भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

३४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ८


[बायाँ स्तम्भ - मूल संस्कृत श्लोक]

एकाग्रेणैव मनसा ध्यायते हृदि केशवम्। सततं योगयुक्तस्तु स मुनिस्तत्र किंकराः ॥ १२ हरिध्यानमहादीक्षाबलं तस्य महामुनेः। नान्यद्वै प्राप्तकालस्य बलं पश्यामि किंकराः ॥ १३ हृदिस्थे पुण्डरीकाक्षे सततं भक्तवत्सले। पश्यन्तं विष्णुभूतं नु को हि स्यात् केशवाश्रयम् ॥ १४ तेऽपि वै पुरुषा विष्णोर्यैर्युयं ताडिता भृशम्। अत ऊर्ध्वं न गन्तव्यं यत्र वै वैष्णवाः स्थिताः ॥ १५ न चित्रं ताडनं तत्र अहं मन्ये महात्मभिः । भवतां जीवनं चित्रं यक्षैर्दत्तं कृपालुभिः ॥ १६ नारायणपरं विप्रं कस्तं वीक्षितुमुत्सहेत्। युष्माभिश्च महापापैर्मार्कण्डेयं हरिप्रियम्। समानेतुं कृतो यत्नः समीचीनं न तत्कृतम् ॥ १७ नरसिंहं महादेवं ये नराः पर्युपासते। तेषां पार्श्वे न गन्तव्यं युष्माभिर्मम शासनात् ॥ १८

श्रीव्यास उवाच स एवं किंकरानुक्त्वा मृत्युं च पुरतः स्थितम्। यमो निरीक्ष्य च जनं नरकस्थं प्रपीडितम् ॥ १९ कृपया परया युक्तो विष्णुभक्त्या विशेषतः । जनस्यानुग्रहार्थाय तेनोक्ताश्च गिरः शृणु ॥ २० नरके पच्यमानस्य यमेन परिभाषितम्। किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः ॥ २१ उदकेनाप्यलाभे तु द्रव्याणां पूजितः प्रभुः । यो ददाति स्वकं लोकं स त्वया किं न पूजितः ॥ २२ नरसिंहो हृषीकेशः पुण्डरीकनिभेक्षणः । स्मरणान्मुक्तिदो नृणां स त्वया किं न पूजितः ॥ २३ इत्युक्त्वा नारकान् सर्वान् पुनराह स किंकरान्। वैवस्वतो यमः साक्षाद्विष्णुभक्तिसमन्वितः ॥ २४ नारदाय स विश्वात्मा प्राहैवं विष्णुरव्ययः । अन्येभ्यो वैष्णवेभ्यश्च सिद्धेभ्यः सततं श्रुतम् ॥ २५ तद्वः प्रीत्या प्रवक्ष्यामि हरिवाक्यमनुत्तमम्। शिक्षार्थं किंकराः सर्वे शृणुत प्रणता हरेः ॥ २६


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]

है। दूतो ! वे मुनि निरन्तर योगयुक्त होकर वहाँ एकाग्रचित्तसे अपने हृदयमें केशवका ध्यान कर रहे हैं। किंकरो ! उस महामुनिको भगवान् विष्णुके ध्यानकी महादीक्षाका ही बल प्राप्त है; क्योंकि जिसका मरणकाल प्राप्त हो गया है, उसके लिये मैं दूसरा कोई बल नहीं देखता। भक्तवत्सल, कमललोचन भगवान् विष्णुके निरन्तर हृदयस्थ हो जानेपर उस विष्णुस्वरूप भगवच्छरणागत पुरुषकी ओर कौन देख सकता है ? ॥ ९-१४ ॥

वे पुरुष भी, जिन्होंने तुम्हें बहुत मारा है, भगवान् विष्णुके ही दूत हैं। आजसे जहाँ वैष्णव हों, वहाँ तुमलोग न जाना। उन महात्माओंके द्वारा तुम्हारा मारा जाना आश्चर्यकी बात नहीं है। आश्चर्य तो यह है कि उन दयालु महापुरुषोंने तुम्हें जीवित रहने दिया है। भला, नारायणके ध्यानमें तत्पर हुए उस ब्राह्मणको देखनेका भी साहस कौन कर सकता है? तुम महापापियोंने भगवान्के प्रिय भक्त मार्कण्डेयजीको जो यहाँ लानेका प्रयत्न किया है, यह अच्छा नहीं किया। आजसे तुमलोग मेरी आज्ञा मानकर उन महात्माओंके पास न जाना, जो महादेव भगवान् नृसिंहकी उपासना करते हों ॥ १५-१८ ॥

**श्रीव्यासजी कहते हैं—**शुकदेव ! यमने अपने सामने खड़े हुए मृत्युदेव और दूतोंसे इस प्रकार कहकर नरकमें पड़े हुए पीड़ित मनुष्योंकी ओर देखा तथा अत्यन्त कृपा एवं विशेषतः विष्णुभक्तिसे युक्त होकर नारकीय जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये जो बातें कहीं, उन्हें तुम सुनो। नरकमें यातना सहते हुए जीवोंसे यमने कहा—‘पापसे कष्ट पानेवाले जीव ! तुमने क्लेशनाशक भगवान् केशवकी पूजा क्यों नहीं की ? पूजन-सम्बन्धी द्रव्योंके न मिलनेपर केवल जलमात्रसे भी पूजित होनेपर जो भगवान् पूजकको अपना लोकतक दे डालते हैं, उनकी पूजा तुमने क्यों नहीं की? कमलके समान लोचनोंवाले, नरसिंहरूपधारी जो भगवान् हृषीकेश स्मरणमात्रसे ही मनुष्योंको मुक्ति देनेवाले हैं, उनकी पूजा तुमने क्यों नहीं की?' ॥ १९-२३ ॥

नरकमें पड़े हुए जीवोंके प्रति यों कहकर विष्णुभक्तिसे युक्त सूर्यनन्दन यमने अपने किंकरोंसे पुनः कहा—'किंकरो ! अविनाशी विश्वात्मा भगवान् विष्णुने नारदजीसे जैसा कहा था और अन्य वैष्णवों तथा सिद्धोंसे जैसा सदा ही सुना गया है, वह अत्यन्त उत्तम भगवद्वाक्य मैं प्रसन्न होकर तुम लोगोंसे शिक्षाके लिये कह रहा हूँ। तुम सभी भगवान्के शरणागत होकर सुनो ॥ २४-२६॥

अध्याय ८ ] मृत्य और दूतोंको समझाते हुए यमका उन्हें वैष्णवोंके पास जानेसे रोकना ३५

हे कृष्ण कृष्ण कृष्णेति यो मां स्मरति नित्यशः। | भगवान् कहते हैं—'हे कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !'— जलं भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम् ॥ २७ | इस प्रकार जो मेरा नित्य स्मरण करता है, उसको मैं | उसी प्रकार नरकसे निकाल लेता हूँ, जैसे जलको पुण्डरीकाक्ष देवेश नरसिंह त्रिविक्रम। | भेदकर कमल बाहर निकल आता है। 'पुण्डरीकाक्ष ! त्वामहं शरणं प्राप्त इति यस्तं समुद्धरे ॥ २८ | देवेश्वर नरसिंह ! त्रिविक्रम ! मैं आपकी शरणमें पड़ा | हूँ'—यों जो कहता है, उसका मैं उद्धार कर देता हूँ। त्वां प्रपन्नोऽस्मि शरणं देवदेव जनार्दन। | 'देवाधिदेव ! जनार्दन ! मैं आपकी शरणमें आ गया इति यः शरणं प्राप्तस्तं क्लेशादुद्धराम्यहम् ॥ २९ | हूँ'—इस प्रकार जो मेरा शरणागत होता है, उसे मैं | क्लेशसे मुक्त कर देता हूँ॥ २७-२९॥ व्यास उवाच | व्यासजी कहते हैं—वत्स ! यमराजके कहे हुए इत्युदीरितमाकर्ण्य हरिवाक्यं यमेन च। | इस भगद्वाक्यको सुनकर नरकमें पड़े हुए जीव 'कृष्ण ! नारकाः कृष्णकृष्णेति नारसिंहेति चुक्रुशुः ॥ ३० | कृष्ण ! नरसिंह !' इत्यादि भगवन्नामोंका जोरसे उच्चारण | करने लगे। नारकीय जीव वहाँ ज्यों-ज्यों भगवन्नामका यथा यथा हरेर्नाम कीर्तयन्त्यत्र नारकाः। | कीर्तन करते थे, त्यों-ही-त्यों भगवद्भक्तिसे युक्त होते तथा तथा हरेर्भक्तिमुद्वहन्तोऽब्रुवन्निदम् ॥ ३१ | जाते थे। इस तरह भक्तिभावसे पूर्ण हो वे इस प्रकार | कहने लगे ॥ ३०-३१॥ नारका ऊचुः | नरकस्थ जीव बोले—'ॐ' जिनका नाम कीर्तन ॐ नमो भगवते तस्मै केशवाय महात्मने। | करनेसे नरककी ज्वाला तत्काल शान्त हो जाती है, उन यन्नामकीर्तनात् सद्यो नरकाग्निः प्रशाम्यति ॥ ३२ | महात्मा भगवान् केशवको नमस्कार है। जो यज्ञोंके | ईश्वर, आदिमूर्ति, शान्तस्वरूप और संसारके स्वामी हैं, भक्तप्रियाय देवाय रक्षाय हरये नमः। | उन भक्तप्रिय, विश्वपालक भगवान् विष्णुको नमस्कार लोकनाथाय शान्ताय यज्ञेशायादिमूर्तये ॥ ३३ | है। अनन्त, अप्रमेय नरसिंहस्वरूप, शङ्ख-चक्र-गदा धारण अनन्तायाप्रमेयाय नरसिंहाय ते नमः। | करनेवाले, लोकगुरु आप श्रीनारायणको नमस्कार है। नारायणाय गुरवे शङ्खचक्रगदाभृते ॥ ३४ | वेदोंके प्रिय, महान् एवं विशिष्ट गतिवाले भगवान्‌को | नमस्कार है। तर्कके अविषय, वेदस्वरूप, पृथ्वीको वेदप्रियाय महते विक्रमाय नमो नमः। | धारण करनेवाले भगवान् वाराहको प्रणाम है। ब्राह्मणकुलमें वाराहायाप्रतर्क्याय वेदाङ्गाय महीभृते ॥ ३५ | अवतीर्ण, वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञाता और अनेक विषयोंका नमो द्युतिमते नित्यं ब्राह्मणाय नमो नमः। | ज्ञान रखनेवाले कान्तिमान् भगवान् वामनको नमस्कार वामनाय बहुज्ञाय वेदवेदाङ्गधारिणे ॥ ३६ | है। बलिको बाँधनेवाले, वेदके पालक, देवताओंके | स्वामी, व्यापक, परमात्मा आप वामनरूपधारी बलिबन्धनदक्षाय वेदपालाय ते नमः। | विष्णुभगवान्‌को प्रणाम है। शुद्ध द्रव्यमय, शुद्धस्वरूप विष्णवे सुरनाथाय व्यापिने परमात्मने ॥ ३७ | भगवान् चतुर्भुजको नमस्कार है। दुष्ट क्षत्रियोंका अन्त | करनेवाले जमदग्निनन्दन भगवान् परशुरामको प्रणाम है। चतुर्भुजाय शुद्धाय शुद्धद्रव्याय ते नमः। | रावणका वध करनेवाले आप महात्मा श्रीरामको नमस्कार जामदग्न्याय रामाय दुष्टक्षत्रान्तकारिणे ॥ ३८ | है। गोविन्द ! आपको बारंबार प्रणाम है। आप इस रामाय रावणान्ताय नमस्तुभ्यं महात्मने। | दुर्गन्धपूर्ण नरकसे हमारा उद्धार करें ॥ ३२-३९॥ अस्मानुद्धर गोविन्द पूतिगन्धान्नमोऽस्तु ते ॥ ३९ |

1113 Narsingpuran_Section_3_2_Front In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

३६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ९

३६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ९ व्यास उवाच इति संकीर्तिते विष्णौ नारकैर्भक्तिपूर्वकम्। तदा सा नारकी पीडा गता तेषां महात्मनाम्॥ ४० कृष्णरूपधराः सर्वे दिव्यवस्त्रविभूषिताः। दिव्यगन्धानुलिप्ताङ्गा दिव्याभरणभूषिताः॥ ४१ तानारोप्य विमानेषु दिव्येषु हरिपूरुषाः। तर्जयित्वा यमभटान् नीतास्ते केशवालयम्॥ ४२ नारकेषु च सर्वेषु नीतेषु हरिपूरुषैः। विष्णुलोकं यमो भूयो नमश्चक्रे तदा हरिम्॥ ४३ यन्नामकीर्तनाद्याता नारकाः केशवालयम्। तं नमामि सदा देवं नरसिंहमहं गुरुम्॥ ४४ तस्य वै नरसिंहस्य विष्णोरमिततेजसः। प्रणामं येऽपि कुर्वन्ति तेभ्योऽपीह नमो नमः॥ ४५ दृष्ट्वा प्रशान्तं नरकाग्निमुग्रं यन्त्रादि सर्वं विपरीतमत्र। पुनः स शिक्षार्थमथात्मदूतान् यमो हि वक्तुं कृतवान् मनः स्वयम्॥ ४६ व्यासजी कहते हैं—शुकदेव ! इस प्रकार नरकमें पड़े हुए जीवोंने जब भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुका कीर्तन किया, तब उन महात्माओंकी नरक-पीड़ा तत्काल दूर हो गयी। वे सभी अपने अङ्गोंमें दिव्य गन्धका अनुलेप लगाये, दिव्य वस्त्र और भूषणोंसे विभूषित हो, श्रीकृष्णस्वरूप हो गये। फिर भगवान् विष्णुके किंकर यमदूतोंकी भर्त्सना करके उन्हें दिव्य विमानोंपर बिठाकर विष्णुधामको ले गये। विष्णुदूतोंद्वारा सभी नरकस्थ जीवोंके विष्णुलोकमें ले जाये जानेपर यमराजने पुनः भगवान् विष्णुको प्रणाम किया। 'जिनके नामकीर्तनसे नरकमें पड़े हुए जीव विष्णुधामको चले गये, उन गुरुदेव नरसिंह-भगवान्‌को मैं सदा प्रणाम करता हूँ। उन अमित तेजस्वी नरसिंहस्वरूप भगवान् विष्णुको जो प्रणाम करते हैं, उन्हें भी मेरा बार-बार नमस्कार है'॥ ४०-४५॥ उग्र नरकाग्निको शान्त और सभी यन्त्र आदिको विपरीत दशामें पड़े देखकर यमराजने स्वयं ही पुनः अपने दूतोंको शिक्षा देनेके लिये मनमें विचार किया॥ ४६॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे यमगीता नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'यमगीता' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८॥ नवाँ अध्याय यमाष्टक—यमराजका अपने दूतके प्रति उपदेश श्रीव्यास उवाच स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्तं वदति यमः किल तस्य कर्णमूले। परिहर मधुसूदनप्रपन्नान् प्रभुरहमन्यनृणां न वैष्णवानाम्॥ १ अहममरगणार्चितेन धात्रा यम इति लोकहिताहिते नियुक्तः। हरिगुरुविमुखान् प्रशास्मि मर्त्यान् हरिचरणप्रणतान्नमस्करोमि ॥ २ श्रीव्यासजी बोले—अपने किंकरको हाथमें पाश लिये कहीं जानेको उद्यत देखकर यमराज उसके कानमें कहते हैं—"दूत ! तुम भगवान् मधुसूदनकी शरणमें गये हुए प्राणियोंको छोड़ देना; क्योंकि मेरी प्रभुता दूसरे मनुष्योंपर ही चलती है, वैष्णवोंपर मेरा प्रभुत्व नहीं है। देवपूजित ब्रह्माजीने मुझे 'यम' कहकर लोगोंके पुण्य- पापका विचार करनेके लिये नियुक्त किया है। जो विष्णु और गुरुसे विमुख हैं, मैं उन्हीं मनुष्योंका शासन करता हूँ। जो श्रीहरिके चरणोंमें शीश झुकानेवाले हैं, उन्हें तो In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth 1113 Narsingpuran_Section_3_2_Back

अध्याय ९ ] यमाष्टक — यमराजका अपने दूतके प्रति उपदेश ३७

अध्याय ९ ] यमाष्टक — यमराजका अपने दूतके प्रति उपदेश ३७ सुगतिमभिलषामि वासुदेवा- दहमपि भागवते स्थितान्तरात्मा। मधुवधवशगोऽस्मि न स्वतन्त्रः प्रभवति संयमने ममापि कृष्णः॥ ३ भगवति विमुखस्य नास्ति सिद्धि- र्विषममृतं भवतीति नेदमस्ति। वर्षशतमपीह पच्यमानं व्रजति न काञ्चनतामयः कदाचित् ॥ ४ नहि शशिकुलुषच्छविः कदाचिद्- विरमति नो रवितामुपैति चन्द्रः। भगवति च हरावनन्यचेता भृशमलिनोऽपि विराजते मनुष्यः॥ ५ महदपि सुविचार्य लोकतत्त्वं भगवदुपास्तिमृते न सिद्धिरस्ति। सुरगुरुसुदृढप्रसाददौ तौ हरिचरणौ स्मरतापवर्गहेतोः॥ ६ शुभमिदमुपलभ्य मानुषत्वं सुकृतशतेन वृथेन्द्रियार्थहेतोः। रमयति कुरुते न मोक्षमार्गं दहयति चन्दनमाशु भस्महेतोः॥ ७ मुकुलितकरकुड्मलैः सुरेन्द्रैः सततनमस्कृतपादपङ्कजो यः। अविहतगतये सनातनाय जगति जनिं हरते नमोऽग्रजाय॥ ८ यमाष्टकमिदं पुण्यं पठते यः शृणोति वा। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥ ९ इतीदमुक्तं यमवाक्यमुत्तमं मयाधुना ते हरिभक्तिवर्द्धनम्। पुनः प्रवक्ष्यामि पुरातनीं कथां भृगोस्तु पौत्रेण च या पुरा कृता॥ १०

मैं स्वयं ही प्रणाम करता हूँ। भगवद्भक्तोंके चिन्तन एवं स्मरणमें अपना मन लगाकर मैं भी भगवान् वासुदेवसे अपनी सुगति चाहता हूँ। मैं मधुसूदनके वशमें हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ। भगवान् विष्णु मेरा भी नियन्त्रण करनेमें समर्थ हैं। जो भगवान्‌से विमुख है, उसे कभी सिद्धि (मुक्ति) नहीं प्राप्त हो सकती; विष अमृत हो जाय, ऐसा कभी सम्भव नहीं है; लोहा सैकड़ों वर्षोंतक आगमें तपाया जाय, तो भी कभी सोना नहीं हो सकता; चन्द्रमाकी कलङ्कित कान्ति कभी निष्कलङ्क नहीं हो सकती; वह कभी सूर्यके समान प्रकाशमान नहीं हो सकता; परंतु जो अनन्यचित्त होकर भगवान् विष्णुके चिन्तनमें लगा है, वह मनुष्य अपने शरीरसे अत्यन्त मलिन होनेपर भी बड़ी शोभा पाता है। महान् लोकतत्त्वका अच्छी तरह विचार करनेपर भी यही निश्चित होता है कि भगवान्‌की उपासनाके बिना सिद्धि नहीं प्राप्त हो सकती; इसलिये देवगुरु बृहस्पतिके ऊपर सुदृढ़ अनुकम्पा करनेवाले भगवच्चरणोंका तुमलोग मोक्षके लिये स्मरण करते रहो। जो लोग सैकड़ों पुण्योंके फलस्वरूप इस सुन्दर मनुष्य-शरीरको पाकर भी व्यर्थ विषयसुखोंमें रमण करते हैं, मोक्षपथका अनुसरण नहीं करते, वे मानो राखके लिये जल्दी-जल्दी चन्दनकी लकड़ीको फूँक रहे हैं। बड़े-बड़े देवेश्वर हाथ जोड़कर मुकुलित करपङ्कज-कोषद्वारा जिन भगवान्‌के चरणारविन्दोंको प्रणाम करते हैं तथा जिनकी गति कभी और कहीं भी प्रतिहत नहीं होती, उन भवजन्मनाशक एवं सबके अग्रज सनातन पुरुष भगवान् विष्णुको नमस्कार है'॥ १-८॥ श्रीव्यासजी कहते हैं—इस पवित्र यमाष्टकको जो पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकको चला जाता है। भगवान् विष्णुकी भक्तिको बढ़ानेवाला यमराजका यह उत्तम वचन मैंने इस समय तुमसे कहा है; अब पुनः उसी पुरानी कथाको अर्थात् भृगुके पौत्र मार्कण्डेयजीने पूर्वकालमें जो कुछ किया था, उसको कहूँगा॥ ९-१०॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे यमाष्टकनाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'यमाष्टक नाम' नवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

३८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १०

३८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १० दसवाँ अध्याय मार्कण्डेयका विवाह कर वेदशिराको उत्पन्न करके प्रयागमें अक्षयवटके नीचे तप एवं भगवान्की स्तुति करना; फिर आकाशवाणीके अनुसार स्तुति करनेपर भगवान्का उन्हें आशीर्वाद एवं वरदान देना तथा मार्कण्डेयजीका क्षीरसागरमें जाकर पुनः उनका दर्शन करना


[मूल संस्कृत श्लोक - वाम भाग]

श्रीव्यास उवाच जित्वैवमात्मनो मृत्युं तपसा शंसितव्रतः। स जगाम पितुर्गेहं मार्कण्डेयो महामतिः॥ १ कृत्वा विवाहं धर्मेण भृगोर्वाक्यविशेषतः। स वेदशिरसं पुत्रमुत्पाद्य च विधानतः॥ २ इष्ट्वा यज्ञैस्तु देवेशं नारायणमनामयम्। श्राद्धेन तु पितॄनिष्ट्वा अन्नदानेन चातिथीन्॥ ३ प्रयागमासाद्य पुनः स्नात्वा तीर्थे गरीयसि। मार्कण्डेयो महातेजास्तेपे वटतले तपः॥ ४ यस्य प्रसादेन पुरा जितवान् मृत्युमात्मनः। तं देवं द्रष्टुमिच्छन् यः स तेपे परमं तपः॥ ५ वायुभक्षश्चिरं कालं तपसा शोषयंस्तनुम्। एकदा तु महातेजा मार्कण्डेयो महामतिः॥ ६ आराध्य माधवं देवं गन्धपुष्पादिभिः शुभैः। अग्रे व्यग्रमनाः स्थित्वा हृदये तमनुस्मरन्। शङ्खचक्रगदापाणिं तुष्टाव गरुडध्वजम्॥ ७ मार्कण्डेय उवाच नरं नृसिंहं नरनाथमच्युतं प्रलम्बबाहुं कमलायतेक्षणम्। क्षितीश्वरैरर्चितपादपङ्कजं नमामि विष्णुं पुरुषं पुरातनम्॥ ८ जगत्पतिं क्षीरसमुद्रमन्दिरं तं शार्ङ्गपाणिं मुनिवृन्दवन्दितम्। श्रियःपतिं श्रीधरमीशमीश्वरं नमामि गोविन्दमनन्तवर्चसम्॥ ९


[हिन्दी अनुवाद - दक्षिण भाग]

श्रीव्यासजी कहते हैं—शुकदेव ! इस प्रकार तपस्याद्वारा अपनी मृत्युको जीतकर प्रशंसित व्रतवाले महाबुद्धिमान् मार्कण्डेयजी पिताके घर गये। वहाँ भृगुजीके विशेष आग्रहसे धर्मपूर्वक विवाह करके उन्होंने विधिके अनुसार ‘वेदशिरा' नामक एक पुत्र उत्पन्न किया। तत्पश्चात् निरामय (निर्विकार) देवेश्वर भगवान् नारायणका यज्ञोंद्वारा यजन करते हुए उन्होंने श्राद्धसे पितरोंका और अन्नदानसे अतिथियोंका पूजन किया। इसके बाद पुनः प्रयागमें जाकर वहाँके श्रेष्ठतम तीर्थ त्रिवेणीमें स्नान करके महातेजस्वी मार्कण्डेयजी अक्षयवटके नीचे तप करने लगे। जिनके कृपाप्रसादसे उन्होंने पूर्वकालमें मृत्युपर विजय प्राप्त की थी, उन्हीं देवाधिदेवके दर्शनकी इच्छासे उन्होंने उत्कृष्ट तपस्या आरम्भ की। दीर्घकालतक केवल वायु पीकर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए वे महातेजस्वी महाबुद्धिमान् मार्कण्डेयजी एक दिन गन्ध-पुष्प आदि शुभ उपकरणोंसे भगवान् वेणीमाधवकी आराधना करके उनके सम्मुख स्वस्थचित्तसे खड़े हो गये और हृदयमें उन्हीं शङ्ख-चक्र-गदाधारी गरुडध्वज भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए उनकी स्तुति करने लगे॥ १-७॥ मार्कण्डेयजी बोले—जो भगवान् श्रेष्ठ नर, नृसिंह और नरनाथ (मनुष्योंके स्वामी) हैं, जिनकी भुजाएँ लम्बी हैं, नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान विशाल हैं तथा चरणारविन्द असंख्य भूपतियोंद्वारा पूजित हैं, उन पुरातन पुरुष भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। जो संसारके पालक हैं, क्षीरसमुद्र जिनका निवास-स्थान है, जो हाथमें शार्ङ्गधनुष धारण किये रहते हैं, मुनिवृन्द जिनकी वन्दना करते हैं, जो लक्ष्मीके पति हैं और लक्ष्मीको निरन्तर अपने हृदयमें धारण करते हैं, उन सर्वसमर्थ, सर्वेश्वर, अनन्त तेजोमय भगवान् गोविन्दको


