निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
(भा०) देवा नो यथा सदावर्द्धनायस्युः, 'अप्रा- युषः'(३७) अप्रमाद्यन्तः रक्षितारश्च अहनिअहनि ॥ ‘व्यवनः’ ( ३८ ) ऋषिर्भवति । च्याचयिता स्तोमानाम् । 'च्यवानम्'- इति । अप्यस्य निगमा भवन्ति । “युवं च्यवानं सनयं यथा रथं पुन र्युवानं चरथाय तक्षथुः ॥” [ ऋ० सं० ७, ८, १५, ४ ] (भा०-) युवां च्यवनं सनयं पुराणं यथा रथं पुन र्युवानं चरणाय ततक्षथुः । ‘युवा’ प्रयोति कर्माणि । ‘तक्षतिः’ करोतिकर्मा ॥ 'रजः' (३९) रजतेः । ज्योतिः रजः उच्यते । उदकं रजः उच्यते । लोकाः रजांसि उच्यन्ते । असृगहनी रजसी उच्येते । (“रजांसि चित्रा विचरन्ति तान्यव” इत्यपि निगमो भवति ) ॥ ‘हरः’ ( ४० ) हरतेः । ज्योति र्हरउच्यते । ( उदकं हर उच्यते । ) लोकाः हरांसि उच्यन्ते । ( असृगहनी हरसी ) उच्येते । “प्रत्यग्मे हंसा हरः शृणीहि” [ ] इत्यपि निगमो भवति । ) ॥ “'जुहुरे' (४१) विचितयन्तः” (ऋ०सं०४,१,११,२) ।
हिन्दी निरुक्त ( ७० ) ४ अ० ३ पा० ३ खं० (भा०-) जुह्विरे विचेतयमानाः ॥ ‘व्यन्तः’ (४२) इति एषः अनेककर्मा । “पदं देवस्य नमसा व्यन्तः” [ऋ० सं०४,४,३५,४] इति पश्यतिकर्मा । “वीहि शूर पुरोडाशम्” ( ऋ० सं०- ३, ३, ३, ३ ) इति खादतिकर्मा । “वीतं पातं पयस उस्रियायाः ।” ( ऋ० सं०२, २, २३, ४ ] । ( भा०- ) अश्नीतं पिबतं पयसः उस्रियायाः । ‘उस्रिया’-इति गोनाम । उत्साविणोऽस्यां भोगाः। ( ‘उस्रा’-इति च । ) “त्वामिन्द्र मतिभिः सुते सुनीथासो वस्यवः । (४३) गोभिः क्राणा अनूषत ।” [ ] ( भा०- ) गोभिः कुर्वाणाः अस्तोषत ॥ (४४) “आतूषिञ्च हरिमींद्रोरुपस्थे वाशीभिस्तक्षता इमन्मयीभिः ।” [ऋ०सं० ८, ५, १९, ४] (भा०-) आ- सिञ्च हरिं द्रोणुपस्थे द्रुममयस्य । ‘हरिः’ सोमः, हरितवर्णः । अयमपि इतरो हरिः एतस्मादेव । ‘वाशीभिः’ तक्षताश्मन्मयीभिः । ‘वाशीभिः’ (४४) अश्ममयीभिः इतिवा । वाग्भिः-इतिवा । (४५) “सशर्द्धदर्यो विषुणस्य जन्तोर्माशिश्नदेवा
हिन्दी निरुक्त ( ७१ ) ४ अ० ३ पा० ३खं० अपिगुर्ऋतंनः” [ऋ० सं० ५, ३, ३, ५] । (भा०) सः उत्सहतां, यो विषुणस्य जन्तोर्विषमस्य । मा शिश्नदेवाः अब्रह्मचर्याः । 'शिश्नं' श्रथतेः । “अ- पिगुर्ऋतंनः ।" (भा०) सत्यंवा यज्ञंवा ॥३[१९]॥ अनुवादः । 'अपायुवः' (३७) अनवगत पद का निगम— “देवानो यथा००” [ऋ०सं १, ६, १५, १] अर्थात् 'यथा' जिस प्रकार 'नः' हमारी 'वृधे' वृद्धिके लिये 'सदम्-इत्' सदा ही 'दिवे-दिवे' (अहनि अहनि) दिन दिन 'देवाः' देवता 'अपायुवः' (३७) (अप्रमाद्यन्तः) प्रमाद नहीं करते हुए 'रक्षि- तारः (च)' और रक्षा करते हुए 'असन' (स्युः) होवें, [ उसी प्रकार ये सोम यज्ञ या सगुण काम आवें । ] 'च्यवन' (३८) ऋषि होता है । क्यों कि-स्तोमों (मन्त्रों) का चुवाने वाला या देखने वाला है । 'च्यवान' इस नाम से भी इस (भृगु के पुत्र ऋषि) के निगम हैं— “युवं च्यवानं००” [ ऋ० सं० ७, ८, १५, ४ ] अर्थात् हे 'अश्विनौ', अश्विनी कुमारो ! 'युवम्' (युवाम्) तुम दोनों ने 'यथा' जैसे 'सनयम्' पुराने 'रथम्' रथ को [ कोई शिल्पी नवीन या चलने योग्य बनादे, ] वैसे ही 'सनयम्' बूढ़े ( चलने में असमर्थ ) 'च्यवानम्' च्यवन ऋषि को 'चरणाय' चलने के अर्थ पुनः' फिर 'युवानम्' युवा (जवान) 'तक्षथुः' (ततक्षथुः) बना दिया (कर दिया) ॥ 'युवा' क्यों?
वह कर्मों को जैसा चाहिए युवाता (सम्पादन करता है ।) 'तक्ष' (भ्वा० प०) धातु 'करोति' करना अर्थ में है । रजस् (३६) 'रञ्ज' रागे (भ्वा० प०) धातु से है । ज्योति 'रजस्' कहा जाता है । जल 'रजस्' कहा जाता है । लोक 'रजस्' कहे जाते हैं । असृक् (रक्त) और अहन् (दिन) रजस् कहे जाते हैं । (“ रजांसि चित्रा विचरन्ति तान्यव” यह भी निगम है ।) ॥ 'हरस्' (४०) हरति 'हृञ्' हरणे (भ्वा० उ०) धातु से है । ज्योति 'हरस्' कही जाती है । [ क्योंकि वह हर ली जाती है, या वह स्नेह (चिकनाई) को हर लेती है । अथवा तम (अंधेरे) को हर लेती है । ] जल 'हरस्' कहा जाता है (क्योंकि लोक उसे जीवन के अर्थ ले जाते हैं ।) लोक 'हरस्' कहलाते हैं । [ क्योंकि जिन के पुण्य क्षीण हो जाते हैं, वे प्राणी वहां से हर लिये (हटा लिये) जाते हैं ।] 'जुहुरे' (४१) (जुह्वहिरे) इस अनवगत पद का निगम— “जुहुरे विचितयन्तः” [ऋ० सं० ४, १, ११, २] अर्थात् 'जुहुरे' (जुह्विरे) अग्नि में होम करते हैं 'विचितयन्तः' (विचेतयमानाः) वेदान्त दर्शन से कर्त्ता, कर्म, और साधन रूप कारकों के यथार्थ रूप को जानते हुए ॥ 'व्यन्तः' (४२) यह (वी० अदा० प० धा०) अनेकार्थ है । [निगम-] “पदं देवस्य नमसा व्यन्तः” [ऋ० सं० ४, ४, ३५, ४] अर्थात् “'देवस्य' अग्निदेव के 'नमसा' नमस्कार या मन्त्र से 'पदम्' यथार्थ (वास्तविक)
हिन्दी निरुक्त ( ७३ ) ४ अ० ३ पा० ३ खं० रूप को 'व्यन्तः' देखते हुए।” यहां दर्शन अर्थ में है। “वीहि शूर पुरोडाशम्” [ ऋ० सं० ३,३,३,३ ] अर्थात्—हे शूर ! इन्द्र ! ‘पुरोडाशम्’ पुरोडाश को ‘वीहि’ खा। इस मन्त्र में खाना (भोजन) अर्थ में है । “वीतं पातं पयस उस्रियायाः” [ ऋ० सं २, २, २३, ४] अर्थात्-हे मित्रावरुणो ! ‘उस्रियायाः’ उस्रिया के दूधसे बनी हुई ‘पयसः’ पयस्या के भाग को ‘वीतम्’ खाओ ‘पातम्’ पीओ । इस मन्त्र में भी भोजन अर्थ है। ‘उस्रिया’ यह गौका नाम है। क्योंकि- इस में भोग उत्पन्न होते हैं । (और ‘उस्रा’ यह भी गौका नाम है ।) 'क्राणा.' (४३) (कुर्वाणाः) इस अनवगत पद का निगम— “त्वामिन्द्र ०० गोभिः क्राणा (४३) अनूषत” [ ] अर्थात्-‘हे इन्द्र ! ‘मतिभिः’ बुद्धिमान् पुरुषों से ‘सुते’ सोमके निचुड़ जाने पर ‘सुनीथासः’ सुन्दर स्तुति करने में समर्थ ‘वसूयवः’ धन की कामना वाले पुरुष ‘गोभिः’ स्तुति की वाणियों से आभिमुख्य (सम्मुखता) ‘क्राणाः’ (कुर्वाणाः) करते हुए ‘अनूषत’ (अस्तोषत) स्तुति करते हैं । 'वाशी' (४४) अनवगत पचान्तर में अनेकार्थ है, उसका निगम— “आतूषिञ्च ०० वाशीभिस्तक्षताश्मन्मयीभिः” [ ऋ० सं० ८, ५, १६, ४ ] अर्थात्-हे अध्वर्यो ! ‘हरिम्’ इस हरे रंग के सोमको ‘द्रोः’ वृक्ष (काष्ठ) के ‘उपस्थे’ अधिष- वण-फलक (पात्र) में ‘आ-सिञ्च’ डाल । ( ‘ईम्’ अनर्थक) हे होतारः ! होताओं ! तुम भी ‘अश्मन्मयीभिः’ (अश्ममयीभिः) १०
हिन्दी निरुक्त ( ७४ ) ४ अ० ३ पा० ३ खं० पत्थर की 'वाशीभिः' ग्रावों (पात्रविशेषों) से 'तक्षत' संस्कार करो (कूटो) । दूसरा अर्थ-हे उन्नेतः ! 'हरिम्' उस हरे सोमरस को इस कलश से 'द्रोः-उपस्थे' द्रोणकलशके ऊपर 'आसिञ्च' झार । और तुम भी हे होताओ ! सींचेजाते हुए इस सोम को 'अश्म- न्मयीभिः' व्यापन होती हुई 'वाशीभिः' स्तुतियों से 'तक्षत' संस्कार करो । निरुक्तार्थ—द्रुम-मय या काठ के पात्र के ऊपर हरिको भली प्रकार सींच । 'हरि' नाम सोम हरे रंग का । यह दूसरा भी 'हरि' (वानरका नाम) इसी व्याख्यान से है। [क्योंकि- वह भी हरे रंग का होता है। रामायण में कहा है— “शिरीषकुसुमप्रख्याःकेचित्पिङ्गलकप्रभाः, वानराः” अर्थात् कोई सिरस के फूलके रंग के और कोई पीले वानर थे । “तक्षताश्मन्मयीभिः” इस मन्त्र में 'वाशीभिः' पदके पत्थर के पात्रों से अथवा बाणियों (स्तुतियों) से इस प्रकार दो अर्थ होते हैं । 'विषुणा' (४५) (विषमः) इस अनवगत पद का निगम— “ स शर्द्धदर्यो विषुणस्य ००” [ऋ० सं० ५, ३, ३,५ ] अर्थात्-हे इन्द्र ! 'सः' वह 'शर्द्धत्' (हमारे यज्ञ में) आसके, जो 'अर्य्यः' जितेन्द्रियहो, और 'विषुणस्य' (विषमस्य) यज्ञ के विध्वंस करने वाले 'जन्तोः' मनुष्य के (दबाने में समर्थ हो ।) किन्तु-'शिश्नदेवाः' ब्रह्मचर्य्य से रहित पुरुष 'नः' हमारे 'ऋतम्' यज्ञ में या सत्य में 'मा' न 'अपिगुः' आवें । निरुक्तार्थ-वह उत्साह करे जो विषुणा (विषम) यज्ञ के विध्वंस करने वाले का। न शिश्नदेव या अब्रह्मचर्य से
हिन्दी निरुक्त ( ७५ ) ४ अ० ३ पा० ४ खं० रहित । 'शिश्न' शब्द 'श्नथ' (भ्वा० प०) धातु से है । “अपि गुर्ऋतम्” यहां 'ऋत' नाम सत्य का है, अथवा यज्ञ का है ॥ ३ (१६) ॥ (४ खं०) १ [निरु०-] “आघातागच्छानुत्तरा युगानि यत्र (४६) जामयः कृणवन्नजामि । उपबर्बृहि वृषभाय बाहु- मन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्।” [ऋ०सं०७,६,७,५] (भा०) आगमिष्यन्ति तानि उत्तराणि युगानि, यत्र जामयः करिष्यन्ति अजामिकर्माणि । 'जामि' (४६) अतिरेकनाम । बालिशस्य वा । असमान- जातीयस्य वा । उपजनः (मिः) । उपधेहि वृषभाय बाहुम्, 'अन्यम्-इच्छस्व सुभगे ! पतिं मत्'-इति व्याख्यातम् ॥ ४ (२०) ॥ अनुवादः । 'जामि' (४६) यह अनेकार्थ अर्थात् भगिनी, मूर्ख, और पुनरुक्त अर्थ में है । इस का निगम नीचे है, जिसमें यमका उसकी बहिन यमी के प्रति वचन है “आघाता गच्छा ००” [ऋ० सं० ७, ६, ७, ५] अर्थात्- ('घा' अनर्थक) 'ता' (तानि) वे 'उत्तरा' (उत्तराणि) १-“आघाता” इति यम ऋषिः । यमी देवता । त्रिष्टप्छन्दः ।
हिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ४ अ० ३ पा० ४ खं०
पिछले 'युगानि' युग 'आ-गच्छान्' (आगमिष्यन्ति) आवेंगे। [वे भी काल अभी वर्त्तमान नहीं है।] 'यत्र' जिनमें 'जामयः' भाइयों की बहिनें 'अजामि' बहिनों के अयोग्य मैथुन आदि कर्मों को 'कृणवन्' (करिष्यन्ति) करेंगी। [क्योंकि-वैसा संकर कलियुग के अन्त में होता है, और यह कलियुग नहीं है। इस लिये अभी तक वर्णसंकर धर्म चला नहीं है। किन्तु सब प्रजा अपने सदाचार ही में हैं। इससे मैं कहता हूं— “उपबर्बृहि००” अर्थात्-तू 'वृषभाय' अन्य कुलमें उत्पन्न हुए हुए योग्य वर के लिये 'बाहुम्' भुजाको 'उपबर्बृहि' फैला [सर्वथा मैथुनधर्म के लिये प्रार्थना करने पर भी मैं तेरा पति न हूूंगा।] [इसी से कहता हूं-] “अन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्” अर्थात्-हे सुभगे ! 'मत्' मुझसे 'अन्यम्'दूसरे 'पतिम्'पतिको'इच्छस्व' इच्छा कर। इस प्रकार इस सूक्त में संवाद के अधिकार के कारण 'जामि' शब्द से भगिनी ही कही जाती है। निरुक्तार्थ-आवेंगे वे उत्तर युग, जिनमें बहिनें अजामि- कर्म जो उनके योग्य नहीं हैं, करेंगी। 'जामि' (४६) अतिरेक ( पुनरुक्त ) का नाम है। [इस अर्थ में निगम खोजना होगा।] अथवा बालिश या मूर्खका नाम है। अथवा असमानजातीय या भिन्न जातिके मनुष्य का नाम है, 'जामि' इस शब्द में 'मि' यह प्रत्यय है। [जो ही अर्थ 'जा' से होता है, वही 'जामि' से।] भुजा को वीर्य्य देने वाले के लिये धारण कर। “अन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्” यह अपने आप ही व्याख्या किया हुआ [स्पष्ट] है ॥ ४(२०) ॥
हिन्दी निरुक्त r ( ७७ ) ४ अ० ३ पा० ५ ख० ( ५ खं० ) १ (४७) [निरु०] “द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम् । उत्तानयो श्चम्वो ३ र्योनि- रन्तरत्रापितादुहितुर्गर्भमाधात् ॥” [ ऋ० सं० २, ३, २०, ३ ] (४७) (भा०) “द्यौर्मे पिता” माता ( पाता ) वा पालयिता वा । जनयिता । “नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी” महती “इयम्” । ‘बन्धुः’ सम्बन्ध- नात् । ‘नाभिः’ सन्नहनात् । “नाभ्या सन्नद्धा गर्भा जायन्ते” इत्याहुः । एतस्मादेव ज्ज्ञातीन् ‘सनाभयः’ इत्याचक्षते । ‘ सम्बन्धवः ’ इतिच । ‘ज्ज्ञातिः’ सञ्जानात् । “उत्तानयोश्चम्वो३र्योनि- रन्तः ।” ‘उत्तानः’ उत्तानः । ऊर्ध्वतानो वा । तत्र पिता दुहितुर्गर्भ दधातिपर्जन्यः पृथिव्याः । ( शंयुः सुखंयुः । ) (४८) “अथानः शंयोररणो दधात” (ऋ० सं० ७, ६, १७, ४ ) । १-“द्यौर्मेपिता” इति । द्वयम् अस्यवामीयं दीर्घतमसः आर्षम् । तृतीयसवने वैश्वदेवे शस्यते ।
हिन्दी निरुक्त ( ७८ ) ४ अ० ३ पा० ५ खं० (भा०) 'रपो' 'रिप्रम्' इति पापनामनी भवतः । शमनं च रोगाणां, यावनं च भयानाम् अथापि 'शंयुः' (४८) बार्हस्पत्य उच्यते । "तच्छंयोरावृणीमहे गातुं यज्ञाय गातुं यज्ञपतये" इत्यपि निगमोभवति (भा०) गमनं यज्ञाय, गमनं यज्ञपतये" ॥ ५ (२१) ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ४, ३ ॥ अनुवादः । 'पिता' (४७) अनवगत शब्द का निगम— "द्यौर्मे पिता"०[ऋ० सं० २, ३, २०, ३] अर्थात् 'द्यौः' ऊपर वाला द्यु लोक 'मे' मेरा 'जनिता' उत्पन्न करने वाला, 'नाभिः' वीर्य के द्वारा नाभि देश में बांधने वाला, 'पिता' बाप है । 'अत्र' इस द्यु लोक रूप पिता के जल दान से अनुगृहीता होने पर, 'बन्धुः' अङ्ग के सम्बन्ध को करने वाली 'मही' पूजनीया 'इयम्' यह 'पृथिवी' पृथ्वी 'मे' मेरी 'माता' मा है । 'उत्तानयोः' ऊपर को उठे हुए 'चम्वोः' द्यु लोक और पृथिवी लोक के 'अन्तः' बीच में 'योनिः' अवकाश दान से मिलाने वाला अन्तरिक्ष (आकाश) लोक है । 'अत्र' इस में 'पिता' द्युलोक ने 'दुहितुः' पृथिवी के ऊपर 'गर्भम्' सब प्राणियों की उत्पत्ति का कारण रूप जल (गर्भ) धारण किया । निरुक्तार्थ द्यु लोक मेरा 'पिता' पालने वाला है । अथवा
हिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ४ अ० ३ पा० ५ ख० उत्पन्न करने वाला है । 'नाभि' नाभिदेश में बांधने वाला । इस द्यु लोक में अङ्ग सम्बन्ध को जोड़ने वाली यह बड़ी या पूजनीय पृथिवी माता है । 'बन्धु' क्यों ? सम्बन्ध करने से । 'नाभिः' क्यों? सन्नहन या बांध लेने से । [क्योंकि-] “ नाभि [ सूंढी ] बंधे हुए गर्भ उत्पन्न होते हैं ” ऐसा विद्वान् कहते हैं । इसी कारण से ज्जातियों को 'सनाभि' इस नाम से बोलते हैं । और 'सम्बन्धु' यह भी (कहते हैं) 'ज्जाति' क्यों? संज्ञान अच्छे प्रकार से ज्ञान या जानकारी से । ऊपर को उठे हुए ःद्युलोक-पृथिवी लोक के बीच में अन्तरिक्ष है । उत्तान क्यों ? उत्तान है । अथवा ऊर्ध्वतान ऊपर को तना हुआ है । उस में पिता पर्जन्य दुहिता [द्यु लोक से जलको दोहने वाली] पृथिवी पर गर्भ धारण करता है । 'शंयु.' (४८) अर्थात् सुखयु सुखी । निगम— “अथानः शंयो ररपो दधात” [ऋ० सं० ७, ६, १७, ७ ] । अर्थात्-हे पितरो ! ‘अथ’ और ‘नः’ हमारे अर्थ 'शम्' रोगों की निवृत्ति 'योः' भयों का नाश और 'अरपः' जो कुछ पाप विना हित हो 'दधात' करो । निरुक्तार्थ-‘रपः’ 'रिम्रम्' यह दो पापके नाम हैं । शमन रोगों का, और यावन ( भगाना ) भयों (डरों) का । और ‘शंयु’ वृहस्पति का पुत्र भी कहा जाता है । 'तत्' ( तदा ) तब ( हम ) ‘शंयोः’ वृहस्पति के पुत्र से 'आ-वृणी- महे' सम्मुखभाव से मांगते हैं- ‘यज्ञाय’ यज्ञ के अर्थ 'गातुम् देवताओं के प्रति जाने को, और ‘यज्ञपतये’ यजमान के अर्थ ‘गातुम्’ देवताओं के प्रति जाने को । ' यह भी निगम है ।
हिन्दी निरुक्त ( ८० ) ४ अ० ४ पा० १ खं० निरुक्तार्थ—यज्ञ के लिये गमन । यज्ञपति (यजमान) के लिये गमन ॥ ५ ( २१ ) ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ४, ३ ॥ चतुर्थेऽध्याये- चतुर्थः पादः । ( १ खं० ) [ निरु० ] ‘ अदिति ’ (४१) अदीना देव- माता ॥ १ ( २२ ) ॥ अनुवादः । ‘अदिति’ यह अनवगत पद है । १ (२२) क्योकि-इसमे प्रकृति और प्रत्यय तथा अर्थ की प्रतीति नहीं होती । ‘अदीना’ इसका अवगम और देवमाता इसका अर्थ है । निरुक्तार्थ-अदिति (४६) क्यों ? वह अदीना है, दीन नहीं है, वह क्या? देवमाता। [यह अर्थ ऐतिहासिक पक्ष से है] नैरूक्तो के मत मे ‘अदिति’ शब्द के उतने ही अर्थ है, जितने कही जाने वाली ऋचा में दिखाए है । अर्थात्-द्यौ, द्युलोक अन्तरिक्ष, माता, पिता, पुत्र, विश्व सर्व देव, पञ्चजन [ गन्धर्व आदि या ब्राह्मण आदि ] जात, भूत जनित्व, [ भविष्यत् । ] ( २ खं० ) १ [निरु०] अदितिर्द्यौरदिति रन्तरिक्ष मदितिर्माता- १ “अदितिर्द्यौः” इति राहूगणस्य गोतमस्य इयमार्षम् । तृतीयसवने सर्वस्तोमेष्वेव, वैश्वदेवस्य शस्तस्य परिधानीया एषा ।
हिन्दी निरुक्त ( ८१ ) ४ अ० ४ पा० २ खं०
सपिता सपुत्रः । विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना
अदिति र्जातं मदितिर्जनित्वम्' ॥ [ ऋ० सं०१०,
६, १६, ५ ]
(भा०) इति अदिते र्विभूतिमाचष्टे । एनानि
अदीनानि-इतिवा ।
“यमेरिरे (५०) भृगवः” [ऋ०सं० २,२,२,४]
(भा०) एरिर इति 'ईर्त्तिः' ( अदा० आ० ) उप
सृष्टोऽभ्यस्तः २, ( २३ ) ॥
अनुवादः ।
मन्त्रार्थः-‘अदितिः’ देवमाता ही ‘द्यौः’ द्युलोक है ।
‘अदितिः’ देवमाता ही ‘अन्तरिक्षम्’ अन्तरिक्ष है । ‘अदितिः’
देवमाता ही ‘माता’ सब प्राणियों को उत्पन्न करने वाली
है । ‘सः’ वही ‘पिता’ पालक है । ‘सः’ वही ‘पुत्रः’ पुत्र है ।
‘अदितिः’ देवमाता ही ‘विश्वे’ सब ‘देवाः’ देवता हैं ।
‘अदितिः’ देवमाता ही ‘पञ्च’ पांच ‘जनाः’ जन हैं । ‘अदितिः’
देवमाता ही ‘जातम्’ बहुत क्या ? सर्वथा ही जो कुछ जगत्
में उत्पन्न हुआ हुआ है, सब है । ‘अदितिः’ देवमाता ही
‘जनित्वम्’ जो होनहार जगत् है, सब है ॥
इस मन्त्र में ऋषि ( जिसे मन्त्र का साक्षात्कार हुआ )
अदिति की विभूति को कहता है । [ क्योंकि देवता महाभाग्य
होता है, उसे सब सम्भव है । यह माहाभाग्य दैवत काण्ड में
कहा जावेगा । ]
११
हिन्दी निरुक्त ( ८२ ) ४ अ० ४ पा० ३ ख० अथवा 'ये सब अदीन हैं' यह अर्थ है ॥ [ मन्त्रार्थ में ऐतिहासिक पक्ष से 'अदिति' शब्द का सर्वत्र 'देवमाता' और नैरुक्त पक्ष में 'अदीन' अर्थ लेना । ] 'एरिरे' (५०) (आईरिरे) का निगम— “येमेरिरे भृगवः” [ ऋ० सं० २, २, २, ४ ] अर्थात् 'भृगवः' भृगुओं ने 'यम्' जिस (अग्नि) को 'एरिरे' (आईरिरे) प्रेरणा या स्थापन किया । 'एरिरे' इस पद में 'ईर्' ( अदा० आ० ) धातु 'आ' उपसर्ग से युक्त और दोहराया हुआ है ॥ २ (२३) ( ३ खंड ) [निरु०-] १“उतस्मैने॑ वस्त्रमथिं न तायु मनुक्रोशन्ति (५१) क्षितयो॒भरे॑षु । नी॒चाय॑मानं जसुरिंनश्येनं॑श्रव॒श्रा- च्छा पशुमच्च यूथम् ॥” [ ऋ०सं० ३,७,११,५ ] । ( भा०- ) अपि “स्म-एनम्” “वस्त्रमथिम्” . इव वस्त्रमाथिनम् । 'वस्त्रं' वस्तेः । 'तायुः'-इति स्तेन-नाम । “संस्त्यानम् अस्मिन् पापकम्-” इति नैरुक्ताः। तस्यतेर्वा स्यात् । “अनुक्रोशन्ति क्षितयः” संग्रामेषु । 'भरः' इति संग्रामनाम । भरतेर्वा । हरतेर्वा । “नीचायमानं” नीचैः-अयमानम् । १ “उतस्मैनेम्” इति बामदेवस्य आर्षम् । त्रिष्टुप्छन्दः । दधिक्राव्यो सूक्तं ।
हिन्दी निरुक्त ( ८३ ) ४ अ० ४ पा० ३ खं० 'नीचैः' निश्चितं भवति । 'उच्चैः' उचितं भवति । जस्तमिव “श्येनम्” । ‘श्येनः’ शंसनीयं गच्छति । “श्रवश्चाच्छा पशुमच्चयूथम्” । श्रवश्चापि पशुमच्च यूथम् = प्रशंसांच यूथंच । ‘धनंच यूथंच’:इतिवा। 'यूथं' यौतेः । सभायुतं भवति । “इन्धान एनं जरते स्वाधीः”^(५२) [ऋ०सं०७,८,२८,१] गृणाति मन्दी^(५३), मन्दतेः स्तुतिकर्मणः । “प्रमन्दिने पितुमदर्चतावचः ।” [ऋ०सं०१, ७, १२, १ ] ( भा०) प्रार्चत पितुमद्वचः । ^(५४)गौः व्याख्यातः ॥ ३ ( २४ ) ॥ अनुवादः । 'जस्तुरिः' (५१) (जस्तम्) अनवगत का निगम— “उतस्मैनेम्” [ऋ० सं० ३, ७, ११, ५ ] अर्थात्— ‘क्षितयः’ मनुष्य ‘उत-स्म-एनम्’ इस ( इन्द्र ) को ‘वस्त्रमथिम्’ वस्त्रों को छीन ले जाने वाले ‘तायुम्’ लुटेरेके ‘न’ समान और ‘जस्तुरिम्’ तांत आदि के तन्तु से बंधे हुए, ‘नीचायमानम्’ गुस्से आदि जन्तुओं को मारनेके अर्थ नीचानीचा चलने वाले ‘श्येनम्’ बाज के ‘न’ समान ‘भरेषु’ संग्रामों में ‘अनुक्रोशन्ति’ पुकारते ( बुलाते ) हैं । [इस प्रयोजन से कि] श्रवः-च-अच्छ' कब हम सुने कि-इन्होंने जय लाभ किया इत्यादि कीर्त्ति ‘च’
हिन्दी निरुक्त ( ८४ ) ४ अ० ४ पा० ३ खं० और ‘पशुमत्’ अनेक जाति के पशुओं वाला ‘यूथम्’ समूह [हमारे हो] ॥ निरुक्तार्थ- इसी को। वस्त्रमथि या वस्त्रमाथी (वस्त्रों के छीन लेजाने वाले) के ‘समान। ‘वस्त्र’ शब्द ‘वस्’ (अदा० आ०) धातु से है। [क्योंकि-वह ढांपा जाता है।] ‘तायु’ यह स्तेन या लुटेरे का नाम है। [क्योंकि-] 'इसमें पापकर्म संस्त्यान या इकट्ठा रहता है' ऐसा नैरुक्त मानते हैं। अथवा ‘तस्’ उपक्षयार्थक (दिवा० प०) धातु से है। क्योंकि-वह अधार्मिक होने से हीन होता है। या परलोक की परवाह न करके कर्मों को करता है।] संग्रामों में मनुष्य पुकारते हैं। 'भर' यह संग्राम का नाम है। अथवा 'भृ' (भ्वा० उ०) धातु से है। अथवा 'हृ' (भ्वा० उ०) धातु से है। ‘नीचायमान’ नीचे नीचे अयमान चलने वाला। ‘नीचैः’ क्यों ? निश्चित (झुकाहुआ) होता है। बँधेहुए श्येन (बाज) के समान। ‘श्येन’ क्यों ? शंसनीय (प्रशंसनीय) चलता है। “श्रवश्चा- च्छा पशुमच्चयूथम्” कीर्त्ति और पशुओं वाला झुन्ड। अथवा धन और यूथ (झुन्ड)। ‘यूथ’ क्यों ? ‘यु’ (अदा० प०) धातु से है। एक स्थान में स्त्री, पुरुष, बाल, और वृद्ध पशुओं से संयुक्त होता है। जरते-(५२) (स्तौति) अर्थानवगत पद का निगम- “इन्धान एनं जरते (५२) स्वाधीः” [ऋ० सं० ७, ८, २८, १,] अर्थात् ‘इन्धानः’ दीपन करता हुआ ‘स्वाधीः’ सुन्दर बुद्धि बाला ‘एनम्’ इस अग्नि को ‘जरते’ स्तुति करता है।
हिन्दी निरुक्त ( ८५ ) ४ अ० ४ पा० ४खं० 'मन्दिने' (५३) (मन्दनीयाय) की व्याख्या — 'मन्दी' जो मन्दन या गरण (स्तुति) करता है, या स्तुति किया जाता है । स्तुति अर्थ में 'मन्द' (भ्वा० आ०) धातु से है। निगम— “प्रमन्दिने पितुमदर्चता वचः” [ ऋ० सं० १, ७, १५, १,] अर्थात्–'प्रमन्दिने' स्तुति के योग्य (इन्द्र) के लिये 'पितुमत्' अन्नसंयुक्त 'वचः' वचन 'प्र-अर्चत' उच्चारण करो । निरुक्तार्थ–अन्नसंयुक्त वचन कहो । गो (५४) शब्द का व्याख्यान [ नि० २, २, १ ] हो चुका ॥ ३ (२४) ॥ ( ४ खं० ) [निरु०] अत्राह गोरमन्वत नामत्वष्टुरपीच्यम् । इत्था चन्द्रमसो गृहे ॥ [१, ६, ७, १५ ] (भा०)“अत्रह गोः” सममंसत आदित्यरश्मयः । स्वं “नाम” “अपीच्यम्” अपचितम्, अपगतम्, अपिहितम्, अन्तर्हितंवा । अमुत्र “चन्द्रमसो गृहे” 'गातुः' (५५) व्याख्यातः । (“गातुं कृणव- न्नुषमोजनाय” इत्यपि निगमो भवति ।) ॥ 'दंसयः' (५६) कर्माणि । दंसयन्तएनानि । १-“अत्राह” इति गोतमस्य राहूगणस्य इयमर्षम् । अ- ग्निचयने इष्टकोपधाने विनियुक्ता ।
हिन्दी निरुक्त ( ८६ ) ४ अ० ४ पा० ४ खं० “कुत्साय मन्मन्नह्यश्च दंसयः” (ऋ० सं० ८, ७, २६, १) इत्यपिनिगमो भवति ॥ “सतूताव (५७) नैनमश्नोत्यंहतिः ।” [ऋ० सं० १, ६, ३०, २ ] (भा०) सतुताव न-एनम् अंहतिः अश्नोति । 'अंहति' श्व-अंहश्च, अंहुश्च, हन्ते र्निरूढोपधाद् विपरीतात् ॥ “बृहस्पते चयसे (५८) इत्पियारम्” [ऋ० सं० २, ५, १२, ५ ] (भा०) बृहस्पते यच्चातयसि देवपीय़ुम् । पीयति हिंसाकर्मा । वियुते (५९) द्यावापृथिव्यौ । वियवनात् । “समान्या वियुते दूरे अन्ते ।” [ऋ० सं० ३, ३, २५, २,] (भा०) 'समानं' सम्मानमात्रं भवति । 'मात्रा' मानात् । 'दूरं' व्याख्यातम् । 'अन्तः' अततेः । 'ऋधक्' (६०)-इति पृथग् भावस्य प्रवचनं भवति । अथापि ऋध्नोत्यर्थे दृश्यते । “ऋधगया ऋधगुताशमिष्ठाः” [य०वा०सं०८,२०] (भा०) ऋध्नुवन्नयाक्षीः, ऋध्नुवन्नशमिष्ठाः ।
हिन्दी निरुक्त ( ८७ ) ४ अ० ४ पा० ४ खं० ‘अस्याः’ (६१) इतिच ‘अस्य’-(६२) इतिच । उ- दात्तं प्रथमादेशे । अनुदात्तम् अन्वादेशे । तीव्रार्थ- तरम्-उदात्तम् । अल्पीयोऽर्थतरम्-अनुदात्तम् । “अस्या ऊ षु ण उपसातये भुवोऽहेलमानो ररि- वाँ अजाश्व” (श्रवस्यतामजाश्व) । [ऋ० सं० २, २, २, ४] । (भा०-) अस्यै नः सातये उपभव । “अहेलमानः” अक्रुध्यन् “ररिवान्” रातिः (अदा० प०) अभ्यस्तः “अजाश्व” इति पूषणमाह । अजनाश्व । ‘अजाः’ अजनाः । अथ-अनुदात्तम् ।— “दीर्घायुरस्यायः पतिर्जीवाति शरदःशतम् ।” [ऋ० सं० ८, ३, २७, ४] । (भा०) दीर्घायुः अस्याः यः पतिर्जीवितु स शरदः शतम् । ‘शरत्’ शृता अस्याम्-ओषधयो भवन्ति । शीर्णा आप इति वा ॥ ‘अस्य’ (६२) इति ‘अस्याः’ [६२] इत्येतेन व्या- ख्यातम् ॥ ४ [२५] ॥ अनुवादः ‘गौ’ यह अनेकार्थ होने से यहा नैगम काण्ड में समाम्नान हुआ है । एवम् जिस प्रकार यह अनेकार्थ है, सो पहिले (नै० का० अ० २ पा०२ ख० १) दिखाया जाचुका । किन्तु पहिले यह भी कहा गया था कि—
हिन्दी निरुक्त ( ८८ ) ४ अ० ४ पा० ४ ख०
“अथाप्यस्यैको रश्मिश्चन्द्रमस प्रति दीप्यते, ०-० सोऽपि ‘गोः’
इत्युच्यते-“अत्राह गोरमन्वत” इति तदुपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः”
अर्थात् “और इस (आदित्य) का रश्मि (किरण) चन्द्रमा में लग
कर चमकता है, ०-० सो भी ‘गो’ कहलाता है—इसका निगम है—
“अत्राह गोरमन्वत” इसकी व्याख्या आगे करेंगे। वही यह अब
कहा जाता है—
[निरू०] [मन्त्रार्थ-] ‘अत्र-ह’ इसी ‘चन्द्रमसः’ चन्द्र के ‘गृहे’
मण्डल में अन्य ‘त्वष्टुः’ सूर्य की रश्मियों ने ‘गोः’ सुषुम्णा
नामक रश्मि का ‘नाम’ अवस्थान ‘अमन्वत’ माना।
निरुक्तार्थ-आदित्य की रश्मियों ने इसी में गो (सुषुम्णा
रश्मि) को माना। अपना अवस्थान, जो ‘अपीच्य’ (अपचित)
सूर्यमण्डल से हटकर चन्द्रमण्डल में लगा हुआ, (अपगत) गया
हुआ, (अपिहित) रखा हुआ, [अन्तर्हित] अथवा भीतर घसा
हुआ। उस चन्द्रमा के गृह (मण्डल) में॥
‘गातु’ (५५) शब्द का [नि०अ०४,पा०३,खं०५,] व्याख्यान
हो चुका। (“गातुं कृण्वन्नुषसो जनाय” यह भी नि-
गम है।)॥
‘दंसयः’ (५६) यह अनेक कर्मों का नाम है। [क्यों कि-
कर्मों के करने वाले] इन्हें दंसन (ग्रहण) करते हैं। [निगम]
“कुत्साय” ०-०[ ऋ० सं० १, ६, ३०, २, ] अर्थात्—
“सन्मन् (मन्यमानाः) मानते हुए ‘कुत्साय’ कृषक के लिये
‘अह्नः’ जल (देने) ‘च’ और ‘दंसयः’ उस के कर्मों को सफल
करने” यह भी निगम है।
‘तूताव’ (५७) (तुताव) इस अनवगत पद का निगम—
“स तूतताव” ०—० [१, ६, ३०, २] अर्थात् ‘सः’
वह ‘तूताव’ (वर्द्धते) बढ़ता है। ‘एनम्’ इस को ‘अंहतिः’