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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

[Header] हिन्दी निरुक्त \qquad ( ८६ ) \qquad ४ अ० ४ पा० ४ ख० \rule{\textwidth}{0.5pt}

पाप 'न' नहीं 'अश्नोति' व्यापता है। अंहति, अंहस्, अंहु ये तीनों शब्द निरूढोपध 'हन्' (अदा० प०) धातुसे हैं। ['नि रूढोपध' जिसका अन्तिम अक्षर से पहिला अक्षर आदि में किया जावे ।] अर्थात् - 'हन्' धातु के अकार को आदि में लाकर हकार नकार को उलटा कर 'अंह' रूपसे बनते हैं । 'चयसे' (५८) (चातयति) अनवगत पद का निगम- "बृहस्पते चयसे" ०-० [ऋ० सं० २,५,१२, ५] अर्थात्-हे बृहस्पते ! दान, आदि गुणोंसे युक्त ! तू 'पियारुम्' देवताओं के अपूजक को 'इत्' अवश्य 'चयसे' (नाशयसि) नाश कर देता है। निरुक्तार्थ-हे वृहस्पति देव ! जो तू देवताओं के अपूजक को नाश करता है। 'पीय' धातु का हिंसा अर्थ है । 'वियुते' (५६) मिलेहुए द्यावा-पृथिवी दोनों लोकों का नाम है। क्यों ? वियवन या परस्पर दोनों को पृथक् होनेसे । निगम- "समान्या वियुते" ०-० [ऋ० सं० ३, ३, २५, २] अर्थात्-'वियुते' द्युलोक और पृथिवी लोक दोनों 'समान्या' परिमाण में समान हैं, 'दूरे' दूरतक हैं, 'अन्ते' जगत् के अन्त तक हैं। [अर्थात्-इन दोनों का ही अन्त नहीं मिलता ।] 'समान' क्यों ? सम्मानमात्र या तुल्य परिमाण होता है। 'मात्रा' क्यों ? मान से। 'दूर' शब्द की व्याख्या हो चुकी । 'अन्त' 'अत्' (भ्वा० प०) धातु से है। 'ऋधक्' (६०)-यह जुड़े हुए हुए का नाम है। और 'ऋध्' (स्वा०प०) धातु के अर्थ में देखा जाता है। निगम- "ऋधगया" ०-० [य० वा० सं० ८, २०] १२

हिन्दी निरुक्त ( ६० ) ४ अ० ४ पा० ४ खं० अर्थात्--हे अग्ने ! तू 'ऋधक्' समृद्ध होता हुआ 'अयाः' आया अथवा यज्ञको बढ़ाते हुएने यजन किया । 'उत' और 'ऋधक्' बढ़ते हुए ने 'अशस्तिहाः' विघ्नों को शान्त किया । ' अस्याः ' ( ६१ ) और 'अस्य' (६२) ये दोनों मुख्य अर्थ में उदात्त होते हैं, और विशेषण या गौण अर्थ में अनुदात्त होते हैं । क्यों ? जो उत्कृष्ट या अधिक गुणयुक्त होता है, वह उदात्त होता है और अल्प या हीन गुणयुक्त अनुदात्त होता है । (लोक में भी 'यह कुल उदात्त (समृद्ध) है'ऐसा प्रसिद्ध है ।) प्रधान वाचक 'अस्या' (६१) का निगम— “ अस्या ऊषुणः ” ०-० [ ऋ०सं० २, २, २, ४ ] अर्थात्-हे 'अजाश्व' हे पूषन् ! 'अस्याः' ( अस्यै ) इस 'सातये' लब्धि के लिये ( जिस प्रकार हम वाञ्छित अर्थ को प्राप्त हों ) 'नः' हमारे 'उप' समीप 'भुवः' ( भव ) हो । ( क्योंकि-आप के निकट होनेसे हम इस वाञ्छित अर्थ को प्राप्त हो सकते हैं ।) ( कैसे पास आओ ? ) ‘ अहेलमानः ’ ( अक्रुध्यन् ) क्रोध न करते हुए । ( क्योंकि-सभी याचना करने से क्रोधकरता है । ) (फिर कैसे आ ?) ‘ररिवाञ्’ दान के अभिप्राय से युक्त होकर ‘अजाश्व’ हे अजनाश्व ! (शीघ्र चलने वाले घोड़ों वाले ! अथवा छाग ( बकरा ) रूप घोड़े वाले ' ॥ (‘अ वस्यताम् धन की इच्छा करते हुओं के 'अजाश्व' हे छाग अश्व वाले ! ॥ ) निरुक्तार्थ —इस लब्धिके लिए हमारे पास आ । 'अहेल- मानः' नहीं क्रोध करता हुआ । 'ररिवान्' कैसे ? ('रा'अदा० प०) धातु 'अभ्यस्त' या दोहराया हुआ है। ' अजाश्व ' यह पूषादेव को कहता है । (अर्थ क्या ? ) अजनाश्व । 'अज नाम अजन ( चलने वाले ) । अब अनुदात्त । —

