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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

७४ ३ अ० ३ पा० ३ ख० ।
मन्त्रार्थ-हे अश्विनौ ! तुम दोनों रात्रिमें कहाँ रहते हो ?
तुम दोनों दिनमें कहाँ रहते हो ? कहाँ तुम दोनों स्नान भोजन
आदिके अर्थ अपनी उपस्थिति करते हो ? कहाँ वसते हो ? विधवा
शयनमें देवरको जैसे ( या ) ( कोई ) स्त्री ( किस्सो ) पुरुषको जैसे,
कौन तुम्हें अपने पासमे करता है ? [ जिससे कि-तुम न रात्रि और
न दिन होमें हमारे देखनेमें आते । ] दुःख ! [ इस ऋचामें नीच
देवरसे उत्कृष्ट ( बड़े ) अश्विनोंकी उपमा है । ]
नि० अ०-कहाँ रात्रिमें होते हो ? कहाँ दिनमें ? कहाँ आना
जाना करते हो ? कहाँ वसते हो ? कौन तुम दोनोंको शयनमें
विधवा देवरको जैसे ॥
[ एक पद नि०-] [ देवर क्यों ? द्वितीय (दूसरा) वर कहाता है ]
'विधवा' क्यों ? विधातृका है या उसका धाता ( वर ) मर गया ।
अथवा भर्त्ताके मर जानेसे वह कम्पित जैसी हो जाती है। अथवा
'पतिके अभावसे उसे कोई रुकावट नहीं रहती और वह जहाँ तहाँ
धावन करतो है, इसीसे विधवा है ।"-यह चर्मशिराः ( चमड़ेका
टोप पहनने वाले ) आचार्य मानते हैं । अथवा 'धव' यह मनुष्यका
नाम है, उसके वियोगसे यह विधवा है। 'देवर' क्यों ? क्रीड़ा
करता है। 'मर्य' नाम मनुष्य । ( क्योंकि-) वह मरण धर्मवाला
है। 'योषा' 'यु' मिश्रणे ( अदा० प० ) धातुसे है। [ क्योंकि-)
वह अपनेको पुरुषके साथ मिला लेती है ! ] [ अर्थ पाद-] समान
स्थानमें बुला लेता है, या करता है ।
यहाँसे निपात हैं, सो [ सामान्यरूपसे-] पहले ही व्याख्यान
किये जा चुके हैं। [ अब विशेषरूपसे कहे जाते हैं-] 'यथा' यह
कर्म या क्रियाकी उपमामें है। जैसे-
"जिस प्रकार वायु कम्पित होता है, जिस प्रकार वन,
तथा जिस प्रकार समुद्र कम्पित होता है। [ वैसे ही हे दश मासमें

हिन्दी निरुक्त । ७५
होने वाले गर्भ ! तू अपनी इस माताको दुःख न देता हुआ जरायु
( जेर ) के साथ बाहर निकल । ]"
[ यहाँ 'यथा' पदसे वायु, वन और समुद्रकी कम्पन क्रियासे
गर्भकी क्रियाको उपमा दी गई है । ] अन्य उदाहरण--
'भ्राजन्तो अग्नयो यथा" अर्थात् ' [ भगवान् सूर्यके किरण ]
अग्नियोंके समान प्रदीप्त होते हुए [ अन्धकारको दूर करने या अन्य
उपकारोंके करने या ओषधियोंके पाक आदि करनेके लिये मनुष्योंके
प्रति जाते हैं । ]"
[ यहाँ 'यथा' पदसे अग्निकी प्रदीपन क्रियाका सादृश्य किरणों
के प्रदीपनमे बताया गया है । ] अन्य उदाहरण--
“आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा ।” अर्थात्
[ मैं आथर्वण भिषक् (वैद्य) जिस समय इन ओषधियोंको प्रशंसा
करता हुआ हाथमें धारण करता हूँ, और हस्तमे लेकर रोगोंके
पास पहुचता ही हूं कि उस समय ओषधियोंके प्रयोगसे ] पहले
ही यक्ष्म रोगका आत्मा नष्ट हो जाता है जिस प्रकार 'जीवगृभ्'
(जीवका लेने हारा) या यमदूतके प्रहारसे पहले ही अहत या
बिना मारे प्राणियोंका जीव नष्ट हो जाता है ।
[ एक पद नि० ] 'आत्मा' क्यों ? 'अत, सातत्यगमने (भ्वा०
प०) धातुसे है । [ अर्थात् सब स्थानोंमे गया हुआ रहता है । ]
अथवा व्याप्ति अर्थमें 'आप्' (स्वा० प०) धातुसे है । क्योंकि-
सभी वस्तु मात्र उससे व्याप्त रहता है, जिससे कि वह सर्वगत
है । अथवा वह कार्य और कारणमें स्थित हुआ संघात (देह) मे
आत्त (पाया हुआ) जैसा होता है, जितनेसे कि-वह व्यापन
किया हुआ है । या सर्वव्यापक होने पर भी जितने शरीरसे
व्यापन किया हुआ होता है उतना ही प्रतीत होता है । क्योंकि

७६ ३ अ० २ पा० ३ खं० ।
उतने ही प्रदेशमें उसकी चैतन्यशक्ति प्रकट होतो है। जिस प्रकार
तप्त लोहे पर तृणको मुट्ठी छोड़ने पर 'तृण संयोग स्थलमें ही
अग्नि प्रकट होता है और अन्य तप्त लोह भागमें अग्नि रहता हुआ
भी प्रत्यक्ष नहीं होता। [नैरुक्तोंके मतमें भी आत्मा विभु है।]
“अग्निर्न ये भ्राजसा रुक्मवक्षसः” अर्थात् “अग्निके समान जा
मरुद् देव भ्राजमान (प्रकाशमान) सुवर्णयुक्त छातोवाले या चम-
कीलो छातो वाले हैं।”॥ ३॥
व्याख्या।
“कुहस्वित् दोषा” मन्त्र जो उपमाके उदाहरणमें दिया गया
है, कक्षोवानको पुत्री घोषा और अश्विनीकुमारोंके संवादसे
हिन्दुओंके घरकी पतिव्रता स्त्री और व्यभिचारकी शङ्कासे युक्त
पतिके संयोगमें स्त्रीका उस पतिके प्रति कैसा भाव हो जाता है
तथा हिन्दू पुरुषोंमें वह कैसा घृणास्पद अथवा त्याज्य हो जाता है
इसका एक उत्तम चित्र दिखाता है। हिन्दू स्त्री और पुरुषका
सहनिवास ही नियत है, पुरुषको चाहिये कि वह दिनमें बाह्य-
कृत्योंको करके रात्रिके समय अपने घरमें आवे। जब वह ऐसा
नहीं करता है तो स्त्रीको उस पर परस्त्री समागकी शङ्का हो जाती
है। इसी नियमके अनुसार घोषाको अश्विनों पर शङ्का हुई है,
उसने अश्विनोंसे कहा है कि जिस प्रकार विधवागामी देवर या
कोई पुरुष परस्त्रीगामी किसी सज्जनके पास नहीं बैठ सकता उसी
प्रकार तुम भी हो। जैसा कि कहा है कि—“कः वां सधस्थे
आकृणुते” कौन पुरुष तुम्हें पास बुला सकता है या बुलाता है”
अर्थात् कोई नहीं, प्रयोजन यह कि—तुम असदाचारके कारण
किसी पुरुषके पास बैठने योग्य नहीं हो। जैसे कि—और और
व्यभिचारी।

हिन्दी निरुक्त । ७७
“कः” पुल्लिङ्ग निर्देशका प्रयोजन यह है कि दूसरी स्त्रियोंने तो
उसे अपने पास बैठा कर व्यभिचारो बनाया हो है, तब पुरुष ही
उसका त्याग कर सकते हैं ।
भाष्यकारने भी “कनीयसा ज्यायांसम्” के उदाहरणमें इस
मन्त्रको देकर यही प्रयोजन लिया है कि व्यभिचारा या विधवा-
गामी देवर त्याज्य है ।
“यथा वातो यथा वनं यथा समुद्र एजति ।
एवा त्वं दशमास्य सहावेहि जरायुणा ।”
इस मन्त्रका सप्तवध्रि आत्रेय ऋषि। अनुष्टुप् छन्दः।
गर्भका अनुमन्त्रण कर्म। जिस समय गर्भवती स्त्रीको दशवें
मासमे प्रसव शूल हो इस मन्त्रसे पिता गर्भको अभिमन्त्रित करता
है, जिससे सुखपूर्वक प्रसव हो जाता है।
“यदि मा वाजिन्नङ्गमोषधो र्हस्तमादधे । आत्मा
यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जोवगृभो यथा ।”
ओषधिसूक्तमें ऋचा है। आथर्वण भिषक् ऋषि। अनुष्टुप्
छन्दः। इस मन्त्रसे दीक्षा किया हुआ यजमान आदि अग्निसे
उपतप्त (जला हुआ या दाझा हुआ) इक्कोस बार कुशजलसे मार्जन
किया जाता है। मन्त्रसामर्थ्यसे रोगीका मार्जन विशेष करके
यक्ष्म रोगीका मार्जन करनेसे उसका हित होता है।
“अग्निर्नये” मन्त्र उपमार्थक “न” निपातका उदाहरण है।
इस मन्त्रमें उपमार्थके लिये ‘न’ निपात चार बार आया है।—
'अग्निर्न' अग्निके समान (१) 'वातासो न' वायुयोंके समान (२)
'प्रज्ञातारः सुनोतयोन' बड़े समझदासों व शुभ नीतिवालोंके समान
(३) 'सुशर्माणोन' सुखकारो बन्धुओंके समान (४) मरुद् देवता
हैं। पहले भाष्यकारने निरुक्तके प्रथमाध्यायके द्वितीय पादमें

७८ ३ अ० ३ पा० ४ ख० ।
निपातोंकी व्याख्या की है और वहां पर “न” निपातका उपमा
अर्थमें “दुर्मदासो न सुरायाम्” मदिराके पानसे दुष्ट मदवालोंके
समान, यह उदाहरण भी दिया है, इससे यहाँ पर उसी निपातका
उक्त उदाहरण फिर देना न चाहिये था ? इस पर भगवद्दुर्गेन दो
मत दिखाये हैं:—
(क) कोई आचार्य इस खण्डमे “अग्निर्नये” इस उदाहरणको
नहीं पढ़ते ।
(ख) कोई आचार्य मानते है कि-पहले भाष्यकारने निपातोकी
व्याख्या भूमिकाके अवसरमें की है, और इस समय निघण्टुशास्त्रके
क्रमानुसार की है इसलिये यह उदाहरण यहाँ पर उचित है ॥ ३ ॥
( खण्ड ४ )
[निरु०-] “चतुरश्चिद् ददमानात् विभीयादानिधातोः।
न दुरुक्ताय स्पृहयेत् ।” [ऋ० सं० १, ३, २३, ४]
चतुरोऽक्षान् धारयत इति तद् यथा कितवाद्
बिभीयात्, एव मेव दुरुक्ताद् बिभीयात्, न दुरुक्ताय
स्पृहयेत् कदाचित् । ‘आ’ इत्याकार उपसर्गः ।
पुरस्तादेव व्याख्यातः । अथापि उपमार्थे दृश्यते ।—
“जार आभगम्” [ ऋ० सं० ७, ६, १०, १]
जार इव भगम् । आदित्योऽत्र जार उच्यते ।
रात्रेर्जरयिता स एव भासाम् । तथापि निगमो
भवति ।—
“स्वसु जारः शृणोतु नः” [ऋ० सं० ४, ८, २१, ५]

हिन्द' निरुक्त । ७१
इति उषसम् अस्य स्वसार माह । साहचर्याद्
रस हरणाद् वा । अपि तु अयं मनुष्यजार एव
अभिप्रेतः स्यात्, स्त्री भगम् यथा स्यात् । भजतेः ।
‘मेष’ इति भूतोपमा ।
“मेषो-भूतो ३ भियन्नयः” [ऋ० सं० ५, ७, २४, ५]
मेषो मिषते । तथा पशुः पश्यतेः ।
‘अग्निर्’ इति रूपोपमा ।
“हिरण्यरूपः स हिरण्य सं दृगपान्नपात्सेदु
हिरण्यवर्णः ।” [ऋ० सं २, ७, २३, ५ ]
हिरण्यवर्णस्येवास्य रूपम् । ‘था’ दूति च ।—
“तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्वथे मथा ।” [ऋ० सं०
४, २, २३, १]
प्रत्न इव । पूर्व इव । विश्व इव इम इव इति ।
‘अयम्’ एततरः आमुष्मात् । ‘असौ’ अस्ततरः
अस्मात् । ‘अमुथा’ ‘यथा’ असौइति व्याख्यातम् ।
‘वत्’ इति सिद्धोपमा । ब्राह्मणवत् । वृषलवत् ।
ब्राह्मण इव । वृषला इव-इति । वृषलो वृषशीलो
भवति, वृषाशीलो वा ॥ ४ ॥ (१६)
अर्थ ।
“चतुरश्चित्” मन्त्रका घोरपुत्र ऋषि । मित्र, वरुण और
अर्यमा देवता । गायत्री छन्दः ।”

८० ३ अ० ३ पा० ४ खं० ।
'चित्' निपातका उदाहरण —
मन्त्रार्थ—जिस प्रकार चार अक्षों (पासों) को धारण किये
हुए जुवारियेसे उसके पासोंको फेंकनेसे पहले, दूसरा कितव
(जुवारिया) जो उसके साथ जुआ कर रहा है, डरता है, [ क्या
मेरी इच्छानुसार पासे गिरेंगे या विपरीत, जिससे कि मुझ यह
जीत लेगा ? ] उसी प्रकार दुरुक्त (गाली) से डरना चाहिये, तथा
दुरुक्तकी कभी भी इच्छा न करे ।
नि० अ०—चार अक्षोंको धारण करनेवाले कितवसे जिस
प्रकार डरे, ऐसे ही दुरुक्त (दुर्वचन) से डरे, किन्तु कदाचित्
दुरुक्त (गाली) खानेकी इच्छा न करे । 'आ' यह आकार उप-
सर्ग (रूपसे) पहले ही (अ० १ पा० १ खं० ५ में) व्याख्यान
किया जा चुका है। अब उपमा अर्थमें (निपातके रूपसे) देखा
जाता है। [जैसे-]
“जार आ भगम्” [ ऋ० सं० ७,६,१०,१ ]
'जार भग (रस) को जैसे।' यहाँ 'जार' आदित्य (सूर्य)
कहा गया है। [क्योंकि] वह रात्रिका जरण (नाश) करने
वाला है। वही भासों (ज्योतियों) का। वैसा भी निगम
(जनानेवाला) मन्त्र है। 'स्वसुर्जारः शृणोतु नः' [ऋ० सं०
४, ८, २१, ५]
स्वसा (भगिनी) का जार हमारी सुनाई करे। उषाको ही
इसकी बहिन कहता है [किस कारण] साथ रहनेसे या रस
(जलके) हरनेसे। इसके अतिरिक्त [मन्त्र] में यह मनुष्य
जार ही माना जा सकता है। [ऐसा होनेसे भग शब्दसे] स्त्री
भग (योनि) हो सकता है। 'भज' (भ्वा० उ०) धातुसे। 'मेषो
भूत:' मेष (मोढे) के समान' यह 'भूत' शब्दसे उपमा अर्थ है।
[जैसे] “मेषो भूतो ३ भियन्नयः” [ऋ० सं० ५, ७, २५, ५]

हिन्दी निरुक्त । ८१
हे इन्द्र ! जो तू मेंढेके समान मेधातिथिके यज्ञमें आया,
'मेष' 'मिष' ( तु० प० ) धातुसे है। वैसे ही 'पशु' पश्यति या
'दृश' ( भ्वा० पा० ) धातुसे है ।
अग्निको रूप शब्दसे उपमा। जैसे—
“हिरण्य रूपः०” इत्यादि
'हिरण्य (सुवर्ण) के रूपके समान रूप वाला, वह हिरण्य
जैसा दिखाई देनेवाला हिरण्य जैसा अपांनपात् जलोंका पोता,
वैद्युत, अग्नि।' हिरण्य (सुवर्ण) वर्णका जैसा इसका रूप है।
और 'था' यह उपमार्थक है। [ जैसे—
“तं प्रत्नथा० [ ऋ० सं० ४, २, २३, १ ]
'हे सोम ! तू 'तम्' उस इन्द्रको अपने वीर्यसे तृप्त करके
( प्रत्नथा ) चिरन्तन भृगु आदि महर्षियोंके समान (पूर्वथा) ऋषि
पुत्रोंके समान (विश्वथा) सब प्राणियोंके समान ( इमथा ) इस
समयके यजमानोंके समान [ हमारे कामोंको दोहन करता है।]
[ प्रसङ्गसे ] 'अयम्' (इदम्) जो बहुत ही समीप हो, दूरस्थकी
अपेक्षा। “असौ” (अदस्) जो निकटसे दूर गिरा हुआ जैसा
हो । 'अमुथा' की व्याख्या “असौ” के समान है।
'वत्' यह लोकमें प्रसिद्ध उपमावाचक है। [कैसे] 'ब्राह्मणवत्'
ब्राह्मणोंके समान। 'वृषलवत्' वृषलों (शूद्रों) के समान।
'वृषल' क्यों ? वह 'वृष (बैल) कासा शीलवाला होता है।
अथवा वृष (धर्म) में अशील (अधर्म स्वभाव) वृषल होता है ॥४॥(१६)
व्याख्या ।
अपांनपात् । रूपोपमाके उदाहरण “हिरण्यरूपः...अपांनपात्”
मन्त्रमें 'अपांनपात्' देवताकी स्तुति है। अप् नाम जलका और
'नपात्' या नप्ता, पोते (नाती) का नाम है, दोनोंके मेलसे

.८२ ३ अ० ३ पा० ५ खं० ।
'अपांनपात्' नाम बना है, जिसका अर्थ है,-जलका पोता । इसको
मन्त्रोंसे प्रमाणित प्रक्रिया इस प्रकार है, कि-जलका बेटा सूर्य है
क्योंकि वह समुद्रसे निकलता है। "समुद्रादूर्मिर्मधुमाँ उदारत्"
[ ऋ० सं० ३, ८, १०, १ ] 'सूर्य समुद्रसे निकला।' और सूर्यका
बेटा मध्यम लोकका वैद्युत अग्नि है। "आदूतो अग्निमभरद्विव-
स्वतः" अर्थात् देवताओंका दूत वायु विवस्वान् (सूर्य) से अग्नि
लाया। इस परम्पराके साथ जलका नाती वैद्युत अग्नि हुआ, तथा
इसी कारण 'अपांनपात्' कहलाता है।
भूतोपमा । उपमार्थक 'भूत' शब्दसे उपमा ।
रूपमोपमा । उपमार्थक 'रूप' शब्दसे उपमा ।
सिद्धोपमा । लौकिक प्रयोगोंमें 'ब्राह्मणवत्' आदि ॥ ४ ॥(१६)
( खण्ड ५ )
[निरु०-] "प्रियमेधवदत्रिवज्जातवेदो विरूपवत् ।
अङ्गिरस्वन्महिव्रत प्रस्कण्वस्य शृधी हवम्" ।
[ ऋ० सं० १, ३, ३१, ३ ]
'प्रियमेधः' प्रिया अस्य मेधा । यथा एतेषाम्
ऋषीणाम्, एवं प्रस्कण्वस्य शृणु ह्वानम् । 'प्रस्कण्वः'
कण्वस्य पुत्रः । कण्वप्रभवो यथा प्राग्रम् । अर्चिषि
भृगुः सम्बभूव । भृगुभृज्यमानः, न देहे । अङ्गारेषु
अङ्गिराः । 'अङ्गाराः' अङ्कनाः ( अञ्चनाः ) । अत्रैव
'तृतीयम् अच्छत' इत्युचुस्तस्मात्-'अत्रिः' । न त्रयः
इति । विखननाद्—'वैखानसः' । भरणाद्—

हिन्दी निरुक्त । ८३

'भरद्वाजः' । 'विरूपो' नानारूपः । 'महिव्रतो'
महाव्रतः-इति ॥ ५ ॥ (१७)
इति तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ३, ३ ॥
अर्थ ।
“प्रियमेधवत्” मन्त्रका प्रस्कण्व ऋषि । अग्निदेवता । अनुष्टुप्
छन्दः । प्रातरनुवाक और आश्विनमें शस्त्र ।
'वत्' का मन्त्र उदाहरण—
हे जातवेदस् ! सर्वज्ञ महिव्रत ! बड़े व्रतवाले ! या कर्म वाले !
अग्नि ! प्रियमेधके समान, अत्रिके समान, विरूपके समान, और
अङ्गिराके समान मुझ प्रस्कण्वका 'भी' आह्वान सुन । [ यह आशीः
या प्रार्थना है ।]
नि० अ०—'प्रियमेध' क्यों ? इसकी प्रियमेधा (बुद्धि) है । जिस
प्रकार इन ऋषियोंका, इसी प्रकार प्रस्कण्वका बुलावा सुन ।
[एक पद निरुक्त-] 'प्रस्कण्व' क्या ? कण्वका पुत्र । अथवा
कण्व-प्रभव ( कण्वसे उत्पन्न हुआ ) जैसे प्रगत अगका प्राप्त ।
अर्चिष् या ज्वालाओंमें भृगु उत्पन्न हुआ । 'भृगु' क्यों ? भृज्यमान
भुंजता हुआ [होनेसे,] देहमें नहीं । [प्रयोजन—भृगु देहसे उत्पन्न
नहीं हुए, ये दिव्य सृष्टि हैं ।] अङ्गारोंमें ( अङ्गिरस् ) ऋषि हुऐ ।
'अङ्गार' क्यों ? अङ्कन हैं. [क्योंकि जहाँ गिरते हैं वहाँ अङ्क (चिन्ह)
कर देते हैं ।] 'इसीमें तृतीय (तीसरे) को पाओ' यह बोले-इसीसे 'अत्रि'
है ।] अत्र एव...ऋच्छत इस वाक्यके अक्षरोंसे चुनकर 'अत्रि' शब्द
बना ।] अथवा 'न त्रि' 'तीन नहीं' इन दो शब्दोंसे।'अत्रि' शब्द बना
है । विशेष खनन ( खोदने ) से 'वैखानस' है । भरण ( पालन )
से 'भरद्वाज' है । नानारूप होनेसे 'विरूप' है । महाव्रत या बड़े
कर्मवाला होनेसे 'महिव्रत' है । इति ॥ ५ ॥ ( १७ )
इति तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ३, ३ ॥

८४ ३ अ० ३ पा० ५ खं० ।
व्याख्या ।
भृगु, अङ्गिरा, अत्रि और वैखानस ऋषियोंकी उत्पत्ति जो
निरुक्त शास्त्रके आचार्यों को अभिमत है।—
ऐसा इतिहास है, कि सृष्टिके आरम्भकालमें प्रजापतिने अपना
वीर्य लेकर अग्निमें होम कर दिया, उससे ज्वाला (झल) में 'भृगु'
नाम महर्षि उत्पन्न हुआ । फिर ज्वालाके हट जानेसे अङ्गारोंमें
उसी वीर्यके एक अंशसे 'अङ्गिरस्' नाम महर्षि हुआ । फिर
पहले उत्पन्न हुए महर्षि बोले कि-इसी स्थानमें तृतीय (तीसरे)
को पाओगे, इस बचनके अनन्तर पाये हुए ऋषिका पूर्व ऋषियोंके
वाक्यके अक्षरोंसे ही 'अत्रि' नाम हुआ । अथवा 'अत्रि' नाममें जो
'अ'-कार है, यह निषेध अर्थको देता है, कि 'तीन ही नहीं' किन्तु
खोदो इसी स्थानमें चौथा और है, इस अर्थके अनुसार तीसरे
महर्षिका नाम 'अत्रि' है। और अग्नि हटाकर उसी स्थानको
खोदनेसे जो महर्षि निकला उसका नाम वैखानस है। इस प्रकार
“प्रियमेधवत्” मन्त्रोक्त तथा अन्य कुल चार ऋषियोंकी उत्पत्ति
और नामका इतिहास है।
यद्यपि उदाहरण मन्त्रमें 'भृगु' और 'वैखानस' नहीं हैं अतः
उनका निर्वचन यास्कको नहीं करना चाहिये था, किन्तु मन्त्रोक्त
'अत्रि' 'अङ्गिरस्' नामोंका इतिहास इनके साथ है, इसीसे मन्त्रके
पाठके क्रमको छोड़कर भृगु और अङ्गिरस् आदि क्रमसे निर्वचन
किया। क्योंकि इस आनुपूर्वीके बिना इनका निर्वचन नहीं हो
सकता था, तथा अन्यत्र भी प्रयोजनके अनुसार ऐसे निर्वचनका
अनुसन्धान रखना चाहिये। यह दिखानेके अर्थ ऐसा किया ॥४॥

तृतीय पादकी उपमाका चित्र ।

उपमा वाचक पदउदाहरणअर्थअ०पा०खं०
(१) इव ।“तनूत्यजेव”...(ऋक्) देहत्यागी जैसे३३२
”“विधवेव”...(ऋक्) विधवा जैसे३३३
(२) न ।“मर्यं न”...(ऋक्) मनुष्यको जैसे ।३३३
”“अग्नि र्न”...(ऋक्) अग्निके समान ।३३४
(३) यथा ।“यथावातः”...(ऋक्) पवन जैसे ।३३४
”“अग्नयो यथा”...(ऋक्) अग्नियों जैसे ।३३४
”“जीवगृभो यथा”...(ऋक्) जीवको लेनेवालेके जैसे ।३३४
(४) चित् ।“चतुरश्चिद्ददमानात्”(ऋक्) चार अक्षोंके लेनेवालेसे जैसे ।३३४
(५) आ ।“आ भगम्”...(ऋक्) भग (रस या योनि) जैसे ।३३४
(६) भूतः ।“मेषो भूतः”...(ऋक्) मेढा जैसा ।३३४
(७) रूपम् ।“हिरण्यरूपः”...(ऋक्) सुवर्ण जैसा ।३३४
(८) था ।“प्रत्नथा”...(ऋक्) चिरन्तनोंको जैसे ।३३४
(६) वत् ।“ब्राह्मणवत्”...(ऋक्) ब्राह्मण जैसे ।३३४
”“प्रियमेधवत्”...(ऋक्) प्रियमेधके जैसे ।३३५
इति तृतीयः पादः ॥ ३ ॥ ३ ॥

८६ ३ अ० ४ पा० १ खं० ।
तृतीयेऽध्याये—
४र्थः पादः ।
(खण्ड १)
अथ लुप्तोपमानि अर्थोपमानि इति आ-
चक्षते । सिंहो व्याघ्र इति पूजायाम् । श्वा काक
इति कुत्सायाम् । काक इति शब्दानुकृतिः ।
तदिदं शकुनिषु बहुलम् । “न शब्दानुकृति विद्यते”
इति औपमन्यवः । काकः अपकालयितव्यो भवति ।
तित्तिरिः तरणात् । तिलमात्रचित्र इति वा ।
कपिञ्जलः कपिरिव जीर्णः । कपिरिव जवते ।
ईषत्पिङ्गलो वा । कमनीयं शब्दं पिञ्जयति इति
वा । ‘श्वा’ आशुयायी । श्वयते र्वा स्याद् गति-
कर्मणः । श्वसिते र्वा । ‘सिंहः’ सहनात् । हिंसे
र्वा स्याद् विपरीतस्य । सम्पूर्वस्य वा हन्तेः ।
संहाय हन्ति इति वा । ‘व्याघ्रः’ व्याघ्राणात् ।
व्यादाय हन्ति इति वा ॥ १ ॥
अर्थ ।
यहांसे 'लुप्तोपम' जिनमें उपमावाचक लुप्त हो जाते हैं ऐसे
पदोंकी व्याख्या करेंगे । इनको आचार्य अर्थोपम कहते हैं । पूजा
प्रशंसा में 'सिंह' 'व्याघ्र' [ शब्द बोले जाते हैं । ] कुत्सा ( निन्दा )

हिन्दी निरुक्त । ८७
में 'श्वा' (कुत्ता) 'काक' (कौआ) शब्द। 'काक' यह शब्दके
अनुकरण पर नाम है। सो यह पक्षियोंमें प्रायकरके होता है।
“शब्दके अनुकरण नहीं है” यह औपमन्यव (उपमन्युका पुत्र)
मानता है। 'काक' (क्यों ?) अपकालयितव्य (हटाने योग्य)
होता है। 'तित्तिरि' (क्यों ?) तरनेसे। अथवा वह तिलके
बराबर चित्र वर्ण वाला होता है। 'कपिञ्जल' (क्यों ?) कपि
(वानर) के समान रङ्गमें होता है। अथवा बानरके समान भागता है।
अथवा कम (थोड़ा) पीलासा होता है। अथवा कमनीय (मनोहर)
शब्दको पिञ्जता (बोलता) है। 'श्वा' (क्यों ?) आशु (शीघ्र) चलता
है। अथवा गति अर्थमें 'शिव' (भ्वा० प०) धातुसे है। अथवा श्वास
अर्थमें 'श्वस्' (अदा० प०) धातुसे है। 'सिंह' (क्यों ?) सहन
करनेसे। अथवा हिंसा अर्थमें 'हिंस' (रु० प०) धातुके उलटे
रूपसे है। अथवा 'सम्' (उप०) सहित 'हन्' (अ० प०) धातुसे
है। 'व्याघ्र' (क्यों ?) विशेष सूंघनेवाला होनेसे। अथवा मुख
फैलाकर मारता है ॥ १ ॥
(खण्ड २)
[ निघ० ] अष॑ति (१)। गासति (२)।
रेभति (३)। स्तोभति (४)। शूर्द्धय॑ति (५)।
गृणाति (६)। जरते (७)। ह्वयते (८)। नदति
(६)। पृच्छति (१०)। रिहति (११)। धमति
(१२)। कृपायति (१३)। कृपयति (१४)।
पनस्यति (१५)। पनायते (१६)। वलगूयति
(१७)। मन्दते (१८)। भन्दते (१८)। छन्दति ।
(२०)। छदयते (२१)। शशमानः (२२)।

८८ ३ अ० ४ पा० २ खं० ।
रञ्जयति ( २३ ) । रजयति ( २४ ) । शंसति ( २५ ) ।
स्तौति ( २६ ) । यौति ( २७ ) । रौति ( २८ ) ।
नौति ( २९ ) । भनति ( ३० ) । पणायति ( ३१ ) ।
पणाते ( ३२ ) । सपति ( ३३ ) । प्रपृक्षाः ( ३४ ) ।
महयति ( ३५ ) । वाजायति ( ३६ ) : पूजयति (३७) ।
मन्यते ( ३८ ) । मदति ( ३९ ) । रसति ( ४० ) ।
स्वरति ( ४१ ) ! बेनति ( ४२ ) । मन्द्रयते ( ४३ ) ।
जल्पति ( ४४ ) । इति चतुश्चत्वारिंशत् पर्चति-
कर्माणः ॥ १४ ॥
[निघ०-] विप्रः ( १ ) । विप्रः ( २ ) । गृह्सः
( ३ ) । धीरः ( ४ ) । वेनः ( ५ ) । वेधाः ( ६ ) ।
कण्वः ( ७ ) । ऋभुः ( ८ ) । नवेदाः ( ९ ) । कविः
( १० ) । मनीषी ( ११ ) । मन्धाता ( १२ ) ।
विघाता ( १३ ) । विंपः ( १४ ) । मनस्विन् ( १५ ) ।
विपश्चित् ( १६ ) । विपन्त्यवः ( १७ ) । आकेनिपः
( १८ ) उशिजः ( १९ ) । कीस्तासः ( २० ) । अद्भा-
तयः ( २१ ) । मनयः ( २२ ) । मतुथाः ( २३ ) ।
वाघतः ( २४ ) । इति चतुर्विंशतिर्मेधाविना-

हिन्दी निरुक्त । ८६
[ निघ० ] रेभः (१) . जरिता (२) । कारुः
(३) । नदः (४) । स्तायुः (५) । कीरिः (६) ।
गौः (७) । सूरिः (८) । नादः (६) । बन्दः
(१०) । स्तुप् (११) । वद्रः (१२) । कृपण्युः
(१३) । इति त्रयोदश स्तोतृनामानि ॥ १६ ॥
[ निघ० ] यज्ञः (१) । वेनः (२) । अध्वरः
(३) । मेधः (४) । विदथः (५) । नार्य्यः (६) ।
सवनं (७) । होत्रा (८) । इष्टिः (६) । देव-
ता (१०) । मखः (११) । विष्णुः (१२) । इन्दुः
(१३) । प्रजापतिः (१४) । घर्मः (१५) । इति
पञ्चदश यज्ञनामानि ॥ १७ ॥
[ निघ० ] भारताः (१) । कुरवः (२) ।
वाघतः (३) । वृक्तबर्हिषः (४) । यतस्रुचः (५) ।
मरुतः (६) । सबाधः (७) । देवयवः (८) । इति
अष्टौ ऋत्विङ् नामानि ॥ १८ ॥
[ निघ० ] ईमहे (१) । यामि (२) । मन्-
महे (३) ! देहि (४) । शग्धि (५) । पृर्धि (६) ।
मिमिक्ष्वि (७) । मिमौहि (८) । रिरिड्ढिः (६) । रिरौढि
(१०) । पौपरत् (११) । यन्तारः (१२) । यम्बि

(१३) । इषुष्यति (१४) । मदेमहि (१५) ।
मनामहे (१६) । मायते (१७) । इति सप्तदश
याच्ञाकर्म्माणः ॥ १८ ॥
[ निघ० ] दाति (१) । दाशति (२) । दासति
(३) । राति (४) । रासति (५) । पृणक्ति (६) ।
पृणाति (७) । शिङ्क्ते (८) । तुञ्जति (६) ।
मंहते (१०) । इति दश दानकर्म्माणः ॥२०॥
[ निघ० ] परिस्रव (१) । पवस्व (२) । अभ्यर्ष
(३) । आशिषः (४) । इति चत्वारोध्ये षणा
कर्म्माणः ॥ २१ ॥
[ निघ० ] स्वपिति (१) । सस्ति (२) । इति
द्वौ स्वपिति कर्म्माणौ ॥२२॥
[ निघ० ] कूपः (१) । कातुः (२) । कत्र्तः
(३) । वभ्रः (४) । काटः (५) । खातः (६) ।
अवतः (७) । क्रिविः (८) । सूदः (६) । उत्सः
(१०) । ऋश्यदात् (११) । कारोतरात् (१२) ।
कुशयः (१३) । वीवटः (१४) ! इति चतुर्दश
कूपनामानि ॥ २३ ॥
[ निघ० ] तृपुः (१) । तक्मा (२) । रिभ्वा
(३) । रिपुः (४) । रिक्ता (५) । रिहायाः (६) ।

हिन्दी निरुक्त । ४१
तायुः ( ७ ) । तस्करः ( ८ ) । वनर्गुः ( ९ ) । दुरश्चित्
( १० ) । मुषौवान् ( ११ ) । मलिम्लुचः ( १२ ) ।
अघशंसः ( १३ ) । वृकः ( १४ ) । इति चतुर्दशैव
स्तेननामानि ॥ २४ ॥
[ निघ०-] निरायस् ( १ ) । सखः ( २ ) ।
अनुतः ( ३ ) । हिवक् ( ४ ) । प्रतीच्यम् ( ५ ) ।
अपीच्यम् ( ६ ) । इति षट् निर्णीतान्तर्हित-
नामानि ॥ २५ ॥
[ निघ०-] आके ( १ ) । पराके ( २ ) । पराचैः
( ३ ) । आरे ( ४ ) । परावतः ( ५ ) । इति पञ्च
दूरनामानि ॥ २६ ॥
[ निघ०- ] प्रत्नस् ( १ ) । प्रदिवः ( २ ) ।
प्रवयाः ( ३ ) । सनेमि ( ४ ) । पूर्व्यस् ( ५ ) ।
अम्हाय ( ६ ) । इति षट् पुराण नामनि ॥ २७ ॥
[ निघ०-] नवम् ( १ ) । नूतनम् ( २ ) । नूत-
नस् ( ३ ) । नव्यम् ( ४ ) । इदा ( ५ ) । इदानीम्
( ६ ) । इति षडेव नवनामानि ॥ २८ ॥
[ निरु०-] अर्चातिकर्माणः उत्तरे धातवश्चतु-
श्चत्वारिंशत् ॥

४२ ३ अ० ४ पा० २ सं० ।
मेधाविनामानि उत्तराणि चतुर्विंशतिः । मेधा-
वी कस्मात् ? मेधया तद्वान् भवति । 'मेधा' मतौ
धीयते ॥
स्तोतृनामानि उत्तराणि त्रयोदश ।
यज्ञनामानि उत्तराणि पञ्चदश । 'यज्ञः'
कस्मात् ? 'प्रख्यातं यजति कर्म'-इति नैरुक्ताः ।
याज्यो भवति-इति वा । यजुर्यत्नो भवति-इति
वा। 'बहुकृष्णाजिनः'-इति औपमन्यवः । 'यजूंषि
एनं नयन्ति'-इति वा ।
ऋत्विड् नामानि उत्तराणि अष्टौ । 'ऋत्विक्'
कस्मात् ? ईरणः । 'ऋग्यष्टा भवति'-इति शाक-
पूणिः । ऋतुयाजी भवति इति वा ।
याच्ञाकर्माणः उत्तरे धातवः सप्तदश ।
दानकर्माणः उत्तरे धातवो दश ।
अध्येषणाकर्माण उत्तरे धातवश्चत्वारः ।
स्वपिति, सस्ति-इति द्वौ स्वपितिकर्माणौ ।
कूपनामानि उत्तराणि चतुर्दश । 'कूपः'
कस्मात् ? कुपानं भवति । कुप्यते वा ।
स्तेननामानि उत्तराणि चतुर्दशैव । 'स्तेनः'
कस्मात् ? 'संस्त्यानमस्मिन् पापकम्'-इति नैरुक्ताः ।

हिन्दी निरुक्त । ३३
निर्णीतान्तर्हित नामधेयानि उत्तराणि षट् ।
( निर्णीतं कस्मात् ? निश्चितं भवति । )
दूरनामानि उत्तराणि पञ्च । 'दूरं' कस्मात् ?
द्रुतं भवति । दुरयं भवति ।
पुराणनामानि उत्तराणि षट् । 'पुराणं' कस्मात् ?
पुरातनं भवति ।
नवनामानि उत्तराणि षडेव । 'नवं' कस्मात् ?
आनीतं भवति ॥ २ ॥ ( १८ )
अर्थ ।
[ निरु० ] आगे पूजा में चवालीस ( ४४ ) धातु हैं ।
आगे मेधावी ( धारणावाली बुद्धिवाले ) के चौबीस ( २४ )
नाम हैं । 'मेधावी' क्यों है ? मेधासे मेधावान् होता है । 'मेधा'
( क्या ? ) मति ( बुद्धि ) में पुरुषकी एक शक्ति प्रकट होती है वह
मेधा है ।
आगे स्तोतृ ( स्तुति करने वाले ) के तेरह नाम ( १३ ) नाम हैं ।
आगे यज्ञके पन्द्रह ( १५ ) नाम हैं । 'यज्ञ' क्यों है ? “ 'यज्'
( भ्वा० उ० ) धातुका अर्थ ( यज्ञ ) लोकमें प्रसिद्ध है ।” यह
निरुक्त शास्त्रके आचार्य मानते हैं । अथवा इसमें याचना होती
है इससे ( यज्ञ ) है । अथवा यजुर्वेद ( मन्त्रों ) से गीला जैसा
होता है । [ क्योंकि-वेही उसमें बहुत होते हैं । ] “उसमें बहुत
काले अजिन ( मृगचर्म ) होते हैं । इससे 'यज्ञ' है” यह