संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ४१ ] प्रह्लादकी उत्पत्ति और उनकी हरि-भक्तिसे हिरण्यकशिपुकी उद्विग्नता १४७ अथाह प्रकटक्रोधः सुरारिर्भर्त्सयन् सुतम्। प्रह्लादके यों कहनेपर देवशत्रु हिरण्यकशिपु अपने केनायं बालको नीतो दशामेतां सुमध्यमाम्॥ ४७ क्रोधको रोक न सका, उसने रोषको प्रकट करके पुत्रको धिग् धिग्घाहेति दुष्पुत्र किं मे कृतमघं महत्। फटकारते हुए कहा—'हाय! हाय! किसने इस बालकको याहि याहि दुराचार पापिष्ठ पुरुषाधम। अत्यन्त मध्यम कोटिकी अवस्थाको पहुँचा दिया ? रे दुष्ट उक्तेति परितो वीक्ष्य पुनराह शिशोर्गुरुम् ॥ ४८ पुत्र! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है! तूने क्यों मेरा महान् बद्ध्वा चानीयतां दैत्यैः क्रूरैः क्रूरपराक्रमैः। अपराध किया ? ओ दुराचारी नीच पुरुष! अरे पापिष्ठ! तू इति श्रुत्वा ततो दैत्यास्तमानीय न्यवेदयन्। यहाँसे चला जा, चला जा।' यों कहकर उसने अपने चारों धीमानूचे खलं भूपं देवान्तक परीक्षताम् ॥ ४९ ओर निहारकर फिर कहा—'नृशंस पराक्रमी क्रूर दैत्य जायें लीलयैव जितं देव त्रैलोक्यं निखिलं त्वया। और इसके गुरुको बाँधकर यहाँ ले आयें' ॥ ४७-४८१/२ ॥ असकृन्न हि रोषेण किं क्रुद्धस्याल्पके मयि ॥ ५० यह सुन दैत्यों ने प्रह्लादके गुरुको वहाँ लाकर उपस्थित इति सामवचः श्रुत्वा द्विजोक्तं प्राह दैत्यराट्। कर दिया। बुद्धिमान् गुरुने उस दुष्ट दैत्यराजसे विनयपूर्वक विष्णुस्तवं मम सुतं पाप बालमपीपठः ॥ ५१ कहा—देवान्तक! थोड़ा विचार तो कीजिये। आपने उक्तेति तनयं प्राह राजा साम्नामलं सुतम्। समस्त त्रिभुवनको अनायास ही अनेकों बार पराजित ममात्मजस्य किं जाड्यं तव चैतद्द्विजैः कृतम् ॥ ५२ किया है, खेल-खेलमें ही सबको जीता है, रोषसे कभी विष्णुपक्षैर्ध्रुवं धूर्तैर्मूढ नित्यं परित्यज। काम नहीं लिया। फिर मुझ-जैसे तुच्छ प्राणीपर क्रोध त्यज द्विजप्रसङ्गं हि द्विजसङ्गो ह्यशोभनः ॥ ५३ करनेसे क्या लाभ होगा ? ॥ ४९-५०॥ अस्मत्कुलोचितं तेजो यैर्द्विजैस्तु तिरोहितम्। ब्राह्मणके इस शान्त वचनको सुनकर दैत्यराज बोला— यस्य यत्सङ्गतिः पुंसो मणिवत्स्यात्स तद्गुणः ॥ ५४ 'अरे पापी! तूने मेरे बालक पुत्रको विष्णुका स्तोत्र पढ़ा स्वकुलवृद्धयै ततो धीमान् स्वयूथ्यानेव संश्रयेत्। दिया है।' गुरुसे यों कहकर राजा हिरण्यकशिपुने अपने मत्सुतस्योचितं त्यक्त्वा विष्णुपक्षीयनाशनम् ॥ ५५ निर्दोष पुत्रके प्रति सान्त्वनापूर्वक कहा—'बेटा! तू मेरा स्वयमेव भजन् विष्णुं मन्द किं त्वं न लज्जसे। आत्मज है, तुझमें यह जड-बुद्धि कैसे आ सकती है ? विश्वनाथस्य मे सूनुर्भूत्वान्यं नाथमिच्छसि ॥ ५६ यह तो इन ब्राह्मणोंकी ही करतूत है। मूर्ख बालक! शृणु वत्स जगत्तत्त्वं कश्चिन्नास्ति निजः प्रभुः। आजसे तू सदा विष्णुके पक्षमें रहनेवाले धूर्त ब्राह्मणोंका यः शूरः स श्रियं भुङ्क्ते स प्रभुः स महेश्वरः ॥ ५७ साथ छोड़ दे, ब्राह्मणमात्रका सङ्ग त्याग दे; ब्राह्मणोंकी संगति अच्छी नहीं होती; क्योंकि इन ब्राह्मणोंने ही तेरे उस तेजको छिपा दिया, जो हमारे कुलके लिये सर्वथा उचित था। जिस पुरुषको जिसकी संगति मिल जाती है, उसमें उसीके गुण आने लगते हैं—ठीक उसी तरह, जैसे मणि कीचड़में पड़ी हो तो उसमें उसके दुर्गन्ध आदि दोष आ जाते हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि वह अपने कुलकी समृद्धिके लिये आत्मीय जनोंका ही आश्रय ले। बुद्धिहीन बालक! मेरे पुत्रके लिये तो उचित कर्तव्य यह है कि वह विष्णुके पक्षमें रहनेवाले लोगोंका नाश करे; परंतु तू इस उचित कार्यको त्यागकर इसके विपरीत स्वयं ही विष्णुका भजन कर रहा है! बता तो सही, क्या यों करते हुए तुझे लज्जा नहीं आती ? अरे! मुझ सम्पूर्ण जगत्के सम्राट्का पुत्र होकर तू दूसरेको अपना स्वामी बनाना चाहता है ? बेटा! मैं तुझे संसारका तत्त्व बताता हूँ, सुन; यहाँ कोई भी अपना स्वामी नहीं है। जो शूरवीर है, वही लक्ष्मीका उपभोग करता है तथा वही प्रभु है, वही महेश्वर है ॥ ५१-५७॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४२
१४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४२ स देवः सकलाध्यक्षो यथाहं त्रिजगज्जयी। | ''वही सबका अध्यक्ष देवता है, जैसा कि तीनों त्यज जाड्यमतः शौर्यं भजस्व स्वकुलोचितम्॥ ५८ | लोकोंपर विजय पानेवाला मैं हूँ। इसलिये तू अपनी यह | जडता त्याग दे और अपने कुलके लिये उचित वीरताका अन्येऽपि त्वां हनिष्यन्ति वदिष्यन्ति जनास्त्विदम्। | आश्रय ले। तेरी यह कायरता देखकर दूसरे लोग भी तुझे असुरोऽयं सुरान् स्तौति मार्जार इव मूषकन्॥ ५९ | मारेंगे और कहेंगे कि 'अरे! यह असुर होकर भी | देवताओंकी उसी प्रकार स्तुति करता है, जैसे बिल्ली द्वेष्यान् शिखीव फणिनो दुर्निमित्तमिदं ध्रुवम्। | चूहेकी स्तुति करे और मोर अपने द्वेषपात्र सर्पोंकी प्रार्थना लब्ध्वापि महदैश्वर्यं लाघवं यान्त्यबुद्धयः॥ ६० | करे। ऐसा करना अवश्य ही अनिष्टका सूचक है। मूर्ख | प्राणी महान् ऐश्वर्य पाकर भी [अपने खोटे कर्मोंके द्वारा] यथायं मत्सुतः स्तुत्यः स्तावकान् स्तौति नीचवत्। | नीचे गिर जाते हैं, जैसे मेरा पुत्र प्रह्लाद, जो स्वयं स्तुतिके रे मूढ दृष्ट्वाप्यैश्वर्यं मम ब्रूषे पुरो हरिम्॥ ६१ | योग्य था, आज नीच जनोंकी भाँति उन लोगोंकी स्तुति | कर रहा है, जो स्वयं हमारी स्तुति करनेवाले हैं। रे मूर्ख! असदृशस्य तु हरेः स्तुतिरेषा विडम्बना। | तू मेरा ऐश्वर्य देखकर भी मेरे सामने ही हरिका नाम ले इत्युक्त्वा तनयं भूप जातक्रोधो भयानकः॥ ६२ | रहा है? वह हरि इस सम्मानके योग्य नहीं है, उसकी | स्तुति विडम्बनामात्र है''॥ ५८—६११/२॥ जिह्मं निरीक्ष्य च प्राह तद्गुरुं कम्पयन् रुषा। | भूप! अपने पुत्रसे इस प्रकार कहकर वह इतना याहि याहि द्विजपशो साधु शाधि सुतं मम॥ ६३ | कुपित हुआ कि उसका स्वरूप भयानक हो गया; फिर | प्रह्लादके गुरुको टेढ़ी नजरसे देखकर उन्हें अपने रोषसे प्रसाद इत्येष वदन् स विप्रो | कँपाता हुआ बोला—'मूर्ख ब्राह्मण! यहाँसे चला जा, जगाम गेहं खलराजसेवी। | चला जा। अबकी बार मेरे पुत्रको अच्छी शिक्षा देना।' विष्णुं विसृज्यान्वसरच्च दैत्यं | दुष्ट राजाकी सेवा करनेवाला वह ब्राह्मण 'बड़ी कृपा किं वा न कुर्युर्भरणीय लुब्धाः॥ ६४॥ | हुई' यों कहता हुआ घर चला गया और विष्णुका भजन | त्यागकर दैत्यराज (हिरण्यकशिपु)-का अनुसरण करने | लगा। सच है, लोभी मनुष्य अपना पेट पालनेके लिये | क्या नहीं कर सकते?॥ ६२—६४॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे नृसिंहप्रादुर्भावे एकचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४१॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'नरसिंहावतार' नामक इकतालिसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४१॥
बयालीसवाँ अध्याय प्रह्लादपर हिरण्यकशिपुका कोप और प्रह्लादका वध करनेके लिये उसके द्वारा किये गये अनेक प्रयत्न मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजी कहते हैं—भगवान् विष्णुकी भक्ति ही सोऽप्याशु नीतो गुरुवेश्म दैत्यै- | जिनका भूषण है, वे दैत्यराजकुमार योगी प्रह्लादजी शीघ्र दैत्येन्द्रसूनुर्हरिभक्तिभूषणः । | ही सारथिके साथ गुरुके घर भेजे गये। वहाँ वे कालक्रमसे अशेषविद्यानिवहेन साकं | कालेन कौमारमवाप योगी॥ १ | सम्पूर्ण विद्याओंके ज्ञानके साथ कुमारावस्थाको प्राप्त In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४२ ] प्रह्लादपर हिरण्यकशिपुका कोप और प्रह्लादका वध करनेके लिये प्रयत्न १४९ प्रायेण कौमारमवाप्य लोकः | हुए। संसारके अन्य लोग कौमार अवस्थाको पाकर पुष्णाति नास्तिक्यमसद्रतिं च। | प्रायः नास्तिक विचार और बुरे आचार-व्यवहारके पोषक तस्मिन् वयःस्थस्य बहिर्विरक्ति- | बन जाते हैं, परंतु उसी उम्रमें प्रह्लादको बाह्य विषयोंसे र्भवत्यभूच्चित्रमजे च भक्तिः॥ २ | वैराग्य हुआ और भगवान्में उनकी भक्ति हो गयी—यह | अद्भुत बात है। तदनन्तर जब प्रह्लादने गुरुके यहाँ अपनी अथ सम्पूर्णविद्यं तं कदाचिद्दितिजेश्वरः। | पढ़ाई समाप्त कर ली, तब एक दिन दैत्यराजने उन्हें अपने आनाय्य प्रणतं प्राह प्रह्लादं विदितेश्वरम्॥ ३ | पास बुलवाया और ईश्वर-तत्त्वके ज्ञाता प्रह्लादको अपने | सामने प्रणाम करके खड़े देख उनसे कहा— ॥ १-३॥ साध्वज्ञाननिधेर्बाल्यान्मुक्तोऽसि सुरसूदन। | सुरसूदन ! तुम अज्ञानकी निधिरूपा बाल्यावस्थासे मुक्त इदानीं भ्राजसे भास्वान् नीहारादिव निर्गतः ॥ ४ | हो गये—यह बहुत अच्छा हुआ। इस समय तुम कुहिरेसे | निकले हुए सूर्यकी भाँति अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे हो। बाल्ये वयं च त्वमिव द्विजैर्जाड्याय मोहिताः । | पुत्र ! बचपनमें तुम्हारी ही तरह हमें भी जडबुद्धि सिखानेके वयसा वर्धमानेन पुत्रकैवं सुशिक्षिताः ॥ ५ | लिये ब्राह्मणोंने मोहित कर रखा था; किंतु अवस्था बढ़नेपर | जब हम समझदार हुए, तब इस प्रकार अपने कुलके अनुरूप तदद्य त्वयि धुर्येऽहं संसकण्टकताधुरम्। | सुन्दर शिक्षा ग्रहण कर सके थे। अतः शत्रुरूपी काँटोंसे युक्त विन्यस्य स्वां चिरधृतां सुखी पश्यन् श्रियं तव ॥ ६ | इस राज्य-शासनके भारको, जिसे मैंने बहुत दिनोंसे धारण कर | रखा है, अब तुझ सामर्थ्यवान् पुत्रपर रखकर मैं तुम्हारी राज्य- यदा यदा हि नैपुण्यं पिता पुत्रस्य पश्यति । | लक्ष्मीको देखते हुए सुखी होना चाहता हूँ। पिता जब-जब तदा तदाऽऽधिं त्यक्त्वा नु महत्सौख्यमवाप्नुयात् ॥ ७ | अपने पुत्रकी निपुणता देखता है, तब-तब अपनी मानसिक | चिन्ता त्यागकर महान् सुखका अनुभव करता है। तुम्हारे गुरुने गुरुश्चातीव नैपुण्यं ममाग्रेऽवर्णयत्तव । | भी मेरे समक्ष तुम्हारी योग्यताका बड़ा बखान किया है। यह न चित्रं पुत्र तच्छ्रोतुं किं नु मे वाञ्छतः श्रुती ॥ ८ | तुम्हारे लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। आज मेरे कान तुम्हारी | कुछ बातें सुनना चाहते हैं। नेत्रोंके सामने शत्रु की दरिद्रता नेत्रयोः शत्रुदारिद्र्यं श्रोत्रयोः सुतसूक्तयः । | देखना, कानोंमें पुत्रकी सुन्दर वाणीका पड़ना और अङ्गोंमें युद्धव्रणं च गात्रेषु मायिनां च महोत्सवः॥ ९ | युद्धके आघातसे घाव होना—यह सब ऐश्वर्यवान् वीरों अथवा | मायावी दैत्योंके लिये महान् उत्सवके समान है ॥ ४-९॥ श्रुत्वेति निकृतिप्रज्ञं दैत्याधिपवचस्ततः। | उस समय दैत्यराजके ये शठतापूर्ण वचन सुनकर जगाद योगी निश्शङ्कं प्रह्लादः प्रणतो गुरुम् ॥ १० | योगी प्रह्लादने पिताको प्रणाम करके निर्भीकतापूर्वक | कहा— ॥ १०॥ सूक्तयः श्रोत्रयोः सत्यं महाराज महोत्सवः। | 'महाराज! आपका यह कथन सत्य है कि अच्छी किंतु ता वैष्णवीर्वाचो मुक्त्वा नान्या विचारयेत् ॥ ११ | बातें सुनना कानोंके लिये महान् उत्सवके समान है; किंतु | वे बातें भगवान् विष्णुसे सम्बन्ध रखनेवाली हों, तभी ऐसा नीतिःसूक्तिःकथाःश्राव्याःश्राव्यं काव्यं च तद्वचः। | होता है। उनको छोड़कर दूसरी बातें सुननेका विचार भी यत्र संसृतिदुःखौघकक्षाग्निर्गोयिते हरिः॥ १२ | नहीं करना चाहिये। जो संसारके दुःखसमुदायरूपी तृणोंको | भस्म करनेके लिये अग्निके समान हैं, उन भगवान् विष्णुका | जिसमें गुणगान किया जाता हो, वही वचन नीतियुक्त है, | वही सूक्ति (सुन्दर वाक्य) है, वही सुनने योग्य कथा
१५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४२
१५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४२ [संस्कृत श्लोक] अचिन्त्यः स्तूयते यत्र भक्त्या भक्तेप्सितप्रदः। अर्थशास्त्रेण किं तात यत्र संसृतिसंततिः ॥ १३ शास्त्रश्रमेण किं तात येनात्मैव विहंस्यते। वैष्णवं वाङ्मयं तस्माच्छाव्यं सेव्यं च सर्वदा ॥ १४ मुमुक्षुभिर्भवक्लेशान्नो चेन्नैव सुखी भवेत्। इति तस्य वचः शृण्वन् हिरण्यकशिपुस्तदा ॥ १५ जज्वाल दैत्यराट् तप्तसर्पिर्ह्रद्विरिवाधिकम्। प्रह्लादस्य गिरं पुण्यां जनसंसृतिनाशिनीम् ॥ १६ नामृष्यतासुरः क्षुद्रो घूको भानुप्रभामिव। परितो वीक्ष्य सम्प्राह क्रुद्धो दैत्यभटानिदम् ॥ १७ हन्यतामेष कुटिलः शस्त्रपातैः सुभीषणैः। उत्कृत्योत्कृत्य मर्माणि रक्षितास्तु हरिः स्वयम् ॥ १८ पश्यत्विदानीमेवैष हरिसंस्तवजं फलम्। काकोलकाङ्गगृध्रेभ्यो ह्यस्याङ्गं संविभज्यताम् ॥ १९ अथोद्धतास्त्रा दैतेयास्तर्जयन्तः प्रगर्जितैः। अच्युतस्य प्रियं भक्तं तं जघ्नुः पतिनोदिताः ॥ २० प्रह्लादोऽपि प्रभुं नत्वा ध्यानवज्रं समाददे। अकृत्रिमरसं भक्तं तमित्थं ध्याननिश्चलम् ॥ २१ ररक्ष भगवान् विष्णुः प्रह्लादं भक्तदुःखहृत्। अथालब्धपदान्यस्य गात्रे शस्त्राणि रक्षसाम् ॥ २२ नीलाब्जशकलानीव पेतुश्छिन्नान्यनेकधा। किं प्राकृतानि शस्त्राणि करिष्यन्ति हरिप्रिये ॥ २३ तापत्रयमहास्त्रौघः सर्वोऽप्यस्माद् बिभेति वै। पीडयन्ति जनांस्तावद् व्याधयो राक्षसा ग्रहाः ॥ २४ यावद् गुहाशयं विष्णुं सूक्ष्मं चेतो न विन्दति। ते तु भग्नास्त्रशकलैः प्रतीपोत्थैरितस्ततः ॥ २५ हन्यमाना न्यवर्तन्त सद्यः फलददैरिव। न चित्रं विबुधानां तदज्ञानां विस्मयावहम् ॥ २६ [हिन्दी अनुवाद] और श्रवण करने योग्य काव्य है। जिसमें भक्तोंको अभीष्ट वस्तु देनेवाले अचिन्त्य परमेश्वरका भक्तिपूर्वक स्तवन किया जाता हो, वही शास्त्र है। तात ! उस अर्थशास्त्रसे क्या लाभ, जिसमें संसार-चक्रमें डालनेवाली ही बातें कही गयी हैं। पिताजी ! उस शास्त्रमें परिश्रम करनेसे क्या सिद्ध होगा, जिससे आत्माका ही हनन होता है; इसलिये मुमुक्षु पुरुषोंको सदा वैष्णव शास्त्रोंका ही श्रवण और सेवन करना चाहिये। अन्यथा सांसारिक कष्टसे छुटकारा नहीं मिलता और न मनुष्य सुखी ही हो पाता है ॥ ११–१४१/२ ॥ जिस प्रकार तपाया हुआ घी जलके छींटे पड़नेसे और अधिक प्रज्वलित हो उठता है, वैसे ही दैत्यराज हिरण्यकशिपु प्रह्लादकी उपर्युक्त बातें सुनकर क्रोधसे जल उठा। जैसे उल्लू सूर्यकी प्रभा नहीं देख सकता, उसी प्रकार वह क्षुद्र असुर जीवके संसार-बन्धनको नष्ट करनेवाली प्रह्लादकी पवित्र वाणी न सह सका। उस क्रोधीने चारों ओर देखकर दैत्य वीरोंसे कहा- ॥ १५-१७ ॥ 'अरे! इस कुटिलको शस्त्रोंके भयंकर आघातसे मार डालो, इसके मर्मस्थानोंके टुकड़े-टुकड़े कर दो; आज इसका भगवान् स्वयं आकर इसकी रक्षा करे। विष्णुकी स्तुति करनेका फल यह आज इसी समय अपनी आँखोंसे देखे। इसका अङ्ग-अङ्ग काटकर कौओं, काँकों और गिद्धोंको बाँट दो' ॥ १८-१९ ॥ तब अपने स्वामी हिरण्यकशिपुद्वारा प्रेरित दैत्यगण अपनी विकट गर्जनासे डराते हुए, हाथमें शस्त्र लेकर भगवान्के प्रिय भक्त उन प्रह्लादजीको मारने लगे। प्रह्लादने भी भगवान्को नमस्कार करके ध्यानरूपी वज्र ग्रहण किया। तब भक्तोंके दुःख दूर करनेवाले भगवान् विष्णु स्वभावतः प्रेम करनेवाले भक्त प्रह्लादको इस प्रकार ध्यानमें स्थिर देख उसकी रक्षा करने लगे। फिर तो राक्षसोंके चलाये हुए अस्त्र-शस्त्र प्रह्लादके शरीरमें स्पर्श किये बिना ही नील-कमलके टुकड़ोंकी भाँति खण्ड- खण्ड होकर गिर जाने लगे। भला, ये प्राकृत शस्त्र भगवान्के प्रिय भक्तका क्या कर सकते हैं। उससे तो सम्पूर्ण त्रितापरूपी महान् अस्त्रसमूह भी भय मानता है। व्याधि, राक्षस और ग्रह-ये तभीतक मनुष्योंको पीड़ा पहुँचाते हैं, जबतक उनका चित्त हृदय-गुहामें सूक्ष्मरूपसे स्थित भगवान् विष्णुको नहीं प्राप्त कर लेता। भक्तके अपमानका मानो तत्काल फल देनेवाले वे भग्न अस्त्रखण्ड उलटे चलकर दैत्योंका संहार करने लगे। इनसे पीड़ित होनेके कारण वे दैत्य इधर-उधर भाग गये। विद्वानोंकी दृष्टिमें ऐसा होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, अज्ञानीजनोंको ही इस घटनासे विस्मय हो सकता है ॥ २०-२६ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४२ ] प्रह्लादपर हिरण्यकशिपुका कोप और प्रह्लादका वध करनेके लिये प्रयत्न १५१ वैष्णवं बलमालोक्य राजा नूनं भयं दधौ। वैष्णवोंका बल देखकर राजा हिरण्यकशिपुको अवश्य पुनस्तस्य वधोपायं चिन्तयन् स सुदुर्मतिः॥ २७ ही महान् भय हुआ; किंतु उस दुर्बुद्धिने पुनः प्रह्लादके समादिशत् समाहूय दंदशूकान् सुदुर्विषान्। वधका उपाय सोचते हुए, अत्यन्त भयंकर विषवाले अशस्त्रवधयोग्योऽयमस्मयो हरितोषकृत्॥ २८ सर्पोंको बुलाकर उन्हें आदेश दिया—'गरलायुधो*! तर द् भवद्भिरचिराद् हन्यतां गरलायुधाः। विष्णुको संतुष्ट करनेवाला यह निश्शङ्क बालक किसी हि. ण्यकशिपोः श्रुत्वा वचनं ते भुजंगमाः। शस्त्रसे नहीं मारा जा सकता; अतः तुम सभी मिलकर तस्याज्ञां जगृहुर्मूर्ध्ना प्रहर्षार्दिशवर्तिनः॥ २९ इसे अति शीघ्र मार डालो।' हिरण्यकशिपुकी यह बात अथ ज्वलद्दशनकरालदंष्ट्रिण सुनकर उसकी आज्ञा माननेवाले सभी सर्पोंने उसके स्फुटस्फुरद्दशनसहस्रभीषणाः । आदेशको हर्षपूर्वक शिरोधार्य किया॥ २७-२९॥ अकर्णका हरिमहिस्वकर्णका तदनन्तर जिनके दाँत विषसे जल रहे हैं तथा जिनकी हरिप्रियं द्रुततरमापतन्नुषा॥ ३० दाढ़ें विकराल हैं, जो स्फुट दिखायी देनेवाले हजारों गरायुधास्त्वचमपि भेत्तुमल्पिकां चमकीले दाँतोंके कारण भयानक जान पड़ते हैं, ऐसे वपुष्यजस्मृतिबलदुर्भिदाकृतेः । सर्पगण क्रोधसे फुफकारते हुए बड़े वेगसे उस हरिभक्तके अलं न ते हरिवपुषं तु केवलं ऊपर टूट पड़े। भगवान्के स्मरणके बलसे जिनका आकार विदश्य तं निजदशनैर्विना कृताः॥ ३१ दुर्भेद्य हो गया था, उन प्रह्लादजीके शरीरका थोड़ा-सा ततः स्रवत्क्षतजविषण्णमूर्तयो चमड़ा भी काटनेमें वे विषधर सर्प समर्थ न हो सके। द्विधाकृताद्भुतदशनां भुजंगमाः। इतना ही नहीं, जिनका शरीर भगवन्मय हो गया था, उन समेत्य ते दितिजपतिं व्यजिज्ञपन् प्रह्लादजीको केवल डँसनेमात्रसे वे सर्प अपने सारे दाँत विनिःश्वसत्प्रचलफणा भुजंगमाः॥ ३२ खो बैठे। तदनन्तर रक्तकी धारा बहनेसे जिनका आकार प्रभो महीध्रानपि भस्मशेषां- विषादग्रस्त हो रहा है, जिनके अद्भुत दाँतोंके दो-दो टुकड़े स्तस्मिन्नशक्तास्तु तदैव वध्याः। हो गये हैं तथा बार-बार उच्छ्वास लेनेके कारण जिनके महानुभावस्य तवात्मजस्य फन चञ्चल हो रहे हैं, उन भुजंगमोंने परस्पर मिलकर वधे नियुक्त्वा दशनैर्विना कृताः॥ ३३ दैत्यराज हिरण्यकशिपुको सूचित किया—॥ ३०-३२॥ इत्थं द्विजिह्वाः कठिनं निवेद्य 'प्रभो! हम पर्वतोंको भी भस्म करनेमें समर्थ हैं, यदि ययुर्विसृष्टाः प्रभुणाकृतार्थाः। उनमें हमारी शक्ति न चले तो आप तत्काल हमारा वध विचिन्तयन्तः पृथुविस्मयेन कर सकते हैं। परंतु आपके महानुभाव पुत्रका वध करनेमें प्रह्लादसामर्थ्यनिदानमेव ॥ ३४ लगाये जाकर तो हम अपने दाँतोंसे भी हाथ धो बैठे!' इस मार्कण्डेय उवाच प्रकार बड़ी कठिनाईसे निवेदन करके स्वामी हिरण्यकशिपुके अथासुरेशः सचिवैर्विचार्य आदेश देनेपर भी अपने कार्यमें असफल हुए वे सर्प निश्चित्य सूनुं तमदण्डसाध्यम्। अत्यन्त आश्चर्यके साथ प्रह्लादके अद्भुत सामर्थ्यका क्या आहूय साम्ना प्रणतं जगाद कारण है, इसका विचार करते हुए चले गये॥ ३३-३४॥ वाक्यं सदा निर्मलपुण्यचित्तम्। मार्कण्डेयजी कहते हैं—इसके बाद असुरराज प्रह्लाद दुष्टोऽपि निजाङ्गजातो हिरण्यकशिपुने मन्त्रियोंके साथ विचारकर अपने पुत्रको न वध्य इत्यद्य कृपा ममाभूत्॥ ३५ दण्डसे अजेय मानकर उसे शान्तिपूर्वक अपने पास बुलाया और जब वह आकर प्रणाम करके खड़ा हो गया, तब उस निर्मल एवं पवित्र हृदयवाले अपने पुत्रसे कहा—'प्रह्लाद! अपने शरीरसे यदि दुष्ट पुत्र भी उत्पन्न हो जाय तो वह वधके योग्य नहीं है, यह सोचकर अब तुझपर मुझे दया आ गयी है'॥ ३५॥
- विष ही जिनका शस्त्र है, उन्हें 'गरलायुध' (सर्प) कहा है। In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
१५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३
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१५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३ ततस्तूर्णं समागत्य दैत्यराजपुरोहिताः । तत्पश्चात् तुरंत ही वहाँ दैत्यराजके पुरोहित आये। मूढाः प्राञ्जलयः प्राहुर्द्विजाः शास्त्रविशारदाः ॥ ३६ शास्त्रविशारद होनेपर भी वे मूढ ही रह गये थे। उन ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर कहा— 'देव ! तुम्हारी युद्धविषयक त्रैलोक्यं कम्पते देव भृशं त्वय्यभिकाङ्क्षिणि । इच्छा होते ही सारा त्रिभुवन थरथर काँपने लगता है। प्रह्लादस्त्वां न जानाति क्रुद्धं स्वल्पो महाबलम् ॥ ३७ यह अल्प बलवाला प्रह्लाद कुपित हुए आप महान् बलशालीको नहीं जानता। अतः देव ! आपको क्रोधका परित्याग करके इसपर दया करनी चाहिये; क्योंकि पुत्र तदलं देव रोषेण दयां कर्तुं त्वमर्हसि । भले ही कुपुत्र हो जाय, परंतु माता-पिता कभी कुमाता पुत्रः कुपुत्रतामेति न मातापितरौ कदा ॥ ३८ अथवा कुपिता नहीं होते' ॥ ३६-३८ ॥ दैत्यराजके पुरोहितोंने उस दुर्बुद्धि दैत्य हिरण्यकशिपुसे उक्त्वेति कुटिलप्रज्ञं दैत्यं दैत्यपुरोहिताः । यों कहकर उसकी आज्ञासे प्रह्लादको साथ लेकर अपने आदाय तदनुज्ञातं प्रह्लादं धीधनं ययुः ॥ ३९ भवनको चले गये ॥ ३९ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे नरसिंहप्रादुर्भावे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'नरसिंहावतारविषयक' बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥ तैंतालीसवाँ अध्याय प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना; हिरण्यकशिपुकी आज्ञासे प्रह्लादका समुद्रमें डाला जाना तथा वहीं उन्हें भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन होना मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले— तदनन्तर सकल शास्त्रोंके अथ स गुरुगृहेऽपि वर्तमानः ज्ञाता प्रह्लादजी गुरुके घरमें रहकर भी अपने पवित्र सकलविदच्युतसक्तपुण्यचेताः । मनको भगवान् विष्णुमें लगाये रहनेके कारण सम्पूर्ण जड इव विचचार बाह्यकृत्ये जगत्को नारायणका स्वरूप समझकर बाह्य-लौकिक सततमनान्तमयं जगत्प्रपश्यन् ॥ १ कर्मोंमें जडकी भाँति व्यवहार करते हुए विचरते थे। सहगुरुकुलवासिनः कदाचि- एक दिन, उनके साथ ही गुरुकुलमें निवास करनेवाले च्छुतिविरता ह्यवदन् समेत्य बालाः । छात्र-बालक पाठ-श्रवण बंद करके, एकत्र हो, प्रह्लादसे तव चरितमहो विचित्रमेतत् कहने लगे— 'राजकुमार ! अहो ! आपका चरित्र बड़ा ही क्षितिपत्तिपुत्र यतोऽस्य भोगलुब्धः । विचित्र है; क्योंकि आपने विषय-भोगोंका लोभ त्याग हृदि किमपि विचिन्त्य हृष्टरोमा दिया है। प्रिय ! आप अपने हृदयमें किसी अनिर्वचनीय भवसि सदा च वदाङ्ग यद्यगुह्यम् ॥ २ वस्तुका चिन्तन करके सदा पुलकित रहते हैं। यदि वह वस्तु छिपानेयोग्य न हो तो हमें भी बताइये' ॥ १-२॥ इति गदितवतः स मन्त्रिपुत्रा- नृप ! प्रह्लादजी सबपर स्नेह करनेवाले थे, अतः इस नवददिदं नृप सर्ववत्सलत्वात् । प्रकार पूछते हुए मन्त्रिकुमारोंसे वे यों बोले— “हे दैत्यपुत्रो! शृणुत सुमनसः सुरारिपुत्रा एकमात्र भगवान्में अनुराग रखनेवाला मैं तुम्हारे पूछनेपर यदहमनन्यरतिर्वदामि पृष्टः ॥ ३ जो कुछ भी बता रहा हूँ, उसे तुमलोग प्रसन्नचित्त होकर In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५३
अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५३ धनजनतरुणीविलासरम्यो | सुनो। यह जो धन, जन और स्त्री-विलास आदिसे भवविभवः किल भाति यस्तमेनम्। | अत्यन्त रमणीय प्रतीत होनेवाला सांसारिक वैभव दृष्टिगोचर विमृशत सुबुधैरुतैष सेव्यो | हो रहा है, इसपर विचार करो। क्या यह लोक-वैभव द्रुतमथ वा परिवर्ज्य एव दूरात् ॥ ४ | विद्वानोंके सेवन करने योग्य है या जल्दी-जल्दी दूरसे ही | त्याग देनेयोग्य? अहो! जिनके अङ्ग गर्भाशयमें टेढ़े-मेढ़े प्रथममिह विचार्यतां यदम्बा- | पड़े हैं, जो जठरानलकी ज्वालासे संतप्त हो रहे हैं तथा जठरगतैरनुभूयते सुदुःखम्। | जिन्हें अपने अनेक पूर्वजन्मोंका स्मरण हो रहा है, वे सुकुटिलतनुभिस्तदग्नितप्तै- | माताके गर्भमें पड़े हुए जीव जिस महान् कष्टका अनुभव र्विविधपुराजन्मनानि संस्मरद्भिः॥ ५ | करते हैं, पहले उसपर तो विचार करो ॥ ३-५॥ कारागृहे दस्युरिवास्मि बद्धो | 'गर्भमें पड़ा हुआ दुःखी जीव कहता है— 'हाय! जरायुणा विट्कृमिमूत्रगेहे। | कारागारमें बँधे हुए चोरकी भाँति मैं विष्ठा, कृमियों और पश्यामि गर्भेऽपि सकृन्मुकुन्द- | मूत्रसे भरे हुए इस [देहरूपी] घरमें जरायु (झिल्ली)- पादाब्जयोरस्मरणेन कष्टम्॥ ६ | से बँधा पड़ा हूँ। मैंने जो एक बार भी भगवान् मुकुन्दके | चरणारविन्दोंका स्मरण नहीं किया, उसीके कारण तस्मात्सुखं गर्भशयस्य नास्ति | होनेवाले कष्टको आज मैं इस गर्भमें भोग रहा हूँ।' अतः बाल्ये तथा यौवनवार्द्धके वा। | गर्भमें सोनेवाले जीवको बचपन, जवानी और बुढ़ापेमें भी एवं भवो दुःखमयः सदैव | सुख नहीं है। दैत्यकुमारो! जब इस प्रकार यह संसार सेव्यः कथं दैत्यसुताः प्रबुद्धैः। | सदा दुःखमय है, तब विज्ञ पुरुष इसका सेवन कैसे कर एवं भवेऽस्मिन् परिमृग्यमाणा | सकते हैं ? इस तरह इस संसारमें ढूँढ़नेपर हमें सुखका वीक्षामहे नैव सुखांशलेशम्॥ ७ | लेशमात्र भी दिखायी नहीं देता। हम जैसे-जैसे इसपर | ठीक विचार करते हैं, वैसे-ही-वैसे इस जगत्को यथा यथा साधु विचारयाम- | अत्यन्त दुःखमय समझते हैं। इसलिये ऊपरसे सुन्दर स्तथा तथा दुःखतरं च विद्मः। | दिखायी देनेवाले इस दुःखपूर्ण संसारमें साधु पुरुष तस्माद्बवेऽस्मिन् किल चारुरूपे | आसक्त नहीं होते। जो तत्त्वज्ञानसे रहित अत्यन्त मूढ़ दुःखाकरे नैव पतन्ति सन्तः॥ ८ | लोग हैं, वे ही देखनेमें सुन्दर दीपकपर गिरकर नष्ट | होनेवाले पतंगोंकी भाँति सांसारिक भोगोंमें आसक्त होते पतन्त्यथोऽतत्त्वविदः सुमूढा | हैं। यदि सुखके लिये कोई दूसरा सहारा न होता, तब वह्नौ पतंगा इव दर्शनीये। | तो सुखमय-से प्रतीत होनेवाले इस जगत्में आसक्त यद्यस्ति नान्यच्छरणं सुखाय | होना उचित था—जैसे अन्न न पानेके कारण जो अत्यन्त युक्तं तदैतत्पतनं सुखाभे॥ ९ | दुबले हो रहे हैं, उनके लिये खली-भूसी आदि खा | लेना ठीक हो सकता है; परंतु भगवान् लक्ष्मीपतिके अविन्दतामन्नमहो कृशानां | युगल चरणारविन्दोंकी सेवासे प्राप्त होनेवाला आदि, युक्तं हि पिण्याकतुषादिभक्षणम्। | अविनाशी, अजन्मा एवं नित्य सुख (परमात्मा) तो अस्ति त्वजं श्रीपतिपादपद्म- | है ही, फिर इस क्षणिक संसारका आश्रय क्यों लिया द्वन्द्वार्चनप्राप्यमनन्तमाद्यम् ॥१० | जाय ? ॥ ६-१०॥
१५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३
१५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३ अक्लेशतः प्राप्यमिदं विसृज्य | ''जो बिना कष्टके ही प्राप्त होनेयोग्य इस महान् सुख महासुखं योऽन्यसुखानि वाञ्छेत्। | (परमेश्वर)-को त्यागकर अन्य तुच्छ सुखोंकी इच्छा राज्यं करस्थं स्वमसौ विसृज्य | करता है, वह दीनहृदय मूर्ख पुरुष मानो हाथमें आये हुए भिक्षामटेद्दीनमनाः सुमूढः॥ ११ | अपने राज्यको त्यागकर भीख माँगता है। भगवान् लक्ष्मीपतिके तच्चार्च्यते श्रीपतिपादपद्म- | युगल-चरणारविन्दोंका यथार्थ पूजन वस्त्र, धन और परिश्रमसे द्वन्द्वं न वस्त्रैर्न धनैः श्रमैर्न। | नहीं होता; किंतु मनुष्य यदि अनन्यचित्त होकर 'केशव', अनन्यचित्तेन नरेण किंतु | 'माधव' आदि भगवन्नामोंका उच्चारण करे तो वही उनकी उच्चार्यते केशव माधवेति॥ १२ | वास्तविक पूजा है। दैत्यकुमारो! इस प्रकार संसारको एवं भवं दुःखमयं विदित्वा | दुःखमय जानकर भगवान्का ही भलीभाँति भजन करो। दैत्यात्मजाः साधु हरिं भजध्वम्। | इस प्रकार करनेसे ही मनुष्यका जन्म सफल हो सकता एवं जनो जन्मफलं लभेत | है; नहीं तो (भगवद्भजन न करनेके कारण) अज्ञानी पुरुष नो चेद्भवब्धौ प्रपतेदधोऽधः॥ १३ | भवसागरमें ही नीचेसे और नीचे स्तरमें ही गिरता रहता तस्माद्भवेऽस्मिन् हृदि शङ्खचक्र- | है। इसलिये इस संसारमें समस्त कामनाओंसे रहित हो गदाधरं देवमनन्तमीड्यम्। | तुम सभी लोग अपने हृदयके भीतर विराजमान शङ्ख- स्मरन्तु नित्यं वरदं मुकुन्दं | चक्र-गदाधारी, वरदाता, अविनाशी स्तवनीय भगवान् सद्भक्तियोगेन निवृत्तकामाः॥ १४ | मुकुन्दका सच्चे भक्तिभावसे सदा चिन्तन करो। भवसागरमें अनास्तिकत्वात् कृपया भवद्द्व्यो | पड़े हुए दैत्यपुत्रो! तुम लोग नास्तिक नहीं हो, इसलिये वदामि गुह्यं भवसिन्धुसंस्थाः। | दयावश मैं तुमसे यह गोपनीय बात बतलाता हूँ-समस्त सर्वेषु भूतेषु च मित्रभावं | प्राणियोंके प्रति मित्रभाव रखो; क्योंकि सबके भीतर भजन्वयं सर्वगतो हि विष्णुः॥ १५ | भगवान् विष्णु ही विराजमान हैं''॥ ११-१५॥ दैत्यपुत्रा ऊचुः | दैत्यपुत्र बोले-महाबुद्धिमान् प्रह्लादजी! बचपनसे प्रह्लाद त्वं वयं चापि बालभावान्महामते। | लेकर आजतक आप और हम भी षण्डामर्कके सिवा षण्डामर्कात्परं मित्रं गुरुं चान्यं न विद्महे॥ १६ | दूसरे किसी गुरु तथा मित्रको नहीं जान सके। फिर त्वयैतच्छिक्षितं कुत्र तथ्यं नो वद निस्तुषम्। | आपने यह ज्ञान कहाँ सीखा? हमसे पर्दा न रखकर | सच्ची बात बताइये॥ १६ १/२॥ प्रह्लाद उवाच | प्रह्लादजी बोले-कहते हैं, जिस समय मेरे पिताजी यदा तातः प्रयातो मे तपोऽर्थं काननं महत्॥ १७ | तपस्या करनेके लिये महान् वनमें चले गये, उसी समय तदा चेन्द्रः समागत्य पुरं तस्य रुरोध ह। | इन्द्रने यहाँ आकर पिता दैत्यराज हिरण्यकशिपुको मरा मृतं विज्ञाय दैत्येन्द्रं हिरण्यकशिपुं तदा॥ १८ | हुआ समझकर उनके इस नगरको घेर लिया। इन्द्र इन्द्रो मे जननीं गृह्य प्रयातो मन्मथाग्निना। | कामाग्निसे पीड़ित हो मेरी महाभागा माताजीको पकड़कर दह्यमानो महाभागां मार्गे गच्छति सत्वरम्॥ १९ | यहाँसे चल दिये। वे मार्गमें बड़ी तेजीसे पैर बढ़ाते तदा मां गर्भंगं ज्ञात्वा नारदो देवदर्शनः। | हुए चले जा रहे थे। इसी समय देवदर्शन नारदजी मुझे आगत्येन्द्रं जगादोच्चैर्मूढ मुञ्च पतिव्रताम्॥ २० | माताके गर्भमें स्थित जान सहसा वहाँ पहुँचे और | चिल्लाकर इन्द्रसे बोले-'मूर्ख! इस पतिव्रताको छोड़ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५५
अस्या गर्भे स्थितो योऽसौ स वै भागवतोत्तमः । तच्छ्रुत्वा नारदवचो मातरं प्रणिपत्य मे ॥ २१ विष्णुभक्त्या प्रमुच्याथ गतः स्वं भुवनं हरिः । नारदस्तां समानीय आश्रमं स्वं शुभव्रतः ॥ २२ मामुद्दिश्य महाभागामेतद्वै कथितं तदा । तथा मे विस्मृतं नैव बालाभ्यासाद्हनोः सुताः ॥ २३ विष्णोश्चानुग्रहेणैव नारदस्योपदेशतः । मार्कण्डेय उवाच एकदा गुप्तचर्यायां गतोऽसौ राक्षसाधिपः ॥ २४ शृणोति रात्रौ नगरे जय रामेति कीर्तनम् । अवैत्पुत्रकृतं सर्वं बलवान् दानवेश्वरः ॥ २५ अथाहूयाह दैत्येन्द्रः क्रोधान्धः स पुरोहितान् । रे रे क्षुद्रद्विजा यूयमतिमुमूर्षतां गताः ॥ २६ प्रह्लादोऽयं मृषालापान् वक्तव्यान्यान् पाठयत्यपि । इति निर्भर्त्स्य तान् विप्रान् श्वसन राजाविशद् गृहम् ॥ २७ न च पुत्रवधे चिन्तां जहौ स्ववधकारिणीम् । आसन्नमरणोऽमर्षात्कृत्यमेकं विमृश्य सः ॥ २८ अकृत्यमेव दैत्यादीनाहूयोपादिशद्रहः । अद्य क्षपायां प्रह्लादं प्रसुप्तं दुष्टमुल्बणैः ॥ २९ नागपाशैर्दृढं बद्ध्वा मध्ये निक्षिपताम्बुधेः । तदाज्ञां शिरसाऽऽदाय ददृशुस्तमुपेत्य ते ॥ ३० रात्रिप्रियं समाधिस्थं प्रबुद्धं सुप्तवत् स्थितम् । संछिन्नरागलोभादिमहाबन्धं क्षपाचराः ॥ ३१ बबन्धुस्तं महात्मानं फल्गुभिः सर्परज्जुभिः । गरुडध्वजभक्तं तं बद्ध्वाहिभिरबुद्धयः ॥ ३२ जलशायिप्रियं नीत्वा जलराशौ निचिक्षिपुः । बलिनस्तेऽचलान् दैत्या तस्योपरि निधाय च ॥ ३३ शशंसुस्तं प्रियं राज्ञे द्रुतं तान् सोऽप्यमानयत् ।
दो। इसके गर्भमें जो बालक है, वह भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ है।' नारदजीका कथन सुनकर इन्द्रने विष्णुभक्तिके कारण मेरी माताको प्रणाम करके छोड़ दिया और वे अपने लोकको चले गये। फिर शुभ सङ्कल्पवाले नारदजी मेरी माताको अपने आश्रममें ले आये और मेरे उद्देश्यसे मेरी महाभागा माताके प्रति इस पूर्वोक्त ज्ञानका वर्णन किया। दानवो! बाल्यकालके अभ्यास, भगवान्की कृपा तथा नारदजीका उपदेश होनेसे वह ज्ञान मुझे भूला नहीं है॥ १७-२३१/२ ॥ मार्कण्डेयजी बोले-एक दिन राक्षसराज हिरण्य- कशिपु रात्रिके समय गुप्तरूपसे नगरमें घूम रहा था। उस समय उसे 'जय राम' का कीर्तन सुनायी देने लगा। तब बलवान् दानवराजने यह सब अपने पुत्रकी ही करतूत समझी। तब उस दैत्यराजने क्रोधान्ध होकर पुरोहितोंको बुलाया और कहा-'नीच ब्राह्मणो! जान पड़ता है, तुमलोग मरनेके लिये अत्यधिक उत्सुक हो गये हो। तुम्हारे देखते-देखते यह प्रह्लाद स्वयं तो व्यर्थकी बातें बकता ही है, दूसरोंको भी यही सिखाता है।' इस प्रकार उन ब्राह्मणोंको फटकारकर राजा हिरण्यकशिपु लम्बी साँसें खींचता हुआ घरमें आया। उस समय भी वह पुत्रवधके विषयमें होनेवाली चिन्ताको, जो उसका ही नाश करनेवाली थी, नहीं छोड़ सका। उसकी मृत्यु निकट थी; अतः उसने अमर्षवश एक ऐसा काम सोचा, जो वास्तवमें न करने योग्य ही था। हिरण्यकशिपुने दैत्यादिकोंको बुलाया और उनसे एकान्तमें कहा-'देखो, आज रातमें प्रह्लाद जब गाढी नींदमें सो जाय, उस समय उस दुष्टको भयंकर नागपाशोंद्वारा खूब कसकर बाँध दो और बीच समुद्रमें फेंक आओ'॥ २४-२९१/२ ॥ उसकी आज्ञा शिरोधार्य करके उन दैत्योंने प्रह्लादजीके पास जाकर उन्हें देखा। वे रात्रिके ही प्रेमी थे (क्योंकि रातमें ही उन्हें ध्यान लगानेकी सुविधा रहती थी)। प्रह्लादजी समाधिमें स्थित होकर जाग रहे थे, फिर भी खूब सोये हुएके समान स्थित थे। उन्होंने राग और लोभ आदिके महान् बन्धनोंको काट डाला था, तो भी उन महात्मा प्रह्लादको निशाचरोंने तुच्छ नागपाशोंसे बाँध दिया। जिनकी ध्वजामें साक्षात् गरुडजी विराजमान हैं, उन भगवान्के भक्त प्रह्लादको उन मूर्खोंने सर्पोंद्वारा बाँधा और जलशायीके प्रियजनको ले जाकर जलराशि समुद्रमें डाला। तदनन्तर उन बली दैत्योंने प्रह्लादके ऊपर पर्वतकी चट्टानें रख दीं और तुरंत ही जाकर राजा हिरण्यकशिपुको यह प्रिय संवाद कह सुनाया। उसे सुनकर उस दैत्यराजने भी उन सबका सम्मान किया॥ ३०-३३१/२ ॥
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१५६ श्रीमन्नसिंहपुराण [ अध्याय ४३
१५६ श्रीमन्नसिंहपुराण [ अध्याय ४३ प्रह्लादं चाब्धिमध्यस्थं तमौर्वाग्निमिवापरम् ॥ ३४ बीच समुद्रमें पड़े हुए प्रह्लादको भगवान्के तेजसे दूसरे वडवानलकी भाँति प्रज्वलित देख अत्यन्त भयके ज्वलन्तं तेजसा विष्णोर्ग्राह्या भूरिभियात्यजन्। कारण ग्राहोंने उन्हें दूरसे ही त्याग दिया। प्रह्लाद भी स चाभिन्नचिदानन्दसिन्धुमध्ये समाहितः ॥ ३५ अपनेसे अभिन्न चिदानन्दमय समुद्र (परमेश्वर)-में समाहित होनेके कारण यह न जान सके कि 'मैं बाँधकर खारे न वेद बद्धमात्मानं लवणाम्बुधिमध्यगम्। पानीके सागरमें डाल दिया गया हूँ।' मुनि (प्रह्लाद) जब अथ ब्रह्मामृताम्भोधिमये स्वस्मिन् स्थिते मुनौ ॥ ३६ ब्रह्मानन्दामृतके समुद्ररूप अपने आत्मामें स्थित हो गये, ययौ क्षोभं द्वितीयाब्धिप्रवेशादिव सागरः । उस समय समुद्र इस प्रकार क्षुब्ध हो उठा, मानो उसमें क्लेशात् क्लेशानि वोद्धूय प्रह्लादमथ वीचयः ॥ ३७ दूसरे महासागरका प्रवेश हो गया हो। फिर समुद्रकी लहरें प्रह्लादको धीरे-धीरे कठिनाईसे ठेलकर उस नौकारहित निन्युस्तीरेऽप्लवाम्भोधेः गुरूक्तय इवाम्बुधेः । सागरके तटकी ओर ले गयीं—ठीक उसी प्रकार, जैसे ध्यानेन विष्णुभूतं तं भगवान् वरुणालयः ॥ ३८ ज्ञानी गुरुके वचन क्लेशोंका उन्मूलन करके शिष्यको भवसागरसे पार पहुँचा देते हैं। ध्यानके द्वारा विष्णुरूप विन्यस्य तीरे रत्नानि गृहीत्वा द्रष्टुमाययौ । हुए उन प्रह्लादजीको तीरपर पहुँचाकर भगवान् वरुणालय तावद् भगवताऽऽदिष्टः प्रहृष्टः पन्नगाशनः ॥ ३९ (समुद्र) बहुत-से रत्न ले उनका दर्शन करनेके लिये आये। इतनेमें ही भगवान्की आज्ञा पाकर सर्पभक्षी बन्धनाहीन् समभ्येत्य भक्षयित्वा पुनर्ययौ । गरुडजी वहाँ आ पहुँचे और बन्धनभूत सर्पोंको अत्यन्त अथाबभाषे प्रह्लादं गम्भीरध्वनिरर्णवः ॥ ४० हर्षपूर्वक खाकर चले गये ॥ ३४—३९१/२ ॥ प्रणम्य दिव्यरूपः सन् समाधिस्थं हरेः प्रियम् । तत्पश्चात् गम्भीर घोषवाला दिव्यरूपधारी समुद्र प्रह्लाद भगवद्भक्त पुण्यात्मन्नर्णवोऽस्म्यहम् ॥ ४१ समाधिनिष्ठ भगवद्भक्त प्रह्लादको प्रणाम करके यों बोला— 'भगवद्भक्त प्रह्लाद! पुण्यात्मन् ! मैं समुद्र हूँ। अपने पास चक्षुर्भ्यामथ मां दृष्ट्वा पावयार्थिनमागतम् । आये हुए मुझ प्रार्थीको अपने नेत्रोंद्वारा देखकर पवित्र इत्यम्बुधिगिरः श्रुत्वा स महात्मा हरेः प्रियः ॥ ४२ कीजिये।' समुद्रके ये वचन सुनकर भगवान्के प्रिय भक्त महात्मा असुर-नन्दन प्रह्लादने सहसा उनकी ओर उद्वीक्ष्य सहसा देवं तं नत्वाऽऽहासुरात्मजः । देखकर प्रणाम किया और कहा—'श्रीमन् कब पधारे?' कदाऽऽगतं भगवता तमथाम्बुधिरब्रवीत् ॥ ४३ तब उनसे समुद्रने कहा— ॥ ४०—४३ ॥ योगिन्नज्ञातवृत्तस्त्वमपराध्दं तवासुरैः । 'योगिन्! आपको यह बात ज्ञात नहीं है, असुरोंने बद्धस्त्वमहिभिर्दैत्यैर्मयि क्षिप्तोऽद्य वैष्णव ॥ ४४ आपका बड़ा अपराध किया है। वैष्णव! आपको साँपोंसे बाँधकर दैत्योंने आज मेरे भीतर फेंक दिया; तब मैंने ततस्तूर्णं मया तीरे न्यस्तस्त्वं फणिनश्च तान् । तुरंत ही आपको किनारे लगाया और उन साँपोंको इदानीमेव गरुडो भक्षयित्वा गतो महान् ॥ ४५ अभी-अभी महात्मा गरुडजी भक्षण करके गये हैं। महात्मन् ! मैं सत्सङ्गका अभिलाषी हूँ, आप मुझपर महात्मन्ननुगृहीष्व त्वं मां सत्संगमार्थिनम् । अनुग्रह करें और इन रत्नोंको भेंटरूपमें स्वीकार गृहाणेमानि रत्नानि पूज्यस्त्वं मे हरैर्यथा ॥ ४६ करें। मेरे लिये आप भगवान् विष्णुके समान ही पूज्य हैं। यद्यपि आपको इन रत्नोंकी कोई आवश्यकता यद्यप्येतैर्न ते कृत्यं रत्नैर्दास्याम्यथाप्यहम् । नहीं है, तथापि मैं तो इन्हें आपको दूँगा ही; क्योंकि दीपान्निवेदयत्येव भास्करस्यापि भक्तिमान् ॥ ४७ भगवान् सूर्यका भक्त उन्हें दीप निवेदन करता ही है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५७ त्वमापत्स्वपि घोरासु विष्णुनेव हि रक्षितः। घोर आपत्तियोंमें भी भगवान् विष्णुने ही आपकी रक्षा त्वादृशा निर्मलात्मानो न सन्ति बहवोऽर्कवत्॥ ४८ की है। सूर्यकी भाँति आप-जैसे शुद्धचित्त महात्मा बहुना किं कृतार्थोऽस्मि यत्तिष्ठामि त्वया सह। संसारमें अधिक नहीं हैं। बहुत क्या कहूँ? आज मैं आलपामि क्षणमपि नेक्षे ह्येतत्फलोपमाम्॥ ४९ कृतार्थ हो गया; क्योंकि आज मुझे आपके साथ स्थित इत्यब्धिना स्तुतः श्रीशमाहात्म्यवचनैः स्वयम्। होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस समय क्षणभर भी जो ययौ लज्जां प्रहर्षं च प्रह्लादो भगवत्प्रियः॥ ५० आपके साथ बातचीत कर रहा हूँ, इससे प्राप्त होनेवाले प्रतिगृह्य स रत्नानि वत्सलः प्राह वारिधिम्। फलकी उपमा मैं कहीं नहीं देखता'॥४४–४९॥ महात्मन् सुतरां धन्यः शेते त्वयि हि स प्रभुः॥५१ इस प्रकार समुद्रने साक्षात् भगवान् लक्ष्मीपतिके कल्पान्तेऽपि जगत्कृत्स्नं ग्रसित्वा स जगन्मयः। माहात्म्यसूचक वचनोंद्वारा जब उनकी स्तुति की, तब त्वय्येवैकार्णवीभूते शेते किल महात्मनि॥५२ भगवान्के प्रिय भक्त प्रह्लादजीको बड़ी लज्जा हुई और हर्ष लोचनाभ्यां जगन्नाथं द्रष्टुमिच्छामि वारिधे। भी। स्नेही प्रह्लादने समुद्रके दिये हुए रत्न ग्रहणकर उनसे त्वं पश्यसि सदा धन्यस्तत्रोपायं प्रयच्छ मे॥५३ कहा—'महात्मन्! आप विशेष धन्यवादके पात्र हैं; क्योंकि उक्तेति पादावनतं तूर्णमुत्थाप्य सागरः। भगवान् आपके ही भीतर शयन करते हैं। यह प्रसिद्ध है प्रह्लादं प्राह योगीन्द्र त्वं पश्यसि सदा हृदि॥५४ कि जगन्मय प्रभु प्रलयकालमें भी सम्पूर्ण जगत्को अपनेमें द्रष्टुमिच्छस्यथाक्षिभ्यां स्तुहि तं भक्तवत्सलम्। लीन करके एकार्णवरूपमें स्थित आप महात्मा महासागरमें उक्तेति सिन्धुः प्रह्लादमात्मनः स जलेऽविशत्॥५५ ही शयन करते हैं। समुद्र! मैं इन स्थूल नेत्रोंसे भगवान् गते नदीन्द्रे स्थित्वैको हरिं रात्रौ स दैत्यजः। जगन्नाथका दर्शन करना चाहता हूँ। आप धन्य हैं; क्योंकि भक्त्यास्तौदिति मन्वानस्तद्दर्शनमसम्भवम्॥ ५६ सदा भगवान्का दर्शन करते रहते हैं। कृपया मुझे भी प्रह्लाद उवाच उनके दर्शनका उपाय बताइये'॥ ५०-५३॥ वेदान्तवाक्यशतमारुतसम्पवृद्ध- यों कहकर प्रह्लादजी समुद्रके चरणोंपर गिर पड़े। वैराग्यवह्निशिखया परिताप्य चित्तम्। तब समुद्रने उनको शीघ्र ही उठाकर कहा—'योगीन्द्र! संशोधयन्ति यदवेक्षणयोग्यतायै आप तो सदा ही अपने हृदयमें भगवान्का दर्शन करते धीराः सदैव स कथं मम गोचरः स्यात्॥ ५७ हैं; तथापि यदि इन नेत्रोंसे भी देखना चाहते हैं तो उन मात्सर्यरोषस्मरलोभमोह- भक्तवत्सल भगवान्का स्तवन कीजिये।' यों कहकर मदादिभिर्वा सुदृढैः सुषड्भिः। समुद्रदेव अपने जलमें प्रविष्ट हो गये॥५४-५५॥ उपर्युपर्यावरणैः सुबद्ध- समुद्रके चले जानेपर दैत्यनन्दन प्रह्लादजी रात्रिमें वहाँ मन्धं मनो मे क्व हरिः क्व वाहम्॥ ५८ अकेले ही रहकर भगवान्के दर्शनको एक असम्भव यं धातृमुख्या विबुधा भयेषु कार्य मानते हुए भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी स्तुति करने लगे ॥ ५६ ॥ शान्त्यर्थिनः क्षीरनिधेरुपान्तम्। प्रह्लादजी बोले—धीर पुरुष जिनके दर्शनकी योग्यता गत्वोत्तमस्तोत्रकृतः कथंचित् प्राप्त करनेके लिये सदा ही सैकड़ों वेदान्त-वाक्यरूप पश्यन्ति तं द्रष्टुमहो ममाशा॥ ५९ वायुद्वारा अत्यन्त बढ़ी हुई वैराग्यरूप अग्निकी ज्वालासे अपने चित्तको तपाकर भलीभाँति शुद्ध किया करते हैं, वे भगवान् विष्णु, भला, मेरे दृष्टिपथमें कैसे आ सकते हैं। एकके ऊपर एकके क्रमसे ऊपर-ऊपर जिनका आवरण पड़ा हुआ है—ऐसे मात्सर्य, क्रोध, काम, लोभ, मोह, मद आदि छः सुदृढ़ बन्धनोंसे भलीभाँति बँधा हुआ मेरा मन अंधा (विवेकशून्य) हो रहा है। कहाँ भगवान् श्रीहरि और कहाँ मैं! भय उपस्थित होनेपर उसकी शान्तिके लिये क्षीरसागरके तटपर जाकर ब्रह्मादि देवता उत्तम रीतिसे स्तवन करते हुए किसी प्रकार जिनका दर्शन कर पाते हैं, उन्हीं भगवान्के दर्शनकी मुझ-जैसा दैत्य आशा करे— यह कैसा आश्चर्य है!॥ ५७-५९॥
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१५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३
१५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३ अयोग्यमात्मानमितीशदर्शने राजन्! इस प्रकार अपनेको भगवान्का दर्शन पानेके स मन्यमानस्तदनासिकातरः । योग्य न मानते हुए प्रह्लादजी उनकी अप्राप्तिके दुःखसे उद्वेगदुःखार्णवमग्नमानसः कातर हो उठे। उनका चित्त उद्वेग और अनुतापके समुद्रमें स्रुताश्रुधारो नृप मूर्च्छितोऽपतत् ॥ ६० डूब गया। वे नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए मूर्च्छित होकर गिर पड़े। भूप! फिर तो क्षणभरमें ही भक्तजनोंके अथ क्षणात्सर्वगतश्चतुर्भुजः एकमात्र प्रियतम सर्वव्यापी कृपानिधान भगवान् विष्णु शुभाकृतिर्भक्तजनैकवल्लभः । सुन्दर चतुर्भुज रूप धारणकर दुःखी प्रह्लादको अमृतके दुःस्थं तमाश्लिष्य सुधामयैर्भुजै- समान सुखद स्पर्शवाली अपनी भुजाओंसे उठाकर गोदमें स्तत्रैव भूपाविरभूद्दयानिधिः ॥ ६१ लगाते हुए वहाँ प्रकट हो गये ॥ ६०-६१ ॥ स लब्धसंज्ञोऽथ तदङ्गसङ्गा- उनके अङ्गस्पर्शसे होशमें आनेपर प्रह्लादने सहसा नेत्र दुन्मीलिताक्षः सहसा ददर्श । खोलकर भगवान्को देखा। उनका मुख प्रसन्न था। नेत्र प्रसन्नवक्त्रं कमलायताक्षं कमलके समान सुन्दर और विशाल थे। भुजाएँ बड़ी- सुदीर्घबाहुं यमुनासवर्णम् ॥ ६२ बड़ी थीं और शरीर यमुनाजलके समान श्याम था। वे उदारतेजोमयमप्रमेयं परम तेजस्वी और अपरिमित ऐश्वर्यशाली थे। गदा, शङ्ख, गदारिशङ्खाम्बुजचारुचिह्नितम् । चक्र और पद्म आदि सुन्दर चिह्नोंसे पहचाने जा रहे थे। स्थितं समालिङ्ग्य विभुं स दृष्ट्वा इस प्रकार अपनेको अङ्कमें लगाये हुए भगवान्को खड़ा प्रकम्पितो विस्मयभीतिहर्षैः ॥ ६३ देख प्रह्लाद भय, विस्मय और हर्षसे काँप उठे, वे इस तत् स्वप्नमेवाथ स मन्यमानः घटनाको स्वप्न ही समझते हुए सोचने लगे—'अहा! स्वप्नेऽपि पश्यामि हरिं कृतार्थम् । स्वप्नमें भी मुझे पूर्णकाम भगवान्का दर्शन तो मिल गया!' इति प्रहर्षार्णवमग्नचेताः यह सोचकर उनका चित्त हर्षके महासागरमें गोता लगाने स्वानन्दमूर्च्छां स पुनश्च भेजे ॥ ६४ लगा और वे पुनः स्वरूपानन्दमयी मूर्च्छाको प्राप्त हो गये। ततः क्षितावेव निविश्य नाथः तब अपने भक्तोंके एकमात्र बन्धु भगवान् पृथ्वीपर ही कृत्वा तमङ्के स्वजनैकबन्धुः । बैठ गये और पाणिपल्लवसे धीरे-धीरे उन्हें हिलाने लगे। शनैर्विधुन्वन् करपल्लवेन स्नेहमयी माताकी भाँति प्रह्लादके गात्रका स्पर्श करते हुए स्पृशन् मुहुर्मातृवदालिलिङ्ग ॥ ६५ उन्हें बार-बार छातीसे लगाने लगे ॥ ६२-६५ ॥ ततश्चिरेण प्रह्लादः सम्मुखोन्मीलितेक्षणः । कुछ देरके बाद प्रह्लादने भगवान्के सामने आँखें खोलकर आलुलोके जगन्नाथं विस्मयाविष्टचेतसा ॥ ६६ विस्मितचित्तसे उन जगदीश्वरको देखा। फिर बहुत देरके ततश्चिरात्तं सम्भाव्य धीरः श्रीशाङ्कशायिनम् । बाद अपनेको भगवान् लक्ष्मीपतिकी गोदमें सोया हुआ आत्मानं सहसोत्तस्थौ सद्यः सभयसम्भ्रमः ॥ ६७ अनुभवकर वे भय और आवेगसे युक्त हो सहसा उठ गये प्रणामायापतद्भूम्यां प्रसीदेति वदन्मुहुः । तथा 'भगवन्! प्रसन्न होइये' यों बार-बार कहते हुए उन्हें सम्भ्रमात् स बहुज्ञोऽपि नान्यां पूजोक्तिमस्मरत् ॥ ६८ साष्टाङ्ग प्रणाम करनेके लिये पृथ्वीपर गिर पड़े। बहुज्ञ तमथाभयहस्तेन गदाशङ्खारिधृक् प्रभुः । होनेपर भी उन्हें उस समय घबराहटके कारण अन्य गृहीत्वा स्थापयामास प्रह्लादं स दयानिधिः ॥ ६९ स्तुतिवाक्योंका स्मरण न हुआ। तब गदा, शङ्ख और चक्र कराब्जस्पर्शनाह्लादगलदश्रुं सवेपथुम् । धारण करनेवाले दयानिधि भगवान्ने प्रह्लादको अपने भूयोऽथाह्लादयन् स्वामी तं जगादेति सान्त्वयन् ॥ ७० भक्तभयहारी हाथसे पकड़कर खड़ा किया। भगवान्के कर- कमलोंका स्पर्श होनेसे अत्यन्त आनन्दके आँसू बहाते और काँपते हुए प्रह्लादको और अधिक आनन्द देनेके लिये प्रभुने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा ॥ ६६-७० ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५९
अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५९ सभयं सम्भ्रमं वत्स मद्गौरवकृतं त्यज। 'वत्स! मेरे प्रति गौरव-बुद्धिसे होनेवाले इस भय नैवं प्रियो मे भक्तेषु स्वाधीनप्रणयी भव ॥ ७१ और घबराहटको त्याग दो। मेरे भक्तोंमें तुम्हारे समान कोई भी मुझे प्रिय नहीं है, तुम स्वाधीनप्रणयी हो जाओ नित्यं सम्पूर्णकामस्य जन्मानि विविधानि मे। [अर्थात् यह समझो कि तुम्हारा प्रेमी मैं तुम्हारे वशमें भक्तसर्वेष्टदानाय तस्मात् किं ते प्रियं वद ॥ ७२ हूँ]। मैं नित्य पूर्णकाम हूँ, तथापि भक्तोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेके लिये मेरे अनेक अवतार हुआ करते हैं; अतः तुम भी बताओ, तुम्हें कौन-सी अथ व्यजिज्ञपद्विष्णुं प्रह्लादः प्राञ्जलिर्नमन्। सलौल्यमुत्फुल्लदृशा पश्यन्नेवं च तन्मुखम् ॥ ७३ वस्तु प्रिय है?'॥ ७१-७२॥ तदनन्तर खिले हुए नेत्रोंसे भगवान्के मुखको सतृष्णभावसे देखते हुए प्रह्लादने हाथ जोड़ नमस्कारपूर्वक उनसे यों नाप्ययं वरदानाय कालो नैष प्रसीद मे। निवेदन किया—'भगवन्! यह वरदानका समय नहीं है, त्वद्दर्शनामृतास्वादादन्तरात्मा न तृप्यति ॥ ७४ केवल मुझपर प्रसन्न होइये। इस समय मेरा मन आपके दर्शनरूपी अमृतका आस्वादन करनेसे तृप्त नहीं हो रहा ब्रह्मादिदेवैर्दुर्लक्ष्यं त्वामेव पश्यतः प्रभो। है। प्रभो! ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी जिनका दर्शन पाना तृप्तिं नेष्यति मे चित्तं कल्पायुतशतैरपि ॥ ७५ कठिन है, ऐसे आपका दर्शन करते हुए मेरा मन दस लाख वर्षोंमें भी तृप्त न होगा। इस प्रकार आपके दर्शनसे अतृप्त रहनेवाले मुझ सेवकका चित्त आपके दर्शनके बाद नैवमेतद्ध्यतृप्तस्य त्वां दृष्ट्वाऽन्यद् वृणोति किम्। और क्या माँग सकता है?'॥ ७३-७५ १/२ ॥ ततः स्मितसुधापूरैः पूरयन् स प्रियं प्रियात् ॥ ७६ तब मुस्कानमयी सुधाका स्रोत बहाते हुए उन जगदीशने अपने परम प्रिय भक्त प्रह्लादको मोक्ष- योजयन् मोक्षलक्ष्म्यैव तं जगाद जगत्पतिः। लक्ष्मीसे संयुक्त-सा करते हुए उससे कहा—'वत्स! यह सत्यं मद्दर्शनादन्यद् वत्स नैवास्ति ते प्रियम् ॥ ७७ सत्य है कि तुम्हें मेरे दर्शनसे बढ़कर दूसरा कुछ भी प्रिय नहीं है; किंतु मेरी इच्छा तुम्हें कुछ देनेकी है। किंचित्ते दातुमिष्टं मे मत्प्रीयार्थं वृणीष्व तत्। अतः तुम मेरा प्रिय करनेके लिये ही मुझसे कुछ माँग प्रह्लादोऽथाब्रवीद्धीमान् देव जन्मान्तरेष्वपि ॥ ७८ लो'॥७६-७७१/२॥ तब बुद्धिमान् प्रह्लादने कहा—'देव! मैं जन्मान्तरोंमें भी गरुडजीकी भाँति आपमें ही भक्ति रखनेवाला आपका दासस्तवाहं भूयासं गरुत्मानिव भक्तिमान्। अथाह नाथः प्रह्लादं संकटं खल्विदं कृतम् ॥ ७९ दास होऊँ!' यह सुनकर भगवान्ने कहा—'यह तो तुमने मेरे लिये कठिन समस्या रख दी-मैं तो तुम्हें स्वयं अपने-आपको दे देना चाहता हूँ और तुम मेरी अहं त्वात्मदानेच्छुस्त्वं तु भृत्यत्वमिच्छसि। दासता चाहते हो! बुद्धिमान् दैत्यराजकुमार! दूसरे-दूसरे वरानन्यांश्च वरय धीमन् दैत्येश्वरात्मज ॥ ८० वर माँगो'॥ ७८-८०॥ तब प्रह्लादने भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले भगवान् प्रह्लादोऽपि पुनः प्राह भक्तकामप्रदं हरिम्। विष्णुसे पुनः कहा—'नाथ! आप प्रसन्न हों; मुझे तो यही प्रसीद सास्तु मे नाथ त्वद्भक्तिः सात्त्विकी स्थिरा ॥ ८१ चाहिये कि आपमें मेरी सात्त्विक भक्ति सदा स्थिर रहे।
१६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४४
१६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४४
[श्लोक ८२ – ८९ एवं हिन्दी अनुवाद]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अनयाथ च त्वां नौमि नृत्यामि तत्परः सदा।<br>अथाभितुष्टो भगवान् प्रियमाह प्रियंवदम् ॥ ८२<br><br>वत्स यद्यदभीष्टं ते तत्तदस्तु सुखी भव।<br>अन्तर्हिते च मय्यत्र मा खिद त्वं महामते ॥ ८३<br><br>त्वच्चित्तान्नापयास्यामि क्षीराब्धेरिव सुप्रियात्।<br>पुनर्द्वित्रिदिनैस्त्वं मां द्रष्टा दुष्टवधोद्यतम् ॥ ८४<br><br>अपूर्वाविष्कृताकारं नृसिंहं पापभीषणम्।<br>उक्त्वेत्यतः प्रणमतः पश्यतश्चातिलालसम् ॥ ८५<br><br>अतृप्तस्यैव तस्येशो माययान्तर्दधे हरिः।<br>ततो हताददृष्ट्वा तं सर्वतो भक्तवत्सलम् ॥ ८६<br><br>हाहेत्यश्रुप्लुतः प्रोच्य ववन्दे स चिरादिति।<br>श्रूयमाणेऽथ परितः प्रतिबुद्धजनस्वने ॥ ८७<br><br>उत्थायाब्धितटाद्धीमान् प्रह्लादः स्वपुरं ययौ ॥ ८८<br><br>अथ दितिजसुतश्चिरं प्रहृष्टः<br> स्मृतिबलतः परितस्तमेव पश्यन्।<br>हरिमनुजगत्तिं त्वलं च पश्यन्<br> गुरुगृहमृतपुलकः शनैरवाप ॥ ८९ | यही नहीं, इस भक्तिसे युक्त होकर मैं आपका स्तवन किया करूँ और आपके ही परायण रहकर सदा नाचा करूँ'॥ ८११/२॥<br><br>भगवान्ने संतुष्ट होकर प्रिय भाषण करनेवाले प्रिय भक्त प्रह्लादसे तब कहा—'वत्स! तुम्हें जो-जो अभीष्ट हो, वह सब प्राप्त हो; तुम सुखी रहो। एक बात और है—महामते! यहाँसे मेरे अन्तर्धान हो जानेपर भी तुम खेद न करना। मैं अपने परमप्रिय स्थान क्षीरसागरकी भाँति तुम्हारे शुद्धचित्तसे कभी अलग न होऊँगा। तुम दो-ही-तीन दिनोंके बाद मुझे दुष्ट हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये उद्यत अपूर्व शरीर धारण किये नृसंहरूपमें, जो पापियोंके लिये भयानक है, पुनः प्रकट देखोगे।' यों कहकर भगवान् हरि, अपनेको प्रणाम करके अत्यन्त ललचायी हुई दृष्टिसे देखते रहनेपर भी तृप्त न होनेवाले उस भक्त प्रह्लादके सामने ही मायासे अन्तर्धान हो गये॥ ८२-८५१/२॥<br><br>तत्पश्चात् वे सहसा सब ओर दृष्टि डालनेपर भी जब भक्तवत्सल भगवान्को न देख सके, तब आँसू बहाते हुए उच्चस्वरसे हाहाकार करके बड़ी देरतक भगवान्की वन्दना करते रहे। फिर जब प्रातःकाल जगे हुए जन्तुओंकी वाणी सब ओर सुनायी देने लगी, तब बुद्धिमान् प्रह्लाद समुद्र-तटसे उठकर अपने नगरको चले गये। इसके बाद दैत्यनन्दन प्रह्लादजी परम प्रसन्न होकर अपने स्मरणबलसे संसारमें सब ओर भगवान्का ही दर्शन करते हुए तथा भगवान् एवं मनुष्यकी गतिको भलीभाँति समझते हुए रोमाञ्चित होकर धीरे-धीरे गुरुके घर गये॥ ८६-८९॥ |
इति श्रीनरसिंहपुराणे नरसिंहप्रादुर्भावे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'नरसिंहावतारविषयक' तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥
चौवालीसवाँ अध्याय
नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका वध
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मार्कण्डेय उवाच<br>अथागतं ते प्रह्लादं दृष्ट्वा दैत्याः सुविस्मिताः।<br>शशंसुर्दैत्यपतये यैः क्षिप्तः स महार्णवे ॥ १<br>स्वस्थं तमागतं श्रुत्वा दैत्यराड्विस्मयाकुलः। | **मार्कण्डेयजी बोले—**तदनन्तर प्रह्लादको [कुशलपूर्वक समुद्रसे] लौटा देखकर, जिन्होंने उन्हें महासागरमें डाला था, वे दैत्य बड़े विस्मित हुए और उन्होंने तुरंत यह समाचार दैत्यराज हिरण्यकशिपुको दिया। उन्हें स्वस्थ |
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अध्याय ४४ ] नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका वध १६१
अध्याय ४४ ] नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका वध १६१
आहूयतां च इत्याह क्रोधान्मृत्युवशे स्थितः ॥ २ तथासुरैर्दुरा नीतः समासीनं स दिव्यदृक् । आसन्नमृत्युं दैत्येन्द्रं ददर्शात्यूर्जितश्रियम् ॥ ३
नीलांशुमिश्रमाणिक्यद्युतिच्छन्नविभूषणम् । सधूमाग्निमिव व्यासमुच्चासनचितिस्थितम् ॥ ४
दंष्ट्रोत्कटैर्घोरतरैर्घनच्छविभिरुद्धतैः । कुमार्गदर्शिभिर्दैत्यैर्यमदूतैरिवावृतम् ॥ ५
दूरात् प्रणम्य पितरं प्राञ्जलिस्तु व्यवस्थितः । अथाहाकारणक्रोधः स खलो भर्त्सयन् सुतम् ॥ ६
भगवत्प्रियमत्युच्चैर्मृत्युमेवाश्रयन्निव । मूढ रे शृणु मद्वाक्यमेतदेवान्तिमं ध्रुवम् ॥ ७
इतो न त्वां प्रवक्ष्यामि श्रुत्वा कुरु यथेप्सितम् । उक्तेवेति द्रुतमाकृष्य चन्द्रहासासिमद्भुतम् ॥ ८
सम्भ्रमाद्वीक्षितः सर्वैश्चालयन्नाह तं पुनः । क्व चास्ति मूढ ते विष्णुः स त्वामद्य परक्षतु ॥ ९
त्वयोक्तं स हि सर्वत्र कस्मात्स्तम्भे न दृश्यते । यदि पश्यामि तं विष्णुमधुना स्तम्भमध्यगम् ॥ १०
तर्हि त्वां न वधिष्यामि भविष्यसि द्विधान्यथा । प्रह्लादोऽपि तथा दृष्ट्वा दध्यौ तं परमेश्वरम् ॥ ११
पुरोक्तं तद्वचः स्मृत्वा प्रणनाम कृताञ्जलिः । तावत्प्रस्फुटितस्तम्भो वीक्षितो दैत्यसूनुना ॥ १२
आदर्शरूपो दैत्यस्य खड्गतो यः प्रतिष्ठितः । तन्मध्ये दृश्यते रूपं बहुयोजनमायतम् ॥ १३
अतिरौद्रं महाकायं दानवानां भयंकरम् । महानेत्रं महावक्त्रं महादंष्ट्रं महाभुजम् ॥ १४
महानखं महापादं कालाग्निसदृशाननम् । कर्णान्तकृतविस्तारवदनं चातिभीषणम् ॥ १५
लौटा सुन दैत्यराज विस्मयसे व्याकुल हो उठा और क्रोधवश मृत्युके अधीन होकर बोला-'उसे यहाँ बुला लाओ।' असुरोंके द्वारा बुरी तरहसे पकड़कर लाये जानेपर दिव्यदृष्टिवाले प्रह्लादने सिंहासनपर बैठे हुए दैत्यराज हिरण्यकशिपुको देखा। उसकी मृत्यु निकट थी, उसका तेज बहुत बढ़ा हुआ था। उसके आभूषण नीलप्रभायुक्त माणिक्योंकी कान्तिसे आच्छन्न थे, अतएव वह धूमयुक्त फैली हुई अग्निके समान शोभित हो रहा था। वह ऊँचे सिंहासन-मञ्चपर विराजमान था और उसे मेघके समान काले दाढ़ोंके कारण विकराल, अत्यन्त भयानक, कुमार्गदर्शी एवं यमदूतोंके समान क्रूर दैत्य घेरे हुए थे॥ १-५॥
प्रह्लादजीने दूरसे ही हाथ जोड़कर पिताको प्रणाम किया और खड़े हो गये। तब मृत्युके निकट पहुँचनेवालेकी भाँति अकारण ही क्रोध करनेवाले उस दुष्टने भगवद्भक्त पुत्रको उच्चस्वरसे डाँटते हुए कहा-'अरे मूर्ख ! तू मेरा यह अन्तिम और अटल वचन सुन; इसके बाद मैं तुझसे कुछ न कहूँगा; इसे सुनकर तेरी जैसी इच्छा हो, वही करना।' यह कहकर उसने शीघ्र ही चन्द्रहास नामक अपनी अद्भुत तलवार खींच ली। उस समय सब लोग उसकी ओर आश्चर्यपूर्वक देखने लगे। उसने तलवार चलाते हुए पुनः प्रह्लादसे कहा-'रे मूढ़! तेरा विष्णु कहाँ है ? आज वह तेरी रक्षा करे ! तूने कहा था कि वह सर्वत्र है। फिर इस खंभेमें क्यों नहीं दिखायी देता ? यदि तेरे विष्णुको इस खंभेके भीतर देख लूँगा, तब तो तुझे नहीं मारूँगा; यदि ऐसा न हुआ तो इस तलवारसे तेरे दो टुकड़े कर दिये जायँगे' ॥ ६-१० १/२ ॥
प्रह्लादने भी ऐसी बात देखकर उन परमेश्वरका ध्यान किया और पहले कहे हुए उनके वचनको याद करके हाथ जोड़ उन्हें प्रणाम किया। इतनेमें ही दैत्यनन्दन प्रह्लादने देखा कि वह दर्पणके समान स्वच्छ खंभा, जो अभीतक खड़ा था, दैत्यराजकी तलवारके आघातसे फट पड़ा तथा उसके भीतर अनेक योजन विस्तारवाला, अत्यन्त रौद्र एवं महाकाय नरसिंहरूप दिखायी दिया, जो दानवोंको भयभीत करनेवाला था। उसके बड़े-बड़े नेत्र, विशाल मुख, बड़ी-बड़ी दाढ़ें और लंबी-लंबी भुजाएँ थीं। उसके नख बहुत बड़े और पैर विशाल थे। उसका मुख कालाग्निके समान देदीप्यमान था, जबड़े कानतक फैले हुए थे और वह बहुत भयानक दिखायी देता था ॥ ११-१५ ॥
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१६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४४
१६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४४ कृत्वेत्थं नारसिंहं तु ययौ विष्णुस्त्रिविक्रमः । नरसिंहः स्तम्भमध्यान्निर्गत्य प्रणनाद च ॥ १६ निनादश्रवणाद्दैत्या नरसिंहमवेष्टयन् । तान् हत्वा सकलांस्तत्र स्वपौरुषपराक्रमात् ॥ १७ बभञ्ज च सभां दिव्यां हिरण्यकशिपोर्नृप । वारयामासुरभ्येत्य नरसिंहं महाभटाः ॥ १८ ते तु राजन् क्षणादेव नरसिंहेन वै हताः । ततः शस्त्राणि वर्षन्ति नरसिंहे प्रतापिणि ॥ १९ स तु क्षणेन भगवान् हत्वा तद्बलमोजसा । ननाद च महानादं दिशः शब्देन पूरयन् ॥ २० तान्मृतानपि विज्ञाय पुनरन्यान्महासुरः । अष्टाशीतिसहस्राणि हेतिहस्तान् समादिशत् ॥ २१ तेऽप्यागत्य च तं देवं रुरुधुः सर्वतोदिशम् । हत्वा तानखिलान् युद्धे युध्यमानो ननाद सः ॥ २२ पुनः सभां बभञ्जासौ हिरण्यकशिपोः शुभाम् । तान् हतानपि विज्ञाय क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ २३ ततो हिरण्यकशिपुर्निष्चक्राम महाबलः । उवाच च महीपाल दानवान् बलदर्पितान् ॥ २४ हन्यतां हन्यतामेष गृह्यतां गृह्यतामयम् । इत्येवं वदतस्तस्य प्रमुखे तु महासुरान् ॥ २५ युध्यमानान् रणे हत्वा नरसिंहो ननाद च । ततोऽतिदुद्रुवुर्दैत्या हतशेषा दिशो दश ॥ २६ तावद्धता युध्यमाना दैत्याः कोटिसहस्रशः । नरसिंहेन यावच्च नभोभागं गतो रविः ॥ २७ शस्त्रास्त्रवर्षचतुरं हिरण्यकशिपुं जवात् । प्रगृह्य तु बलाद्राजन् नरसिंहो महाबलः ॥ २८ संध्याकाले गृहद्वारि स्थित्वोरौ स्थाप्य तं रिपुम् । वज्रतुल्यमहोरस्कं हिरण्यकशिपुं रुषा । नखैः किसलयमिव दारयत्याह सोऽसुरः ॥ २९ इस प्रकार नरसिंहरूप धारणकर त्रिविक्रम भगवान् विष्णु खंभेके भीतरसे निकल पड़े और लगे बड़े जोर-जोरसे दहाड़ने। नरेश्वर! यह गर्जना सुनकर दैत्योंने भगवान् नरसिंहको घेर लिया। तब उन्होंने अपने पौरुष एवं पराक्रमसे उन सबको मौतके घाट उतारकर हिरण्यकशिपुका दिव्य सभाभवन नष्ट कर दिया। राजन्! उस समय जिन महाभटोंने निकट आकर नृसिंहजीको रोका, उन सबको उन्होंने क्षणभरमें मार डाला। तत्पश्चात् प्रतापी नरसिंहभगवान्पर असुर सैनिक अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे ॥ १६-१९ ॥ भगवान् नृसिंहने क्षणभरमें ही अपने तेजसे समस्त दैत्यसेनाका संहार कर दिया और दिशाओंको अपनी गर्जनासे गुँजाते हुए वे भयंकर सिंहनाद करने लगे। उपर्युक्त दैत्योंको मरा जान महासुर हिरण्यकशिपुने पुनः हाथमें शस्त्र लिये हुए अट्ठासी हजार असुर सैनिकोंको नृसिंहदेवसे लड़नेकी आज्ञा दी। उन असुरोंने भी आकर भगवान्को सब ओरसे घेर लिया। तब युद्धमें लड़ते हुए भगवान् उन सभीका वध करके पुनः सिंहनाद करने लगे। उन्होंने हिरण्यकशिपुके दूसरे सुन्दर सभाभवनको भी पुनः नष्ट कर दिया। राजन्! अपने भेजे हुए इन असुरोंको भी मारा गया जान क्रोधसे लाल-लाल आँखें करके महाबली हिरण्यकशिपु स्वयं बाहर निकला और बलाभिमानी दानवोंसे बोला—'अरे, इसे पकड़ो-पकड़ो; मार डालो, मार डालो। इस प्रकार कहते हुए हिरण्यकशिपुके सामने ही युद्ध करनेवाले उन सभी महान् असुरोंका रणमें संहार करके भगवान् नृसिंह गर्जने लगे। तब मरनेसे बचे हुए दैत्य दसों दिशाओंमें वेगपूर्वक भाग चले ॥ २०-२६ ॥ जबतक सूर्यदेव अस्ताचलको नहीं चले गये, तबतक भगवान् नृसिंह अपने साथ युद्ध करनेवाले हजारों करोड़ दैत्योंका संहार करते रहे। राजन्! किंतु जब सूर्य डूबने लगे, तब महाबली भगवान् नृसिंहने अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करनेमें कुशल हिरण्यकशिपुको बड़े वेगसे बलपूर्वक पकड़ लिया। फिर संध्याके समय घरके दरवाजेपर बैठकर, उस वज्रके समान कठोर विशाल वक्षवाले शत्रु हिरण्यकशिपुको अपनी जाँघोंपर गिराकर जब भगवान् नृसिंह रोषपूर्वक नखोंसे पत्तेकी भाँति उसे विदीर्ण करने लगे, तब उस महान् असुरने जीवनसे निराश होकर कहा— ॥ २७-२९ ॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth 113 Narsingpuran_Section_7_1_Back
अध्याय ४४ ] नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका वध १६३
अध्याय ४४ ] नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका वध १६३ यत्राखण्डलदन्तिदन्तमुसला- 'हाय! युद्धके समय देवराज इन्द्रके वाहन गजराज न्याखण्डितान्याहवे ऐरावतके मूसल-जैसे दाँत जहाँ टकराकर टुकड़े-टुकड़े धारा यत्र पिनाकपाणिपरशो- हो गये थे, जहाँ पिनाकपाणि महादेवके फरसेकी तीखी राकुण्ठतामागमत् । धार भी कुण्ठित हो गयी थी, वहीं मेरा वक्षःस्थल इस तन्मे तावदुरो नृसिंहकरजै- समय नृसिंहके नखोंद्वारा फाड़ा जा रहा है। सच है, जब र्व्यादीर्यते साम्प्रतं भाग्य खोटा हो जाता है, तब तिनका भी प्रायः अनादर दैवे दुर्जनतां गते तृणमपि करने लगता है' ॥ ३० ॥ प्रायोऽप्यवज्ञायते ॥ ३० दैत्यराज हिरण्यकशिपु इस प्रकार कह ही रहा एवं वदति दैत्येन्द्रे ददार नरकेसरी। था कि भगवान् नृसिंहने उसका हृदयदेश विदीर्ण कर हृदयं दैत्यराजस्य पद्मपत्रमिव द्विपः ॥ ३१ दिया-ठीक उसी तरह, जैसे हाथी कमलके पत्तेको शकले द्वे तिरोभूते नखरन्ध्रे महात्मनः। अनायास ही छिन्न-भिन्न कर देता है। उसके शरीरके दोनों टुकड़े महात्मा नृसिंहके नखोंके छेदमें घुसकर ततः क्व यातो दुष्टोऽसाविति देवोऽतिविस्मितः ॥ ३२ छिप गये। राजन्! तब भगवान् सब ओर देखकर अत्यन्त विस्मित हो सोचने लगे-'अहो! वह दुष्ट कहाँ निरीक्ष्य सर्वतो राजन् वृथैतत्कर्म मेऽभवत् । चला गया? जान पड़ता है, मेरा यह सारा उद्योग ही इति संचिन्त्य राजेन्द्र नरसिंहो महाबलः ॥ ३३ व्यर्थ हो गया' ॥ ३१-३२१/२ ॥ व्यधुनत्करावुच्चैस्ततस्ते शकले नृप। राजेन्द्र! महाबली नृसिंह इस प्रकार चिन्तामें पड़कर नखरन्धान्निपतिते भूमौ रेणुसमे हरेः ॥ ३४ अपने दोनों हाथोंको बड़े जोरसे झाड़ने लगे। राजन्! फिर तो वे दोनों टुकड़े उन भगवान्के नख-छिद्रसे दृष्ट्वा व्यतीतसंरम्भो जहास परमेश्वरः। निकलकर भूमिपर गिर पड़े, वे कुचलकर धूलिकणके पुष्पवर्षं च वर्षन्तो नरसिंहस्य मूर्धनि ॥ ३५ समान हो गये थे। यह देख रोषहीन हो वे परमेश्वर हँसने लगे। इसी समय ब्रह्मादि सभी देवता अत्यन्त देवाः सब्रह्मकाः सर्वे आगताः प्रीतिसंयुताः। प्रसन्न हो वहाँ आये और भगवान् नरसिंहके मस्तकपर आगत्य पूजयामासुर्नरसिंहं परं प्रभुम् ॥ ३६ फूलोंकी वर्षा करने लगे। पास आकर उन सबने उन परम प्रभु नरसिंहदेवका पूजन किया ॥ ३३-३६ ॥ ब्रह्मा च दैत्यराजानं प्रह्लादमभिषेचयत् । तदनन्तर ब्रह्माजीने प्रह्लादको दैत्योंके राजाके पदपर धर्मे रतिः समस्तानां जनानामभवत्तदा ॥ ३७ अभिषिक्त किया। उस समय समस्त प्राणियोंका धर्ममें अनुराग हो गया। सम्पूर्ण देवताओंसहित भगवान् विष्णुने इन्द्रोऽपि सर्वदेवैस्तु हरिणा स्थापितो दिवि । इन्द्रको स्वर्गके राज्यपर स्थापित किया। भगवान् नृसिंह नरसिंहोऽपि भगवान् सर्वलोकहिताय वै ॥ ३८ भी सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये श्रीशैलके शिखरपर जा पहुँचे। वहाँ देवताओंसे पूजित हो वे श्रीशैलशिखरं प्राप्य विश्रुतः सुरपूजितः । प्रसिद्धिको प्राप्त हुए। वे भक्तोंका हित और अभक्तोंका स्थितो भक्तहितार्थाय अभक्तानां क्षयाय च ॥ ३९ नाश करनेके लिये वहीं रहने लगे ॥ ३७-३९ ॥ इत्येतन्नरसिंहस्य माहात्म्यं यः पठेन्नरः । नृपश्रेष्ठ! जो मनुष्य भगवान् नरसिंहके इस माहात्म्यको शृणोति वा नृपश्रेष्ठ मुच्यते सर्वपातकैः ॥ ४० पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता 1113 Narsingpuran_Section_7_2_Front In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१६४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४५
१६४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४५ नरो वा यदि वा नारी शृणोत्याख्यानमुत्तमम्। | है। नर हो या नारी—जो भी इस उत्तम आख्यानको सुनता वैधव्याद्दुःखशोकाच्च दुष्टसङ्गात्प्रमुच्यते॥ ४१ | है, वह दुष्टोंका सङ्ग करनेके दोषसे, दुःखसे, शोकसे एवं वैधव्यके कष्टसे छुटकारा पा जाता है। जो दुष्ट स्वभाववाला, दुःशीलोऽपि दुराचारो दुष्प्रजो दोषकर्मकृत्। | दुराचारी, दुष्ट संतानवाला, दूषित कर्मोंका आचरण करनेवाला, अधर्मिष्ठोऽनभोगी च शृण्वन् शुद्धो भवेन्नरः॥ ४२ | अधर्मात्मा और विषयभोगी हो, वह मनुष्य भी इसका श्रवण करनेसे शुद्ध हो जाता है॥ ४०—४२॥ हरिः सुरेशो नरलोकपूजितो | मनुष्यलोकपूजित देवेश्वर भगवान् हरिने पूर्वकालमें हिताय लोकस्य चराचरस्य। | चराचर जगत्के हितके लिये अपनी मायासे भयानक कृत्वा विरूपं च पुराऽऽत्ममायया | आकारवाला नरसिंहरूप धारण करके दुःखदायी दैत्य हिरण्यकं दुःखकरं नखैश्छिनत्॥ ४३ | हिरण्यकशिपुको नखोंद्वारा नष्ट कर दिया था॥ ४३॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे नरसिंहप्रादुर्भावो नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'नरसिंहका प्रादुर्भाव' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४४॥ पैंतालीसवाँ अध्याय वामन-अवतारकी कथा मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! जिन्होंने पूर्वकालमें शृणु राजन् समासेन वामनस्य पराक्रमम्। | राजा बलिके यज्ञमें सहस्रों दैत्योंका संहार किया था, बलियागे हता येन पुरा दैत्याः सहस्रशः॥ १ | उन भगवान् वामनका चरित्र संक्षेपसे सुनो॥ १॥ विरोचनसुतः पूर्वं महाबलपराक्रमः। | पहलेकी बात है, विरोचनका पुत्र बलि महान् बल त्रैलोक्यं बुभुजे जित्वा देवानिन्द्रपुरोगमान्॥ २ | और पराक्रमसे सम्पन्न हो इन्द्र आदि समस्त देवताओंको जीतकर त्रिभुवनका राज्य भोग रहा था। नृपवर! उसके ततः कृशतरा देवा बभूवुस्तेन खण्डिताः। | द्वारा खण्डित हुए देवतालोग बहुत दुबले हो गये थे। इन्द्रं कृशतरं दृष्ट्वा नष्टराज्यं नृपोत्तम॥ ३ | राज्य नष्ट हो जानेसे इन्द्र और अधिक कृश हो गये थे। अदितिर्देवमाता या सातप्यत्परमं तपः। | उन्हें इस दशामें देखकर देवमाता अदितिने बहुत बड़ी तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः प्रणिपत्य जनार्दनम्॥ ४ | तपस्या की। उन्होंने भगवान् जनार्दनको प्रणाम करके अभीष्ट वाणीद्वारा उनका स्तवन किया। अदितिकी स्तुतिसे प्रसन्न हो ततः स्तुत्याभिसंतुष्टो देवदेवो जनार्दनः। | देवाधिदेव मधुसूदन जनार्दन उनके सम्मुख उपस्थित हो स्थित्वा तत्पुरतो वाचमुवाच मधुसूदनः॥ ५ | बोले—'सौभाग्यशालिनि! मैं बलिको बाँधनेके लिये तुम्हारा तव पुत्रो भविष्यामि सुभगे बलिबन्धनः। | पुत्र होऊँगा।' उनसे यों कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान इत्युक्त्वा तां गतो विष्णुः स्वगृहं सा समाययौ॥ ६ | हो गये और अदिति भी अपने घर चली गयीं॥ २—६॥ ततः कालेन सा गर्भमवाप नृप कश्यपात्। | राजन्! तदनन्तर समय आनेपर अदितिने कश्यपजीसे अजायत स विश्वेशो भगवान् वामनाकृतिः॥ ७ | गर्भ धारण किया। उस गर्भसे वामनरूपमें साक्षात् भगवान् In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth 1113 Narsingpuran_Section_7_2_Back
अध्याय ४५ ] वामन-अवतारकी कथा १६५
अध्याय ४५ ] वामन-अवतारकी कथा १६५ तस्मिञ्जाते समागत्य ब्रह्मा लोकपितामहः। जगन्नाथ ही प्रकट हुए। वामनजीका अवतार होनेपर जातकमीदिकाः सर्वाः क्रियास्तत्र चकार वै॥ ८ लोकपितामह ब्रह्माजी वहाँ आये। उन्होंने उनके जातकर्मादि कृतोपनयनो देवो ब्रह्मचारी सनातनः। सम्पूर्ण समयोचित संस्कार सम्पन्न किये। उपनयन-संस्कारके अदितिं चाप्यनुज्ञाप्य यज्ञशालां बलेर्ययौ ॥ ९ बाद वे सनातन भगवान् ब्रह्मचारी होकर अदितिकी आज्ञा ले राजा बलिकी यज्ञशालामें गये। चलते समय उनके गच्छतः पादविक्षेपाच्चचाल सकला मही। चरणोंके आघातसे पृथ्वी काँप उठती थी। दानवगण बलिके यज्ञभागान्न गृह्णन्ति दानवाश्च बलेर्मखात् ॥ १० यज्ञसे हविष्य ग्रहण करनेमें असमर्थ हो गये। वहाँकी प्रशान्ताश्चाग्नयस्तत्र ऋत्विजो मन्त्रतश्च्युताः। आग बुझ गयी। ऋत्विकगण मन्त्रोच्चारणमें त्रुटि करने विपरीतमिदं दृष्ट्वा शुक्रमह महाबलः ॥ ११ लगे। यह विपरीत कार्य देखकर महाबली बलिने शुक्राचार्यसे कहा— 'मुने ! ये महान् असुरगण यज्ञका भाग क्यों नहीं न गृह्णन्ति मुने कस्माद्धविर्भागं महासुराः। ग्रहण कर रहे हैं? अग्नि क्यों शान्त हो रही है ? विप्रवर ! कस्माच्च वह्नयः शान्ताः कस्माद्विक्ष्वलति द्विज ॥ १२ यह पृथ्वी क्यों डगमगा रही है तथा ये सम्पूर्ण ऋत्विज् कस्माच्च मन्त्रतो भ्रष्टा ऋत्विजः सकला अमी। मन्त्रभ्रष्ट क्यों हो रहे हैं?' बलिके इस प्रकार पूछनेपर इत्युक्तो बलिना शुक्नो दानवेन्द्रं वचोऽब्रवीत् ॥ १३ शुक्राचार्यने उस दानवराजसे कहा— ॥ ७-१३॥ शुक्र उवाच शुक्र बोले- असुरराज बलि ! तुम मेरी बात सुनो। हे बले शृणु मे वाक्यं त्वया देवा निराकृताः। तुमने देवताओंको जीतकर स्वर्गसे निकाल दिया है; तेषां राज्यप्रदानाय अदित्यामच्युतोऽसुर ॥ १४ उन्हें पुनः उनका राज्य देनेके लिये जगत्के उत्पत्तिस्थान देवदेव भगवान् विष्णु अदितिके गर्भसे वामनरूपमें देवदेवो जगद्योनिः संजातो वामनाकृतिः। प्रकट हुए हैं। असुरराज ! वे ही तुम्हारे यज्ञमें आ रहे स त्वागच्छति ते यज्ञं तत्पादव्यासकम्पिता ॥ १५ हैं, अतः उन्हींके पादविन्यास (पाँव रखने)-से कम्पित चलतीयं मही सर्वा तेनाद्यासुरभूपते। हो यह सारी पृथ्वी आज हिलने लगी है तथा उन्हींके तत्संनिधानादसुरा न गृह्णन्ति हविर्मखे ॥ १६ निकट आ जानेके कारण असुरगण आज यज्ञमें हविष्य ग्रहण नहीं कर रहे हैं। बले ! वामनके आगमनसे ही तवाग्नयोऽपि वै शान्ता वामनागमनाद्वि भोः। तुम्हारे यज्ञकी आग भी बुझ गयी है और ऋत्विज् भी ऋत्विजश्च न भासन्ते होममन्त्रो बलेऽधुना ॥ १७ श्रीहीन हो गये हैं। इस समयका होममन्त्र असुरोंकी असुराणां श्रियो हन्ति सुराणां भूतिरुत्तमा। सम्पत्तिको नष्ट कर रहा है और देवताओंका उत्तम इत्युक्तः स बलिः प्राह शुक्रं नीतिमतां वरम् ॥ १८ वैभव बढ़ रहा है ॥ १४-१७ १/२ ॥ शृणु ब्रह्मन् वचो मे त्वमागते वामने मखे। उनके इस प्रकार कहनेपर बलिने नीतिज्ञोंमें श्रेष्ठ यन्मया चाद्य कर्तव्यं वामनस्यास्य धीमतः ॥ १९ शुक्राचार्यजीसे कहा- 'ब्रह्मन् ! महाभाग ! आप मेरी बात तन्मे वद महाभाग त्वं हि नः परमो गुरुः। सुनें। यज्ञमें वामनजीके पधारनेपर उन बुद्धिमान् वामनजीके लिये मुझे क्या करना चाहिये, वह हमें बताइये; क्योंकि आप मेरे परम गुरु हैं' ॥ १८-१९ १/२ ॥ मार्कण्डेय उवाच इति संचोदितः शुक्रः स राज्ञा बलिना नृप ॥ २० मार्कण्डेयजी बोले- नरेश्वर ! राजा बलिके इस तमुवाच बलिं वाक्यं ममापि शृणु साम्प्रतम्। प्रकार पूछनेपर शुक्राचार्यजीने उनसे कहा- "राजन् ! देवानामुपकाराय भवतां संक्षयाय च ॥ २१ अब मेरी भी राय सुनो। बले! वे देवताओंका हित करने और तुम लोगोंके विनाशके लिये ही तुम्हारे स नूनमायाति बले तव यज्ञे न संशयः। यज्ञमें पधार रहे हैं, इसमें संदेह नहीं है। अतः जब आगते वामने देवे त्वया तस्य महात्मनः ॥ २२ भगवान् वामन यहाँ आ जायँ, तब उन महात्माके लिये In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१६६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय, ४५
१६६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय, ४५ प्रतिज्ञा नैव कर्तव्या ददाम्येतत्तवेति वै। 'मैं आपको यह वस्तु देता हूँ' यों कहकर कुछ इति श्रुत्वा वचस्तस्य बलिर्बलवतां वरः॥ २३ देनेकी प्रतिज्ञा न करना' ॥ २०-२२१/२॥ उनकी यह बात सुनकर बलवानोंमें श्रेष्ठ बलिने उवाच तां शुभां वाणीं शुक्रमात्मपुरोहितम्। अपने पुरोहित शुक्राचार्यजीसे यह सुन्दर बात कही— आगते वामने शुक्र यज्ञे मे मधुसूदने ॥ २४ 'गुरुदेव शुक्र! यज्ञमें मधुसूदन भगवान् वामनके पधारनेपर मैं उन्हें कुछ भी देनेसे इनकार नहीं कर सकता। अभी- न शक्यते प्रतिख्यातुं दानं प्रति मया गुरो। अभी मैं आपसे कह चुका हूँ कि दूसरे प्राणी भी यदि अन्येषामपि जन्तूनामित्युक्तं ते मयाधुना ॥ २५ मुझसे कुछ याचना करेंगे तो मैं उन्हें वह वस्तु देनेसे इनकार नहीं कर सकता; फिर शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले साक्षात् भगवान् विष्णु (वासुदेव) मेरे यज्ञमें पधारें और किं पुनर्वासुदेवस्य आगतस्य तु शार्ङ्गिणः। त्वया विघ्नो न कर्तव्यो वामनेऽत्रागते द्विज ॥ २६ मैं उनकी मुँहमाँगी वस्तु उन्हें देनेसे इनकार कर दूँ, यह कैसे सम्भव होगा? ब्राह्मणदेव! यहाँ भगवान् वामनके पदार्पण करनेपर आप उनके कार्यमें विघ्न न डालियेगा। यद्यद्द्रव्यं प्रार्थयते तत्तद्द्रव्यं ददाम्यहम्। वे जो-जो द्रव्य माँगेंगे, वही-वही मैं उन्हें दूँगा। मुनिश्रेष्ठ! कृतार्थोऽहं मुनिश्रेष्ठ यद्यागच्छति वामनः ॥ २७ यदि सचमुच ही यहाँ भगवान् वामन पधार रहे हैं तो मैं कृतार्थ हो गया' ॥ २३-२७॥ इत्येवं वदतस्तस्य यज्ञशालां स वामनः । राजा बलि जब इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय आगत्य प्रविवेशाथ प्रशंसंस बलेर्मखम् ॥ २८ वामनजीने आकर यज्ञशालामें प्रवेश किया और वे उनके उस यज्ञकी प्रशंसा करने लगे। राजन् ! उन्हें देखते तं दृष्ट्वा सहसा राजन् राजा दैत्याधिपो बलिः । ही दैत्याधिपति राजा बलिने सहसा उठकर पूजन- उपचारेण सम्पूज्य वाक्यमेतदुवाच ह॥ २९ सामग्रियोंसे उनकी पूजा की, फिर इस प्रकार कहा— 'देवदेव! आप धन आदि जो-जो वस्तु माँगेंगे, वह सब यद्यत्प्रार्थयसे मां त्वं देवदेव धनादिकम्। तत्सर्वं तव दास्यामि मां याचस्वाद्य वामन ॥ ३० मैं आपको दूँगा; इसलिये वामनजी! आज आप मुझसे याचना कीजिये' ॥ २८-३०॥ इत्युक्तो वामनस्तत्र नृपेन्द्र बलिना तदा । 'नृपेन्द्र! बलिके यों कहनेपर उस समय देवेश्वर भगवान् वामनने उनसे यही याचना की कि मुझे याचयामास देवेशो भूमेर्देहि पदत्रयम् ॥ ३१ अग्निशालाके लिये केवल तीन पग भूमि दीजिये, मुझे धनकी आवश्यकता नहीं है' ॥ ३११/२॥ ममाग्निशरणार्थाय न मेऽर्थेऽस्ति प्रयोजनम्। इत्युक्तो वामनेनाथ बलिः प्राह च वामनम् ॥ ३२ भगवान् वामनके यों कहनेपर बलिने उनसे कहा— 'यदि तीन पग भूमिसे ही आपको संतोष है तो तीन पदत्रयेण चेत्तृप्तिर्मया दत्तं पदत्रयम्। पग भूमि मैंने आपको दे दी' ॥ ३२१/२॥ एवमुक्ते तु बलिना वामनो बलिमब्रवीत् ॥ ३३ बलिके द्वारा यों कहे जानेपर भगवान् वामन उनसे बोले—'यदि आपने मुझे तीन पग भूमि दे दी तो मेरे दीयतां मे करे तोयं यदि दत्तं पदत्रयम्। हाथमें संकल्पका जल दीजिये' ॥ ३३१/२॥ इत्युक्तो देवदेवेन तदा तत्र स्वयं बलिः ॥ ३४ कहते हैं, उस समय वहाँ देवदेव भगवान् वामनजीके In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth