न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
२२. सू० ] निरवयवप्रकरणम् ३२७
२२. सू० ] निरवयवप्रकरणम् ३२७ आकाशासर्वंगतत्वं वा ? ॥ १९ ॥ अथैतन्नेष्यते—परमाणोरन्तर्नास्त्याकाशमिति असर्वंगतत्वं प्रसज्यते इति ? अन्तर्बहिश्च कार्यद्रव्यस्य कारणान्तरवचनादकार्ये तदभावः ॥ २० ॥ अन्तरिति पिहितं कारणान्तरैः कारणमुच्यते । बहिरिति च व्यवधायक- मव्यवहितं कारणमेवोच्यते । तदेतत् कार्यद्रव्यस्य सम्भवति; नाणोरकार्यत्वात् । अकार्ये हि परमाणौवन्तर्बहिरित्यस्याभावः । यत्र चास्य भावोऽणुकार्यं तन्न परमाणुः, यतो हि नाल्पतरमस्ति स परमाणुरिति ॥ २० ॥ शब्दसंयोगविभवाच्च सर्वंगतम् ॥ २१ ॥ यत्र क्वचिदुत्पन्नाः शब्दा विभवन्त्याकाशे तदाश्रया भवन्ति, मनोभिः पर- माणुभिस्तत्कार्यैश्च संयोगा विभवन्त्याकाशे, नासंयुक्तमाकाशेन किञ्चिन्मूर्त्तं- द्रव्यमुपलभ्यते, तस्मान्नासर्वंगतमिति ॥ २१ ॥ अव्यूहाविष्टम्भविभुत्वानि चाकाशधर्माः ॥ २२ ॥ या फिर 'आकाश सर्वंगत है' यह अपना सिद्धान्त छोड़ना पड़ेगा ? ॥ १९ ॥ यदि परमाणु में आकाश नहीं मानते हो तो आप ( नैयायिक ) का 'आकाश सर्वंगत हैं' यह सिद्धान्त खण्डित हो जायेगा ? ॥ १९ ॥ अवयवाभिधायक 'अन्तर्' तथा 'बहिर्' शब्द कार्यद्रव्य ( अवयवी ) के कारण- विशेष को ही बतलाते हैं, अतः अकार्यं होने से ( अनवयवी ) परमाणु के वे दोनों सम्भव नहीं हो सकते ॥ २० ॥ 'अन्तर्' अर्थात् पिहित प्रदेश जो घट के अन्दर उसके बाह्य अवयवों से ढका हुआ हो, इसी तरह 'बहिर्' वह कहलाता है जो घट के अन्दर के अवयवों को ढका रखे । 'अन्तर्' यह कारणान्तर से कारण का बोधन कर रहा है तथा बहिर्' यह स्वयं कारण है । ये दोनों शब्द कार्यद्रव्य के बोध में सम्भव हो सकते हैं, परन्तु परमाणु के नहीं, क्योंकि वह अकार्यं है । अकार्य ( निरवयव ) परमाणु में 'अन्तर्' 'बहिर्' क्या बनेंगे ! जिसके ये होते हैं वह अणु-कार्य है, उसे परमाणु नहीं कहते । जैसा कि हम अभी पीछे कह आये हैं कि परमाणु उसे कहते हैं जिसका कोई अन्य लघुतर विभाग न किया जा सके ॥ २० ॥ हमारा आकाश का सर्वंगतत्व शब्दसंयोग के सार्वत्रिक होने से उपपन्न हो जाता है ॥ २१ ॥ जहाँ कहीं उत्पन्न शब्द वर्तमान होते हैं वहाँ वे आकाश में रहते ही हैं क्योंकि वे आकाशाश्रित हैं । तथा मन, परमाणु और कार्य-द्रव्यों के संयोग आकाश में आश्रय पाते हैं । ऐसा कोई मूर्त द्रव्य नहीं जो आकाश से असंयुक्त हो । अतः यह मानना ही पड़ेगा कि आकाश असर्वगत नहीं है ॥ २१ ॥ अव्यूह ( मिश्रित द्रव्य का अपरावर्तन ), अविष्टम्भ ( अन्य देश में गत्यभाव ) तथा विभुत्व—ये आकाश के धर्म हैं ॥ २२ ॥
३२८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० संसर्पता प्रतिघातिना द्रव्येण न व्यूह्यते यथा काष्ठेनोदकम् । कस्मात् ? निरवयवत्वात् । सर्पच्च प्रतिघाति न विष्टभ्नाति—नास्य क्रियाहेतुं गुणं प्रति- बध्नाति, कस्मात् ? अस्पर्शत्वात्, विपर्यये हि विष्टम्भो दृष्ट इति स भवान् सावयवे स्पर्शवति द्रव्ये दृष्टं धर्मं विपरीते नाशङ्कितुमर्हति । अण्ववयवस्याणुतरत्वप्रसङ्गादणुकार्यप्रतिषेधः । सावयवत्वे चाणोरण्ववयवोऽणुतर इति प्रसज्यते । कस्मात् ? कार्यकारण- द्रव्ययोः परिमाणभेददर्शनात् । तस्मादण्ववयवस्याणुतरत्वम्, यस्तु सावयवोऽणु- कार्यं तदिति । तस्मादणुकार्यमिदं प्रतिषिध्यते इति । कारणविभागाच्च कार्यस्यानित्यत्वम्; नाकाशव्यतिभेदात् । लोष्टस्यावयव- विभागादनित्यत्वम्; नाकाशसमावेशादिति ॥ २२ ॥ मूर्तिमतां च संस्थानोपपत्तेरवयवसद्भावः ? ॥ २३ ॥ परिच्छिन्नानां हि स्पर्शवतां संस्थानम्—त्रिकोणं चतुरस्रं समं परिमण्डल- मित्यपपद्यते, यत्तत् संस्थानं सोऽवयवसंन्निवेशः । परिमण्डलाश्चाणवः, तस्मात् सावयवा इति ? ॥ २३ ॥ आकाश, निरवयव होने से, क्रियावान् द्रव्य द्वारा मिश्रित होकर वह रूपान्तर में परावृत्त नहीं किया जा सकता और क्रियावान् द्रव्य अभिमुख उपस्थित द्रव्य की तरह आकाश द्वारा प्रतिबद्ध नहीं होता, अर्थात् इस द्रव्य के क्रियाहेतुगुण को आकाश स्पर्शवान् न होने से प्रतिबद्ध नहीं कर पाता। क्योंकि निरवयव स्पर्शवान् से विष्टम्भ देखा गया है, इसलिये आप निरवयव तथा अस्पर्शवान् आकाश में भी उस विष्टम्भ की कल्पना करें—यह उचित नहीं ! अणु का भी अवयव मानने पर वह अवयव उससे भी छोटा होगा तथा उस अवयव का भी अन्य अवयव कल्पित किया जा सकता है—इस आनन्त्य-कल्पना से अनवस्था- दोष आने लगेगा—अतः हम अणु के कार्य ( अवयव ) नहीं मानते। तात्पर्य यह है कि अणु को सावयव मानने पर अणु का अवयव उससे भी लघ्वाकार होगा; क्योंकि कार्य- द्रव्य से कारणद्रव्य में परिमाणभेद हुआ ही करता है। अतः अण्ववयव में अणुतरत्व आयेगा, वह अण्ववयव ही अणुकार्य है। उपर्युक्त हेतु ( अनवस्था-दोष ) से हम इस अणु में कार्यत्व का प्रतिषेध करते हैं। यह जो आप लोक में कार्य की अनित्यता देखते हैं वह कारण के विभाग से होती है, न कि आकाश का समावेश होने से । लोष्ट का नाश उसके अवयवों के विनाश से होता है, न कि आकाश के समावेश से ॥ २२ ॥ मूर्तिमान् द्रव्यों में आकारोपपत्ति देखी जाने से अणु के अवयव की सत्ता सिद्ध है ? ॥२३॥ लोक में परिच्छिन्न ( मूर्तिमान् ) स्पर्शवान् द्रव्यों का त्रिकोण, चौकोर, गोल, चपटा—आदि परमाणु का आकार देखा जाता है। वह आकार अवयवों का मिश्रण है। अणु में ऐसा चौकोर आदि भेद उसकी सावयवता से देखा जाता है। अतः वे भी सावयव हैं ? ॥ २३ ॥
२४. सू० ] निरवयवप्रकरणम् ३२९
