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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

• हिन्दी निरुक्त ( ५०० ) १२ अ० २ पा० ७ ख० •
( खं० ७ )
निरु० "पथस्पथः परिपतिं वचस्या कामेन कृतो
अभ्यानडर्कम् । सनो रासच्छुरुधश्चन्द्राग्रा। धि-
यन्धिषं सीषधाति प्रपूषा ॥" [ ऋ०सं० ७,१,८,८
य०वा०सं० ३४,४२ ]
पथस्पथः अधिपतिं वचनेन कामेन कृतः अभ्या-
नङ् अर्कम्, अभ्यापन्नः अर्कम्-इतिवा । स नो
ददातु चायनीयाग्राणि धनानि । कर्म कर्म च नः
प्रसाधयतु पूषा-इति ॥
अथ यद्विषितो भवति तद्-
'विष्णुः' । विशतेर्वा । व्यश्नोतेर्वा ।
तस्य एषा भवति ॥ ७ (१८) ॥
अर्थः- "पथस्पथः" इस ऋचा का ऋजिश्वन् ऋषि
और पूषा के हविः में पञ्च अहन् में व्यूढ में विनियोग है ।
'वचस्या' (वचनेन) स्तुतिरूप वचन से 'कामेन' और
कामना से 'कृतः' किया हुआ या प्रेरित हुआ (अहम्) मैं
'पथस्पथः' [सर्वेषां मार्गाणाम्] पथ पथ के या सब मार्गों के
'परिपतिम्' (अधिपतिम्) अधिपति 'अर्कम्' सूर्य (पूषा)
को 'अभ्यानट् [अभ्यापन्नः] प्राप्त हुआ हूं या शरणागत
हुआ हूं । 'सः' वह 'पूषा' पूषा देव 'नः' हमें 'चन्द्राग्राः'
(चायनीयाग्राणि) धर्म से प्राप्त हुये हुये 'शुरुधः' (धनानि)
धनों को 'रासत् (ददातु) देवे । 'धिय' धियम् (कर्म कर्म

हिन्दी निरुक्त ( ५०१ ) १२ अ० २ पा० ८ खं०
च, और कर्म कर्म को या सब कर्मों को 'प्रसीपधाति' (प्रसा-
धयतु ) सिद्ध करे, - यह हम चाहते हैं ॥
“अथ यद्०” अब जो 'विषित' व्याप्त होता है, यह
विष्णु' [११] होता है- व्याप्ति अर्थ में 'विषु' (जु०उ०)
धातु से है। अथवा प्रवेश अर्थ में 'विश' (तु०प०) धातु से है
क्योंकि-वह विभु होने से सर्वत्र प्रवेश किया हुआ होता है
अथवा व्याप्ति अर्थ में 'वि-अश' (स्वा०आ०) धातु से है।
“ तस्य० ” उस 'विष्णु' [११] की यह ऋचा है
॥ ७ ( १८) ॥
(खं० ८)
निरु०- “ इदं विष्णु र्विचक्रमे त्रेधा निदधे
पदम् । समूळ्हमस्य पांसुरे ॥” ऋ० सं० १, २,
७, २ । य० वा० सं० ५, १५ । सा० सं० छ० आ०
८, २, ५, २ । अथ० सं० ७, २६, ४ ॥
यद् इदं किञ्च तद् विक्रमते विष्णुः त्रिधा
निधत्ते पदं त्रेधा भावाय,-पृथिव्याम्, अन्तरिक्षे
दिवि, - इति शाकपूणिः ।
समारोहणे, विष्णुपदे, गयशिरसि- इति
और्णवाभः ।
समूळ्व् हमस्य 'पांसुरे' प्यायने अन्तरिक्षे ।
पदं न दृश्यते ।

हिन्दी निरुक्त ( ५०२ ) १२अ० २पा० ८ खं०,
अपिवा उपमार्थे स्यात्- समूळ्हमस्य पांसुले
इव पदं न दृश्यते- इति ।
‘पांसवः’ पादैः सूयन्ते- इति वा । पन्नाः
शेरते इति वा । पिंशनीया भवन्ति— इति
वा ॥८ (१९)॥
इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य द्वितीयः
पादः ॥१२, २, ॥
अर्थः- “इदं विष्णुः०” इस ऋचा का मेधातिथि
ऋषि और प्रायश्चित्त तथा आज्योसादन (घृत के स्थापन)
में विनियोग है ।
'इदम्' इस नानाविभाग से अवस्थित जगत् को 'विष्णुः'
विष्णु (आदित्य देव ) 'विक्रमते' (अधितिष्ठति) अधिष्ठित
होता है— दबा कर स्थित होता है। कैसे ? ‘त्रेधा पदं
निदधे” (त्रिधा निधत्ते पदं त्रेधाभावाय) तीन प्रकार से-
पद (पैर) को रखता है- पार्थिव अग्नि होकर पृथिवी में जो
कुछ है, उस पर अधिकार करके रहता है, अन्तरिक्ष में वि-
द्युत्(बिजली)के रूप से और द्युलोक में सूर्य के रूप से अधि-
कृत होता है- ऐसा त्रेधाभाव (तीन रूप) शाकपूणि आचार्य
मानते हैं ।
समारोहण = उदय गिरिमें उदय होता हुआ विष्णु देव
एक पद धरता है, मध्यान्ह काल में विष्णु पद (आकाश) में
दूसरा और सायंकाल में गयशिर (अस्तंगिरि = अस्ताचल)
पर तीसरा पद रखते हैं, यह और्णवाभ आचार्य मानते हैं ।

हिन्दी निरुक्त (५०३) १२ अ० २ पा० ८ खं०
"समूढम् अस्य पांसुरे प्यायने = अन्तरिक्षे
पदं न दृश्यते" पांसुर = प्यायन = सब भूतों की वृद्धि
के कारण = अन्तरिक्ष में इसका पद 'समूढ' गुप्त है- अन्तरिक्ष
लोक में जो विष्णु देव का विद्युत् रूप पद है, वह स्थायिरूप
से नहीं दिखाई देता, किन्तु शीघ्र ही अन्तर्धान होजाता है।
"अपिवा" अथवा उपमा अर्थ में होसकता है- "समूह-
म् अस्य पांसुले इव पदं न दृश्यते" मध्यम लोक में
रखा हुआ इसका पद रेतीले स्थान में रखे हुये पैर के समान
नहीं दिखाई देता-रेतीले स्थान से पैर उठाते हैं, उस स्थान में
झट पट रेत भरजाने से पैर का चिन्ह शीघ्र मिट जाता है,
ऐसे ही विष्णु देव का विद्युत् रूप पद भी शीघ्र अन्तर्धान
होजाने से फिर नहीं दिखाई देता ।
'पांसु' (धूलिये) क्यों ? 'पादैः सूयन्ते' पैरों से पैदा होती
हैं-पैरों के पृथिवी में आघात या रगड़ से पैदा होजाती हैं
इससे 'पांसु' हैं। अथवा वे प्रोप्त होकर सोती हैं- उत्पन्न
होकर पड़ी रहती हैं। अथवा वे पिशनीय या ध्वंसनीय होने
से 'पांसु' हैं। क्यों कि- वे जिस पर गिर जाती हैं, वह
अच्छी तरह दिखाई नहीं देता, अतः वे हिसनीय या हटा
देने योग्य होती हैं ॥८(१६) ॥
इति हिन्दी निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥१२,२॥
तृतीयः पादः ॥
निघ०-विश्वानरः ॥१२॥ वरुणः १३
केशी ॥१४॥ केशिनः ॥१५॥ वृषाकपिः

हिन्दी निरुक्त ( ५०४ ) १२अ० ३पा० २ खं०
॥१६॥ यमः ॥१७॥ अजएकपात् ॥१८॥
पृथिवी ॥१९॥ समुद्रः ॥२०॥ दध्यङ्
॥२१॥ अथर्वा ॥२२॥ मनुः ॥२३॥
( खं० १ )
निरु०- 'विश्वानरो' व्याख्यातः।
तस्य एष निपातो भवति ऐन्द्रयाम्-ऋचि१(२०)
अर्थ:- 'विश्वानर' (१२) शब्द व्याख्यान किया जा-
चुका है (७, ६, १) ।
“तस्य०” उस (विश्वानर) का यह इन्द्र देवता की
ऋचा में निपात है ॥१ (२०)॥
(खं० २)
निरु-० “विश्वानरस्य वस्पति मनानतस्य
शवसः। एवैश्च चर्षणीनामूती हुवे रथानाम् ॥”
(ऋ० सं० ६, ५, १, ४ । सा० सं० छ० आ० ४,
२ ३, ५) ॥
विश्वानरस्य आदित्यस्य अनानतस्य शवसो
महतो बलस्य एवैश्च कामैः अयनैः अवनैः र्वा
चर्षणीनां मनुष्याणाम्, ऊत्या च पथा रथानाम्
इन्द्रम् अस्मिन् यज्ञे ह्वयामि ॥
'वरुणः' व्याख्यातः ।
तस्य एषा भवति ॥२ (२१) ॥

हिन्दी निरुक्त (५०५) १२ अ० ३ पा० २ खं०
अर्थः– “विश्वानरस्य ०” यह ऋचा इन्द्र देव-
ता के “आत्वा रथं यथोतये” इस सूक्त में है, इस
का प्रियमैध ऋषि और निष्केवल्य(शस्त्र)में विनियोग है।प्रयोज-
न— उक्त सूक्त तथा इस प्रस्तुत ऋचा में स्तुति इन्द्र देवता की
है, उसी इन्द्र की प्रशंसा में किसी सम्बन्ध से विश्वानर
आया हुआ है, यही इसका यहां निपात है। क्यों कि- अन्य
देवता की स्तुति में अन्य देवता किसी सम्बन्ध से आवे तो
उसका वहां वह निपातहोता है, यह इस उदाहरण केअनुसार
अन्यत्र भी देखना चाहिये ।
‘विश्वानरस्य’ (आदित्यस्य) आदित्य के ‘अनानतस्य’ अन्य
ज्योतियों से अतिरस्कृत = न दबे हुए ‘शवसः’ (महतो बल-
स्य) महान् ज्योतिर्बल के ‘पतिम्’ पति (इन्द्रम्) इन्द्र को
‘चर्षणीनाम्’ (मनुष्याणाम्) मनुष्यों के ‘एवैः’ (च कामैः) कामों
(अर्थों) के निमित्त (अयनैः) गमन (चलने फिरने) के निमित्त
(अवनै र्वा) अथवा रक्षाके निमित्त ‘रथानाम्’ रथों के ‘ऊती’
(ऊत्या च पथा) मार्ग से ‘हुवे’ (अस्मिन् यज्ञे ह्वयामि) इस
यज्ञ में आवाहन करताहूं = बुलाता हूं ॥
‘वरुणः’ (१३) ‘वरुण’ शब्द व्याख्यान किया जाचुका
है (१०, १, ३)
“तस्य० उस (वरुण) की यह ऋचा है॥२ (२१)॥
[ खं० ३ ]
निरु०-“येनापावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु
त्वं वरुण पश्यसि ॥” (ऋ०सं० १।४।७,५ । सा०
सं०आर०आ० ५ द० ११) ।

| हिन्दी निरुक्त (५०६) १२ अ० ३ पा० ३ खं०
'भुरण्युः' इति क्षिप्रनाम । भुरण्युः शकुनिः ।
भूरिम् अध्वानं नयति स्वर्गस्य लोकस्यापि वोढा
तत्सम्पाती भुरण्युः अनेन पावक ! ख्यानेन ।
भुरण्यन्तं जनाँ अनु । त्वं वरुण पश्यसि । तत्ते
वयं स्तुमः इति वाक्यशेषः ।
अपिवा उत्तरस्याम् ॥ ३ (२२) ॥
अर्थ:-"येना पावक चक्षसा०" ये सब ऋचाएं
प्रस्कण्व ऋषि की हैं और अश्विनों के शस्त्र में इनका विनि-
योग है।
हे 'पावक '! 'वरुण '! 'येन' जिस 'चक्षसा' (ख्यानेन)
दृष्टि (दर्शन) से 'जनान्-अनु' (पूर्वान् पुण्यकृतः जनान्
अनु) पूर्व पुण्यवानों के पीछे 'भुरण्यन्तम्' जल्दी २ देवमार्ग
से स्वर्ग को जाते हुए अग्नि को आधान करने वाले जन को
'त्वं' तू 'पश्यसि' देखता है (तत् ते वयं स्तुम) उस तेरे
दर्शन (देखने) को हम स्तुति करते हैं। यह वाक्यशेष है-
भाष्यकार ने "येन" पद के जोड़ के लिये या उसकी अपेक्षा
को पूर्ण करने के लिये "तत् ते वयं स्तुमः" यह "तत्"
पद वाला वाक्य अध्याहार किया है। इस प्रकार जहां मन्त्रों
मे अधूरा वाक्य रह जाये, वहां उस २ मन्त्रार्थ के अनुकूल
अध्याहार कर लेना चाहिये, यह भाष्यकार ने दिखाया है।
"भुरण्युः०" 'भुरण्यु' यह शीघ्र का नाम है। 'भुरण्यु'
शकुनि = पक्षी होता है। क्यों ? "भूरिम् अध्वानं नयति"

बहुत मार्ग को लेजाता है चला जाता है । ‘स्वर्गस्य लोक-
स्यापि वोढा’ तथा स्वर्ग लोक को लेजाने वाला अग्नि भी
‘भुरण्यु’ है! “स्वर्गाय लोकाय अग्निश्चीयते” ‘स्वर्ग
लोक के लिये अग्नि चयन (स्थापन) किया जाता है’- यह
श्रुति है। ‘तत्संपाती’ उसके साथ जाने वाला - अग्नि को
चयन करने वाला अग्नि से युक्त जन कर्म के अनुष्ठान से
उत्पन्न हुए अदृष्ट को लेकर स्वर्ग लोक के प्रति जाता है, वह
“भुरण्यति” (शीघ्र जाता है) कहा जाता है, उसी
“भुरण्यति” पद से ‘भुरण्यत्’ शब्द बनता है, जिस का
रूप मन्त्र में ‘भुरण्यन्तम्’ है । सुतराम् यह ‘भुरण्यत्’
शब्द ‘भुरण्यु’ शब्द से नामधातु के संस्कार द्वारा बना है ॥
“अपिवा०” ऐसा भी है, जैसा कि—यह कहा गया,
और ऐसा भी दूसरे प्रकार से [व्याख्यान] है, जैसा कि—
उत्तरा = अगली ऋचामें इस पूर्व ऋचा को मिला देने से होता
है-॥ ३ [ २२ ] ॥
( सं० ४ )
निरु०-“येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ
अनु त्व वरुण पश्यसि ॥
विद्यामेषि रजस्पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः ।
पश्यञ्जन्मानि सूर्य ॥”
व्येषि द्यां रजश्च पृथु महान्तं लोकम् अहानि
च मिमानः अक्तुभिः रात्रिभिः सह पश्यन् जन्मानि
जातानि सूर्य ! ।

हिन्दी निरुक्त ( ५०८ ) १२अ० ३पा० ५ खं०
अपिवा पूर्वस्याम् ॥४(२३॥
अर्थः-“येना पावक ” ! हे पावक ! वरुण ! जिस
दृष्टि से पूर्व सुकृति जनों के पीछे जाते हुए अग्नि-पूजक जन
को तू देखता है, उसी दृष्टि से युक्त होकर तू द्याम्' द्युलोक
को 'वि-एषि' विविध प्रकार से या अतिशय से जाता है,
'पृथु रज:' [ महान्तं लोकम् अन्तरिक्षम् ] और बड़े लोक =
अन्तरिक्ष को 'अक्तुभिः' [ रात्रिभिः सह ] रात्रियों के सहित
'अहा' [ अहानि च ] दिनों को 'मिमान' ( कुर्वन् ) करता
हुआ 'जन्मानि' [ जातानि ] तथा उत्पन्न हुई वस्तुओं को
'पश्यन्' देखता हुआ 'सूर्य'! हे सूर्य ! तू जाता है ।
“अपिवा०" अथवा उत्तरा (अगली) ऋचा में एक
वाक्यता हो सकती है, अथवा तो पूर्व ऋचामें भी एक वाक्यता
होसकती है- जिस प्रकार पूर्वोक्त रीति से अध्याहार के द्वारा
प्रस्तुत ऋचा का अर्थ पूरा होसकता है, और उत्तर ऋचा के
साथ उसे मिला देने से उसका पूर्ण अर्थ होजाता है, उसी
प्रकार इस ऋचा को पूर्व ऋचा में भी मिला देने से वह
कार्य हो सकता है, जैसा कि- आचार्य आगे पढ़ता है-
॥ ४ ( २३ ) ॥
( खं० ५ )
निरु०-“येना पावक चक्षषा भुरण्यन्तं जनाँ
अनु त्वं वरुण पश्यसि ॥
प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषान्
प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे ॥”

हिन्दी निरुक्त ( ५०९ ) १२ अ० ३पा० ६खं०
प्रत्यङ् इदं सर्वम् उदेषि, प्रत्यङ् इदं सर्वम् इदम्
अभिविपश्यसि-इति ।
अपिवा एतस्यामेव ॥ ५ (२४) ॥
अर्थः- हे वरुण ! पावक! जिस ख्याति या प्रज्ञा से या
जिस अनुग्रह बुद्धिसे सुकृती जनों के पीछे जाते'हुये अग्नि-
मान् जन को देखता है, उसी ख्याति या बुद्धि से "प्रत्यङ्
देवानां विशः" देवताओं के निवासों को प्रत्यङ् = अभि-
मुख या संमुख करके 'उदेषि' तू उदय होता है "प्रत्यङ्
उदेषि मानुषान्" मनुष्यों के सामने करके उदय होता है
"प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे" हे स्वः ! आदित्य ! ( प्रत्यङ्
इदंसर्वम् उदेषि ) इस सब जगत् को सामने करके तू उदय
होता है [प्रत्यङ् इदं सर्वम् अभिविपश्यसि] इस सब जगत्
को तू अभिमुख देखता है ॥
"अपिवा०" अथवा यदि पूर्व ऋचा में भी एक वाक्यता
न हो, और उत्तर ऋचा में भी एक वाक्यता न हो, तो भी
इसी प्रस्तुत ऋचा में व्याख्यान होसकता है ॥५ (२४)॥
(खं० ६ )
निरु०- "येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ
अनु त्वं वरुण पश्यसि ॥"
तेन नो जनान् अभिविपश्यसि ॥
'केशी' केशाः रश्मयः, तैः तद्वान् भवति ।
काशनाद् वा । प्रकाशनाद् वा ।

• हिन्दी निरुक्त ( ४१० ) १२ अ० ३ पा० ६ खं०
तस्य एषा भवति ॥६ (२५) ॥
अर्थः— "येना पावक०" हे पावक ! वरुण जिसबुद्धि
से सुकृती या पुण्यात्मा जनों के पीछे चलने वाले सुकृती को
देखता है, उसी बुद्धि से हम लोगों को भी देखता है ॥
प्रथम व्याख्यान में भी अध्याहार किया था 'तत् ते
वयं स्तुमः" उस तेरे ख्यान = दर्शन को हम स्तुति करते
हैं) और इस चौथे व्याख्यानमें भी अध्याहार ही किया है—
“तेन नो जनान् अभिविपश्यसि” [उस ख्यान से तू
हम लोगों को देखता है], इनमें पहिले की अपेक्षा इस दूसरे
अध्याहार में क्या विशेष है ?
प्रथम अध्याहार में “तत् ते वयं स्तुमः” इस प्रकार
स्तुति से मन्त्रार्थ पूर्ण किया है और इसमें “तेन नो जनान्
अभिविपश्यसि” [उससे तू हम लोगों को देखता है या
देख] इस प्रकार आशिषा ( प्रार्थना ) से पूरा किया है।
यह दोनों अध्याहारों में भेद है क्यों कि—मन्त्रों में स्तुति
और प्रार्थना का नित्य सम्बन्ध है, यह सप्तमाध्याय में
विस्तार से निरूपण किया है। इस लिये दोनों अध्याहारों
से ही मन्त्रार्थ की पूर्ति हो सकती है, तथा पूर्व उत्तर मन्त्रों
में भी जोड़ने से पूर्ति हो सकती है । यह साकाङ्क्ष्य या
अधूरे मन्त्रों में सर्वत्र ही एक वाक्यता या व्याख्यान के पूर्ण
करने का प्रकार दिखाया है ।
'केशी' [१४] ( आदित्य ) क्यों ? 'केश' नाम रश्मि ओं
(किरणों) का है, उनसे वह केशवान् होने से 'केशी' है ।

हिन्दी निरुक्त ( ५११ ) १२अ० ३पा० ७ख०

अथवा काशन से 'केशी' है । अथवा प्रकाशन से 'केशी' है ।
दोनों में अर्थ और धातु समान हैं ॥
“तस्य०” उस ( केशी ) की यह ऋचा है ॥६[२५]॥
[ खं० ७ ]
निरु०-“केश्य१ग्निं केशी विषं, केशी विभर्त्ति
रोदसी । केशी विश्वं स्वर्दृशे केशीदं ज्योतिरु-
च्यते ॥” [ ऋ०सं० ८, ७, २४, १ ] ॥
केशी अग्निं च विषं च ।
'विषम्'-इति उदकनाम । विष्णातेः = विपूर्वस्य
स्नातेः शुद्धार्थस्य । विपूर्वस्य वा सचतेः । द्यावा-
पृथिव्यौ च धारयति । केशी इदं सर्वम् इदम्
अभिविपश्यति केशी इदं ज्योतिः उच्यते ।
इत्यादित्यम् आह ।
अथापि एते इतरे ज्योतिषी केशिनी उच्येते ।
धूमेन अग्निः, रजसा च मध्यमः ।
तयोः एषा भवति ॥ ७ [२६] ॥
अर्थः- "केश्यग्निं०" इस ऋचाका जूतिनाम ऋषि है।
'केशी' देव 'अग्निं बिभर्ति" अग्नि को धारण कर
ता है- वर्षा से जल के द्वारा ओषधियों ही उत्पन्न कर के
आहुति के द्वारा अग्निका पोषण करता है । "केशीविषम्"
केशी विषको धारण करता है- 'विष' यह जल का नाम है

• हिन्दी निरुक्त ( ५१२ ) १२ अ० ३ पा० ४ खं० _
'विष्णाति' = शुद्धि अर्थ में 'वि' (उप०) और 'स्ना' (अदा०
प०) धातु का है। क्यों कि— वह विशेष करके वस्त्र आदि
को शुद्ध कर देता है। अथवा 'वि' (उप०) 'सच' (भ्वा० आ०)
धातु का है। क्यों कि — वह सब जगह लगा हुआ रहता है।
“केशी रोदसी बिभर्ति” केशी द्यावा पृथिवी दोनों
लोकों को धारण करता है— उनमें रहने वाले प्राणियों पर
अनुग्रह करता है। “केशी विश्वं स्वर्दृशे” केशी (स्वः)
आदित्य [इदम् अभिविपश्यति] इस सब को भले प्रकार देखता
है । '“केशी इदं ज्योतिः उच्यते” 'केशी' यह आदित्य
रूप ज्योति कहाता है । इस यह प्रकार मन्त्र 'केशी' नामसे
आदित्य को कह रहा है ॥
और भी ये दूसरे ज्योति प्रथम और मध्यम केशी कहे
जाते हैं। उनमें धूम [धूप'] से अग्नि केशी (केश वाला) है ।
क्यों कि-वह जब प्रज्वलित होता है, तबभी उसमें धूआं केश
जैसा रहता है। और मध्यम (वायु) रूप रहित होनेके कारण
अप्रत्यक्ष होता हुआ भी धूली से प्रतीत होता है- वह वायु
आता है, इससे मध्यम वायु धूलि से केशी है और विद्युत्
[बिजली] के रूपमें वह जलसे केशी है-जलसे वह केश वाला
जैसा प्रतीत होता है ।
“तयो०” उन दोनों [प्रथम और मध्यम = अग्नि
और वायु] की यह ऋचा है ॥१ (२६) ॥
[ खं० ८ ]
निरु०- “ त्रयः केशिन ऋतुथा विचक्षते
संवत्सरे पवत एक एषाम् । विश्वमेको अभिचष्टे

हिन्दी निरुक्त ( ५१३ ) १२अ० ३पा० ८ खं०
शचीभि ध्राजिरेकस्य ददृशे न रूपम् ॥” ( ऋ०
सं० २, ३, २२, ४ । अथ० सं० ९, १९, ६) ॥
त्रयः केशिनः ऋतुथा विचक्षते काले काले
अभि विपश्यन्ति । संवत्सरे वपते एकः एषाम्-
इति- अग्निः पृथिवी दहति । सर्वम् एकः अभि
विपश्यति कर्मभिः आदित्यः ।। गतिः एकस्य
दृश्यते न रूपं मध्यमस्य ।
अथ रश्मिभिः अभिप्रकम्पयन् एति तद् -
'वृषाकपिः' भवति । वृषाकम्पनः
तस्य एषा भवति ॥ ८ (२७) ॥
अर्थः- “त्रयः केशिनः०” इस ऋचा का दीर्घतमा
ऋषि है । महाव्रत में वैश्वदेव शस्त्र में शस्त होती है ।
“त्रयः केशिनः ऋतुथा (काले काले) विचक्षते
(अभिविपश्यन्ति)” तीनों केशी (अग्नि वायु और
सूर्य) समय समय पर संमुख देखते हैं— काल के अनुसार
अपने कर्माधिकार के सहित अनुग्रह से लोक को अनुगृहीत
करते हैं । “एषाम् एकः [ अग्निः ] संवत्सरे वपते
(पृथिवीं दहति)” इनमें एक पार्थिव अग्नि संवत्सर
में पृथिवी को दग्ध करता है [ ऐसा होने से वह कर्मयोग्य
बन जाती है ] । “एकः (आदित्यः) शचीभिः (कर्म-
भिः) विश्वम् अभिविचष्टे (अभिविपश्यति)” एक

हिन्दी निरुक्त ( ५१४ ) १२अ० ३पा० ६ खं०
आदित्य अपने अधिकार युक्त कर्मों से विश्व को देखता है,
या लोक को अपने २ कर्मों से युक्त देखता है। क्योंकि—
रात्रिमें सब लोक सोया हुआ रहता है, और जब दिन होता
है, तो सब प्राणी अपने २ कर्म में लग जाते हैं। “एकस्य
( मध्यमस्य ) भ्राजिः ( गतिः ) दहशे [दृश्यते]
न रूपम्” और एक मध्यम ( वायु ) की गति उठी हुई
धूलिसे या जलसे देखी जाती है, किन्तु रूप (आकृति) नहीं।
“अथ रश्मिभिः” और जब आदित्य अपनी रश्मिओं
से भूतों को कंपाता हुआ आता है, तब 'वृषाकपि' ( १६ )
होता है । क्योंकि-अवश्यायों ( ओसों ) का वर्षिता (बरसाने
वाला ) है और भूतों का कम्पन ( कंपाने वाला ) है [ क्यों
कि-जब भगवान् सूर्य तेज दिखाई नहीं देते, तब सब लोक
भय से डरने लगता है ] इससे 'वृषाकपि' है ।
“तस्य०” उस ( वृषाकपि ) की यह ऋचा है—॥८(२७)॥
( खं० ६ )
निरु०-“पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै ।
य एष स्वप्ननंशनोऽस्तमेषि पथा पुनार्विश्वस्मा-
दिन्द्र उत्तरः ॥” [ ऋ०सं० ८, ४, ४, ६ ] ॥
पुनः एहि वृषाकपे ! सुप्रसूतानि वः कर्माणि
कल्पयावहै, यः एष स्वप्ननंशनः स्वप्नान् नाश-
यति आदित्यः उदयेन, सः अस्तम् एषि पथा,
पुनः, सर्वस्माद् यः इन्द्रः उत्तरः तम् एतद् ब्रूमः
आदित्यम् ।

हिन्दी निरुक्त ( ५१५ ) १२अ० ३पा० १०खं०
'यमः' व्याख्यातः ।
तस्य एषा भवति—॥ ९ (२८) ॥
अर्थः-“पुनरेहि वृषाकपे०” इस ऋचा का वृषाकपि
ऋषि है, और पृष्ठ्य के षष्ठ (छठे) अहन् में ब्राह्मणाच्छंसी के
शस्त्र में विनियुक्त है ।
'वृषाकपे !' हे वृषाकपि देव ! “यः एषः त्वं स्वप्न-
नंशनः ( स्वप्नान् नाशयति उदयेन आदित्यः )
अस्तम् एषि पथा” जो यह तू अपने उदय से लोगों के
स्वप्नों का नाश करने वाला ( निद्रा का भङ्ग करने वाला )
आदित्य अपने मार्ग से अस्त को प्राप्त होता है । “ ( यश्च
त्वं ) विश्वस्मात् ( सर्वस्मात् ) इन्द्रः उत्तरः ” और
जो तू सब से ऊंचा या बड़ा है, ( सः त्वम् ) सो तू “पुनः
एहि” फिर आ-उदय को प्राप्त हो । “सुविता, (सुप्र-
सूतानि वः कर्माणि) कल्पयावहै” फिर हम दोनों
तुम्हारे प्रवृत्त हुये शुभ कर्मों को साधें (करें) (.तम् एतद् ब्रूमः
आदित्यम् ) उस आदित्य को हम यह कहते हैं ॥
‘यम ’ ( १७ ) शब्द व्याख्यान किया जा चुका है
[ १०, २, ६ ] ।
“तस्य०” उस (यम) की यह ऋचा है-॥ ६(२८) ॥
[ खं० १० ]
निरु०-“यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे देवैः सम्पिबते

यमः । अत्रा नो विश्पतिः पिता पुराणाँ अनु
वेनति ॥” ( ऋ०सं० ८,७,२३,१ )
यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे स्थाने वृतक्षये । अपि
वा उपमार्थे स्याद्-वृक्ष इव सुपलाशे-इति ।
‘वृक्षः’ व्रश्चनात् ।
‘पलाशं’ पलाशनात् ।
देवैः संगच्छते यमः, रश्मिभिः आदित्यः । तत्र
नः सर्वस्य पाता वा, पालयिता वा, पुराणान्
अनुकामयेत ।
‘अज एकपाद्’ अजनः एकः पादः । एकेन
पादेन पाति-इतिवा । एकेन पादेन पिबति इति
वा । एकः अस्य पादः इतिवा ।
“ एकं पादं नोत्खिदति ” इत्यपि निगमो -
भवति ।
तस्य एष निपातो भवति वैश्वदेव्याम् ऋचि
॥ १० ( २९ ) ॥
अर्थः— “यस्मिन् वृक्षे” इस ऋचा का यामायन (यम
का पुत्र ) कुमार ऋषि है ।
‘यस्मिन्’ जिस‘सुपलाशे(सुष्ठु पराशीर्णमले = दीप्तिमति)
सुन्दरमल रहित या प्रकाशमान ‘वृक्षे’ ( आदित्यमण्डले )

हिन्दी निरुक्त ( ५१७ ) १२ अ० ३ पा० १० खं०
वृक्ष = आदित्य मण्डल में अथवा- 'वृक्षे' (वृत्तक्षये) पुण्यवान्
पुरुषों से युक्त निवास में 'यमः' (आदित्य.) यम = आदित्य
'देवैः' (रश्मिभिः) रश्मियों से 'संपिबते' (संगच्छते) (अस्तं-
गच्छन्) अस्त को प्राप्त होता हुआ मिलता है- अस्त काल में
उनके साथ एक रूप होजाता है, 'अत्र' यहां 'नः' हमको
'विशपतिः पिता' (सर्वस्य पाता वा पालयिता वा ) प्रजाओं
का पति, पिता सब का रक्षक आदित्य (तत्र) वहां के (आदि-
त्य लोक के) निवासियों = 'पुराणान्' पुराने = पहिले के
गये हुए पुरुषों के समान 'अनुवेनति' (अनुकामयेत = सम्प्रीण-
यतु) पुण्य कर्म या उनको (अपनेको) प्राप्त कराने वाली विद्या
से पालन करे- वह आदित्य देव अपने लोकमें रहने वाले अपने
भक्तों की जिस प्रकार वहां रक्षा करता है, उसी प्रकार
यहां पृथिवी लोक में रहने वाले हम लोगों की भी रक्षा करे
(यह नैरुक्त पक्ष में व्याख्या है) ॥
ऐतिहासिक पक्ष में-(अपिवा उपमार्थे स्याद्वृक्ष इव सुप-
लाशे ) 'यम पितृराज सुन्दर पत्तों वाले वृक्ष के समान अपने
सुख निवास याँ लोकमें अपने अनुचरों के साथ मिलता है।
वह यमदेव'यहां अपने घरों में रहते हुए हम लोगों की उन
के लोकमें रहने वाले पितरों के समान रक्षा करे', ऐसी व्या-
ख्या होती है ॥
वृक्ष (आदित्य) क्यों ? व्रश्चन (छेदन) से । क्यों कि- वह
अपनी गति से काल को अतिक्रमण या उल्लङ्घन करता हुआ
सब प्राणियों की आयुओं को क्षीण करता है ।
पलाश (पत्ते) क्यों ? पलाशन ( खाने ) से । क्यों कि-
उसे पशु आदि अशन करते हैं- खाते हैं ॥

,हिन्दी निरुक्त ( ५१८ ) १२अ०२पा० ११ खं०-
'अज एकपात्' (१४) (आदित्य) क्यों? अजन, गमन =
पर) एकपाद (पैर) है- आदित्य ब्रह्म का चलने वाला
एक पैर है, क्यो कि- " अग्निः पादो वायुः पाद
आदित्यः पादो दिशः पादः" अग्नि एकपाद है, वायु
एकपाद है, आदित्य एकपाद है, और दिशाएं एक पाद
हैं, इस प्रकार ये ब्रह्म के पाद स्तुति में बताए हैं, इसी के
अनुसार आदित्य का 'अज एकपात्' यह नाम है।
अथवा 'एकेन पादेन पाति- इति वा।' एकपाद
(अंश) से जगत्‌की रक्षा करना है- सोने के समय प्राण रूप
से अन्न का पाक करके रक्षा करता है, और अजन(चलनेवाला)
है, इससे 'अज एकपात्' है।
'एकेन पादेन पिबति इति वा' अथवा एक पाद [अंश]
से सब जगत् से जल को पीता है और अजन है, इससे 'अज
एकपात् ' है
'एकः अस्य पादः इति वा' अथवा इसके एक पाद है-
सारे संसार मे इसका जीव रूप एक पाद प्रविष्ट है औरअज-
न है, इससे 'अज एकपात्' है ।
"एकं पादं नो त्खिदंति" अर्थात्- अपने एक
अंश को नहीं उखाड़ता या नहीं उठाता है, यह भी
निगम है ॥
"तस्य०" उस ( अज एकपाद् ) का विश्वेदेवों की
ऋचा में यह निपात है ॥ १० (२६) ॥
(खं० ११)
निघ०- "पावीरवी तन्यतुरेकपादजो दिवो

धर्त्ता सिन्धुरपः समुद्रियः । विश्वे देवासः शृणवन्
वचांसि मे सरस्वती सह धीभिः पुरन्ध्या ॥ ”
[ऋ० सं० ८, २, ११, ३] ॥
'पविः' शल्यो भवति । यद् विपुनाति कायम्
तद्वत्- 'पवीरम्' आयुधम् । तद्वान् इन्द्रः -
'पवीरवान्' ।
“अति तस्थौ पवीरवान् ” [ऋ० सं० ८, १,
२४, ३) । इत्यपि निगमो भवति ।
तद्देवता वाक् 'पावीरवी' पावीरवी च दिव्या
वाक्, 'तन्यतुः' तनित्री वाचः अन्यस्याः अजश्च
एकपाद् दिवो धारयिता च सिन्धुश्च आपश्च
समुद्रियाः च सर्वे च देवाः सरस्वती च सह पुर-
न्ध्या स्तुत्या प्रयुक्तानि धीभिः कर्मभिः युक्तानि
शृण्वन्तु वचनानि इमानि- इति ॥
'पृथिवी' व्याख्याता ।
तस्या एष निपातो भवति ऐन्द्र्याम् ऋचि।११,३०।
अर्थः- “पावीरवी तन्यतुः” इस ऋचा का वणुकर्ण
ऋषि और वैश्वदेव शस्त्र में विनियोग है ।
'पावीरवी' मध्यम लोक की वाक्- 'तन्यतु' अन्यस्याः
वाचः तनित्री जो अन्यमनुष्य आदिकों की बातोंको विस्तार