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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त (४०) ४ अ० १ पा० ८ खं०

है। क्योंकि- 'ईषति' (धा० गत्यर्थों में पढ़ा हुआ है। अथवा
'एषण' शब्द से है। क्योंकि-वह इच्छावाला होता है। ('इष्'
इच्छायाम् (तु० प०) धातु है।) अथवा 'ऋर्षण' या
'ऋषण' शब्द से है। [क्योंकि-वह सब पदार्थों का दर्शन
करने वाला होता है।] 'ते' तेरा, जो हमारा भाग है 'सुत'
निचोड़कर तैयार किया हुआ रस उसे मनसे बाप के धन के
समान भक्षण करें। और हे सोम राजन् ! तुम हमारी आयुयों
को बढ़ाओ। सूर्य जिस प्रकार वासर या वसन्त के दिनों को
(बढ़ाता है।)
'वासर' क्यों ? वे वेसर हैं, अर्थात् शीत और उष्ण
(गर्मी) दोनों से चलते हैं। रात्रि में ठंडक, दिन में गरमी
अथवा विवासन या शीत को नाश करते हैं। अथवा गमन या
फैलने वाले होते हैं॥
'कुरुतन' (८) "अनर्थक जिन का कोई अर्थ नहीं)
उपजन (प्रत्यय) होते हैं।" अर्थात् जो ही अर्थ 'कुरुत'
(तुम सब करो) पद से होता है, वही अर्थ 'कुरुतन' पद से
होता है। सुतराम् यहां 'न' का कोई अर्थ नहीं, इसी से यह
अनर्थक है। इसी प्रकार और और स्थलों में अनर्थक प्रत्यय
आते हैं। जैसे—'कर्त्तन' 'हन्तन' 'यातन'।
'जठर' (६) 'जठर नाम उदर (पेट) का है। क्यों ?
इस में जग्ध (खाया हुआ) धरा जाता या रखाजाता है ॥७॥
१ (ख०८)
[निरु०] "मरुत्वाँइन्द्रवृषभो रणाय पिबासोम
१—"मरुत्वां इन्द्र" इति विश्वामित्रस्येयमार्षम् ।
त्रिष्टप् छन्दः। महाव्रते पृष्ठ्यस्य चतुर्थेऽहनि शस्यते।" ॥४,१॥

हिन्दी निरुक्त ( ४१ ) ४ अ० १ पा० ८ सं० मनुष्वधं मदाय । आसिञ्च स्वजठरे मध्वऊर्मिं त्वं राजासि प्रदिवः सुतानाम् ॥ ( ऋ० सं० ३, ३, ११, १ ) ( भा० ) “ मरुत्वानिन्द्र ” मरुद्भिस्तद्वान् । 'वृषभः' वर्षिता अपाम् 'रणाय' रमणीयाय संग्रामाय । पिब सोमम् अनुष्वधम् अन्वन्नम् 'मदाय' मदनीयाय जैत्राय । आसिञ्चस्वजठरे मधुनः ऊर्मिम् । 'मधु' सोमम्-इतिऔपमिकम् । माद्यतेः। इदमपि इतरत् मधु एतस्मादेव । त्वंराजासि पूर्वेषु अपि अहःसु सुतानाम् ॥८॥ इति चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥४,१॥ अनुवादः । मन्त्रार्थ व निरुक्तार्थ ।— हे ' इन्द्र ! ' जोतू मरुत्वान् मरुतों ( वायुओं ) से उन वाला ( मरुतों वाला ) या उनका स्वामी [ कहलाता है ] 'वृषभः' जलों का वर्षने वाला है, रण या रमण के देने वाले संग्राम के उद्देश्य से ' मदाय ' मदनीय या हर्ष-दायक या ' जैत्र ' जय-दायक मद के अर्थ ' सोमम् ' सोम रस को ' अनुष्वधम् ' अन्न खा-खाकर 'पिब' पी । [ कम नहीं, बल कि ] ' स्वजठरे ' अपने पेट में 'मधुनः' सोम की ' ऊर्मिम् ' लहरी को ' आसिञ्च ' खूब सींच । 'मधु' सोम का औपमिक ( उपमा से ) नाम है । [अर्थात् मद्य के समान मद का देने वाला है । ] हर्ष अर्थ में ' मद् ' ६

हिन्दी निरुक्त ( ४२ ) ४ अ० २ पा० १ ख० ( दिवा० प० ) धातु से है । यह भी मधु (शहद या मद्य ) इसी धातु से है । हे इन्द्र ! 'प्रदिवः' पहिले दिनों में 'सुता- नाम्' बनाए हुये सोम रसों का भी 'त्वम्' तू 'राजा' 'असि' है ॥ ८ ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ ४,१ ॥ चतुर्थेऽध्याये द्वितीयः पादः ( ख० १ ) [निरु०] तितउ (१०) परिपवनं भवति । ततवद्वा । तुन्नवद्वा । तिलमात्रतुन्नमिति वा ॥ १ ( ९ ) ॥ अनुवादः । [निरुक्तार्थः-] 'तितउ' (१०) परिपवन अर्थात् जिससे सत्त छाने जावें ऐसी चालनी का नाम है । 'तितउ' क्यों ? तत (चर्म) से मँढा हुआ होता है । अथवा तुन्नों (छिद्रों) वाला होता है । अथवा उसमें तिलके बराबर तुन्न ( छिद्र ) होते हैं ॥ १ ( ९ ) ॥ १ ( खं०२) [निरु०-] “सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसावाचमक्रत अत्रासखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि ॥ ” [ ऋ० सं० ८, २, २३, २ ] १-“सक्तुमिव तितउना” इति विद्यासूक्तं बृहस्पतेरार्षम् ।

हिन्दी निरुक्त ( ४३ ) ४ अ० २ पा० २ ख० (भा०) सक्तुमिव परिपवनेन पुनन्तः । 'सक्तुः' सचतेः । दुर्धावोभवति । कसतेर्वा स्याद् विपरीत- तस्य । विकसितो भवति । [ द्वि० पा०- ] “ यत्र धीरा मनसा वाच-” मकृषत । [व्याख्यान्तरम्-] प्रज्ञानं धीराः,-प्रज्ञानवन्तः, ध्यानवन्तः । [तृ०च० पा०-] तत्र “सखायः सख्यानि” सं “ जानते ” “ भद्रैषां लक्ष्मी र्निहिताधिवाचि” ॥ ‘ भद्रं ’ भगेन व्याख्यातम् । भजनीयं भूता- नाम् । अभिद्रवणीयंम् । भवदूरमयति- इतिवा । भाजनवद्वा । 'लक्ष्मीः' लाभाद्वा । लक्षणाद्वा ( लप्स्यनाद्वा । ) लञ्छनाद्वा । लषतेर्वा स्यात् प्रेप्साकर्मणः । लग्यतेर्वा स्याद्- आश्लेषकर्मणः । लज्जतेर्वा स्याद्-अश्लाघाकर्मणः ॥ ‘ शिप्रे ( ११ ) ’ इति उपरिष्टाद् व्याख्या- स्यामः ॥ २ ( १० ) ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थः- 'यत्र' जहां 'इव' जैसे (कोई) 'तितउना' परि- पवन या चालनी से 'सक्तुम् सत्तू को 'पुनन्तः' पवित्र करते हैं ( करते हुये होते हैं ) 'धीराः' विद्वान् पुरुष 'मनसा' मन से शब्द और अर्थ का निश्चय करके 'वाचम् वाणीको 'अक्रत'

हिन्दी निरुक्त ( ४४ ) ४ अ० २ पा० २ खं० न्याय युक्त करते हैं, । 'अत्र' वहां 'सखायः' समान ज्ञान वाले 'सख्यानि' समान शास्त्रों में परिश्रम किये हुओं के विज्ञानाँ को 'जानते' जानते हैं । [किन्तु दूसरा नहीं ।] क्योंकि-'एषाम्' इनकी 'अधि-वाचि' वाणी के ऊपर 'भद्रा' सुखदायक 'लक्ष्मीः' लक्ष्मी 'निहिता' स्थापित है ॥ [निरुक्तार्थ-] सक्तूके समान परिपवन (चालनी) से पवित्र करते हुए । 'सक्तु' , लगना अर्थ में 'सञ्च' ( भ्वा०प०) धातु से है क्योंकि-वह दुर्धाव या कठिनाई से धोया जाने वाला होता है । अथवा उलटे हुए 'कस' (भ्वा०प०) धातु से हो-सकता है। क्योंकि ! वह विकसित या फूला हुआ होता है। यहां धीर पुरुष मन से बाणी को न्याययुक्त करते हैं। अथवा 'धीर' धी या प्रज्ञावाले, वा धी या ध्यान-वाले पुरुष 'वाच्' नाम प्रज्ञान ( प्रकृष्ट ज्ञान ) को करते हैं। तहां 'सखा' समान विद्यावाले सख्य समानविद्यावालों की विद्याकी उन्नति को अच्छी तरह जानते हैं । इनकी बाणीके ऊपर भद्र (वाञ्छनीय) लक्ष्मी स्थापित है । 'भद्र' 'भग' शब्दसे व्याख्यान किया गया । ( दोनों शब्दोंकी समान व्याख्या है । ) 'भग' क्यों ? प्राणियों का भजने योग्य है, या प्राणी उसे भजते हैं । अथवा उसकी ओर भागते हैं । अथवा 'भवत्' (होता हुआ) रमण (रति) देता है । ( क्योंकि- जिसके वह होता है, वह रमता है ) अथवा सुकृती जन उस के भाजन होते हैं, इस से भग है । 'लक्ष्मी' क्यों ! लाभ से । ( क्योंकि-उसे लक्ष्मीवाले ही लभते या प्राप्त होते हैं । अथवा लक्षण से । ( क्योंकि- लक्ष्मी- वान् पुरुष लक्षित ( चिन्हित ) जैसा हो जाता है । ) अथवा

हिन्दी निरुक्त ( ४५ ) ४ अ० २ पा० ३ खं० लञ्छन से। (क्योंकि- लक्ष्मीवान् उससे लञ्छित जैसा हो जाता है।) अथवा प्रेप्सा (बड़ी लालसा) अर्थमें 'लष' (भ्वा०प०) धातु से हो। क्योंकि- सभी उसे बहुत चाहते हैं।) अथवा आश्लेष (चपकना) अर्थ में 'लग' (स्वा० प०) धातु से है। (क्योंकि- वह पुरुष के साथ लगी हुई जैसी होती है॥) 'शिप्रे' (११) इसकी आगे व्याख्या करेंगे॥ ३ (१०)॥ १ (३ खं०) [निरु०] "तत्सूर्य्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्त्तोर्विततं सञ्जभार। यदेदयुक्तं हरितः सध- स्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै॥" (ऋ० सं० १, ८, ७, ४,) (भा०) तत्सूर्य्यस्य देवत्वं तन्महित्वं, मध्ये यत्कर्मणां क्रियमाणानां विततं संह्रियते। यदा- असौ-अयुक्त हरणान् आदित्यरश्मीन्। हरितः अश्वान्-इतिवा। अथ रात्री वासस्तनुते सिमस्मै। वेसरम् अहः-अवयुवती सर्वस्मात्। अपिवा उप- मार्थे स्यात्-'रात्री-इव वासस्तनुते' इति। तथापि निगमो भवति। "पुनः समव्यद् विततं वयन्ती" [ऋ० सं० २, ८, २, ४, ]। (भा०) समनात्सीत्॥ ३ (११) १ "तत्सूर्य्यस्य देवत्वम्" इति आङ्गिरसस्य कुत्सस्य इयमार्षम् त्रिष्टुप् छन्दः। सौर्य्यस्य पशोः षडर्चे वपाया याज्या

हिन्दी निरुक्त ( ४६ ) ४ अ० २ पा० ३ खं० अनुवादः । मन्त्रार्थः—मैं 'सूर्यस्य' भगवान् सूर्य के 'तत्' उस 'देवत्वम्' देवताभाव को 'तत्' उस 'महित्वम्' महिमा को जानता हूँ कि-उसने 'कर्त्तोः' कुल कर्मकर्त्ताओं के 'मध्या' मध्य में या साझने 'विततम्' यह प्रकाश जाल फैलाया । और भी बड़ी भारी महिमा यह है कि 'संजभार' जो प्रकाश समूह औरों से बहुत काल में भी हटाया जाना कठिन है, उसे बिना ही परिश्रम के एक ही क्षण में सायंकाल के समय स्वयम् सूर्य देव हटा देते हैं । यदा-इत् जिसी समय सूर्य भगवान् अस्त होते हुये 'हरितः' रस (जल) के हरने वाले किरणों को 'सध- स्थात्' पृथिवी लोक से खैंच कर 'अयुक्त' अपने में रख लेते हैं 'आत्' उसी समय 'रात्री' 'वासः' सब लोक से दिन को खैंच कर 'सिमस्मै' सब लोक के लिये 'तनुते' अन्धकार को फैला देती है । अर्थात् यह सूर्य देव की ही महिमा है, कि उस के निकट होने से अँधेरा नष्ट होता है, और उस से त्यागे हुए देश में अन्धकार छा जाता है ॥ निरुक्तार्थ—सूर्य का वह देव भाव और वह महिमा है, जो किये जाते हुए कर्मों के स्थल में फैला, हुआ (प्रकाश) संहार किया जाता है । जब उस ने (वह) हरणों या आदित्य की रश्मियों को जोड़ा (जोड़ता है) । अथवा हरितों नाम अश्वों को । उसी समय सब के लिये रात्री दिन को (हटाकर) (अँधेरे को) फैलाती है । 'वेसर' नाम दिन को सब से हटा कर अपने में मिलाती हुई । अथवा उपमा अर्थ में हो-'जैसे रात्री दिन को (हटा कर) (अँधेरे को) फैलाती है' यह

हिन्दी निरुक्त ( ४७ ) ४ अ० २ पा० ४खं० वैसा भी निगम (बोधक मन्त्र) है ।—"पुनः समव्यत्००" [ ऋ० सं० ३, ८, २, ४, ] अर्थात् जैसे कोई स्त्री वस्त्र को बिनती हुई अस्त काल में फैलाए हुए तन्तुओं को फिर समे- टती है, और फिर उदय काल में फैलाती है, ऐसे यह रात्रि उदय काल में तम को समेटती है, और अस्तकाल में फिर उसे फैला देती है ! ( भा० ) 'समानात्सीत्' लपेट लेती थी या लपेट लेती है ॥ ३ ( ११ ) ॥ ( खं ४ ) १ [निरु-०] " इन्द्रेण संहिदृक्षसे सञ्जग्मानो अबिभ्युषा । मन्दूसमानवर्चसा ॥" [ ] (भा-०) इन्द्रेणाहि सन्दृश्यसे, सङ्गच्छमानः- अबिभ्युषा गणेन । मन्दू मदिष्णू युवांस्थः । अपि वा 'मन्दुना तेन-' इति स्यात्, 'समानवर्चसा'- इत्येतेन व्याख्यातम् ॥ ४(१२) ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थ- निरुक्तार्थ- हे भगवन् ! इन्द्र ! तू 'अबिभ्युषा' भय रहित 'इन्द्रेण' ईश्वर के अथवा प्रदीप्त मरुद्-गण के साथ 'सञ्जग्मानः' नित्य ही मिलता हुआ 'संदृक्षसे' दिखाई देता है १ "इन्द्रेण संहि दृक्षसे" इति मधुच्छन्दसः इदमार्र्षम् । महाव्रते मरुदुक्थे तृचाशीतिषु शस्यते । सात्रिकेषु च अहःसु स्तो- मातिवृद्धौ प्रातःसवने ब्राह्मणाच्छंसि शस्त्रे इन्द्र उच्यते ।

हिन्दी निरुक्त ( ४८ ) ४ अ० २ पा० ५ खं० तुम दोनों [इन्द्र और मरुद्गण] 'मन्दू' हर्ष-स्वभाव और 'स- मान वर्चसा' समान तेज वाले हो । [ यह व्याख्यान 'मन्दू 'समान वर्चसा' इन दोनों पदों को द्विवचन समझ कर किया (१३) गया । ] अथवा 'मन्दू' (मन्दुना) हर्ष स्वभाव 'समान वर्चसा' समान तेज वाले 'मरुद्गणेन' मरुद्गण के साथ,*-इस रीति से दोनों ['मन्दू' 'समान वर्चसा'] पदों को तृतीया विभक्ति के एकवचन में समझ कर व्याख्यान हो सकता है । 'समानवर्चसा' यह पद 'मन्दू' इस पदके साथ व्याख्यान किया गया ॥४(१२)॥ (खं० ५) १ (१४) [निरु०-] “ईर्मा॒न्तास॑: सि॒लि॒कम॑ध्यमासः संशू॒- रणासो॑ दि॒व्यासो॒ अत्या॑: । हंसा इ॑व श्रेणि॒शो यतन्ते॒ यदाक्षि॑षु॒र्दिव्य॒मज्म॒मश्वा॑:॥” [ २,३,१२,१०] (भा०) इर्मान्ताः समीरि॑तान्ताः (सुसमीरितान्ताः) पृथ्वन्तावा । ‘सिलिकमध्यमाः' संसृतमध्यमाः । शीर्षमध्यमा वा । अपिवा शिर आदित्यो भवति । यदनुशेते सर्वाणि भूतानि, मध्ये च एषां तिष्ठति । इद- मपि इतरत् ‘शिरः’ एतस्मादेव । समाश्रितानि एतत् इन्द्रियाणि भवन्ति । ‘संशूरणासः’ (दिव्यासो- १-“ईर्मान्तासः” इति दीर्घतमसः आर्षम् । “यमेन दत्तम्” इति द्वयं च, द्वे अप्येते अश्वस्तोमीये सूक्ते, तेन च अश्वः स्तूयते अश्वमेधे, आदित्यस्य रथे ये अश्वा युक्तास्ते उच्यन्ते ।

हिन्दी निरुक्त \qquad ( ४६ ) \qquad ४ अ० २ पा० ५ खं० अत्याः) 'शूरः' शवतेर्गतिकर्मणः । 'दिव्याः' दिवि- जाः । 'अत्याः' अतनाः । "हंसाइव श्रेणिशो य- तन्ते ।” 'हंसाः' हन्तेः। घ्नन्ति-अध्वानम्। (श्रेणि- शः इति) 'श्रेणिः' श्रयतेः । समाश्रिता भवन्ति । “यदाक्षिषुः” यदापन् । “दिव्यम्-अज्मम्” अजनि- म्, आ।जिम्-अश्वाः। अस्ति-आदित्यस्तुतिः-अश्व- स्य । “आदित्यादश्वो निस्तष्ट” इति । “सूरादश्वं वसवो निरतष्ट” [ऋ० सं० २, ३, ११, २] इत्यपि निगमो भवति ॥ ५ (१३) ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थः-निरुक्तार्थः-सूर्य के रथ में जुते हुए घोड़ों की स्तुति है ।-सात (७) घोड़ों में से चार (४) घोड़े 'हेमन्तासः' विरल या आपस में अन्तर दिये हुए हैं । अथवा पृथ्वन्त ( चौड़ी छाती वाले ) या मोटी जांघ वाले हैं । उन सातों में से जो बीच के तीन घोड़े हैं, वे 'सिलिकमध्यमासः' एक से एक सटे हुए हैं । अथवा सातों घोड़े जघन और छाती में मोटे या चौड़े, तथा पेट में पतले या बिलकुल बिना पेट के हैं । [ऐसे भी स्तुति हो जाती है ।] अथवा शीर्षमध्यस हैं, या उन सातों के बीचका घोड़ा शिरोमणि है । अथवा 'सिलिक' नाम शिर और वह आदित्य है, क्यों कि- सब भूत (प्राणी) उसी पर टिके हुए हैं, और वो ही इनके मध्य में स्थित है । [प्रा- ७

हिन्दी निरुक्त ( ५० ) ४ अ० २ पा० ५ खं०

रुंगिक-] यह भी दूसरा [मनुष्यों का] 'शिर' इसी व्याख्यान से है। क्यों कि ? इसके सब इन्द्रियें आश्रित हैं। 'संशूरणासः' भगवान् आदित्य से मिले हुए हैं। 'शूर' शब्द गत्यर्थक 'शु' (भ्वा० प०) धातु से है। [ क्यों कि ? वह शत्रुओं के साम्हने चला ही जाता है, लौटता नहीं ।] 'दिव्यासः' द्युलोक में पैदा हुए हैं । 'अत्याः' निरन्तर चलते ही रहते हैं, किन्तु क्षणमात्र भी कभी नहीं ठहरते । 'हंसाः इव श्रेणिशो यतन्ते' हंसों के समान श्रेणि (पङ्क्ति) बांध कर चलते हैं । 'हंस' क्यों? वे मार्ग को हनन (गमन) करते हैं । 'श्रेणि' 'श्रिञ् सेवायाम्' (भ्वा० उ०) धातु से है । 'यत्' जब वे 'अश्वाः' घोड़े 'दिव्यम्' स्वर्ग के 'अज्मम्' मार्ग को 'आक्षिषुः' (उदय से अस्त पर्यन्त) प्राप्त होते हैं ॥ 'अश्वाः' पद के साथ तुल्य विभक्ति होने से 'ईर्म्मान्तास.' इत्यादि पद अश्व के विशेषण है, "आत्माएव एषा रथो भवति आत्मा अश्व.” अर्थात् 'आत्मा ही इनका रथ होता है, और आत्मा ही अश्व'-इस युक्ति से सूर्यदेवता का ही यह मन्त्र हो सकता है या होना चाहिये, किन्तु अश्व की स्तुति में विनियुक्त हुआ है, यह ठीक नहीं? इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिये भाष्यकार समाधान करते हैं— 'आदित्य की स्तुति अश्व की होती है, क्यों कि-अश्व आदित्य से गढ़ा गया है, या उत्पन्न हुआ है। "सूरादश्वं वस- वो निरतष्ट" [ ऋ० सं० २, ३, ११, २ ] अर्थात्-वसुओं ने अश्व (घोड़े) को सूर्य से गढ़ कर निकाला है यह निगम भी है ॥ ५ (१३) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ५१ ) ४ अ० २ पा० ६ खं०

(खं० ६)
[ निरु० ] $^{(१५)}$ "$^१$कायमानो वना त्वं यन्मातॄरजगन्नपः ।
नतत्तेअग्ने प्रमृषे निवर्त्तनं यद् दूरे सन्निहाभवः ॥"
[ ऋ० सं० ३, १, ५, २ ]
(भा०) 'कायमान' श्रायमानः । कामयमान इतिवा । वनानि त्वंयन्मातृः अपः-अगमः उपशाम्यन् । न तत्ते अग्ने प्रमृष्यते निवर्त्तनं, दूरे यत् सन्-इहभवसि जायमानः । "$^{(१६)}$लोधं नयन्ति पशुमन्यमानाः" । [ ऋ०सं० ३, ३, २३, ३ ] "शीरं पावकशोचिषम्" । [ ऋ०सं० ७, ११,११] पावकदीप्तिम् । 'अनुशायिनम्'-इतिवा । ' आशिनम्-' इतिवा ॥ ६ (१४) ॥
अनुवादः ।
मन्त्रार्थ—हे भगवन् ! अग्ने ! 'यत्' जब 'त्वम्' तू 'वना' वनरूप अथवा ' अपः ' जलरूप 'मातृः' माताओं को 'कायमानः' देखता हुआ या इच्छा करताहुआ ' अजगन्' जाता है,तो 'तत्' वह 'ते' तेरा 'निवर्त्तनम्' मार्ग 'न' नहीं 'प्रमृषे' लुप्त होता। 'यत्' क्योंकि-'दूरे' 'सन्' दूर या नष्ट होता हुआ भी तू फिर
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१-“कायमानो वनात्वम्” इति विश्वामित्रस्येयमार्षम् । बृहती छन्दः । प्रातरनुवाकाश्विनयोः शस्यते ।

हिन्दी निरुक्त ( ५२ ) ४ अ० २ पा० ६ खं० 'इह' यहां काष्ठों में अरणि से अग्नि के रूपमें और जलमें बिजली के रूपमें 'अभवः'। उत्पन्न हो जाता है ॥ निरुक्तार्थः- 'कायमान' (१५) देखता हुआ । अथवा इच्छा करता हुआ । जब तू बन या काष्ठरूप और जलरूप माताओं में शान्त होता हुआ लय हो जाता है। हे अग्नि देव ! वह तेरा मार्ग लुप्त नहीं होता । क्योंकि-तू दूर (नष्ट) होता हुआ भी फिर यहां (काष्ठ (अरणि) अथवा जल (मेघ) में) वह्नि या बिजली के रूप में उत्पन्न हो जाता है ॥ (१६) “लोधं नयन्ति पशु मन्यमानाः”(ऋ०सं० ३, ३, २३, ३) अर्थात् लोभी को पशु के समान मानते हुए लेजाते हैं। “शीरं (१७) पावक शोचिषम्” (ऋ०सं० ६, ७, ११, ११) अर्थात् शीर या अनुशायी सब भूतों (प्राणियों) में प्रवेश कर के शयन करने वाले को । अथवा सब प्राणियों में अशन (व्या- पने वाले) को । 'पावक शोची' या अग्नि के समान दीप्ति (तेज) वाले को स्तुति करता हूँ ॥ ६ (१४) ॥ व्याख्या । “लोधंनयन्ति” यह जिस ऋचा का टुकड़ा है, उसमें पुराना प्रसिद्ध विश्वामित्र और वसिष्ठजी के इतिहास का एक अंश है, उसकी भगवद्दुर्गाचार्य ने व्याख्या नहीं की । क्योंकि- भग- वद्दुर्गाचार्य वासिष्ठ था और उसमें वसिष्ठ-की निन्दा है। पहिले किसी समय विश्वामित्र ब्रह्मर्षि बनने के अर्थ बहुत कालतक तप करके वसिष्ठ जी के पास गए कि- अब के बारमें मुझे वे 'ब्रह्मर्षि' कहकर संबोधन करेंगे । किन्तु वहां उनसे

हिन्दी निरुक्त ( ५३ ) ४ अ० २ पा० ७ ख० वैसे व्यवहार नहीं किया गया । अनन्तर विश्वामित्र अपने तप के लोप के भय से वसिष्ठ को शाप विना दिये ही चुप चाप लौटे । तब वसिष्ठ ने सोचा कि-इस वार इनका तप शाप से नष्ट नहीं हुआ, अतः इनका तप नष्ट करना चाहिये इसी प्रयो- जन से उनको बांध कर लाने के लिये अपने आदमी भेजे, वे गए और विश्वामित्र को पकड़ कर वसिष्ठ के साम्हने ले चले, उस समय विश्वामित्र उन पुरुषों से कहते हैं— “ न सायकस्य चिकिते जनासो लोधं नयन्ति पशु- मन्यमानाः । नावाजिनं वाजिना हासयन्ति न गर्दभं पुरो अश्वान्नयन्ति” [ ऋ०सं० ३,३,२३,३ ] अर्थात् हे जनों ! तुम ध्वंसकारी विश्वामित्र के मन्त्रगण के सामर्थ्य को नहीं जानते, इसी से मुझ तपके लोभी को पशु के समान बांधकर ले जाते हो । किन्तु वाजिन या विद्वान् अवाजिन ( मूर्ख ) को उपहास नहीं करते और गधे को घोड़े के साम्हने से नहीं ले जाते । प्रयोजन यह कि-मेरे मन्त्र बल को न जान कर मुझे ले जाने की तुम बड़ी भूल करते हो । मैं विद्वान् हूँ, उस मूर्ख वसिष्ठ की हांसी नहीं करना चाहता । एवम् घोड़े से गधे का साम्हना जैसा अनुचित है, वैसे मेरा भी उस के साथ है ॥ ६, १७ ॥ ( ७ खं० ) १ १८ १६ [निरु०] “कनीनकेव विद्रुधे नवे द्रुपदे अर्भके । १—“कनीनकेव विद्रुधे” इति वामदेवस्यार्षम् ।

[Header] हिन्दी निरुक्त ( ५४ ) ४ अ० २ पा० ७ ख०

बभ्रूयामेषु शोभेते ॥ ” [ऋ० सं० ३, ६, ३०, ७] (भा०) 'कनीनके' कन्यके । 'कन्या' कमनीया भवति । क्व-इयंनेतव्या'-इतिवा (कमनेन आनी- यते इतिवा) कनतेर्वा स्यात् कान्तिकर्मणः । 'क- न्ययोरधिष्ठानप्रवचनानि सप्तम्या एकवचनानि' इति शाकपूणिः । विद्धयो दारुपाद्योः । 'दारु' दृणाते- र्वा । द्रूणातेर्वा । तस्मादेव 'द्रु' । 'नवे' नवजाते । 'अर्भके' अवृद्धे । ते यथा तदधिष्ठानेषु शोभेते, एवं बभ्रूयामेषु शोभेते। बभ्रोः अश्वयोः संस्तवः। 'इदं च मे अदात्, इदंच मे अदात्'- इति ऋषिः प्रसंख्याय आह— “सुवास्त्वा अधि तुग्वनि”२० [ऋ० सं० ६, १, ३५, ७] (भा०) 'सुवास्तु' नदी । 'तुग्व' तीर्थं भवति । तूर्णं मेतत् आयन्ति । कुविन्नंसन्तेमरुतः पुनर्नः”२१ [ऋ० सं० ५, ४, २८, ५] (भा०) पुनर्नो नमन्ते मरुतः । 'नसन्त' (२२) इति उपरिष्टाद् (१२ अ०) व्या ख्यास्यामः । “ये ते मदा आहनसो विहायसस्ते-२३ भिरिन्द्रं चोदय दातवे मघम् ।” (ऋ० सं० ७, २, ३३, ५)

हिन्दी निरुक्त ( ५५ ) ४ अ० २ पा० ७ ख० (भा०) ये ते मदा आहननवन्तो वञ्चनवन्तः, तैः-इन्द्रं चोदय दानाय मघवम् ॥ ७ (१५) ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थः-हे इन्द्र! ‘विद्रधे’ (१८) बहुत दृढ ‘नवे’ नवीन ‘अर्भके’ ठीक परिमाण से युक्त ‘द्रुपदे’ खड़ाऊंओंके ऊपर चढ़ी हुईं ‘कनीनका’-‘इव’ दो कन्याओंके समान ‘यामेषु’ घुड़शाल में ‘बभ्रू’ भूरे रंग वाली घोड़ियें ‘शोभेते’ सुहाती हैं ॥ निरुक्तार्थः-‘कनीनका’ दो कन्याएं । ‘कन्या’ क्यों? कम- नीय (वाञ्छनीय) होती है । [ सभी उसे चाहते हैं ] अथवा ‘कहां यह पहुंचाना चाहिये’ यह उस के अर्थ पिता चिन्ता करता है । अथवा कमन (सुन्दर वर) से आनयन की जाती है (लाई जाती है) । अथवा इच्छार्थक ‘कन्’ (स्वा०प०) धातु से है । ‘‘‘विद्रधे’ ‘नवे’ ‘द्रुपदे’ ‘अर्भके’ ये चारों पद कन्याओं के अधिष्ठान (खड़ाओं) के जनाने वाले सप्तमी के एकवचन हैं’’ यह शाकपूणि आचार्य मानतेहैं । ‘विद्धयोः’ नीचे से घोड़े के खुर के आकार में घड़ी हुईं, ‘दारुपाद्योः’ दो काष्ठकी पादुकाएं (खड़ाऊँ जोड़ी) इस प्रकार अर्थ का अनुसन्धान कर के यास्काचार्य उक्त चारों पदों को द्विवचनान्त मानते हैं । ‘दारु’ शब्द ‘दृ’ विदारणे (क्र्या० प०) धातु से है । अथवा ‘द्रू’ (क्र्या० प०) धातु से है । उसी धातु से ‘द्रु’ शब्द है । ‘नवे’ नई बनी हुईं ‘अर्भके’ अवृद्ध या बड़ी नहीं (ठीक

हिन्दी निरुक्त ( ५६ ) ४ अ० २ पा० ४खं० परिमाण से बनी हुई) । वे दो कन्याएं जिस प्रकार उन अधिष्ठानों ( खड़ाऊँओं ) पर शोभित होती हैं, उसी प्रकार यामों (अश्वशालाओं) में बभ्रु (बादामी रंगकी) घोड़िएं शो- भित होती हैं [यह-] बभ्रु वर्ण वाली घोडियों की स्तुति है ॥ व्याख्या । “कनीनकेव” [ऋ०सं० ३,६,३०,७] यह मन्त्र ‘विद्रुधे’ (१८) ‘द्रुपदे’ (१९) इन दो पदों के उदाहरण में दिया है । ‘विद्रुध’ नाम विवृढ या विशेष दृढ का, और ‘द्रुपद’ ‘द्रु’ वृक्ष, उसके बने हुए पद ( पैर ) का है । इन पदों की विभक्ति के वचनमात्र में शाकपूणि और यास्क के मत का भेद है । मन्त्र में जैसे रूप दिए हुए हैं, वे व्याकरण में एकवचन और द्विव- चन में समान ही सिद्ध होते हैं । और अर्थ भी दोनों प्रकार से संगत होता है । इसी से दोनों ही मत सफल हो जाते हैं । ‘तुग्वनि’ (२०) शब्द के निगम की भूमिका— [ निरुक्तार्थ- ] ‘यह मुझे दिया’ ‘यह मुझे दिया इस प्रकार ( त्रसदस्युराजा के दान की ) गणना करके ( काण्व सोभरि ) ऋषि कहता है— ( “उतमे प्रयियोर्वयियोः ) “सुवास्त्वा अधि तुग्वनि” ( तिसृणां सप्ततीनां श्यावः प्रणेता भुवद् वसुर्दानां पतिः ” [ ऋ० सं० ६, १,३५, ७ ] ॥ अर्थात्- ( और ‘प्रयियु’ जिसपर चढकर चलते हैं, अश्व २० आदि धन ) सुवास्तू नदी के ‘तुग्वनि’ तीर्थपर ( मुझे दिया ‘वयियु’ विनाहुआ वस्त्र आदि धन मुझे दिया । तीन सप्तति ( ७० ) अर्थात् दोसौ दश (२१०) गौओंके आगे चलने वाला

हिन्दी निरुक्त ( ५७ ) ४ अ० २ पा० ७ ख०

'श्याव' श्याम वर्ण वृषभ (सांड) 'भुवद्-वसु' धनों को उत्पन्न
करने वाले 'दियांनां पतिः' दान योग्य धनों के स्वामी त्रसद-
स्यु ने मुझे दिया ॥
व्याख्या ।
यहां दान के सम्बन्ध से 'सुवास्तु' शब्द नदी का वाचक
होता है क्योंकि-नदी पर दान करना प्रसिद्ध है । और नदी
के सम्बन्ध से ही 'तुग्वन्' शब्द तीर्थ का वाचक होता है ।
भाष्यकार ने इस प्रकार से यह भी सूचित किया कि-निगम
(मन्त्र) के अर्थके निश्चयार्थ सूक्त का अर्थ भी देख लेना चाहिए
जिस ऋचा में सौभरि ऋषिने त्रसदस्यु के दान की बड़ाई
पहिले की है, वह ऋचा—
“ अदान्मे पौरुकुत्स्यः पञ्चाशतं त्रसदस्युर्वधूनाम् ।
मंहिष्ठो अर्य्यः सत्पतिः” [ ऋ० सं० ६, १, ३५, ६ ]
यह ऋचा कण्वके पुत्र सौभरि ऋषि की है । वह कहता
है कि-'मंहिष्ठ', बड़ा पूजनीय 'अर्य्य', ईश्वर 'पौरुकुत्स्य'
बहुत शत्रुओं की मारने वाले का पुत्र 'त्रसदस्यु' दस्युओं
(डाकुओं) को डराने वाले राजा ने 'पञ्चाशत्' पचास ( ५० )
'वधू' ब्याहने योग्य कन्याएं 'मै' मुझे 'अदात्' दी हैं ॥
इन दोनों ऋचाओं में नदी तीर्थ पर दान करने की
महिमा और कन्याओं के दान की महिमा तथा एक पुरुष को
अनेक वधू देने की महिमा आती है । ऐसे दानों को वेद में
ढूंढने वालों के लिये ये ऋचाएं पूरा सन्तोष देने वाली हैं ।
निरुक्तार्थ-'नमन्त' (२१) शब्द का निगम—
“कुविन्नं सन्ते मरुतः पुनर्नः” (ऋ०सं०५,४,२८,४)।
८

हिन्दी निरुक्त ( ५८ ) ४ अ० २ पा० ८ खं० अर्थात्-'मरुतः' मरुत् देवता 'नः' हमारे अर्थ 'पुनः' फिर 'कुचित्' बहुत 'नंसन्ते' वर्षा आदि उपकार से झुकते हैं । 'नंसन्त' (२२) आगे १२वें अध्याय में व्याख्यान करेंगे । आहनसः (२३) शब्द का निगम— “येतमदा” ०० ( ऋ० सं० ७, २, ३३, ५ ) अर्थात् हे सोम ! 'ये' जो 'ते' तेरे 'मदाः' मद 'आहनसः' बहुन्न या मोहित करने वाले 'विहायसः' और बड़े हैं, 'तेभिः' उन मदों से ' मघम् ' धन को 'दातवे' देने के अर्थ 'इन्द्रम्' इन्द्रदेव को 'चोदय' प्रेरणा कर (जिससे कि-वह उन्मत्त होकर हमें धन दे । ) ७ ( १६ ) ॥ १ ( ८ खं० ) [निरु०] “उपो अदर्शि शुन्ध्युवो न वक्षो नोधा इवाविरकृत प्रियाणि । अद्मसन्न ससतो बोधय- न्ती शश्वत्तमागात्पुनरेयुषीणाम् ॥” [ ऋ० सं० २, १, ७, ४ ] ( भा० ) उपादर्शि 'शुन्ध्युवः' । 'शुन्ध्युः' आ- दित्योभवति । शोधनात् । तस्यैव वक्षो भासा- ध्यूढः ( म् ) इदमपि इतरद् 'वक्षः' एतस्मादेव । अध्यूढं काये । शकुनिरपि शुन्ध्युरुच्यते । शोध- नादेव । उदकचरो भवति । आपोऽपि 'शुन्ध्यवः' १ “ उपो अदर्शि ” इति कक्षीवतः आर्षम् । औषसी । त्रिष्टुप् छन्दः । प्रातरनुवाकाश्विनयोः शस्यते ।

हिन्दी निरुक्त ( ५६ ) ४ अ० २ पा० ८खं०

उच्यन्ते । शोधनादेव । 'नोधा' ऋषिर्भवति । नवनं
दधाति। स यथा कामान् आविष्कुरुते, एवम् उषाः
रूपाणि आविष्कुरुते । 'अद्मसत् (२४)' । 'अद्म'
अन्नंभवति । अद्मसादिनी-इतिवा। अद्मसानिनी
इतिवा । ससतोबोधयन्ती “शश्वत्तमागात्पुनरे-
युषीणाम् ।” (स्वपतो बोधयन्ती ।) शाश्वतिक-
तमा आगात् पुनरेयुषीणाम् ।
“तेवाशीमन्त इष्मिणः” (२५) [ऋ० सं०
१,६,१३,६] ईषणिनः-इतिवा । एषणिनः-इतिवा ।
आर्षणिनः-इतिवा 'वाशी' इतिवाङ्नाम । वाश्यते
इतिसत्याः ।
“शंसावाध्वर्यो प्रति मे गृणीहीन्द्राय
वाहः (२६) कृणवाव जुष्टम् ।” [ऋ०३,३,१९,३]
अभिवहनस्तुतिम् अभिषवणप्रवादो स्तुतिं
मन्यन्ते । ऐन्द्री त्वेव शस्यते ।
'परितक्म्या' (२७) इति उपरिष्टाद्व्याख्या-
स्यामः ॥ ८ ( १६ ) ॥
इति चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ ४, २ ॥
अनुवादः ।
मन्त्रार्थ-यह उषा 'शुन्ध्युवः' आदित्य के मण्डल में
'वक्षः' छाती के 'न' समान 'उप' उपश्लिष्ट या चिपकी हुई