२४. सू० ] निरवयवप्रकरणम् ३२९ संयोगोपपत्तेश्च ? ॥ २४ ॥ मध्ये सन्नणुः पूर्वापराभ्याम् अणुभ्यां संयुक्तस्तयोर्व्यवधानं कुरुते । व्यव- धानेनानुमीयते—पूर्वभागेन पूर्वेणाणुना संयुज्यते परभागेन परेणाणुना संयुज्यते, यौ तौ पूर्वापरौ भागौ तावस्यावयवौ । एवं सर्वतः संयुज्यमानस्य सर्वतो भागा अवयवा इति ? ॥ २४ ॥ यत्तावत् 'मूर्तिमतां संस्थानोपपत्तेरवयवसद्भावः' इति ? अत्रोक्तम् । किमु- क्तम् ? विभागेऽल्पतरप्रसङ्गस्य यतो नाल्पीयस्तत्र निवृत्तेरण्ववयवस्य चाणु- तरत्वप्रसङ्गादणुकार्यप्रतिषेध इति । यत् पुनरुच्यते—'संयोगोपपत्तेश्चेति स्पर्शवत्त्वाद्व्यवधानमाश्रयस्य चाव्याप्त्या भागभक्तिः' ? उक्तं चात्र स्पर्शवानणुः स्पर्शवत्तोरण्वोः प्रतिघाताद्व्यवधायकः; न सावयवत्वात् । स्पर्शवत्त्वाच्च व्यवधाने सत्यणुसंयोगो नाश्रयं व्याप्नोतीति भागभक्तिर्भवति संयोग के उपपादन से भी अणु के अवयव की सत्ता सिद्ध है ? ॥ २४ ॥ अणु बीच में रहता हुआ, पूर्व तथा पर वाले अणुओं से संयुक्त है, वह उन दोनों को पृथक् किये हुए हैं—यह पार्थक्य ही सिद्ध करता है कि मध्य अणु अपने पूर्व भाग द्वारा पूर्व अणु से संयुक्त है, तथा अपर भाग द्वारा अपर अणु से संयुक्त है ! यहाँ ये अपर भाग वाले अणु से संयुक्त भाग उस मध्यस्थ अणु के अवयव हैं। यों सब ओर से संयुक्त उसके सभी ओर अवयव हैं ? ॥ २४ ॥ यह जो आपने कहा कि 'मूर्तिमान् द्रव्यों की आकारोपपत्ति से अवयव की सत्ता अनुमति होती हैं' ? (४.२४.२३) इसका उत्तर दिया जा चुका है । क्या दिया गया ? यह 'अवयव-क्रम वहाँ ( अणु में ) जाकर रुक जाता है जहां उससे लघु कोई अवयव न बन सके; क्योंकि अणु का अवयव मानने से अनवस्था होने लगेगी, अतः हम अणु का अवयव नहीं मानते ।' यह आपने कहा कि 'संयोगोपपत्ति से अवयव की सत्ता सिद्ध होतो है, परमाणुत्रय के संयोग से आरब्ध अवयवसमूह में मध्यस्थ परमाणु द्वारा पूर्व-पर का व्यवधान होता है, संयोग स्वाश्रय को व्याप्त नहीं करता, अतः संयोगवान् होने से उस अणु के भी अव- यव हैं—यही सिद्ध होता हैं' ? इसका उत्तर यह है—आप अणु को स्पर्शवान् मानते हैं, मध्यस्थ अणु द्वारा स्पर्शवान् दो अणुओं में जो व्यवधान सिद्ध हो रहा है, वह उनके स्पर्शत्व होने से सिद्ध हो रहा है, न कि उसके सावयव होने से । अभी हमने कहा था कि संयोग स्वाश्रय को व्याप्त नहीं करता; परन्तु इसमें दो स्पर्शवान् अणुओं द्वारा व्यवधान से विभाग ज्ञात हो रहा है, अतः यह अणु सावयव है ? १. अत्र वार्त्तिककृता वचनविरोधोऽप्युपात्तः, स तु तत्रैव ध्येयः ।
३३० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० भागवानवायमिति ? उक्तं चात्र विभागेऽल्पतरप्रसङ्गस्य यतो नाल्पीयस्तत्राव- स्थानात् तदवयवस्य चाणुतरत्वप्रसङ्गादणुकार्यप्रतिषेध इति । मूर्तिमत्तां च संस्थानोपपत्तेः संयोगोपपत्तेश्च परमाणूनां सावयवत्वम् ? इति हेत्वोः— अनवस्थाकारित्वादनवस्थानुपपत्तेश्चाप्रतिषेधः ॥ २५ ॥ यावन्मूर्तिमद्यावच्च संयुज्यते तत् सर्वं सावयवम्—इत्यनवस्थाकारिणाविमौ हेतू, सा चानवस्था नोपपद्यते । सत्यामनवस्थायां सत्यौ हेतू स्याताम्, तस्माद- प्रतिषेधोऽयं निरवयवत्वस्येति । विभागस्य च विभज्यमानहानिर्नोपपद्यते, तस्मात् प्रलयान्तता नोपपद्यते इति । अनवस्थायां च प्रत्यधिकरणं द्रव्यावयवानामा- नन्त्यात् परिमाणभेदानां गुरुत्वस्य चाग्रहणं समानपरिमाणत्वं चावयवावय- विनोः परमाण्ववयवविभागादूर्ध्वमिति ॥ २५ ॥ बाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् [ २६-३७ ] यदिदं भवान् बुद्धीराश्रित्य बुद्धिविषयाः सन्तीति मन्यते, मिथ्याबुद्धय एताः । इसका उत्तर भी हम दे चुके हैं कि अवयवक्रम वहां जा कर रुक जाता है जहाँ उससे आगे कोई लघुतर अवयव विभक्त न हो सके; क्योंकि अणु का अवयव मानने से पूर्वोक्त अनवस्था होने लगेगी (।२.४.२४) । अतः हम अणु का अवयव नहीं मानते । मूर्तिमान् द्रव्यों की आकारोपपत्ति तथा संयोगोपपत्ति से परमाणुओं की सावयवत्व सिद्धि होगी ? अनवस्थाकारो होने से तथा अनवस्थानुपपादन से सिद्धि नहीं होतो ॥ २५ ॥ जो भी मूर्तिमान् तथा संयुक्त है वह सब सावयव है—ये दोनों हेतु पूर्वोक्त अन- वस्था उपपन्न करने वाले हैं । वह अनवस्था लोक में नहीं देखी जाती । हाँ, यदि वह अनवस्था लोक में देखी गयी होती तो वे दोनों हेतु परमाणु को सावयव सिद्ध कर सकते थे ! 'जिसको आप अन्तिम अवयव मानते हैं वह भी तो एक तरह से विभाग ही है ?' यह कथन भी उचित नहीं; क्योंकि जिसके विभाग होने मात्र से विभज्यमान का कोई नाश न होता हो वह विभाग होता रहे ! इसीलिये हमारे मत में आपके मत को व्याप्त करने वाला प्रलयदोष भी न आ पायेगा । यदि उक्त अनवस्था को स्वीकार किया जाय तो प्रतिद्रव्य में द्रव्यावयवों के आनन्त्य से परिमाणभेद तथा गुरुत्व का भी ग्रहण न होगा । यों परमाणु का भी अवयव मानने पर, मेरु तथा सर्षप ( अवयव्यवयव ) का समान परिमाण होने लगेगा—यह भयंकर अनवस्था आप का मत मानने पर होने लगेगी ! ॥ २५ ॥ प्रमेयत्व याथात्म्यव्याप्य है या नहीं ?—यह संशय होने पर विज्ञानवादी बौद्ध कहते हैं कि आप बुद्धियों का सहारा लेकर सबको बुद्धि-विषय मानते है, आपका यह मत
२८. सू० ] वाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३१
२८. सू० ] वाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३१ यदि हि तत्त्वबुद्धयः स्युः, बुद्ध्या विवेचने क्रियमाणे याथात्म्यं बुद्धिविषयाणा- मुपलभ्येत— बुद्ध्या विवेचनात्तु भावानां याथात्म्यानुपलब्धिस्तन्तवपकर्षेण पटसद्भावानुपलब्धिवत् तदनुपलब्धिः ? ॥ २६ ॥ यथाऽयं तन्तुरयं तन्तुरिति प्रत्येकं तन्तुषु विविच्यमानेषु नार्थान्तरं किञ्चि- दुपलभ्यते यत्पटबुद्धेर्विषयः स्यात्, याथात्म्यानुपलब्धेरसति विषये पटबुद्धिर्भ- वन्ती मिथ्याबुद्धिर्भवति । एवं सर्वत्रेति ? ॥ २६ ॥ व्याहतत्वादहेतुः ॥ २७ ॥ यदि बुद्ध्या विवेचनं भावानाम् न सर्वभावानां याथात्म्यानुपलब्धिः । अथ सर्वभावानां याथात्म्यानुपलब्धिः, न बुद्ध्या विवेचनं भावानाम् । बुद्ध्या विवेचनं याथात्म्यानुपलब्धिश्चेति व्याहन्यते । तदुक्तम्—'अवयवावयविप्रसङ्गश्चैवमा- प्रलयात्' (४.२.१५) इति १ ॥ २७ ॥ तदाश्रयत्वादपृथग्ग्रहणम् ॥ २८ ॥ मिथ्या हैं; क्योंकि यदि ये यथार्थ-बुद्धि होते तो बुद्धि से विवेचन किये जाने पर इन बुद्धिविषयों का याथात्म्य गृहीत होता । बुद्धि द्वारा विवेचन करने से भावों का याथात्म्य ( स्वभाव ) उपलब्ध नहीं होता, तन्तुओं के अपकर्षण से पटसत्ता के अनुपलम्भ की तरह उसकी अनुपलब्धि हो ? ॥२६॥ जैसे पट के प्रत्येक तन्तु का यह तन्तु, यह तन्तु—यों विवेचन किये जाने पर तन्तुओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता जो पटबुद्धि का विषय बन सके । यों स्वभाव ( पटत्व ) की अनुपलब्धि से विषय ( पट ) के न होने पर भी वहाँ पटबुद्धि होती हुई मिथ्याबुद्धि ही कहलायेगी ! इसी तरह सर्वत्र समझें ? ॥ २६ ॥ वचनविरोध होने से यह बुद्धिविवेचन हेतु अयुक्त है ॥ २७ ॥ यदि बुद्धि से विवेचन किया जाये तो भावों की याथात्म्यानुपलब्धि क्यों नहीं होगी ! यदि सभी भावों की याथात्म्यानुपलब्धि न हो पायी तो वह बुद्धि से विवेचन नहीं हुआ । भावों का बुद्धि से विवेचन हो और उनकी याथात्म्यानुपलब्धि न हो पाये—यह तो परस्पर विरुद्ध बात है । वस्तुस्वभाव के विना उसका विवेचन नहीं हो सकता, तथा जिस विविच्यमान की स्वभावानुपलब्धि को हेतुरूप से उपस्थित कर रहे हो वह बुद्धि से विवेचन नहीं माना जाता । इसीलिये हम पीछे (४. २. १५ में) कह आये हैं कि 'प्रलय- पर्यन्त अवयवावयविप्रसङ्ग होता चलेगा' ॥ २७ ॥ उस ( पटकार्य ) के आश्रित होने से वह पृथक् गृहीत नहीं होता ॥ २८ ॥ १. अत्र वार्त्तिककारः 'प्रमाणं पर्य्यनुयोज्यः' इत्यादिना दूषणान्तरमप्याह ।
३३२ . वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० कार्यद्रव्यं कारणद्रव्याश्रितं तत्कारणेभ्यः पृथङ् नोपलभ्यते, विपर्यये पृथ- ग्ग्रहणात्, यत्राश्रयाश्रितभावो नास्ति तत्र पृथग्ग्रहणमिति । बुद्ध्या विवेचनात्तु भावानां पृथग्ग्रहणम्, अतीन्द्रियेष्वणुषु यदिन्द्रियेण गृह्यते तदेतया बुद्ध्या विविच्यमानमन्यदिति ॥ २८ ॥ प्रमाणतश्चार्थप्रतिपत्तेः ॥ २९ ॥ बुद्ध्या विवेचनाद्भावानां याथात्म्योपलब्धिः । यदस्ति यथा च यत्रास्ति यथा च तत्सर्वं प्रमाणत उपलब्ध्या सिध्यति, या च प्रमाणत उपलब्धिस्तद् बुद्ध्या विवेचनं भावानाम्, तेन सर्वशास्त्राणि सर्वकर्माणि सर्वे च शरीरिणां व्यवहारा व्याप्ताः । परीक्षमाणो हि बुद्ध्याऽध्यवस्यति—इदमस्ति, इदं नास्तीति । तत्र न सर्वभावानुपपत्तिः ॥ २९ ॥ प्रमाणानुपपत्त्युपपत्तिभ्याम् ॥ ३० ॥ एवं च सति सर्वं नास्तीति नोपपद्यते, कस्मात् ? प्रमाणानुपपत्त्युपपत्ति- भ्याम् । यदि सर्वं नास्तीति प्रमाणमुपपद्यते, सर्वं नास्तीत्येतद्व्याहन्यते ! अथ प्रमाणं नोपपद्यते, सर्वं नास्तीत्यस्य कथं सिद्धिः ! अथ प्रमाणमन्तरेण सिद्धिः, सर्वमस्तीत्यस्य कथं न सिद्धिः ! ॥ ३० ॥ कार्यद्रव्य कारणद्रव्याश्रित है, अतः वह उन कारणों से पृथक् गृहीत नहीं होता । जहाँ यह आश्रयाश्रित भाव न हो वहाँ पृथग् ग्रहण होता ही है ! बुद्धि द्वारा विवेचन- मात्र से स्थूल भावों का इन्द्रियों द्वारा पृथक् ज्ञान गृहीत होता है, जैसे अतीन्द्रिय पर- माणुओं का पृथक् ग्रहण बुद्धि द्वारा होता ही है, अतः बुद्धि से विवेचित हुआ अवयवी परमाणु से पृथक् है ॥ २८ ॥ अर्थप्रतिपत्ति के प्रमाणाधीन होने से ॥ २९ ॥ बुद्धिविवेचन से भावों की याथात्म्योपलब्धि होती है । जो घटादि द्रव्य है तथा स्वावयवसमवेतत्व जैसा है, या जो शशविषाणादि कार्यकारणभाव से जैसा नहीं है— यह सब प्रमाण द्वारा उपलब्धि से सिद्ध होता है । प्रमाण द्वारा उपलब्धि ही 'भावों का बुद्धि से विवेचन' है । इस बुद्धिविवेचन के अन्तर्गत ही सब शास्त्र, सब कर्म तथा प्राणियों के सब व्यवहार आ जाते हैं । विवेचन करता हुआ जिज्ञासु—'यह है, यह नहीं है' ऐसा अध्यवसाय ( यथार्थ निर्णय ) करता है, अतः 'सर्वभावानुपपत्ति' सिद्धान्त युक्त नहीं ॥ २९ ॥ प्रमाणों की उपपत्ति, अनुपपत्ति से भी ॥ ३० ॥ इतना व्याख्यान होने के बाद, 'सब कुछ नहीं है' यह सिद्धान्त उपपन्न नहीं होता; क्योंकि प्रमाणों की उपपत्ति तथा अनुपपत्ति उसका आधार है । जैसे—यदि 'सब कुछ नहीं है' इसमें कोई प्रमाण देते हैं तो उस प्रमाण के होने से तुम्हारी 'सब कुछ नहीं है' यह प्रतिज्ञा कैसे बनेगी ! यदि प्रमाण न देते हो तो 'सब कुछ नहीं है' इसे कैसे सिद्ध करोगे ! यदि प्रमाण के बिना ही सिद्धि मानें तो 'सब कुछ है' यह क्यों न सिद्ध मान लिया जाये ! ॥ ३० ॥
३३. सू० ] वाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३३
३३. सू० ] वाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३३ स्वप्नविषयाभिमानवदयं प्रमाणप्रमेयाभिमानः ? ॥ ३१ ॥ मायागन्धर्वनगरमृगतृष्णिकावद्वा ? ॥ ३२ ॥ यथा स्वप्ने न विषयाः सन्त्यथ चाभिमानो भवति, एवं न प्रमाणानि प्रमे- यानि च सन्त्यथ च प्रमाणप्रमेयाभिमानो भवति ? ॥ ३१-३२ ॥ हेत्वभावादसिद्धिः ॥ ३३ ॥ स्वप्नान्ते विषयाभिमानवत् प्रमाणप्रमेयाभिमानो न पुनर्जागरितान्ते विषयो- पलब्धिवदित्यत्र हेतुर्नास्तीति हेत्वभावादसिद्धिः । स्वप्नान्ते चासन्तो विषया उपलभ्यन्ते इत्यत्रापि हेत्वभावः । प्रतिबोधेऽनुपलम्भादिति चेत् ? प्रतिबोधविषयोपलम्भादप्रतिषेधः । यदि प्रतिबोधेऽनुपलम्भात् स्वप्ने विषया न सन्तीति ? र्तिह य इमे प्रतिबुद्धेन विषया उपलभ्यन्ते उपलम्भात् सन्तीति । विपर्यये हि हेतुसामर्थ्यम् । उपलम्भात्सद्भावे सत्यनुपलम्भादभावः सिद्ध्यति, उभयथा त्वभावे नानुपलम्भस्य सामर्थ्यमस्ति, यथा-प्रदीपस्याभावादरूपस्यादर्शन- मिति, तत्र भावेनाभावः समर्थ्यते इति । [ विज्ञानवादी फिर दूसरे रूप से बात उठाते हैं— ] यह प्रमाण-प्रमेय का अभिमान ( कल्पना ) स्वप्नविषय के अभिमान ( मिथ्या कल्पना ) की तरह है ? ॥ ३१ ॥ या कल्पित गन्धर्वनगर या मृगतृष्णा की तरह ( मिथ्या ) है ? ॥ ३२ ॥ जैसे स्वप्न में विषय वास्तविक नहीं अपितु कल्पित ही होते हैं, उसी तरह ये प्रमाण तथा प्रमेय दोनों ही नहीं हैं, केवल इनकी कल्पना कर ली गयी है ? ॥ ३१-३२ ॥ उक्त अभिमानकल्पना में हेतु न होने से वह असिद्ध है ॥ ३३ ॥ यह प्रमाण-प्रमेयबुद्धि स्वप्नप्रत्ययसदृशी है, जाग्रत्प्रत्ययसदृशी नहीं है—इसमें कोई हेतु नहीं, अतः हेत्वभाव से आपकी बात अयुक्त ही है। स्वप्नावस्था में गृहीत होनेवाले विषय नहीं हैं—इसमें भी कोई हेतु नहीं। यदि यह कहो कि जागने पर वे उपलब्ध नहीं होते अतः वे नहीं हैं ? तो जाग्रद- वस्था में तो वे उपलब्ध रहते ही हैं। तब 'जाग्रदवस्था में विषय नहीं हैं'—यह कैसे कहते हो ! हेतुसामर्थ्य से तभी कोई बात सिद्ध की जा सकती है कि जब वह कहीं अन्यत्र देखी गयी हो। अन्यत्र क्वचित् उपलब्धि से सत्ता सिद्ध होने पर ही अनुपलब्धि से उसका अभाव सिद्ध हो सकता है। जब उभयथा अभाव ही है तो अनुपलब्धिसामर्थ्य से आप क्या सिद्ध करेंगे ! जैसे किसी जगह प्रदीप के अभाव में रूप ( घटादि ) का अदर्शन सिद्ध करना है तो प्रमाता को अन्यत्र कहीं रूपदर्शन हुआ रहना चाहिये, उसी सामर्थ्य से वह कह सकता है कि 'प्रदीप नहीं है, अतः रूपादर्शन हैं' । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
मानस्य निमित्तविकल्पाद्विकल्पोपपत्तिः॥ ३३ ॥
३३४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० स्वप्नान्तविकल्पे च हेतुवचनम्। स्वप्नविषयाभिमानवदिति ब्रुवता स्वप्ना- न्तविकल्पे हेतुर्वाच्यः। कश्चित्स्वप्नो भयोपसंहितः, कश्चित्प्रमादोपसंहितः, कश्चि- दुभयविपरीतः, कदाचित्स्वप्नमेव न पश्यतीति। निमित्तवतस्तु स्वप्नविषयाभि- मानस्य निमित्तविकल्पाद्विकल्पोपपत्तिः॥ ३३ ॥ स्मृतिसङ्कल्पवच्च स्वप्नविषयाभिमानः ॥ ३४ ॥ पूर्वोपलब्धविषयः। यथा स्मृतिश्च सङ्कल्पश्च पूर्वोपलब्धविषयौ न तस्य प्रत्याख्यानाय कल्पेते, तथा स्वप्ने विषयग्रहणं पूर्वोपलब्धविषयं न तस्य प्रत्या- ख्यानाय कल्पते इति। एवं दृष्टाविषयश्च स्वप्नान्तो जागरितान्तेन। यः सुप्तः स्वप्नं पश्यति स एव जाग्रत्स्वप्नदर्शनानि प्रतिसन्धत्ते—इदमद्राक्षमिति। तत्र जाग्रद्बुद्धिवृत्ति- वशात्स्वप्नविषयाभिमानो मिथ्येति व्यवसायः। सति च प्रतिसन्धाने या जाग्रतो बुद्धिवृत्तिस्तद्वशादयं व्यवसायः स्वप्नविषयाभिमानो मिथ्येति। उभयाविशेषे तु साधनानर्थक्यम्। यस्य स्वप्नान्तजागरितान्तयोरविशेषस्तस्य स्वप्नविषयाभिमानवदिति साधनमनर्थकम्; तदाश्रयप्रत्याख्यानात्। स्वप्नविकल्प में भी हेतु देना चाहिये ! पूर्वपक्षी को 'स्वप्नविषयाभिमानवत्' कहते हुए हेतु भी रखना चाहिये। कोई स्वप्न राग से, कोई भय से, कोई प्रमाद से तथा कोई इनके अभाव अर्थात् अदृष्ट से होता है, कोई पुरुष स्वप्न देखता ही नहीं। निमित्तवान् स्वप्नविषयाभिमान के निमित्तविकल्प से निमित्तविकल्प बन जायेगा ॥ ३३ ॥ स्वप्नविषयाभिमान भी स्मृति तथा सङ्कल्प के समान ॥ ३४ ॥ पूर्वोपलब्ध विषय वाला है। जैसे स्मृति और सङ्कल्प पूर्वोपलब्धविषयक ही होते हैं, उनका प्रत्याख्यान नहीं किया जा सकता; उसी तरह स्वप्न में दिखायी देने वाला विषय भी पूर्वोपलब्ध है, उनका प्रत्याख्यान कैसे होगा ! इस तरह स्वप्न-ज्ञान जाग्रज्ज्ञान से दृष्टविषय है। सोया हुआ मनुष्य जो कुछ स्वप्न में देखता है, जगने पर वह उसका प्रतिसन्धान करता है कि 'ऐसा मैंने स्वप्न में देखा था'। यों जाग्रज्ज्ञान होने पर जाग्र- त्पुरुष की ज्ञानवृत्ति के कारण यह निश्चय होता है कि स्वप्न में देखा गया विषय मिथ्या था; क्योंकि वह इस समय उपलब्ध नहीं है। यदि इन दोनों ( स्वाप्न एवं जाग्रत ) ज्ञानों को ही मिथ्या मानें तो साधनानर्थक्य होने लगेगा। यो, स्वाप्न तथा जाग्रत—दोनों ही ज्ञानों को मिथ्या मानता है, उसके लिये बाकी क्या रह जाता है कि उसे वह सिद्ध करने का प्रयास कर रहा है; क्योंकि उसने तो उस मिथ्याज्ञान के आश्रय जाग्रज्ज्ञानाधीन वस्तु का ही प्रत्याख्यान ( अप- लाप ) कर दिया ! अर्थात् जाग्रत् से स्वप्न या स्वप्न से जाग्रज्ज्ञान होता हैं—इसमें विनिगमन करना ही कठिन है।
३५. सू० ] बाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३५
३५. सू० ] बाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३५ अतस्मिंस्तदिति च व्यवसायः प्रधानाश्रयः । अपुरुषे स्थाणौ पुरुष इति व्यवसायः स प्रधानाश्रयः, न खलु पुरुषेऽनुपलब्धे 'पुरुषः' इत्यपुरुषे व्यवसायो भवति । एवं स्वप्नविषयस्य व्यवसायः—हस्तिनमद्राक्षं पर्वतमद्राक्षमिति प्रधानाश्रयो भवितुमर्हति ॥ ३४ ॥ एवं च सति— मिथ्योपलब्धेर्विनाशस्तत्त्वज्ञानात्स्वप्नविषयाभिमानप्रणाशवत्प्रतिबोधे ॥ ३५ ॥ स्थाणौ पुरुषोऽयमिति व्यवसायो मिथ्योपलब्धिः, अतस्मिंस्तदिति ज्ञानम्; स्थाणौ स्थाणुरिति व्यवसायस्तत्त्वज्ञानम्, तत्त्वज्ञानेन च मिथ्योपलब्धिर्निवर्त्यते, नार्थः स्थाणुपुरुषसामान्यलक्षणः । यथा प्रतिबोधे या ज्ञानवृत्तिस्तया स्वप्नविषया भिमानो निवर्त्यते, नार्थो विषयसामान्यलक्षणः; तथा मायागन्धर्वनगरमृग- तृष्णिकाणामपि या बुद्धयोऽतस्मिंस्तदिति व्यवसायाः, तत्राप्यनेनैव कल्पेन मिथ्योपलब्धिविनाशस्तत्त्वज्ञानान्नार्थप्रतिषेध इति । उपादानवच्च मायादिषु मिथ्याज्ञानम् । प्रज्ञापनीयसरूपं च द्रव्यमुपादाय अभाव में सत्ता ( तदभाववान् में तत्त्व ) का व्यवसाय प्रधानाश्रित होता है । पुरुषाभावयुक्त स्थाणु में पुरुषव्यवसाय पुरुषाश्रित है । पुरुष यदि कहीं प्रमाता को अन्यत्र न उपलब्ध हुआ हो तो वह स्थाणु में पुरुषव्यवसाय कभी नहीं कर पायेगा । इसी तरह 'हाथी देखा था, पर्वत देखा था'—यह स्वप्नगत विषय का व्यवसाय भी जाग्रज्ज्ञानरूप प्रधान का आश्रय लेकर ही हो सकता है ॥ ३४ ॥ ऐसा मानने पर— जगने पर स्वप्नज्ञान के नाश की तरह तत्त्वज्ञान से मिथ्याज्ञानोपलब्धि का विनाश हो जाता है ॥ ३५ ॥ स्थाणु में 'यह पुरुष है'—ऐसा व्यवसाय मिथ्योपलब्धि है, यही में तदभाववान् 'तत्ता' ज्ञान कहलाता है । स्थाणु में 'यह स्थाणु है'—ऐसा ज्ञान तत्त्वज्ञान कहलाता है । तत्त्व- ज्ञान से मिथ्योपलब्धि निवृत्त हो जाती है, न कि स्थाणुपुरुष में उपलब्ध होने वाले सामान्य लक्षणों ( स्थाणुत्व, पुरुषत्व ) का-कोई अर्थ नहीं रह जाता, अर्थात् इस तत्त्व- ज्ञान से उन विषयों में कोई परिवर्तन नहीं होता । जैसे जगने पर हुई ज्ञानवृत्ति से स्वप्न- विषयक मिथ्याभिमान नष्ट हो जाता है, न कि जाग्रत्स्वप्न-विषयों में उपलब्ध होने वाले सामान्य लक्षणों का कोई अर्थ नहीं है । इसी तरह मायाकल्पित गन्धर्वनगर, मृगतृष्णा आदि में तदभाववान् में तत्ता के ज्ञान का भी उक्त रीति से ही खण्डन समझ लेना चाहिये । वहाँ भी तत्त्वज्ञान से मिथ्योपलब्धि निवृत्त हो, जाती है विषय में कोई परिवर्त्तन नहीं होता । यों यह मिथ्याज्ञान सत् के आश्रित है । माया या इन्द्रजाल में मिथ्याज्ञान होता है । मायिक जिस विषय का आभास उत्पन्न करना चाहता है तत्सदृश किसी सद् द्रव्य को स्मृति में लेकर ही वह दूसरे में सम्पादित सामग्रियों से मिथ्याध्यवसाय करता
