**हे मित्र ! स्वभावतः मनोहारी इस शिलातल पर आप बैठिये ।

चारुदत्त-- ( बैठकर ) मित्र ! वर्द्धमानक देर कर रहा है !

**विदूषक--**मैंने तो यह कहा था--वर्धमानक वसन्तसेना को लेकर जल्दी-जल्दी ही आना ।'

**अन्वयः--**किम्, अस्य, पुरः, प्रवहणम्, शनैः, याति, तस्य, अन्तरम्, मार्गते ? अथवा, अक्षे, भग्ने, [ सति, तस्य ] परिवर्तनम्, कुरुते, अथवा, प्रग्रहः, छिन्नः, अथवा, वर्त्मान्तोन्झितदारुवारितगतिः, [ सन् ], मार्गान्तरम्, याचते, अथवा, स्वैरम्, प्रेरितगोयुगः, स्वच्छन्दम्, आगच्छति, किम् ? ॥ २ ॥

शब्दार्थ--किम् = क्या, अस्य=इस ( वर्धमानक की गाड़ी ) के, पुरः=आगे, प्रवहणम्=दूसरी गाड़ी, शनैः=धीरे-धीरे, याति=जा रही है, तस्य=उस गाड़ी का, अन्तरम्=अवकाश, खाली स्थान, मार्गते=ढूंढ़ रहा है ? अथवा, अक्षे=धुरा के, भग्ने=टूट जाने पर, [ तस्य=उसका ] परिवर्तनम्=बदलना, कुरुते=कर रहा है ? अथवा, प्रग्रहः=बैलों को नियन्त्रित करने की रस्सी, छिन्नः=टूट गयी है ? अथवा वर्त्मान्तोन्झितदारुवारितगतिः=रास्ते के बीच में रखी गयी लकड़ी [ कटे हुये वृक्ष आदि ] से रोक दिया गया है गमन जिसका ऐसा वह, मार्गान्तरम्=दूसरी रास्ता, याचते=प्रार्थना कर रहा है ? अथवा, स्वैरम्=धीरे-धीरे, प्रेरितगोयुगः=

४१४ मृच्छकटिकम्

बैलों को चलने के लिये प्रेरित करता हुआ, हांकता हुआ, स्वच्छन्दम्=धीरे-धीरे, आगच्छति किम्=आ रहा है क्या ? ॥ २ ॥

अर्थ - चारुदत्त - तो देर क्यों कर रहा है ?

क्या इस [ वर्धमानक की गाड़ी ] के आगे दूसरी गाड़ी धीरे-धीरे जा रही है, उसका अवकाश=खाली रास्ता ढूंढ़ रहा है ? अथवा धुरा टूट जाने पर उसे बदल रहा है ? अथवा लगाम की रस्सी टूट गयी है ? अथवा रास्ते के बीच में पेड़ आदि लकड़ी रख देने से इसका गमन रुक गया है अतः दूसरे रास्ते की प्रार्थना कर रहा है ? अथवा धीरे-धीरे बैलों की जोड़ी को हांकता हुआ अपनी इच्छा से धीरे-धीरे आ रहा है ? ॥ २ ॥

टीका-प्रवहणस्य विलम्बेनागमने हेतुमुत्प्रेक्षते—किमिति। किम्=इदं जिज्ञासायाम्, अस्य=वर्धमानस्य शकटस्य, पुरः=अग्रे, प्रवहणम्=अन्यत् शकटम्, शनैः=मन्दंमन्दम्, याति=व्रजति, तस्य=अग्रेगामिनः शकटस्य, अन्तरम्=अग्रे गमनायावकाशम्, मार्गति=अन्विष्यति ? अक्षे=कूबरे, भग्ने=त्रुटिते, विकृते वा, परिवर्तनम्=विनिमयम्, तदपाकृत्यान्यसंयोजनमित्यर्थः, कुरुते=करोति ?, अथवा विकल्पार्थकमव्ययम्, प्रग्रहः=वृषभादीनां नियन्त्रणरज्जुः, छिन्नः=त्रुटितो, भग्नो वा, अथवा, वर्त्मनः=मार्गस्य, अन्ते=प्रान्तभागे, मध्यभागे इति भावः, उज्झितानि=पातितानि यानि दारूणि तैः वारिता = निवारिता गतिः=गमनं यस्य तादृशः, राजाज्ञया गमनागमनावरोधाय मार्गे दार्व्वादिकं निपात्य मार्गस्यावरोधः कृत इति भावः, कुत्रचित् कर्मान्तोञ्झितेत्यादिपाठः, कर्मान्तः = राजादिनियोगः, मार्गान्तरम् अन्यं पन्थानम्, याचते = प्रार्थयते, अन्विष्यतीति भावः, अथवा, स्वैरम्=मन्दंमन्दम्, प्रेरितम्=सञ्चालितम्, गोयुगम् = बलीवर्दद्वयम्, येन तादृशः, सन्, स्वच्छन्दम्=यथेच्छम्, शनैः शनैरिति भावः, आयाति=आगच्छति । एवञ्च विलम्बमसहमानश्चारुदत्तोऽनेक-संकल्प-विकल्पान् कल्पयति । अत्र सन्देहालंकारः, शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ २ ॥

विमर्श—वसन्तसेना को लेकर वर्धमानक नहीं आ सका। इसके विलम्ब के लिये चारुदत्त तरह-तरह की शंकायें करता है। वर्त्मान्तोञ्झितदारुवारितगतिः--- इसके स्थान पर कर्मान्तोञ्झितदारुवारितगतिः---यह पाठ भी है। कभी-कभी यातायात रोकने के लिये मार्ग के मध्यभाग में बड़ी-बड़ी लकड़ी के लट्ठे आदि रख दिये जाते हैं। यहाँ 'याचते' क्रियापद महत्त्वपूर्ण है। चारुदत्त सोचता है कि कहीं सभी रास्ते बन्द न कर दिये गये हों, अतः वर्धमानक किसी अन्य सुरक्षित रास्ते से जाने की प्रार्थना कर रहा होगा। अनेक सन्देह होने से सन्देहालंकार है। शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ २ ॥

सप्तमोऽङ्कः ४१५

( प्रविश्य गुप्तार्यकप्रवहणस्थः । )

चेटः-- जाध गोणा जाध । ( यातं गावो ! यातम् । )

आर्यकः--( स्वगतम् )

नरपतिपुरुषाणां दर्शनाद्भीतभीतः
सनिगडचरणत्वात् सावशेषापसारः ।
अविदितमधिरूढो यामि साधोस्तु याने
परभृत इव नीडे रक्षितो वायसीभिः ॥ ३ ॥

( आर्यक जिसमें छिपा हुआ बैठा है ऐसी गाड़ी में बैठा हुआ प्रवेश करके ।)

**अर्थ--चेट--**चलो बैलों, चलो ।

**अन्वयः--**नरपतिपुरुषाणाम्, दर्शनाद्, भीतभीतः, सनिगडचरणत्वात्, सावशेषापसारः, तु, नीडे, वायसीभिः, रक्षितः, परभृतः, इव, ( अहम् आर्यकः ), साधोः, याने, अविदितम्, अधिरूढः, यामि ॥ ३ ॥

**शब्दार्थ--**नरपतिपुरुषाणाम् = राजपुरुषों रक्षक सिपाहियों आदि के, दर्शनाद् = देखने से, भीतभीतः = बहुत डरा हुआ, सनिगडचरणत्वात् = पैरों में बेड़ियाँ जकड़ीं हुईं होने के कारण, सावशेषापसारः = भागने में पूर्णतया समर्थ न होनेवाला, तु = लेकिन, नीडे = घोसले में, वायसीभिः = कौवे की पत्नियों द्वारा, रक्षितः = रक्षित, पोषित, परभृतः = कोयल के, इव = समान, ( अहम् = मैं आर्यक ), साधोः = सज्जन चारुदत्त की, याने = गाड़ी में, अविदितम् = बिना जानकारी के, छिपा हुआ, अधिरूढः = बैठा हुआ, यामि = जा रहा हूँ ।। ३ ।।

अर्थ--आर्यक--( अपने आप में )
राजा के सिपाहियों को देखने से अत्यन्त भयभीत, पैरों में बेड़ियाँ जकड़ी होने से भागने में पूर्णतया असमर्थ, लेकिन घोसले में कौवे की पत्नियों द्वारा रक्षित कोयल [के बच्चे] के समान [मैं आर्यक] उस सज्जन चारुदत्त की गाड़ी में छिपा बैठा हुआ जा रहा हूँ ॥ ३ ॥

टीका-- स्वकीयसुरक्षितगमने हेतुमाह आर्यकः-नरपतीति । नरपतेः = राज्ञः पालकस्य, पुरुषाणाम् = रक्षकजनानाम्, दर्शनाद् = अवलोकनाद्, भीतभीतः = अत्यन्तं भयभीतः, निगडेन सहितौ-सनिगडौ = श्रृंखलाबद्धौ चरणौ = पादौ यस्य सः सनिगडचरणः, तस्य भावः, तस्मात् श्रृंखलाबद्धचरणत्वात् सादशेषः = किञ्चिदवशिष्टः, अपसारः = पलायनं यस्य सः, स्वेच्छया पलायनेऽसमर्थ इति भावः, तु = किन्तु, नीडे = कुलाये, रक्षितः = पालितः पोषितश्च, परभृतः = कोकिलशावकः, इव = यथा, [ अहम् आर्यकः ), साधोः = सज्जनस्य चारुदत्तस्येत्यर्थः, याने = शकटे, अविदितम् = अज्ञातं यथा स्यात् तथा, अधिरूढः = आसीनः, प्रच्छन्नरूपेण स्थित इत्यर्थः, यामि = सकुशलं व्रजामि । उपमालंकार, मालिनी वृत्तम्-न-न-म-य-य-युतेयं मालिनी भोगिलोकैः ॥३॥

४१६ मृच्छकटिकम्

अहो ! नगरात् सुदूरमपक्रान्तोऽस्मि । तत् किमस्मात् प्रवहणादवतीर्य वृक्षवाटिकागहनं प्रविशामि ? उताहो प्रवहणस्वामिनं पश्यामि ? अथवा कृतं वृक्षवाटिकागहनेन । अभ्युपपन्नवत्सलः खलु तत्रभवानार्यचारुदत्तः श्रूयते; तत् प्रत्यक्षीकृत्य गच्छामि ।

स तावदस्माद्व्यसनार्णवोत्थितं निरीक्ष्य साधुः समुपैति निर्वृतिम् ।
शरीरमेतत् गतमीदृशीं दशां धृतं मया तस्य महात्मनो गुणैः ॥ ४ ॥

विमर्श- भीतभीतः-एक शब्द के प्रयोग से उतना अधिक अर्थ नहीं निकलता है, 'आबाधे च' पा. सू. ८।१।१० से द्वित्व किया गया है । सावशेषापसारः-लम्बी अवधि तक पैर जकड़े रहने के कारण भागने में कठिनाई होने से इच्छानुसार भागना सम्भव नहीं है । वायसीभिः रक्षितः---यह प्रसिद्धि है कि कोयल अपना अण्डा कौवा के घोसले में रख देती है कौवी भ्रमवश अपना अण्डा समझकर उसकी रक्षा करती हुई पालन-पोषण करती रहती है । आर्यक अपने को भी उसी प्रकार समझ रहा है । क्योंकि वह गाड़ी चारुदत्त की है, अतः उसमें वह या उसके सम्बन्धी ही बैठे होंगे । इस कारण आर्यक की रक्षा होती जा रही है । वह सुरक्षित चला जा रहा है । यहाँ उपमा अलंकार है और मालिनी छन्द है ॥ ३ ॥

अर्थ- ओह ! नगर से बहुत दूर निकल आया हूँ । तो क्या इस गाड़ी से उतर कर घने पेड़ों के समूह में चला जाऊँ, अथवा गाड़ी के स्वामी चारुदत्त का दर्शन कर लूं । अथवा घने वृक्षों के समूह में जाना व्यर्थ है । माननीय चारुदत्त शरणागतों की रक्षा करने वाले हैं, ऐसा सुना जाता है । अतः उनका दर्शन करके ही जाऊँगा ।

**टीका-**सुदूरम्=बहुदूरम्, अपक्रान्तः=अपसृतः, वृक्षवाटिकाभिः=वृक्षसमूहैः, गहनम् = गभीरम्, संकुलम्, प्रविशामि=आत्मरक्षार्थं व्रजामि, उताहो=अथवा, प्रवहणस्य स्वामिनम्=चारुदत्तम्, वृक्षवाटिकागहनेन तत्र प्रवेशेन, कृतम्=न किमपि फलम् इत्यर्थः, अभ्युपपन्नेषु=शरणागतेषु वत्सलः=पालकः, प्रत्यक्षीकृत्य=अवलोक्य, गच्छामि=अस्मात् स्थानात् अन्यत्रात्मरक्षार्थं ब्रजिष्यामीत्यर्थः ।

**अन्वयः-**साधुः, सः, अस्मात्, व्यसनार्णवोत्थितम्, [ माम् ] निरीक्ष्य, निर्वृतिम्, समुपैति, तावत्, ईदृशीम्, दशाम्, गतम्, एतत्, शरीरम्, मया, तस्य, महात्मनः, गुणैः, धृतम् ॥ ४ ॥

**शब्दार्थ-**साधुः=सज्जन, सः=वे चारुदत्त, अस्मात्=इस, पूर्वोक्त स्वभाव के कारण, व्यसनार्णवोत्थितम्=विपत्तिरूपी सागर से निकले हुये, माम्=मुझ आर्यक को, निरीक्ष्य=देख कर, निर्वृतिम् = सुख, आनन्द को, उपैति=प्राप्त करेंगे, तावत्= यह वाक्यालंकार के लिये है, ईदृशीम्=इस प्रकार की, दशाम्=अवस्था को, गतम्=

सप्तमोऽङ्कः ४१७

चेटः-—इमं तं उज्जाणं, ता जाव उवशप्पामि । ( उपसृत्य ) अज्ज मित्तेअ ! । ( इदं तदुद्यानम्, तद् यावदुपसर्पामि । ) ( आर्य मैत्रेय ! )

विदूषकः-—भो ! पियं दे णिवेदेमि, वड्ढमाणओ मन्तेदि, आगदाए वसन्तसेणाए होदव्वं ( भोः ! प्रियं ते निवेदयामि, वर्द्धमानको मन्त्रयति, आगतया वसन्तसेनया भवितव्यम् । )


प्राप्त हुआ, एतत् = यह, शरीरम् = शरीर, तस्य = उस, महात्मनः = महापुरुष के, गुणैः = गुणों के कारण, धृतम् = धारण किया हुआ है ॥ ४ ॥

अर्थ—वे सज्जन [ चारुदत्त ] इस अपने स्वभाव से, विपत्तिरूपी समुद्र से पार निकले हुये मुझको देखकर सुख प्राप्त करेंगे, प्रसन्न होगें। इस प्रकार की दशा को प्राप्त हुआ यह शरीर उसी महापुरुष के गुणों के कारण धारण किया हुआ है, [ अन्यथा समाप्त कर दिया जाता । ] ॥ ४ ॥

टीकासाधुः = सज्जनः, सः = चारुदत्तः, अस्मात् = शरणागतवात्सल्यात्, व्यसनम् = कारागारादौ बन्धनम् एव अर्णवः = सागरः, तस्मात् उत्थितम् = बहिर्भूतम्, सुरक्षितम्, [ माम् = आर्यकम् ], निरीक्ष्य = विलोक्य, निर्वृतिम् = आनन्दम्, समुपैति = प्राप्स्यति, वर्तमानसामीप्यात् भविष्यति लट्, ईदृशीम् = पूर्वानुभूताम्, दशाम् = अवस्थाम्, गतम् = प्राप्तम्, एतत् = इदम्, शरीरम् = कायः, महात्मनः = महापुरुषस्य, तस्य = चारुदत्तस्य, गुणैः = परोपकारादिसद्गुणैः, धृतम् = त्रातम्, महापुरुषस्य तस्य याने समारोहणेनैव मम शरीरमेतावत्कालपर्यन्तं सुरक्षितं वर्ततेऽन्यथा राजपुरुषादिभिः गृहीत्वा कारागारादौ बद्धं स्यादिति भावः । वंशस्थबिलं वृत्तम् ॥ ४ ॥

विमर्श—इस श्लोक में 'अस्मात्' इसका अर्थ सन्दिग्ध है । सामान्यतया इसको 'व्यसनार्णव' का परामर्शक माना गया है परन्तु ऐसा मानने पर व्याकरण-शास्त्रानुसार समास होना कठिन है क्योंकि 'साकाङ्क्ष' का समास नहीं होता है । इस स्थिति में इसका अर्थ पूर्वोक्त 'अभ्युपपन्नवत्सलत्व' के साथ करना चाहिये- ऐसा कुछ लोग कहते हैं । परन्तु अर्थ के औचित्य को ध्यान में रखने पर इसको 'व्यसनार्णव' का ही परामर्शक मानना चाहिये । जैसे कुछ विशेष उदाहरणों में साकाङ्क्षता में भी समास हुये हैं, वैसा ही यहाँ भी मान लेना चाहिये ॥ ४ ॥

अर्थ चेट—यही वह बगीचा है, तो वहीं चलता हूँ। ( पास जाकर ) आर्य मैत्रेय !

विदूषक—मित्र, मित्र, आपको शुभ समाचार बता रहा हूँ । वर्धमानक पुकार रहा है । वसन्तसेना आ गई होगी ।

२७ मृ०

४१८ मृच्छकटिकम्

चारुदत्तः—प्रियं नः प्रियम् ।
विदूषकः—दासीए पुत्ता ! किं चिरइदोसि ? (दास्याः पुत्र ! किं चिरायितोऽसि ?).
चेटः—अज्ज मित्तेअ ! मा कुप्प, जाणत्थलके विशुमलिदे त्ति कदुअ गदागदिं कलेन्ते चिलइदेम्हि । (आर्य मैत्रेय ! मा कुप्य, यानास्तरणं विस्मृतमिति कृत्वा गतागतिं कुर्वन् चिरायितोऽस्मि ।)
चारुदत्तः—वर्द्धमानक ! परिवर्त्तय प्रवहणम् । सखे मैत्रेय ! अवतारय वसन्तसेनाम् ।
विदूषकः—किं णिअडेण वद्धा से गोडा जेण सअं ण ओदरेदि । (उत्थाय प्रवहणमुद्घाट्य) भोः ! ण वसन्तसेणा, वसन्त-सेणो क्खु एसो । (किं निगडेन बद्धावस्याः पादौ येन स्वयं नावतरति ।) (भोः न वसन्तसेना, वसन्तसेनः खल्वेषः ।)
चारुदत्तः—वयस्य ! अलं परिहासेन, न कालमपेक्षते स्नेहः । अथवा स्वयमेवावतारयामि । (इत्युत्तिष्ठति)
आर्यकः—(दृष्ट्वा) अये ! अयमेव प्रवहणस्वामी । न केवलं श्रुतिरमणीयो दृष्टिरमणीयोऽपि । हन्त ! रक्षितोऽस्मि ।
चारुदत्तः—(प्रवहणमधिरुह्य दृष्ट्वा च) अये ! तत् कोऽयम् ?

'करिकर-समबाहुः सिंहपीनोन्नतांसः
पृथुतर-सम-वक्षास्ताम्रलोलायताक्षः ।


चारुदत्त--प्रिय है, हमारे लिये प्रिय है ।
विदूषक—दासी के बच्चे ! क्यों देर कर दी ?
चेट—आर्य मैत्रेय ! मत नाराज होइये । गाड़ी का बिछावन भूल गया था इसलिये आना जाना करने में देर हो गयी ।
चारुदत्त—वर्धमानक गाड़ी घुमाओ । मित्र मैत्रेय ! वसन्तसेना को उतारो ।
विदूषक—क्या इसके पैर बेड़ी से बंधे हैं जो यह स्वयं नहीं उतर पा रही है। (उठ कर, गाड़ी खोलकर) अरे ! यह वसन्तसेना नहीं है, यह तो वसन्तसेन है ।
चारुदत्त—मित्र हंसी मत करो । प्रेम समय का विलम्ब नहीं चाहता है । अथवा मैं स्वयं ही उतारता हूँ । (यह कह कर उठता है ।)
आर्यक—(देखकर) अरे ! ये ही गाड़ी के स्वामी हैं । ये केवल सुनने में ही अच्छे नहीं हैं अपि तु देखने में भी अच्छे लगते हैं । अहो ! अब (मेरी) रक्षा हो गयी ।
अन्वयः—करिकरसमबाहुः, सिंहपीनोन्नतांशः, पृथुतरसमवक्षाः, ताम्रलोलाय-

सप्तमोऽङ्कः ४१९

कथमिदमसमानं प्राप्त एवंविधो यो
वहति निगडमेकं पादलग्नं महात्मा ॥ ५ ॥

ततः को भवान् ?
आर्यकः — शरणागतो गोपालप्रकृतिरार्यकोऽस्मि ।


ताक्षः, एवंविधः, महात्मा [ अस्ति, सः ] कथम्, इदम्, असमानम्, [ दण्डम् ], प्राप्तः, पादलग्नम्, एकम्, निगडम्, वहति ॥ ५ ॥

शब्दार्थ — करिकर-समबाहुः = हाथी की सूँड़ के समान भुजाओं वाला, सिंहपीनोन्नतांशः=शेर के समान मोटे और ऊँचे कन्धों वाला, पृथुतरसमवक्षाः=विशाल और समतल वक्षस्थलवाला, ताम्रलोलायताक्षः=ताम्बें के समान, चञ्चल और बड़ी-बड़ी आंखोंवाला, यः=जो, एवंविधः=इस प्रकार का महात्मा=महापुरुष है वह, कथम्=कैसे, इदम समानम्=इस प्रकार के अनुचित [ दण्ड ] को, प्राप्तः=प्राप्त कर, पादलग्नम्=पैर में लटकी हुई एक, निगडम्=बेड़ी को, वहति=ढो रहा है, धारण किये हुये है ॥ ५ ॥

अर्थ —चारुदत्त--( गाड़ी पर चढ़कर और देखकर ) अरे, तो यह कौन है ?
हाथी की सूँड़ के समान विशाल भुजाओं वाला, शेर के समान ऊँचे और मोटे कन्धों वाला, विशाल और समतल वक्षस्थलवाला, ताम्बें के समान रंगवाले चञ्चल और विशाल नेत्रों वाला जो इस प्रकार का महापुरुष है वह कैसे इस प्रकार के अनुचित दण्ड को प्राप्त करके पैर में लगी हुई एक बेड़ी को ढो रहा है, धारण किये हुये है ॥ ५ ॥
तब आप कौन हैं ?

टीका — आर्यकस्य स्वरूपं बन्धनं च विलोक्य चारुदत्त उत्प्रेक्षते—करिकरेति । करिणः=गजस्य करेण=शुण्डादण्डेन समौ=तुल्यौ बाहू=भुजौ यस्य तादृशः, सिंहस्य=मृगाधिपस्य इव पीनो = परिपुष्टौ, उन्नतौ = उच्छ्रितौ च अंशौ = स्कन्धौ यस्य तादृशः, पृथुतरम्=अतिविशालम् समम्=अनुच्चनीचम्, वक्षः=उरःस्थलं यस्य सः, ताम्रे =ताम्रवर्णे, लोले=चञ्चले, आयते=आयताकारे विशाले इत्यर्थः, अक्षिणी=नेत्रे यस्य तादृशः, सः=पुरोदृश्यमानः, एवंविधः=पूर्वोक्तवैशिष्ट्ययुक्तः, महात्मा=महापुरुषः, अस्ति, सः, कथम् = कस्मात् कारणात्, इदम्=पुरो दृश्यमानम्, अंसमानम् = अयोग्यम् अनुचितं बन्धनम्, प्राप्तः = उपगतः, सन्, पादलग्नम्=चरणनिबद्धम् एकम्, निगडम्=शृङ्खलाम्, वहति=धारयति । एवंविध-महापुरुष-लक्षणवत इदं बन्धनमाश्चर्यकरमिति भावः । लुप्तोपमालंकारः । मालिनी वृत्तम् ॥ ५ ॥

अर्थ—आर्यक--शरण में आया हुआ, अहीर का पुत्र आर्यक हूँ ।

४२० | मृच्छकटिकम्

चारुदत्तः—किं घोषादानीय योऽसौ राज्ञा पालकेन बद्धः ?
आर्यकः—अथ किम् ।
चारुदत्तः

विधिनैवोपनीतस्त्वं चक्षुर्विषयमागतः ।
अपि प्राणानहं जह्यां न तु त्वां शरणागतम् ॥६॥

( आर्यको हर्षं नाटयति )
चारुदत्तः—वर्द्धमानक ! चरणान्निगडमपनय ।
चेटः—जं अज्जो आणवेदि । ( तथा कृत्वा ) अज्ज ! अवणीदाइं णिगलाइं । ( यदार्य आज्ञापयति । ) ( आर्य ! अपनीतानि निगडानि । )


चारुदत्त—क्या जिसे राजा पालक ने अहीरों की बस्ती से पकड़ कर जेल में बन्द करा दिया था ?
आर्यक—हां, वही ।

अन्वयः—विधिना, एव, उपपन्नः, त्वम्, चक्षुर्विषयम्, आगतः, अहम्, प्राणान्, अपि, जह्याम्, तु, शरणागतम्, त्वाम्, न, [ जहामि ] ॥ ६ ॥

शब्दार्थविधिना = भाग्य से, एव=ही, उपनीतः = लाये गये, त्वम्=तुम आर्यक, चक्षुर्विषयम्=दर्शन के विषय को, आगतः=प्राप्त हुये हो, दिखाई दिये हो, अहम् = मैं चारुदत्त, प्राणान् = अपने प्राणों को, अपि = भी, जह्याम् = छोड़ दूँ, तु = किन्तु, शरणागतम् = शरण में आये हुये, त्वाम् = तुम को, =नहीं, [ छोड़ सकता ] ॥ ६ ॥

अर्थचारुदत्त
भाग्य द्वारा ही लाये गये तुम मेरे नेत्रों के विषय बने हो, दिखाई पड़ रहे हो, मैं अपने प्राणों को भी छोड़ दूँ किन्तु शरण में आये हुये तुम [ आर्यक ] को नहीं छोड़ सकता । ( तुम्हारी जीवनरक्षा अवश्य करूँगा । ) ॥ ६ ॥

टीकाविधिना=भाग्येन, एव उपनीतः=अत्र प्रापितः, त्वम्=आर्यकः, मम, चक्षुषोः = नेत्रयोः, विषयम् = गोचरम्, आगतः=प्राप्तः, असि, अहम् = चारुदत्तः, प्राणान्=अशून्, अपि, जह्याम्=त्यजेयम्, तु=परन्तु, शरणे=रक्षणे, आगतम्=प्रपन्नम्, त्वाम्=आर्यकम्, =नैव, जहामीत्यर्थः । स्वकीयप्राणपरित्यागेनापि तव जीवन-रक्षां करिष्यामीति भावः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ६ ॥

( आर्यक हर्ष का अभिनय करता है । )
अर्थचारुदत्त—वर्धमानक ! पैर से बेंडी हटा दो ।
चेट—आर्य की जो आज्ञा । ( पैर की बेड़ी हटा कर ) आर्य ! बेड़ियाँ हटा दीं ।

सप्तमोऽङ्कः ४२१

आर्यकः--स्नेहमयान्यन्यानि दृढंतराणि दत्तानि । विदूषकः--सङ्कच्छेहि णिअडाइं, एसो वि मुक्को, सम्पंदं अम्हे वज्जि- स्सामो । ( सङ्कच्छस्व निगडानि, एषोऽपि मुक्तः, साम्प्रतं वयं व्रजिष्यामः । ) चारुदत्तः धिक् शान्तम् । आर्यकः--सखे चारुदत्त ! अहमपि प्रणयेनेदं प्रवहणमारूढः । तत् क्षन्तव्यम् । चारुदत्तः--अलङ्कृतोऽस्मि स्वयंग्राहप्रणयेन भवता । आर्यकः--अभ्यनुज्ञातो भवता गन्तुमिच्छामि । चारुदत्तः--गम्यताम् । आर्यक :--भवतु, अवतरामि । चारुदत्तः--सखे ! नावतरितव्यम् । प्रत्यग्रापनीतसंयमनस्य भवतः अलघुसंचारा गतिः । सुलभपुरुषसञ्चारेऽस्मिन् प्रदेशे प्रवहणं विश्वास- मुत्पादयति, तत् प्रवहणेनैव गम्यताम् । आर्यकः--यथाह भवान् ।


आर्यक--प्रेममयी दूसरी बेड़ियां डाल दीं ।

विदूषक--( चारुदत्त के पैर में ) बेड़ियां डाल दो । यह भी छूट गया । अब हम लोग ( कारागार ) चलेंगे ।

चारुदत्त--ऐसी बात को धिक्कार है । शान्त रहो ।

आर्यक--मित्र चारुदत्त ! मैं भी प्रेम के कारण ही इस गाड़ी पर चढ़ा । अतः क्षमा करिये ।

चारुदत्त--आपके द्वारा स्वयं इस गाड़ी पर चढ़ने के स्नेह से मैं अलंकृत हो गया हूँ ।

आर्यक--आपसे आज्ञा लेकर जाना चाहता हूँ ।

चारुदत्त--जाइये ।

आर्यक--अच्छा, उतरता हूँ ।

चारुदत्त--मित्र ! मत उतरो । अभी अभी बेड़ी हटाने से आपकी गति तेज नहीं है ( अर्थात् आप जल्दी जल्दी नहीं चल पायेंगे । ) राजपुरुषों के आवा- गमन से युक्त इस स्थान पर ( मेरी ) गाड़ी विश्वास उत्पन्न कराती है, इसलिये गाड़ी से ही जाइये ।

आर्यक--आप की जैसी आज्ञा ।

४२२मृच्छकटिकम्

चारुदत्त : — क्षेमेण व्रज बान्धवान्, — आर्यकः — ननु मया लब्धो भवान् बान्धवः । चारुदत्तः — स्मर्त्तव्योऽस्मि कथान्तरेषु भवता,— आर्यकः — स्वात्मापि विस्मर्यते ? चारुदत्तः — त्वां रक्षन्तु पथि प्रयान्तममराः,— आर्यकः — संरक्षितोऽहं त्वया । चारुदत्तः — स्वैर्भाग्यैः परिरक्षितोऽसि —, आर्यकः — ननु हे ! तत्रापि हेतुर्भवान् ॥ ७ ॥

अन्वयः – क्षेमेण, बान्धवान्, व्रज। ननु, मया, भवान्, बान्धवः, लब्धः। भवता, कथान्तरेषु स्मर्त्तव्यः। स्वात्मा, अपि, विस्मर्यते ? पथि, प्रयान्तम्, त्वाम्, अमराः, रक्षन्तु, अहम्, त्वया, रक्षितः। स्वैः भाग्यैः, परिरक्षितः, असि, ननु, हे, तत्र, अपि, भवान्, हेतुः ॥ ७ ॥

शब्दार्थ--क्षेमेण = कुशलतापूर्वक, बाधवान् = बन्धुबान्धवों के पास, व्रज = जाइये। ननु = निश्चित ही, मया = मुझे, भवान् = आप चारुदत्त, बान्धवः = बान्धव, लब्धः = प्राप्त हो गये। भवता = आप (आर्यक) द्वारा, कथान्तरेषु = अन्य बातचीत के प्रसंग में, अस्मि स्मर्त्तव्यः = मेरी याद करनी चाहिये। स्वात्मा = अपनी आत्मा, अपि = भी, विस्मर्यते = भुलाई जाती है ?, पथि = मार्ग में, प्रयान्तम् = जाते हुये, त्वाम् = तुम्हारी (आर्यक की), अमराः = देवता लोग, रक्षन्तु = रक्षा करें, अहम् = मुझ आर्यक की, त्वया = तुम [चारुदत्त] ने, रक्षितः = रक्षा की है, स्वैः = अपने [आर्यक के], भाग्यैः = भाग्य से, परिरक्षितः = सुरक्षित, असि = हो, ननु = निश्चित ही, तत्र = उसमें, अपि = भी, भवान् = आप [चारुदत्त] ही, हेतुः = कारण, हैं ॥ ७ ॥

अर्थ--चारुदत्त — कुशलता के साथ अपने बन्धुओं के पास जाइये। आर्यक — निश्चित ही मैंने आपको बन्धु पा लिया है। चारुदत्त — अन्य प्रसङ्गों में मुझे भी याद करना। आर्यक — क्या अपनी आत्मा भी भुलाई जाती है ? चारुदत्त — मार्ग में जाते हुये तुम्हारी रक्षा देवता करें। आर्यक — मेरी रक्षा तो आपने ही कर दी। चारुदत्त — अपने भाग्य से सुरक्षित हो। आर्यक — मित्रवर ! इसमें भी तो आप ही कारण हैं।

टीका--साम्प्रतं प्रयाणसमये आर्यकचारुदत्तौ परस्परं शिष्टाचारं विधातुमुक्तिप्रत्युक्तिभ्यां प्रतिपादयतः—क्षेमेणेति । क्षेमेण = आर्यक ! त्वं कुशलेन, बान्धवान् = आत्मीयान्, व्रज = याहि। आर्यकः प्रतिवदति-ननु भोः = निश्चयेन, मित्रवर !,

सप्तमोऽङ्कः ४२३

चारुदत्तः— यत्, उद्यते पालके महती रक्षा न वर्त्तते, तत् शीघ्रमपक्रामतु भवान् ।

आर्यकः — एवं पुनर्दर्शनाय । ( इति निष्क्रान्तः )

चारुदत्तः —

कृत्वैवं मनुजपतेर्महद्व्यलीकं
स्थातुं हि क्षणमपि न प्रशस्तमस्मिन् ।
मैत्रेय ! क्षिप निगडं पुराणकूपे
पश्येयुः क्षितिपतयो हि चारदृष्ट्या ॥ ८ ॥

भवान्=चारुदत्तः, मया = आर्यकेण, बान्धवः=आत्मीयः, लब्धः=प्राप्तः, 'राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति सः बान्धवः' इत्याद्युक्तेः। चारुदत्तो ब्रूते-भवता=आर्यकेण त्वया, कथान्तरेषु=अन्यविषयकवार्ताप्रसङ्गेषु, स्मर्त्तव्यः=स्मरणीयः, अस्मि=अहम्, अत्र 'अहमर्थकः 'अस्मि' इति अव्ययशब्दः । आर्यकः प्रतिब्रूते— स्वात्मा अपि=निजात्मा अपि, विस्मर्यते=विस्मरणीयो भवति ? चारुदत्तः शुभमांशसति-पथि=मार्गे, प्रयान्तम्=व्रजन्तम्, त्वाम्=आर्यकम्, अमराः=देवाः, रक्षन्तु=अवन्तु, त्रायन्ताम्, आर्यकः प्रतिवदति--अहम्=आर्यकः, त्वया=चारुदत्तेन, संरक्षितः=परित्रातः, चारुदत्तः स्वस्य हेतुत्वं निराकरोति-स्वैः = निजैः, भाग्यैः=भागधेयैः, परिरक्षितः=परित्रातः, असि, आर्यकस्तत्रापि चारुदत्तस्यैव हेतुत्वमङ्गीकर्तुं प्रतिवदति ननु=निश्चये, हे=भोः मित्र !, तत्रापि=तादृशक्षणेऽपि, भवान्=चारुदत्तः, एव, हेतुः=कारणमिति भावः । एवञ्च भवानेव मे मुख्यः परित्रातेति आर्यकस्याशयः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ ७ ॥

विमर्श— यहां उक्ति-प्रत्युक्ति के माध्यम से आर्यक की कृतज्ञता और चारुदत्त की महानुभावता का अति सुन्दर चित्रण किया गया है ॥ ७ ॥

अर्थ—चारुदत्त— चूंकि पालक राजा (आपको पकड़ने के लिये) उद्यत है और सुरक्षा की व्यवस्था नहीं है अतः आप शीघ्र ही चले जाइये ।

आर्यक— अच्छा, फिर दर्शन करने के लिये (आशा बनाये हुये) जा रहा हूँ । (यह कहकर निकल जाता है ।)

अन्वयः— एवम्, मनुजपतेः, महत्, व्यलीकम्, कृत्वा, अस्मिन् (स्थाने) क्षणम्, अपि, स्थातुम्, न, हि, प्रशस्तम्, मैत्रेय; निगडम्, पुराणकूपे, क्षिप, हि; क्षितिपतयः, चारदृष्ट्या, पश्येयुः ॥ ८ ॥

शब्दार्थ— एवम्=पूर्वोक्त प्रकार का, मनुजपतेः=राजा पालक का, महत्=बहुत बड़ा, व्यलीकम्=अपराध, कृत्वा=करके, अस्मिन्=इस स्थान पर, उद्यान में, क्षणम्=थोड़ी देर, अपि=भी, स्थातुम्=रुकना, न हि=निश्चित रूप से नहीं,

४२४ मृच्छकटिकम्

( वामाक्षिस्पन्दनं सूचयित्वा ) सखे मैत्रेय ! वसन्तसेनादर्शनोत्सुकोऽयं जनः । पश्य —

अपश्यतोऽद्य तां कान्तां वामं स्फुरति लोचनम् ।
अकारणपरित्रस्तं हृदयं व्यथते मम ॥ ६ ॥

प्रशस्तम्=अच्छा है, मैत्रेय=मित्र मैत्रेय !, निगडम्=बेड़ी को, पुराणकूपे=पुराने कुआँ में, ( जिसका पानी सूख जाने से कोई वस्तु दिखाई नहीं देती है ), क्षिप=फेंक दो, हि=क्योंकि, क्षितिपतयः=राजा, चारदृष्ट्या=गुप्तचररूपी नेत्र से, पश्येयुः=देख लेंगे ॥ ८ ॥

अर्थ—चारुदत्त—
राजा पालक का ऐसा [ आर्यकरक्षारूपी ] महान् अपराध करके यहाँ क्षण भर भी रुकना ठीक नहीं है । हे मैत्रेय ! बेड़ी को पुराने [ अन्धे ] कुआँ में फेंक दो । क्योंकि राजा लोग गुप्तचर रूपी नेत्र से देख लेंगे ॥ ८ ॥

**टीका—**सुरक्षितं कृत्वाऽऽर्यकं विसृज्य चारुदत्तः आत्मनः सुरक्षार्थं मैत्रेयं निर्दिशति–कृत्वैवमिति । एवम्=इत्थम्, मनुजपतेः=राज्ञः पालकस्येत्यर्थः, महत्=अत्यन्तम्, व्यलीकम्=अप्रियम्, अहितमिति भावः, कृत्वा=विधाय, अस्मिन्=प्रदेशे इत्यर्थः, क्षणम् अपि=मुहूर्तमपि, स्थातुम्=वर्तितुम्, नहि=नैव, प्रशस्तम्=युक्तम्, अतः हे मैत्रेय=मित्र, निगडम्=आर्यकस्य पादादपाकृतं निगडम्, पुराणकूपे=जलादिशून्ये 'अन्धकूपे' इति प्रसिद्धम्, क्षिप=पातय, हि=यस्मात्, क्षितिपतयः=राजानः, चारदृष्ट्या=गुप्तचररूपदृष्ट्या, पश्येयुः=अवलोकयेयुः । 'चारैः पश्यन्ति राजानः' इति वचनमनुस्मृत्य चारुदत्तः भयमुपैति । अत्र कारणेन कार्यसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासोऽलङ्कारः, प्रहर्षिणी वृत्तम् ॥ ८ ॥

अर्थ—( बायीं आँख का फड़कना सूचित करके ) मित्र मैत्रेय । यह व्यक्ति [ मैं ] वसन्तसेना के दर्शन के लिये अति उत्सुक है । देखो —

**अन्वयः—**अद्य, ताम्, कान्ताम्, अपश्यतः, मम, वामम्, लोचनम्, स्फुरति, अकारणपरित्रस्तम्, मम, हृदयम्, व्यथते ॥ ६ ॥

**शब्दार्थ—**अद्य=आज, इस समय, ताम्=उस, कान्ताम्=प्रेयसी वसन्तसेना को, अपश्यतः=न देखने वाले, मम=मेरा [ चारुदत्त का ], वामम्=बाँया, लोचनम्=आँख, स्फुरति=फड़क रही है, अकारणपरित्रस्तम्=बिना किसी कारण के घबड़ाया हुआ, हृदयम्=हृदय, व्यथते=व्यथित हो रहा है, परेशान हो रहा है ॥ ९ ॥

अर्थ—आज [ इस समय ] उस प्रेयसी वसन्तसेना का दर्शन न करने वाले मेरी बाँयी आँख फड़क रही है । बिना किसी कारण के घबड़ाया हुआ मेरा हृदय व्यथित हो रहा है ॥ ९ ॥

सप्तमोऽङ्कः ४२५

तदेहि, गच्छावः। (परिक्रम्य) कथमभिमुखमनाभ्युदयिकं श्रमणकदर्शनम्।
(विचार्य) प्रविशत्वयमनेन पथा, वयमप्यनेनैव पथा गच्छामः।

( इति निष्क्रान्तः। )

इत्यार्यकापहरणं नाम सप्तमोऽङ्कः।

-: ० :-


**टीका—**तदानीं चारुदत्तो दुर्निमित्तोत्पत्तिं वसन्तसेनायाः अदर्शनमूलिकां चिन्तयति—अपश्यत इति। अद्य=अस्मिन् काले, ताम्=पूर्वोक्ताम्, मदीयाम् कान्ताम्=प्रेयसीम्, वसन्तसेनामित्यर्थः, अपश्यतः=अनवलोकयतः मम=चारुदत्तस्य, वामम्=सव्येतरम्, लोचनम्=नेत्रम्, स्फुरति=स्पन्दते, अकारणं परित्रस्तम्=व्याकुलम्, हृदयम्=चित्तम्, व्यथते=व्यग्रं भवति। विभावनालंकारः, आर्या वृत्तम् ॥ ९ ॥

**विमर्श—**भावी अनिष्ट के संकेत को चारुदत्त ठीक से नहीं समझ पा रहा है। वह उसे वसन्तसेना के दर्शन न होने के कारण होने वाला मान रहा है। यहाँ कारण के अभाव में कार्योत्पत्ति होने से विभावना अलंकार है ॥ ६ ॥

**अर्थ—**इस लिये आओ, चलें। (घूम कर) अरे सामने अमङ्गलसूचक इस बौद्ध संन्यासी का दर्शन क्यों ? (सोचकर) यह इस मार्ग से प्रवेश करे, आये। हम लोग इस (दूसरे) मार्ग से चल रहे हैं।

(इस प्रकार सभी निकल जाते हैं।)

"इस प्रकार आर्यक का अपहरण नामक सप्तम अङ्क समाप्त हुआ॥

॥ इस प्रकार जयशङ्करलाल-त्रिपाठि-विरचित 'भावप्रकाशिका, हिन्दी-संस्कृत-व्याख्या में मृच्छकटिक का सप्तम अंक समाप्त हुआ ॥

अष्टमोऽङ्कः (वसन्तिसेना-मोतन)

अष्टमोऽङ्कः

( ततः प्रविशति आर्द्रचीवरहस्तो भिक्षुः । )

भिक्षुः —अज्ञा ! कलेध धम्मशञ्चअं । ( अज्ञाः ! कुरुत धर्मसञ्चयम् । )

शञ्जम्मध णिअपोटं णिच्चं जग्गेध झाण-पड़हेण
विशमा इन्द्रिअ-चोला हलन्ति चिलसञ्चिदं धम्मं ॥ १ ॥
( संयच्छत निजोदरं नित्यं जागृत ध्यानपटहेन ।
विषमा इन्द्रियचौरा हरन्ति चिरसञ्चितं धर्मम् ॥ १ ॥ )


( इसके बाद गीला वस्त्र हाथ में लिये हुये भिक्षुक प्रवेश करता है । )

अन्वयः—निजोदरम्, संयच्छत, ध्यानपटहेन, नित्यम्, जाग्रत, विषमाः, इन्द्रियचौराः, चिरसञ्चितम्, धर्मम्, हरन्ति ॥ १ ॥

शब्दार्थनिजोदरम्=अपने पेट को, संयच्छत=सीमित करो, ध्यानपटहेन=ध्यानरूपी नगाड़े से, नित्यम्=रोज, सदैव, जाग्रत=जागते रहो, विषमाः=कष्टकारक, इन्द्रियचौराः=इन्द्रियरूपी चोर, चिरसञ्चितम्=बहुत समय से एकत्र किये गये, धर्मम्=धर्म को, पुण्य को, हरन्ति=चुरा लेते हैं ॥ १ ॥

अर्थभिक्षु ( =बौद्धसंन्यासी )—अरे अज्ञानियों ! ( मूर्खो ! ) धर्म का संचय करो —

अपने पेट को सीमित करो, [ कम खाओ ] ध्यानरूपी नगाड़े से सदा जागते रहो । ( कारण यह है कि ) कष्टकारक इन्द्रियरूपी चोर बहुत समय से सञ्चित धर्म को चुरा लेते हैं, हर लेते हैं ॥ १ ॥

टीका--संयम एव धर्मरक्षणस्य परमोपाय इति प्रतिपादयन्नाह भिक्षुःबौद्धधर्मावलम्बी संन्यासीसंयच्छतेति । निजोदरम्=निजम्=स्वीयम्, उदरम्=जठरम्, संयच्छत=सङ्कोचयत, केवलमुदरं पूरयितुमेव जीवनं न नाशयतेति भावः । ध्यानपटहेन=ध्यानमेव पटहः=ढक्का, तेन, नित्यम्=सदैव, जाग्रत=विनिद्राः तिष्ठत, जाग्रतः पुंसो न चौर्यादिकं संभवतीति भावः । किमर्थमत आहविषमाः=दुरन्ताः, कष्टकारिण इत्यर्थः इन्द्रियचौराः=इन्द्रियाणि=चक्षुरादीन्येव चौराः=तस्कराः, चिरसञ्चितम्=सुदीर्घकालात् सुरक्षितम्, धर्मम्=पुण्यम्, सुकृतम्, हरन्ति=मुष्णन्ति । अत इन्द्रियनिग्रहार्थं यत्नं कुरुतेति भावः । रूपकमलंकारः, आर्या वृत्तम् ॥ १ ॥

विमर्श—बौद्ध भिक्षु लोगों को सावधान करने के लिये उपर्युक्त बाते कहता है ॥ १ ॥

अष्टमोऽङ्कः / ४२७

अवि अ, अणिच्चदाए पेक्खिअ केवलं दाव धम्माणं शलणम्हि ।
(अपि च, अनित्यतया प्रेक्ष्य केवलं तावद्धर्माणां शरणमस्मि ।)
पञ्चजण जेण मालिदा इत्थिअ मारिअ गाम रक्खिदे ।
अवले अ चण्डाल मालिदे अवसंवि शे णले शग्गं गाहदि ॥ २ ॥
(पञ्चजना येन मारिताः स्त्रियं मारयित्वा ग्रामो रक्षितः ।
अबलश्च चाण्डालो मारितः अवश्यं स नरः स्वर्गं गाहते ॥ २ ॥)


अर्थ— और भी, (संसार के सभी पदार्थों को) अनित्यत्व रूप से देख कर धर्म की शरण में आया हूँ।

अन्वयः——येन, पञ्चजनाः, मारिताः, स्त्रियम्, मारयित्वा, ग्रामः, रक्षितः, अबलः, चण्डालः, च, मारितः, सः, नरः, स्वर्गम्, अवश्यम्, गाहते ॥ २ ॥

शब्दार्थ —येन=जिस व्यक्ति ने, पञ्चजनाः=पाँच (कर्मेन्द्रियरूपी) लोगों को, मारिताः,=मार डाला है, स्त्रियम्=अविद्यारूपी स्त्री को, मारयित्वा=मार कर, ग्रामः=आत्मा अथवा शरीर की, रक्षितः=रक्षा की है; च=और, अबलः=दुर्बल, चाण्डालः=चाण्डाल (घमंड) मारितः=मार डाला.है, सः=ऐसा वह, नरः=मनुष्य, स्वर्गम्=स्वर्ग को, अवश्यम्=निश्चित ही. गाहते=प्राप्त करता है ॥२॥

अर्थ - जिस व्यक्ति ने पाँच (कर्मेन्द्रिय रूपी) लोगों को मार डाला है, [निष्क्रिय बना दिया है।] अविद्यारूपी स्त्री को मार कर [समाप्त कर] आश्रयभूत ग्राम=शरीर की रक्षा की है। और अबल घमण्डरूपी चाण्डाल को भी मार डाला है, ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से स्वर्ग प्राप्त करता है ॥ २ ॥

टीका—-कीदृशो जनः स्वर्गं प्राप्नोतीत्यत्र भिक्षुः मार्गं निर्दिशति-पञ्चेति । येन=जनेन, पञ्चजनाः=पञ्चकर्मेन्द्रियाणि, मारिताः=विनाशिताः, स्वस्वविषयेभ्यो निवार्य स्वाधीनाः कृता इत्यर्थः, स्त्रियम् = अविद्यारूपाम्, मारयित्वा = तत्त्वज्ञानेन विनाशय, ग्रामः=आत्मा, शरीरं वा, रक्षितः-परिपालितः, च = तथा, अबलः=दुर्बलः, चाण्डालः=अहङ्कारः, मारितः=विनाशितः, सः=पूर्वोक्त-वैशिष्ट्य-युतः, नरः=मनुष्यः, स्वर्गम्=सुरलोकम्, गाहते=प्राप्नोति । अत्र पञ्चजन-स्त्री-ग्राम-चाण्डालशब्दाः लक्षणया इन्द्रियादिपदार्थबोधका इति बोध्यम् । वैतालीयँ वृत्तम् ॥ २ ॥

विमर्श—यहाँ 'पञ्चजनाः, यह पाँच कर्मेन्द्रियों को, 'स्त्रियम्' अविद्या को, : ग्रामः' आत्मा या शरीर को, 'चाण्डालः' अहङ्कार को प्रतिपादित करते हैं। इसमें वैतालीय छन्द है, लक्षण -

'षड्विषमेऽष्टौ समे कलास्ताश्च समे स्युनोनिरन्तराः ।
न समात्र पराश्रिता कला वैतालीयंन्ते रलौ गुरु ॥ २ ॥

४२५मृच्छकटिकम्

शिल मुण्डिदे तुण्ड मुण्डिदे चित्त ण मुण्डिदे कीश मुण्डिदे।
जाह उण अ चित्त मुण्डिदे शाहु सुट्ठु शिल ताह मुण्डिदे ॥ ३ ॥
(शिरो मुण्डितं तुण्डं मुण्डितं चित्तं न मुण्डितं किं मुण्डितम् ?
यस्य पुनश्च चित्तं मुण्डितं साधु सुष्ठु शिरस्तस्य मुण्डितम् ॥ ३ ॥)

गिहिद-काशाओदए एशे चीवले, जाव एदं लट्टिअ-शालकाहकेल्के सज्जाणे पविशिअ पोक्खलिणीए पक्खाजिअ लहुं लहुं अवक्कमिश्शं।

अन्वयः—शिरः, मुण्डितम्, तुण्डम्, मुण्डितम्, (यदि) चित्तम्, न, मुण्डितम्, (तदा) किम्, मुण्डितम्; पुनः, यस्य, च, चित्तम्, साधु, मुण्डितम्, तस्य, शिरः, सुष्ठु, मुण्डितम् ॥ ३ ॥

शब्दार्थशिरः=शिर, मुण्डितम्=मुड़ा लिया, तुण्डम्=मुंह (दाढ़ी-मूँछ), मुण्डितम्=मुड़ा ली, यदि=यदि, चित्तम्=मन, =नहीं, मुण्डितम्=स्वच्छ कराया, तदा=तब, किम्=क्या, मुण्डितम्=मुड़ाया, स्वच्छ कराया, पुनः च = और फिर, यस्य=जिसका, चित्तम्=चित्त; मुण्डितम्=मुड़ाया हुआ, स्वच्छ करवाया हुआ है, तस्य=उसका, शिरः=सिर, सुष्ठु=अच्छी प्रकार से, मुण्डितम्=मुड़ा हुआ है ॥ ३ ॥

अर्थ—शिर मुड़ा लिया, मुख (दाढ़ी मूंछ) मुड़ा ली किन्तु यदि चित्त नहीं मुड़ाया तो उसने क्या मुड़ाया। और जिसने चित्त मुड़ाया उसीने शिर भी अच्छी प्रकार मुड़ा लिया ॥ ३ ॥

टीका—बाह्यशरीरशुद्धिरेव न पर्याप्ता, किन्तु अन्तःशुद्धिरपीति प्रतिपाद-यति—शिर इति। शिरः=मस्तकम्, तत्रास्थाः केशा इत्यर्थः, मुण्डितम्=केशरहितं कृतम्, तुण्डम्=मुखम्, मुण्डितम्=श्मश्वादिशून्यं कृतम्, यदि=परन्तु यदि, चित्तम्=अन्तःकरणम्, =नैव, मुण्डितम्=स्वच्छं कृतम्, किं मुण्डितम्=किं परिष्कृतम्, न किमपीति भावः। पुनश्च, यस्य=जनस्य, चित्तम् = अन्तःकरणम्, मुण्डितम्=स्वच्छं कृतम्, विषयविकारशून्यं सम्पादितम्, तस्य=जनस्य, शिरः=मस्तकम्, साधु=सम्यग् रूपेण, मुण्डितम्=स्वच्छं कृतम्। एवञ्च चित्तशुद्धिरेव तात्त्विकी तदर्थमेव यतनीयमिति तदभिप्रायः। वैतालीयं वृत्तम् ॥ ३ ॥

विमर्श—भिक्षु का आशय यह है कि जब तक चित्त की शुद्धि नहीं होती है तब तक शिर, दाढ़ी मूंछ मुड़ाना ढोंग है। कवि की यह व्यङ्ग्योक्ति है। इसमें भी वैतालीय छन्द है। लक्षण पूर्वश्लोक के विमर्श में देखें ॥ ३ ॥

शब्दार्थगृहीतकषायोदकम्=कसैले रंग के पानी को सोख लेने वाला, चीवरम्=वस्त्र-खण्ड, पुष्करिण्याम्=पोखरी तलैया में, लघु-लघु = बहुत जल्दी, नासिकाम्=नाक को, विदध्वा=छेद कर, अपवाहयति=बाहर निकाल देता है, अशरणः=असहाय।

अष्टमोऽङ्कः ४२६

( गृहीत-कषायोदकमेतत् चीवरम्, यावदेतत् राष्ट्रियश्यालकस्य उद्याने प्रविश्य पुष्करिण्यां प्रक्षाल्य लघु लघु अपक्रमिष्यामि । ) ( परिक्रम्य तथा करोति ) ।

( नेपथ्ये )

शकारः—चिट्ठ, ले दुट्ठशमणका ! चिट्ठ । (तिष्ठ, रे दुष्टश्रमणक तिष्ठ ।)

भिक्षुः—( दृष्ट्वा सभयम् ) ही अविदमाणहे ! एशे शे लाअशाल-शण्ठाणे आगदे । एक्केण भिक्खुणा अवलाहे किदे अण्णं वि जंहिं जंर्हि भिक्खुं पेक्खदि, तहिं तहिं गोणं विअ णासं विन्धिश्र ओवाहेदि । ता कहिं अशलणे शलणं गमिश्शं ? अथवा भट्टालके ज्जेव बुद्धे मे शलणे । ( आश्चर्यम् । एष स राज-श्याल-संस्थानक आगतः । एकेन भिक्षुणा अपराधे कृते, अन्यमपि यस्मिन् यस्मिन् भिक्षुं प्रेक्षते, तस्मिन् तस्मिन् गामिव नासिकां विद्ध्वा अपवाहयति । तत् कस्मिन् अशरणः शरणं गमिष्यामि ? । अथवा भट्टारक एव बुद्धो मे शरणम् । )

( प्रविश्य सखड्गेन विटेन सह । )

शकारः—चिट्ठ, ले दुट्ठशमणका ! चिट्ठ आवाणअ-मज्झ-पविट्ठश्श विअ लत्तमूलअश्श शीशं दे मोडइश्शं । (तिष्ठ रे दुष्टश्रमणक ! तिष्ठ । आपानक-मध्य-प्रविष्टस्येव रक्तमूलकस्य शीर्षं ते भङ्क्ष्यामि । ) ( इति ताडयति । )


अर्थ—यह वस्त्र कसैले=गेरुआ रंग के पानी को सोख चुका है, ( रंग गया है ) तो अब राजा के शाले के बगीचे में घुस कर पुष्करिणी पोखरी में धोकर जल्दी ही भाग चलूँगा । ( घूमकर वैसा ही करता है । )

( पर्दे के पीछे से )

अर्थशकारः—रुक जा दुष्ट बौद्ध संन्यासी, रुक जा ।

भिक्षु—( देख कर भय के साथ ) आश्चर्य है, यह तो राजा का ( दुष्ट ) शाला संस्थानक आ गया । किसी एक भिक्षुक के अपराध करने पर जहाँ कहीं भी जिस किसी भी भिक्षुक को देखता है वहाँ वहाँ बैल के समान [ उसकी ] नाक को छेद कर बाहर भगा देता है । इसलिये बेसहारा अब मैं किसकी शरण में जाऊँ ? अथवा स्वामी बुद्ध ही मेरे रक्षक हैं ।

शब्दार्थ—आपानक=मदिरा पीने वालों की गोष्ठी, रक्तमूलकस्य=लाल मूली ( ताजी मूली ) के, भङ्क्ष्यामि=काट डालूँगा, निर्वेदधूतकषायम्=वैराग्य के कारण गेरुआ रंग के कपड़े पहनने वाले, सुखोपगम्यम्=आनन्दपूर्वक सेवन करने योग्य ।

( तलवारधारी विट के साथ प्रवेश करके )

अर्थशकार—रुक जा दुष्ट बौद्ध संन्यासी ! रुक जा । मदिरा पीने वालों के बीच में रखी हुई लाल (ताजी) मूली के समान तेरा शिर काट डालूँगा । [ काट डालता हूँ । ] [ यह कह कर पीटता है । ]

४३० | मृच्छकटिकम्

विटः--काणेलीमातः ! न युक्तं निर्वेद-धृत-कषायं भिक्षुं ताडयितुम्। तत् किमनेन। इदं तावत् सुखोपगम्यमुद्यानं पश्यतु भवान्।

अशरण-शरण-प्रमोदभूतैर्वनतरुभिः क्रियमाण-चारु-कर्म।
हृदयमिव दुरात्मनामगुप्तं नवमिव राज्यमनिर्जितोपभोग्यम् ॥ ४ ॥

[विट--काणेली के बच्चे ! वैराग्य के कारण गेरुआ रंग के वस्त्र धारण करने वाले संन्यासी को पीटना ठीक नहीं है। तो इससे क्या लाभ ? आनन्दपूर्वक उपभोग करने योग्य इस बगीचे को आप देखिये।

अन्वयः-- अशरणशरणप्रमोदहेतुभूतैः, वनतरुभिः, क्रियमाणचारुकर्म, दुरात्मनाम्, हृदयम्, इव, अगुप्तम्, नवम्, राज्यम्, इव, अनिर्जितोपभोग्यम्, [ इदम्, उद्यानम्, पश्यतु ] ॥ ४ ॥

शब्दार्थ-- अशरण-शरण-प्रमोद-हेतुभूतैः = बेघर लोगों के घर और आनन्दस्वरूप, वनतरुभिः = जगल के वृक्षों के द्वारा, क्रियमाणचारुकर्म = जिसमें सुन्दर कार्य किया जा रहा है ऐसे, दुरात्मनाम् = दुष्टों के, हृदयम् इव = हृदय के समान, अगुप्तम् = अनियन्त्रित, नवम् = नये, राज्यम् इव = राज्य के समान, अनिर्जितोपभोग्यम् = उपभोगयोग्य सभी वस्तुओं को समुचित रूप से वश में न किये गये, [ इदम् = इस, उद्यानम् = बगीचे को, पश्यतु = देखिये ] ॥ ४ ॥

अर्थ-- बेघर लोगों के घर और आनन्दस्वरूप वन के वृक्षों के द्वारा जिसमें सुन्दर कार्य किया जा रहा है, जो दुष्टों के हृदय के समान अनियन्त्रित [ स्वेच्छया विहारयोग्य ] है, जो नये [ तत्काल-प्राप्त ] राज्य के समान उपभोगयोग्य वस्तुओं को अच्छी तरह वश में नहीं किये हुये हैं, अथवा बिना जीता हुआ और सभी के उपभोग के योग्य है, ऐसे बगीचे को देखिये ॥ ४ ॥

टीका-- विटः उद्यानस्य सुखोपगम्यतां प्रतिपादयति-अशरणेति। अशरणानाम् = गृहरहितानाम्, 'शरणं गृहरक्षितोः' इत्यमरः, शरणैः = आश्रयैः, तथा प्रमोदहेतुभूतैः = आनन्दस्वरूपैः वनतरुभिः = उद्यानस्थवृक्षैः, क्रियमाणम् = सम्पाद्यमानम्, चारु = रमणीयम्, कर्म = कार्यम्, [ पुष्पफलादिदानात् छायादिदानाच्चेति भावः, ] यत्र, तादृशम्, दुरात्मनाम् = दुष्टानाम्, हृदयम् = चित्तम्, इव = तुल्यम्, अगुप्तम् = अनियन्त्रितम्, स्वेच्छापूर्वकविहारयोग्यम्, तथा, नवम् = नवीनम्, सद्य एव विजितम्, राज्यम् = साम्राज्यम्, इव = यथा, अनिर्जितम् = शासनेन अनायतीकृतम्, उपभोग्यम् = सर्वजनभोगयोग्यम्, इदम्, उद्यानं पश्यतु भवानिति गद्यस्थेनान्वयः कार्यः। उपमालंकारः, पुष्पिताग्रा वृत्तम् ॥ ४ ॥

शब्दार्थ-- उपासकः = सेवा करने वाला, बुद्ध का पुजारी, आक्रोशति = गाली दे रहा है, धन्यः = प्रशंसनीय, पुण्यः = पवित्र, श्रावकः = स्तुतिकर्ता चारण, कोष्ठकः =