In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय १० ] मार्कण्डेयका विवाह कर वेदशिराको उत्पन्न करके प्रयागमें तप एवं भगवान्‌की स्तुति करना ३९ अजं वरेण्यं जनदुःखनाशनं | मैं प्रणाम करता हूँ। जो अजन्मा, सबके वरणीय, जन- गुरुं पुराणं पुरुषोत्तमं प्रभुम्। | समुदायके दुःखोंका नाश करनेवाले, गुरु, पुराण- सहस्रसूर्यद्युतिमन्तमच्युतं | पुरुषोत्तम एवं सबके स्वामी हैं, सहस्रों सूर्योंके समान जिनकी कान्ति है तथा जो अच्युतस्वरूप हैं, उन नमामि भक्त्या हरिमाद्यमाधवम्॥ १० | आदिमाधव भगवान् विष्णुको मैं भक्तिभावसे प्रणाम पुरस्कृतं पुण्यवतां परां गतिं | करता हूँ। जो पुण्यात्मा भक्तोंके ही समक्ष सगुण- साकार रूपसे प्रकट होते हैं, सबकी परमगति हैं, भूमि, क्षितीश्वरं लोकपतिं प्रजापतिम्। | लोक और प्रजाओंके पति हैं, 'पर' अर्थात् कारणोंके परं पराणामपि कारणं हरिं | भी परम कारण हैं तथा तीनों लोकोंके कर्मोंके साक्षी नमामि लोकत्रयकर्मसाक्षिणम्॥ ११ | हैं, उन भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। जो भोगे त्वनन्तस्य पयोधौ सुरः | अनादि विधाता भगवान् पूर्वकालमें क्षीरसमुद्रके भीतर पुरा हि शेते भगवाननादिकृत्। | 'अनन्त' नामक शेषनागके शरीररूपी शय्यापर सोये थे, क्षीरोदवीचीकणिकाम्बुनोक्षितं | क्षीरसिन्धुकी तरङ्गोंके जलकणोंसे अभिषिक्त होनेवाले उन लक्ष्मीनिवास भगवान् केशवको मैं प्रणाम करता हूँ। तं श्रीनिवासं प्रणतोऽस्मि केशवम्॥ १२ | जिन्होंने नरसिंहस्वरूप धारण किया है, जो महान् देवता यो नारसिंहं वपुरास्थितो महान् | हैं, मुर दैत्यके शत्रु हैं, मधु तथा कैटभ नामक दैत्योंका सुरो मुरारिर्मधुकैटभान्तकृत्। | अन्त करनेवाले हैं और समस्त लोकोंकी पीड़ा दूर समस्तलोकार्तिहरं हिरण्यकं | करनेवाले एवं हिरण्यगर्भ हैं, उन भगवान् विष्णुको मैं नमामि विष्णुं सततं नमामि तम्॥ १३ | सदा नमस्कार करता हूँ। जो अनन्त, अव्यक्त, इन्द्रियातीत, सर्वव्यापी और अपने विभिन्न रूपोंमें स्वयं ही प्रतिष्ठित अनन्तमव्यक्तमतीन्द्रियं विभुं | हैं तथा योगेश्वरगण जिनके चरणोंमें सदा ही मस्तक स्वे स्वे हि रूपे स्वयमेव संस्थितम्। | झुकाते हैं, उन भगवान् जनार्दनको मैं भक्तिपूर्वक योगेश्वरैरेव सदा नमस्कृतं | निरन्तर प्रणाम करता हूँ। जो आनन्दमय, एक (अद्वितीय), नमामि भक्त्या सततं जनार्दनम्॥ १४ | रजोगुणसे रहित, ज्ञानस्वरूप, वृन्दा (लक्ष्मी)-के धाम और योगियोंद्वारा पूजित हैं; जो अणुसे भी अत्यन्त अणु आनन्दमेकं विरजं विदात्मकं | और वृद्धि तथा क्षयसे शून्य हैं, उन भक्तप्रिय भगवान् वृन्दालयं योगिभिरेव पूजितम्। | विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ८-१५॥ अणोरणीयांसमवृद्धिमक्षयं | श्रीव्यासजी कहते हैं-वत्स! इस प्रकार स्तुति नमामि भक्तप्रियमेश्वरं हरिम्॥ १५ | समाप्त होनेपर उस तीर्थमें तपस्या करनेवाले उन महाभाग श्रीव्यास उवाच | मार्कण्डेयजीसे आकाशवाणीने कहा- 'ब्रह्मन्! क्यों क्लेश इति स्तोत्रावसाने तं वागुवाचाशरीरिणी। | उठा रहे हो, तुम्हें जो भगवान् माधवका दर्शन नहीं हो मार्कण्डेयं महाभागं तीर्थेऽनु तपसि स्थितम्॥ १६ | रहा है, वह तभीतक जबतक तुम समस्त तीर्थोंमें स्नान किमर्थं क्लिश्यते ब्रह्मंस्त्वया यो नैव दृश्यते। | नहीं कर लेते' उसके यों कहनेपर महामति मार्कण्डेयजीने माधवः सर्वतीर्थेषु यावन्न स्नानमाचरेः॥ १७ | समस्त तीर्थोंमें स्नान किया (परंतु जब फिर भी दर्शन नहीं हुआ, तब उन्होंने आकाशवाणीको लक्ष्य करके इत्युक्तः सर्वतीर्थेषु स्नात्वोवाच महामतिः। | कहा-) 'जो कार्य करनेसे समस्त तीर्थोंमें स्नान करना सफल होता है, अथवा समस्त तीर्थोंमें स्नानका फल कृत्वा कृत्वा सर्वतीर्थे स्नानं चैव कृतं भवेत्। | मिल जाता है, वह कार्य मुझे प्रसन्न होकर आप बतलाइये। तद्वद त्वं मम प्रीत्या योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते॥ १८ | आप जो भी हों, आपको नमस्कार है' ॥ १६-१८॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

४० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १०

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (Transcribed Text) दिया गया है:

४० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १० [मूल संस्कृत श्लोक - वाम भाग] वागुवाच स्तोत्रेणानेन विप्रेन्द्र स्तुहि नारायणं प्रभुम्। नान्यथा सर्वतीर्थानां फलं प्राप्स्यसि सुव्रत ॥ १९ मार्कण्डेय उवाच तदेवाख्याहि भगवन् स्तोत्रं तीर्थफलप्रदम्। येन जप्तेन सकलं तीर्थस्नानफलं लभेत् ॥ २० वागुवाच जय जय देवदेव जय माधव केशव। जय पद्मपलाशाक्ष जय गोविन्द गोपते ॥ २१ जय जय पद्मनाभ जय वैकुण्ठ वामन। जय पद्म हृषीकेश जय दामोदराच्युत ॥ २२ जय पद्मेश्वरानन्त जय लोकगुरो जय। जय शङ्खगदापाणे जय भूधरसूकर ॥ २३ जय यज्ञेश वाराह जय भूधर भूमिप। जय योगेश योगज्ञ जय योगप्रवर्त्तक ॥ २४ जय योगप्रवर्त्तक जय धर्मप्रवर्त्तक। कृतप्रिय जय जय यज्ञेश यज्ञाङ्ग जय ॥ २५ जय वन्दितसद्द्विज जय नारदसिद्धिद। जय पुण्यवतां गेह जय वैदिकभाजन ॥ २६ जय जय चतुर्भुज (श्री) जयदेव जय दैत्यभयावह। जय सर्वज्ञ सर्वात्मन् जय शंकर शाश्वत ॥ २७ जय विष्णो महादेव जय नित्यमधोक्षज। प्रसादं कुरु देवेश दर्शयाद्य स्वकां तनुम् ॥ २८ व्यास उवाच इत्येवं कीर्तिते तेन मार्कण्डेयेन धीमता। प्रादुर्बभूव भगवान् पीतवासा जनार्दनः ॥ २९ शङ्खचक्रगदापाणिः सर्वाभरणभूषितः। तेजसा द्योतयन् सर्वा दिशो विष्णुः सनातनः ॥ ३० तं दृष्ट्वा सहसा भूमौ चिरप्रार्थितदर्शनम्। प्रयातः शिरसा वश्यो भक्त्या स भृगुनन्दनः ॥ ३१ निपत्योत्पत्य च पुनः पुनः साङ्गं महामनाः। प्रबद्धसम्पुटकरो गोविन्दं पुरतः स्तुवन् ॥ ३२ [हिन्दी अनुवाद - दक्षिण भाग] आकाशवाणीने कहा—विप्रेन्द्र ! सुव्रत ! इस स्तोत्रसे प्रभुवर नारायणका स्तवन करो; और किसी उपायसे तुम्हें समस्त तीर्थोंका फल नहीं प्राप्त होगा ॥ १९ ॥ मार्कण्डेयजी बोले—भगवन् ! जिसका जप करनेसे तीर्थस्नानका सम्पूर्ण फल प्राप्त हो जाता है, वह तीर्थफलदायक स्तोत्र कौन-सा है ? उसे ही मुझे बताइये ॥ २० ॥ आकाशवाणीने कहा—देवदेव ! माधव ! केशव ! आपकी जय हो, जय हो। आपके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान शोभा पाते हैं। गोविन्द ! गोपते ! आपकी जय हो, जय हो। पद्मनाभ ! वैकुण्ठ ! वामन ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। पद्मस्वरूप हृषीकेश ! आपकी जय हो। दामोदर ! अच्युत ! आपकी जय हो। लक्ष्मीपते ! अनन्त ! आपकी जय हो। लोकगुरो ! आपकी जय हो, जय हो। शङ्ख और गदा धारण करनेवाले तथा पृथ्वीको उठानेवाले भगवान् वाराह ! आपकी जय हो, जय हो। यज्ञेश्वर ! पृथ्वीका धारण तथा पोषण करनेवाले वाराह ! आपकी जय हो, जय हो। योगके ईश्वर, ज्ञाता और प्रवर्तक ! आपकी जय हो, जय हो। योग और धर्मके प्रवर्तक ! आपकी जय हो, जय हो। कर्मप्रिय ! यज्ञेश्वर ! यज्ञाङ्ग ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। उत्तम ब्राह्मणोंकी वन्दना करने—उन्हें सम्मान देनेवाले देवता ! आपकी जय हो और नारदजीको सिद्धि देनेवाले परमेश्वर ! आपकी जय हो। पुण्यवानोंके आश्रय, वैदिक वाणीके चरम तात्पर्यभूत एवं वेदोक्त कर्मोंके परम आश्रय नारायण ! आपकी जय हो, जय हो। चतुर्भुज ! आपकी जय हो। दैत्योंको भय देनेवाले श्रीजयदेव ! आपकी जय हो, जय हो। सर्वज्ञ ! सर्वात्मन् ! आपकी जय हो। सनातनदेव ! कल्याणकारी भगवन् ! आपकी जय हो, जय हो। महादेव ! विष्णो ! अधोक्षज ! देवेश्वर ! आप मुझपर प्रसन्न होइये और आज मुझे अपने स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कराइये ॥ २१—२८ ॥ श्रीव्यासजी कहते हैं—शुकदेव ! आकाशवाणीके कथनानुसार जब बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीने इस प्रकार भगवन्नामोंका कीर्तन किया, तब पीताम्बरधारी भगवान् जनार्दन वहाँ प्रकट हो गये। वे सनातन भगवान् विष्णु हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा लिये, समस्त आभूषणोंसे भूषित हो अपने तेजसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। भृगुवंशको आनन्दित करनेवाले मार्कण्डेयजीने भगवान्‌को, जिनका दर्शन चिरकालसे प्रार्थित था, सहसा सामने प्रकट हुआ देख, भक्तिविवश हो, भूमिपर मस्तक रखकर प्रणाम किया। भूमिपर गिर-गिरकर बारंबार साष्टांग प्रणाम करके खड़े हो, महामना मार्कण्डेय दोनों हाथ जोड़ सामने उपस्थित हुए भगवान्‌की इस प्रकार स्तुति करने लगे ॥ २९—३२ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय १० ] मार्कण्डेयका विवाह कर वेदशिराको उत्पन्न करके प्रयागमें तप एवं भगवान्‌की स्तुति करना ४१ मार्कण्डेय उवाच नमोऽस्तु ते देवदेव महाचित्त महाकाय महाप्राज्ञ महादेव महाकीर्त्ते ब्रह्मेन्द्रचन्द्र- रुद्राचितपादयुगल श्रीपद्महस्त सम्मर्दितदैत्य- देह ॥ ३३॥ अनन्तभोगशयनार्पितसर्वाङ्ग सनक- सनन्दनसनत्कुमाराद्यैर्योगिभिर्नासाग्रन्यस्तलोचनै- रनवरतमभिचिन्तितमोक्षतत्त्व । गन्धर्व- विद्याधरयक्षकिन्नरकिम्पुरुषैरहरहर्गीयमानदिव्य- यशः ॥ ३४॥ नृसिंह नारायण पद्मनाभ गोविन्द गोवर्द्धनगुहानिवास योगीश्वर देवेश्वर जलेश्वर महेश्वर ॥ ३५॥ योगधर महामायाधर विद्याधर यशोधर कीर्तिधर त्रिगुणनिवास त्रितत्त्वधर त्रेताग्निधर ॥ ३६ ॥ त्रिवेदभाक् त्रिनिकेत त्रिसुपर्ण त्रिदण्डधर ॥ ३७॥ स्निग्धमेघाभार्चितद्युतिविराजित पीताम्बरधर किरीटकटक- केयूरहारमणिरत्नांशुदीप्तिविद्योतितसर्वदिश ॥ ३८ ॥ कनकमणिकुण्डलमण्डितगण्डस्थल मधुसूदन विश्वमूर्ते ॥ ३९ ॥ लोकनाथ यज्ञेश्वर यज्ञप्रिय तेजोमय भक्तिप्रिय वासुदेव दुरितापहाराराध्य पुरुषोत्तम नमोऽस्तु ते ॥ ४० ॥ व्यास उवाच इत्युदीरितमाकर्ण्य भगवांस्तु जनार्दनः । देवदेवः प्रसन्नात्मा मार्कण्डेयमुवाच ह ॥ ४१ श्रीभगवानुवाच तुष्टोऽस्मि भवतो वत्स तपसा महता पुनः । स्तोत्रैरपि महाबुद्धे नष्टपापोऽसि साम्प्रतम् ॥ ४२ वरं वरय विप्रेन्द्र वरदोऽहं तवाग्रतः । नातमतपसा ब्रह्मन् द्रष्टुं साध्योऽहमञ्जसा ॥ ४३ मार्कण्डेयजी बोले—महामना ! महाकाय ! महामते ! महादेव ! महायशस्वी ! देवाधिदेव ! आपको नमस्कार है। ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्रमा तथा रुद्र निरन्तर आपके युगल- चरणारविन्दोंकी अर्चना करते हैं। आपके हाथमें शोभाशाली कमल सुशोभित होता है; आपने दैत्योंके शरीरोंको मसल डाला है, आपको नमस्कार है। आप 'अनन्त' नामसे विख्यात शेषनागके शरीरकी शय्याको अपने सम्पूर्ण अङ्ग समर्पित कर देते हैं—उसीपर शयन करते हैं। सनक, सनन्दन और सनत्कुमार आदि योगीजन अपने नेत्रोंकी दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर सुस्थिर करके नित्य- निरन्तर जिस मोक्षतत्त्वका चिन्तन करते हैं, वह आप ही हैं। गन्धर्व, विद्याधर, यक्ष, किंनर और किम्पुरुष प्रतिदिन आपके ही दिव्य सुयशका गान करते रहते हैं। नृसिंह ! नारायण ! पद्मनाभ ! गोविन्द ! गिरिराज गोवर्धनकी कन्दरामें क्रीड़ा-विश्रामादिके लिये निवास करनेवाले ! योगीश्वर ! देवेश्वर ! जलेश्वर और महेश्वर ! आपको नमस्कार है। योगधर ! महामायाधर ! विद्याधर ! यशोधर ! कीर्तिधर ! सत्त्वादि तीनों गुणोंके आश्रय ! त्रितत्त्वधारी तथा गार्हपत्यादि तीनों अग्नियोंको धारण करनेवाले देव ! आपको प्रणाम है। आप ऋक्, साम और यजुष्—इन तीनों वेदोंके परम प्रतिपाद्य, त्रिनिकेत (तीनों लोकोंके आश्रय), त्रिसुपर्ण, मन्त्ररूप और त्रिदण्डधारी हैं; ऐसे आपको प्रणाम है। स्निग्ध मेघकी आभाके सदृश सुन्दर श्यामकान्तिसे सुशोभित, पीताम्बरधारी, किरीट, वलय, केयूर और हारोंमें जटिल मणिरत्नोंकी किरणोंसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करनेवाले नारायणदेव ! आपको नमस्कार है। सुवर्ण और मणियोंसे बने हुए कुण्डलोंद्वारा अलंकृत कपोलोंवाले मधुसूदन ! विश्वमूर्ते ! आपको प्रणाम है। लोकनाथ ! यज्ञेश्वर ! यज्ञप्रिय ! तेजोमय ! भक्तिप्रिय वासुदेव ! पापहारिन् ! आराध्यदेव पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है ॥ ३३-४० ॥ श्रीव्यासजी बोले—इस प्रकार स्तवन सुनकर देवदेव भगवान् जनार्दनने प्रसन्नचित्त होकर मार्कण्डेयजीसे कहा ॥ ४१ ॥ श्रीभगवान् बोले—वत्स ! मैं तुम्हारे महान् तप और फिर स्तोत्रपाठसे तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। महाबुद्धे ! इस समय तुम्हारा सारा पाप नष्ट हो चुका है। विप्रेन्द्र ! मैं तुम्हारे सम्मुख वर देनेके लिये उपस्थित हूँ; वर माँगो। ब्रह्मन् ! जिसने तप नहीं किया है, ऐसा कोई भी मनुष्य अनायास ही मेरा दर्शन नहीं पा सकता ॥ ४२-४३ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

४२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ११

४२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ११ मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजी बोले— देवेश्वर! इस समय आपके कृतकृत्योऽस्मि देवेश साम्प्रतं तव दर्शनात्। | दर्शनसे ही मैं कृतार्थ हो गया। जगत्पते! अब तो मुझे त्वद्भक्तिमचलामेकां मम देहि जगत्पते॥ ४४ | एकमात्र अपनी अविचल भक्ति ही दीजिये। माधव! यदि प्रसन्नो भगवन् मम माधव श्रीपते। | श्रीपते! हृषीकेश! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे चिरायुष्यं हृषीकेश येन त्वां चिरमर्चये॥ ४५ | चिरकालिक आयु दीजिये, जिससे मैं चिरकालतक श्रीभगवानुवाच | आपकी आराधना कर सकूँ॥ ४४-४५॥ मृत्युस्ते निर्जितः पूर्वे चिरायुस्त्वं च लब्धवान्। | श्रीभगवान् बोले— मृत्युको तो तुम पहले ही जीत भक्तिरस्त्वचला ते मे वैष्णवी मुक्तिदायिनी॥ ४६ | चुके हो, अब चिरकालिक आयु भी तुम्हें प्राप्त हुई। साथ इदं तीर्थं महाभाग त्वन्नाम्ना ख्यातिमेष्यति। | ही, मेरी मुक्तिदायिनी अविचल वैष्णवी भक्ति भी तुम्हें पुनस्त्वं द्रक्ष्यसे मां वै क्षीराब्धौ योगशायिनम्॥ ४७ | प्राप्त हो। महाभाग! यह तीर्थ आजसे तुम्हारे ही नामसे व्यास उवाच | विख्यात होगा; अब पुनः तुम क्षीरसमुद्रमें योगनिद्राका | आश्रय लेकर सोये हुए मेरा दर्शन पाओगे॥ ४६-४७॥ इत्युक्त्वा पुण्डरीकाक्षस्तत्रैवान्तरधीयत। | श्रीव्यासजी बोले— यों कहकर कमललोचन मार्कण्डेयोऽपि धर्मात्मा चिन्तयन्मधुसूदनम्॥ ४८ | भगवान् विष्णु वहीं अदृश्य हो गये। धर्मात्मा, साधुशिरोमणि, अर्चयन् देवदेवेशं जपन् शुद्धं नमन्नपि। | तपोधन मार्कण्डेयजी भी शुद्धस्वरूप देवदेवेश्वर वेदशास्त्राणि पुण्यानि पुराणान्यखिलानि च॥ ४९ | मधुसूदनका ध्यान, पूजन, जप और नमस्कार करते हुए मुनीनां श्रावयामास गाथाश्चैव तपोधनः। | वहीं रहकर मुनियोंको पवित्र वेदशास्त्र, अखिल पुराण, इतिहासानि पुण्यानि पितृतत्त्वं च सत्तमः॥ ५० | विविध प्रकारकी गाथाएँ, पावन इतिहास और पितृतत्त्व ततः कदाचित् पुरुषोत्तमोक्तं | भी सुनाने लगे। तदनन्तर किसी समय भगवान् पुरुषोत्तमके वचः स्मरन् शास्त्रविदां वरिष्ठः। | कहे हुए वचनको स्मरण कर, वे शास्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भ्रमन् समुद्रं स जगाम द्रष्टुं | उग्रतेजस्वी मुनि उन सुरेश्वर भगवान् श्रीहरिका दर्शन हरिं सुरेशं मुनिरुग्रतेजाः॥ ५१ | करनेके लिये घूमते हुए समुद्रकी ओर चले। हृदयमें श्रमेण युक्तश्चिरकालसम्भ्रमाद् | भगवान्‌की भक्ति धारण किये चिरकालतक परिश्रमपूर्वक भृगोः स पौत्रो हरिभक्तिमुद्वहन्। | चलते-चलते क्षीरसागरमें पहुँचकर उन भृगुके पौत्रने क्षीराब्धिमासाद्य हरिं सुरेशं | नागराजके शरीररूपी पर्यङ्कपर निद्रामग्न हुए सुरेश्वर नागेन्द्रभोगे कृतनिद्रमैक्षत॥ ५२ | भगवान् विष्णुका दर्शन किया॥ ४८-५२॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे मार्कण्डेयचरित्रे दशमोऽध्यायः॥ १०॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'मार्कण्डेयके चरित्र' वर्णनके प्रसंगमें दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०॥ ═══════════════════════════════════════════════════════════════ ग्यारहवाँ अध्याय मार्कण्डेयजीद्वारा शेषशायी भगवान्का स्तवन व्यास उवाच | व्यासजी बोले— शुकदेव! तदनन्तर मार्कण्डेयजी प्रणिपत्य जगन्नाथं चराचरगुरुं हरिम्। | शेषशय्यापर सोये हुए उन चराचरगुरु जगदीश्वर भगवान् मार्कण्डेयोऽभितुष्टाव भोगपर्यङ्कशायिनम्॥ १ | विष्णुको प्रणाम करके उनका स्तवन करने लगे॥ १॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ११ ] मार्कण्डेयजीद्वारा शेषशायी भगवान्का स्तवन ४३

अध्याय ११ ] मार्कण्डेयजीद्वारा शेषशायी भगवान्का स्तवन ४३


[मूल संस्कृत श्लोक]

मार्कण्डेय उवाच

प्रसीद भगवन् विष्णो प्रसीद पुरुषोत्तम । प्रसीद देवदेवेश प्रसीद गरुडध्वज ॥ २

प्रसीद विष्णो लक्ष्मीश प्रसीद धरणीधर । प्रसीद लोकनाथाद्य प्रसीद परमेश्वर ॥ ३

प्रसीद सर्वदेवेश प्रसीद कमलेक्षण । प्रसीद मन्दरधर प्रसीद मधुसूदन ॥ ४

प्रसीद सुभागाकान्त प्रसीद भुवनाधिप । प्रसीदाद्य महादेव प्रसीद मम केशव ॥ ५

जय कृष्ण जयाचिन्त्य जय विष्णो जयाव्यय । जय विश्व जयाव्यक्त जय विष्णो नमोऽस्तु ते ॥ ६

जय देव जयाजेय जय सत्य जयाक्षर । जय काल जयेशान जय सर्व नमोऽस्तु ते ॥ ७

जय यज्ञपते नाथ जय विश्वपते विभो । जय भूतपते नाथ जय सर्वपते विभो ॥ ८

जय विश्वपते नाथ जय दक्ष नमोऽस्तु ते । जय पापहरानन्त जय जन्मजरापह ॥ ९

जय भद्रातिभद्रेश जय भद्र नमोऽस्तु ते । जय कामद काकुत्स्थ जय मानद माधव ॥ १०

जय शंकर देवेश जय श्रीश नमोऽस्तु ते । जय कुङ्कुमरक्ताभ जय पङ्कजलोचन ॥ ११

जय चन्दनलिप्ताङ्ग जय राम नमोऽस्तु ते । जय देव जगन्नाथ जय देवकिनन्दन ॥ १२

जय सर्वगुरो ज्ञेय जय शम्भो नमोऽस्तु ते । जय सुन्दर पद्माभ जय सुन्दरिवल्लभ । जय सुन्दरसर्वाङ्ग जय वन्द्य नमोऽस्तु ते ॥ १३

जय सर्वद सर्वेश जय शर्मद शाश्वत । जय कामद भक्तानां प्रभविष्णो नमोऽस्तु ते ॥ १४


[हिन्दी अनुवाद]

मार्कण्डेयजी बोले — भगवन्! विष्णो! आप प्रसन्न हों। पुरुषोत्तम! आप प्रसन्न हों। देवदेवेश्वर! गरुडध्वज! आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों। लक्ष्मीपते विष्णो! धरणीधर! आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों। लोकनाथ! आदिपरमेश्वर! आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों। कमलके समान नेत्रोंवाले सर्वदेवेश्वर! आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों! समुद्रमन्थनके समय मन्दर पर्वतको धारण करनेवाले मधुसूदन! आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों। लक्ष्मीकान्त! भुवनपते! आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों। आदिपुरुष महादेव! केशव! आप मुझपर प्रसन्न हों, प्रसन्न हों ॥ २—५ ॥

कृष्ण! अचिन्तनीय कृष्ण! अव्यय विष्णो! विश्वके रूपमें रहनेवाले एवं व्यापक व्यक्त होते हुए भी अव्यक्त! परमेश्वर! आपकी जय हो, आपको मेरा प्रणाम है। अजेय देव! आपकी जय हो, जय हो। अविनाशी सत्य! आपकी जय हो, जय हो। सबका शासन करनेवाले काल! आपकी जय हो, जय हो। सर्वमय! आपकी जय हो, आपको नमस्कार है। यज्ञेश्वर! नाथ! व्यापक विश्वनाथ! आपकी जय हो, जय हो। स्वामिन्! भूतनाथ! सर्वेश्वर! विभो! आपकी जय हो, जय हो। विश्वपते! नाथ! कार्यदक्ष ईश्वर! आपकी जय हो, जय हो; आपको प्रणाम है। पापहारी! अनन्त! जन्म तथा वृद्धावस्थाके भयको नष्ट करनेवाले देव! आपकी जय हो, जय हो। भद्र! अतिभद्र! ईश! कल्याणमय प्रभो! आपकी जय हो, जय हो; आपको नमस्कार है। कामनाओंको पूर्ण करनेवाले ककुत्स्थ-कुलोत्पन्न श्रीराम! सम्मान देनेवाले माधव! आपकी जय हो, जय हो। देवेश्वर शंकर! लक्ष्मीपते! आपकी जय हो, जय हो; आपको नमस्कार है। कुङ्कुमके समान अरुण कान्तिवाले कमलनयन! आपकी जय हो, जय हो। चन्दनसे अनुलिप्त श्रीअङ्गोंवाले श्रीराम! आपकी जय हो, जय हो; आपको नमस्कार है। देव! जगन्नाथ! देवकीनन्दन! आपकी जय हो, जय हो। सर्वगुरो! जाननेयोग्य शम्भो! आपकी जय हो, जय हो; आपको नमस्कार है। नील कमलकी-सी आभावाले श्यामसुन्दर! सुन्दरी श्रीराधाके प्राणवल्लभ! आपकी जय हो, जय हो। सर्वाङ्गसुन्दर! वन्दनीय प्रभो! आपको नमस्कार है; आपकी जय हो, जय हो। सब कुछ देनेवाले सर्वेश्वर! कल्याणदायी सनातन पुरुष! आपकी जय हो, जय हो। भक्तोंकी कामनाओंको देनेवाले प्रभुवर! आपकी जय हो, आपको नमस्कार है ॥ ६—१४ ॥