३३६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० साधनवान् परस्य मिथ्याध्यवसायं करोति, सा माया। नीहारप्रभृतीनां नगरसरूप- सन्निवेशे दूरान्नगरबुद्धिरुत्पद्यते; विपर्यये तदभावात् । सूर्यमरीचिषु भौमेनोष्मणा संसृष्टेषु स्पन्दमानेषूदकबुद्धिर्भवति; सामान्यग्रहणात्, अन्तिकस्थस्य विपर्यये तदभावात् । क्वचित्-कदाचित् कस्यचिच्च भावान्नानिमित्तं मिथ्याज्ञानम्। दृष्टं च बुद्धिद्वैतं मायाप्रयोक्तुः, परस्य च दूरान्तिकस्थयोर्गन्धर्वनगरमृगतृष्णिकासु, सुप्तप्रतिबुद्धयोश्च स्वप्नविषये। तदेतत् सर्वस्याभावे निरुपाख्यातायां निरात्मकत्वे नोपपद्यते इति ॥ ३५ ॥ बुद्धेश्चैवं निमित्तसद्भावोपलम्भात् ॥ ३६ ॥ मिथ्याबुद्धेश्चार्थवत्प्रतिषेधः। कस्मात् ? निमित्तोपलम्भात्, सद्भावोपलम्भा- च्च । उपलभ्यते मिथ्याबुद्धिनिमित्तम्, मिथ्याबुद्धिश्च प्रत्यात्ममुत्पन्ना गृह्यते; संवेद्यत्वात्। तस्मान्मिथ्याबुद्धिरप्यस्तीति ॥ ३६ ॥ तत्त्वप्रधानभेदाच्च मिथ्याबुद्धेर्द्वैविध्योपपत्तिः१ ॥ ३७ ॥ है, वही माया है। जैसे दूर से नगरादि की भ्रान्ति भी तभी होती है जब उसका कारण नक्षत्र या मेघादि से नगररूपाकार बन जाये । यहाँ मिथ्या ज्ञान का कारण दूरत्व है, पास में जाने पर वह बाधित होता है। मरुप्रदेश में सूर्यकिरणें भूमि से निर्गत उत्कट उष्ण तेज से संसृष्ट हो चिलचिलाती हैं, तत्र जल का सामान्य धर्म गृहीत होने से उसमें उदक का मिथ्या ज्ञान होता है । वह मिथ्याज्ञान समीप जानेपर नष्ट हो जाता है । कहीं कुछ तो कहीं कुछ भाव मिथ्याज्ञान से पूर्व है ही, न कि मिथ्याज्ञान अनिमित्तक है । लोक में यह बुद्धिद्वैत मायाप्रयोक्ता के कार्य में या दूसरे के कार्य में या गन्धर्वनगर- मृगतृष्णा आदि में देखते ही हैं। इसी तरह यह द्वैत सुप्त तथा प्रतिबुद्ध के स्वप्न तथा जाग्रत ज्ञानों में भी समझना चाहिये । यदि आत्यन्तिक निरात्मक एवं सत् के सर्वथा अभाव में ही इस संसार को व्याप्त करके रहता तो यह बुद्धिद्वैत कैसे होता ! अतः बाह्यार्थ का अपलाप करना अयुक्त है ॥ ३५ ॥ यों, कारण तथा सत्ता की उपलब्धि से मिथ्याज्ञान का अस्तित्व मानना ही उचित है ॥ ३६ ॥ जैसे ( मिथ्याज्ञानों के ) विषय का प्रतिषेध नहीं किया जा सकता, उसी तरह मिथ्याज्ञान का प्रतिषेध भी उचित नहीं; क्योंकि उसका कारण तथा उसकी सत्ता उप- लब्ध होती है। जब मिथ्याबुद्धि के कारण उपलब्ध होते हैं, तथा मिथ्याज्ञान सर्वजनानु- भवसिद्ध है तो शून्यवादी ( माध्यमिक बौद्ध ) को भी मिथ्याज्ञान की सत्ता स्वीकार करनी ही चाहिये ॥ ३६ ॥ तत्त्व ( धर्मस्वरूप ) तथा प्रधान ( आरोप्य ) में भेद होने से मिथ्याबुद्धि के निमित्त में द्वैविध्य बन सकता है ॥ ३७ ॥ १. ‘मिथ्याबुद्धिद्वैविध्योपपत्तिः’—इति पाठ० । ‘मिथ्याबुद्धिनिमित्तस्य द्वैविध्य- मित्यर्थः’—इति तात्पर्याचार्याः ।
३८. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३३७
३८. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३३७ तत्त्वं स्थाणुरिति, प्रधानं पुरुष इति—तत्त्वप्रधानयोरलोपाद् = भेदात्, स्थाणौ 'पुरुषः' इति मिथ्याबुद्धिरुत्पद्यते; सामान्यग्रहणात् । एवं पताकायां बलाकेति, लोष्टे कपोत इति । तत्र समाने विषये मिथ्याबुद्धीनां समावेशः, सामान्यग्रहणव्यवस्थानात् । यस्य तु निरात्मकं निरुपाख्यम्, सर्वं तस्यासमा- वेशः प्रसज्यते ! गन्धादौ च प्रमेये गन्धादिबुद्धयो मिथ्याभिमतास्तत्त्वप्रधानयोः सामान्य- ग्रहणस्य चाभावात् तत्त्वबुद्धय एव भवन्ति । तस्मादयुक्तमेतत्—'प्रमाणप्रमेय- बुद्धयो मिथ्या' इति ॥ ३७ ॥ तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् [ ३८-४९ ] 'दोषनिमित्तानां तत्त्वज्ञानादहङ्कारनिवृत्तिः' (४. २. १) इत्युक्तम् । अथ कथ तत्त्वज्ञानमुत्पद्यत इति ? समाधिविशेषाभ्यासात् ॥ ३८ ॥ स तु प्रत्याहृतस्येन्द्रियेभ्यो मनसो धारकेण प्रयत्नेन धार्यमाणस्यात्मना संयोगस्तत्त्वबुभुत्साविशिष्टः । सति हि तस्मिन्निन्द्रियार्थेषु बुद्धयो नोत्पद्यन्ते, तदभ्यासवशात् तत्त्वबुद्धिरुत्पद्यते ॥ ३८ ॥ तत्त्व अर्थात् स्थाणु ( धर्मी ), प्रधान अर्थात् पुरुष ( आरोप्य )—इनके भिन्न-भिन्न होने से स्थाणु में 'पुरुष है' यह मिथ्याज्ञान उत्पन्न होता है; उनके सामान्य लक्षण समान होने के कारण । इसी तरह ध्वजा में वक पक्षी तथा ढेले में कबूतर का भी समान लक्षणों से मिथ्याज्ञान हो जाया करता है । अतः यह सिद्ध होता है कि समान विषयों में मिथ्याबुद्धियों का समावेश समान लक्षणों से हो जाता है । परन्तु जो इस संसार को निर्धर्मक और अभाव ही मानता है उसके मत में यह समावेश कैसे और क्या करने के लिये होगा ! गन्धादि प्रमेय में गन्धविज्ञान को भी ये शून्यवादी मिथ्या ही मानते हैं; परन्तु वहाँ उक्त तत्त्व तथा प्रधान का भेद न होने से तथा समानलक्षण गृहीत न होने से हमारे मत में वह गन्धज्ञान तत्त्वज्ञान ही है, अर्थात् धर्मवत् धर्मिस्वरूप का यह यथार्थ ज्ञान ही है। अतः यह कहना अयुक्त ही है कि—प्रमाणप्रमेयबुद्धि मिथ्या है ॥ ३७ ॥ 'दोष-कारणों के तत्त्वज्ञान से अहङ्कार की निवृत्ति होती हैं' यह आप पहले ( ४.२.१ में ) कह चुके हैं, पर यह तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता कैसे है—यह तो बताइये ! समाधिविशेष के अभ्यास से तत्त्वज्ञान उत्पन्न हो जाता है ॥ ३८ ॥ समाधि क्या है ? तत्त्वज्ञान की इच्छा से इन्द्रियों से मन को हटा कर धारक प्रयत्न द्वारा धार्यमाण मन का आत्मा से संयोग ही 'समाधि' है। उस समाधि के होने पर, बुद्धि इन्द्रियों के विषयों की ओर नहीं दौड़ती । ऐसा अभ्यास करते-करते कि इन्द्रियाँ विषयों की तरफ न जाने पावें, एक दिन तत्त्वज्ञान हो ही जाता है ॥ ३८ ॥ न्या० द० : २२
३३८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० यदुक्तम्—'सति हि तस्मिन् इन्द्रियार्थेषु बुद्धयो नोत्पद्यन्ते' इत्येतत्— न; अर्थविशेषप्राबल्यात् ? ॥ ३९ ॥ अनिच्छतोऽपि बुद्धयुत्पत्तेर्नैतद् युक्तम् । कस्मात् ? अर्थविशेषप्राबल्याद् अबुभुत्समानस्यापि बुद्धयुत्पत्तिर्दृष्टा, यथा—स्तनयित्नुशब्दप्रभृतिषु । तत्र समाधिविशेषो नोपपद्यते ? ॥ ३९ ॥ क्षुदादिभिः प्रवर्त्तनाच्च ? ॥ ४० ॥ क्षुत्पिपासाभ्यां शीतोष्णाभ्यां व्याधिभिश्चानिच्छतोऽपि बुद्धयः प्रवर्त्तन्ते । तस्मादेकाग्र्यानुपपत्तिरिति ॥ ४० ॥ अस्त्वेतत् समाधिं विहाय व्युत्थानम्, व्युत्थाननिमित्तं समाधिप्रत्यनीकं च, सति त्वेतस्मिन्— पूर्वकृतफलानुबन्धात् तदुत्पत्तिः ॥ ४१ ॥ पूर्वकृतो जन्मान्तरोपचितस्तत्त्वज्ञानहेतुर्धर्मप्रविवेकः¹ फलानुबन्धो योगा- शङ्का— आपका यह कहना कि 'उस समाधि के होने पर बुद्धि इन्द्रियों के विषयों की ओर नहीं दौड़ती' यह अयुक्त है; क्योंकि— वह समाधि अर्थविशेष के प्राबल्य से नहीं हो पायेगी ? ॥ ३९ ॥ समाधिस्थ पुरुष के न चाहने पर भी विषय की प्रबलता से इन्द्रियाँ उधर प्रवृत्त होंगी ही, तब वैसा ज्ञान भी होगा ही । जैसे न जानना चाहते हुए की भी मेघगर्जन- शब्द की तरफ इन्द्रियप्रवृत्ति देखी जाती है, तथा उसका श्रावण ज्ञान भी देखा जाता है, अतः हम तो यही मानना चाहेंगे कि आपका वह समाधिविशेष उत्पन्न नहीं होता ? ॥ ३९ ॥ भूख आदि की प्रवृत्ति से भी यही मानना उचित है ? ॥ ४० ॥ अनिच्छुक पुरुष की भी क्षुत्पिपासा, शीतातप, तथा व्याधि आदि की तरफ बुद्धि दौड़ती रहती है, अतः यही मानें कि वह समाधिविशेष उत्पन्न हो नहीं पाता ? ॥४०॥ उत्तर—हम कब कहते हैं कि समाधि-च्युति नहीं होती, या उसमें अन्तराय नहीं आता; परन्तु पुनः पुनः समाधिच्युति या उसमें अन्तराय आने पर भी पूर्वशरीराभ्यस्त समाधि के धर्माख्य संस्कारविशेष की स्थिरता से इस समाधि की पुनः उत्पत्ति हो जाती है ॥ ४१ ॥ सूत्रस्थ 'पूर्वकृत' पद से तात्पर्य है—पूर्व जन्म में संचित हुआ तत्त्वज्ञान-निमित्तक धर्माख्य प्रकृष्ट संस्कार ( अदृष्ट ) । 'फलानुबन्ध से तात्पर्य है योगाभ्यास का सामर्थ्य । १. 'प्रविविच्यते विशिष्यते इति प्रविवेकः, धर्मश्चासौ प्रविवेकः' इति तात्पर्यकृतः ।
४४. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३३९
४४. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३३९ भ्याससामर्थ्यम्, निष्फले ह्यभ्यासे नाभ्यासमाद्रियेरन् । दृष्टं हि लौकिकेषु कर्म- स्वभ्याससामर्थ्यम् ॥ ४१ ॥ प्रत्यनीकपरिहारार्थं च अरण्यगुहापुलिनादिषु योगाभ्यासोपदेशः ॥ ४२ ॥ योगाभ्यासजनितो धर्मो जन्मान्तरेऽप्यनुवर्तते । प्रचयकाष्ठागते तत्त्वज्ञानहेतौ धर्मे प्रकृष्टायां समाधिभावनायां तत्त्वज्ञानमुत्पद्यते इति । दृष्टश्च समाधिनाऽर्थ- विशेषप्राबल्याभिभवः—'नाहमेतदश्रौषं नाहमेतदज्ञासिषम्, अन्यत्र मे मनोऽभूत्' इत्याह लौकिक इति ॥ ४२ ॥ यद्यर्थविशेषप्राबल्यादनिच्छतोऽपि बुद्धयुत्पत्तिरनुज्ञायते, अपवर्गेऽप्येवं प्रसङ्गः ? ॥ ४३ ॥ मुक्तस्यापि बाह्यार्थसामर्थ्याद् बुद्धय उत्पद्येरन्निति ? ॥ ४३ ॥ न; निष्पन्नावश्यम्भावित्वात् ॥ ४४ ॥ इन दोनों हेतुओं से समाधि की उत्पत्ति होगी । 'फलानुबन्ध' इसलिये लगाया है कि निष्फल अभ्यास में प्रेक्षावान् पुरुषों का आदर न होगा । लोक में भी देखा जाता है, जैसे मनुष्य यदि कुछ समय पहले कोई कार्य थोड़ा-बहुत सीखा रहता है तो समय पाकर, साधन मिलने पर अभ्यास से वही उस कार्य में कुशल हो जाता है ॥ ४१ ॥ विघ्नों के परिहार के लिये आचार्यों ने अरण्य, गुफा, तथा ( समुद्र या नदी के ) तट आदि एकान्त स्थानों में बैठ कर योगाभ्यास का उपदेश किया है ॥ ४२ ॥ योगाभ्यासजनित अदृष्ट जन्मान्तर में भी अनुवृत्त होता है । जब यह तत्त्वज्ञानहेतु अदृष्ट प्रचय ( वृद्धि ) की अन्तिम सीमा तक पहुँच जाता है तो समाधि की पूर्णता से उस समय तत्त्वज्ञान हो जाता है । लोक में भी समाधि से अर्थविशेष के प्राबल्य का अभिभव देखा जाता है, जैसे कोई कहे—'अरे भाई ! मैं आपकी बात सुन नहीं सका, अतः समझ नहीं पाया, मेरा ध्यान ( मन ) दूसरी ओर था'—इत्यादि ॥ ४२ ॥ शङ्का— यदि आप हमारी इस बात को स्वीकार करते हैं कि 'अनिच्छुक का भी मन अर्थ- विशेषप्राबल्य से उधर खिंच ही जाता है' तो— अपवर्ग में भी बाह्य विषयों की ओर बुद्धि प्रसक्त होगी ? ॥ ४३ ॥ मुक्त पुरुष की बुद्धि भी विषयविशेष के प्राबल्य से उसकी तरफ प्रवृत्त होगी ? ॥ ४३ ॥ उत्तर— उस बुद्धि के निष्पन्न ( शरीर ) में ही अवश्यम्भावी होने से अपवर्ग-स्थिति में यह सब कुछ नहीं होता ॥ ४४ ॥
३४० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० कर्मवशान्निष्पन्ने शरीरे चेष्टेन्द्रियार्थाश्रये निमित्तभावादवश्यम्भावी बुद्धीना- मुत्पादः, न च प्रबलोऽपि सन् बाह्योऽर्थ आत्मनो बुद्धयुत्पादे समर्थो भवति, तस्येन्द्रियेण संयोगाद् बुद्धयुत्पादे सामर्थ्यं दृष्टमिति ॥ ४४ ॥ तदभावश्चापवर्गे ॥ ४५ ॥ तस्य बुद्धिनिमित्ताश्रयस्य शरीरेन्द्रियस्य धर्माधर्मभावादभावोऽपवर्गे । तत्र यदुक्तम्-‘अपवर्गेऽप्येवं प्रसङ्गः’ इति तदयुक्तम् । तस्मात्सर्वदुःखविमोक्षोऽपवर्गः । यस्मात् सर्वदुःखबीजं सर्वदुःखायतनं चापवर्गे विच्छिद्यते, तस्मात् सर्वेण दुःखेन विमुक्तिरपवर्गः; न निर्बीजं निरायतनं च दुःखमुत्पद्यत इति ॥ ४५ ॥ तदर्थं यमनियमाभ्यामात्मसंस्कारो योगाच्चाध्यात्मविध्युपायैः ॥ ४६ ॥ तस्यापवर्गस्याधिगमाय यमनियमाभ्यामात्मसंस्कारः । यमः१ समानमाश्र- मिणां धर्मसाधनम्, २नियमस्तु विशिष्टम् । आत्मसंस्कारः पुनरधर्महानं धर्मो- आत्मा के प्राक्तन कर्मवश जब यह शरीर निष्पन्न होता है, तब वह चेष्टा, इन्द्रिय, तथा विषयों का आश्रय होता है । इस प्रकार उस बुद्धि का निमित्त होने से इस शरीर में भी वैषयिक बुद्धि का उत्पाद अवश्यम्भावी है, परन्तु मोक्षावस्था में ( इन्द्रिय से दूर होने के कारण ) प्रबल बाह्य विषय भी आत्मा में बुद्धयुत्पाद नहीं कर सकता; क्योंकि इन्द्रियों के संयोग से ही उस वैषयिकबुद्धि की उत्पत्तिशक्ति देखी जाती है ॥ ४४ ॥ तथा उस बुद्धिकारण शरीर का अपवर्गदशा में अभाव है ॥ ४५ ॥ बुद्धिनिमित्त के आश्रय शरीरेन्द्रियोत्पत्ति के कारण धर्माधर्म हैं, पर अपवर्ग में धर्माधर्म क्षीण हो जाते हैं । अतः वहाँ कारण ( धर्माधर्मादि ) के अभाव में तत्कार्य ( शरीरेन्द्रियादि ) का अभाव ही रहेगा । इसलिए आपका यह कहना कि 'अपवर्ग में भी बाह्य विषयों की ओर बुद्धि प्रवृत्त होगी'—अयुक्त ही है । यहाँ सब दुःखों से छुट- कारा पा जाना ही मोक्ष है, यही 'अपवर्ग' है । तात्पर्य यह है कि सब दुःखों के कारण तथा आश्रय का अपवर्ग में विच्छेद हो जाता है, अतः सब दुःखों से विमुक्ति ही 'अपवर्ग' है । इस दशा में निष्कारण तथा निराश्रय दुःख उत्पन्न ही कैसे होंगे ! ॥ ४५ ॥ उसके लिये यम-नियम, योग तथा अध्यात्मशास्त्रोक्त उपायों से आत्मा का संस्कार करना चाहिये ॥ ४६ ॥ उस अपवर्ग की प्राप्ति के लिये यम-नियम से आत्म-संस्कार करना चाहिये । यम कहते हैं—आश्रमियों का समान धर्मसाधन, जैसे—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह आदि धर्म का पालन । नियम—जिज्ञासु पुरुषों के विशिष्ट धर्मसाधन को १. 'अहिंसा सत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः'—( योगसूत्रम्, २. ३०. ) २. 'शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः'—( योगसूत्रम्, २. ३२. )
४८. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३४१
४८. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३४१ पचयश्च, योगशास्त्राच्चाध्यात्मविधिः प्रतिपत्तव्यः । स पुनस्तपः, प्राणायामः, प्रत्याहारः, ध्यानम्, धारणेति । इन्द्रियविषयेषु प्रसंख्यानाभ्यासो रागद्वेषप्रहा- णार्थः । उपायस्तु योगाचारविधानमिति ॥ ४६ ॥ ज्ञानग्रहणाभ्यासस्तद्विद्यैश्च सह संवादः ॥ ४७ ॥ तदर्थमिति प्रकृतम् । ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानम् = आत्मविद्याशास्त्रम्, तस्य ग्रहण- मध्ययनधारणे । अभ्यासः = सततक्रियाध्ययनश्रवणचिन्तनानि । तद्विद्यैश्च सह संवाद इति प्रज्ञापरिपाकार्थम् । परिपाकस्तु संशयच्छेदनम्, अविज्ञातार्थबोधः, अध्यवसिताभ्यनुज्ञानमिति । समाय वादः = संवादः ॥ ४७ ॥ 'तद्विद्यैश्च सह संवादः' इत्यविभक्तार्थं वचनं विभज्यते-- तं शिष्यगुरुसब्रह्मचारिविशिष्टश्रेयोऽर्थिभिरनसूयिभिरभ्युपेयात् ॥ ४८ ॥ कहते हैं, जैसे—शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान । उक्त उपायों द्वारा अधर्मनाश तथा धर्मोपचय से आत्मसंस्कार समझना चाहिये । अध्यात्मविधि योगशास्त्र से ग्रहण करनी चाहिये । वह विधि योगशास्त्र में—तप, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान तथा धारणा आदि उपायों से बतायी गयी है । इन्द्रियार्थों के वारे में निवृत्ति ( त्याग ) का अभ्यास रागद्वेष के क्षय के लिये किया जाता है । योग तथा आचारशास्त्र में मुमुक्षु के लिये बतायी गयी विधियाँ ही 'उपाय' है। जैसे—एकाकिता, आहार में संयम तथा एक स्थान पर अधिक काल न रहना आदि ॥ ४६ ॥ [ यदि अपवर्ग उक्त समाधि से ही निष्पन्न होता है तो इस न्यायशास्त्र के अध्ययन का क्या लाभ ?—] इस पर सूत्रकार कहते हैं— विद्याओं का अध्ययन तथा उसका अभ्यास और उसके मर्मज्ञों के साथ संवाद ॥४७॥ उस अपवर्ग के लिए करना चाहिये । 'जिससे जाना जाये'—इस करणव्युत्पत्ति से आत्मविद्याशास्त्र को 'ज्ञान' कहते है, उसे प्राप्त करना ही अध्ययन एवं धारणा है । निरन्तर शास्त्रोक्त क्रिया, शास्त्रों का अध्ययन एवं चिन्तन करना अभ्यास कहलाता है । तथा प्रज्ञावै शद्य के लिए उस विद्या के विद्वानों के सामने जिज्ञासुभाव से श्रद्धा के साथ परिप्रश्न कर संवाद करते रहने से प्रज्ञापरिपाक होता है । यह प्रज्ञावैशद्य तब समझना चाहिये जब जिज्ञासु को संशयनिवृत्ति, अविज्ञात ( विशेषेण अज्ञात ) अर्थ का बोध, तथा प्रमाण से सामान्यतः ज्ञात का तर्कयुक्त अभ्युपगम हो जाये । समस्थिति के लिये किये गये वाद को 'संवाद' कहते हैं । अर्थात् तत्त्ववुभुत्सा के लिये विहित कथाप्रवर्तन संवाद कहलाता है ॥ ४७ ॥ पूर्वसूत्रोक्त 'उन उन विद्वानों के साथ होनेवाला संवाद'—इस वाक्यावयव को और स्पष्ट करते हैं— संवाद को शिष्य, गुरु, सहाध्यायी तथा किसी तत्त्वज्ञानी के साथ जो कि उस जिज्ञासु का कल्याण चाहते हों तथा उससे ईर्ष्या न करते हों, प्राप्त करे ॥ ४८ ॥
सूत्रकार का यह आदेश उन जिज्ञासुओं के लिये है जिनको तत्त्वज्ञान न हुआ हो,
३४२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० एतन्निगदेनैव नीतार्थमिति ॥ ४८ ॥ यदिदं मन्येत—पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहः प्रतिकूलः परस्येति ? प्रतिपक्षहीनमपि वा प्रयोजनार्थमर्थित्वे ॥ ४९ ॥ तमभ्युपेयादिति वर्तते । परतः प्रज्ञामुपादित्समानस्तत्त्वबुभुत्साप्रकाशनेन स्वपक्षमनावस्थापयन् स्वदर्शनं परिशोधयेदिति ॥ ४९ ॥ तत्त्वज्ञानपरिपालनप्रकरणम् [ ५०-५१ ] अन्योन्यप्रत्यनीकानि च प्रावादुकानां दर्शनानि, स्वपक्षरागेण चैके न्याय- मतिवर्तन्ते, तत्र— तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं जल्पवितण्डे, बोजप्ररोहसंरक्षणार्थं कण्टकशाखावरणवत् ॥ ५० ॥ अनुत्पन्नतत्त्वज्ञानानामप्रहीणदोषाणां तदर्थं घटमानानामेतदिति ॥ ५० ॥ यह सूत्र अपने सरल पदों से स्वयं स्पष्ट है, अतः इसका अधिक व्याख्यान अपे- क्षित नहीं ॥ ४८ ॥ यदि संवाद में पक्ष तथा प्रतिपक्ष होने से वह दूसरों ( उक्त शिष्य, गुरु, सब्रह्म- चारी ) के लिये प्रतिकूल ही होगा—ऐसा समझा जाय तो ? तत्त्वज्ञान की इच्छा होने पर तत्त्वनिर्णय के लिये प्रतिकूलपक्षहीन ॥ ४९ ॥ वह संवाद करे । दूसरे से ज्ञान प्राप्त करने के लिये तथा तत्त्वज्ञान की इच्छा प्रकट कर, अपना कोई पक्ष न रखता हुआ अपने ज्ञान का परिष्कार करे ॥ ४९ ॥ [ यदि तत्त्वज्ञान के लिये ऐसा सात्त्विक संवाद ही अपेक्षित है तो जल्प-वितण्डा को हाथ जोड़ लें, संवाद में उनकी क्या जरूरत पड़ेगी ? इस पर कहते हैं—] एक बात और, विभिन्न दार्शनिकों के आत्मविद्या के बारे में अपने-अपने मत हैं जो कि परस्पर विरुद्ध हैं, उनमें अपने को न उलझाते हुए तथा उनमें से अयुक्त को छोड़- कर युक्त के परिग्रह से अपने ज्ञान का परिष्कार करे। हाँ, उक्त प्रकार के वादियों को छोड़ कर अन्य प्रकार के वादी भी हैं जो अपने पक्ष में दुराग्रह रखते हुए न्याय का अतिक्रमण करते रहते हैं, उन पर— जिज्ञासु को तत्त्वज्ञान के संरक्षण के लिये जल्प-वितण्डा का भी प्रयोग करना चाहिये, जैसे अन्यत्र अनपेक्षित कण्टकशाखा का आवरण (कांटों का घेरा) भी क्षेत्ररक्षण के लिये कभी-कभी अत्यावश्यक होता है ॥ ५० ॥ सूत्रकार का यह आदेश उन जिज्ञासुओं के लिये है जिनको तत्त्वज्ञान न हुआ हो, • जिनके दोष प्रहीण न हुए हों, परन्तु जो उनके प्रहाण के लिये प्रयास कर रहे हों ॥५०॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
