निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त । ५३
हो जाता है । उपमानमें खली और उपमेयमें संग्राम । 'खले'
पदके आगे 'न' पद उपमा वाचक 'यथा' के अर्थमें है ।
वैकुण्ठका अभिमान । मन्त्रमें वेकुण्ठने जो अभिमान किया है ।
वह इन्द्र पुत्र होनेके कारणसे है । पुत्र पर पिताका अविकल
स्वभाव आना प्राकृतिक है । इसी कारण हिन्दुओंमें कुलीनताका
विशेष आदर है ॥ ४ ॥
सङ्कृतियां—क्योंकि संग्राममें परस्परको योध्या व्याप्त करते हैं,
इस कारण संग्राम नामोंसे आगे व्याप्ति अर्थ वाले धातु कहे ।
क्योंकि संग्राममें पहले परस्परको व्यापन करते हैं, और फिर
मारते हैं, इससे व्याक्तिकर्म धातुओंके अनन्तर वधकर्म धातु
कहे गये ॥ ४ ॥
( ख० ५ )
[ निघ० ] विद्युत् ( १ )। नेमिः ( २ )।
हेतिः ( ३ )। नमः ( ४ )। पविः ( ५ )। सृकः
( ६ )। त्वकः ( ७ )। वधः ( ८ )। वज्रः ( ६ )।
अर्कः ( १० )। कुत्सः ( ११ )। कुलिशः ( १२ )।
तुजः ( १३ )। तिग्मम् ( १४ )। मेनिः ( १५ )।
स्वधितिः ( १६ )। सायकः ( १७ )। परशुः ( १८ )।
इति अष्टादश वज्रनामानि ॥ २० ॥
[ निघ० ] इरज्यति ( १ )। पत्यते ( २ )।
क्षयति ( ३ )। राजति ( ४ )। इति चत्वारः
ऐश्वर्यकर्माणः ॥ २१ ॥
५४ ३ अ० २ पा० खं० ५ ।
[ निघ० ] राष्टो ( १ ) । अर्यः ( २ ) । नियु-
त्वान् ( ३ ) । इन इनः ( ४ ) । इति चत्वारि
ईश्वरनामानि ॥ २२ ॥
अपः ( १ ) । तुक् ( २ ) । मनुष्याः ( ३ ) ।
आयतां ( ४ ) । भग्वः ( ५ ) । वश्मि ( ६ ) ।
अन्धः ( ७ ) । आवयति ( ८ ) । ओजः ( ९ ) ।
मघम् (-१०-) । अघ्ना ( ११ ) । रेलते ( १२ ) ।
हेलः ( १३ ) । वर्त्तते ( १४ ) । नु ( १५ ) । तलित्
( १६ ) । रणः ( १७ ) । इन्व॑ति ( १८ ) । दम्भोति
( १९ ) । दिद्यु॒त ( २० ) । इरज्यति ( २१ ) ।
राष्टो ( २२ ) । द्वाविंशतिः ( २२ ) ॥
इति निघण्टौ द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
[ निरु० ] “त्वया वयं सुवृधा ब्रह्मणस्पते स्पार्हा वसु
मनुष्या ददीमहि । या नो दूरे तडितो
या अरातयोऽभिषन्ति जम्भय़ाता अन-
प्नसः ॥”
[ ऋ० सं० २, ६, ३०, ४ ]
त्वया वयं सुवर्द्धयित्रा ब्रह्मणस्पते स्पृहणीयानि
वसू नि मनुष्येभ्यः आददीमहि । याश्च नो दूरे
हिन्दी निरुक्त । ५५
तडितो याश्च अन्तिके अरातयः अदान-
कर्माणो वा । अदान प्रज्ञा वा । जम्भयता
अनमशः । [ एकपद निरुक्तम् ] आभरिति
रूप नाम । ‘आप्नोति’ इति विद्युत् ‘तडित्’
भवति । इति शाक पूर्णिः । सा हि अवताडयिति
दूराच्च दृश्यते । अपि तु-इदमन्तिकनामैव अभि-
प्रेतं स्यात् । “दूरे चित् सन्तडिदिवा तिरोधत्से”
। [ ऋ० सं० १, ६, ३१, २ ] दूरेऽपि यन्नन्तिक इव
संन्दृश्यते-इति । वज्रनामानि उत्तराणि अष्टादश ।
‘वज्रः’ कस्मात् ? वर्जयति इति सतः । तत्र ‘कुत्स’
इत्येतत् कृन्ततेः । ऋषिः ‘कुत्सो’ भवति कर्त्ता
स्तोमानाम् इति औपमन्यवः । अत्रापि अस्य
वधकर्मैव भवति । “तत्सख इन्द्रः । शुष्णं
जघान” इति ।
ऐश्वर्यकर्म्माणः उत्तरे धातवश्चत्वारः । ईश्वर-
नामानि उत्तराणि चत्वारि । तत्र ‘इन’ इति
एतत् सनित ऐश्वर्येण वा । सनितमनेन-ऐश्वर्य-
मितिवा ॥ ५ ॥
५६ ३ अ० २ पा० ५ खं० ।
अर्थ ।
“त्वयावयम्” मन्त्रका गृत्समद ऋषि । जगती छन्दः । प्रवर्ग्यमें
विनियोग ।”
मन्त्रार्थ—हे ब्रह्मणस्पति देव ! सुन्दर बढ़ानेवाले तुमसे हम
वाञ्छनीय धनोंको दाता मनुष्योंसे लेवें । दूर देशमें जो शत्रु और
जो निकट देशमें शत्रु हमें तिरस्कार करते हैं उन कर्महीन या रूप
हीन शत्रुओंको तुम नाश करो ॥
नि० अ०—हे ब्रह्मणस्पति देव ! तुझ बढ़ानेवालेके कारणसे
वाञ्छनीय धनोंको मनुष्योंसे लेवें । जो हमारे दूर देशमें और
तडित् या निकटमें शत्रु हैं, हमें वाञ्छित अर्थों को देनेवालेके रोकने
वाले या स्वयम् देना नहीं चाहने वाले उन दोनों कुरूपोंको तुम
बेचेत करो । [ एक पदानि ] ‘अप्नस्’यह रूपका नाम है ‘आप्नोति’
व्यापन करता है, इस कतृ वाच्य क्रियासे है, ‘तडित्’ विद्युत् या
बिजली होती है यह शाकपूर्णि आचार्य मानते हैं । क्योंकि वह
ताडन करती है और दूरसे दिखाई देती है । किन्तु यह अन्तिक
या समीपका ही नाम अभिप्रायसे हो सकता है । [ उदाहरण ]
“दूरमें भी रहता हुआ समीपमें जैसा स्थित हुआ दिखाई पड़ता
है।” [ यहाँ ‘तडित्’ शब्दक समीप वाचकता अत्यन्त स्पष्ट है । ]
वधकर्म धातुओंके अनन्तर अठारह ( १८ ) वज्रके नाम हैं ।
‘वज्र” किस धातुसे है ? ‘वर्जयति’ इस ( चु० उ० ) कर्तृ वाच्य
धातुसे है । अर्थात् यह प्राणियोको प्राणोंसे वियुक्त कर देता है ।
[सन्देह-पद-] उन वज्र नामोंमे ‘कुत्स’ यह पद ‘कृतो’ छेदने
( तु० प० ) धातुसे है । ‘कुत्स’ ऋषि ( भी ) है । क्योंकि वह
स्तोम नाम कर्मों का करनेवाला है, यह औपमन्यव आचार्य मानते
हैं। इस ( ऋषि ) अर्थमें भी इस धातुका 'वध' अर्थ ही है ।
हिन्दी निरुक्त । ५९
क्योंकि उसके सखा इन्द्रने रसोंको शोषण करने वाले असुर या
मेघको मारा है ।
वज्र नामोंके अनन्तर चार (४) ऐश्वर्य अर्थवाले धातु हैं।
ऐश्वर्य कर्म धातुओंके अनन्तर चार (४) ईश्वरके नाम हैं।
उन ईश्वरके नामोंमें 'इन' यह क्यों ? ऐश्वर्यसे सनित या व्याप्त
है। अथवा इससे ऐश्वर्य व्याप्त है ॥ ५ ॥
व्याख्या ।
इस खण्डमें 'तडित्' इस सन्दिग्ध पदकी "त्वया वयम्"
उदाहरणसे व्याख्या दिखाई कि मन्त्रोंमें यह पद समीप अर्थमें
आता है । शाकपूणि आचार्य विद्युत्का नाम भी मानते हैं। किन्तु
आचार्यने दूसरे मन्त्रसे भी पूर्व अर्थको ही पुष्ट किया है, जो यहाँ
प्रकरणके अनुरूप है ।
वज्र नामोंमें 'कुत्स' यह सन्दिग्ध पद है। क्योंकि वज्र और
ऋषि दोनों अर्थोंमें आता है। ऋषि अर्थका पक्ष औपमन्यव
आचार्य लेता है। पर आचार्य पुरा पक्षमें भी इस शब्दके धातुका
वध अर्थ ही मानते हैं, जिसे उन्होंने उनके उपास्य देव इन्द्रके द्वारा
सिद्ध किया है ।
"त्वया वयम्" मन्त्रमें गृत्समद ऋषिने अपने ब्रह्मणस्पति
देवसे अरातियों या शत्रुओंके नाश करनेकी प्रार्थना की है यहाँ
भगवद्दुर्गाचार्यने शत्रुओंके दो भेद बताए हैं । (१) दुःखसंनाश्य
जिनका दुःखसे नाश हो सकता है। (२) सुख संनाश्य जिनका
सुखसे नाश हो सकता है। पहले भेदमें वे शत्रु हैं, जो यह बुद्धि
रखते हैं कि 'हमे' इनके लिये देना नहीं चाहिये। और दूसरे वे
हैं, जो औरोंको देते हुओंको रोकें ॥ ५ ॥
५८ ३ अ० २ पा० ६ खं० ।
( खण्ड ६ )
[ निरु० ] “यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भागमनिमेषं
विदथा भिसरन्ति । इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपाः
समाधीरः पाकमत्राविवेश ॥”
[ ऋ० सं० २, ३, १८. १ ]
यत्र “सुपर्णाः” सुपतनाः आदित्यरश्मयः- “अमृ-
तस्य भागं” मुदकस्य अनिमिषन्तः वेदनेन “अभि-
स्वरन्ति”-इति वा, अभिप्रयन्ति-इति वा । ईश्वरः
सर्वेषां भूतानां गोपायिता आदित्यः । “स मा
धीरः पाकमत्राविवेश”-इति । “धीरः” धीमान् ।
“पाकः” पक्तव्या भवति । विपक्वप्रज्ञः आदित्यः-
इति उपनिषद्वर्णो भवति-इति अधिदैवतम् । अथा-
ध्यात्मम् । यत्र सुपर्णाः सुपतनानि इन्द्रियाणि अमृ-
तस्य भागं ज्ञानस्य अनिमिषन्तः वेदनेन अभि-
स्वरन्ति इति वा, अभिप्रयन्ति इति वा । ईश्वरः
सर्वेषाम् इन्द्रियाणां गोपायिता आत्मा “स मा
धीरः पाकमत्राविवेश” इति । “धीरः धीमान्”
“पाकः” पक्तव्या भवति, विपक्वप्रज्ञः आत्मा इति
आत्मगतिमाचष्टे ॥ ६ ॥
इति तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ ३, २, ॥
हिन्दी निरुक्त । ५६
वह मन्त्र जिसमें 'इन' यह ईश्वरका नाम है—"यत्रा सुपर्णा"
इत्यादि । इस मन्त्रका दीर्घतमाः ऋषि । त्रिष्टुप् छन्दः । विश्वे-
देवाः देवता । महाव्रतमें तृतीय सवनमें वैश्वदेव शस्त्रमें शस्त्र है ।
मन्त्रार्थ—[देवता पक्ष-] 'यत्र' जिस आदित्य मण्डलमें स्थित
हुए हुए 'सुपर्णा' जो अन्धकारको दूर करनेके लिये गिरते हैं अथवा
सुन्दर होते हुए गिरते हैं 'अमृत' अमर जलके 'भाग' भजन (सेवन)
योग्य अंशको पृथिवी लोकसे लेकर 'विदथा' अपने अधिकारके
ज्ञान पूर्वक 'अनिमिष' आलस्य रहित या आदर-युक्त आदित्य-
रश्मि 'अभिस्र्वरन्ति' सम्मुख भावसे आदित्य मण्डलको जाते हैं ।
या लोकको तपाते हैं । उस आदित्य मण्डलमे स्थित हुआ हुआ
सब लोकोंका 'इन' ईश्वर 'गोपा' रक्षा करने वाला 'धीर' धीमान्
स्वच्छबुद्धि वाला वह आदित्य अनुग्रहसे' अत्र' इस आदित्य मण्ड-
लमें मा' 'पाकम्' मुझ अपक्वबुद्धिको 'आविवेश' प्रवेश करे ।
[आत्मपक्ष-] 'यत्र' जिस शरीरमें 'सुपर्णा' अपने अपने काले
बिन्दु आदि स्थानोंमें स्थित हुयी हुयी चक्षु आदि इन्द्रियें 'अमृतस्य'
अमर धर्म युक्त ज्ञानको 'भागम्' अपने अपने ग्राह्य रूप आदि
विषय रूप रसको लेकर 'अनिमेषम्' आलस्य रहित या आदर युक्त
'विदथा' विषय विज्ञान पूर्वक 'अभिस्र्वरन्ति' बाह्य विज्ञानका रखने
के लिये आत्माके सम्मुख जातो है । उस शरीरमें रहता हुआ
'विश्वस्य भुवनस्य इन:' सब शरीररूप भुवनका ईश्वर 'गोपा' सब
इन्द्रियोंका रक्षक 'धीरः' बुद्धिमान् 'स:' वह 'अत्र' इस देहमें
बुद्धिके अधि देवता रूपसे तैजस नाम वाला 'पाकम्' पक्वबुद्धि
'माम्' मुझको अनुग्राह्य बुद्धिसे 'आविवेश' प्रवेश करे। [उसीके
अनुग्रहसे इस जीवको यथार्थ ज्ञान होता है उसीको प्रार्थना है।]”
नि० अ०—जिस आदित्यमण्डलमें सुपर्णा नाम सुन्दर पतन
करने वाले आदित्यके रश्मि अमृत नाम उदकके भागको आलस्य
६० ३ अ० २ पा० ६ खं० ।
रहित अथवा विज्ञानसे तपाते हैं अथवा सम्मुख जाते हैं। सब
भूतों या प्राणियोंको रक्षा करने वाला आदित्य वह मुझे 'धीरः
पाकमत्राविवेश' इति। 'धीर' नाम धीमान् धारणा बुद्धिवाला,
'पाक' नाम पकाने योग्यका है। उत्तम पकी हुई प्रज्ञान बुद्धिवाला,
आदित्य (सूर्य) यह उपनिषद् विद्या है। यह देवता परक व्याख्या
है। अब अध्यात्म नाम आत्म विषयक व्याख्या है। जिस
(शरीर) में सुपर्ण नाम सुन्दर-गमन करने वाले इन्द्रिय, अमृत
या अमरज्ञानके भागको (लेकर) आलस्यसे रहित विज्ञान पूर्वक
भोक्ता पुरुषको विषयके ज्ञान द्वारा दुःखित करते हैं। अथवा बाह्य
विज्ञानको स्थापन करनेके अर्थ आत्माके प्रति जाते हैं। सब
इन्द्रियोंका ईश्वर रक्षक वह तैजस आत्मा "धीरः पाकमत्राविवेश"
'धीर' नाम 'धी' धारणा वालो बुद्धिवाला, 'पाक' नाम पकाने
योग्य होता है, या विशेष पकी हुई बुद्धिवाला आत्मा। इस प्रकार
आत्म पक्षको कहता है ॥ ६ ॥
व्याख्या ।
"यत्रा सुपर्णा" यह मन्त्र 'इम' शब्दको ईश्वरवाचकता दिखाने-
के लिये दिया गया है। अधिदैवत या आदित्य पक्षमे सब भुवनोका
ईश्वर और अध्यात्म पक्षमें सब इन्द्रियोंका ईश्वर कहा गया है।
[अधिदैवत-] जिस मन्त्र या प्रकरणमें देवताके अधिकार या
प्राधान्यसे अर्थ कहा जावे वह अधिदैवत है। जैसे उक्त "यत्रा
सुपर्णा" मन्त्रमे सूर्य देवताके अभिप्रायसे आदित्यमण्डल रश्मिएँ
या किरणें, उनका रसको ले जाकर पृथ्वीको तपाना आदि अर्थ
कल्पित किया है। ऐसे ही अन्य मन्त्रोंमें जिस देवतामें मन्त्र
लगाना होता है, उसीके अनुरूप सब शब्दोंके अर्थ कर लिये
जाते हैं।
६२ ३ अ० ३ पा० १ ख० ।
तृतीयाध्यायस्य-
तृतीयः पादः ।
( खण्ड १ )
अथ निघण्टौ तृतीयोऽध्यायः ।
[ निघ० ] उरु ( १ ) । तुवि ( २ ) । पुरु ( ३ ) ।
भूरि ( ४ ) । शश्वत् ( ५ ) । विश्वम् ( ६ ) । पपी-
यांसा ( ७ ) । व्यानशिः ( ८ ) । शतम् ( ९ ) ।
सहस्रम् ( १० ) । सलिलम् ( ११ ) । कुवित् ( १२ ) ।
इति द्वादश बहुनामानि ॥ १ ॥
[ निघ० ] ह्रसन् ( १ ) । ह्रस्वः ( २ ) । नि-
घृष्वः ( ३ ) । माथुकः ( ४ ) । प्रतिष्ठा ( ५ ) । कृधु
( ६ ) । वभ्रुकः ( ७ ) । दभ्रम् ( ८ ) । अर्भकः ( ९ ) ।
क्षुल्लकः ( १० ) । अल्पः ( ११ ) । इत्येकादश
ह्रस्वनामानि ॥ २ ॥
[ निघ० ] महत् ( १ ) । ब्रह्मः ( २ ) । ऋष्वः
( ३ ) । बृहत् ( ४ ) । उक्षितः ( ५ ) । तवसः ( ६ ) ।
तविषः ( ७ ) । महिषः ( ८ ) । ऋष्वः ( ९ ) ।
ऋभुक्षाः (१०) । उक्षाः (११) । विहायाः (१२) ।
यह्वः (१३) । ववक्षियः (१४) । विवक्षसे (१५) ।
ऋम्भृणः (१६) । माहितः (१७) । गभीरः (१८) ।
ककुहः (१८) । रभसः (२०) । ब्राधन् (२१) ।
विरप्शी (२२) । अद्भुतम् (२३) । वंहिष्ठः (२४) ।
बर्हिषत् (२५) । इति पञ्चविंशतिर्महन्नामानि ॥३॥
[निघ०-] गयः (१) । कृदरः (२) । नर्तः
(३) । हर्म्यम् (४) । अस्तम् (५) । पस्त्यम् (६) ।
दुरोणे (७) । नीलयम् (८) । दुर्य्याः (६) खसराणि (१०) ।
अमा (११) । दमे (१२) । कृत्तिः (१३) । योनिः
(१४) । सद्म (१५) । शरणम् (१६) । वरूथम्
(१७) । छर्दिः (१८) । छदि (१९) । छाया (२०) ।
शर्म (२१) । अञ्म (२२) । इति द्वाविंशतिर्गृह-
नामानि ॥ ४ ॥
[निघ०-] इरज्यति (१) । विधेम (२) ।
सपयति (३) । नमस्यति (४) । दुवस्यति (१५) ।
ऋप्नोति (६) । ऋशद्धि (७) । ऋच्छति (८) ।
सपति (६) । विवासति (१०) । इति दश परि-
चरणकर्माणः ॥ ५ ॥
६४ ३ अ० ३ पा० १ ख० ।
[निघ०-] शम्बाता (१) । शतरा (२) ।
शातपन्ता (३) । शर्म (४) स्यूमकम् (५) ।
शेवृधम् (६) । मयः (७) । सुग्म्यम् (८) । सुदि-
नम (९) । शूषम् (१०) । शुनम् (११) । शग्मम्
(१२) । भेषजम् (१३) । जुलाषम् (१४) । स्योमम्
(१५) । सुम्नम् (१६) । शवसे (१७) । शिवम्
(१८) । शम् (१९) । कम् (२०) । इति विंशतिः
सुख नामानि ॥ ६ ॥
[ निघ० ] निर्णिंक् (१) । वत्रिः (२) । वर्षः
(३) । वपुः (४) । अमतिः (५) । पप्सः (६) ।
प्मुः (७) । रूप्रः (८) । पिष्टम् (६) । पेशः
(१०) । कृशनम् (११) । प्क्षारः (१२) । अर्जु-
नम् (१३) । ताम्रम् (१४) । चरुषम् (१५) ।
शिल्पम् (१६) । इति षोडश रूपनामानि ॥ ७ ॥
( निघ० ) असेमाः (१) । अनेसः (२) ।
अनेघः (३) । अनवद्यः (४) । अनभिशस्ताः (५) ।
उक्थ्यः (६) । सुनोथः (७) । पाकः (८) । वामः
(६) । वयुनम् (१०) । इति दश प्रशस्यस्य ॥ ८ ॥
[ निघ० ] कतः (१) । केतुः (२) । चेतः
(३) । चिवम् (४) । क्रतुः (५) । पमुः (६) ।
हिन्दी निरुक्त । ६५
धीः ( ७ ) । शचीः ( ८ ) । माया ( ६ ) । वयुनम्
( १० ) । अभिख्या ( ११ ) । इति एकादश प्रज्ञा
नामानि ॥ ६ ॥
[ निघ० ] बट् ( १ ) । श्रत् ( २ ) । सत्रा ( ३ ) ।
अद्धा ( ४ ) । इत्था ( ५ ) । ऋतम् ( ६ ) । इति षट्
सत्यनामानि ॥ १०॥
[ निघ० ] चिक्षत् ( १ ) । चाकनत् ( २ ) ।
आचष्ट ( ३ ) । चष्टे ( ४ ) । विष्टे ( ५ ) । विच-
र्षणिः ( ६ ) । विश्वचर्षणिः ( ७ ) । अच्योशुकत्
( ८ ) इति अष्टौ पश्यतिकर्माणः ॥ ११ ॥
[ निघ० ] हिकम् ( १ ) । नुकम् ( २ ) ।
सुकम् ( ३ ) । घषिकम् ( ४ ) । चाकीम् ( ५ ) ।
नकिः ( ६ ) । माकिः ( ७ ) । नकाम् ( ८ ) । आ-
क्तम् ( ६ ) । इति नव उत्तराणि सर्व-पद-समा-
म्नानाय ॥ १२ ॥
[ निघ० ] इदमिव ( १ ) । इदं यथा ( २ ) ।
अग्निनये ( ३ ) । · चतुरश्चिद् ददमानात् ( ४ ) ।
ब्राह्मणा व्रतचारिणः ( ५ ) । वृक्षस्य नु ते पुरुहूत-
वयाः ( ६ ) । जार आभगम् ( ७ ) । मेषोभूतो ३
६
६६ ३ अ० ३ पा० १ खं० ।
भियन्नयः (८) । तद्रूपः (६) । तद्वर्णां (१०) ।
तद्वत् (११) । तथा (१२) । इति उपमाः ॥१३॥
[ निरु० ] बहुनामानि उत्तराणि द्वादश । बहु
कस्मात् ? प्रभवति इति सतः ।
ह्रस्वनामानि उत्तराणि एकादश । ह्रस्वो
ह्रसतेः ।
महन्नामानि उत्तराणि पञ्च विंशतिः । महान्
कस्मात् ? मानेन अन्यान् जहाति इति शाकपूणिः ।
संहनीयो भवति-इति वा । तत्र 'अवक्ष्य' 'विव-
क्षसे' इति-एते वक्तेर्वा वहतेर्वा साभ्यासात् ।
गृहनानानि उत्तराणि द्वाविंशतिः । गृहाः कस्मात्?
गृह्णन्ति इति सताम् ।
परिचरण-कर्माणः उत्तरे धातवो दश ।
सुखनामानि उत्तराणि विंशतिः । 'सुखं'
कस्मात् ? सुहितं खेभ्यः । 'खं' पुनः खनतेः ।
रूपनामानि उत्तराणि षोडश । रूपं' रोचतेः ।
प्रशस्य-नामानि उत्तराणि दश ।
प्रज्ञानामानि उत्तराणि एकादश ।
हिन्दी निरुक्त । ६७
सत्यनामानि उत्तराणि षट् । ‘सत्यं’ कस्मात् ?
सत्सु तायते । सत्प्रभवं भवति इति वा ।
अष्टौ उत्तराणि पदानि । पश्यति-कर्माणः
उत्तरे धातवः । धायति-प्रभृतीनि च नामानि
आमिम्राणि ।
नव उत्तराणि पदानि सर्वपदसमाम्नानाय ।
अथात उपमाः । ‘यदतत्तत्सदृशम्’ इति
गार्ग्यः तदासाम् कर्म । ज्यायसा वा गुणेन प्रख्यात
तमेन वा कनीयांसं वा अप्रख्यातं वा उपमिमीते ।
अथापि कनीयसा ज्यायांसम् ।
अर्थ ।
निरुक्तार्थ—ईश्वर नामोंके अनन्तर बारह (१२) बहु (बहुत)
के नाम हैं। ‘बहु’ किस अर्थसे है ? ‘प्रभवति’ अर्थात् समर्थ होता
है, इस कर्तृवाच्य (प्र० उप० भू० धा०) से। अनन्तर ‘ह्रस्व’ के
ग्यारह (११) नाम हैं। ‘ह्रस्व’ अल्पोभाव अर्थमें ‘ह्रस्व’ (भ्वा०
प०) धातुसे है। [क्योंकि—वह महत्को अपेक्षा छोटा हुआ
प्रतीत होता है।]
‘महत्’ के नाम पच्चीस हैं। ‘महान्’ क्यों है ? मान या परि-
माणसे अन्योंको छोडता है। यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं।
अथवा महनीय या पूजनीय होता है। उन महत् नामोंमें ‘ववक्षिथ’
‘विवक्षसे’ ये दोनों दोहराये हुए ‘वच्’ (अ० प०) धातुसे अथवा
वह (भ्वा० उ०) धातुसे हैं।
६८ ३ अ० ३ पा० १ ख० ।
अनन्तर बाईस ( २२ ) गृह "( घर ) के नाम हैं. 'गृह' क्यों हैं ?
ग्रहण करते हैं । ( धान्य आदिको ) इस प्रकार कर्तृवाच्य 'ग्रह'
उपादाने ( क्र्या० उ० ) धातुसे हैं ।
अनन्तर दश ( १० ) परिचरण अर्थमें धातु हैं ।
अनन्तर बीस ( २० ) सुखके नाम हैं। 'सुख' क्यों ? 'ख'
नाम इन्द्रियोंके लिये सुहित होता है। फिर 'ख' शब्द 'खन' खनने
( भ्वा० उ० ) धातुमे है। [ क्योंकि कर्ण आदि इन्द्रियोंके स्थान
खोदे हुए जैसे होते हैं । ]
अनन्तर सोलह ( १६ ) रूपके नाम हैं। 'रूप' शब्द दीप्ति
अर्थवाले ( भ्वा० आ० ) 'रुच' धातुसे है। [ क्योंकि वह दीप्त
होता है ।
अनन्तर दश ( १० ) प्रशस्य ( प्रशंसा योग्य ) के हैं ।
अनन्तर ग्यारह ( ११ ) प्रज्ञाके नाम हैं ।
अनन्तर छः ( ६ ) सत्यके नाम हैं । 'सत्य' क्यों ? सत्पुरुषोंमें
ही फैलता है। [ क्योंकि-सत्पुरुषोंके समीप मिथ्या नहीं बोला
जा सकता । ] अथवा सत्पुरुषोंसे ही उत्पन्न होता है । [ क्योंकि-
सत्पुरुष ही सत्य बोलते हैं । ]
अनन्तर आठ (८) उत्तरे पद हैं । अनन्तर आठ (८) नेत्रसे देखने
अर्थ वाले धातु हैं । और चायति' आदि नाम हैं । अतः ये आमिश्र
( मिले हुए ) हैं ।
अनन्तर नव ( ६ ) उत्तर पद हैं सब ( नाम आख्यात, उपसर्ग
और निपात ) चारों प्रकारके पदोंके समाम्नानके अथ हैं । [ अर्थात्
इन्हीं नव ( ६ ) पदोंके आम्नान करनेमें सब निपात और उपसर्ग
दिखाये गये समझे जावेंगे। चारोंमें इन्हींके दिखानेकी त्रुटि थी
सो सब पूरी की जाती है । ]
हिन्द निरुक्त । ६६
अनन्तर उपमा हैं। [लक्षण] जो उस (उपमेय) से मिश्र
और उसके समान हो सो उपमा होती है—यह गार्ग्य आचार्य
मानते हैं। सो इन उपमाओंका कर्म या अर्थ है। क्या ? जो-
अथवा उत्कृष्ट-गुणसे अल्पगुण या छोटेको अथवा अधिक प्रसिद्धसे
अप्रसिद्धका उपमा करता है। और छोटे या निकृष्टसे बड़े या
श्रेष्ठको (उपमा करता है।) ॥ १ ॥
व्याख्या !
इस खण्डमें निघण्टु के तेरह (१३) खण्डोंकी
व्याख्या है।
जिनमें बहु (१) ह्रस्व (२) महत् (३) गृह (४) परिचरण
(५) सुख (६) रूप (७) प्रशस्य (८) प्रज्ञा (९) सत्य (१०)
पश्यति (११) सर्वपद (१२) उपमा (१३) इन अर्थोंके वाचक
शब्द हैं। इनका संगतियां भी योग्यतानुसार कल्पित कर लेना
चाहिये। जैसे कि-- ईश्वर ही बहु होते हैं। बहु सम्बन्धसे ह्रस्व,
ह्रस्व सम्बन्धसे महत्, जो महत् होते हैं वे ही गृही (गृहस्थ) होते
हैं, गृहोंमें ही परिचर्या (सेवा) होती है परिचर्यासे ही सुख होता
है, सुखी ही रूपवाले होते हैं रूपवाले ही प्रशंसनीय होते हैं, जो
प्रज्ञा (बुद्धि) वाले होते हैं वे ही प्रशंसनीय होते हैं जो प्रज्ञावान्
होते हैं, वे ही सत्य बोलते हैं, जो सत्य बोलते हैं, वे ही देखते
हैं—इत्यादि ।
चिक्यत् आदि। इस खण्डके भगवद्दुर्गाचार्यने तीन व्याख्यान
दिखाये हैं, जो भिन्न भिन्न पूर्वाचार्योंके हैं और यास्काचार्यके
अनुमत हैं।
१—चिक्यत् आदि दर्शनार्थक धातु हैं, और वे ही चायत आदि
रूपमें नाम हैं। इसलिये ये मिलित या संसर्गी हैं। कहाँ धातु
७० ३ अ० २ पा० १ ख० ।
और कहाँ पर नाम इस प्रकारका ज्ञान प्रकरण और समीपस्थ
पदसे होगा।
२—उनमें कोई नाम और कोई आख्यात हैं।
३—विचक्षण् ( १ ) विचर्षणः ( २ ) विश्वचर्षणः ( ३ ) ये
तीन नाम हैं और ८ जो शेष हैं वे सब धातु हैं। और वे पूर्वाचार्यों के
प्रामाण्यवश मिलित पढ़े जाते हैं।
उपमा—जिस प्रकार अन्य पृथिवी आदि पदार्थोंके नाम केवल
अपने स्वरूपसे ही निघण्टुमें पढ़े गये हैं और उनके उदाहरण वेदमें
ढूंढ़ लिये जाते हैं उसी प्रकार उपमा शब्दोंको वहाँ ही पढ़ा है, किन्तु
उनके उदाहरण ही आम्नात किये हैं जिनमें उपमा वाचक शब्द
और वे जिस प्रकारसे जिसकी उपमा जिसमें कह रहे हैं वह सब
हैं। जैसे "इदमिव" इसके समान। यहां 'इव' उपमा वाचक
और 'इदम्' उपमेयवाचक पद हैं।
उपमा दो पदार्थों के बीचका एक सम्बन्ध है इसीसे वह दूसरेके
साथमें हो आता है, किन्तु कहीं एक पदार्थ अपना आप ही उपमान
हो जाता है, जैसे "वायोरात्मोपमा गतिः" अर्थात् वायुकी
गति या वेग अपनी ही उपमा रखता है।
अधिकसे अल्पकी उपमा। "सिंहो माणवकः"माणवक। सिंह
है। यहाँ सिंहके अधिक शूरत्वसे माणवक (बालकके) के शौर्यको
उपमा है।
अधिक प्रसिद्धसे अप्रसिद्धकी उपमा। "चन्द्र इव कान्तो
माणवकः" चन्द्रमाके समान सुन्दर माणवक है यहाँ प्रसिद्ध चन्द्रसे
अप्रसिद्ध माणवककी उपमा है।
कहीं छोटे या अल्पगुणसे बड़े या अधिक गुणकी उपमा।
किन्तु यह वेदमें ही मिलती है, लोकमें इसका अधिक उपयोग
नहीं है ॥ १ ॥
हिन्दी निरुक्त । ७१
(खण्ड २)
[ निरु० ] “तनूत्यजेव तस्करा वनर्गू रशनाभि
दशभिरभ्यधीताम् ।”
[ ऋ० सं० ७, ५, ६२, ६ ]
'तनूत्यक्' तनूत्यक्ता 'वनर्गू' वनगामिनौ चाग्नि-
मन्थनौ बाहू तस्कराभ्यामुपमिमीते । 'तस्करः' तत्
करोति, यत् पापकम्–इति नैरूक्ताः । तनोतेर्वा
स्यात् । सन्ततकर्मा भवति । अहोरात्रकर्मा वा ।
“रशनाभिर्दशभिरभ्यधीताम्” अभ्यधाताम् । ज्यायां
स्तव गुणोऽभिप्रेतः ॥ २ ॥
अर्थ ।
“तनूत्यजेव” मन्त्रका त्रित ऋषि । त्रिष्टुप् छन्दः । प्रातर-
नुवाक और आश्विनमें शस्त्र ।
वनमें रहनेवाले, मार्गमें लूटनेवाले दो चोर 'हरेंगे, या भागेगें'
ऐसे अभिप्रायसे चले, उन्हींसे दो बाहुओं (भुजों) को उपमा
इस मन्त्रमे है ।
मन्त्रार्थ—हे अग्निदेव ! शरीरको त्यागनेवाले, वनमें विचरने
वाले दो चोरोंके समान हमारे दो बाहू दश अङ्गुलियोंसे दोनों
अरणियोंके द्वारा तुम्हें बाँध लें । यहाँ श्रेष्ठ भुजोंकी निकृष्ट
तस्करोंसे उपमा है ।
नि० अ०—'तनूत्यज्' नाम तनू (शरीर) का त्यागने वाला ।
'वनर्गू' वनगामी या वनमें रहने वाले । अग्निके मथने वाले बाहु-
ओंको दो तस्करों (चोरों) से उपमा करता है । 'तस्कर' क्यों ?
'वह कर्म करता है जो पाप रूप है'—यह नैरुक्त आचार्य मानते हैं ।
७२ ३ अ० ३ पा० २ खं० ।
अथवा सन्तत ( निरन्तर ) कर्मवाला होता है। अथवा रात्रि दिन
कर्म करता है [दिनमे वनमे चोरी करता है और रात्रिमे ग्राममे ।]
दश रशनाओं ( अङ्गुलियों ) से 'अभ्यधीताम्' बाँध लें ॥ २ ॥
व्याख्या
"तनूत्यजेव" मन्त्र 'अथापि कनीयसा ज्यायांसम्' छोटेसे भी
बड़ेको उपमा दी जाती है, इस पूर्व खण्डके वाक्यके अनुसार निकृष्ट
पदार्थ से उत्तम पदार्थकी उपमामें उदाहरण है।
तस्करके दो विशेषण मन्त्रमें हैं--"तनूत्यज्या" देहत्यागी
"वनेर्गू" वनचारी। ये दोनों ही विशेषण यह बता रहे हैं कि
ग्राम-वासी और अपने प्राणोंको बचानेकी इच्छा रखने वाला चोर
असली चोर नहीं है। इससे बाँधने और पकड़नेकी उपमाको
पुष्ट करनेके लिये मन्त्रमें तस्करके ये दो विशेषण भी दिये
हैं॥ २॥
( खण्ड ३)
[निरु०-] "कुहस्विद् दोषा कुहवस्तोरश्विना कुहा-
भिपित्वं करतः कुहोषतुः । को वां शयुत्रा
विधवेव देवरं मर्यं न योषा कृणुते सधस्थ-
आ ॥” [ ऋ० सं० ७, ८, १, ८२ ]
कस्विद् रात्रौ भवथः, क्व दिवा, क्वाभिप्राप्तिं
कुरुथः, क्व वसथः, को वां शयने विधवेव देवरम् ।
[एकपदनि०-] (देवरः कस्माद् ? द्वितीयो वर
उच्यते ) 'विधवा' विधातृका भवति । विधवनाद्
वा । विधावनाद् वा इति चमशिराः । अपि वा
'धव' इति मनुष्य नाम । तद् वियोगाद् विधवा ।
'देवगो' दीव्यतिकर्मा । 'मर्यो' मनुष्यः । मरणधर्मा
'योषा' यौतेः । [ ४ र्थ पादः ] आकुरुते सहस्थने ॥
अथ निपाताः पुरस्तादेव व्याख्याताः । 'यथा'
इति कर्मोपमा ।
“यथा वातो यथा वनं यथा समुद्र एजति” ॥
[ ऋ० सं० ५, ५, २, ५ ]
“भ्राजन्तो अग्नयो यथा” ॥ [ ऋ० सं० १, ४,
७, ३ ]
‘आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो
यथा' । [ ऋ० सं० ८, ५, १०, १, ]
[एक पद निरु-] 'आत्मा' अतते र्वा । आप्तेर्वा ।
अपि वा आप्त इव स्याद्, यावद् व्याप्तिभूत इति ।
“अग्नि र्न ये भ्राजसा रुक्मवक्षसः” [ऋ० सं०
८, ३, १२, २]
अग्निरिव ये (मारुतो भ्राजमाना रोचिष्
पूरस्काः ) भ्राजस्वन्तो रुक्मवक्षसः ॥ ३ ॥
अर्थ ।
“कुहस्विद्दोषा” मन्त्रका कक्षोवान्की पुत्री घोषा ऋषि अश्विन्
देवता । जगती छन्दः । प्रातरनुवाक और आश्विनमें शस्त्र है ।”
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