४४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ११

४४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ११ नमः कमलनाभाय नमः कमलमालिने। | जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है तथा लोकनाथ नमस्तेऽस्तु वीरभद्र नमोऽस्तु ते॥ १५ | जो कमलकी माला पहने हुए हैं, उन भगवान्‌को नमस्त्रैलोक्यनाथाय चतुर्मूर्ते जगत्पते। | नमस्कार है। लोकनाथ! वीरभद्र! आपको बार-बार नमो देवाधिदेवाय नमो नारायणाय ते॥ १६ | नमस्कार है। चतुर्व्यूहस्वरूप जगदीश्वर! आप त्रिभुवननाथ देवाधिदेव नारायणको नमस्कार है। पीताम्बरधारी वासुदेवको नमस्ते वासुदेवाय नमस्ते पीतवाससे। | प्रणाम है, प्रणाम है। शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले नमस्ते नरसिंहाय नमस्ते शार्ङ्गधारिणे॥ १७ | नरसिंहस्वरूप आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है, नमस्कार है। भुवनेश्वर! चक्रधारी विष्णु, कृष्ण, राम नमः कृष्णाय रामाय नमश्चक्रायुधाय च। | और भगवान् शिवके रूपमें वर्तमान आपको बार-बार नमः शिवाय देवाय नमस्ते भुवनेश्वर॥ १८ | नमस्कार है। सबके स्वामी श्रीधर! अच्युत! वेदान्त नमो वेदान्तवेद्याय नमोऽनन्ताय विष्णवे। | शास्त्रके द्वारा जाननेयोग्य आप अन्तरहित भगवान् नमस्ते सकलाध्यक्ष नमस्ते श्रीधराच्युत॥ १९ | विष्णुको बारम्बार नमस्कार है। लोकाध्यक्ष! जगत्पूज्य परमात्मन्! आपको नमस्कार है॥ १५-१९१/२॥ लोकाध्यक्ष जगत्पूज्य परमात्मन् नमोऽस्तु ते। | आप ही समस्त संसारकी माता और आप ही त्वं माता सर्वलोकानां त्वमेव जगतः पिता॥ २० | सम्पूर्ण जगत्के पिता हैं। आप पीड़ितोंके सुहृद् हैं; आप त्वमार्तानां सुहृन्मित्रं प्रियस्त्वं प्रपितामहः। | सबके मित्र, प्रियतम, पिताके भी पितामह, गुरु, गति, त्वं गुरुस्त्वं गतिः साक्षी त्वं पतिस्त्वं परायणः॥ २१ | साक्षी, पति और परम आश्रय हैं। आप ही ध्रुव, वषट्कर्ता, हवि, हुताशन (अग्नि), शिव, वसु, धाता, त्वं ध्रुवस्त्वं वषट्कर्ता त्वं हविस्त्वं हुताशनः। | ब्रह्मा, सुरराज इन्द्र, यम, सूर्य, वायु, जल, कुबेर, मनु, त्वं शिवस्त्वं वसुर्धाता त्वं ब्रह्मा त्वं सुरेश्वरः॥ २२ | दिन-रात, रजनी, चन्द्रमा, धृति, श्री, कान्ति, क्षमा और त्वं यमस्त्वं रविर्वायुस्त्वं जलं त्वं धनेश्वरः। | धराधर शेषनाग हैं। चराचरस्वरूप मधुसूदन! आप ही त्वं मनुस्त्वमहोरात्रं त्वं निशा त्वं निशाकरः। | जगत्के स्रष्टा, शासक और संहारक हैं तथा आप ही त्वं धृतिस्त्वं श्रियः कान्तिस्त्वं क्षमा त्वं धराधरः॥ २३ | समस्त संसारके रक्षक हैं। आप ही करण, कारण, कर्ता और परमेश्वर हैं। हाथमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण त्वं कर्ता जगतामीशस्त्वं हन्ता मधुसूदन। | करनेवाले माधव! आप मेरा उद्धार करें। कमलदललोचन त्वमेव गोप्ता सर्वस्य जगतस्त्वं चराचर॥ २४ | प्रियतम! शेषशय्यापर शयन करनेवाले पुरुषोत्तम आपको करणं कारणं कर्ता त्वमेव परमेश्वरः। | ही मैं सदा भक्तिके साथ प्रणाम करता हूँ। देव! जिसमें शङ्खचक्रगदापाणे भो समुद्धर माधव॥ २५ | श्रीवत्सचिह्न शोभा पाता है, जो जगत्का आदिकारण है, जिसका वर्ण श्यामल और नेत्र कमलके समान हैं तथा प्रिय पद्मपलाशाक्ष शेषपर्यङ्कशायिनम्। | जो कलिके दोषोंको नष्ट करनेवाला है, आपके उस त्वामेव भक्त्या सततं नमामि पुरुषोत्तमम्॥ २६ | श्रीविग्रहको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २०-२७॥ श्रीवत्साङ्कं जगद्बीजं श्यामलं कमलेक्षणम्। | जो लक्ष्मीजीको अपने हृदयमें धारण करते हैं, नमामि ते वपुर्देव कलिकल्मषनाशनम्॥ २७ | जिनका शरीर सुन्दर है, जो दिव्यमालासे विभूषित लक्ष्मीधरमुदाराङ्गं दिव्यमालाविभूषितम्। | हैं, जिनका पृष्ठदेश सुन्दर और भुजाएँ बड़ी-बड़ी चारुपृष्ठं महाबाहुं चारुभूषणभूषितम्॥ २८ | हैं, जो सुन्दर आभूषणोंसे अलंकृत हैं, जिनकी नाभिसे पद्म प्रकट हुआ है, जिनके नेत्र कमलदलके पद्मनाभं विशालाक्षं पद्मपत्रनिभेक्षणम्। | समान सुन्दर और विशाल हैं, नासिका बड़ी ऊँची दीर्घतुङ्गमहाघ्राणं नीलजीमूतसंनिभम्॥ २९ | और लम्बी है, जो नील मेघके समान श्याम हैं, जिनकी भुजाएँ लम्बी, शरीर सुरक्षित और वक्षःस्थल दीर्घबाहुं सुगुप्ताङ्गं रत्नहारोज्ज्वलोरसम्। | रत्नोंके हारसे प्रकाशमान है, जिनकी भौंहें, ललाट सुभ्रूललाटमुकुटं स्निग्धदन्तं सुलोचनम्॥ ३० | और मुकुट-सभी सुन्दर हैं, दाँत चिकने और नेत्र In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ११ ] मार्कण्डेयजीद्वारा शेषशायी भगवान्‌का स्तवन ४५ चारुबाहुं सुताम्रोष्ठं रत्नोज्ज्वलितकुण्डलम् । मनोहर हैं, जो सुन्दर भुजाओं और रुचिर अरुण वृत्तकण्ठं सुपीनांसं सरसं श्रीधरं हरिम् ॥ ३१ अधरोंसे सुशोभित हैं, जिनके कुण्डल रत्नजटित होनेके कारण जगमगा रहे हैं, कण्ठ वर्तुलाकार है और कंधे सुकुमारमजं नित्यं नीलकुञ्चितमूर्धजम् । मांसल हैं, उन रसिकशेखर श्रीधर हरिको नमस्कार उन्नतांसं महोरस्कं कर्णान्तायतलोचनम् ॥ ३२ है ॥ २८-३१ ॥ जो अजन्मा एवं नित्य होनेपर भी सुकुमारस्वरूप हेमारविन्दवदनमिन्दिरायनमीश्वरम् । धारण किये हुए हैं, जिनके केश काले-काले और सर्वलोकविधातारं सर्वपापहरं हरिम् ॥ ३३ घुंघराले हैं, कंधे ऊँचे और वक्षःस्थल विशाल हैं, आँखें कानोंतक फैली हुई हैं, मुखारविन्द सुवर्णमय कमलके सर्वलक्षणसम्पन्नं सर्वसत्त्वमनोरमम् । समान परम सुन्दर है, जो लक्ष्मीके निवासस्थान एवं विष्णुमच्युतमीशानमनन्तं पुरुषोत्तमम् ॥ ३४ सबके शासक हैं, सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा और समस्त पापोंको हर लेनेवाले हैं, समग्र शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न नतोऽस्मि मनसा नित्यं नारायणमनामयम् । और सभी जीवोंके लिये मनोरम हैं तथा जो सर्वव्यापी, वरदं कामदं कान्तममन्तं सूनृतं शिवम् ॥ ३५ अच्युत, ईशान, अनन्त एवं पुरुषोत्तम हैं, वरदाता, कामपूरक, कमनीय, अनन्त, मधुरभाषी एवं कल्याणस्वरूप हैं, उन नमामि शिरसा विष्णो सदा त्वां भक्तवत्सल । निरामय भगवान् नारायण श्रीहरिको मैं सदा हृदयसे अस्मिन्नेकार्णवे घोरे वायुस्कम्भितचञ्चले ॥ ३६ नमस्कार करता हूँ ॥ ३२-३५ ॥ भक्तवत्सल विष्णो ! मैं सदा आपको मस्तक झुकाकर अनन्तभोगशयने सहस्रफणशोभिते । प्रणाम करता हूँ। इस भयंकर एकार्णवमें, जो प्रलयकालिक विचित्रशयने रम्ये सेविते मन्दवायुना ॥ ३७ वायुकी प्रेरणासे विक्षुब्ध एवं चञ्चल हो रहा है, सहस्र फणोंसे सुशोभित 'अनन्त' नामक शेषनागके शरीरकी भुजपञ्जरसंसक्तकमलालयसेवितम् । विचित्र एवं रमणीय शय्यापर, जहाँ मन्द-मन्द वायु चल इह त्वां मनसा सर्वमिदानीं दृष्टवानहम् ॥ ३८ रही है, आपके भुजपाशमें बँधी हुई श्रीलक्ष्मीजीसे आप सेवित हैं; मैंने इस समय सर्वस्वरूप आपके रूपका इदानीं तु सुदुःखार्तो मायया तव मोहितः । यहाँपर जी भरकर दर्शन किया है ॥ ३६-३८ ॥ एकोदके निरालम्बे नष्टस्थावरजङ्गमे ॥ ३९ इस समय आपकी मायासे मोहित होकर मैं अत्यन्त दुःखसे पीड़ित हो रहा हूँ। दुःखरूपी पङ्कसे शून्ये तमसि दुष्पारे दुःखपङ्के निरामये । भरे हुए, व्याधिपूर्ण एवं अवलम्बशून्य इस एकार्णवमें शीतातपजरारोगशोकतृष्णादिभिः सदा ॥ ४० समस्त स्थावर-जङ्गम नष्ट हो चुके हैं। सब ओर शून्यमय अपार अन्धकार छाया हुआ है। मैं इसके भीतर पीडितोऽस्मि भृशं तात सुचिरं कालमच्युत । शीत, आतप, जरा, रोग, शोक और तृष्णा आदिके शोकमोहग्रहग्रस्तो विचरन् भवसागरे ॥ ४१ द्वारा सदा चिरकालसे अत्यन्त कष्ट पा रहा हूँ। तात ! अच्युत ! इस भवसागरमें शोक और मोहरूपी ग्राहसे इहाद्य विधिना प्राप्तस्तव पादाब्जसंनिधौ । ग्रस्त होकर भटकता हुआ आज मैं यहाँ दैववश आपके एकार्णवे महाघोरे दुस्तरे दुःखपीडितः ॥ ४२ चरणकमलोंके निकट आ पहुँचा हूँ। इस महाभयानक दुस्तर एकार्णवमें बहुत कालतक भटकते रहनेके कारण चिरभ्रमपरिश्रान्तस्त्वामद्य शरणं गतः । दुःखपीड़ित एवं थका हुआ मैं आज आपकी शरणमें प्रसीद सुमहामाय विष्णो राजीवलोचन ॥ ४३ आया हूँ। महामायी कमललोचन भगवन् ! विष्णो ! आप मुझपर प्रसन्न हों ॥ ३९-४३ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

४६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ११

४६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ११ विश्वयोने विशालाक्ष विश्वात्मन् विश्वसम्भव। अनन्यशरणं प्राप्तमतोऽत्र कुलनन्दन॥ ४४ त्राहि मां कृपया कृष्ण शरणागतमातुरम्। नमस्ते पुण्डरीकाक्ष पुराणपुरुषोत्तम॥ ४५ अब्जनाभ हृषीकेश मायामय नमोऽस्तु ते। मामुद्धर महाबाहो मग्ने संसारसागरे ॥ ४६ गह्वरे दुस्तरे दुःखक्लिष्टे क्लेशमहाग्रहैः। अनाथं कृपणं दीनं पतितं भवसागरे। मां समुद्धर गोविन्द वरदेश नमोऽस्तु ते॥ ४७ नमस्त्रैलोक्यनाथाय हरये भूधराय च। देवदेव नमस्तेऽस्तु श्रीवल्लभ नमोऽस्तु ते ॥ ४८ कुलनन्दन कृष्ण! आप विश्वकी उत्पत्तिके स्थान, विशाललोचन, विश्वोत्पादक और विश्वात्मा हैं; अतः दूसरेकी शरणमें न जाकर एकमात्र आपकी ही शरणमें आये हुए मुझ आतुरका आप कृपापूर्वक यहाँ उद्धार करें। पुराण-पुरुषोत्तम पुण्डरीकलोचन! आपको नमस्कार है। कज्जलके समान श्याम कान्तिवाले हृषीकेश! मायाके आश्रयभूत महेश्वर! आपको नमस्कार है। महाबाहो! संसार-सागरमें डूबे हुए मुझ शरणागतका उद्धार कर दें। वरदाता ईश्वर! गोविन्द! क्लेशरूपी महान् ग्राहोंसे भरे हुए, दुःख और क्लेशोंसे युक्त, दुस्तर एवं गहरे भवसागरमें गिरे हुए मुझ दीन, अनाथ एवं कृपणका उद्धार करें। त्रिभुवननाथ विष्णु और धरणीधर अनन्तको नमस्कार है। देवदेव! श्रीवल्लभ! आपको बारम्बार नमस्कार है॥ ४४-४८॥ कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भवान्। संसारार्णवमग्नानां प्रसीद मधुसूदन॥ ४९ त्वामेकमाद्यं पुरुषं पुराणं जगत्पतिं कारणमच्युतं प्रभुम्। जनार्दनं जन्मजरार्तिनाशनं सुरेश्वरं सुन्दरमिन्दिरापतिम्॥ ५० बृहद्भुजं श्यामलकोमलं शुभं वराननं वारिजपत्रनेत्रम्। तरंगभङ्गायतकन्तलं हरिं सुकान्तीमीशं प्रणतोऽस्मि शाश्वतम्॥ ५१ सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्त्वदर्पितम्। तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ त्वत्पूजाकरौ करौ॥ ५२ जन्मान्तरसहस्रेषु यन्मया पातकं कृतम्। तन्मे हर त्वं गोविन्द वासुदेवेति कीर्तनात्॥ ५३ कृष्ण! कृष्ण! आप दयालु और आश्रयहीनके आश्रय हैं। मधुसूदन! संसार-सागरमें निमग्न हुए प्राणियोंपर आप प्रसन्न हों। आज मैं एक (अद्वितीय), आदि, पुराणपुरुष, जगदीश्वर, जगत्के कारण, अच्युतस्वरूप, सबके स्वामी और जन्म-जरा एवं पीड़ाको नष्ट करनेवाले, देवेश्वर, परम सुन्दर लक्ष्मीपति भगवान् जनार्दनको प्रणाम करता हूँ। जिनकी भुजाएँ बड़ी हैं, जो श्यामवर्ण, कोमल, सुशोभन, सुमुख और कमलदललोचन हैं, क्षीरसागरकी तरंगभङ्गीके समान जिनके लम्बे-लम्बे घुँघराले केश हैं, उन परम कमनीय, सनातन ईश्वर भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। भगवन्! वही जिह्वा सफल है, जो आप श्रीहरिका स्तवन करती है; वही चित्त सार्थक है, जो आपके चरणोंमें समर्पित हो चुका है तथा केवल वे ही हाथ श्लाघ्य हैं, जो आपकी पूजा करते हैं। गोविन्द! हजारों जन्मान्तरोंमें मैंने जो-जो पाप किये हों, उन सबको आप 'वासुदेव' इस नामका कीर्तन करनेमात्रसे हर लीजिये ॥ ४९-५३॥ व्यास उवाच इति स्तुतस्ततो विष्णुर्मार्कण्डेयेन धीमता। संतुष्टः प्राह विश्वात्मा तं मुनिं गरुडध्वजः॥ ५४ व्यासजी बोले—तदनन्तर बुद्धिमान् मार्कण्डेय मुनिके इस प्रकार स्तुति करनेपर गरुडचिह्नित ध्वजावाले विश्वात्मा भगवान् विष्णुने संतुष्ट होकर उनसे कहा॥ ५४॥ श्रीभगवानुवाच प्रीतोऽस्मि तपसा विप्र स्तुत्या च भृगुनन्दन। वरं वृणीष्व भद्रं ते प्रार्थितं दद्मि ते वरम्॥ ५५ श्रीभगवान् बोले—विप्र! भृगुनन्दन! मैं तुम्हारी तपस्या और स्तुतिसे प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। तुम मुझसे वर माँगो। मैं तुम्हें मुँहमाँगा वर दूँगा॥ ५५॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ११] मार्कण्डेयजीद्वारा शेषशायी भगवान्का स्तवन ४७

अध्याय ११] मार्कण्डेयजीद्वारा शेषशायी भगवान्का स्तवन ४७ मार्कण्डेय उवाच त्वत्पादपद्मे देवेश भक्तिं मे देहि सर्वदा। यदि तुष्टो ममाद्य त्वमन्यदेकं वृणोम्यहम्॥ ५६ स्तोत्रेणानेन देवेश यस्त्वां स्तोष्यति नित्यशः। स्वलोकवसतिं तस्य देहि देव जगत्पते॥ ५७ दीर्घायुष्ट्वं तु यद्दत्तं त्वया मे तप्यतः पुरा। तत्सर्वं सफलं जातमिदानीं तव दर्शनात्॥ ५८ वस्तुमिच्छामि देवेश तव पादाब्जमर्चयन्। अत्रैव भगवन् नित्यं जन्ममृत्युविवर्जितः॥ ५९ मार्कण्डेयजी बोले—देवेश्वर! यदि आज आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं यही माँगता हूँ कि 'आपके चरणकमलोंमें मेरी भक्ति सदा बनी रहे।' इसके सिवा एक दूसरा वर भी मैं माँग रहा हूँ—'देव! देवेश्वर! जगत्पते! जो इस स्तोत्रसे आपकी नित्य स्तुति करे, उसे आप अपने वैकुण्ठधाममें निवास प्रदान करें।' पूर्वकालमें तपस्या करते हुए मुझको जो आपने दीर्घायु होनेका वरदान दिया था, वह सब आज आपके दर्शनसे सफल हो गया। देवेश! भगवन्! अब मैं आपके चरणारविन्दोंका पूजन करता हुआ जन्म और मृत्युसे रहित होकर यहाँ ही नित्य निवास करना चाहता हूँ॥ ५६–५९॥ श्रीभगवानुवाच मय्यस्तु ते भृगुश्रेष्ठ भक्तिरव्यभिचारिणी। भक्त्या मुक्तिर्भविष्यत्येव तव कालेन सत्तम॥ ६० यस्त्विदं पठते स्तोत्रं सायं प्रातस्त्वरितम्। मयि भक्तिं दृढां कृत्वा मम लोके स मोदते॥ ६१ यत्र यत्र भृगुश्रेष्ठ स्थितस्त्वं मां स्मरिष्यसि। तत्र तत्र समेष्यामि दान्तो भक्तवशोऽस्मि भोः॥ ६२ श्रीभगवान् बोले—भृगुश्रेष्ठ! मुझमें तुम्हारी अनन्य भक्ति बनी रहे तथा साधुशिरोमणे! समय आनेपर इस भक्तिसे तुम्हारी मुक्ति भी अवश्य ही हो जायगी। तुम्हारे कहे हुए इस स्तोत्रका जो लोग नित्य प्रातःकाल और संध्याके समय पाठ करेंगे, वे मुझमें सुदृढ़ भक्ति रखते हुए मेरे लोकमें आनन्दपूर्वक रहेंगे। भृगुश्रेष्ठ! मैं दान्त (स्ववश) होनेपर भी भक्तोंके वशमें रहता हूँ; अतः तुम जहाँ-जहाँ रहकर मेरा स्मरण करोगे, वहाँ-वहाँ मैं पहुँच जाऊँगा॥ ६०–६२॥ व्यास उवाच इत्युक्त्वा तं मुनिश्रेष्ठं मार्कण्डेयं स माधवः। विरराम स सर्वत्र पश्यन् विष्णुं यतस्ततः॥ ६३ इति ते कथितं विप्र चरितं तस्य धीमतः। मार्कण्डेयस्य च मुनेस्तेनैवोक्तं पुरा मम॥ ६४ ये विष्णुभक्त्या चरितं पुराणं भृगोस्तु पौत्रस्य पठन्ति नित्यम्। ते मुक्तपापा नरसिंहलोके वसन्ति भक्तैरभिपूज्यमानाः॥ ६५ व्यासजी बोले—मुनिवर मार्कण्डेयसे यों कहकर भगवान् लक्ष्मीपति मौन हो गये तथा वे मुनि इधर-उधर विचरते हुए सर्वत्र भगवान् विष्णुका साक्षात्कार करने लगे। विप्र! बुद्धिमान् मार्कण्डेय मुनिके इस चरित्रका, जिसे पूर्वकालमें उन्होंने स्वयं ही मुझसे कहा था, मैंने तुमसे वर्णन किया। जो लोग भृगुके पौत्र मार्कण्डेयजीके इस पुरातन चरित्रका भगवान् विष्णुमें भक्ति रखते हुए नित्य पाठ करते हैं, वे पापोंसे मुक्त हो, भक्तोंसे पूजित होते हुए भगवान् नृसिंहके लोकमें निवास करते हैं॥ ६३–६५॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे मार्कण्डेयचरितं नाम एकादशोऽध्यायः॥ ११॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'मार्कण्डेय-चरित' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १२

४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १२ बारहवाँ अध्याय यम और यमीका संवाद * सूत उवाच सूतजी बोले- समस्त पापोंको नष्ट करनेवाली श्रुत्वेमाममृतां पुण्यां सर्वपापप्रणाशिनीम् । और अमृतके समान मधुर इस पावन कथाको सुनकर धर्मात्मा शुकदेवजी तृप्त न हुए—उनकी श्रवणविषयक अवितृप्तः स धर्मात्मा शुको व्यासमभाषत ॥ १ इच्छा बढ़ती ही गयी; अतः वे व्यासजीसे बोले ॥ १ ॥ श्रीशुक उवाच श्रीशुकदेवजी बोले- पिताजी ! बुद्धिमान् अहोऽतीव तपश्चर्या मार्कण्डेयस्य धीमतः । मार्कण्डेयजीकी तपस्या बड़ी भारी और अद्भुत है, जिन्होंने साक्षात् भगवान् विष्णुका दर्शन किया और मृत्युपर येन दृष्टो हरिः साक्षाद्येन मृत्युः पराजितः ॥ २ विजय पायी । तात ! पापोंको नष्ट करनेवाली इस विष्णु- न तृप्तिरस्ति मे तात श्रुत्वेमां वैष्णवीं कथाम् । सम्बन्धिनी पावन कथाको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही पुण्यां पापहरां तात तस्मादन्यत्तु मे वद ॥ ३ है; अतः अब मुझसे कोई दूसरी कथा कहिये । महामते ! नराणां दृढचित्तानामकार्यं नेह कुर्वताम् । जिनका मन सुदृढ़ है, जो इस जगत्में कभी निषिद्ध कर्म यत्पुण्यमृषिभिः प्रोक्तं तन्मे वद महामते ॥ ४ नहीं करते, उन मनुष्योंको जिस पुण्यकी प्राप्ति ऋषियोंने बतायी है, उसे ही आप कहिये ॥ २-४ ॥ व्यास उवाच व्यासजी बोले- मुनिश्रेष्ठ शुकदेव ! स्थिर चित्तवाले नराणां दृढचित्तानामिह लोके परत्र च। पुरुषोंको इस लोकमें या परलोकमें जो पुण्य प्राप्त होता पुण्यं यत् स्यान्मुनिश्रेष्ठ तन्मे निगदतः शृणु ॥ ५ है, उसे मैं बतलाता हूँ; तुम सुनो। इसी विषयमें विद्वान् अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्। पुरुष यमीके साथ महात्मा यमके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया करते हैं। अदितिके पुत्र जो यम्या च सह संवादं यमस्य च महात्मनः ॥ ६ विवस्वान् (सूर्य) हैं, उनके दो तेजस्वी संतानें हुईं। विवस्वानदितेः पुत्रस्तस्य पुत्रौ सुवर्चसौ। उनमें प्रथम तो 'यम' नामक पुत्र था और दूसरी उससे जज्ञाते स यमश्चैव यमी चापि यवीयसी ॥ ७ छोटी 'यमी' नामकी कन्या थी। वे दोनों अपने पिताके तौ तत्र संविवर्धेते पितुर्भवन उत्तमे। उत्तम भवनमें दिनोंदिन भलीभाँति बढ़ने लगे। वे बाल- क्रीडमानौ स्वभावेन स्वच्छन्दगमनावुभौ ॥ ८ स्वभावके अनुसार साथ-साथ खेलते-कूदते और इच्छानुसार घूमते-फिरते थे। एक दिन यमकी बहिन यमीने अपने यमी यमं समासाद्य स्वसा भ्रातरमब्रवीत् ॥ ९ भाई यमके पास जाकर कहा- ॥ ५-९॥

  • यह 'यम-यमी-संवाद' ऋग्वेदके एक सूक्तपर आधारित है। वहाँ प्रसंग यह है कि यम और यमी, जो परस्पर भाई और बहन हैं, कुमारावस्थामें बालोचित खेलसे मन बहला रहे थे। उनके सामने एक ऐसा दृश्य आया, जिसमें कोई वर बाजे-गाजेके साथ विवाहके लिये जा रहा था। यमीने पूछा- 'भैया ! यह क्या है?' यमने उसे बताया कि 'यह बारात है। इसमें वर-वेषधारी पुरुष किसी कुमारी स्त्रीके साथ विवाह करेगा। फिर वे दोनों पति-पत्नी होकर गृहस्थ-जीवन व्यतीत करेंगे।' यमी बालोचित सरलताके साथ प्रस्ताव कर बैठी- 'भैया ! आओ, हम और तुम भी परस्पर विवाह कर लें।' यमने उसे समझाया कि भाईके साथ बहनका विवाह नहीं होता। तुम्हें मुझसे भिन्न किसी दूसरे श्रेष्ठ पुरुषको अपना पति चुनना होगा- 'अन्यं वृणुष्व सुभगे पतिं मत्।' इसी वैदिक उपाख्यानको यहाँ इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है, मानो यमी कामवेदनासे पीड़ित हो यमसे यह प्रार्थना कर रही हो कि-वे उसे अपनी पत्नी बनाकर उसकी इच्छा पूर्ण करें। इसमें यमीका विकारोत्पादक चित्र प्रस्तुत किया गया है और 'विकारहेतौ सति विक्रियन्ते येषां न चेतांसि त एव धीराः।' (विकारका कारण उपस्थित होनेपर भी जिनके चित्तमें विकार नहीं होता, वे ही पुरुष धीर- ज्ञानी और संयमी हैं-) इस उक्ति के अनुसार यमकी जितेन्द्रियता, उनकी धर्मविषयक अविचल निष्ठा, धैर्य और विवेकको लोकके समक्ष प्रकाशमें लाया गया। जैसे सोना आगमें तपकर खरा उतरता है, उसी प्रकार यम यमीकी अग्नि-परीक्षामें उत्तीर्ण हो सुदृढ़ धर्मात्मा, संयमी और विवेकी सिद्ध हुए हैं। यमके उज्ज्वल चरित्रको और भी चमत्कारी रूपमें सामने लाना इस कथाका उद्देश्य है। इससे प्रत्येक भाई तथा नवयुवकको सदाचारी, संयमी तथा धर्ममें अविचलभावसे स्थित रहनेकी शिक्षा और प्रेरणा मिलती है। यमीके चरित्रसे यह शिक्षा प्राप्त होती है कि प्रत्येक कुमारीका विवाहयोग्य अवस्था होनेपर अविलम्ब किसी योग्य वरके साथ विवाह कर देना चाहिये। वास्तवमें यम और यमी दोनों ही सूर्यदेवकी दिव्य संतानें हैं। उनमें किसी प्रकारके विकारकी लेशमात्र भी सम्भावना नहीं है। लोगोंको सदाचार और संयमकी शिक्षा देनेके लिये ही व्यासजीने उस वैदिक उपाख्यानको यहाँ इस प्रकार चित्रित किया है। In Public Domain. Digitzed by 'Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय १२ ] यम और यमीका संवाद ४९

