निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( २४० ) ६ अ ०२ पा० १० खं० बधा हुआ होने से मृग या मृगमय कहा गया और दूसरे पक्ष में ढूंढना अर्थ में 'मृग' (चु० आ०) धातु से है ] “ गोभिः सन्नद्धा पतति प्रसूता” गो की चर्बी या बाधी से बंधे हुये धनुर्धारी से फेंके हुये चलते हैं [यह वाक्य (निरु० २ अ० २ पा० १ खं०) में व्याख्यान किया जा चुका है] । “यत्रानर संच विचद्रवन्ति” (यत्रनराः संद्रवन्ति च विद्रवन्ति च) जहां मनुष्य संघटित होते हैं = इकट्ठे होते हैं और विद्रुत हो जाते हैं = निकल जाते हैं- “तत्र संग्रामेषु) अस्मभ्यम् इषवः शर्म (शरणं) यंसन् [यच्छन्तु]” उन संग्रामों में इषु (बाण) हमारे लिये कल्याण या शरण देवें । 'अश्ववाजनी' [१५] को कशा = चाबुक ऐसा कहते हैं । ' कशा ' क्यों ? अश्व के लिये भय प्रकाश करती है । अथवा चर्म से भी कृश या अणु = सूक्ष्म होती है, इससे ' कशा ' है । और वाक् (वाणी) भी 'कशा' होती है । क्यों कि- वह अर्थों को प्रकाश करती है । अथवा खशया = आकाश में सोने वाली होती है, इससे 'खशया' होती हुई 'कशा' होजाती है अथवा शब्द अर्थ में 'क्रुश' (भ्वा० प०) धातु से है * क्यों कि वह क्रोशन की जाती है । [अथवा तीव्र वाक्य कोड़े के समान मर्म में लगता है, इससे वाणी भी कशा कही जाती है ।] अश्वकशा = घोड़े की चाबुक की यह ऋचा है॥९(१६)॥ (खं०१०) निरु०- “आजङ्घन्तिसान्वेषामघनाँउपजिघ्रते।
हिन्दी निरुक्त ( २४१ ) ६ अ० १ पा० १० खं० अश्वाजनि प्रचेतसोऽश्वान् समत्सु चोदय ॥ " [ऋ० सं० ५, ११, १, ३ ] ॥ । आजघन्ति सानूनि एषां सरणानि सक्थीनि । ‘सक्थिः’ सचतेः । आसक्तः अस्मिन् कायः । जघनानि च उपघ्नन्ति । ‘जघनं’ जङ्घन्यते । अश्वाजाने ‘ प्रचेतसः ’ प्रवृद्धचेतसः अश्वान् ‘समत्सु’ समरणेषु संग्रामेषु चोदय ॥ ‘उलूखलम्’उरुकरं वा । ऊर्ध्वखं वा । ऊर्करं वा । उरुमे कुरु इति अब्रवीत् तद् उलूखलम् अभवत् । “ उरुकरं वैतत्तदुलूखलम्-इत्याचक्षते परोक्षेण ” इति च ब्राह्मणम् । तस्य एषा भवति ॥ १० (२०) ॥ अर्थ:- “आजङ्घनन्ति०» हे ‘अश्वाजनि !’ चाबुक! ‘एषाम्’ ( अश्वानां ) ‘सानू’ ( सानूनि = सरणानि सक्थीनि) ‘आजङ्घन्ति !’ इन घोड़ों के सानु = ऊंचे ऊंचे सक्थि ॥ पुट्ठों को आघात करनेवाली ! ‘जघना’ ( जघनानि ) ( च ) ‘उपजिघ्रते !’ ( उपघ्नन्ति ! ) कमरके जोड़ों को ताड़न करने वाली ! ( त्वम् ) तू ‘प्रचेतसः’ जोशीले 'अश्वान्’ घोड़ों को ‘समत्सु’ ( समरणेषु = संग्रामेषु) संग्रामों में ‘चोदय’ प्रेरणाकर, जैसे कि- हम जीतें ॥ ‘ सानु ’ क्या, सक्थि-( साथल = ऊंचे कटि प्रदेश )
हिन्दी निरुक्त ( २४२ ) ६ अ ०२ पा० १० खं ० क्यों ! वे सरण होते हैं- उनके बल से चलने वाले चलते हैं। 'सक्थि' कैसे ? 'सञ्च' (भ्वा०प०) धातु से । क्यों कि- इसमें सब शरीर आसक्त = लदाहुआ होता है । 'जघन' क्यों ? वह बहुत फरके कोड़े से हनन = ताड़न किया जाता है । 'उलूखल' (१६) क्यों ? वह 'उरुकर' बहुत अन्न को करने वाला होता है । 'उरु' शब्द से पहिला पद और 'करोति' धातु से दूसरा पद है । अथवा 'ऊर्कर' = 'ऊर्क' शब्द करने वाला होने से 'उलूखल' है । 