निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( २६५ ) १० अ० १ पा० ७ खं०
अग्निभी 'रुद्र' कहा जाता है।
"तस्य०" उस अग्नि रुद्र की यह ऋचा है॥ ७ ॥
व्याख्या ।
जिस 'रुद्र' की यहां व्याख्या है, वह रुद्र मध्यलोक के
वायु आदि देवताओं में तीसरा देवता है, उसी की स्तुति
"याते दिद्युत्०" मन्त्र से है। किन्तु 'रुद्र' देव के मध्यम
होने पर भी इस मन्त्र में 'उसकी रची हुई 'दिद्युत्' (रोग-
देवता) द्युलोक में और पृथिवी लोक में भी विचरती है,
कहा गया है। इस से इसका मध्यम होना संशय-युक्त होता
है ? तथापि "सभी देवता द्युलोक स्थान के ही हैं"
"किन्तु उनके कर्माधिकार के स्थान अलग २
नियत हैं" जैसे एक स्थान [ देश ] के मनुष्य भिन्न २
देशों में राज्य करें । यह बात इस मन्त्र के "दिवस्परि"
वाक्य से जानी जाती है। इसी से पृथिवीस्थान अग्नि के
अधिकार में ( अ० ७ पा० ४ खं० २) "अग्निमीळे०"
इस निगम में "देव" शब्द की व्याख्या भाष्यकार इस
प्रकार करते हैं-
"देवो दानाद् वा। दीपनाद् वा। द्योतनाद्
वा। द्युस्थानो भवति-इति वा ।"
अर्थात्-यहां "देव" क्यों है ! अथवा द्युस्थान होता है
इस का प्रयोजन यह है कि - जिस का द्युलोक स्थान
है वह 'देव' है। इसी व्याख्या के आधार पर 'देव' पद के
हिन्दी निरुक्त ( ३६६ ) १० अ० १ पा० ७ खं०
सम्बन्ध से सभी देवता द्य स्थान हैं सभी देवताओं का द्युलोक
स्थान समान है। कर्माधिकार स्थान तो अग्नि का पृथिवी,
इन्द्र का अन्तरिक्ष और आदित्य का द्युलोक है।
ऐसे ही रुद्रदेवता का कर्माधिकार तीनों लोकों में भी
बताया हुआ है -
“नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि येषां वर्षमिषवः । ”
( य० वा० सं० १६, ६४) अर्थात्- जो रुद्र द्युलोक में रहते हैं,
और जिनका वृष्टि ही वाण हैं,-जो वृष्टि अतिवृष्टि आदि
क्लेशों के द्वारा प्राणियों को मारते हैं, उन रुद्रों के लिये
नमस्कार है । वृष्टिकर्म द्य लोक से होता है, और द्य लोक में
ही रुद्रों की स्थिति तथा वृष्टि ही उनके आयुध हैं, इस प्रकार
इस मन्त्र में रुद्रों का कर्माधिकार स्थान द्युलोक कहागया ।
“नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो येऽन्तरिक्षे येषां वातइषवः।”
[ य० वा० सं० १६, ६५ ] अर्थात्-जो रुद्र अन्तरिक्ष में रहते
हैं, जिन के वायु ही आयुध हैं, कुवायु से अन्न को नाश करके
अथवा वायु रोग को उत्पन्न करके प्राणियों को मारते हैं,
उन रुद्रों के अर्थ नमस्कार हो । वायु का अन्तरिक्ष स्थान
प्रसिद्ध है ।
“नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये पृथिव्यां येषामन्नमिषवः । ”
[ य० वा० सं० १६,६६ ] । अर्थात्-जो रुद्र पृथिवी में रहते
हैं, जिनके अन्न ही आयुध = शस्त्र हैं, जो कदन्न [सड़े अन्न]
के भक्षण में जनों को प्रवृत्त करके अथवा चोरी में प्रवृत्त
करके उन्हें रोगी करके मारते हैं उन रुद्रों के अर्थ नमस्कार हो
इस सब कथन का सार यह है कि-सब देवताओं का
हिन्दी निरुक्त ( २६७ ) १० अ० १ पा० ८ खंड
लोक या मुख्य स्थान द्युलोक है, भिन्न २ लोक उनके कर्माधि-
कार को लेकर ही बताए हैं ॥ ७ ॥
( खं० ८ )
निरु०-“जराबोध तद्विविड्ढि विशे विशेयज्ञि-
याय। स्तोमं रुद्राय दृशीकम्॥”[ऋ०सं० १, २, २३, ५]
( सा० सं० छ० आ० १, १, २, ५) ॥
‘जरा’ स्तुतिः । जरतेः स्तुतिकर्मणः । तां बोध
तया बोधयितः ! इति वा । तद् विविड्ढि तत्
कुरु मनुष्यस्य मनुष्यस्य यजनाय स्तोमं रुद्राय
दर्शनीयम् ॥
‘इन्द्रः’ इरां दृणाति-इति वा ।
इरां ददाति- इति वा ।
इरां दधाति-इति वा ।
इरां दारयते-इति वा ।
इन्दवे द्रवति- इति वा ।
इन्दौ रमते-इति वा ।
इन्धे भूतानि-इति वा ।
“ तद्यदेनं प्राणैः समैन्धं स्तदिन्द्रस्येन्द्रत्वम्
इति विज्ञायते ”
इदं करणाद्-इति-आग्रायणः ।
इदं दर्शनाद्-इति औपमन्यवः ।
हिन्दी निरुक्त (२६८) १० अ० १पा० ८ खं०
इन्द्ते वा ऐश्वर्यकर्मणः ।
इन्धन्-शत्रूणां दारयिता वा, द्रावयिता वा ।
आदरयिता वा यज्वनाम् ।
तस्य-एषा भवति- ॥ ८ ॥
अर्थः—" जरा बोध० " इस ऋचा का शुनः शेप
ऋषि है । " अश्वं न त्वा वारवन्तम्० " ( ऋ० सं० १
मं० ६ अ० ४ सू०) इस सूक्त में प्रातरनुवाक में विनियोग है ।
हे भगवन् ! अग्ने ! रुद्र ! 'जरा' ( स्तुतिः ) जो यह तेरी
स्तुति मुझसे उच्चारण की जा रही है, ( ताम् ) उसको (बोध )
जान । अथवा हे 'जराबोध !' ( तया बोधयितः ! ) उस
स्तुति के द्वारा होतृ कर्म में वर्त्तमान हुआ यजमानों के
अभिमत अर्थ को सम्पादन करने वाले ! = सिद्ध करने वाले !
'यजिष्ठाय' यज्ञ के करने वाले 'विशे-विशे' ( मनुष्याय
मनुष्याय ) मनुष्य मनुष्य के लिये अथवा ( मनुष्यस्य मनुष्य-
स्य यजनाय ) मनुष्य मनुष्य के यजन के अर्थ 'तत्' वह 'वि-
विड्ढि ' (कुरु) कर—जो तेरा यज्ञ में कर्त्तव्य है । उससे वह
मनुष्य देवताओं के स्तोता तुझ रुद्र के लिये 'दृशीकम्' (दर्शनी-
यम् ) दर्शनीय या श्रवणीय 'स्तोमम्' स्तोत्र को (करिष्यति)
करेगा ।
“ यो अग्नौ रुद्रो यो अप्स्वन्तर्य ओषधीर्वी-
रुध आविवेश । य इमा विश्वा भुवनानि चाक्ल-
पे तस्मै रुद्राय नमो अस्त्वग्नये ॥ ” ( अथ० सं०
७, ८७, १ ] ॥
हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) १० अ० । पा० = खं०
अर्थात्-जो रुद्र अग्नि में जो जलों में जो ओषधियों के
मध्यमें, वीरुध् (तृणों) के मध्य में प्रवेश किये हुए है, जिसने
इनमें प्रवेश किया था, जिसने इन सब भुवनों को बनाया है
उस रुद्र अग्नि को नमस्कार हो । इस मन्त्र में स्पष्ट ही अग्नि
और रुद्र का अभेद है ॥
'इन्द्र' ( ४ ) क्यों ? इरा (अन्न) को विदारण करता है-
वर्षा से बीज को भिगोकर अङ्कुर उत्पन्न करता हुआ उसे
फाड़देता है। इस प्रकार यह 'इरादार' का 'इन्द्र' नाम है।
यही देवताओं के नामों की परोक्षता है, कि वे प्रत्यक्ष वृत्ति
शब्दों के संक्षेप या विकृत शब्द रूप हैं। 'इन्द्र' शब्द का
पूर्व भाग 'इरा' शब्द से है और दूसरा भाग 'दृणाति' से या
'दार' से है। जैसे "अग्रणी" से "अग्नि"। ऐसे परोक्ष
नाम देवताओं को बहुत प्रिय हैं, वे प्रत्यक्ष प्रशंसा के नामों
से अप्रसन्न होते हैं। जैसा कि-
“परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः”
( ब्राह्मण ) ।
यही प्रकार अन्य देवताओं के नामों के अर्थों में ध्यान
में रखना चाहिए।
देवता अपने तत्व को अपने नाम में छिपाकर अविद्वानों
से सदा परोक्ष = अप्रत्यक्ष रहते हैं, किन्तु विद्वान् पुरुष उनके
नामों की व्युत्पत्ति के द्वारा दिव्य दृष्टिसे उनके आत्मतत्व
को जानकर उनके स्वरूपको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार देवता-
ओं के नामों की व्युत्पत्ति में सकल पुरुषार्थ = मनुष्य का
सम्पूर्ण आङ्कित स्थापित है, इसी सिद्धि के लिये देवता
नामों के निर्वचन में महान् यत्न किया जाता है।
हिन्दी निरुक्त ( ३०० ) १० अ० १ पा० ४ खं०
और देवताओं में भी इन्द्र देवता अध्यात्म और अधिदैवत
दोनों अर्थों में सब से अधिक स्तुति का भाग लेने वाला है,
और देवताओं से इनमें अधिक महिमा है, इस कारण इस के
नाम की व्याख्या को आचार्य बहुत ही विस्तार से करते हैं।
अथवा इरा को देता है, इससे इन्द्र है। इराद = इरा-
दाता = इन्द्रः ।
अथवा 'इरां दधाति' इरा (अन्न) को धारण करता है।
'इराध' = इराधारयिता = इन्द्र।
अथवा 'इरां दारयते' इरा (अन्न) को दारण करता है।
अथवा 'इरां धारयते' 'इरा' (अन्न) को धारण करता है।
अथवा 'इन्दवे द्रवति' इन्दु (सोम) के लिये द्रुत होता
है = चलता है।
अथवा 'इन्दौ रमते' इन्दु (सोम) में रमता है।
अथवा 'इन्धे भूतानि' भूतों को = प्राणियों को अन्न
की उत्पत्ति के अधिदेव में स्थित हुआ अथवा अध्यात्म में
स्थित हुआ भोजन कराने के द्वारा द्युतिमान् = कान्तिमान्
करता है, सो यह "इन्ध = इन्द्र" है।
और यह दूसरा इन्द्र का इन्द्रपना ब्राह्मण में कहा है-
"तद् यदेनं प्राणैः०" जो कि-इसे प्राणों के अधि-
देवताओं ने समिन्धन = सन्दीपन किया है, यही इन्द्रका
इन्द्रत्व है, यह जाना जाता है।
इदंकरण से इन्द्र है-इस जगत् को इसने बनाया है इस
से यह इन्द्र है,-यह आग्रायण आचार्य मानते हैं।
इदं दर्शन से इन्द्र है-इस जगत् को इसने देखा है, इस
से यह 'इन्द्र' है, यह औपमन्यव आचार्य मानते हैं।
अथवा ऐश्वर्य अर्थ में 'इन्द' (भ्वा० प०) धातु से है।
हिन्दी निरुक्त ( ३०१ ) १० अ० १पा० ६खं०
क्योंकि-वह ऐश्वर्यवान् है, इससे वह 'इन्द्र' है ।
अथवा 'इन्दत्' ऐश्वर्ययुक्त होता हुआ शत्रुओं का दारणा
करने वाला है, अथवा द्रावण करने वाला = भगाने वाला है,
इससे 'इन्द्र' है ।
अथवा यज्बनों का = यज्ञ करने वालों का आदर करने
वाला है, इस से इन्द्र है ।
“तस्य०” उस इन्द्र की यह ऋचा है-॥८॥
( खं० ६ )
निरु०-“अद॑र्दरुत्स॒मसृ॑जो॒ विखा॑नि॒ त्वम॑र्ण॒वान्
बद्वबधानां॑ अरम्णाः । म॒हान्त॒मिन्द्र॒ पर्व॑तं॒ वि
यदद्वः सृ॒जो विधा॑रा॒ अव॑ दान॒वं हन् ॥” (ऋ०सं०
४,१,३२,१ सा०सं०छं०आ० ४,१,३,३)
अहृणाः उत्सम् ।
'उत्सः' उत्सरणाद् वा । उत्सदनाद् वा । उत्स्य-
न्दनाद् वा । उनत्तेर्वा ।
व्यसृजः अस्य खानि । त्वम् अर्णवान् = अर्ण-
स्वतः एतान् माध्यमिकान् संस्त्यायन् बाबध्य-
मानान् अरम्णाः । 'रम्णातिः' संयमनकर्मा,
विसर्जनकर्मा वा ।
“महान्तमिन्द्र ! पर्वतम्” मेघं यद् व्यवृणोः ।
व्यसृजः अस्य धारा अवहन् एनं 'दानवं' दान-
कर्माणम् ।
हिन्दी निरुक्त ( ३०२ ) १० अ० १ पा० ६ खं०
तस्य एषा अपरा भवति ॥९॥
अर्थ :- “अदर्दः०” इस ऋचा का गातु आत्रेय ऋषि
है । हे भगवन् ! ‘इन्द्र !’ ‘त्वम्’ तैने ‘उत्सम्’ ( मेघम् ) मेघ
को ‘अदर्दः’ ( अहनाः ) फाड़ा, ‘अस्य’ इस (मेघ) के ‘खानि’
(बिलानि) छिद्रों को ‘वि-असृजः’ खोला, (त्वम्) तैने ‘अर्ण-
वान्’ ( अर्णस्वतः एतान् माध्यमिकान् बाबध्यमानान् संस्त्या-
यान् ) इन जल से भरे हुए मध्यलोक के मेघ समूहों को
‘अरम्णाः’ इकट्ठा किया है—वश में किया है, या रचा है,
या छोड़ा है । ‘यत्’ जोकि-‘महान्तम्’ बड़े ‘पर्वतम्’ ( मेघम् )
मेघको जो अन्य का खुले द्वार करना अशक्य था, ‘खि-वः’
( व्यवृणोः ) खोल दिया है,—उसके जल के बहाने वाले द्वार
खोल दिये हैं, उससे ‘दानवम्’ ( एनं उदकदातारं मेघम् )
इस जलके देने वाले मेघको ‘अव-हन्’ हनन करते हुए ने
‘तैने ‘धाराः’ धाराओं को ‘विसृजः’ छोड़ा है ।
‘उत्स’ (मेघ) कैसे ? उत्सरणा ( ऊपर को गमन ) करने
से । अथवा उत्सदन से—ऊपर को सन्न ( बैठा हुआ ) जैसा-
होने से । अथवा उत्स्यन्दन से ऊपर अवस्थित होकर स्यन्दन
करता है = बहता है, इससे ‘उत्स’ है । अथवा भिगोने अर्थ
में ‘उन्द्’ (रु०) धातुसे है । क्योंकि—वह सब जगत् को गीला
बना देता है इससे उन्दन करने से यह ‘उत्स’ है ।
“अरम्णाः” पद में ‘रभ’ ( क्रया० प० ) धातु संयमन
अर्थ में है। अथवा विसर्जन अर्थ में है ।
‘दानव’ क्या ? दानकर्मा = देने वाला ॥
“तस्य०” उस इन्द्र की यह और ऋचा है—पहिले कहा
हिन्दी निरुक्त ( ३०३ ) १० अ० १ पा० १० ख०
है कि इसके रसानुप्रदान (१) वृत्रवध (२) और जो कोई
बलकृति (३) कर्म हैं, उनमें रसानुप्रदान और वृत्रवध पूर्व
उदाहरण में दिखाया गया अब बलकृति के अर्थ यह और
ऋचा है ॥ ६ ॥
(खं० १०)
निरु०-“यो जात एव प्रथमो मनस्वांन्देवो देवा-
न्क्रतुना पर्यभूषत् । यस्य शुष्माद् रोदसी अभ्य-
सेतां नृम्णस्य महा सजनास इन्द्रः ॥” [ऋ० सं०
२, ६, ७, १ ] ॥
यो जायमान एव प्रथमो मनस्वी देवो देवान्
‘क्रतुना’ कर्मणा पर्यभवत्, पर्यगृह्णात्, पर्य्यरक्षत्,
अत्यक्रामद्-इति वा। यस्य बलात् द्यावापृथिव्यौ
अपि अबिभीताम्, नृम्णस्य महा बलस्य महत्वेन
स जनास इन्द्र इति ॥
ऋषिरिष्टार्थस्य प्रीतिर्भवति आख्यानसंयुक्ता ।
‘पर्जन्यः’ तृपेः आद्यन्तविपरीतस्य। तर्पयिता
जन्यः ।
परो जेता वा । परो जनयिता वा । प्रार्जयिता
वा रसानाम् ।
तस्य एषा भवति ॥१०॥
अर्थः-“यो जात एव०” इस ऋचा का गृत्समद ऋषि
हिन्दी निरुक्त ( ३०४ ) १० अ० १ पा० १० खं०
है। इन्द्र मनस्वान् के लिये पुरोडाश होता है, उसकी यह
याज्या है।
गृत्समद् इन्द्र देव के वरदान से इन्द्र के सदृश रूप को
प्राप्त होगया था, जब वह इन्द्र जैसा आकृति वाला होगया,
तो उसे देखकर असुरों ने उसे इन्द्र समझा, और उसे मारने
की ठानी, कि- 'अब यह मरुद् गणों (देवताओं) के बिना
अकेला है, इसे हम मार सकेंगे, इस विचार से उन्हों ने
गृत्समद को घेर लिया । तब उसने डर कर इस सूक्त से इन्द्र
की स्तुति की, और असुरों को अपने को ब्राह्मण बताया-
'यः' जो 'जातः' (जायमानः) 'एव' उत्पन्न होते ही
'प्रथमः' (मुख्यः सर्वभूतानाम्) सब प्राणियों के प्रति मुख्य हुआ
और 'मनस्वान्' (मनस्वी) मेधावी हुआ । क्यों कि- और
मनुष्य समय पाकर क्रम से प्रधान और मेधावी होते हैं,
और इन्द्र देव अपने जन्म के साथ ही इन गुणों से युक्त
होता है, यह उसका अन्यों की अपेक्षा अतिशय है। 'देवः'
देव इन्द्र ने 'देवान्' और देवताओं को 'क्रतुना' (कर्मणा)
कर्म से 'पर्यभूषत्' (पर्यभवत्) दबाया है- देवतापने में समान
होने पर भी और देवों पर कर्म से अपना आधिपत्य स्थापन
किया है। अथवा (पर्यगृह्णात्) अपने स्वामित्व से उन्हें सब
प्रकार अधीन किया है। अथवा (पर्यरक्षत) मुख्यता से रक्षित
किया है अथवा [अत्यक्रामत्] प्रभाव से उल्लङ्घन किया है।
'यस्य' जिसके 'शुष्मात्' (बलात्) बल से 'रोदसी' (द्यावा-
पृथिव्यौ-अपि, द्यावा-पृथिवी भी 'अभ्यसेताम्' (अबिभीताम्)
डरे हैं 'नृम्णस्य' (बलस्य = सैन्यस्य) सैन्य के 'महा' [महत्त्वेन]
अधिक होने से, 'यह हम दोनों को अवश्य दबायेगा' इस
हिन्दी निरुक्त ( ३०५ ) १० अ० १ पा० १० खं०
कारण द्यावापृथिवी भी दोनों जिसके बलसे डरे । 'जनासः!'
हे असुरजनों ! “सः-इन्द्रः” वह इन्द्र है, मैं इन्द्र नहीं,
मैं ब्राह्मण हूं, मैं उसी के वर से उसके समान रूप को प्राप्त
हुआ हूं ॥
अनधिकार में किसी उत्तम सम्पत्तिका मिलना भी अनर्थ-
कारी हो सकता है, यह उपदेश इस मन्त्र के आख्यान से
मिल सकता है।
“ऋषेर्दैष्टार्थस्य०” जिसने इन्द्र देव की मैत्रीका अनुभव
किया है,उस इन्द्रके सखा गृत्समद् ऋषिकी यहप्रीति=स्तुति
आख्यान = इतिहास-संयुक्त है—गृत्समद् ने इन्द्र की प्रीति
को इतने परिमाण तक प्राप्त कियो था कि—वह इतिहासमें
गाई जाती है, इतिहास में स्थिर होगई है।
इससे आचार्य ने दिखाया कि- मन्त्रों का ऐतिहासिक
अर्थ भी ढूंढना—मन्त्रों में इतिहास सम्बन्धी भी अर्थ हैं।
'पर्जन्य' ( ५ ) शब्द तृप्ति अर्थ में 'तृप' (दि० प० )
धातु का उसके आदि और अन्त के अक्षरों को बदलने से है-
'तर्पयिता जन्यः' (सब देश का तृप्त करने वाला)। पूर्व भाग
'तृप्' धातु से और उत्तर भाग 'जन्यः' शब्द से है।
अथवा 'परो जेता' (बड़ा जीतने वाला) होने से 'पर्जन्य'
है । 'पर' शब्द से पूर्व पद और 'जि' (स्वा०प० ) धातु से
उत्तरपद है ।
अथवा ' परो जनयिता ' ( बड़ा उत्पन्न करने वाला )
वही पूर्वपद और 'जन' (दि०) धातु से उत्तर पद है।
अथवा 'प्रार्जयिता रसानाम्' (रसों को संग्रह करने
हिन्दी निरुक्त ( ३०७ ) १० अ० १ पा० १२ खं०
(अनपराधः) निरपराध 'उत [अपि] भी 'वृष्यावतः' (वर्ष-
कर्मवतः) बरसते हुए (इस मेघ से) (भीतः) डरा हुआ
'ईषते' (पलायते) भागता है, 'यत्' जब कि-'पर्जन्यः'
पर्जन्य देव 'स्तनयन्' गर्जता हुआ = वज्र को छोड़ता हुआ
'दुष्कृतः' (पापकृतः) पापकारियों को 'हन्ति' मारता है ॥
अर्थात्-जब पर्जन्य देव वज्रपात से पापकारियों को मारता
है, तो सभी मनुष्य हमें यह मारता है, इस बुद्धि से भागते
हैं । वह ऐसा । महानुभाव पर्जन्य हमारे लिये बरसे ॥
'महावध' क्यों ? इसका वध महान् है । क्योंकि-जिसे
मारता है, वह फिर बचता नहीं ॥
'बृहस्पति' (६) क्यों ? वह 'बृहतः पाता वा' इस
बृहत् (विस्तृत) जगत् को पालन करने वाला है । अथवा
'बृहतः पालयिता' (वही अर्थ है इससे 'बृहस्पति' है ।
“तस्य०” उस बृहस्पति की यह ऋचा है- ॥ ११ ॥
(खं० १२)
निरु०-“अश्नापिनद्धं मधु पर्यपश्यन्मत्स्यं न
दीन उदनि क्षियन्तम् । निष्कज्जभार चमसं न
वृक्षाद् बृहस्पति विरवेणा विकृत्य ॥” [ऋ०सं०
८, २, १८, २ ] ॥
अशनवता मेघेन अपिनद्धं मधु पर्यपश्यत् ।
मत्स्यम्-इव दीने उदके निवसन्तं निर्जहार तत्,
चमसम्-इव वृक्षात् ॥
हिन्दी निरुक्त ( ३०८ ) १० अ० १पा० १२खं०
'चमसः' कस्मात् ? चमन्ति अस्मिन्-इति ।
बृहस्पतिः 'विरवेण' शब्देन विकृत्य ॥
'ब्रह्मणस्पतिः' ब्रह्मणः पाता वा । पालयिता वा ।
तस्यैषा भवति — ॥ १२ ॥
अर्थः- "अश्नापिनद्धम्०" इस ऋचा का अयास्य
आङ्गिरस ऋषि है ।
'अश्मा' (अशनवता) व्यापन वाले या व्यापने वाले
(मेघेन) मेघ से 'अपिनद्धम्' अपने भीतर लेकर बांधे हुए =
ढांपेहुये = औरोंके अदृश्य 'मधु' (उदकम्) जलको 'पर्यपश्यत्'
(बृहस्पति ने) देखा । 'तत्' उस (जल) को 'दीने' घटते
हुए 'उदनि' (उदके) जलमें क्षियन्तम्' [निवसन्तं] बसते
हुए 'मत्स्यं-न [इव] मछली को जैसे 'निः-जभार' (निर्ज-
हार) निकाला । 'वृक्षात्' वृक्षसे 'चमसम्' 'न' (इव) चमस
पात्र के समान — जैसे कोई बढई वृक्षसे काट कर चमस (कठ-
डिया) पात्रको निकाल लेवे, उसी प्रकार बृहस्पति देवने मेघसे
जलको निकाला । किस प्रकार ? 'विरवेण' [शब्देन] शब्द
के साथ 'विकृत्य' काटकरके ।
'चमस [पात्र] क्यों ? 'चमन्ति अस्मिन्' इसमें चमन
(भक्षण) करते हैं ।
'ब्रह्मणस्पति' (७) क्यों ? 'ब्रह्मणः पाता वा' वह
ब्रह्म का (वेदका) पालन करने वाला है । अथवा पालयिता
है [वही अर्थ] ।
"तस्य०" उस 'ब्रह्मणस्पति' की यह ऋचा है— ॥१२॥
हिन्दी निरुक्त ( ३०६ ) १० अ० १ पा० १३ खं०
[ खं० १३ ]
निरु०- “ अश्मास्य मवतं ब्रह्मणस्पति र्मधु-
धारमभि यमोजसा तृणत् । तमेवविश्वे पपिरे स्व-
र्दृशो बहु साकं सिसिचुरुत्समुद्रिणम् ॥” [ऋ०सं०
२, ७, १, १] ॥
अशनवन्तम् आस्यन्दनवन्तम् । अवातितं
ब्रह्मणस्पतिर्मधुधारम् अभि यम् 'ओजसा' बलेन
अभ्यतृणत् तम्-एव सर्वे पिबन्ति रश्मयः सूर्य्यदृशो
बहु एनं सिञ्चन्ति उत्सम् 'उद्रिणम्' उदकवन्तम् ॥१३॥
इति दशमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥१०, १॥
अर्थः- “अश्मास्यमवतम्०” इस ऋचा का गृत्समद
ऋषि है।
'ब्रह्मणस्पतिः' ब्रह्मणस्पति देवने 'अश्मास्यम्' (अशन-
वन्तम् आस्यन्दनवन्तम्) उदक (जल) की व्यापन क्रिया से
अशन = व्यापन वाले और जलकी स्यन्दन = झरनाक्रिया
से आस्यन्दन वाले 'मधुधारम्' (उदकं धारयितारम्) जलको
धारण करने वाले 'यम्' जिस(मेघम्) मेघको 'ओजसा' (बलेन)
बल से 'अभि—अतृणत्' सम्मुख मारा (फोड़ा) । 'तम्-एव'
उसही 'अवतम्' (अवाङ्मलितम्) नीचे की ओर पृथ्वी पर
गिरे हुये को 'विश्वे' (सर्वे) सब स्वर्दृशः' सूर्य की रश्मियों
ने 'पपिरे' (पिबन्ति) पान किया अथवा वे इसको पानकरती
हैं। फिर वर्षा काल में (रश्मयः = सूर्य्यदृशः) सूर्य की किरणें
'बहु' बहुत 'साकम्' (सह) एक साथ 'एनम्' इस 'उत्सम्'
(मेघम्) मेघको 'उद्रिणम्' (उदकवन्तम्) जल युक्त (करते हुये)
'सिसिचुः' (सिञ्चन्ति) सींचती हैं ॥ जो ब्रह्मणस्पति देव
प्रति वर्ष इस प्रकार मेघ को खोलता है, वह हमारे लिये ऐसा
करे, यह आशीः जोड़ लेना चाहिये ॥
इति हिन्दी निरुक्ते दशमाध्यायस्य प्रथमः पादः॥१०,१॥
द्वितीयः पादः ।
(खं० १)
निघ०— क्षेत्रस्यपतिः ॥८॥ वास्तो-
ष्पतिः॥६॥ वाचस्पतिः॥१०॥अपांनपात्
॥११॥यमः॥१२॥मित्रः॥१३॥कः॥१४॥
सरस्वान् ॥१५॥
निरु०– क्षेत्रस्य पतिः । 'क्षेत्रं' क्षियतेर्निवास-
कर्मणः, तस्य पाता वा । पालयिता वा ।
तस्य एषा भवति ॥१(१४) ॥
अर्थः- 'क्षेत्रस्य पतिः' [ ८ ] क्या ? 'क्षेत्र' निवासार्थक
'क्षि' (तु० प०) धातु से है । क्यों कि-उसके आश्रय से कुटुम्बी
घर में निवास करते हैं । उसका पति (स्वामी) 'क्षेत्रस्य पतिः
है । ये दो पद अलग २ हैं, किन्तु मन्त्र में वैसे ही हैं, इस
लिये समाम्नाय में भी वैसे ही पढ़ दिये हैं ।
“तस्य०” उस क्षेत्रस्यपतिः (क्षेत्रपति) की यह ऋचा
है ॥ १, (१४) ॥
हिन्दी निरुक्त ( ३११ ) १० अ० २ पा० २ ख०
( खं० २ )
निरु०-“क्षेत्रस्य पतिना वय हितेनेव जयामसि।
गामश्वं पोषयित्न्वा त्सख्या) सनो मृलातीदृशे॥”
( ऋ०सं०३ ८, ९, १ )
क्षेत्रस्य पतिना वयं सुहितेन- इव जयामः, गाम्,
अश्वं, पुष्टं पोषयितृ च आहर-इति। “सनोमृलाति
ईदृशे” बलेन वा धनेन वा ।
‘मृलतिः’ दानकर्मा वा पूजाकर्मा वा ॥
तस्य एषा अपरा भवति ॥२ (१५)॥
अर्थः-“क्षेत्रस्य पतिना वयम्०” इस ऋचाका वाम-
देव ऋषि है। क्षेत्र पति के अर्थ चरु की पुरोनुवाक्या है।
‘क्षेत्रस्य पतिना’ क्षेत्र के पति से ‘वयम्’ हम ‘ सुहितेन
इव’ किसी उत्तम आप्त = प्रामाणिक = प्रतिष्ठित मित्र से जैसे
संयुक्त होकर ‘जयामसि’ (जयामः) जीतें या समर्थ हों। [कैसे
‘गाम्’ गौको ‘अश्वम्’ घोड़ेको ‘पोषयित्नु’ [पुष्टं पोषयितृ च]
और जो वस्तु स्वयम् पुष्ट हो और पोषण करने वाली हो,
उसे ‘आ’ (हर) ला, ऐसे । अर्थात्- क्षेत्रपति देव के प्रसाद से
गौ घोड़े और अच्छे पदार्थ जो सुखदायक हों हमें मिलें,और
दास दासी भी मिलें, जिनसे हम कहे ‘यह ला’ ‘वह ला’
इत्यादि । ‘सः’ वह ‘क्षेत्रपति देव ‘नः’ हमारे लिये ‘ ईदृशे’
ऐसे भोग के लिये अभीष्ट धनों को ‘मृलाति’ (ददातु) देवे या
[पूजयतु] पूजे ।
‘मृलति’ धातु दान अर्थ में या पूजा अर्थ में है ॥
हिन्दी निरुक्त (३१२) १० अ० २धा० ३ खं०
“तस्य०” इस क्षेत्रपति की यह और दूसरी ऋचा है-[१५
• (खं० ३)
निरु०- “क्षेत्रस्य पते मधुमन्तमूर्मिं धेनुरिव
पयो अस्मासु धुक्ष्व । मधुश्चुतं घृत मिव सुपूत-
मूतस्य नः पतयो मृळयन्तु ॥” (ऋ०सं०३,८,९,२) ।
क्षेत्रस्य पते मधुमन्तम् ऊर्मिं धेनुः- इव पयः
अस्मासु धुक्ष्व- इति मधुश्चुतं घृतम्- इव उदकं
सुपूतम् ऋतस्य नः पातारो वा पालयितारो वा
मृळयन्तु ।
‘मृळयतिः’ उपदयाकर्मा पूजाकर्मा वा ॥
तद् यत्समान्याम्- ऋचि समानाभिव्याहारं
भवति, तद् ‘जामि’ भवति,-इति-एकम् । “मधु-
मन्तं” “मधुश्चुतम्”- इति यथा ॥
यदेव समाने पादे समानाभिव्याहारं भवति तद्
‘जामि’ भवति- इति- अपरम् । “हिरण्यरूपः स
हिरण्यसंदृक्” इति यथा ॥
यथा कथा च विशेषः ‘अजामि’ भवति- इति
अपरम् । “मण्डूका इवोदकान्मण्डूका उदका-
दिव” इति यथा ।
‘वास्तोष्पतिः’ ‘वास्तुः’ वसतेर्निवासकर्मणः ।
तस्य पाता वा पालयिता वा ।
हिन्दी निरुक्त ( ३१३ ) १० अ० १ पा० ३ खं०
तस्य एषा भवति ॥३ (१६)॥
अर्थ:-"क्षेत्रस्यपते०" इस ऋचा का भी वामदेव ऋषि
है। विनियोग महाव्रत में है। अदिति के लियेचरुरूप चारवार
स्तनग्रह होता है, उसका तृतीय स्तनग्रह इस ऋचा से ग्रहण
किया जाता है ।
'क्षेत्रस्य पते !' हे क्षेत्रपति देव ! 'धेनुः' गौ 'पयः'- इव
दूध को जैसे [ त्वम् ] तू ' अस्मासु' हमारे लिये 'मधुमन्तम्'
मिठास वाले 'मधुश्चुतम्' मिठास के झरने वाले , घृतम्-इव
सुपूतम्' घृतके समान सुन्दर निर्मल = निर्दोष 'ऊर्मिम्' जल
समूहको 'धुक्ष्व' दुह या दे = बरस । 'ऋतस्य' जलके 'पतयः'
(पातारो वा पालयितारो वा ) स्वामी या अधिष्ठाता क्षेत्र
पति आदि देवता 'नः' हमें 'मृळयन्तु ' ( रक्षन्तु ) रक्षाकरें
( पूजयन्तुवा ) अथवा सत्कार करें ॥ ' मृळयति '
( मृल-खिच् ) धातु अथवा उपद्या अर्थ में अथवा पूजा
अर्थ में है ॥
“तद्यत्समान्यामृचि०” सो-जो पद समानी = समान
या एक ऋचा में समान अर्थ को कहता है-दूसरे पद से ऋचो
के पूर्वार्द्ध में जो कुछ अर्थ कहा गया है,उसी अर्थ को ऋचा
उत्तरार्द्ध में जो पद कहता है, वह पदजामि होता है । यहएक
मत है । जैसे उक्त मन्त्र में “मधुमन्तम्” “मधुश्चुतम्”
[ये दो पद हैं ।] [क्यों कि— जो 'मधुश्चुत्' मधु का चुवाने
[मधुको बरस ने वाला] होता है, वह अवश्य ही 'मधुमान्'
मधुवाला होता है । इससे यहां “ मधुश्चुतम् ” यह पद
'जामि' होता है ।
हिन्दी निरुक्त ( ३१४ ) १० अ० २पा० ३ खं०
“यदेव समाने पादे०” जो ही पद एक पाद में दूसरे
पदसे व्यवहित = अन्तरित होकर समान या वैसे ही अर्थ में
फिर कहा जाता है, वही पद 'जामि' होता है । यह दूसरा
मत है । जैसे- “ हिरण्यरूपः सहिरण्यसंदृक् ” ।
क्योंकि-जो हिरण्य रूप होता है, वह अवश्य ही हिरण्य
जैसा होता है । अतः 'हिरण्यसंदृक्' यह पद जामि (पुनरुक्त)
होता है ॥
“ यथा कथा च विशेषः,अजामि भवति-इति
अपरम् ” । जिस किसी प्रकारसे भी जो कुछ भी = थोड़ा
भी विशेष = भिन्न अर्थ होने से अजामि होता है । (क्योंकि
वेदमें जैसा देखा जाता है, उसी का अनुविधान = अनुसरण
या निर्वाह किया जाता है । वह अपौरुषेय या ईश्वरीय वाक्य
है, उसमें भ्रान्ति आदि दोषों की आशङ्का का भी संभव नहीं
है, अतः ऐसा यत्न करना चाहिये, जिस प्रकार जामि पद का
फल निकल आवे । यत्किंचित् विशेष से भी वह अजामि हो
जाता है ।) यह अन्य मत-तीसरा मत है । जैसे- “ मण्डूका
इवोदकान्मण्डूका उदकादिव ”इति । अर्थात्- मेंढक
जैसे जलसे, मेंढक जलसे जैसे ॥
'वास्तोष्पति' (१) क्या ? 'वास्तु' (घर) निवास अर्थ में
'वस' ( भ्वा० प० ) धातु से है । क्योंकि-उसमें मनुष्य निवास
करते हैं । उसके पति ( पाता या पालयिता ) को 'वास्तो-
ष्पति' कहते हैं । ( सो यह ' वास्तोष्पति ' रुद्ररूप मध्यम
लोक का देवता है । क्योंकि-“अमीवहा०” इस मन्त्र में
बलकृति ( बलकर्म ) लिङ्ग पाया जाता है ।
हिन्दी निरुक्त ( ३१५ ) १० अ० २ पा० ३ खं०
“तस्य०” उस वास्तोष्पति की यह ऋचा है-॥३(१६)॥
व्याख्या ।
‘जामि’ पदका मतभेद से लक्षण ।
‘जामि’ यह एक वैदिक संज्ञा है । अतएव यह अन्य
श्रौत तथा मान्त्रिक आवश्यक शब्दों के समान निर्वचनीय है
यद्यपि दैवत काण्ड में आनुपूर्वी से निघण्टुस्थ देवतानामों का
ही यहां निर्वचन होना उचित है, तथापि निरुक्त शास्त्र के
सकल शब्दों के अर्थ परिज्ञान में समुद्यम होने के कारण
मुख्य शब्दों में वे शब्द, जिनका निर्वचन या विचार किसी
विशेष व्युत्पत्ति को उत्पन्न करने वाला हो तथा जिसके
विचार का प्रभाव शास्त्र में व्यापक रूप से पड़ता हो । प्रसंग-
वश प्रकरण में आये हुये छोड़े नहीं जाते, यह आचार्य की
इस ग्रन्थनिर्माण में सार्वत्रिक ही विशेष शैली है। इसी से
यहां “क्षेत्रस्यपते” इस निगम में जामि पद भी आचार्य
का उपेक्षणीय नहीं है । क्योंकि-मन्त्रों में जामि अजामि
का प्रसंग प्रायः आता रहता है । 'जामि' यह वैदिक संज्ञा
है यह पहिले कहा गया है, तदनुसार भगवद्दुर्गाचार्य ने एक
श्रुति भी उद्धृत की है, जिसमें 'जामि' पद व्यवहृत हुआ है-
“जामि वा एतत्क्रियते यन्मरुत्वतीयो ग्रहो
गृह्यते मरुत्वतीयं शस्यते” अर्थात् - जामि ही वह
(यज्ञ) में किया जाता है, जो मरुत्वतीय ( मरुतों का ) ग्रह
ग्रहण किया जाता है, और मरुत्वतीय [ मरुतों का ] शस्त्र
किया जाता है ।