यम्युवाच यमी बोली—जो भाई अपनी योग्य बहिनको उसके चाहनेपर भी न चाहे, जो बहिनका पति न हो सके, न भ्राता भगिनीं योग्यां कामयन्तीं च कामयेत्। उसके भाई होनेसे क्या लाभ? जो स्वामीकी इच्छा भ्रातृभूतेन किं तस्य स्वसुर्यो न पतिर्भवेत् ॥ १० रखनेवाली अपनी कुमारी बहिनका स्वामी नहीं बनता, उस भ्राताको ऐसा समझना चाहिये कि वह पैदा ही अभूत इव स ज्ञेयो न तु भूतः कथञ्चन। नहीं हुआ। किसी तरह भी उसका उत्पन्न होना नहीं अनाथां नाथमिच्छन्तीं स्वसारं यो न नाथति ॥ ११ माना जा सकता। भैया ! यदि बहिन अपने भाईको ही अपना स्वामी—अपना पति बनाना चाहती है, इस दशामें काङ्क्षन्तीं भ्रातरं नाथं भर्तारं यस्तु नेच्छति । जो बहिनको नहीं चाहता, वह पुरुष मुनिशिरोमणि ही भ्रातेति नोच्यते लोके स पुमान् मुनिसत्तमः ॥ १२ क्यों न हो, इस संसारमें भ्राता नहीं कहा जा सकता। यदि किसी दूसरेकी ही कन्या उसकी पत्नी हो तो भी स्याच्चान्यतनया तस्य भार्या भवति किं तया। उससे क्या लाभ, यदि उस भाईकी अपनी बहिन उसके ईक्षतस्तु स्वसा भ्रातुः कामेन परिदह्यते ॥ १३ देखते-देखते कामसे दग्ध हो रही है। मेरे होश, इस समय अपने ठिकाने नहीं हैं। मैं इस समय जो काम यत्कार्यमहमिच्छामि त्वमेवेच्छ तदेव हि । करना चाहती हूँ, तुम भी उसीकी इच्छा करो; नहीं तो अन्यथाहं मरिष्यामि त्वामिच्छन्ती विचेतना ॥ १४ मैं तुम्हारी ही चाह लेकर प्राण त्याग दूँगी, मर जाऊँगी। भाई! कामकी वेदना असह्य होती है। तुम मुझे क्यों कामदुःखमसह्यं नु भ्रातः किं त्वं न चेच्छसि । नहीं चाहते? प्यारे भैया ! कामाग्निसे अत्यन्त संतप्त होकर कामाग्निना भृशं तप्ता प्रलीयाम्यङ्ग मा चिरम् ॥ १५ मैं मरी जा रही हूँ; अब देर न करो। कान्त ! मैं कामपीड़िता स्त्री हूँ। तुम शीघ्र ही मेरे अधीन हो जाओ। अपने कामार्तायाः स्त्रियाः कान्त वशगो भव मा चिरम्। शरीरसे मेरे शरीरका संयोग होने दो ॥ १०-१६ ॥ स्वेन कायेन मे कायं संयोजयितुमर्हसि ॥ १६ ॥ यम बोले—बहिन ! सारा संसार जिसकी निन्दा यम उवाच करता है, उसी इस पापकर्मको तू धर्म कैसे बता रही है? भद्रे ! भला कौन सचेत पुरुष यह न करने योग्य पाप- किमिदं लोकविद्विष्टं धर्मं भगिनि भाषसे । कर्म कर सकता है? भामिनि ! मैं अपने शरीरसे तुम्हारे अकार्यमिह कः कुर्यात् पुमान् भद्रे सुचेतनः ॥ १७ शरीरका संयोग न होने दूँगा। कोई भी भाई अपनी काम- पीड़िता बहिनकी इच्छा नहीं पूरी कर सकता। जो बहिनके न ते संयोजयिष्यामि कायं कायेन भामिनि। साथ समागम करता है, उसके इस कर्मको महापातक न भ्राता मदनार्तायाः स्वसुः कामं प्रयच्छति ॥ १८ बताया गया है—शुभे ! यह तिर्यग्-योनिमें पड़े हुए पशुओंका धर्म है—देवता या मनुष्यका नहीं ॥ १७-१९ ॥ महापातकर्मित्याहुः स्वसारं योऽधिगच्छति। पशूनामेष धर्मः स्यात् तिर्यग्योनिवतां शुभे ॥ १९ यमी बोली—भैया ! हम दोनों जुड़वी संतानें हैं और माताके गर्भमें एक साथ रहे हैं। पहले माताके यम्युवाच गर्भमें एक ही स्थानपर हम दोनोंका जो संयोग हुआ था, वह जैसे दूषित नहीं माना गया, उसी प्रकार यह एकस्थाने यथा पूर्वं संयोगो नौ न दुष्यति । संयोग भी दूषित नहीं हो सकता। भाई ! अभीतक मुझे मातृगर्भे तथैवायं संयोगो नौ न दुष्यति ॥ २० पतिकी प्राप्ति नहीं हुई है। तुम मेरा भला करना क्यों नहीं चाहते? 'निर्ऋति' नामक राक्षस तो अपनी बहिनके किं भ्रातरप्यनाथां त्वं मम नेच्छसि शोभनम् । साथ नित्य ही समागम करता है ॥ २०-२१ ॥ स्वसारं निर्ऋती रक्षः संगच्छति च नित्यशः ॥ २१

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १२

५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १२ यम उवाच स्वयम्भुवापि निन्द्येत लोकवृत्तं जुगुप्सितम्। प्रधानपुरुषाचीर्णं लोकोऽयमनुवर्तते॥ २२ तस्मादनिन्दितं धर्मं प्रधानपुरुषश्चरेत्। निन्दितं वर्जयेद्यत्नादेतद्धर्मस्य लक्षणम्॥ २३ यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ २४ अतिपापमहं मन्ये सुभगे वचनं तव। विरुद्धं सर्वधर्मेषु लोकेषु च विशेषतः॥ २५ मत्तोऽन्यो यो भवेद्यो वै विशिष्टो रूपशीलतः। तेन सार्धं प्रमोदस्व न ते भर्ता भवाम्यहम्॥ २६ नाहं स्पृशामि तन्वा ते तनुं भद्रे दृढव्रतः। मुनयः पापमाहुस्तं यः स्वसारं निगृह्णति॥ २७ यम बोले— बहिन! कुत्सित लोकव्यवहारकी निन्दा ब्रह्माजीने भी की है। इस संसारके लोग श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा आचरित धर्मका ही अनुसरण करते हैं। इसलिये श्रेष्ठ पुरुषको चाहिये कि वह उत्तम धर्मका ही आचरण करे और निन्दित कर्मको यत्नपूर्वक त्याग दे—यही धर्मका लक्षण है। श्रेष्ठ पुरुष जिस-जिस कर्मका आचरण करता है, उसीको अन्य लोग भी आचरणमें लाते हैं और वह जिसे प्रमाणित कर देता है, लोग उसीका अनुसरण करते हैं। सुभगे! मैं तो तुम्हारे इस वचनको अत्यन्त पापपूर्ण समझता हूँ। इतना ही नहीं, मैं इसे सब धर्मों और विशेषतः समस्त लोकोंके विपरीत मानता हूँ। मुझसे अन्य जो कोई भी रूप और शीलमें विशिष्ट हो, उसके साथ तुम आनन्दपूर्वक रहो; मैं तुम्हारा पति नहीं हो सकता। भद्रे! मैं दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाला हूँ, अतः अपने शरीरसे तुम्हारे शरीरका स्पर्श नहीं करूँगा। जो बहिनको ग्रहण करता है, उसे मुनियोंने 'पापी' कहा है॥ २२—२७॥ यम्युवाच दुर्लभं चैव पश्यामि लोके रूपमिहेदृशम्। यत्र रूपं वयश्चैव पृथिव्यां क्व प्रतिष्ठितम्॥ २८ न विजानामि ते चित्तं कुत एतत् प्रतिष्ठितम्। आत्मरूपगुणोपेतां न कामयसि मोहिताम्॥ २९ लतेव पादपे लग्ना कामं त्वच्चरणं गता। बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य निवसामि शुचिस्मिता॥ ३० यमी बोली— मैं देखती हूँ, इस संसारमें ऐसा (तुम्हारे समान) रूप दुर्लभ है। भला, पृथ्वीपर ऐसा स्थान कहाँ है, जहाँ रूप और समान अवस्था—दोनों एकत्र वर्तमान हों। मैं नहीं समझती, तुम्हारा यह चित्त इतना स्थिर कैसे है, जिसके कारण तुम अपने समान रूप और गुणसे युक्त होनेपर भी मुझ मोहिता स्त्रीकी इच्छा नहीं करते हो। वृक्षमें संलग्न हुई लताके समान मैं स्वेच्छानुसार तुम्हारी शरणमें आयी हूँ। मेरे मुखपर पवित्र मुसकान शोभा पाती है। अब मैं अपनी दोनों भुजाओंसे तुम्हारा आलिङ्गन करके ही रहूँगी॥ २८—३०॥ यम उवाच अन्यं श्रयस्व सुश्रोणि देवं देव्यसितेक्षणे। यस्तु ते काममोहेन चेतसा विभ्रमं गतः। तस्य देवस्य देवी त्वं भवेथा वरवर्णिनि॥ ३१ ईप्सितां सर्वभूतानां वर्यां शंसन्ति मानवाः। सुभद्रां चारुसर्वाङ्गीं संस्कृतां परिचक्षते॥ ३२ तत्कृतेऽपि सुविद्वांसो न करिष्यन्ति दूषणम्। परितापं महाप्राज्ञे न करिष्ये दृढव्रतः॥ ३३ चित्तं मे निर्मलं भद्रे विष्णौ रुद्रे च संस्थितम्। अतः पापं नु नेच्छामि धर्मचित्तो दृढव्रतः॥ ३४ यम बोले— श्यामलोचने! सुश्रोणि! मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करनेमें असमर्थ हूँ। तुम किसी दूसरे देवताका आश्रय लो। वरवर्णिनि! तुम्हें देखकर काममोहसे जिसका चित्त विभ्रान्त हो उठे, उसी देवताकी तुम देवी हो जाओ। जिसे समस्त प्राणी चाहते हैं, मानवगण जिसे वरणीय बतलाते हैं, कल्याणमयी, सर्वाङ्गसुन्दरी और सुसंस्कृता कहते हैं, उसके लिये भी विद्वान् पुरुष कभी दूषित कर्म नहीं करेंगे। महाप्राज्ञे! मेरा व्रत अटल है। मैं यह पश्चात्तापजनक पाप कदापि नहीं करूँगा। भद्रे! मेरा चित्त निर्मल है, भगवान् विष्णु और शिवके चिन्तनमें लगा हुआ है। इसलिये मैं दृढ़संकल्प एवं धर्मात्मा होकर निश्चय ही यह पापकर्म नहीं करना चाहता॥ ३१—३४॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय १३ ] पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद ५१


व्यास उवाच असकृत् प्रोच्यमानोऽपि तया चैवं दृढव्रतः। कृतवान् न यमः कार्यं तेन देवत्वमाप्तवान् ॥ ३५ नराणां दृढचित्तानामेवं पापमकुर्वताम्। अनन्तं फलमित्याहुस्तेषां स्वर्गफलं भवेत् ॥ ३६ एतत्तु यम्युपाख्यानं पूर्ववृत्तं सनातनम्। सर्वपापहरं पुण्यं श्रोतव्यमनसूयया ॥ ३७ यश्चैतत् पठते नित्यं हव्यकव्येषु ब्राह्मणः। संतृप्ताः पितरस्तस्य न विशन्ति यमालयम् ॥ ३८ यश्चैतत् पठते नित्यं पितृणामनृणो भवेत्। वैवस्वतीभ्यस्तीव्राभ्यो यातनाभ्यः प्रमुच्यते ॥ ३९ पुत्रैतदाख्यानमनुत्तमं मया तवोदितं वेदपदार्थनिश्चितम्। पुरातनं पापहरं सदा नृणां किमन्यदद्यैव वदामि शंस मे ॥ ४०

श्रीव्यासजी कहते हैं— शुकदेव! यमीके बारंबार कहनेपर भी दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले यमने वह पाप-कर्म नहीं किया; इसलिये वे देवत्वको प्राप्त हुए। इस प्रकार स्थिरचित्त होकर पाप न करनेवाले मनुष्योंके लिये अनन्त पुण्यफलकी प्राप्ति बतलायी गयी है। ऐसे लोगोंको स्वर्गरूप फल उपलब्ध होता है। यह यमीका उपाख्यान, जो प्राचीन एवं सनातन इतिहास है, सब पापोंको दूर करनेवाला और पवित्र है। असूया त्यागकर इसका श्रवण करना चाहिये। जो ब्राह्मण देवयाग और पितृयागमें सदा इसका पाठ करता है, उसके पितृगण पूर्णतः तृप्त होते हैं। उन्हें कभी यमराजके भवनमें प्रवेश नहीं करना पड़ता। जो इसका नित्य पाठ करता है, वह पितृऋणसे मुक्त हो जाता है तथा उसे तीव्र यम-यातनाओंसे छुटकारा मिल जाता है। बेटा शुकदेव! मैंने तुमसे यह सर्वोत्तम एवं पुरातन उपाख्यान कह सुनाया, जो वेदके पदों तथा अर्थोंद्वारा निश्चित है। इसका पाठ करनेपर यह सदा ही मनुष्योंका पाप हर लेता है। मुझे बताओ, अब मैं तुम्हें और क्या सुनाऊँ ? ॥ ३५—४० ॥


इति श्रीनरसिंहपुराणे यमीयमसंवादो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'यमी-यम-संवाद' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥


तेरहवाँ अध्याय पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद; माताकी रक्षा परम धर्म है, इसका उपदेश


श्रीशुक उवाच विचित्रेयं कथा तात वैदिकी मे त्वयेरिता। अन्याः पुण्याश्च मे ब्रूहि कथाः पापप्रणाशिनीः ॥ १

व्यास उवाच अहं ते कथयिष्यामि पुरावृत्तमनुत्तमम्। पतिव्रतायाः संवादं कस्यचिद्ब्रह्मचारिणः ॥ २ कश्यपो नीतिमान् नाम ब्राह्मणो वेदपारगः। सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो व्याख्याने परिनिष्ठितः ॥ ३

श्रीशुकदेवजी बोले— तात! आपने जो यह वैदिक कथा मुझे सुनायी है, बड़ी विचित्र है। अब दूसरी पापनाशक कथाओंका मेरे सम्मुख वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

व्यासजी बोले— बेटा! अब मैं तुमसे उस परम उत्तम प्राचीन इतिहासका वर्णन करूँगा, जो किसी ब्रह्मचारी और एक पतिव्रता स्त्रीका संवादरूप है। (मध्यदेशमें) एक कश्यप नामक ब्राह्मण रहते थे, जो बड़े ही नीतिज्ञ, वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान्, समस्त शास्त्रोंके अर्थ एवं तत्त्वके ज्ञाता, व्याख्यानमें प्रवीण,


In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १३

५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १३ स्वधर्मकार्यनिरतः परधर्मपराङ्मुखः। | अपने धर्मके अनुकूल कार्योंमें तत्पर और परधर्मसे विमुख ऋतुकालाभिगामी च अग्निहोत्रपरायणः॥ ४ | रहनेवाले थे। वे ऋतुकाल आनेपर ही पत्नी-समागम करते सायंप्रातर्महाभाग हुत्वाग्निं तर्पयन् द्विजान्। | और प्रतिदिन अग्निहोत्र किया करते थे। महाभाग! कश्यपजी अतिथीनागतान् गेहं नरसिंहं च पूजयत्॥ ५ | नित्य सायं और प्रातःकाल अग्निमें हवन करनेके पश्चात् तस्य पत्नी महाभागा सावित्री नाम नामतः। | ब्राह्मणों तथा घरपर आये हुए अतिथियोंको तृप्त करते हुए पतिव्रता महाभागा पत्युः प्रियहिते रता॥ ६ | भगवान् नृसिंहका पूजन किया करते थे। उनकी परम भर्तुः शुश्रूषणेनैव दीर्घकालमनिन्दिता। | सौभाग्यशालिनी पत्नीका नाम सावित्री था। महाभागा सावित्री परोक्षज्ञानमापन्ना कल्याणी गुणसम्मता॥ ७ | पतिव्रता होनेके कारण पतिके ही प्रिय और हित-साधनमें तया सह स धर्मात्मा मध्यदेशे महामतिः। | लगी रहती थी। अपने गुणोंके कारण उसका बड़ा सम्मान नन्दिग्रामे वसन् धीमान् स्वानुष्ठानपरायणः॥ ८ | था। वह कल्याणमयी अनिन्दिता सती-साध्वी दीर्घकालतक अथ कौशलिको विप्रो यज्ञशर्मा महामतिः। | पतिकी शुश्रूषामें संलग्न रहनेके कारण परोक्ष-ज्ञानसे सम्पन्न तस्य भार्याभवत् साध्वी रोहिणी नाम नामतः॥ ९ | हो गयी थी—परोक्षमें घटित होनेवाली घटनाओंका भी उसे सर्वलक्षणसम्पन्ना पतिशुश्रूषणे रता। | ज्ञान हो जाता था। मध्यदेशके निवासी वे धर्मात्मा एवं परम सा प्रसूता सुतं त्वेकं तस्माद्भर्तुरनिन्दिता॥ १० | बुद्धिमान् कश्यपजी अपनी उसी धर्मपत्नीके साथ नन्दिग्राममें स यायावरवृत्तिस्तु पुत्रे जाते विचक्षणः। | रहते हुए स्वधर्मके अनुष्ठानमें लगे रहते थे॥ २-८॥ जातकर्म तदा चक्रे स्नात्वा पुत्रस्य मन्त्रतः॥ ११ | उन्हीं दिनों कोशलदेशमें उत्पन्न यज्ञशर्मा नामक एक द्वादशेऽहनि तस्यैव देवशर्मेति बुद्धिमान्। | परम बुद्धिमान् ब्राह्मण थे, जिनकी सती-साध्वी स्त्रीका पुण्याहं वाचयित्वा तु नाम चक्रे यथाविधि॥ १२ | नाम रोहिणी था। वह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थी उपनिष्क्रमणं चैव चतुर्थे मासि यत्नतः। | और पतिकी सेवामें सदा तत्पर रहती थी। उस उत्तम तथाऽन्नप्राशनं षष्ठे मासि चक्रे यथाविधि॥ १३ | आचार-विचारवाली स्त्रीने अपने स्वामी यज्ञशर्मासे एक संवत्सरे ततः पूर्णे चूडाकर्म च धर्मवित्। | पुत्र उत्पन्न किया। पुत्रके उत्पन्न होनेपर यायावर- कृत्वा गर्भाष्टमे वर्षे व्रतबन्धं चकार सः॥ १४ | वृत्तिवाले बुद्धिमान् पण्डित यज्ञशर्माने स्नान करके सोपनीतो यथान्यायं पित्रा वेदमधीतवान्। | मन्त्रोंद्वारा उसका जातकर्म-संस्कार किया और जन्मके स्वीकृते त्वेकवेदे तु पिता स्वर्लोकमास्थितः॥ १५ | बारहवें दिन उन्होंने विधिपूर्वक पुण्याहवाचन कराकर मात्रा सहास दुःखी स पितुर्युपरते सुतः। | उसका 'देवशर्मा' नाम रखा। इसी प्रकार चौथे महीनेमें धैर्यमास्थाय मेधावी साधुभिः प्रेरितः पुनः॥ १६ | यत्नपूर्वक उसका उपनिष्क्रमण हुआ अर्थात् वह घरसे प्रेतकार्याणि कृत्वा तु देवशर्मा गतः सुतः। | बाहर लाया गया और छठे मासमें उन्होंने उस पुत्रका गङ्गादिषु सुतीर्थेषु स्नानं कृत्वा यथाविधि॥ १७ | विधिपूर्वक अन्नप्राशन-संस्कार किया॥ ९-१३॥ तमेव प्राप्तवान् ग्रामं यत्रास्ते सा पतिव्रता। | तदनन्तर एक वर्ष पूर्ण होनेपर धर्मज्ञ पिताने उसका सम्प्राप्य विश्रुतः सोऽथ ब्रह्मचारी महामते॥ १८ | चूडाकर्म और गर्भसे आठवें वर्षपर उपनयन-संस्कार किया। पिताके द्वारा यथोचितरूपसे उपनयन-संस्कार हो जानेपर उसने वेदाध्ययन किया। उसके द्वारा एक वेदका अध्ययन पूर्ण हो जानेपर उसके पिता स्वर्गगामी हो गये। पिताकी मृत्यु होनेपर वह अपनी माताके साथ बहुत दुःखी हो गया। फिर श्रेष्ठ पुरुषोंकी आज्ञासे उस बुद्धिमान् पुत्रने धैर्य धारण करके पिताका प्रेतकार्य किया। इसके पश्चात् ब्राह्मणकुमार देवशर्मा घरसे निकल गया (विरक्त हो गया)। वह गङ्गा आदि उत्तम तीर्थोंमें विधिपूर्वक स्नान करके घूमता हुआ वहीं जा पहुँचा, जहाँ वह पतिव्रता सावित्री निवास करती थी। महामते! In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय १३ ] पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद ५३ भिक्षाटनं तु कृत्वासौ जपन् वेदममन्द्रितः। | वहाँ जाकर वह 'ब्रह्मचारी' के रूपमें विख्यात हुआ। कुर्वन्नेवाग्निकार्यं तु नन्दिग्रामे च तस्थिवान् ॥ १९ | भिक्षाटन करके जीवन-निर्वाह करता हुआ वह | आलस्यरहित हो वेदके स्वाध्याय तथा अग्निहोत्रमें तत्पर मृते भर्तरि तन्माता पुत्रे प्रव्रजिते तु सा। | रहकर उसी नन्दिग्राममें रहने लगा। इधर उसकी माता दुःखाद्दुःखमनुप्राप्ता नियतं रक्षकं विना ॥ २० | अपने स्वामीके मरने और पुत्रके विरक्त होकर घरसे | निकल जानेके बाद किसी नियत रक्षकके न होनेसे अथ स्नात्वा तु नद्यां वै ब्रह्मचारी स्वकर्पटम्। | दुःख-पर-दुःख भोगने लगी ॥ १४-२० ॥ क्षितौ प्रसार्य शोषार्थं जपन्नासीत वाग्यतः ॥ २१ | तदनन्तर एक दिन ब्रह्मचारीने नदीमें स्नान करके | अपना वस्त्र सुखानेके लिये पृथ्वीपर फैला दिया और काको बलाका तद्वस्त्रं परिगृह्याशु जग्मतुः। | स्वयं मौन होकर जप करने लगा। इसी समय एक तौ दृष्ट्वा भर्त्सयामास देवशर्मा ततो द्विजः ॥ २२ | कौआ और बगुला—दोनों वह वस्त्र लेकर शीघ्रतासे | उड़ चले। तब उन्हें इस प्रकार करते देख देवशर्मा विष्ठामुत्सृज्य वस्त्रे तु जग्मतुस्तस्य भर्त्सनात्। | ब्राह्मणने डाँट बतायी। उसकी डाँट सुनकर वे पक्षी उस रोषेण वीक्षयामास खे यान्तौ पक्षिणौ तु सः ॥ २३ | वस्त्रपर बीट करके उसे वहीं छोड़कर चले गये। तब | ब्राह्मणने आकाशमें जाते हुए उन पक्षियोंकी ओर क्रोधपूर्वक तद्रोषवह्निना दग्धौ भूम्यां निपतितौ खगौ। | देखा। वे पक्षी उसकी क्रोधाग्निसे भस्म होकर पृथ्वीपर स दृष्ट्वा तौ क्षितिं यातौ पक्षिणौ विस्मयं गतः ॥ २४ | गिर पड़े। उन्हें पृथ्वीपर गिरा देख ब्रह्मचारी बहुत ही | विस्मित हुआ। फिर वह यह समझकर कि इस पृथ्वीपर तपसा न मया कश्चित् सदृशोऽस्ति महीतले। | तपस्यामें मेरी बराबरी करनेवाला कोई नहीं है, अनायास इति मत्वा गतो भिक्षामटितुं ग्राममञ्जसा ॥ २५ | ही गाँवमें भिक्षा माँगने चला ॥ २१-२५ ॥ | अटन् ब्राह्मणगेहेषु ब्रह्मचारी तपःस्मयी। | वत्स ! तपस्याका अभिमान रखनेवाला वह ब्रह्मचारी प्रविष्टस्तद्गृहं वत्स गृहे यत्र पतिव्रता ॥ २६ | ब्राह्मणोंके घरोंमें भीख माँगता हुआ उस घरमें गया, जहाँ | वह पतिव्रता सावित्री रहती थी। पतिव्रताने उसे देखा, तं दृष्ट्वा याच्यमानापि तेन भिक्षां पतिव्रता। | ब्रह्मचारीने भिक्षाके लिये उससे याचना की, तो भी वाग्यता पूर्वं विज्ञाय भर्तुः कृत्वानुशासनम् ॥ २७ | वह मौन ही रही। पहले उसने अपने स्वामीके | आदेशकी ओर ध्यान दे उसीका पालन किया; फिर क्षालयामास तत्पादौ भूय उष्णेन वारिणा। | गरम जलसे पतिके चरण धोये—इस प्रकार स्वामीको आश्वास्य स्वपतिं सा तु भिक्षां दातुं प्रचक्रमे ॥ २८ | आराम देकर वह भिक्षा देनेको उद्यत हुई। तब ब्रह्मचारी | क्रोधसे लाल आँखें करके अपने तपोबलके द्वारा ततः क्रोधेन रक्ताक्षो ब्रह्मचारी पतिव्रताम्। | पतिव्रताको जला देनेकी इच्छासे उसकी ओर बारंबार दग्धुकामस्तपोवीर्यात् पुनः पुनरुदैक्षत। | देखने लगा। सावित्री उसे यों करते देख हँसती हुई सावित्री तु निरीक्ष्यैवं हसन्ती सा तमब्रवीत् ॥ २९ | बोली—'ऐ क्रोधी ब्राह्मण! मैं कौआ और बगुला नहीं | हूँ, जो आज नदीके तटपर तुम्हारे कोपसे जलकर भस्म न काको न बलाकाहं त्वत्क्रोधेन तु यौ मृतौ। | हो गये थे। मुझसे यदि भीख चाहते हो, तो चुपचाप नदीतीरेऽद्य कोपात्मन् भिक्षां मत्तो यदीच्छसि ॥ ३० | ले लो' ॥ २६-३० ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth