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नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

३४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता विप्र भी हो तो वह दीक्षादाता आचार्य नहीं हो सकता है। इसी प्रकार जो कम अवस्था या आयुवाला और अपकृष्टजाति का गुणशाली भी पुरुष हो तो वह क्रमशः अपने से प्रकृष्टजाति के साधक को मन्त्रादि दीक्षा प्रदान करने वाला ‘आचार्य’ नहीं होगा। यदि कोई आपद्धर्म की स्थिति न हो परन्तु आपद्धर्म में ऐसी विज्ञ तथा हीन जाति भी आचार्यरूप में ली जा सकती है॥४१॥ न जातु मन्त्रदा नारी न शूद्रो नान्तरोद्भवः । नाभिशस्तो न पतितः कामकामोऽप्यकामिनः ॥४२॥ आपद स्थिति में हीनजाति के (द्वारा दीक्षित होने में) आचार्यत्व की अनुमति रहने पर भी कोई स्त्री मन्त्र की देनेवाली नहीं रखनी चाहिए और न ही कोई प्रतिलोमजाति में। उत्पन्न शुद्र ही मन्त्रदाता होता है। इसी प्रकार जो महापातकी या पतित हो तो उसे भी मन्त्रदाता आचार्य नहीं रखते हैं तथा जो सांसारिक कामनाओं से रहित हों तो उसे भी मन्त्रदाता नहीं रखा जावे॥४२॥ स्त्रियः शूद्रादयश्चैव बोधयेयुर्हिताहितम् । यथार्हं माननीयाश्च नार्हन्त्याचार्यतां क्वचित् ॥४३॥ स्त्री तथा शूद्रादि हिताहित की सलाह दे सकते हैं तथा वे अपनी स्थिति के अनुरूप सम्मान के भी अधिकारी होते हैं परन्तु उन्हें मन्त्रदाता आचार्य के रूप में नहीं रखा जा सकता है॥४३॥ किमप्यत्राभिजायन्ते योगिनः सर्वयोनिषु । प्रत्यक्षितात्मनाथानां नैषां चिन्त्यं कुलादिकम् ॥४४॥ इस संसार में योगीजन अनेक निकृष्ट तथा उत्तम योनि तथा जातियों में जन्म ले लेते हैं अतः जिसने अपनी साधनाओं के कारण भगवत्-तत्त्व का साक्षात्कार प्राप्त कर लिया हो ऐसे योगीजन के लिये कुलादि का विचार नहीं माना जाता है। अतः ऐसे किसी भी योगी से मन्त्रदीक्षा लेना निषिद्ध नहीं है॥४४॥ विश्वात्मन्यात्मनो न्यासं धिया वृत्तिञ्च शाश्वतीम् । मन्त्रेणोच्चारयेद् यस्तु स आचार्यः परो मतः ॥४५॥ जो विहित आचार दृष्टि तथा भक्ति के तात्विक भावों से युक्त मन्त्र का उच्चारण कर उपकारातिशय के भाव के कारण सभी के अन्तर्यामी भगवान् में अपने शिष्यको प्रपत्ति के रूप में न्यास-योग का सम्पादन करवाता हो तथा अपने ज्ञान से जो शाश्वती-वृत्ति को मन्त्रों के द्वारा कहलवाता हो तो उसे परम या उत्तम आचार्य माना जाता है॥४५॥

हिन्दीटीकासहित ३५ शान्तोऽनसूयुः श्रद्धावान् गुर्वर्थार्पितमद्वृत्तिकः । शुचिः प्रियहितो दान्तः शिष्यश्चोक्तो मनीषिभिः ॥४६॥ विद्वान ऐसे गुणवाले को जो कि शान्त प्रकृतिवाला, किसी से भी असूया न रखनेवाला, अर्थराशि तथा अपने कार्यों को जो आपने गुरुजन के लिये करने में उद्यत हो (अपनी वृत्ति भी गुरू के हित में चलाने वाला हो) शुद्ध वृत्ति तथा आचरणशील, अपने आचार्य के प्रिय तथा हित में तल्लीन रहनेवाला तथा अपनी इन्द्रियों को वश में रखनेवाला, अतिशय आसंग से हीन जो रहता हो उसे 'शिष्य' समझना चाहिए तथा जो उपदिष्ट अर्थ के ग्रहण करने में समर्थ बुद्धिवाला या दक्ष हो॥४६॥ न मत्तोन्मत्तपतिताभिशस्तक्रूरनास्तिकाः । नानर्थिनो न चाज्ञाताः कर्तव्याः मन्त्रगामिनः ॥४७॥ अतएव जो मत्त या उन्मत्त प्रकृति के हों, जो पतित हों, जो अभिशस्त क्रूर तथा नास्तिक हो, जो अर्थ के बोध में असमर्थ हों तथा जिनका कुलादि परिचय न हो तो ऐसे शिष्यों को न्यास का मन्त्रोपदेश नहीं दिया जावे॥४७॥ स्त्रीणाञ्च पतिमित्रादीननतिक्रम्य सत्तमान् । अनुज्ञया वाप्यन्येभ्यः स्मृतो मन्त्रपरिग्रहः ॥४८॥ स्त्रियों के पति, मित्र, पिता तथा श्वसुर जैसे सम्बन्धियों तथा श्रेष्ठ विद्याओं से युक्त जन को न छोड़कर अथवा अन्यों से भी अपने पूज्यजन से अनुमति लेकर मन्त्रग्रहण किया जा सकता है (पति, पिता तथा अन्य सम्मान्य पुरुष हों तो उनसे भी अनुज्ञा लेकर मन्त्र ग्रहण किया जा सकता है)॥४८॥ वैदिकास्तान्त्रिकाश्चैव यथार्था लौकिकास्तथा । प्रपत्तौ विहिता मन्त्रास्तत्र तत्र व्यवस्थया ॥४९॥ इस न्यास विधि में प्रपत्ति के लिये वैदिक, तान्त्रिक, उन मन्त्रों के अर्थवाले लौकिक भाषा वाले मन्त्रों को भी विहित माना गया है। ये मन्त्र यथेष्ट दिये जा सकते हैं तथा ये आचार्य के अधिकारी भेद की व्यवस्था के अनुगत होते हैं॥४९॥ न्यासिनो न्यास एव स्यान्निष्ठा तत्पूर्विकाः क्रियाः । व्यापकैर्नैष्ठिकैर्वाह्यैः कुर्यात् तेऽप्यर्पणे सताः ॥५०॥ १ कारिका में प्रयुक्त यथार्थ पद का आशय है कि ऐसे मन्त्र जो वैदिक तथा तन्त्रशास्त्र के मन्त्रों के समान शब्द या अर्थवाले हों तो वे यथार्थ मन्त्र होते हैं। यहाँ व्यवस्था यही है कि आचार्य त्रैवर्णिक शिष्यों को उनकी सामर्थ्य के तथा बुद्धि के अनुरूप वैदिक मन्त्र तथा तन्त्रादि आगमों से प्राप्त मन्त्र की दीक्षा दे सकते हैं। इसी प्रकार अत्रैवर्णिक अशूद्रादि को भी आगमिक मन्त्र, प्रतिलोमज जाति के शिष्य को वैदिकादि के समानार्थक उपयुक्त मन्त्र को तथा लौकिक भाषा के मन्त्रों को दिया जा सकता है।

३६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता जिसे आचार्य न्यास विधि में प्रपत्ति प्रतिपादक मन्त्र देवें उसे उसमें निष्ठा रखना चाहिए तथा वह उसी का नित्य जपादि करे। अर्चनादि किया भी उसी मन्त्र को ध्यान में रखते हुए रखे। अथवा यह कार्य व्यापकों अर्थात् आम्नात मन्त्रों के तथा नैष्ठिक मन्त्रों के जो दीक्षा प्राप्त मन्त्र रत्न से भिन्न हो तो उनसे भी किया जा सकता है। ये मन्त्र भी न्यास या प्रपत्ति में मान्य होते हैं। क्योंकि ऐसे मन्त्र भी 'नमः' आदिशब्दों से युक्त रहने से इनसे भी प्रपत्ति की स्थिति या प्रतिपादकता बनती ही है॥५०॥ करेण संस्पर्शयन् गात्रं मन्त्रविद् भावयेद् दृशा । एषा वा सर्ववर्णानां दीक्षेत्याह मुनिः स्वयम् ॥५१॥ मन्त्र-विधाता आचार्य अपने हाथ से शिष्य के शरीर का स्पर्श करते हुए तथा उसे (अपनी दृष्टि से) देखते हुए दीक्षा मन्त्र प्रदान करें। सभी वर्णों को दी जाने वाली दीक्षा का यही मान्य सिद्धान्त है। जो भारद्वाज मुनि ने स्वयं कहा है॥५१॥ यां सिद्धिं वैष्णवैर्मन्त्रैराधत्ते वैष्णवो गुरुः । सर्ववेदधरोऽप्यन्यो नान्यैः कुर्वीत् तादृशीम् ॥५२॥ मन्त्रदीक्षा-प्रदाता आचार्य जिन वैष्णव मन्त्रों से जितनी सिद्धि प्राप्त किये रहता है वह सभी वेदों के ज्ञाता भी अन्य गुरू दूसरे अवैष्णव मन्त्रों से वैसी सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकता है॥५२॥ वैदिकास्तान्त्रिकाश्चैव द्वये मुख्या द्विजन्मनाम् । शूद्रानुलोमजातीनां मन्त्राः स्युस्तान्त्रिकाः परम् ॥५३॥ भाषाख्या लौकिका मन्त्राः प्रपत्त्यर्थविभावनावः । सर्वेभ्यः प्रतिलोमेभ्यो देयाः कामं द्विजातिभिः ॥५४॥ द्विजों में दो प्रकार के साधक मुख्य होते हैं-जिनमें एक वैदिक तथा दूसरे तान्त्रिक (आगमिक) हैं। इनमें जो शूद्र वर्ण तथा अनुलोम-जातियों में उत्पन्न जन हैं उनके हितकर (तथा उनसे साध्य) तान्त्रिक-मन्त्र (होते) हैं। ये लौकिक-भाषाओं में (भाषाओं में) भी प्राप्त होते हैं जो लौकिक मन्त्र के रूप में प्रपत्ति के भावों को दिखलाने वाले होते हैं । ऐसे उपयोगी मन्त्रों को भी ब्राह्मण आँचायों तथा दीक्षा गुरुओं के द्वारा ही सभी शूद्र तथा प्रतिलोम जाति के भक्त शिष्यों को दीक्षापूर्वक यथेष्ट रूप में ग्रहण करना चाहिए॥५३-५४॥ १. सभी प्रकार के मन्त्रों को शिष्य की क्षमता आदि का विचार कर दीक्षादाता आचार्य के द्वारा प्रदान किया जाए तथा ब्राह्मण आचार्य ही भाषा के मन्त्रों को भी दीक्षा के साथ प्रदान करें।

हिन्दीटीकासहित ३७ मन्त्रं नियतमग्र्याणां सो हीनाय प्रयच्छति । स वै हीनगुरुर्निन्द्यस्तेन सार्द्धं पतत्यधः ॥५५॥ अग्रजात त्रैवर्णिक द्विजों के लिये शास्त्रों में मान्य तथा नियत वैदिक मन्त्रों को जो हीन या शूद्रादिवर्णों को दीक्षा प्रदान करते हुए देते हैं वे हीन गुरु होकर निन्दनीय स्थिति को प्राप्त कर साधक शिष्य के साथ ही नरक में जाते हैं। (अतः शूद्रादि जातियों को तान्त्रिक मन्त्र ही साधना के लिये उपयुक्त हैं।)॥५५॥ तदेवं स्वोचितैरेव मन्त्रैर्मन्त्रविदाश्रयाः । श्रयेयुः शरणं सर्वे सर्वभूतेश्वरं हरिम् ॥५६॥ अतएव मन्त्रवेत्ता गुरु का आश्रय लेकर अपने लिये नियत मन्त्रों को ग्रहण करते हुए सभी प्राणियों के अधिपति श्री¹विष्णु की प्रपत्ति के द्वारा उनकी धारणा प्राप्त करना चाहिए॥५६॥ पुण्येऽनुकूले समये देशे भागवते शुभे । निमज्ज्य नियतस्तीर्थे प्रणिपत्याश्रयेद् गुरुम् ॥५७॥ इसकी दीक्षा लेने वाला साधक भक्त किसी उत्तम अनुकूल तथा पुण्यशाली दिवस या तिथि को तथा शुभदाता भागवत तीर्थ या प्रदेश में संयमित मन के साथ सर्वप्रथम पवित्र भाव से नियत तीर्थ में स्नान करें तथा फिर गुरु का सान्निध्य प्राप्त कर उन्हें आचारानुरूप प्रणाम करें॥५७॥ आचार्यश्चोपसन्नाय भक्त्याभ्यर्च्य जनार्दनम् । गुरून् प्रणम्य मन्त्रेण प्रपत्तिं प्रतिपादयेत् ॥५८॥ तब दीक्षा प्रदान करने के पूर्व मन्त्रदाता आचार्य उस शिष्य के शरण आने पर अपने इष्टदेव श्रीमहाविष्णु का सर्वप्रथम पूजन करें तथा बाद में अपने पूज्य गुरु को प्रणाम कर गुरुपरम्परा पूर्वक मन्त्र को उस समीपवर्ती शिष्य को मन्त्र दीक्षा देकर 'प्रपत्ति' या न्यास योग को सम्पादित करें॥५८॥ अथ स्त्रीशूद्रसङ्कीर्णानिर्मला पतितादिषु । अनन्येनान्यदृष्टौ च कृतापि न कृता भवेत् ॥५९॥ और जो स्त्री, शूद्र तथा अनुलोम प्रतिलोम जातियां (संकीर्ण) हैं, जो आचार्य के आश्रय-ग्रहण से हीन है तथा जो महापातकादि से युक्त हैं वे यदि केवल शास्त्रमात्र से सम्पादित ज्ञानवाले किसी भी आचार्य को गुरु के रूप में प्राप्त कर उनसे न्यास या प्रपत्ति की १ यहाँ कारिका में प्रयुक्त 'सर्वभूतेश्वर' पद का आशय है कि श्रीविष्णु सभी प्राणियों के शरण दाता हैं अतः सभी उनकी प्रपत्ति का अधिकार रखते हैं।

३८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता दीक्षा लेते हैं तो उनकी यह प्रपत्ति इस प्रकार होने पर भी न किये के समान निष्फल है (अतः किसी पाञ्चरात्र आगम के वेत्ता तथा पारम्परिक विद्वान् को ही आचार्य मानकर उनके द्वारा ही मन्त्र से दीक्षित होना उत्तम है)॥५९॥ अतोऽन्यत्राशु विधिवत् कर्तव्या शरणागतिः । उपदेष्टा तु मन्त्रस्य मूढः प्रच्यवते ह्यधः ॥६०॥ अतएव स्त्री, शूद्रादि से भिन्न आचार्य के प्राप्त होने पर ही उनके द्वारा ही विधिवत् श्री हरि की शरणागति की दीक्षारूप प्रपत्ति से न्यासयोग को मन्त्रउपदेशपूर्वक ग्रहण करना चाहिए। मन्त्रों के स्त्रीशूद्रादि को उपदेश करते रहने पर आचार्य भी मूढ होकर पतन को प्राप्त करते हैं¹॥६०॥ अनादेर्वासनायोगाद् विपरीतादिहात्मनः । स्मृतिर्न जायते विष्णौ कुत एवार्पणे मतिः ॥६१॥ और जो अनादिदुर्वासनाओं से कलुषित अन्तरात्मावाले हैं उनमें स्थित अनादि वासनाओं के कारण आत्मस्वभाव से विपरीतस्थिति बन जाने से उनमें स्वयं मे श्रीविष्णु को समर्पित करने की शरणागति भाव की स्मृति तक नहीं आती हो तो फिर उनको 'न्यास' की भावना कहाँ से आ सकती है॥६१॥ स्वपापसम्भवादेव कुलात् संसर्गतो ऽन्यतः । देशात् कालात् स्वभावाच्च प्रपद्यन्ते न केशवम् ॥६२॥ वे अपने पापों के उदय के बने रहने के कारण तथा कुल तथा अन्य निषिद्ध कर्मों तथ उनके कर्ताजन के संसर्ग में रहने के कारण, दूसरे भगवद्विमुख जन से युक्त रहने के कारण, देश, काल तथा स्वभाव के वातावरण में स्थित होकर श्रीमद्विष्णु की शरण प्राप्त करने के अवसरों से स्वतः ही वञ्चित रहते हैं॥६२॥ अविज्ञाय सदा शुद्धं नराः नारायणं प्रभुम् । अशुद्धानामहो ऽन्येषां दास्यमिच्छन्त्यबुद्धयः ॥६३॥ ऐसे नर स्वतः की पापमूलक दुर्बुद्धि के कारण शुद्ध-स्वरूप वाले श्रीनारायण को ठीक से न जानकर अन्य इष्ट देवता की शरण ग्रहण करने लगते है और वे अपनी अल्पबुद्धि के कारण कार्यवश राजस तथा तामस गुणों के अधिपति ब्रह्मादि अन्य देवगणों की शरण या उपासना की दीक्षा ग्रहण कर लेते हैं॥६३॥ केचित् सर्वेश्वरं विष्णुमशेषदुरितापहम् । कामकामाः प्रपद्यन्ते न ते दास्यं परं विदुः ॥६४॥ १ यहाँ 'मूढः प्रच्यवते ऽधमः' पाठ भी मिलता है जिसका अर्थ है कि अधम या शूद्र अपनी अहंबुद्धि से यदि मन्त्र का उपदेश देता है तो उसका पतन हो जाता है।

हिन्दीटीकासहित ३९ इनमें से कुछ तो समस्त दुरित के अपहर्त्ता, सभी के प्रभु श्री विष्णु की शरण में किसी कामनाके अभिभूत होकर जाते हैं। ऐसे जन भी श्री विष्णु का दास्यभाव या भक्त की स्थिति प्राप्त नहीं करते हैं।१।।६४।। बहुजन्मकृतैः पुण्यैरात्मनः क्षीणकल्मषाः । हरिं सन्तः प्रपद्यन्ते तद्दास्यैकफलार्थिनः ॥६५॥ किन्तु अनेक जन्मों में पुण्य का आचरण करने के कारण उनसे अपने कल्मष या पापों को दूर कर लेने वाले सन्तजन ही उन श्रीविष्णुरूप के दास्यभाव की फलरूप में इच्छा रखने पर उन्हें प्राप्त करते हैं, क्योंकि वे उनके परब्रह्मरूप से अभिज्ञ हो जाते हैं।।६५।। कृतिनां वीतमोहानां केशवे निहितात्मनाम् । स्वदते केवलं दास्यं स्वधर्मकरणादिकम् ॥६६॥ परन्तु श्री विष्णु में अपनी आत्मा को निहित या समर्पित करने वाले तथा विगत-मोहादि-भाव वाले (अर्थपञ्चक विषयक अज्ञान से रहित) तथा अपने नियत धर्मों का आचरण करनेपर पवित्रभाव के कारण वे श्रीविष्णु के दास्यभाव का फलास्वादन करने में समर्थ होते हैं।।६६।। वासुदेवं प्रपन्नानां तद्दास्यैकरसात्मनाम् । भेदो वीतभयानां हि नात्र कश्चित् परत्र वा ।।६७।। अतएव जब अपने नियत धर्मों में स्थित रहने वाले होकर जो श्री वासुदेव की प्रपन्नता या शरणरूप समर्पण भाव को रखते हैं, जिसमें उनकी दास्यभावना की प्राप्ति के कारण आत्मानन्द का अनुभव हो जाता है तो ऐसे वीतभय या कहीं से प्राप्त किसी भी भय से मुक्त होकर इस लोक तथा परलोक में भेद भावना से रहित हो जाते हैं तथा प्रायः मुक्तिभाव की प्राप्ति करने वाले होते हैं।।६७।। इह श्रुत्यादिनियता वृत्तिरेव स्वयं फलम् । परत्र च परेशस्य कामात् कामप्रवृत्तयः ॥६८॥ ऐसे धर्मनिष्ठजन को इस लोक में श्रुति आदि से विहित वृत्ति वाली जीविका १ अर्थात् जिन श्रीविष्णु की समस्त पातकों के नाश करने की सामर्थ्य है उनकी क्षुद्र लौकिक अपेक्षावाली कामनाओं के वशीभूत होकर शरण ग्रहण करनेवाले एकान्तीभाव या उनके दास्य या प्रपत्ति के न्यासयोग को प्राप्त करने का अधिकार नहीं रखते है। २ कारिका में स्थित 'सन्त' पद का अर्थ है परमेश्वर श्रीविष्णु के स्वरूप से परिचितजन। 'अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद सन्तमेनं ततो विदुः' से जिनका स्वरूप श्रुति भी बतलाती है। ३ वीतभय-जिसे कहीं से भय न आवे। यहाँ भी 'न बिभेति कुतश्चन' इस वचन को ध्यान में रखकर यह कहा गया है जो श्रुति अनुमोदित है।

४० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता (उन्हें) मिल जाना ही पूर्वपुण्यों का फल होता है तथा उस लोक में भी परेश श्रीविष्णु की कामना के संकल्प रहने से स्वच्छन्दरूप में उन्हें श्रीभगवद्विष्णु के प्रसाद से स्वाभिमत मोक्ष की (उनके किंकर भाव से युक्त) प्राप्ति भी हो जाती है।१॥६८॥ निक्षिप्यात्मानमात्मीयमशेषमखिलात्मनि । क्रियाश्च सकलास्तत्र वर्तन्ते वीतकल्मषाः ॥६९॥ मन्यते च स्वकीयान्नः स्वप्रीतयै स्वोचितां स्वयम् । नाथः स्वकीयसेवां तां वृत्तिं कारयतीति वै ॥७०॥ जो अखिलभुवनों के अधिपति श्रीभगवान् विष्णु में स्वयं की आत्मा को अर्पित या स्थापित कर भगवदनुसन्धान में अपना समय बिताते हैं तथा सभी क्रियाएं भी भगवदर्पित कर देते हैं वे निष्पाप होकर ऐसे किसी भी वस्तु पर अपना अधिपत्य नहीं मानते तथा अपनी प्रीति के लिये किसी अन्य देव को अपने अर्चन के योग्य नहीं मानते हैं किन्तु ईश सेवा के आचरण में लगी हुई वृत्ति या जीविका को भी परमेश्वर के द्वारा करवाने वाली क्रिया के रूप में जो मानता है वह प्रपन्न या शरणागत भक्त “न्यासयोग” वाला है तथा उसे ही श्रीविष्णु का दास्यभाव प्राप्त रहता है॥६९-७०॥ (प्रपत्यधिकार समाप्त) यथा प्रपत्तिर्विहिता भगवच्चरणाम्बजयोः । तथैव तत्र वृत्तिश्च कार्या गुरुनिदेशतः ॥७१॥ उपासक या भक्त की वृत्ति की आगे व्याख्या करते हैं, जब उसने अपने मन तथा बुद्धि के द्वारा जिस शाश्वत वर्णानुक्रमागत वृत्ति को प्राप्त किया तथा भगवान् श्री विष्णु के चरणों में प्रपत्ति या न्यासदीक्षा प्राप्त कर ली हो तो उसे गुरु के निर्देश से उसी ‘वृत्ति’ का आचरण तथा तदनुरूप अर्चनादि अनुष्ठान करना चाहिये॥७१॥ वृत्तिश्च विहिताचारः प्रतिषिद्धविवर्जनम् । दृष्टिर्भक्तिस्तथा लक्ष्म सतां सेवेति षड्विधा ॥७२॥ यह वृत्ति छः प्रकार की है यथा - १ विहित कर्मों का आचरण करना, २-प्रतिषिद्ध कर्म हिंसादि का निषेध या आचरण न करना, ३-अपने इष्ट की ओर दृष्टि या १ यहाँ शास्त्र के अनुसार कथन का आशय यह है कि श्रीहरि के किङ्कर भाव में स्थित रहने या उस स्थिति का अनुभव करनेवाले मुमुक्षुजन तथा उसका फल प्राप्त करने वाले मुक्तजन में स्थितिभेद हट जाता है।

हिन्दीटीकासहित ४१ उसका ज्ञान तथा ४-उसी की भक्ति ५-उसी इष्टदेव भगवान् श्री विष्णु के शंखादि चिन्ह (लाञ्छनादि) का धारण करना तथा ६-सन्तों की या पूज्य आचार्यों की सेवा करना॥७२॥ अनन्यरतिरत्यन्तं विहितानि समाचरन् । वर्जयन् प्रतिषिद्धानि वेदवेदान्ततत्ववित् ॥७३॥ अपने इष्ट के प्रति अनन्य या अत्यन्त निष्ठा या भक्ति रखना तथा इष्ट देव के अतिरिक्त अन्यों के प्रति निवर्तन का भाव रखना ही दृष्टि या 'ज्ञान' है। यही उस वेद और वेदान्त के तत्ववेत्ता के द्वारा किया जाए और इसी प्रकार की वृत्ति वह रखे॥७३॥ अर्च्चादिष्वर्चयन् विष्णुमङ्कितो हरिलाञ्छनैः । सेवते यद् गुरून् भक्त्या सेयं वृत्तिः परा मता ॥७४॥ इस वृत्ति में स्थित रहते हुए इष्टदेव श्रीविष्णु की अर्चनादि के द्वारा पूजन करते हुए तथा अपने शरीर को श्रीहरि के लांछनों से अंकित रखकर वह जब पूज्य गुरुजन की भक्तिपूर्वक सेवा करता है तो यह श्रेष्ठ वृत्ति मानी गयी है॥७४॥ स्वाभाविकोऽस्य सम्बन्धः पुंसो यः परमात्मना । तस्यैव बोधो न्यासाख्यः प्रथमं यात्युपायताम् ॥७५॥ इस प्रकार इस उपासक या भक्त (जीव) का परमेश्वर श्रीविष्णु के साथ जो स्वाभाविक भाव से स्वामी तथा सेवकरूप में जो सम्बन्ध हो जाता है इसका बोध रहना ही 'न्यास' (नामक रूप) होकर प्राथमिकरूप से श्रीभगवान् की अनुग्रह प्राप्ति में साधनभूत उपाय बनता है॥७५॥ स एवोपर्य्युपर्य्यस्य परां प्रीतिमुपावहन् । वृत्त्याख्यां फलतां याति तदेवामृतमुच्यते ॥७६॥ यही सम्बन्ध धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए श्री भगवान् की परम प्रीति को उत्पन्न करते हुए वृत्तिरूप फल का आकार धारणकर लेता है जो 'अमृत रूप' कहा जाता है (अर्थात् इस वृत्ति का फल ही 'अमृतत्व' है)॥७६॥ या स्वधर्मेष्वभिरतिः सा भवत्यनुकूलता । वर्जनं प्रतिषिद्धानां तथैषा प्रतिकूलता ॥७७॥ १ अमृतरूप अर्थात् मोक्ष जो कि वृत्ति का फल है। इसमें जीव परमात्म सम्बन्ध का ज्ञान प्रथम उपाय तथा बाद में वृत्ति के फलरूप मोक्ष की स्वरूप प्राप्ति होती है क्योंकि मोक्ष के स्वरूप का आविर्भूत होना मोक्ष माना गया है।

४२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता वेद-वेदान्त-विज्ञानं विश्वासो गोप्तरि स्वयम् । गोप्तृत्ववरणादन्यन्न विष्णोरर्चनादिकम् ॥७८॥ प्रपत्तेहर्यात्मनि क्षेपो दास्यचिह्नैकलक्षणः । सतां देशिकमुख्यानां सेवा कार्पण्यमुच्यते ॥७९॥ १अपने धर्म में जो विहित आचरण के कारण अभिरति का हो जाना है वही प्रपत्ति में अनुकूलता की प्राप्त करता है और यही प्रतिषिद्ध कर्मों के प्रति वर्जन या निषेधभाव को प्राप्त कर ऐसे कर्मों से प्रतिकूलता भी प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार आगे इसी वृत्ति से वेद तथा वेदान्त के विशेष ज्ञान में यह वृत्ति प्रविष्ट होकर ज्ञान प्राप्त कर लेती है जो स्वयं अपने संरक्षक इष्टदेव के द्वारा रक्षा की भावना को उत्पन्न कर विश्वास को उत्पन्न कर देती है तथा इस प्रकार अपने इष्टदेव श्रीभगवद्विष्णु को संरक्षण के रूप में वरण से अन्य कार्य बन जाता है (क्योंकि यही 'भक्ति' बन जाती है) तब इस कार्य के द्वारा अपने आत्मा को प्रपन्नभाव से इष्ट के प्रति अर्पण करने पर 'न्यासयोग' सम्पन्न हो जाता है। जिसमें इष्ट की दास्यता के चिह्नों का धारण करना एक लक्षण होकर यही वृत्ति आगे अपने उपदेश या मन्त्र-प्रदाता मुख्य गुरु (देशिक मुख्य आचार्य) की सेवा वृत्ति के भाव से प्रपत्ति की करुणामयी स्थिति में जाकर अवस्थित हो जाती है॥७७-७९॥ अतः प्रपत्तिरेवेह वृत्तिर्भवति शाश्वती । तस्यैवास्मीति बोधात्मा प्रवृत्तिर्वृत्तिरेव वा ॥८०॥ अतएव प्रपत्तिभाव को ही शाश्वत स्थितिवाली 'वृत्ति' समझना चाहिए (या यही शाश्वत 'वृत्ति' कहलाती है) इसी का 'अस्मीति' भाव में होने वाला विबोध होता है। अतः प्रपत्ति ही शाश्वत वृत्ति है॥८०॥ तदेवं भगवान् प्रीतः प्रपत्या साधनं परम् । तयैव वृत्तिवपुषा प्रीतः फलमपि स्वयम् ॥८१॥ इस प्रकार इस प्रपत्ति के द्वारा प्रीत श्रीमद्भगवान् ही फलरूप या प्राप्तव्य होकर फल भी हो जाते हैं। जिसमें पर-साधन है प्रपत्ति तथा इसी प्रपत्तिवृत्ति से प्रसन्न हो जाने वाले श्रीविष्णु ही तब स्वयं फलरूप हो जाते हैं॥८१॥ १ यहाँ 'या स्वधर्मेषु' इत्यादि से मुनि ने प्रपत्ति तथा वृत्ति की समभेद रूप दशा दिखलाई है। २ यहाँ प्रपत्ति के उपायोपेयभाव का श्रीभगवदुपायोपेय भाव निबन्धन रूप रहने के कारण श्रीभगवद् का ही साक्षात् उपायोपेयभाव है यह तथ्य स्पष्ट होता है।

हिन्दीटीकासहित ४३ विहितान्तर्गतान्येव दृष्ट्यादीनि तथापि तु । तेषां विशेषमान्यत्वात् पृथक् चाङ्गतया विधिः ॥८२॥ वृत्ति आदि से होने वाले ज्ञान या ‘दृष्टि’ आदि यद्यपि विहितकर्मों के अन्तर्गत ही है फिर भी इनकी विशेषरूप में मान्यता रहने के कारण इनकी अंगरूप विधि पार्थक्य रूप में स्थित मानी गई है॥८२॥ निषिद्धान्तर्गतान्येव विरुद्धान्यखिलान्यपि । हानं सर्वस्य चैकाङ्गं पृथग्व्याचक्षते परे ॥८३॥ इस प्रकार दृष्टि, लक्ष्म या चिह्नधारणादि तथा सत्सेवा जैसे कर्मों के आचरण के विपरीत रहनेवाले सभी कार्य विरुद्ध होने के कारण निषिद्ध कर्मों के अन्तर्गत आ जाते हैं। अतः ये सभी वर्ज्य है तथा इनकी प्रत्येक अंगके रूप में पृथक् से आगे व्याख्या की गयी है¹॥८३॥ आनुकूल्यस्य सङ्कल्पात् प्रातिकूल्यस्य वर्जनात् । प्राप्ते समस्तेऽपि तथा विश्वासादेः पृथग्विधिः ॥८४॥ इस प्रकार अनुकूल संकल्प को लेने के तथा प्रतिकूल आचारादि के निषेध के कारण समस्त विश्वासादि के सिद्ध हो जाने पर भी जैसे इन विश्वासादि की पृथक्रूप में विधि होती है, इसी प्रकार यहां समझना चाहिए॥८४॥ न कर्म हीनं ज्ञानेन न तत्तेन न ते अपि । भक्त्या ताभ्यां न सां तानि न वैराग्येण तन्न तैः ॥८५॥ क्योंकि ज्ञान की दृष्टि से रहित कर्म विहित नहीं होता है तथा यह ज्ञान भी कर्म से हीन या उसके बिना नहीं रहता और ये कर्म तथा ज्ञान दोनों ही भक्ति के बिना श्रीभगवान् की प्राप्ति में हेतु नहीं हो सकते हैं। ये कर्मादि भी वैराग्य के बिना नहीं और इन भक्त्यादि से रहित या प्रतिकूल निषेधादि भी भगवन् की प्रीति में हेतु नहीं बन सकते हैं॥८५॥ विहिताचरणं कर्म वैराग्यं निन्यवर्जनम् । ज्ञानं सुदृष्टिर्भक्तिस्तु हरिचिह्नसमाश्रया ॥८६॥ विहित आचार में स्थित रहना ‘कर्म’ है तथा निन्य या निषिद्ध कर्मों का परिवर्जन ही ‘वैराग्य’ कहलाता है। सम्यक् ‘दृष्टि’ है इष्ट का ध्रुव ज्ञान तथा यही हरि के १ इस पंक्ति का आशय है कि जैसे विहिताचार के अन्तर्गत दृष्टि आदि की पृथक् अङ्गरूप में विधि रखी जाती है इसी तरह प्रतिषिद्ध के वर्जन के अन्तर्गत दृष्ट्यादि के विरुद्ध वर्ज्य या हानि की पृथक् अंगके रूपमें स्थिति होगी। इस व्याख्या के कारण वृत्ति की षड्विधता के साथ एक अंग की और वृद्धि होती है।

४४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता चिन्हों का आश्रय लेकर रहने वाली 'भक्ति' कहलाती हैं॥८६॥ एवं चतुर्विधासेनां प्रीतिरूपां हरेः स्वयम् । यो वृत्तिमवमन्येत न हि तस्याऽस्ति निष्कृतिः ॥८७॥ इस प्रकार इस चार प्रभेदों वाली तथा श्रीहरि के प्रीतिभाव रखने वाले साधकभक्त की इन चारों वृत्तियों यथा-१ विहिताचार, २ दृष्टि, ३ भक्ति तथा ४ विरुद्धाचाररूप वर्जनात्मक वैराग्यरूप की जो अवमानना करता हैं उसका कोई भी प्रायश्चित नहीं हैं (अर्थात् वह महापातकी हैं)॥८७॥ न देवतान्तरपरा न च कस्यापि साधनम् । परं प्रसाद एवैषा वृत्तिर्विश्वात्मनो हरेः ॥८८॥ विश्वात्मा श्रीहरि की यह 'वृत्ति' परमप्रसाद स्वरूप ही समझना चाहिए क्योंकि इसमें न तो किसी अन्य देवता से सम्बन्ध हैं और न ही ये किसी काम्यकर्म में साधनरूप हैं क्योंकि ये तो केवल भगवत् प्रसन्नता की कारणीभूत स्थितिवाली होती हैं॥८८॥ देहस्यान्तिकलये मोक्षाख्ये सति सा पुनः । निःश्रेयसं परं ब्रह्म निर्वाणमिति चोच्यते ॥८९॥ भौतिक शरीर की आत्यन्तिक लीनभाव की दशा वाली मोक्ष नामक स्थिति के प्राप्त हो जाने पर तब यही वृत्ति निरवधि श्रेयरूप परब्रह्म विषयक बनकर 'निर्वाण' कहलाती हैं॥८९॥ प्रपन्नस्यापि हि पुनर्देहे कर्मकृते स्थिते । दुरितानि परां वृत्तिं दूषयन्ति मुहुर्बलात् ॥९०॥ तानि सर्वाण्यशेषाणि पापानि प्रशमं नयेत् । पुनः प्रपदनेनाशु कर्मभिर्वापि तत्परैः ॥९१॥ न्यासयोग में साधक के प्रपत्ति भाव में स्थित रहने पर तथा कर्मों के परिणामवश देह के विद्यमान रहने पर प्रपत्ति के सामर्थ्य से यह वृत्ति परम दूषणों का भी विनाश कर देती हैं (पातक इन परम वृत्तियों को दूषित कर देते हैं क्योंकि दूषणों का ऐसा सामर्थ्य होता है)। तब यही फिर से श्री विष्णु के प्रति प्रपत्तिपरक १ मुक्ति की दशा में भी कैङ्कर्य के पुरुषार्थरूप कारण से वृत्ति की भी कैङ्कर्य रूप स्थिति होती है इसलिये पुरुषार्थभूत तथा स्वाधीन इस वृत्ति के विषय में सदा सन्नद्धभाव रखना आवश्यक है। क्योंकि यही निरवधिश्रेय को मुक्तिरूप में परिणत करवाती है तथा निरवधिदुरितबन्धन की निवृत्ति करने के अनन्तर भी मोक्षरूप में फलती है अतः मोक्षफलरूपा यह वृत्ति अवधान के योग्य केन्द्रीभूत महत्व रखती है।

हिन्दीटीकासहित ४५ (भगवत्परक्) कर्मों के द्वारा उन सभी पातकों को (वह वृत्ति) क्षीण या नष्ट कर देती है तथा पातकों को शान्त कर देती है॥९०-९१॥ एकान्ती शक्तितः कुर्वन् विहितानि समुत्सुकः । तथैव प्रतिषिद्धानि त्यक्त्वा याति परां गतिम् ॥९२॥ अतएव इष्ट के प्रति उत्सुकभाव रखते हुए साधक या मन्त्र एकांत की स्थिति (वाला बनकर) में विहित कर्मों का शक्ति भर आचरण करें तथा इसी प्रकार प्रतिषिद्ध कर्मों का परित्याग करते हुए जीवन यापन कर अन्त में परमगति (मोक्ष) को प्राप्त करे॥९२॥ पाखण्ड-शैवशाक्तादि-तन्त्राचारलोकनादिकम् । स्वतो ब्रह्मशिवादीनां बद्धानामर्च Strad...नादिकम् ॥९३॥ ऊनधीः समताशङ्का विष्णोर्विस्मृतिरेव च । अनादरश्च तन्मन्त्रलक्षणार्चाक्रियादिषु ॥९४॥ तस्यैवात्यन्तिके दास्ये विमतिः कामकामिता । अविश्वासः प्रपदने साधनान्तरसंश्रयः ॥९५॥ साधनत्वाभिमत्या च निजधर्मस्य वर्जनम् । असच्छास्त्रेष्वभिरतिर्दिव्यशास्त्रावधीरणम् ॥९६॥ अभागवतसंसर्गो रीढा भागवतेषु च । मर्त्यसामान्यभावेन गुरौ चानतिगौरवम् ॥९७॥ दृष्टि विरुद्ध तत्वों में पाखण्डों (जैन तथा बौद्धागर्मों), शैव, शाक्त आदि तन्त्रों के अनुसार देवतार्चन आदि का करना तथा स्वयं ही गुणों से बद्ध ब्रह्मा तथा शिव जैसे देवताओं का दृष्ट या इष्टभाव में अर्चनादि करना यह सभी 'भक्ति' के विरुद्ध कार्य माना जाता है।१ इसके अतिरिक्त अपने इष्ट की सामर्थ्य (या स्वरूपादि) में न्यूनताबुद्धि रखना, उनके समान दूसरे इष्ट की समता की मन में आशंका रखना, इष्टदेव विष्णु को विस्मरण कर देना तथा उनके मन्त्रों, लक्षणों तथा अर्चादि आस्था में उपेक्षा भाव का रखना दृष्टि तथा भक्ति के विरुद्ध कर्म माना गया है। अथवा प्रपत्ति से किये गये आत्यन्तिक दास्यभाव से विरुद्ध बुद्धि की स्थिति रखने लगना, किसी काम्य या इष्टभाव की इच्छा करना, प्रपत्ति के विषय में दृढ़ विश्वास में शिथिलता लाना या विधानों के अतिरिक्त दूसरे साधनों को (आश्रय) ग्रहण करना १. पाखण्ड जो वेद के प्रतिकूल है उनके साधनापथ का अनुशीलन या अनुमोदन करना भक्ति के मार्ग में बाधक होता है क्योंकि इससे दृष्टिभेद उत्पन्न होता है। अनेक गुणाश्रित देवगण का अर्चन भक्ति विरुद्ध कार्य है। ३

४६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता भी भक्ति के विरुद्ध माना जाता है। स्वयं के प्रपत्तिरूप धर्माचरण होने से अपने कु तथा वर्णाश्रम के उपयुक्त धर्मों से बाधा रहने के कारण प्रपत्ति का वर्जन करना त असच्छास्त्रों में रुचि ग्रहण करते हुए विष्णु देवता के अंकभूत शंखचक्रादि की उपे करना, भागवत-जन से संसर्ग न रखना¹, भागवतजन का तिरस्कार करना, अप दीक्षा तथा मन्त्रादि के प्रदाता गुरुजन को मानवरूप में सामान्य भाव से देखना त उन्हें अधिक गौरव प्रदान नहीं करना, ये सभी सत्सेवा के विपरीत कार्य क गये हैं॥९३-९७॥ इति भागवतस्योक्ताः प्रपन्नस्य विशेषतः । अपाया दुस्त्यजा ह्येते देह-बन्ध-निबन्धनाः ॥९८॥ इस प्रकार पूर्व में कही गयी ये सभी बातें विशेषकर दीक्षित तथा प्रपत्ति भाव न्यासयोग के आचरणकर्ता को भगवत् प्राप्ति के उपाय में संलग्न रहनेवाले त तन्निष्ठभाववालों के लिये वर्जित हैं। ये सभी यद्यपि देह धारण के कारण एक छोड़े नहीं जा सकते हैं परन्तु ये विषभूत हैं तथा इन्हें छोड़ना आवश्य है॥९८॥ एतानन्याँश्च विविधानपचारान् विशेषतः । सर्वानप्यनपाकृत्य नाप्नोति मधुसूदनम् ॥९९॥ इस प्रकार ऐसे अपचारों (विघ्नों) को तथा आगे कहे जाने वाले अपायों को भी ज तक हटाया नहीं जाएगा तब तक मधुसूदन श्रीविष्णु की अनुग्रह प्राप्ति सम्भव न होगी॥९९॥ अतो देहस्य कालुष्यान्मन्त्रमर्थेन केवलम् । आवर्त्तयन् सदा वृत्तिङ्कुर्वन् कालं नयेत् सुधीः ॥१००॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां न्यासोपदेशो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ इसलिये शरीर की कलुषता के कारण दीक्षा प्राप्त मन्त्र के अर्थादि चिन्तन बार-बा आवृत्ति करते हुए तथा विहित तथा आचारानुगत करते हुए जीवन के शेष समय बिताया जाए॥१००॥ नारदपंचरात्र आगम में 'भारद्वाज-संहिता' के न्यासोपदेश की 'तत्वप्रकाशिका' हिन्दी व्याख्या का प्रथम अध्याय सम्पूर्ण १ यहाँ विहिताचार विरुद्धता को ग्रन्थकार ने दिखलाया है तथा अगले अध्यायों में सत्सेवा के विरुद्ध का का विवरण दिया गया है। ये सभी अपायरूप हैं जिनकी हेयता अभीष्ट हैं।

हिन्दीटीकासहित ४७ अथ द्वितीयोऽध्यायः अथानानुकूल्यमुख्यानि प्रपत्त्यङ्गानि विस्तरात् । धर्माणां तद्विरुद्धानां स्वरूपञ्च निबोधत ॥१॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ अपने आराध्य इष्ट देव की अनुकूलता के लिये मुख्यरूप या स्थिति धारण करने वाले प्रपत्ति के अङ्गों का उसकें धर्मों का तथा प्रपत्ति के विरुद्ध धर्मों का अब विस्तार से स्वरूप तथा विवरण बतलाता हूं जिसे ध्यान देकर सुनिये।।१।। (इस द्वितीयाध्याय के आगे का विवरण देने वाला मूल भाग उपलब्ध नहीं हैं। ऐसा लगता है कि यह विच्छिन्न हो चुका है।) इति प्रपत्ति धर्मादिनिरूपणात्मकों द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥

४८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अथ तृतीयोऽध्यायः अथ स्वकर्मनिरतः प्राज्ञो भक्तः सुलक्षणः । सत्सेवाभिरतो ह्येव प्रपन्नः सिद्धिमाप्नुयात् ॥१॥ (सत्सेवनाधिकारः) वृत्ति के अंगों के निदर्शन के साथ अब प्रपत्ति का विवेचन करते हैं:- तब दृष्टि सम्पन्न बुद्धिमान् एवं भगवत् लांछन से मण्डित भक्त अपने पूज्य सन्त की सेवा में निरत रहते हुए “प्रपत्ति” भाव में स्थित रहने पर सिद्धि की प्राप्ति करता है। (या निःश्रेयस को प्राप्त करता है)॥१॥ यथार्हं विहितैस्तैस्तैः संस्कारैः संस्कृतः क्रमात् । नयेदात्मगुणोपेतस्तानि तानि व्रतानि च ॥२॥ यह साधक या भक्त सर्वप्रथम उन विहित गर्भाधानादि संस्कारों से क्रमशः संस्कृ होकर सर्वभूतों के प्रति करुणादि आठ आत्मगुणों से युक्त रहकर तथा वेदव्रत जै नियत कर्मों को पूर्ण करे या उनका आचरण करे²॥२॥ ध्यात्वा नारायणं देवमादौ कर्म्माण्यशेषतः । तस्यैवाराधनया कुर्यात् सङ्कल्पपूर्वकम् ॥३॥ फिर सर्वप्रथम श्रीनारायण देव का ध्यान कर सभी कर्मों को उन्हीं के आराधन पर मानकर उसी देव की ही आराधना में अपने समस्त कर्मों का संकल्प पूर्वक आचर करें³॥३॥ समाप्तानि च कर्माणि तस्मिन्नेव समर्पयेत् । आदावन्ते च मन्त्राणां योजयेद् व्यापकान्तरम् ॥४॥ १ इस अध्याय में विहिताचार, दृष्टि, भक्ति, लक्ष्म तथा सत्सेवन का विवरण रहने से य संग्रहरूप श्लोक विषय प्रवर्तनरूप है। पूर्व में विहिताचार तथा दृष्टि आदि का कथन हुआ था औ निषिष्ठ विवर्जन की इस क्रम में चर्चा भी रहेगी। यह सभी इस एक श्लोक से संकेतित क है। २ प्रकृत कारिका से विहित आचारों का विवरण आरंभ किया गया है। ३ कारिका में प्रयुक्त तस्यैव पद से श्रीविष्णु की अर्चना की मुख्यता तथा प्रथम सम्पादन का संके है अतः अग्नि, इन्द्रादि का अर्चन करने में इस बात का ध्यान रखा जाना आवश्यक है।

हिन्दीटीकासहित ४९ अपने आराधनादि कर्मों की (प्रतिदिन की) समाप्ति पर उन्हें श्री भगवदर्पित करें। मन्त्रों के आदि में तथा अन्त में व्यापक का अन्तर योजित करें॥४॥ प्रातरुत्थाय विधिवत् स्नात्वा नित्यं समाहितः । यजेत कर्मभिस्तैस्तैर्विष्णुं देवादिसंज्ञितम् ॥५॥ फिर वह ब्राह्म मुहूर्त में (प्रातःकाल) उठे तथा विधिपूर्वक स्नान कर आगे विहित सन्ध्यावन्दनादि कर्म सम्पन्न कर एकाग्रभाव से विविध देव नामों वाले व्यापक श्रीविष्णु की उन उन विहित विधियों के साथ अर्चना करें॥५॥ ततश्च देवदेवेशं भोगैरभ्यर्चयेद् हरिम् । अशुद्धवर्जं सकलैः परिचारैः समन्वितम् ॥६॥ फिर देवों के अधिपति श्रीविष्णु की गन्ध-पुष्प नैवेद्यादि भोग्य पदार्थों के द्वारा परिचर्या कर अर्चना करें। इनमें अशुद्ध देवादि परिवारों को हटाते हुए सभी परिचर्या रखी जावे¹॥६॥ पूर्वमेव यथान्यायमभिगम्य जगद्गुरुम् । उपादाय च योगार्थान् सम्भारान्नियतः स्वयम् ॥७॥ यजेत पुरुषं साक्षाद् यथेच्छं प्रतिमादिषु । पञ्चरात्रेण विधिना गुर्वधीनोऽपरेण च ॥८॥ इस क्रम में सर्वप्रथम आचारादि का अनुसरण कर यथाविधान जगद्गुरु के समीप जाकर योग साधनों को ग्रहण करने के संकल्पों से नियत चित्त होते हुए उन सामग्री को रखकर फिर यथेच्छ भाव से साक्षात् शिला में या प्रतिमादि मे स्थित श्री हरि की अपने पूज्य गुरु के अधीन पञ्चरात्र प्रोक्त आगम के विधानानुसार अथवा श्रुति, स्मृति या पुराणादि में कथित विधि का अनुसरण करते हुए स्वयं अर्चना करे॥७-८॥ ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैः स्त्रीभिस्तथा परैः । यथार्हमर्च्यः सेव्यश्च नित्यं सर्वेश्वरो हरिः ॥९॥ प्रतिदिन अपनी स्थिति तथा भावना के अनुरूप ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों, स्त्रियों तथा अन्य अनुलोमादि सभी जातियों के द्वारा नित्य सर्वजगदधिपति श्री हरि की पूजा की जानी चाहिए²॥९॥ १ आशय यही कि अन्य देव परिवार या पंचायतन में स्थित श्रीविष्णु की सम्मिलितरूप में अर्चना के बजाय केवल श्रीविष्णु की केन्द्रीभूत अर्चना का विधान यथाशक्य सम्पन्न करना चाहिए। २ श्रीहरि की अर्चना नित्य क्रिया है। कहा भी है कि—'नित्यं सदा यावदायुर्र्न कदाचिदतिक्रमेत्' । अर्चन श्रीविष्णु का या पादुकादि का जैसी भी स्थिति हो करना चाहिए।

५० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अधिकप्रीतिरर्चायामेकान्ती हरिमर्चयेत् । तद्भावेऽग्निवत्सूर्यभूम्यम्बुगगनादिषु ॥१०॥ श्री विष्णु के प्रति अधिक अभिरति या भक्ति रखकर भक्त एकान्तिक या अनन्य भा की स्थिति में उनकी अर्चना प्रतिमारूप में ही करे। अर्चना के बाद श्रीहरि की स्थिति अग्नि सूर्य, पृथ्वी, जल, आकाश तथा पादुकादि में भावित रखे (तथा इनमें भी हरिभाव रखकर इन्हें भी पूजित करे)॥१०॥ भोजयेद् वैष्णवान्नित्यं पित्रर्थानितिथीँस्तथा । वैष्णवानेव बिभृयात् पुत्रदारादिकान् निजान् ॥११॥ सामर्थ्यानुसार नित्य वैष्णवों को भोजन करवावे तथा पितरों के निमित्त रखे गये श्राद्धादि में वैष्णवजन को अतिथि बनाकर इनको भोजन करवावे। वह अपने पुत्र पत्नी आदि परिवार जन को भी वैष्णव दीक्षा दिलवाकर 'वैष्णव' बना दे॥११॥ नातिसङ्गः परिचरेत् पुत्रादीनप्यवैष्णवान् । भिक्षेत वैष्णवेष्वेव ब्रह्मचारी यतिस्तथा ॥१२॥ पुत्रादि के अवैष्णव रहने पर स्वयं इन पुत्रादि के साथ रहने की या संगति भावना न रहने से उन्हें भी वैष्णव दीक्षा दिलवानी चाहिए। वैष्णव ब्रह्मचारी और यति भी वैष्णवों के यहाँ से ही यथासंभव भिक्षा तथा भोजनादि प्रसाद प्राप्त करें॥१२॥ असद्दृष्टिं परिहरेदच्युतस्य निवेदिते । दद्यादाचार्यमुख्येभ्यः स्वार्थञ्चात्र प्रकल्पयेत् ॥१३॥ श्रीभगवान् को अर्पित प्रसादान्न को भी अवैष्णवों की दृष्टि से देख लिये जाने पर अपवित्र हो जाने के कारण ग्रहण नहीं किया जावे। ऐसा द्रव्य आचार्यादि प्रमुख को प्रथम अर्पित कर दे तथा उनसे लौटा दिये गये शेष बचे हुए कुछ अंश को अपने लिए रख ले॥१३॥ निवेद्य यदि तद्भूयः परिषेकादिपूर्वकम् । जुहुयादाहुतीः पञ्च विष्णौ प्राणादिसंज्ञके ॥१४॥ तब फिर ईश्वरार्पण किये गये उस प्रसादादि को जल से परिसिंचन या प्रक्षेप पूर्वक पुनः श्रीहरि को अर्पित करे और श्रीविष्णु को प्राणादि पंच आहुति को 'प्राणाय स्वाहा' इत्यादि मन्त्रों से प्रदान करे॥१४॥ निवेदयेच्च भुञ्जानो मनसानागतं पुरः । मनो हि पूतमन्यत्र सूतोदक्याशवस्पृशः ॥१५॥

हिन्दीटीकासहित ५१ भोजन के बीच में पहिले अर्पित पदार्थों से भिन्न आनेवाले पदार्थों का निवेदन मन से प्रभु श्री वैष्णव को करे। मन केवल सूतक से युक्त, रजस्वला तथा शव के स्पर्श से शरीर की तरह अशुद्ध होता है और इनसे भिन्न स्थिति में मन शुद्ध माना जाता है॥१५॥ प्रशस्तं भगवद्भुक्तं पितृदेवाद्कर्मसु । लब्धेन चान्यतस्तेन पुनर्यागोऽपि चोदितः ॥१६॥ पितृ देवादि कर्मों में भगवदर्पित अन्नादि भोग्य पदार्थ प्रशस्त माने जाते हैं। यति आदि के द्वारा भिक्षादि में इनसे भिन्न स्थान और स्थिति में प्राप्त करने पर उनके द्वारा बाद में ऐसे पदार्थों के ग्रहण करने पर याग करने का विधान कहा गया है॥१६॥ कृत्वानुयागं कुर्वीत स्वाध्यायं वैष्णवं परम् । ततो युञ्जीत चात्मानं पुरुषे पुष्करेक्षणे ॥१७॥ इस प्रकार होने पर वह विहित याग के सम्पादन करने के बाद होने वाले भगवन्मन्त्रादि के स्वाध्याय तथा जपादि के रूपवाले ‘अनुयाग’ का भी सम्पादन करे और फिर कमलनेत्र श्रीविष्णु में आत्मा (मन) को अविच्छिन्नभाव से लगाये॥१७॥ ये च भागवता मन्त्रा ये च दिव्याश्च विग्रहाः । यथोपदेशं नियतस्तांश्च सेवेत नित्यशः ॥१८॥ वह प्रतिदिन सदा ही गुरुदीक्षा में प्राप्त भगवन्मन्त्रों को तथा आचार्य कृपा से प्राप्त श्रीविष्णु के मन्त्रों तथा प्रतिमाओं के रूप वाले विग्रहों का पवित्रभाव से नियतचित्त होकर अपने उपदेशानुरूप ध्यान करे (या उनका सेवन करे)॥१८॥ कृत्वाभिगमनं पूर्वमुपादाय च सम्पदः । इष्ट्वाधीत्य च युञ्जानो भोगैः कालं नयेद् यतिः ॥१९॥ इस प्रकार वह पांच विभागों में किये जाने वाले कृत्यों में सर्वप्रथम अभिगमन कर फिर याग की सामग्री का उपादान करें फिर याग का सम्पादन करे फिर स्वाध्याय का अध्ययन (पाठादि) करे फिर ध्यानादि भक्तियोग का सम्पादन करते हुए अपने समय को व्यतीत करे॥१९॥ तमेव मत्वा भोक्तारमिज्यं यष्टारमेव च । यजेत सकलैर्यज्ञैः सर्वयज्ञमयं हरिम् ॥२०॥ याग से उत्पन्न प्रीति के आधारभूत कर्त्तारूप श्रीविष्णु को ही भोक्ता के रूप में मानकर तथा उन्हें ही याग का विषय तथा यज्ञकर्ता भी मानते हुए सभी

५२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता नामरूपवाले (ज्योतिष्टोमादि) यज्ञों से उनका ही यजन करे, क्योंकि श्रीहरि सभी यज्ञों में अधिष्ठित हैं अतः उन्हें 'सर्वयज्ञमय' समझना चाहिए॥२०॥ विष्णोः सेवेत तीर्थानि तथैवायतनानि च । दद्यादर्थांश्च विप्रेभ्यश्चरेच्च विविधं तपः ॥२१॥ दीक्षित एवं साधक भक्त श्री विष्णु सम्बन्धी तीर्थों की यात्रा कर उनका सेवन करें इसी प्रकार श्रीविष्णु के आयतन भूत श्रीरङ्गादि स्थित मन्दिरों का सेवन भी करें वह 'सुपात्र' वैष्णव ब्राह्मणों को दान दे तथा विविध प्रकार के उपवास प्रधान तपचान्द्रयणादि व्रतों का भी आचरण करे॥२१॥ प्रायश्चित्तं तु परमं प्रपत्तिस्तस्य केवलम् । कुर्यात् कर्मात्मकं वापि वासुदेवमनुस्मरन् ॥२२॥ विशुद्ध्येद्विष्णुभक्तस्य दृष्ट्या स्पर्शन सेवया । स्मरणेनान्नपानाद्यैर्गिरा पादरजोऽम्बुभिः ॥२३॥ अभागवत दृष्ट्यादि के लिये सर्वोत्तम प्रायश्चित्त केवल श्री विष्णु की प्रपत्ति होती तथा शक्ति के होने पर भी श्रीवासुदेव का स्मरण करते हुए कुछ कर्म या अनुष्ठान रूप प्रायश्चित करना चाहिए। (निमित्त के थोड़े या अल्प मात्रा में होने पर तदनुरूप लघु तथा गुरु होने पर क्रियारूप वैष्णवेष्टि याग रूप प्रायश्चित रहता है। (अवैष्णव दृष्टि के लिये वैष्णव दृष्टि ही प्रायश्चित है, अवैष्णव स्पर्श का वैष्णवस्पर्श अवैष्णवजन की सेवा का वैष्णवसेवा अवैष्णव स्मरण का वैष्णव स्मरण तथा अवैष्णव अन्न पानादि का वैष्णव अन्नपानादि करना प्रायश्चित्त है। वाणी से अवैष्णवजन के साथ सम्भाषण का प्रायश्चित पुनः वैष्णवजन के साथ सम्भाषण कर तथा अवैष्णवजन के चरणरजों का वैष्णवजन की चरण धूलि से अवैष्णव जलपान का वैष्णवजन के जलपान से प्रायश्चित्त हो जाता है॥२२-२३॥ विष्णोर्निवेदितान्नाद्यैस्तथा तत्कीर्तनादिभिः । अभागवतदृष्टादेः शुचिरेषा विशेषतः ॥२४॥ विशेषकर अभागवत दृष्टि आदि की श्रीविष्णु को निवेदित प्रसादान्न आदि के ग्रहण तथा उनके कीर्तनादि कर्मों से शुद्धि होती है॥२४॥ कृता यज्ञाः समस्ताश्च दानानि च तपांसि च । प्रायश्चित्तमशेषेण नित्यमर्चयतां हरिम् ॥२५॥ बिना किसी विच्छेद के नित्य श्री विष्णु का अर्चन करने वाले प्रपन्न भक्त को सभी प्रायश्चित्त स्पर्श नहीं करते हैं, क्योंकि उसके इस अर्चना के कार्य मात्र से सभी यज्ञ किये गये, सभी दान दिये गये तथा सभी तप किये गये माने जाते हैं। (अतः

हिन्दीटीकासहित ५३ नैमित्तिक अनुष्ठानादि की भी उसे अपेक्षा नहीं होती)¹॥२५॥ एवं नित्यानि कर्माणि तथा नैमित्तिकानि च । भर्तुः प्रियकराणीति कुर्यात् प्रीत्यैव केवलम् ॥२६॥ अपने इष्टभूत सर्वान्तर्यामी स्वामी श्री विष्णु के निमित्त कहे हुए नित्य और नैमित्तिक कर्मों का आचरण उनके प्रिय भाव के कारण केवल प्रीतिमात्र के भाव से सम्पन्न करे॥२६॥ अथैवं ब्राह्मणो विद्वानेकान्ती धर्ममाचरन् । सरहस्यमिदं सम्यक् साधुभ्यश्चोपपादयेत् ॥२७॥ अतः विद्वान् ब्राह्मण वेदों का अध्ययन तथा उस पर विचार कर परमेकान्त भाव से इन कथित धर्म तथा विहित आचारों का पालन करते हुए वृत्ति के रहस्यों के साथ इन्हें उपदेश के पात्र साधुजन को पाने पर उन्हें भी इनका उपदेश दें॥२७॥ प्रजापालनरूपञ्च धर्मं भागवतं चरन् । प्राप्यापि महदैश्वर्यं मृतः स्यादेव निर्भरः ॥२८॥ इसी प्रकार क्षत्रिय अपने वर्ण के अनुरूप विहित आचारों के अनुरूप प्रजापालनरूप धर्म के साथ भागवत् धर्म का आचरण करते हुए अतिशय ऐश्वर्य सम्पन्न होकर भी उस ऐश्वर्य से बद्ध न होकर मुक्तिभाव को मृत्यु के बाद प्राप्त करता है॥२८॥ तथा वैश्यः स्वधर्मस्थो वैष्णवानभितर्पयन् । धनेष्वसक्त एकान्ती परं प्राप्नोति तत्पदम् ॥२९॥ इसी प्रकार वैश्य भी अपने वर्ण धर्म के अनुरूप वैष्णवजन को भोजनादि से तृप्त करते हुए अपनी विस्तीर्ण सम्पत्ति में अनुसक्त भाव से रहते हुए एकान्तभाव से भी श्रीविष्णु का सेवक बनकर उनके परमपद को प्राप्त करता है॥२९॥ शुश्रूषमाणः शूद्रोऽपि वैष्णवानग्रजन्मनः । स्वधर्मरत एकान्ती मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥३०॥ इसी प्रकार सेवा में लगा हुए शूद्र भी वैष्णव ब्राह्मण तथा क्षत्रियादि की सेवा करते हुए अपने वर्णधर्म का पालन कर भगवन्निष्ठ हो वैष्णव धर्म का पालन करते हुए सभी पातकों से मुक्त होता है॥३०॥ १ इस कथन से यज्ञ, दान, आदि सकल धर्मचरण की अपेक्षा नित्य श्रीविष्णु के आराधन तथा अर्चन की प्रधानधर्म के रूप मे प्रशंसा तथा महत्व दिखलाया गया है। इसका आशय यह कि वेदाभिहित यज्ञादि के कारणवश न करने के प्रायश्चित की नित्यकर्म के कारण उसके अनुरूप स्थिति तो बनी रहेगी। २ इस विहिताचरणरूप वृत्ति तथा इसके व्यवहार आदि विधियों का अनुकूल तथा अधिकारी पात्र को ही उपदेश दिया जावे।