हिन्दी निरुक्त ( ६१ ) ४ अ० ४ पा० ५ खं० “दीर्घायुरस्याः” ०—० [ ऋ० सं० ८, ३, २७, ४ ] अर्थात्-‘अस्याः’ इस [ पिता के द्वारा पहिले दी हुई और अग्नि के द्वारा फिर दी हुई कन्या ] का ‘ यः ’ जो ‘ पतिः ’ पति है, सो ‘ दीर्घायुः ’ दीर्घायु ( बड़ी आयु वाला ) हो । ‘शतम्’ सौ (१००) ‘शरदः’ शरद् ऋतुओं तक ‘जीवतु’ जीवे ! [ क्योंकि शरत् काल में बहुधा रोग उपजते हैं, इसी से शत शरद् जीवन की प्रार्थना है । ] ॥ निरुक्तार्थः—इस का दीर्घायु जो पति है, वह सौ वर्ष जीवे । ‘शरत्’ क्यों ? इस में ओषधिएँ ‘ शृत ’ पक कर गिर जाती हैं । अथवा जल फट जाते हैं । (६२) ‘अस्य’ यह पद ‘अस्याः’ इस से व्याख्यान किया गया [ उसी के समान है । ] ॥ ४ (२५) ॥ १ (५ खंड०) [ निरु० ] “अस्य वामस्य पलितस्य होतुस्तस्य भ्राता मध्यमो अस्त्यश्नः । तृतीयो भ्राता घृत- पृष्ठो अस्यात्रापश्यं विशपतिं सप्तपुत्रम्” [ २, ३, १४, १ ] (भा०) “अस्य” “वामस्य” वननीयस्य “पलि तस्य” पालयितुः “होतुः” ह्वातव्यस्य “तस्य भ्राता मध्यमः अस्ति” अशनः । ‘ भ्राता ’ भरते र्हराति १ “अस्य वामस्य” इति अस्य वामीयमेवेदं सूक्तम् । दीर्घतमसः आर्षम् । तार्तीयसवने महाव्रते वैश्वदेवे शस्त्रे शस्यते ।

हिन्दी निरुक्त ( ६२ ) ४ अ० ४ पा० ५ खं०


कर्मणः । हरते भागम् । भर्त्तव्योभवति-इतिवा । “तृतीयो भ्राता घृतपृष्ठो अस्य” अयम्-अग्निः, तत्र “अपश्यं” सर्वस्य पातारं वा पालयितारं वा विशपति सप्तपुत्रं” सप्तमपुत्रं, सर्पणपुत्रम्-इति वा । ‘सप्त’ सृप्ता संख्या । सप्त आदित्यरश्मयः इतिवदन्ति ॥ ५ (२६) ॥

अनुवादः ।

अस्य (६२) प्रधान और अप्रधान का एक मन्त्र उदाहरण- “अस्य वामस्य” ०-०[ऋ० सं० २, ३, १४, १] अर्थात् ‘वामस्य’ (वननीयस्य) याचना करने योग्य ‘पलितस्य’ (पाल- यितुः ) पालन करने वाले ‘होतुः’ आह्वान-योग्य ‘तस्य’ उस द्युलोक में रहने वाले ‘अस्य’ इस प्रत्यक्ष सूर्य्य का ‘भ्राता’ , भाग हरने वाला अथवा भरण करने ( जल से भरने ) योग्य ‘मध्यमः’ अन्तरिक्ष लोक में रहने वाला वायु ‘अस्ति’ , है । ‘अस्य’ इस मध्यमस्थान वायु का ‘तृतीयः’ तीसरा ‘भ्राता’ भाई ‘घृतपृष्ठ’ , घृत से संयुक्त पृथिवी स्थान वाला यह अग्नि है । ‘अत्र’ , इस तीन भागों में बटे हुए ज्योति में ‘विशपतिम्’ , विश्व के पालन करने वाले ‘सप्तपुत्रम्’ सात रश्मियों वाले सूर्य्य को ‘अपश्यम्’ प्रधानता से देखता हूं ॥ निरुक्तार्थ-इस वाम या वननीय ( प्रार्थनीय ) पलित ( पालन करने वाले ) होता ( आह्वान करने योग्य ) उस सूर्य्य का भ्राता व्यापक वायु है । ‘भ्रातृ’ हरणार्थक ‘भृ’ (भ्वा० उ०) धातु से है । क्यों ? भाग को हरण करता है । अथवा भर्त्तव्य

हिन्दी निरुक्त ( ६३ ) ४ अ० ४ पा० ६ खं० ( जल से भरने योग्य ) होता है। इस मध्य स्थान वायु का तीसरा भ्राता घृतसंयुक्त यह अग्नि है। तहां सब के पालन करने वाले विश्व के स्वामी सप्त (सात) या सप्तम (सातवें) पुत्र वाले अथवा सर्पण पुत्र ( 'सर्पण निरन्तर चलने वाले ' पुत्रों ' रश्मियों वाले ) ( सूर्य ) को देखता हूं । ' सप्त ' सृप्त या फैली हुई ( छः की अपेक्षा से ) संख्या है । सात आदित्य की रश्मिएं हैं, ऐसा कहते हैं ॥ ५ ( २६ ) ॥ १ ( ६ खंड ) [निरु०] “सप्तयुञ्जन्ति रथमेकचक्रमेकोअश्वो वहति सप्तनांमा । त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वा भुवनाधितस्थुः ॥” [ऋ०सं०२,३,१४,२] (भा०) “सप्त युञ्जन्ति रथम्-एकचक्रम्” एक चारिणम् 'चक्रम्' चकतेर्वा । चरतेर्वा । क्रामतेर्वा । “एकः अश्वो वहति सप्तनामा” आदित्यः । सप्त अस्मै रश्मयः रसान् अभिसंनामयन्ति । सप्त एनम् ऋषयः स्तुवन्ति इतिवा । इदमपि इतरत् नाम एतस्मादेव अभिसंनामात् । संवत्सरप्रधानः उत्त- रोऽर्द्धर्चः । “त्रिनाभिचक्रम्” त्र्यृतुः संवत्सरो-‘ग्री- षमो वर्षा हेमन्तः' इति । 'संवत्सरः' संवसन्ते अ- स्मिन् भूतानि । 'ग्रीष्मः' ग्रस्यन्ते अस्मिन् रसाः । १ “सप्त युञ्जन्ति” इति “अस्य वामस्य' इत्यनेन तुल्यो विनियोगः ।

हिन्दी निरुक्त ( ६४ ) ४ अ० ४ पा० खं० ६ ‘वर्षाः’ वर्षति आसु पर्जन्यः। ‘हेमन्तः’ हिमवान्। ‘हिमं’ पुनः-हन्तेर्वा। हिनोतेर्वा। “अजरम्” अ- जरणधर्म्माणम्। “अनर्वम्” अप्रत्यूतम् अन्यस्मिन्। “यत्र” इमानि सर्वाणि भूतानि अभिसन्तिष्ठन्ते। तं संवत्सरं सर्वमात्राभिः स्तौति— “पञ्चारे चक्रे परिवर्त्तमाने—” [ऋ० सं० २, ३, १६, ३,—१, २२, ८, १३] । इति पञ्चर्तुतया। “पञ्चर्त्तवः संवत्सरस्य-” इति च ब्राह्मणम्,—हेमन्तशिशिरयोः समासेन । “षळर आहुरर्पितम्” [ऋ० सं० २, ३, १६, १] इति षडृतुतया ‘अराः’ । प्रत्यताः नाभौ । ‘षट्’ पुनः सहतेः । “द्वादशारं नहि तज्जराय” [ऋ०सं०२, ३, १६, १] “द्वादशप्रधयश्चक्रमेकम्” (ऋ० सं० २, ३, २३, २) इति [द्वौपादौ] मासानाम् । ‘मासाः’ मानात् । ‘प्रधिः’ प्रहितो भवति । “तस्मिन् साकं त्रिशता न शङ्कवोऽर्पिताः षष्टिर्न चला चलासः ।” (ऋ० सं० २, ३, २३, २) “षष्टिश्च ह वै त्रीणि च शतानि संवत्सरस्य अ- होरात्रा-” इतिच ब्राह्मणं समासेन ।

हिन्दी निरुक्त ( ६५ ) ४ अ० ४ पा० ६ ख० “सप्तशतानि विंशतिश्च तस्थुः” (ऋ०सं० २, ३, १६, १) “सप्त च वै शतानि विंशतिश्च संवत्सरस्याहोरात्राः” इति च ब्राह्मणं विभागेन विभागेन ॥६ (२७) ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः, चतुर्थोऽध्यायश्च समाप्तः । अनुवादः । जिस प्रकार यह आदित्य सात या सर्पण (गमन) स्वभाव रश्मियों से युक्त होता है, वैसा ही इस ऋचा मे वर्णन है ।— मन्त्रार्थः-‘सप्त’ सात (७) या सर्पण (गमन) करने वाले रश्मि ‘एकचक्रम्’ अकेले आकाश में चलने वाले एवम् अपने प्रकाश से अन्य ज्योतियोंको ग्रास करते हुए ‘रथम्’ रंहण या निरन्तर चलने वाले सूर्य को ‘युञ्जन्ति’ आपे से जोड़ते हैं। ‘एकः’ एक (अकेला) ‘सप्तनामा सप्तस्तुति, सप्तपुत्र, सप्ताश्व इत्यादि सप्त (७) संख्या वाली स्तुतियों वाला ‘अश्वः’ व्यापक (सूर्य) ‘वहति’ चलता है । [संवत्सरवर्णन-] ‘त्रिनाभि’ तीन ऋतु (ग्रीष्म-वर्षा-हेमन्त) रूप नाभियों वाला ‘चक्रम्’ चलन स्वभाव ‘अजरम्’ जरा (बुढापा) रहित ‘अनर्वम्’ दूसरे में नहीं आश्रित [ ऐसा संवत्सर काल ] है । ‘अत्र’ जिसमें ‘इमा’ (इमानि) ये ‘विश्वा’ (विश्वानि) सब ‘भुवना’ (भुवनानि) लोक ‘अधि-तस्थुः’ आश्रित या अधिष्ठित हैं ॥ निरुक्तार्थ-सात एक चक्र रथ को जोड़ते हैं । ‘एकचक्र’ क्या ? एक चारी या अकेला चलने वाला । ‘चक्र’ गत्यर्थक ‘चक’ (स्वा० प ) धातु से है । अथवा चर (स्वा० प०)

हिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ४ अ० ४ पा० ६ खं० धातु से है। अथवा 'क्रम्' (भ्वा० प०) धातु से है । एक 'अश्व' आदित्य सप्तनामा विचरता है। 'सप्तनामा' क्या ? सात रश्मिएं इस के लिये रसों को संमुख भाव से संनामन या प्राप्त करती हैं। अथवा सात ऋषि इस की स्तुति करते हैं। यह भी दूसरा 'नाम' (मनुष्य नाम) इसी अभि-संनामन (झुकने से है। (क्योंकि- वह भी अपने अर्थ को या क्रिया पद के प्रति गौण भाव को प्रकट करने के लिए संमुख झुकता है।) पिछली आधी ऋचा 'संवत्सर' को प्राधान्य से कहती है। तीन नाभियों वालां चक्र, तीन ऋतुओं वाला संवत्सर है। (तीन ऋतु) ग्रीष्म, वर्षा, हेमन्त ये हैं। 'संवत्सर' क्या इस में सब भूत या प्राणी संवास (निवास) करते हैं। 'ग्रीष्म' इस में रस ग्रसे जाते हैं। 'वर्षा' इनमें पर्जन्य (मेघ) बरसता है। 'हेमन्त' हिम (पाला) वाला है। और 'हिम' अथवा 'हन्' (अदा०प०) धातु से है। अथवा 'हि' (स्वा० प०) धातु से है। 'अजर' जिसमें जरण (बुढापा धर्म नहो। 'अनर्व' दूसरे में प्रत्यृत या आश्रित नहो । जिसमें ये भूत भले प्रकार स्थित रहते हैं। - उस संवत्सरको सब अंशों से स्तुति करता है। “पञ्चारे चक्रे परिवर्तमाने” [ऋ० सं० २, ३, १६, ३-१, २२, ८, १३] ॥ अर्थात्-“ 'परिवर्त्तमाने' जगत् को लेकर घूमते हुए 'पञ्चारे' पांच अरों वाले 'चक्रे' काल चक्र में”-इस मन्त्र में पांच ऋतुवाला संवत्सर वर्णन किया है। “संवत्सर के पांच ऋतु होते हैं ।” यह ब्राह्मण है। इस में हेमन्त और शिशिर ऋतु का समास या एकीभाव कर दिया गया है। “पञ्चर आहु रर्पितम् ” [ऋ० सं० २, ३, १६, १]

हिन्दी निरुक्त ( ९७ ) ४ अ० ४ पा० ६ खं० अर्थात् “ ‘षलरे’ (षडरे) छः अरों वाले संवत्सरचक्र में आदित्य को ‘अर्पितम् ’ आश्रित ‘आहुः’ कोई ब्राह्मण ग्रन्थ कहते हैं” इस में संवत्सर में छः ऋतु कहे हैं । ‘अर’ क्यों ? नाभि या पहिए के मध्य काष्ठ में प्रत्यूत (आश्रित) हैं । और ‘षष्’ ‘सह’ (भ्वा० आ० ) धातुसे है । “द्वादशारं नहि तज्जराय” [ऋ०सं० २, ३, १६, १] अर्थात् ‘द्वादशारम्’ बारह अरों वाला ‘तत्’ वह संवत्सर चक्र ‘जराय’ जीर्ण ‘न’ नहीं होता । “द्वादश प्रधयश्चक्रमेकम्” [ऋ० सं० २, ३, २३, २] अर्थात्–‘द्वादश’ बारह ‘प्रधयः’ प्रधि (गण्डपुच्छ) या मिलकर चक्रमें लगे हुए काष्ठ ‘एकम्’ एक ‘चक्रम्’ चक्र होता है । ये दोनों ऋचाओंके पाद् संवत्सर के बारह मासोंका वर्णन करते हैं । ‘मासाः’ मास क्यों? कालका मान करते हैं । ‘प्रधि’ क्यों? प्रहित या मिलकर रहता है । “तस्मिन् साकम्” ०—० [ऋ० सं० २, ३, २३, २] अर्थात् “ ‘तस्मिन्’ उस संवत्सर रूप चक्रमें ‘साकम्’ मिलकर (रात्रि और दिन ) ‘ त्रिशता ’ ( त्रीणि शतानि ) तीन सौ (३००) ‘न’ और ‘षष्टिः’ साठ (६०) अहोरात्र (दिन) ‘शङ्कवः’ कीले ‘न’ जैसे ‘अर्पिताः’ ठुके हुए हैं । ‘ लाचलासः’ (चलानि अचलानि च ) जो निरन्तर चलने वाले होनेसे चल और अपने स्वरूप को न छोड़ने वाले होनेसे अचल हैं”। यह ऋचा और- “षष्टिश्च” ०—० [ब्रा०] अर्थात्–“साठ और तीन सौ संवत्सर के अहोरात्र ( रात दिन ) हैं । ” यह ब्राह्मण रात्रि ‘और दिनको एक करके संवत्सरके दिनोंको वर्णन करता है । १३

हिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ५ अध्याय पञ्चम अध्याय के निघण्टुस्थ शब्दों की व्याख्या | संख्या | शब्द | अर्थ (तत्व) अवगम | निगमः | | १ | सस्निम् | संस्नातुम् ( मेघम् ) | सस्निमविन्दच्चरणे नदीनाम् । | | २ | वाहिष्ठः | वोढृतमः हानानाम् । (स्तोमः) | वाहिष्ठो वां हवानां स्तोमोदूतो हुवन्नरा । | | ३ | दूतः | दूतइव । जवतेर्वा । द्रवतेर्वा । वारयतेर्वा । | ,, | | ४ | वावशानः | शब्दंकुर्वाणः । वह्निर्वा । वाश्यतेर्वा | सप्त स्वसृ ररुषी र्वावशानः । | | ५ | वार्य्यम् | वरयितव्यम् । वरम् । | तद्वाद्यं वृणीमहे वरिष्टं गोपत्यत्यम् । | | ६ | अन्धः | अन्ननाम । आध्याननीयं भवति । तमोऽपि । नास्मिन् ध्यानं भवति न दर्शनमन्वन्तस्त इत्य-भिभाषन्ते । अयमपि इत-रोऽन्ध एतस्मादेव । अनेका-र्थम् । | आपामन्त्रेभिः सिंचतामद्यमन्धः । पश्यदचक्षुरवान्न विचेतदन्धः । | | ७ | असस्रन्ती | अस्रंस्यमाने इतिवा । अव्यु-दस्यन्ती इतिवा । | असस्रन्ती भूरिधारे पयस्वती । |

हिन्दी निरुक्त ( १०० ) ५ अध्याय

संख्याशब्दअर्थ [ तत्व ] अवगमनिगमः
वनुष्यतिवनुष्यति हन्तिकर्मा । अन-वगतसंस्कारो भवति ।वनुष्याम वनुष्यतः । दीर्घप्रयुज्य मतियो वनुष्यति ।
तरुष्यतिएवं-कर्मा । (हन्तिकर्मा)इन्द्रेण युजा तरुषेमवृत्रम् ।
१०मन्दनाःमन्दतेः स्तुतिकर्मणः ।पुरुप्रियो मन्दतु धामभिः कविः ।<br>समन्दना उदियर्त्ति प्रजावतीः ।
११ग्राह नःग्राहंसि इव । ग्राहना इव भवति । सम्बोधनानवगतम् ।अन्येन सदाहनो याहि तूयम् ।
१२नदःऋषिनंदी भवति । नदतेः स्तुतिकर्मणः ।
१३सोमोऽदब्धःअश्नोतेः इत्येवमेके । जि-यति निगमः पूर्वः । चरति निगम उत्तरः, इत्येके। संविद्यति नियमा इति शाक-पूणिः ।न यस्य द्यावापृथिवी न धन्व.....सोमो अदब्धः । अनूपे गोमान् गोभिरक्षाः सोमोऽदग्धा-भिरक्षाः ।
१४श्वात्रम्क्षिप्रनाम । आशुअतनं भवति ।सपतत्रोत्त्वरं श्वात्रजगद्ध्यच्छक्षाअग्निरक्षो उजातवेदाः

हिन्दी निरुक्त ( १०१ ) ५ अध्याय १५ ऊतिः अवनम् । अवनात् । आत्वा रथं यथोतये । १६ हासमाने उपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः । ( ६, ४, ५ ) 'प्रपर्वतानामुशती उपस्थात्" । इत्यत्र । १७ षड्भिः पाने रितित्वा । स्पर्शनेरितित्वा वणक्ः षड्भिरुपसर्पदिन्दुम् । १८ सस्रम् स्वपनम् । माध्यमिकं ज्योतिः । सस्रं न पक्व मविदुश्छ्वन्तम् । १९ द्विता वैद्युतम् । द्विता च सत्ता स्वधया च शम्भुः । २० व्राः व्रात्याः (प्रैषाः) मृगं न व्रा मृगयन्ते । २१ वराहः मेघो भवति । वराहारः । विध्यद्वराहं तिरो अद्रि मस्ता । अय मपि इतरो वराह एतस्मा- देव । बृहति मूलानि वरं मूलं वराह मिन्द्र एमुषम् । बृहति इतित्वा । अङ्गिरसोऽपि बृहस्पतिर्विश्वं वभ्र्विराहै । वराहा उच्यन्ते । अथाप्येते माध्यमिका देव- पश्यन् हिरण्यचक्रानयोदंष्ट्रान् विधावतो गणा वराहव उच्यन्ते । "वर- वराहून् । माहार माहाषीः" इति च ब्राह्मणम् । २२ स्वराणि अहानि भवन्ति । स्वयं सा- उलाइव स्वराणि । रीणि । स्वरादित्यो भवति स एनानि सारयति ।

हिन्दी निरुक्त (१०२) ५ अध्याय

संख्याशब्दअर्थ [ तत्व ] अवगमनिगमः
२३शर्य्याःअङ्गुलयो भवन्ति । [सृजन्ति कर्माणि] इषवः शरमय्यः ।शर्य्याभि र्न भरमाणो गभस्त्योः ।
२४अर्कःदेवो भवति । यदेनमर्चन्ति । मन्त्रो भवति । यदनेनार्चन्ति अर्कं मन्नं भवति । अर्चति भूतानि । वृक्षो भवति । संवृत्तः कटुकिम्ना ।गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः ।
२५पविःरथेनेमिर्भवति । यद् विपुनाति भूमिम् ।उतपव्या रथाना मद्रिम्भिन्दन्त्योजसा । तं मरुतः क्षुरपविना व्येयुः इत्यापि निगमो भवति ।
२६वक्षःव्याख्यातम् । (४ । २ । ८)उपोप्रैक्षद्भि शुन्ध्यवो नवक्षः
२७धन्वअन्तरिक्षम् । धन्वन्त्यस्मादापः ।तिरो धन्वातिरोचते ।
२८स्तिनम्स्रन्नं भवति । स्तिनाति भूतानि ।द्वेव स्ताचिनं भरथः सखिभ्यः ।

हिन्दी निरुक्त ( १०३ ) ५ अध्याय ( ३, ३, ४ ) २६ इत्था — अप्थां इत्येतेन व्याख्यातम् ३० सचा — सहेत्यर्थः | वसुभिः सचा भुवा । ३१ चित् — निपातोऽनुदात्तः पुरस्तादेव व्याख्यातः । पशुनाम भवति । | चिदसि मनांसि धीरसि । ३२ आ — उपसर्गः पुरस्तादेव व्याख्यातः । अथापि आश्वर्ये दृश्यते । | अ॒भ्र आँ अपः । ( १, १, ५ ) ३३ द्युम्नम् — यशो वा । अन्नं वा । द्योततेः । अनेकार्थम् । | अ॒स्मे द्यु॒म्नं म॒घव॑त्सु च धेहि । ३४ पवित्रम् — मन्त्रः पवित्र मुच्यते । पुनातेः । रश्मयः पवित्र मुच्यन्ते | येन दे॒वा प॒वित्रे॑णात्मानं॑ पुन॒ते सदा॑ । आपः पवित्रमुच्यन्ते । अग्निः पवित्रमुच्यते । वायुः पवित्र- | गभ॑स्तिपूतः । मुच्यते । सोमः पवित्र मुच्यते | गभ॑स्ति पू॒तो नृभि॑ रि॒द्भिः सुतः । सूर्यः पवित्र मुच्यते । इन्दुः पवित्र मुच्यते । | शत प॑वित्राः स्व॒धया॑ मदन्तीः । | अ॒ग्निः प॒वित्रे॑ सम॒ा पुनातु वायुः सोमः सूर्य इन्द्ः प॒वित्रे॒ ते मा पुनन्तु । ३५ तोदः — भर्मे बिले तोद् उच्यते । तन्न भवति दोर्धत्वात् । कूप इत्येके । अनवगतम् । | तोदस्येव शरण आमहस्य ।

हिन्दी निरुक्त ( १०४ ) ५ अध्याय

संख्याशब्दअर्थ [ तत्व ] अवगमनिगमः
३६स्वञ्चाःसु अञ्चनः । अनवगतम्आजुह्वानो घृतपृष्ठः स्वञ्चाः ।
३७शिपिविष्टःविच्छन्नाम । कुत्सितार्थीय भवति इति उपमन्यवः ।किमित्ते विष्णो परिचक्ष्यं भूत् प्रयद् ववक्षे शिपिविष्टो अस्मि इति ।
३८विष्णुःविष्णो नाम ।प्रतत्ते अद्य शिपिविष्टनामार्यः शंसामि वयुनानि विद्वान् इत्यादि ।
३९आघृणिःआगत छविः ।आघृणे संसचावहै ।
४०पृथुजयाःपृथुजवः ।पृथुजया अमिनोदापदस्योः ।
४१९७४ अथर्युर्अतनवत्तम् । (गमनवन्तम्) अनवगतम् ।अमिनम्रो दीधितिभिरशयोद्दूरस्तस्यतो जन-यन्त प्रशस्तम् । दूरदृशं गृहपति मथर्युम् ।
४२काशुकाकान्तकानि इतित्वा । कान्त-कानि इति वा । कृतकानि इति वाएकया प्रतिधा पिवत् साकं सरांसि त्रिंश-तम्, इन्द्रः सोमस्य काशुका ।
४३ऋध्रिगुमन्त्रो भवति । गवि ऋधि-कृतत्वात् । ऋषि वा ऋध्रिग् नाम कश्चिदस्ति देव्य प्रशस्ति-ता वा ।ऋध्रिगो शमीध्वं सुशमिशमीध्व शमिधो इति तुभ्यं श्योतान्यध्रिगो शचीवः । ऋधिगव ओहमिन्द्राय ।

हिन्दी निरुक्त ( १०५ ) ५ अध्याय ४४ आंगूषः | अन्तिं रपि ऋषिर्गृह्यते । रुद्रोऽपि ऋषिगुरुच्यते । स्तोमः । आघोषः । (शब्द-समाधिः) | येनाङ्गू॒षेण॑ वय॒मिन्द्र॑वन्तः । ४५ आपास्तमन्युः | आपापतितमन्युः । (इन्द्रोवा सोमोवा) वृत्रप्रधानेत्येके । नैघण्टुकं सोमकर्म । उभयप्रधानेत्यपरे । | आपा॑स्तमन्युस्तृ॒षिपल॑ प्र॒भर्मा॑ । १४ ४६ श्मशा | श्वासिनी । कुल्या नदी वा । श्माशिनी नाडी । शु अश्नुते इतिवा । श्माश्नुते इतिवा । | अ॒श्मश्म॑शा॒ारुह॒द्रूथः॑ । ४७ उर्वशी | अप्सराः । उरु अभ्यश्नुते उरुभ्यामश्नुते उरु वा॑ वशोऽस्याः । | उ॒तासि॑ मैत्रावरु॒णो व॑सिष्ठो॒र्वश्या॑ ब्रह्म॒न् मनसोऽधि॑जा॒तः ४८ वयुनम् | कान्तिर्वा प्रज्ञावा । वेतेः । | स॑ द्म॒त्तोमोवयु॑नन्त॒न्व॑त् सूर्य॑क वयुनवच्चकार । ४९ वाजपस्त्यम् | वाजपतनम् । | सनेम वाजपस्त्यम् । ५० वाजगन्ध्यम् | गव्यत्युत्तरेपदम् । (प्रतिष्ठितिष्ठामसमानगन्ध्यम्) | अ॒श्याम॑वाज॒गन्ध्य॑म् ।

हिन्दी निरुक्त ( १०३ ) ५ अध्याय संख्या | शब्द | अर्थ [ तत्व ] अवगम | निगमः ५१ | गध्यम् | ग्रहणीयम् । गृह्णातेः । | रि॒जाव॑नं॒ नग॑ध्यं य॒यून॒न् । ५२ | गचित्वा | गृहीता मिश्रिता च । गध्य- | अग्ग॑चित्वा॒ परि॑गचित्वा । | | तिर्मिश्रीभावकर्मा । | ५३ | कौरयाणः | कृतयाणः । | पाक॑स्थामा कौरया॒णः । ५४ | तोरयाणः | तूर्णयाणः । | स तो॒रया॑णा॒ उप॑याहि य॒ज्ञं म॒रुद्भि॑रिन्द्र स॒खिभिः॑ सजोषाः । ५५ | अहूयाणः | अहीतयानः । | अनु॑ष्ठयाकृण्व॒न्नहू॑याणाः । ५६ | हरयाणः | हरमाणयानः | रजतं॒ हर॑याणं । ५७ | आरितः | प्रत्युतः | य आरितः कर्मणि कर्मणि स्थिरः । ५८ | बन्दू | बहुभावकर्त्तारौ । बन्दते र्वृद्ध- | नियद्वृ॒षाक्षै॑ प्र॒वज॑नस्य॒ मूर्द्धनि॒ प्र शु॒ष्णस्य॑ | | र्भावकर्मणः । वीलयतिश्च व्रील- | चिद्वन्द्विनो॑ रो॒रुव॒द्वना॑ ! | | यतिश्च संस्तम्भकर्मणौ प्र पूर्वश्च | अब्रन्दन्त ब्रीलिता । | | संप्रयुज्येते । | ५९ | निष्पद्यौ | स्त्रीकामोभवति । विनिर्ग- | मानो॒ अद्येव॑ निष्प॒द्यौ परा॑दाः ॥ | | त सयः । | ६० | तूर्णायम् | क्षुद्रं भवति । तूर्णमश्नुते । | तूर्णाशं॒ न गिरे॒ रथि॑ ।

हिन्दी निरुक्त ( १०९ ) ५ अध्याय ६१ क्षुम्पम् अहिच्छत्रकं भवति । यत् क्षम्यते । कदा मर्तमघपत्यामुपद्वा क्षुम्पमिव स्फुरत् । ६२ निचम्पुणः सोमः । निचामनल्पणः निचमनेन प्रीणाति । समङ्गोऽपि निचम्पुण उच्यते । निचमनेन पृर्यते । अवभृथोऽपिनिचम्पुण उच्यते । नीचेरस्मिन् कुशन्ति नीचेर्दधति इति वा । पत्नीवन्तः सुता इमउशन्तो यन्ति वीतये अपांनप्त्रिम निचम्पुणाः । अवभृथ निचम्पुण । ६३ पदिम् पदि गन्तु भवति । यत्पद्यते अनवगतम् । सुगरसत् सुहिरण्यः स्वश्वो बृहद्रथे वय इन्द्रो दधाति । यस्त्ववा ..... पदि मदिस- नाति । ६४ पादुः पदनम् । पद्यतेः । आदिः स्वःकृणोते गहते बसून् । स पादुरस्य निर्णिज इति । ६५ वृकः चन्द्रमा भवति । विवृत-ज्यो- तिष्को वा, विक्रान्तज्योतिष्को वा, विक्रान्तज्योतिष्को वा । आदित्योऽपि वृक उच्यते । यदावृङ्क्ते श्वापि वृक उच्यते विकर्तनात् । बहुवाशिनी अपि वृकी उच्यते । अरुणो मासकृद् वृकः । अजोहवीदश्विना वर्तिका वामास्यो यत्सीम मुञ्चतं वृकस्य । वृकश्चिदस्य वारणा उरामथिः । शतं मेषान् वृक्ये चक्षदानमृज्राश्वं तं पितान्धं चकार ।

हिन्दी निरुक्त ( १०८ ) ५ अध्याय

संख्याशब्दअर्थ ( तत्व ) अवगमनिगमः
६६जोषवाकम्अविज्ञातानामधेयम् । जोष-य इन्द्राग्नी सुतेषु वां स्तवत्तेष्वृतावृधा ।
यितव्यं भवति ।जोषवाकं वदतः पज्जुद्दीषिणा न देवामसश्चन्न ।
६७कृत्तिःयशो वा, अन्नं वा । कृन्ततेः ।महीव कृत्तिः शरणात इन्द्रः
इयमपि इतरा कृत्तिः एतस्मा-अवततधन्वा पिनाकहस्तः कृत्तिवासाः ।
देव । सूत्रमयी उपमार्थे वा ।
६८श्वघ्नीकितवो भवति । स्वं हन्ति ।कृतं न श्वघ्नी विचिनोति देवने ।
स्वं पुनराश्रितं भवति ।
६९समस्यसमसिति परिगृह्णार्थीयं सर्व-मानः समस्य दूढ्यः परिद्रू धसो प्र'हितिः ।
नामानुदात्तम् । तत्कथ मनुदा-उतो समस्मिन् इति ।
त्तप्रकृति नाम । दृष्टव्ययंतुउत्सष्याणो अद्यायतः समस्मात् ।
भवति ।नभन्तामन्यके समे ।
७०कुटस्यकृतस्य ।{ हविषा जारो अपां पिपर्त्ति पपुरिनंरा ।
७१चर्षणिःचायिता ।{ पिता कटस्यचर्षणिः ।
७२शम्भःवज्रनाम । शमयतेर्वा । शा-उयोथः शम्भः पुरुहूततेन ।
तयते र्वा ।
७३केपयाकपूया भवन्ति ।पप्रथमायन्............न्यविषन्त केपयः ।

हिन्दी निरुक्त ( १८६ ) ५ अध्याय ७४ न तमातृषे तूर्णं नपाकृरुषे एताँउविश्वोअसवनाऽनूत्तमातृषे । ७५ असंत्रम् अहंस्रस्त्राणम् । धनुर्वा कवचं वा । प्रीणिताश्वान् हिवंतं जयाथ.....तम संत्रम् चक्र म॑संत्रकोशं सिंचता नृपाणम् । ७६ काकुदम् तालु इत्याचक्षते । जिह्वा कोकुवा सा अस्मिन् धीयते । सुदेवो असि वरुणयस्यते...प्राणापाननु- रन्तत्काकुदं सूर्य सुषिराभिव । ७७ बोरिटे अन्तरिक्षमाह तैतीकिः। पूर्वं वयसः उत्तरम् हरतेः । गवः। प्रवादृजे सुप्र याबर्हि रेषा....बोरिटद्यूयाते ७८ ऋच्छ ऋभैः अयं भवति । आप्नु- मिति शाकपूणिः । ७९ परि व्याख्यातम् । (१-।२।५) ८० हेम् व्याख्यातम् । (१ । ३ । ७) ८१ सीम् व्याख्यातम् । (१ । ३ । २) ८२ रामेम् { अस्याः अस्य इत्येतेन व्या- ८३ रानाम् { ख्यातम् । (४। ४ । ४) नेदीय इत्युच्चयः पक्षेणयात् । ८४ सूकिः अंकुशो भवति । वरत्त्वात् —|००|०-००8० ०|००|—