'ऊर्क्' शब्द से पूर्व पद और 'करोति' धातु से ही दूसरा पद है । अथवा 'ऊर्ध्वख' = ऊपर को छेद वाला = गड्ढे वाला होने से उलखल है । यहां 'ऊर्ध्व' शब्द से पहिला पद और 'ख' शब्द से दूसरा पद है । अथवा उसने किये जाते हुये ने कहा कि- 'मेराउरु (बहुत) ख (आकाश = छिद्र) कर' इससे वह 'उलूखल' हुआ क्यों कि- उसमें वैसा ही गुण देखा जाता है । "उरुकरं वैतत तद्- उलूखलम्- इत्याचक्षते परोक्षेण" अर्थात्- बहुत करने वाले को 'उरुकर' कहतेहैं, सो यह 'उरुकर' प्रत्यक्ष अर्थ का वाचक (शब्द) ही परोक्ष रूप में 'उलूखल' है ऐसा कहते हैं यह ब्राह्मण भी है । यहां 'उरुकर' प्रत्यक्ष शब्द में 'र' के स्थान में 'ल' और 'क'के स्थान में 'ख' बदलने से 'उल खल' परोक्ष शब्द बनजाता है । क्यों कि-इस रूप में वह अर्थ 'ल' और 'ख'से ढक(ढंप) जाता है । "तस्य०"उस'उलूखल'कीस्तुतिकीयहऋचाहै॥१० (२०)॥
हिन्दी निरुक्त ( २४३ ) ६ अ० २ पा० ११ खं० (खं०११) निरु०- “यच्चिद्धि त्वं गृहेगृहे उलूखलक युज्यसे । इह द्युमत्तमं वद जयता मिव दुन्दुभिः ॥”[ऋ० सं० १, २, २५, ५] इति सा निगद व्याख्याता ॥११[२१]॥ इति नवमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥९।२॥ अर्थः-“यच्चिद्धि०” इस ऋचा का शुनःशेप ऋषि है । और आयजी वाजसातमा” इसका भी । सोम के अभिषव (कूटने) में विनियोग है । और अग्निचयन में इस मन्त्र से उलूखल को अभिमन्त्रण करके रख दिया जाता है । हे ‘उलूखलक’ ऊखल ! ‘यच्चित् हि’ यद्यपि तू ‘गृहे गृहे’ घर घर में ‘युज्यसे’ अन्न के संस्कार के अर्थ रहता है, तथा- पि (त्वम्) तू ‘इह’ इस हमारे घर में ही ‘जयतां दुन्दुभिः इव’ जय प्राप्त करने वालों के नगारे के समान ‘द्युमत्तमम्’ गम्भीर शब्द ‘वद’ बोल = कर । क्यों कि- जो जीतते हैं उन्हीं का दुन्दुभिः गम्भीर स्वर लगता है, और जो हारते हैं उनकी दुन्दुभि का शब्द फींका होता है ॥ यह ऋचा अपने उच्चारण से ही व्याख्यान की हुई है ॥११(२१)॥ इति हिन्दीनिरुक्ते नवमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ तृतीयः पादः ( खं० १ ) निघ०- वृषभः॥१७॥ द्रुघणः ॥१८॥
हिन्दी निरुक्त ( २४४ ) ६ अ० ३ पा० २ खं० पितुः ॥१९॥ नद्यः ॥२०॥ आपः ॥२१॥ ओषधयः॥२२॥रात्रिः॥२३॥ अरण्यानी ॥२४॥ श्रद्धा ॥२५॥ पृथिवी॥२६॥अप्व्रा ॥२७॥ अग्नायी ॥२८॥ निरु०-‘वृषभः’ प्रजां वर्षति इति वा । अतिबृहति रेतः इतिवा । तद् वृषकर्म वर्षणाद् वृषभः॥ तस्य एषा भवति ॥१ [२२]॥ अर्थः- ‘वृषभ’ [१७] [सांड़] क्यों ? वह प्रजा = सन्तान को बरसता है। अथवा रेत या वीर्य को सेचनकरनेको अपनेको अतिशय से उद्यत करता है । सोही यह वृष ( बैल ) के कर्म वाला वर्षण कर्म से ‘वृषभ’ है । यहां ‘वृष’ शब्द में ‘भ’(प्रत्यय) जुड़ने से ‘वृषभ’ होता है ॥१[२२] ॥ ( खं० २ ) निरु०- “न्यक्रन्दयन्नुपयन्त एनममेहयन् वृषभं मध्य आजेः । तेन सूभर्वं शतमत् सहस्रं गवां मुद्गलः प्रधने जिगाय ॥”(ऋ० सं० ८,५,२०,५ )॥ “न्यक्रन्दयन्नुपयन्त एनम्”-इति व्याख्यातम्। अमेहयन् वृषभं मध्य आजेः = आजयनस्य = आजवनस्य-इति वा । तेन तं सूभर्वं राजानम् । ‘भर्वतिः’ अत्तिकर्मा । तद् वा सूभर्वं सहस्रं गवां मुद्गलः प्रधने जिगाय ।
हिन्दी निरुक्त ( २४५ ) ६ अ० ३ पा० २ खं० ‘प्रधन’ इति संग्रामनाम । प्रकीर्णानि अस्मिन् धनानि भवन्ति ॥ ‘द्रुघणः’द्रुममयोघनः। तत्र इतिहासम्-आचक्षते मुद्गलो भार्म्यश्व ऋषि वृषभं च द्रुघणं च युक्त्वा संग्रामे व्यवहृत्य आजिं जिगाय ॥ तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति ॥२(२३) ॥ अर्थ- “न्यक्रन्दयन्नुपयन्तएनम्” इसकी पृथक् २ पदों के रूप में व्याख्या होचुकी किन्तु एक वाक्य के रूप में यह व्याख्या है— मन्त्र को देखने वाला ऋषि कहता है—मुद्गल ऋषि मे किसी ने पूछा कि— तुमने बैल से इस राजा को कैसे जीता ऋषि ने उत्तर दिया कि— सुनो । — शत्रुओं ने ‘उपयन्तः पास जा जा कर ‘आजे’ (संग्रामस्य) संग्राम के ‘मध्ये’, मध्य में वर्त्तमान ‘एनम्’ इस ‘वृषभम्’ बैल को ‘न्यक्रन्दयन्’ थका- ना चाहा = दम उखाड़ना चाहा = ऐसा यत्न किया कि यह निष्क्रन्दन करे = हार कर बा बां करे और [ अपनी थकावट मिटाने के लिये-]‘अस्नेहयन्’इसे गोबर कराने का यत्न किया बीच में युद्ध बन्ध करके उसे अवकाश दिया कि- यह गोबर करके ( क्यों कि बैलों का ऐसा स्वभाव होता है कि— वे निचले खड़े होकर गोबर करते हैं) [किन्तु उनके दोनों यत्न निष्फल हुये, और अन्त में] ( अहम् ) मैंने ‘तेन’ उन पूर्वोक्त गुणों वाले ‘मुद्गलः’ मुद्गल इस बैल से ‘सूमर्ध’ (राजानम् ) सूमर्ध राजा से ‘ गवां’ ‘शतवत्-सहस्रम्’ गायों का एक लक्ष ‘जिगाय’ जीता ॥
हिन्दी निरुक्त ( २५६ ) ६ अ० ३पा० ३ खं० 'आजि' क्या ? संग्राम । क्यों ? वह आजयन होता है- उसमें दुर्बल को सबल जीत लेता है । अथवा आजवन है- एक पर एक वेग से जाता है । 'सुभर्व' क्या ? राजा । अथवा 'भक्ष' ( भ्वा० प० ) धातु भक्षण अर्थ में है, उसी से यह 'सुभर्व' है । क्या 'सुन्दर भक्ष्य = भाग्य वाला देश इसका है, इससे यह 'सुभर्व' है । 'प्रधन' यह संग्राम का नाम है, क्यों कि- इसमें प्रकीर्ण (बिखरे हुये) धन होते हैं । 'द्रुघण' (१०) क्या ? द्रुममय घन- काठ का बना हुआ यन्त्र 'द्रु' शब्द से पूर्व भाग और 'घन' शब्द से दूसरा भाग है उस 'द्रुघण' के सम्बन्ध में इतिहास कहते हैं- मुद्गल भृम्यश्व के पुत्र ऋषि ने वृषभ = बैलको और द्रुघण को जोड़ कर संग्राम में युद्ध करके आजि (संग्राम की बाजी को जीता। उसी इतिहास को कहने वाली यह ऋचा है ॥२(२३)॥ व्याख्या “न्यक्रन्दयन्०” मन्त्र में जो मुद्गल ऋषिका सुभर्व राजा के ऊपर बैल के द्वारा विजय कहा गया है, उसी के सदृश बाल्मीकीय रामायण में वसिष्ठ की कामधेनु का विश्वामित्र के साथ युद्ध का वर्णन भी मिलता है। ऐसे अर्थोंमें पुराणोंऔर वेदोंका कैसा अच्छा संवाद है, यह ध्यानमें देनेयोग्य है॥२(२३)॥ ( खं ३ ) निरु०- “इमं तं पश्य वृषभस्य युञ्जङ्काष्ठाया मध्ये द्रुघणं शयानम् । येन जिगाय शतवत्सहस्रं गवां मुद्गलः पृतनाज्येषु ॥” [ऋ०सं०८,५,२१,४]॥
हिन्दी निरुक्त ( २४७ ) ६ अ० ३ पा० ३ खं० इमं तं पश्य वृषभस्य सहयुजं काष्ठाया मध्ये द्रुघणं शयानं, येन जिगाय शतवत् सहस्रं गवां मुद्गलः पृतनाज्येषु।'पृतनाज्यम्' इति संग्रामनाम पृतनानाम्- अजनाद् वा । जयनाद् वा,। 'मुद्गलः' मुद्गवान् । मुद्गिलोवा। मदनं गिलति इतिवा। मदंगिलो वा । मुदं गिलोवा । 'भार्म्यश्वः' भृम्यश्वस्य पुत्रः । 'भृम्यश्वः' भृमयोऽस्य अश्वाः। अश्वभरणाद्वा॥ 'पितुः' इति अन्ननाम । पातेर्वा । पिवतेर्वा । प्यायतेर्वा । तस्य एषा भवति ॥३ [२४] ॥ अर्थ:- "इमं तम्०" युद्ध के समाप्त होते ही, जब कि- वृषभ के साथ गाड़ी में जुता हुआ ही द्रुघण था, किसी ने मुद्गल ऋषि से पूछा कि- तुमने किस की सहायता से राजा को जीता ? मुद्गल ने द्रुघण की ओर हाथ करके कहा कि- "इमं तं पश्य०" तू देख- उस इस बैल के साथ संयुक्त 'काष्ठा' गाड़ी के मध्यमें जुतेहुये या युद्धकेमध्यमेंभिड़े हुये द्रुघण को, जिससे मैं मुद्गल ने एक लाख गौएं युद्धों में जीती हैं। 'पूतनाज्य' यह संग्राम का नाम है । क्यों ? पृतनाओं के अजन (गमन) करने से । क्यों कि- उसमें पृतनायें या सेनायें गमन करती हैं। अथवा पृतनाओं के जय करने से यह पूत-
हिन्दी निरुक्त ( २४८ ) ६ अ० ३ पा० ४ खं० नाज्य है । क्यों कि- उसमें एक पक्षी की सेनायें दूसरे पक्ष की सेनाओं को जय (परास्त) करती हैं । 'मुद्गल' क्या ? मुद्गवाला = मूंग (अन्न) वाला। या मुद्गिल = मूंगों के गिलने वाला । [खाने वाला] अथवा मदन (काम) को गिलने वाला(जितेन्द्रिय)। अथवा मदंगिल = मद को निगलने वाला । अथवा मुदंगिल = हर्ष को निग- गलने वाला (विरक्त) । 'भार्म्यश्व' क्या ? भृम्यश्व का पुत्र । 'भृम्यश्व' क्या ? भूमि [घूमने वाले] इसके अश्व [घोड़े] हैं । अथवा अश्वों के भरण [पोषण] करने से वह 'भृम्यश्व' है। 'पितुः' (१९) यह अन्न का नाम है । कैसे ? रक्षा अर्थ में 'पा' [अदा० प०] धातु से है । क्यों कि- वह प्राणियों की रक्षा करता है । अथवा पान अर्थ में 'पा' (भ्वा० प०) धातु से है । क्यों कि- उसे प्राणी क्षुधाके निवारणार्थ पान करते हैं । अथवा वृद्धि अर्थ में 'प्याय' (भ्वा० आ०) धातु से है । क्यों कि- उससे प्राणी पुष्ट होते हैं । उस 'पितु' (अन्न) की यह ऋचा है ॥३ (२४)॥ (खं० ४) निरु०- “पितुं नु स्तोषं महो धर्म्माणन्तविषीम् । यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्व मर्दयत् ॥” (ऋ० सं० २, ५, ६, १) ॥ तं पितुं स्तौमि, महतो धारयितारं बलस्य, 'तविषी' इति बलनाम । तवतेर्वा वृद्धिकर्मणः। यस्य त्रितः 'ओजसा' बलेन
हिन्दी निरुक्त (२४६) ९ अ० ३ पा० ५ खं० 'त्रितः' त्रिस्थानः = इन्द्रः । 'वृत्रं' विपर्वाणं मर्दयति ॥ 'नद्यः' व्याख्याताः । तासाम्- एषा भवति ॥२(२५) अर्थः- "पितुं नु०” इस ऋचा का अगस्त्य ऋषि है। (अहं) मैं (तम्) उस 'महः' (महत्) महान् 'तविषीम्' (बलस्य) बलके 'धर्त्तारम्' [ धारयितारम् ] धारण करने वाले 'पितुम्' (अन्नम्) अन्न को 'स्तोषम्' (स्तौमि) स्तुति करता हूं 'यस्य' जिसके 'ओजसा' [बलेन] बलसे 'त्रितः' (त्रिस्थानः) त्रिलोकी के स्वामी [इन्द्रः] इन्द्र ने 'वृत्रम्' वृत्रको 'विपर्वम्' (विगतसन्धिपर्वाणम् ) उसके सन्धियों के बन्धनों को तोड़ कर 'विमर्द्दयत्' खूब मारा- जिससे कि- यह फिर न आवे ॥ 'तविषी' यह बल का नाम है। अथवा वृद्धि अर्थ में 'तु' (अदा० प०) धातु से है। क्यों कि- वह सब वस्तुओं से बड़ा है । 'नद्यः' (२०) [नदियें] ये यहां अवसर में आई हैं, किन्तु इनकी व्याख्या “नदना भवन्ति शब्दवत्यः” (अ० २ पा० ७ खं० २) यहां पर होचुकी । उन नदियों की यह ऋचा है ॥ ४ (२५) ॥ ( खं० ५ ) निरु० " इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि
हिन्दी निरुक्त ( २६० ) ६ अ० ३पा० ५ खं० स्तोमं सचता परुष्ण्या । असिक्न्या मरुद्वृधे वितस्तयार्जीकीये शृणुह्या सुषोमया ॥” (ऋ०सं० ८, ३, ६, ५ ) ॥ इमंमे गङ्गे! यमुने! सरस्वति! शुतुद्रि! परुष्णि! स्तोमम्, आसेवध्वम्, असिक्न्या चसह, मरुद्वृधे! वितस्तयाच, आर्जीकीये! आशृणुहि सुषोमया च, इतिसमस्तार्थः॥ अथ- एकपदनिरुक्तम्- 'गंगा' गमनात् । 'यमुना' प्रयुवती गच्छति- इति वा । प्रवियुतं गच्छति- इति वा । 'सरस्वती' 'सरः' इति उदकनाम। सर्त्तेः। तद्वती । 'शुतुद्री' शुद्राविणी = क्षिप्राविणी । आशुतुन्ना- इव द्रवति इति वा । 'इरावती ' = 'परुष्णी'- इत्याहुः । पर्ववती । भास्वती । कुटिलगामिनी । 'असिक्नी' अशुक्ला = असिता । 'सितम्'-इति वर्णनाम । तत्प्रतिषेधः असितम् । 'मरुद्वृधाः' सर्वा नद्यः । मरुतःएनाः वर्द्धयन्ति । 'वितस्ता' अविदग्धा । विवृद्धा । महाकूला । 'आर्जीकीयां' = 'विपाट्'- इत्याहुः । ऋजीक-
हिन्दी निरुक्त ( २५१ ) ६ अ० ३ पा० ५ खं० प्रभवा वा । ऋजुगामिनी वा । ‘विपाट्’ विपाट- नाद् वा । विप्राशनाद् वा । विप्रापणाद् वा । पाशाः अस्यां न्यपाश्यन्त वसिष्ठस्य मुमूर्षतः तस्माद् ‘विपाट्’ उच्यते । पूर्वम्- आसीद् ‘उरुञ्जिरा’ । ‘सुषोमा’ = सिन्धुः । यद्- एनाम्- अभिप्रसु- वन्ति नद्यः ॥ ‘सिन्धुः’ स्यन्दनात् ॥ ‘आपः’ आप्नोतेः । तासाम्- एषा भवति ॥ ५ (२६) ॥ अर्थः—“इमं मे०” हे मरुद्वृधे । = मरुतों से बढाई जाने वाली ! गङ्गे ! (१) हे ‘यमुने !’ (२) हे ‘सरस्वति !’ [३] हे ‘शुतुद्रि !’ (४) हे ‘परुष्णि !’ (५) (यूयम्) तुम सब ‘मे’ मेरे ‘इमं’ ‘स्तोमम्’ इस स्तोत्र को ‘आ-सचत’ (आसेवध्वम्) सेवन करो = उस पर ध्यान दो । हे ‘ मरुद्वृधे ! ’, ‘आर्जीकीये !’ (६) [त्वमपि] तूभी ‘असिक्न्या-’ (७) ( सह ) असिक्नी के साथ ‘वितस्तया’ (८) (चसह)और वितस्ता के सहित ‘सुषोम- या’(च)और सुषोमा नदी के सहित ‘आ-शृणुहि’ इधर ध्यान देकर मेरे स्तोत्र को सुन ॥ यह समस्त (मिलित) अर्थ है । अब एक पद निरुक्त है- ‘गङ्गा’ क्यों ? गमन से- गति अर्थ में ‘गम’ ( भ्वा०प०) धातु से है। क्यों कि- वह गमन करती है- चलती है। अथवा प्राणियों को उत्तम लोक को लेजाती है (१) । ‘यमुना’ क्यों? प्रप्रथन करती हुई जाती है- अपने जलों
हिन्दी निरुक्त ( २५२ ) ६ अ ० ३ पा ० ५ खं ० को और नदियों से मिलाती हुई चलती है।अथवा 'प्रवियुत' होकर चलती है-अपने तरङ्गो से स्थिर हुई जैसी चलती है [यह भाव त्रिवेणी संगमपर प्रयाग में देखा जासकता है] (२)। 'सरस्वती क्या ?'सरस्' यह जल का नाम है।'सृ' (जु०प०) धातु से है। तद्वती = सरस्वती = सरस्वाली होने से 'सरस्वती है वह विशेष प्रकार के जल वाली होने से 'सरस्वती' है। क्यो कि- राजसूय यज्ञ में सारस्वती जलो का अभिषेक के अर्थवाद (कथन) में देखा जाता है- “वरुणस्य वा अभि- षिच्यमानस्येन्द्रियं वीर्य्य मपाक्रामत्, तत् त्रेधा- भवत, भृगुस्तृतीयमभवत्, श्रायन्तीयं सरस्वती तृतीयं प्राविशत्” अर्थात्- अभिषेक किये जाते हुयेवरुण का इन्द्रिय वीर्य्य निकला,वह तीन भागोंमें हुआ, एकतृतीयंश भृगु हुआ , एक आयन्तीय और एक तृतीय भाग सरस्वती होकर प्रविष्ट हुआ । प्रयोजन यह कि- इसमें जो वरुण देव के वीर्य का तेज है, वही इसमें विशेष धर्म है,उसी के कारण यह'सरस्वती' है ( ३ )। 'शुतुद्री' क्यों ? 'शुद्राविणी' सो क्या ? शीघ्र बहने वाली 'शु' यह शीघ्र का नाम है। अथवा 'आशुतुन्ना इव द्रवति' शीघ्र तुन्न = किसी से वेधी हुई जैसी बहती है। 'आशु' से 'शु', 'तुन्ना' से 'तु' और 'द्रवति' से 'द्रु' लेकर 'शुतुद्री' शब्द बना ( ४ )। इरावती को 'परुष्णी' इस नाम से कहते हैं। वह 'परुष्णी'क्यों? पर्ववती = ग्रन्थि वाली होने से । क्याहुआ? वह कुटिलगामिनी है- टेढी मेढी चलती है, उसमें उसके
हिन्दी निरुक्त ( २५३ ) ९ अ० ३ पा० ५ खं० कुटिल भाव ही ग्रन्थि रूप हैं। अथवा 'भास्वती' होने से पर्ववती होकर 'पर्वणी' है। इस अर्थ में भासें = कान्तिये' ही पर्व हैं (५)। 'असिक्नी' क्यों? वहअशुक्ला है। सो क्या ? असिता = काली। सो कैसे ? 'सित' यह सुपेद वर्ण( रंग ) का नाम है। उसका निषेध 'असित' होता है। उस से काले जल वाली 'असिक्नी' है (६)। 'मरुद्वृधा' क्यों ? सब नदियें— यह सब नदियों का साधारण विशेषण है। क्यों कि—मरुत् उन्हें वृष्टि के द्वारा बढ़ाते हैं । इस लिये इस पद को मन्त्र में प्रत्येक नदी के नाम के साथ विशेषण देना चाहिये- हे मरुद्वृधे ! गङ्गे ! हे मरुद्वृध यमुने ! इत्यादि । 'वितस्ता' क्यों ? वह 'अविदग्धा' है और नदियों के समान यह दग्ध नहीं हुई- जली नहीं । क्यों कि— वैदेहक नाम एक अग्नि है, सुना जाता है कि—उसने और सबनदियों को जला दिया था औरइसे नहींजलाया'यह बात सामिधेनी ब्राह्मण में जानी जाती है। अथवा विवृद्धा बहुत बड़ी होने से या महाकूला होने से वह वितस्ता है (७)। 'आर्जीकीया' को 'विपाट्' या 'विपाशा' इस नाम से कहते हैं। 'आर्जीकीया' क्यों ? वह ऋजीक पर्वत से निकली है । अथवाऋजु(सीधा)गमन करती है।'विपाट्'क्यों ?'विपाटन से। क्यों कि- वह बहुत वेग वाली है, इससे चलती हुई पृथ्वी को पाटन करती है- फाड़ती है। अथवा विपाशन से = तोड़ने से इसमें क्या तोड़ा गया है ? सुना गया है कि-पुत्रमरण के शोकसे अपने को पाशों से बांध कर वसिष्ठ इस नदी में परने के अर्थ डूबे थे, उनकी ये सब फांसियां
हिन्दी निरुक्त ( २४४ ) ६ अ० ३ पा० ५ खं० जलसे टूट गईं, उस काल से इसका 'विपाट्' नाम कहा जाता है । उससे पहिले यह नदी 'उरुञ्जिरा' नाम से थी । 'उरु- ञ्जिरा' नाम बहुजला का है । (८) 'सुषोमा' नाम सिन्धु नदी का है। क्योंकि-और नदियां इसे अभिमसय = संगम करती हैं । 'सिन्धु' क्यों ? स्यन्दन से = बहने से । क्योंकि-वह वेग से बहता है (६) । 'आपः' (२१) (जल) यह पद व्याप्ति अर्थ में 'आप' (स्वा०प०) धातु से है। क्योंकि इनसे सब व्याप्त होता है । उन जलों की यह ऋचा है-॥ ५ (२६) ॥ व्याख्या । हमारे वेदानभिज्ञ वैदिक सहयोगी जो गङ्गा आदि तीर्थों में पावन शक्ति को नहीं मानते और उसका वेदमन्त्रों में अभाव समझ कर पुराणों पर खुनसाया करते हैं, उन्हें "इमं मे गङ्गे०" यह मन्त्र पढकर कुत्साकलुषित अपनी बाणी को "हे गङ्गे" एक बार कहकर धोडालना चाहिये । इस मन्त्र में एक ही साथ सब पवित्र नदियों के नाम हैं किन्तु सब में पहिले "गंगे" पद है, इससे "नदीनां च यथा गंगा" वाक्य का मूल भी यही मन्त्र है। क्योंकि- "अभ्यर्हितं पूर्वम्" 'पूज्य का नाम पहिले होता है' यह स्मृति है । इस मन्त्र के भाष्य में भाष्यकार मन्त्र के व्याख्यान करने की एक रीति प्रदर्शित करते हैं, जैसे-"इति समस्तार्थः"
हिन्दी निरुक्त ( २५५ ) ६ अ० ३ पा० ६ खं० “अथ एकपदानिरुक्तम् ” पहिले मन्त्र का समस्त या मिलित अर्थ करना चाहिए और फिर एक २ पदका निर्वचन क्योंकि-बीचमें एक २ पद की स्वतन्त्र २ व्याख्या करने से वाक्यार्थ का ग्रहण विलम्बित हो जाता है ॥ ५ ( २६ ) ॥ (खं०६) [निरु०-आपोहिष्ठामयो भुवस्तान ऊर्जेदधातन । महेरणाय चक्षसे ॥ ” [ ऋ० सं०७,६,५,१ ] ॥ आपो हि स्थ सुखभुवः, तानो अन्नाय धत्त, महते च नो रणाय रमणीयाय च दर्शनाय ॥ ‘ओषधयः’ ओषद् धयन्ति-इति वा । ओषति एना धयन्ति इति वा । दोषं धयन्ति-इति वा । तासाम्-एषा भवति- ॥ ६ ( २७ ) ॥ अर्थः-“आपोहिष्ठा०”इस ऋचाका सिन्धुद्वीप ऋषि है। हे ‘आपः ! ’ जल ! (यूयम्) तुम ‘आपः’ व्यापन करने वाले ‘स्थ’ हो । ‘मयोभुवः’ ( सुखभुवः ) सुखको उत्पन्न करने वाले हो । ‘ताः’ सो आप ‘नः’ हमें ‘ऊर्जे’ ( अन्नाय ) अन्न के लिये ‘दधातन’ ( धत्त = धारयत ) धारण करो-जिसप्रकार हम अन्नको प्राप्त हों ऐसा करो । ‘महे-रणाय’ (महते रमणी- याय ) और महान् रमणीय = सुन्दर धनके अर्थ, और ‘चक्षसे’ ( दर्शनाय ) श्रुति, स्मृति में कहेहुए अर्थ के यथार्थ ज्ञान के लिये हमें धारण करो-जिसप्रकार यह सब हमें मिले ऐसाकरो। ‘ओषधयः’ (२२) (ओषधिएं ) क्यों ? ‘ओषद् धयन्ति’ जो कुछ शरीर में क्षय आदि रोग होता है, उसे सेवन की
हिन्दी निरुक्त ( २५६ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं० हुईं नाश करदेती हैं या पानकर जाती हैं। अथवा ‘ओषति एना धयन्ति’ किसी अङ्ग को रोगी होने पर प्राणी इन्हें पान करते हैं। इन दोनों व्याख्याओं में ‘ओषति’ (भ्वा०प०) धातु से पूर्वभाग और ‘धयति’ (भ्वा० प०) धातु से दूसरा भाग है। मिलकर ‘ओषधि’ शब्द बनजाता है। पहिली व्याख्या में कर्तृ कारक और दूसरी में कर्म कारक वाच्य है अथवा ‘दोषं धयन्ति’ वात, पित्त आदि दोष को पान करती हैं, इस से ये ‘ओषधि’ हैं। उन (ओषधियों) की यह ऋचा है— ॥ ६ (२७) ॥ (खं० ७) निरु०– "या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्य- स्त्रिर्युगं पुरा। मनैनुबभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च॥” (ऋ०सं० ८, ५, ८, १) ॥ या ओषधयःपूर्वा जाता देवेभ्यः त्रीणि युगानि पुरा, मन्ये नु तद् बभ्रूणाम्– अहं बभ्रुवर्णानां हरणानां भरणानाम्– इति वा। ‘शतं धामानि सप्त च’ । धामानि त्रयाणि भवन्ति— स्थानानि, नामानि, जन्मानि–इति। जन्मानि अत्रअभि- प्रेतानि। सप्त शतं पुरुषस्य मर्मणां, तेषु एना दधति– इति वा ॥ ‘रात्रिः’ व्याख्याता। तस्य एषा भवति ॥ ७[२८] ॥
हिन्दी निरुक्त ( २५७ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं० अर्थ:-“ या ओषधीः” यह ऋचा ओषधि- सूक्त में पहिली ही है । अग्नि चयन कर्म में इस मन्त्र से क्षेत्र में ग्राम्य और वन्य (बनकी) ओषधियें बोई जाती हैं । 'याः' जो 'ओषधीः' ( ओषधयः ) ओषधियें ' देवेभ्यः' देवताओं से 'त्रियुगम्' (त्रीणि युगानि) तीन युग'पूर्वाः'पहिले 'जाताः' उत्पन्न हुई हैं—आद्य कल्प में कलि, द्वापर, और त्रेता युग से पूर्व कृतयुग में देवताओं से पहिले जन्मी हैं, क्यों कि— अन्न के विना देवताओं का जीवन या उनकी स्थिति नहीं हो सकती इससे ये देवताओं से पहिले ही हुईं, ' तद् ' (तांसाम्) उन 'बभ्रूणाम्'(बभ्रुवर्णानाम् ) कपिल वर्णवालियों के [हरणानाम् ] अथवा भूख आदि को हरने बालियों के (भरणानाम्—इति वा) अथवा प्राणियों के भरण = पोषण करने बालियों के 'अहम्' मैं 'शतम्' सौ (१००) (सप्त-च)और सात (७) कुल (१०७) धामों को 'मन्वे' [मन्ये] मानता हूं । धाम क्या? 'धाम शब्द के तीन अर्थ होते हैं—स्थान(१) नाम (२) और जन्म (३) उनमें यहां पर जन्मों से अभिप्राय है— अर्थात्— ओषधियों की एक सौ सात (१०७) जातियों को मानता हूं = जानता हूं । अथवा पुरुष के एक सौ सात ( १०७ ) कर्म- स्थान हैं, सभ्हीं में ये ओषधिये' प्राणियों को धारण करती हैं । इस पक्ष में ' धाम ' नाम स्थान का हो जाता है ॥ 'रात्रि'[२३]पद व्याख्यान किया जाचुका— “रातेर्दा- नकर्मणः” [निरु० २ अ०६ पा० १ खं० ]॥ “तस्याः” उस 'रात्रि' की यह ऋचा है ॥७(२८)||
(खं० ८) निरु०- “आ रात्रि ! पार्थिवं रजः पितुरप्रायि धामभिः । दिवःसदांसि बृहती वितिष्ठसे आत्वेषं वर्त्तते तमः ॥” (अथ०सं०का०१९अ०६सू०४७) । आपूपुरः त्वं रात्रि! पार्थिवं रजःस्थानैर्मध्यमस्य, दिवः सदांसि बृहती महती वितिष्ठसे आवर्त्तते त्वेषं तमो रजः ॥ ‘अरण्यानी’ अरण्यस्य पत्नी । ‘अरण्यम्’ अपार्णम् । ग्रामाद् अरमणं भवति इति वा । तस्य एषा भवति ॥८ [२९] ॥ अर्थ.-“आ रात्रि !” इस ऋचा का कुशिक ऋषि है अथवा रात्रि । हे ‘रात्रि !’ (त्वम्) तूने ‘पार्थिवं- रजः’ पृथिवी लोकको ‘आ- अप्रायि’ [ आपूपुरः ] पूर्ण किया है— अन्धकार से व्याप्त किया है । क्या इतना ही ? नहीं— ‘पितुः’ [मध्यमस्य] मध्यम लोक के धामभिः [स्थानैः] स्थानों के सहित- अन्तरिक्ष लोक को भी अन्धकार से छादेती है । क्या यही ? नहीं— ‘दिवः’ [द्युलोकस्य] द्यु लोक के ‘सदांसि’ स्थानों को भी-जिन में द्युलोक वासी जन निवास करते हैं अंधेरे से ढांपलेती है । ‘बृहती’ (महती) बड़ी ( त्वम् ) तू ‘वितिष्ठसे’ दबाकर स्थित होती है— क्यों कि- तू महती है, इस से दूर देशमें रहती हुई
हिन्दी निरुक्त ( २६९ ) ६ अ० ३पा० ६ खंड भी जम करके स्थित होती है। इतनाही नहीं किन्तु - 'त्वेषम्' ( महत् ) अपार 'तमः' ( रजः ) अंधेरा 'आवर्तते' लौटता है-इतना अधिक तेरा अन्धकार है कि-वह सारी त्रिलोकी को पूरण करके भी बचता है और वह इधर ही '( पृथिवी लोक में ) लौट आता है। ऐसे प्रभाव वाली तू हमारे लिये कल्याण रूप हो ॥ 'अरण्यानी' (२४) क्या ? अरण्य (वन) की पत्नी (स्त्री) । 'अरण्य' क्यों ? वह 'अपार्ण ' = अपगतजल = निर्जल होता है। अथवा ग्राम की अपेक्षा अरमण = असुन्दर होता है। “तस्या०”उस (अरण्यानी) की यह ऋचा है-॥८(२६) ॥ ( खं०६ ) निरु०-“अरण्यान्यरण्यान्यसौ या प्रेव नश्यसि कथा ग्रामं न पृच्छसि न त्वा भीरिव विन्दती ३॥ ( ऋ० सं० ८, ८, ४, १) ॥ 'अरण्यानि !' इति एनाम् आमन्त्रयते । या असौ अरण्यानि वनानि पराची इव नश्यसि, कथं ग्रामं न पृच्छसि, 'न त्वा भीर्विन्दति-इव' इति 'इवः' परिभयार्थेवा । 'श्रद्धा' श्रद्धानात् । तस्या एषा भवति-॥ ९ [३०] ॥ अर्थ:- “अरण्यान्यरण्यानि०” इस ऋचाका ऐरम्मद्