निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( १४ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० (निरु०-) अथापि स्तुतिरेव भवति न आशीर्वादः । और कोई मन्त्रों में स्तुति ही है, किन्तु आशीर्वाद या किसी अर्थ की कामना नहीं । उदाहरण- [ निरु०- ] “ इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचम् ” इति यथा एतस्मिन् सूक्ते ( ऋ०सं० १,७,२,१) ॥ “इन्द्रस्य नु वीर्याणि०” यह पन्दरह ( १५ ) ऋचाओं का दूसरा सूक्त है । आङ्गिरस हिरण्यस्तूप ऋषि त्रिष्टुप् छन्द, इन्द्र देवता और अग्निष्टोम में माध्यन्दिन सवनमें निष्केवल्य शस्त्र में विनियोग है । ( अहम् ) मैं ‘इन्द्रस्य’ इन्द्रके ‘ वीर्याणि ’ पराक्रम-युक्त कर्मों को ‘नु’ शीघ्र ‘प्रवोचम्’ ( ब्रवीमि ) कहता हूं । दूसरा विशेष— [निरु०-] अथापि आशीरेव न स्तुतिः । कुछ मन्त्रों में कामना ही है किन्तु स्तुति नहीं । उदाहरण- (निरु०-) “सुचक्षा अहमक्षीभ्यां भूयासम्, सु- वर्चा मुखेन सुश्रुत्कर्णाभ्यां भूयासम्” इति । प्रजापति ऋषि, यजुः, सविता देवता, और नेत्र के अभि- मन्त्रण में विनियोग है । (पा०गृ०जयरा०भा०) हे सवितृदेव ! ‘अहम्’ मैं ‘अक्षीभ्याम्’ (नेत्राभ्याम्) नेत्रों से ‘सुचक्षाः’ सुन्दर दर्शन शक्ति वाला ‘भूयासम्’ हो जाऊं ।
हिन्दी निरुक्त ( १५ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० 'मुखेन' मुख से 'सुवर्चाः' सुन्दर तेज वाला, 'कर्णाभ्याम्' और कानों से 'सुश्रुत्' सुन्दर श्रवण शक्ति वाला 'भूयासम्' हो जाऊं । मन्त्रों में स्तुति के अभाव में स्तुति और कामना के अभाव में कामनो जोड़ लेना चाहिये, ऐसा करने से मन्त्र पूर्ण होजाता है। इस प्रकार स्तुति आदि से रहित मन्त्र आधिक्य से कहां है ? [निरु०-] तदेतद् बहुलम्-आध्वर्यवे याज्ञेषु च मन्त्रेषु । सो यह बहुत करके आध्वर्यव ( यजुर्वेद ) में और यज्ञ सम्बन्धी मन्त्रों में है। तीसरा और चौथा विशेष- [निरु०-] अथापि शपथाभिशापौ । और भी शपथ (सौ या क़सम) और शाप ( कोसना )। कुछ मन्त्र ऐसे हैं जिन में न स्तुति है, और न कामना ही, किन्तु क्या तो किसी के मिथ्या आक्षेप को झूठा ठहराने के लिये ईश्वर से दण्ड स्वरूप अपने ऊपर अनिष्ट की झोंकी को मांगना, या किसी से पीडित होकर उसके लिये बुराई को चाहना ही कहा गया है। शपथ का उदाहरण- [निरु०-] “अद्यामुरीय यदि यातुधानो अस्मि” ऋ०सं०५,७,७,५,] वसिष्ठ ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द, रक्षोहन् (राक्षसों को मारने वाले) इन्द्रा सोम देवते, राक्षसोंकी निवृत्ति के अर्थ “इन्द्रा
' हिन्दी निरुक्त ( १६ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० सोम" यह पचीस (२५) ऋचाओं का सूक्त जपा जाता है, उसकी पन्दरहवीं ऋचा है (सा०भा०) "यदि यातुधानः अस्मि" यदि मैं वशिष्ठ राक्षस हूं "अद्यामुरीय" तो आज ही मरजाऊं । शाप को उदाहरण- [ निरु०- ] “अधा स वीरैर्दशभि र्वियूयाः" इति ॥ ( ऋ० सं० ५, ७, ७, ५) ॥ 'अध' यदि ऐसा होकि-' मैं वसिष्ठ और तू राक्षस' तो सो तू आज ही दश पुत्रों से वियुक्त होजा । पांचवां विशेष- [ निरु०- ] कथापि कस्याचिद् भावस्य आचि- ख्यासा ॥ और भी मन्त्रोंमें किसी भावके कहने की इच्छा होती है । उदाहरण- [ निरु०- ] [क] “न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि" ( ऋ० सं० ८, ७, १७, १ ) त्रिष्टुप् छन्द, परमेष्ठी नाम प्रजापति ऋषि, आकाश आदि पदार्थों की सृष्टि स्थिति और प्रलय आदि यहां प्रति- पादन किये जाते हैं, इससे उनका कर्त्ता परमात्मा देवता और विनियोग पूर्वके तुल्य । (सा० भा० ) 'तर्हि' इस जगत् की जब उत्पत्ति न हुई थी, तब मृत्यु नहीं था, क्योंकि- उस समय मरने वाला मनुष्य आदि कोई नहीं था । और 'अमृत' अमरपणा भी नहीं था, क्योंकि- मृत्यु नहीं था ।
हिन्दी निरुक्त ( १७ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० (निरु०-) (ख) “ तम आसीत्तमसागूल्हमग्रे ” ( ऋ०सं० ८, ७, १७, ३ ) ‘ तमः ’ अंधेरा ही था, अति अंधेरे से ( सब ) ढंका हुआ था । छठा विशेष- (निरु०-) अथापि परिदेवना कस्माच्चिद्भावात् ॥ और भी किसी कारण से विलाप भी मन्त्रोंमें होता है । उदाहरण- ( निरु०- ) “ सुदेवो अद्य प्रपतेदनावृत् ” ॥ ( ऋ० सं० ८, ५, ३, ५ ) पुरूरवा ऋषि, त्रिष्टुप् छन्दः, परिदेवना । ‘सुदेवः’ वह शोभन ( अच्छा ) देव है, जो इस प्रिया उर्वशी से वियुक्त होकर ‘अद्य’ आज ही ‘प्रपतेत्’ गिरे,-ऐसा गिरे कि ‘अनावृत्’ फिर संसारमें न लौटे। यहां ऋषि विषय लम्पटता के दुःखरूप परिणाम की स्थिति को दिखाता है, कि लोक इसे भले प्रकार जानकर इस में न फंसे । और विलाप का उदाहरण- (निरु०-) “न विजानामि यदि वेदमस्मि” इति ॥ दीर्घतमा ऋषि और अस्यवामीय सूक्त । “न विजानामि” मैं यह अच्छी तरह नहीं जानता, “यदि वा इदम् अस्मि” मैं यह कारण ब्रह्म हूं, या उसका कार्य रूप द्वैत जगत् । यहां पर संशय ही विलाप है । सातवां और आठवां विशेष-
हिन्दी निरुक्त ( १८ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० ( निरु०- ) अथापि निन्दाप्रशंसे ॥ और भी मन्त्रोंमें कहीं निन्दा ही है,और कहीं प्रशंसा ही। निन्दा में उदाहरण- ( निरु०- ) "( मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताःसत्यं ब्रवीमि वधइत् स तस्य । नार्थमणं पुष्यति नो सखायम्- ) केवलाघो भवति केवलादी ॥" ( ऋ० सं० ८, ६, २३, १ ) भिक्षु नाम आङ्गिरस ( अङ्गिरस् का पुत्र ) इसका ऋषि। त्रिष्टुप् छन्द। दान न करने वाले की निन्दा। वृथा ही अन्न को प्राप्त होता है, वह उत्तम बुद्धि वाला नहीं है, मैं सच कहता हूं, उसका वह वध (मरना) ही है, जो आदित्य का, ( तथा ) सखा ( मनुष्य ) का पोषण नहीं करता है, केवल पाप का भागी होता है,-जो अकेला ही खाता है ॥ गीता में भी कहा है- “भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्” अर्थात्- वे पाप को ही भोगते हैं, जो अपने लिये पकाते हैं। प्रशंसा में उदाहरण-- ( निरु०- ) “भोजस्येदं पुष्करिणीव वेश्म” ( ऋ० सं० ८, ६, ४, ५ ) दक्षिणा नाम प्रजापति की पुत्री ने अपनी स्तुति से
हिन्दी निरुक्त ( १६ ) ७ अ० १ पा० ४ खं० संयुक्त इस सूक्त को देखा था, वही इसकी ऋषिका है। उस सूक्त में यह त्रिष्टुप् छन्द है। दाता की प्रशंसा है। भोज या दानशील राजा का यह घर पुष्करिणी (कम- लों से सजी हुई तलाई या विमान) के समान (सुन्दर) है। ऐसे ही और २ मन्त्रों में भी निन्दा और प्रशंसा:- (निरु०) एवम् अक्षसूक्ते द्यूतनिन्दा च कृषि- प्रशंसा च ॥ इसी प्रकार अक्षसूक्त में द्यूत (जूवा) की निन्दा और कृषि की प्रशंसा है। जैसे- "अक्षैर्मादीव्यः" पाशों से मत खेल। "कृषिमित्कृषस्व" कृषिका ही कर्षणा कर (खेती ही कर) (ऋ० सं० ७, ८, ५, ३) ॥ ऋषि किसी कारण से मन्त्रों के देखने वाले ही होते हैं किन्तु कर्त्ता नहीं होते- (निरु०- एवम्--उच्चावचैः अभिप्रायैः ऋषीणां मन्त्रदृष्टयो भवन्ति ॥ इस (पूर्वोक्त) प्रकार से ऊँचे नीचे अभिप्रायों से ऋषियों को मन्त्रों के दर्शन होते हैं ॥ (खं० ४) जिन मन्त्रों में "यत्काम ऋषिः०" (७,१,१) इत्यादि पूर्वोक्त मन्त्रदेवतात्मा लक्षण नहीं घटता, उनमें देवता निर्णय करने की प्रतिज्ञा-
हिन्दी निरुक्त ( २० ) ७ अ० १ पा० ४ खं० ( निरु०- ) तद् ये अनादिष्टदेवता मन्त्राः तेषु देवतोपपरीक्षा ॥ सो, जो मन्त्र अनादिष्ट देवत हैं-जिनमें देवता का आदेश ( कथन या लिङ्ग ) नहीं उनमें देवता की उपपरीक्षा (प्रान पूर्वक विचार ) होगी, अथवा उपपत्ति (युक्ति) पूर्वक परीक्षा होगी-यहां से आगे परीक्षा की जावेगी । यज्ञ में और यज्ञाङ्ग (यज्ञके भाग) में जो अनादिष्ट देवता मन्त्र हैं, उनमें देवता का निर्णय- (निरु०-) यद्देवतः स यज्ञो वा यज्ञाङ्गं वा तद्देवता भवन्ति ॥ अथवा जिस देवता का वह यज्ञ हो, अथवा जिस देवता का वह यज्ञाङ्ग हो, उस देवता के वे मन्त्र होते हैं । अर्थात्- मन्त्र में जब कोई देवता विशेष का बोधक लिङ्ग न हो, तो, उसके विनियोग को देखना,-वह किस देवता के यज्ञ में या यज्ञाङ्ग में विनियुक्त है, जिस देवता का वह यज्ञ हो या यज्ञाङ्ग, उसी देवता का वह मन्त्र भी जानना । प्रयोजन यह कि मन्त्रों का कर्म से नित्य संबन्ध है, कोई मन्त्र भी कर्म सम्बन्ध से रहित नहीं है, और जिस प्रकार मन्त्र देवता के बिना नहीं होता, उसी प्रकार कर्म भी देवता के बिना नहीं होता । क्योंकि-मन्त्र जिस प्रकार देवता की स्तुति के लिये होता है, उसी प्रकार कर्म भी देवतो के ही आराधन के लिये होता है, सुतराम् मन्त्र और कर्म दोनों एक देवता में समा- नाधिकरण होते हैं, इसीसे जब मन्त्र में देवता का पता न चले, तो उसके सम्बन्धी कर्म में देखना चाहिये, कर्म में देवता का अधिकार अवश्य बताया हुआ होता है। जैसे-जिसका
हिन्दी निरुक्त ( २१ ) ७ अ० १ पा० ४ खं० बांयां हाथ उसीका दांहिना, जिसका कर्म उसी का मन्त्र । जो अनादिष्ट दैवत मन्त्रयज्ञ के सम्बन्धसे रहित हैं, उनमें देवता का निर्णय-- (निरु०-) अथान्यत्र यज्ञात् प्राजापत्या इति याज्ञिकाः ॥ यज्ञसे अन्यत्र वैसे मन्त्र प्रजापति देवता के होते हैं, यह याज्ञिक लोग मानते हैं । उन्हीं के लिये नैरुक्त आचार्यों का मत-- (निरु०-) नाराशंसा इति नैरुक्ताः ॥ वैसे मन्त्रों का 'नराशंस' देवता होता है, यह नैरुक्त मानते हैं । [ कात्थक्य आचार्य के मत में 'नराशंस' नाम यज्ञ का है, और शाकपूणि आचार्य के मतमें अग्नि का । ] उसी में दूसरो मत- (निरु०-) अपि वासा कामदेवता स्यात् ॥ अथवा वह इच्छित देवता हो-- अनादिष्ट दैवत मन्त्रोंमें पुरुष का जो कोई भी इष्ट देवता हो, वही देवता मानना । क्योंकि-विशेष्य (मुख्य) पद से रहित, केवल विशेषण पदों वाले मन्त्रों का सर्वत्र अधिकार है। जैसे 'नील' 'पीत' आदि शब्द घट पट आदि द्रव्यों के सामान्य से विशेषण हो जाते हैं, ऐसे ही बिना देवताके मन्त्र प्रत्येक देवतामें चले जाते हैं । और मत- (निरु०- ) प्रायोदेवता वा ॥ (क) 'प्रायः' यह शब्द अधिकार का बोधक है। जिस
देवता के अधिकार में अध्ययन पाठ (संहिता पाठ) में देवता के लिङ्ग से रहित मन्त्र पढा गया हो, उसी देवता का वह मन्त्र होता है। (ख) अथवा 'प्रायः' यह बाहुल्य का नाम है। इस से अनादिष्ट दैवत मन्त्र बहुत देवताओं का होता है- जितने देवता हैं, सभी उसके देवता हैं और वे 'विश्व देवता' इस नामसे कहे जाते हैं। लोकाचार का दृष्टान्त- (निरु०- ) अस्ति हि आचारो बहुलं लोके देवदैवत्यम्, अतिथिदैवत्यम्, पितृदैवत्यम् ॥ क्योंकि-लोकमें बहुत आचार (रीति) है,- देवदैवत्य, अतिथिदैवत्य, पितृदैवत्य- विशेष विशेष नामों से बढे हुये द्रव्य से जो बच जाता है, वह साधारण (सब का यों साझैँ का) हो जाता है। जैसे कोई यजमान कहता है- 'यह मेरा द्रव्य देवदेवताओं के लिये है' 'यह मेरा अतिथिदेवताओं के लिये है, 'यह मेरा पितृदेवताओं के लिये है' ऐसा विभाग करदेने पर जो द्रव्य उस दानार्थ नियत की हुई राशि से बच जाता है, वह देव पितर और मनुष्य सब के साझ का हो जाता है, वैसे ही जिन मन्त्रों के देवताओं का निर्देश (लिङ्ग आदि से सूचना) किया हुआ है, उनसे अलग रहे हुये जो मन्त्र हैं, वे सब देवताओं के होते हैं। इस विचार में यास्क आचार्य का क्या निश्चय है ? (निरु० ) याज्ञदैवतो मन्त्रः-इति ॥ जो अप्रकट देवतालिङ्ग वाला मन्त्र है, वह यज्ञ देवता का है, अथवा दैवत = अग्नि देवता का है।
हिन्दी निरुक्त ( २३ ) ७ अ० १ पा० ५ खं० यज्ञ क्या ? विष्णु । 'विष्णु' क्या ? आदित्य (निरुक्तमतमें) 'देवता' अग्नि कैसे ? “ अग्निर्वै सर्वा देवताः ” अग्नि ही सब देवता हैं। यह श्रुति है। प्रथम पक्ष में-'यज्ञश्चासौ देवता यज्ञदेवता, तस्या- ऽयं याज्ञदैवतः' ऐसी व्युत्पत्ति होती है। इस व्युत्पत्ति में 'देवदत्त ब्राह्मण' इस वाक्यके समान पहिला यज्ञ पद विशेष (विष्णु) को बोधक है और दूसरा देवता पद देवता सामान्य का। और दूसरे पक्षमे-'यज्ञे भवं याज्ञम्' याज्ञं दैवतं यस्य स याज्ञदैवतो मन्त्रः ऐसी व्युत्पत्ति होती है। इस व्युत्पत्ति में यज्ञ शब्द कर्म का बोधक है, और देवता शब्द श्रुति बल से अग्नि देवता का बोधक हो जाता है। यही बात यहां ध्यान में देने योग्य है। कहीं मन्त्रों में अदेवता वस्तुएं भी देवता के समान स्तुति की जाती है, वहां देवता बुद्धि कैसे होगी ? यह प्रश्न- (निरु०-) अपि हि अदेवता देवतावत् स्तूयन्ते, यथा अश्वप्रभृतीनि ओषधिपर्यन्तानि । अदेवता = जो देवता नहीं, वे भी देवताओं के समान स्तुति किये जाते हैं, जैसे घोड़े आदि ओषधियों तक ॥४॥ ( खं० ५ ) अश्व आदि के समान और भी अदेवता वस्तुएं देवता के समान स्तुति की जाती हैं- (निरु०-) अथापि अष्टौ द्वन्द्वानि । और भी आठ ( ८ ) द्वन्द्व (जोड़े) हैं-अश्व आदि चेतन तो हैं और ये आठ द्वन्द्व तो सब के सब जड हैं, इनकी स्तुति किसी प्रकार संगत नही हो सकती ।
हिन्दी निरुक्त ( २४ ) ७ अ० १ पा० ५ खं० [ आठ द्वन्द्व-(१) उलूखलमुसले ( २ ) हविर्धाने ( ३ ) द्यावापृथिवी (४) विपाट् छुतुद्री (५) आर्ती ( ६ ) शुनाशिरौ (७) देवी जोष्ट्री (८) देवी ऊर्जाहुती । ] पूर्वोक्त दो वाक्यों में ऐसी वस्तुओं के समूह दिखाये हैं, जिन में कुछ प्राणी या चेतन हैं, और कुछ अप्राणी या अचे- तन हैं। १ से अश्व आदि चेतन प्राणी, और अक्ष (पासे) आदि अचेतन (जड़ = अप्राणी) । उनमें जो जड़ हैं, वे सर्वथा स्तुति के अयोग्य हैं ही, किन्तु जो अश्व आदि चेतन हैं, वे भी वर्त्तमान समीप वस्तु को ही कुछ समझ सकते हैं, परन्तु भूत (बीती हुई) भविष्यत् ( आगे आने वाली ) बातको बिलकुल नहीं समझते और न उन्हें हित अहित का ही बोध है, इस से उनकी स्तुति की भी जावे, तो वे स्तुति के अभिप्राय को नहीं समझ सकते तथा उन में कोई वर देने का सामर्थ्य नहीं है, अतः वे स्तुति के योग्य नहीं हैं, ऐसी शिष्य की संभावना को दिखाते हैं— ( निरु०- ) सन मन्येत आगन्तून्-इव अर्थान् देवतानाम् । वह (शिष्य) न मानेगा, आगन्तु = अनित्य मनुष्यों के अश्व आदिकों के समान देवताओं के अर्थों को = घोड़े आदि साधनों को, कि-इन में पूर्वोक्त देवता का लक्षण अविरुद्ध है, या घटेगा । अर्थात्-शिष्य यह नहीं मान सकता, कि ये देवताओं के अश्व आदि देवता के रूप में स्तुति किये जाने योग्य हैं, या इनमें देवताओं का लक्षण घटता है। क्योंकि ?-
हिन्दी निरुक्त ( २५ ) ७ अ० १ पा० ५ खं० (निरु०-) प्रत्यक्षदृश्यम् एतद् भवति । यह प्रत्यक्ष से देखने योग्य है-प्रत्यक्ष ही देखा जाता है- जैसे कि- मनुष्यों के घोड़े आदि साधन अनित्य (असमर्थ) हैं वैसे ही देवताओं के भी होंगे । “यत्काम ऋषिः” इस देवता के लक्षण की अश्व आदि प्राणियों में तथा अक्ष आदि द्रव्यमात्रों में जो अव्याप्ति ( अगति ) दिखाई है, उसका परिहार- (निरु०-) माहाभाग्याद् देवताया एक आत्मा बहुधा स्तूयते । देवता के माहाभाग्य- अलौकिक सामर्थ्य से एक आत्मा बहुत प्रकार से स्तुति किया जाता है- देवता में बड़ा ऐश्वर्य रहता है, वह अपने ऐश्वर्य ( चमत्कारशक्ति ) से अपने संकल्प के अनुसार जड रूप से तथा चेतन रूप से अनेक प्रकार से हो जाता है, कोई ऐसी बात नहीं है, जिसे देवता न कर सके, सुतराम् देवता अश्वरूप हो या अक्षरूप हो, जड रूप हों, या चेतन रूप हो, सब रूपों में उसकी शक्ति वैसी ही बनी रहती है, उसके सब वे इच्छामय रूप है, वास्तव में वह पशु या जड़ नहीं है, इस से सब अवस्थाओं में वह स्तोता की स्तुति को सुन सकता है, समझता है और उसके वाञ्छित को पूरा कर सकता है, किसी प्रकार भी देवतालक्षण की उस में असंमति नहीं है । पूर्व वाक्य में देवता लक्षण में व्याप्ति दोष का परिहार किया है, किन्तु वेदान्तों के मत में एक आत्मा (देवता) और नैरुक्तों के मत में तीन आत्मा या अग्नि, इन्द्र और सूर्य तीन
देवता हैं। इन दोनों मतों में आत्म संख्या के विरोध का परिहार- (निरु०-) एकस्य आत्मनः अन्ये देवाः प्रत्य- ङ्गानि भवन्ति । एक आत्मा के और देव (आत्मा) प्रत्यङ्ग (भाग) होते हैं। अर्थात्-जो जिसका अङ्ग होता है, वह उससे भिन्न नहीं होता है। क्यों कि- अङ्ग अङ्गी को छोड़ नहीं सकते और न उससे वे अलग देखे ही जाते हैं, ऐसे ही अङ्गों से प्रत्यङ्ग (उनके भाग) अलग नहीं होते इससे- नैरुक्त मत में अग्नि के जातवेदस् आदि, इन्द्र के वायु आदि और सूर्य के भग आदि अङ्ग तथा शकुनि और अश्व आदि प्रत्यङ्ग हैं। इनमें अङ्गी से अङ्गों और अङ्गों से प्रत्यङ्गों का अभेद है। अतः उस मत में तीन से अधिक संख्या नहीं बढ़ती। और- वेदान्ती (आत्मवित्) के मत में वही एक महान् आत्मा अग्नि इन्द्र और सूर्य आदि अङ्गों और अश्व शकुनि आदि प्रत्यङ्गों के रूपों को धारण या अनुभव करता है, तथा वैसी अवस्था में वह अनेक रूप से स्तुति किया जाता है, इस रीति पर दोनों मतों की आत्म संख्याओं में किसी प्रकार का वि- रोध नहीं है। आत्मवित् के मत में एक आत्मा, नैरुक्तों के मत में तीन और याज्ञिकों के मत में असंख्य हैं। इन में याज्ञक लोगों के मत में एक आत्मा का अनेक होना संभव नहीं और न आवश्यक ही है, इससे उन के मत में पूर्व समाधान नहीं
हिन्दी निरुक्त ( २७ ) ७ अ० १ पा० ५ खं० बल्कि-अन्य दो मतों में ही है। अब उन्हीं दो मतों में उसी बातको फिर दूसरे प्रकार से कहते हैं- (निरु०-) अपि च सत्वानां प्रकृतिभूमभिर्ऋषयः स्तुवन्ति-इत्याहुः ॥ और भी, सत्त्वों (नाना द्रव्यों) की जो प्रकृति है, उस के बहुत्वों से ऋषि स्तुति करते हैं ऐसा आचार्य कहते हैं। अर्थात्-आत्मवित् के मत से सब पदार्थों के मूल कारण पर- ब्रह्म महान् आत्मा के बहुत्व को लेकर ऋषि स्तुति करते हैं, जिस किसी वस्तु की भी स्तुति करते हैं, उसे ब्रह्म समझ कर या उसका कार्य समझ कर या उससे अभिन्न समझ कर करते हैं, उन्हें नाना नामों तथा नाना रूपों में वही एक आत्मा प्रतीत होता है। एवम् नैरुक्तमत में तीन आत्मा या तीन प्रकृतिएं हैं, उन के ही अन्य सब पदार्थ विकार हैं, वे एक १ लोक में एक २ देवता में ही वहां के सब पदार्थों को अन्तर्गत समझते हैं, नाना नामों से उन्हीं तीन देवों की स्तुति होती है। इस मत में "प्रकृतीनां भूमभिः प्रकृतिभूमभिः" ऐसी व्युत्पत्ति करते हैं। (निरु०-) प्रकृतिसार्वनाम्याच्च । और प्रकृति या प्रकृतियों की सर्वनाम्यता से । आत्मवित् के मत में प्रकृति = महान् आत्मा के ही सब नाम हैं, क्योंकि उसी से सब जगद् उत्पन्न हुआ है। अतः सब नामों से उसी की स्तुतिएं हैं। नैरुक्तों के मत में अग्नि इन्द्र और आदित्य इन तीन ही प्रकृतियों के सब नाम हैं, क्योंकि-उन्हीं से सब जगत् उत्पन्न होता है। इस से सब
नामों से इन्हीं तीन देवों की स्तुति है । पहिले मत में “प्रकृतेः सार्वनाम्न्यं प्रकृतिसार्वनाम्न्यम्” प्रकृति का सार्वनाम्न्य = प्रकृतिसार्वनाम्न्य, और दूसरे मत में “प्रकृतीनां सार्वनाम्न्यम्, प्रकृतिसार्वनाम्न्यम्” प्रकृतियों का सार्वनाम्न्य = प्रकृतिसर्वनाम्न्य होता है । मनुष्यों से देवताओं की विलक्षणता— (निरु०-) इतरेतरजन्मानो भवन्ति, इतरेतर- प्रकृतयः । देवता इतरेतरजन्मा होते हैं,-परस्पर से उन का जन्म होता है और इतरेतरप्रकृति होते हैं-आपस में एक का एक कारण हो जाता है । जैसे-अग्नि का कारण सूर्य और सूर्य का कारण अग्नि । इससे देवता मनुष्यों से विपरीत धर्म वाले हैं, उनके अश्व आदि मनुष्यों के अश्व आदि के समान असमर्थ नहीं हैं । देवता ईश्वर होकर भी क्यों जन्म लेते हैं— (निरु०-) कर्मजन्मानः । देवता कर्मजन्मा हैं-कर्म के लिये उनका जन्म है-लोकों के कर्मफल की सिद्धि के लिये इनका जन्म है । क्योंकि-इनके विना लोक का कोई कर्म सफल नहीं हो सकता । किस वस्तु से देवता जन्मते हैं ? (निरु०-) आत्मजन्मानः । देवता आत्मजन्मा हैं-अपने से ही आप उत्पन्न होते हैं,-इन्हें दूसरे पदार्थ की अपने जन्म में अपेक्षा नहीं है ।
हिन्दी निरुक्त ( २६ ) ७ अ० २ पा० १ खं० जिस से कि-देवता ईश्वर हैं (समर्थ हैं) इसी से उनका जन्म उनके संकल्प के अनुसार होता है। यह कहते हैं- (निरु०) आत्मैव एषां रथो भवति आत्मा अश्वः आत्मा आयुधम् आत्मा इषवः आत्मा सर्वं देव- स्य देवस्य । आत्मा ही इनका रथ है, आत्मा घोड़ा, आत्मा आयुध, आत्मा बाण, आत्मा सब कुछ देवका है-देवका है ॥५॥ इति हिन्दीनिरुक्ते सप्तमाध्यायस्य प्रथमः पादः। द्वितीयः पादः । ( खं० १ ) ( निरु०- ) तिस्रएव देवता इति नैरुक्ताः । अग्निः पृथिवीस्थानः । वायुर्वा इन्द्रो वा अन्तरिक्षस्थानः । सूर्यो द्युस्थानः । तासां माहाभाग्याद् एकैकस्या अपि बहूनि नामधेयानि भवन्ति । अपि वा कर्मपृथक्त्वाद्, यथा होता, अध्वर्युः, ब्रह्मा, उद्गाता-इति, अपि-एकस्य सतः । अपिवा पृथगेव स्युः । पृथग् हि स्तुतयो भवन्ति। तथा अभिधानानि ।
हिन्दी निरुक्त ( ३० ) ७ अ० २ पा० १ खं०
यथो एतत्, कर्मपृथक्त्वाद्-इति । बहवोऽपि
विभज्य कर्माणि कुर्युः ।
तत्र संस्थानैकत्वं संभोगैकत्वं च उपेक्षितव्यम् ।
यथा पृथिव्यां मनुष्याः पशवो देवा इति स्थानैक-
त्वं च संभोगैकत्वं च दृश्यते । यथा पृथिव्याः
पर्जन्येन च वाय्वादित्याभ्यां च संभोगः, अग्निना
च इतरस्य लोकस्य ॥
तत्र एतत्-नरराष्ट्रमिव ॥ (१) (५) ॥
अर्थ:-तीन ही देवता हैं, यह नैरूक्त (आचार्य मानते हैं)
( क ) अग्नि पृथिवीस्थान या पृथिवी में रहने वाला
( पहला देवता ) है ।
( ख ) अग्नि वायु अथवा इन्द्र अन्तरिक्षस्थान या अन्त-
रिक्ष ( आकाश ) में रहने वाला ( दूसरा देवता ) है ।
( ग ) सूर्य द्युस्थान या द्युलोकनिवासी ( तीसरा
देवता ) है ।
“तासां०” उन (देवताओं) के माहाभाग्य (महत् ऐश्वर्य)
से एक २ के भी बहुत नाम हैं ।
“अथवा कर्म०” अथवा कर्म (क्रिया) के भेद से ( एक २
के बहुत नाम हैं ) । जैसे होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा, उद्गाता, ये
( नाम ) एक होते हुए के भी ( अनेक नाम हैं ) ।
( याज्ञिक मत )
“अपिवा पृथ०” अथवा पृथक् ही हों-मन्त्रों में जितने
हिन्दी निरुक्त ( ३१ ) ७ अ० २पा०१ खं० देवताओं के नाम आते हैं, उतने ही अलग २ देवता हो सकते हैं, न एक और न तीन। क्योंकि स्तुतियाँ अलग २ हैं। वैसे ही नाम ( भी अलग २ हैं ) । “यथो एतत्०” जो कि यह (कहा है-) 'कर्म के भेद से ( नामों का भेद है, किन्तु वस्तु (देवता के भेद से नहीं ? ) यह । (वह ठीक नहीं, क्योंकि-) बहुत (मनुष्य) भी विभाग करके (अलग २ होकर या बांटकर ) कर्मों को (अलग २ क्रियाओं को) कर सकते हैं । “तत्र०” उस (भेद पक्ष देवतानानात्वपक्ष ) में संस्थान की एकता और संभोग की एकता देखना चाहिये-दूसरे (या- ज्ञिक या आत्मवित् ) जो एकता मानते हैं, वह गौण बुद्धि से है, किन्तु वास्तवमें नहीं, और वह (गौण एकता) स्थान की एकता से तथा भोग की एकता से लेना चाहिए। जैसे-पृथिवी ( स्थान ) में मनुष्य, पशु, और देवता हैं, इनका एक स्थान और एक संभोग है-खान पान निद्रा मैथुन आदि सब समान है, ऐसा देखा जाता है, (इस से 'पृथिवी' के कहने से ये सब समझ लिये जाते हैं, - पृथिवी ऐसा करती है, पृथिवी ऐसा मानती है)। जैसे पृथिवी को पर्जन्य (मध्यम देव इन्द्र) से और वायु आदित्य दोनों से संभोग है, और दूसरे (अन्तरिक्ष या द्यु ) लोक को अग्नि से (संभोग है)। ( दोनों पक्षों को समान दृष्टान्त ) “तत्र एतत् नरराष्ट्रमिव” उन (एक के अनेक नाम मानने वालों और अनेकों के अनेक नाम मानने वालों ) में “नर-राष्ट्र के समान” यह है अर्थात्-एक ही नर
हिन्दी निरुक्त ( ३२ ) ७ अ० २ पा० १ खं० समूह के स्थल में दो बुद्धिएं हैं,-एक ‘नराः’ ‘बहुत नर’ और दूसरी “ राष्ट्रम् ” ‘नर समूह’ । यहां जो नरसमूह को वास्तविक ( यथार्थ ) समझते हैं, उनको एकत्व मुख्य और अनेकत्व गौण हैं और जो बहुत नरों को ही ठीक समझते हैं, उनके मतमें अनेकत्व यथार्थ और एकत्व अयथार्थ या गौण या कल्पनामात्र है । प्रयोजन यह निकला कि आत्मा या देवतातत्त्व के एकत्व अनेकत्व का विचार इसी दृष्टान्त के सदृश है, जहां अनेकत्व है, वहां एकत्व बन जाता है, और जहां एकत्व तहां अनेकत्व । युक्ति से उभयथा संभव है, इस से ऐसे स्थलों में ऐसे विकल्पों से सन्देह सरन न होना चाहिए ॥ १ ( ५ ) ॥ व्याख्या । इस खण्ड में नैरुक्तों और याजकों के मतसे देवताओं की संख्या का निर्णय किया है। नैरुक्तों के मतमें केवल तीन देवता हैं- अग्नि, इन्द्र और आदित्य । ये तीनों देवता क्रमसे पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युस्थान में रहते हैं या इनका तहां २ आधिपत्य है । इसी प्रकार याजकों के मत में उतने ही देवता हैं, जितने देवताओं के नाम मन्त्रों में मिलते हैं, उन की कोई संख्या नियत नहीं। यही नानात्व पक्ष कहलाता है। “निघण्टु” शास्त्र के पञ्चमाध्याय (दैवतकाण्ड) में १५१ देवताओं के नाम हैं, उन में अग्नि आदि ५२ नाम पृथिवी स्थान देवताओं के वायु आदि अड़सठ ( ६८) नाम मध्यम देवताओं के और अश्विनी आदि ३१ नाम उत्तम- स्थान देवताओं के हैं । इस मूलग्रन्थ पर - ध्यान देनेसे
हिन्दी निरुक्त ( ३३ ) ७ अ० २ पा० १ खं० नैरुक्तों के मत पर सन्देह होता है कि-ये एक २ स्थान में एक २ ही देवता को स्वीकार करके कुल तीन देवता मानते हैं, किन्तु निघण्टु शास्त्रमें उक्तरीति से बहुत्तर नाम पढे हुये हैं इससे नैरुक्तों का मत निघण्टु के विरुद्ध पड़ता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि-ये सब नाम यथास्थान एक २ देवता के ही हैं, एक देवता ही नाना कर्म के लिये नाना रूप धारण करता है और उन्हीं नाना रूपोंके ये नाना नाम हैं अथवा एक ही रूप से वह देवता अनेक कर्म करता है, तथा उन कर्मों के कारण उस एक ही स्वरूप के अनेक नाम हो जाते हैं अतः नामों के आधिक्य से नैरुक्तों के मत में देवता संख्या में कोई दोष नहीं आता । याज्ञक लोग कहते हैं कि-जिस स्थानमें जितने देवताओं के नाम कहे हैं वे सब अलग २ देवताओं के ही हैं। क्योंकि- पृथक् २ नामों से पृथक् २ स्तुतिऐं आती हैं, अनेक नामों से एकसी स्तुति नहीं और जिस नाम से जिस देवता का यज्ञ आरम्भ होता है, उसी नाम से उस देवता का वह पूर्ण होता है। यदि वैश्वानर नाम से हविः का ग्रहण हुआ, तो वह वैश्वानर नाम से ही दिया जाता है, या होम किया जाता है, किन्तु उसी स्थान के दूसरे अग्नि आदि नाम से नहीं। यदि अभेद होता तो कभी भिन्न नाम से लिया हुआ हविः भिन्न नाम से होम भी किया जाता है। सर्वथा सब नाम भिन्न २ देवताओं के हैं और देवता नाना हैं, न तीन हैं और न एक । नैरुक्तों के मत में जिस प्रकार कर्म के भेदसे एकके अनेक नाम हो सकते हैं, उसी प्रकार बहुतों के भी भिन्न २ कर्म