५१. सू० ] तत्त्वज्ञानपरिपालनप्रकरणम् ३४३
५१. सू० ] तत्त्वज्ञानपरिपालनप्रकरणम् ३४३ विद्यानिर्वेदादिभिश्च परेणावज्ञायमानस्य— ताभ्यां विगृह्य कथनम् ॥ ५१ ॥ विगृह्य इति विजिगीषया, न तत्त्वबुभुत्सयेति । तदेतद् विद्यापालनार्थम्, न लाभपूजाख्यात्यर्थमिति ॥ ५१ ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये चतुर्थाध्याये द्वितीयमाह्निकं समाप्तम् ❀ समाप्तश्च चतुर्थोऽध्यायः ❀ या जो प्रतिवादी मिथ्याज्ञानावलेपदुर्विदग्धता से जिज्ञासु की अवज्ञा करने को तत्पर हो, उस समय जिज्ञासु जल्प-वितण्डा से संवाद करता हुआ विजिगीषा से तत्त्वकथन करे ॥ ५१ ॥ ‘विगृह्य’ पद का तात्पर्य है विजिगीषा से, न कि तत्त्वबुभुत्सा से । जल्प-वितण्डा का प्रयोग इसलिये किया जाता है कि वे उक्त दुर्विदग्ध वादी अपना दृढ प्रतिपक्षी न न पाकर साधारण जनता के हृदय से धार्मिक भावनाओं का विलोप ही न कर दें । वहाँ जिज्ञासु को यह कभी न सोचना चाहिये कि इस जल्प-वितण्डा के प्रयोग से सत्कार, या धन का लाभ होगा, अपितु वह विद्या की रक्षा के लिये जल्प-वितण्डा का आश्रयण लेता रहे ॥ ५१ ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन)में चतुर्थ अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त ❀ चतुर्थ अध्याय भी समाप्त ❀
सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् [ १-३ ]
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अथ पञ्चमोऽध्यायः प्रथममाह्निकम् [ १-३ ] सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् [ १-३ ] 'साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानस्य विकल्पाज्जातिबहुत्वम्' ( १.२.१८ ), इति संक्षेपेणोक्तम्, तद्विस्तरेण विभज्यते । ताः खल्विमा जातयः, स्थापना- हेतौ प्रयुक्ते, चतुर्विंशतिः प्रतिषेधहेतवः- साधर्म्यवैधर्म्योत्कर्षापकर्षवर्ण्यावर्ण्यविकल्पसाध्यप्राप्त्यप्राप्तिप्रसङ्गप्रति- दृष्टान्तानुत्पत्तिसंशयप्रकरणहेत्वर्थापत्त्यविशेषोपपत्त्युपलब्ध्यनुप- लब्धिनित्यानित्यकार्यसमाः ॥ १ ॥ साधर्म्येण प्रत्यवस्थानमविशिष्यमाणं स्थापनाहेतुतः साधर्म्यसमः । अविशेषं तत्र तत्रोदाहरिष्यामः । एवं वैधर्म्यसमप्रभृतयोऽपि निर्वक्तव्याः ॥ १ ॥ [ इस न्यायशास्त्र के प्रथमाध्यायस्थ प्रथम सूत्र में शास्त्रान्तःपाति विषयों का परि- गणन कर, तदनन्तर गत चारों अध्यायों में क्रमशः उन सबके उद्देश, लक्षण तथा परीक्षा की जा चुकी, अब क्या बाकी रह गया कि जिसके लिए यह पञ्चम अध्याय प्रारम्भ किया जा रहा है ? —इस पर भाष्यकार प्रसंग उठाते हैं—] "साधर्म्य तथा विरुद्ध धर्म से किये जाने वाले खण्डन को 'जाति' ( असत् उत्तर ) कहते हैं, तथा उसके भेद से जाति के बहुत भेद हैं"—ऐसा हम संक्षेप से पीछे ( १.२.१८ ) कह चुके हैं। अब उसी का विस्तरशः निरूपण किया जा रहा है । ये जातियाँ, जो कि वादी द्वारा स्थापनाहेतु उपस्थित किये जाने पर प्रतिवादी द्वारा उसके खण्डन के लिए काम में लायी जाती हैं, चौबीस प्रकार की होती हैं, जैसे— १. साधर्म्यसम, २. वैधर्म्यसम, ३. उत्कर्षसम, ४. अपकर्षसम, ५. वर्ण्यसम, ६. अवर्ण्यसम, ७. विकल्पसम, ८. साध्यसम, ९. प्राप्तिसम, १०. अप्राप्तिसम, ११. प्रसङ्गसम, १२. प्रतिदृष्टान्तसम, १३, अनुत्पत्तिसम, १४. संशयसम, १५. प्रकरणसम, १६. हेतुसम, १७. अर्थापत्तिसम, १८. अविशेषसम, १९. उपपत्तिसम, २०. उपलब्धि- सम, २१. अनुपलब्धिसम, २२. नित्यसम, २३. अनित्यसम, तथा २४. कार्यसम ॥ १ ॥ साधर्म्य ही से जिसका निषेध किया जा सकता हो, अर्थात् दोनों पक्ष के लिए समान हो, किसी एक पक्ष में प्रबल युक्ति न मिलती हो उसे 'साधर्म्यसम' कहते हैं । यह 'अविशेष' ( समानता ) आगे के उस उस जाति के उदाहरण में ही बताया जायेगा कि कहाँ क्या समानता है ! इसी तरह 'वैधर्म्यसम' आदि अवशिष्ट शब्दों का भी निर्वचन कर लेना चाहिये ॥१॥
२. सू० ] सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् ३४५
२. सू० ] सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् ३४५ लक्षणं तु— साधर्म्यवैधर्म्याभ्यामुपसंहारे तद्धर्मविपर्ययोपपत्तेः साधर्म्यवैधर्म्यसमौ ॥ २ ॥ साधर्म्येणोपसंहारे—साध्यधर्मविपर्ययोपपत्तेः साधर्म्येणैव प्रत्यवस्थानम- विशिष्यमाणं स्थापनाहेतुतः साधर्म्यसमः प्रतिषेधः । निदर्शनम्—‘क्रियावानात्मा, द्रव्यस्य क्रियाहेतुगुणयोगात्; द्रव्यं लोष्टः क्रियाहेतुगुणयुक्तः क्रियावान्, तथा चात्मा, तस्मात् क्रियावान्’ इति । एवमुपसंहृते, परः साधर्म्येणैव प्रत्यवतिष्ठते— ‘निष्क्रिय आत्मा; विभुनो द्रव्यस्य निष्क्रियत्वाद्, विभु चाकाशं निष्क्रयं च, तथा चात्मा, तस्मान्निष्क्रिय.’ इति । न चास्ति विशेषहेतुः—क्रियावत्साधर्म्यात् क्रियावता भवितव्यम्, न पुनरक्रियसाधर्म्याद् निष्क्रियेणेति । विशेषहेत्व- भावात् साधर्म्यसमः प्रतिषेधो भवति । अथ वैधर्म्यसमः—‘क्रियाहेतुगुणयुक्तो लोष्टः परिच्छिन्नो दृष्टः, न च तथाऽऽत्मा, तस्मान्न लोष्टवत् क्रियावान्’ इति । न चास्ति विशेषहेतुः—क्रिया- 'साधर्म्यसम' तथा 'वैधर्म्यसम' का लक्षण हैं— साधर्म्य तथा वैधर्म्य से वादी द्वारा साध्य का उपसंहार करने पर, प्रतिवादी द्वारा उस साध्यधर्म के व्यतिरेक का ( व्याप्त्यनपेक्ष ) केवल साधर्म्य वैधर्म्य से उपपादन करना 'साधर्म्यसम' तथा 'वैधर्म्यसम' जाति कहलाती हैं ॥ २ ॥ साधर्म्य द्वारा उपसंहार किये जाने पर, साध्यधर्म के अभाव का उपपादन न कर प्रतिवादी व्याप्त्यनपेक्ष केवल साधर्म्य से स्थापनाहेतु के समान ही प्रतिषेध उपस्थित कर दे उसे 'साधर्म्यसम' कहते हैं। उदाहरण के लिए 'आत्मा क्रियावान् है, द्रव्य के क्रिया- हेतुगुणयुक्त होने से; लोष्टद्रव्य जैसे क्रियाहेतुगुणयुक्त है अतः क्रियावान् है, वैसे ही आत्मा भी द्रव्य है, अतः वह भी क्रियावान् हैं'—ऐसा वादी द्वारा साध्य का उपसंहार किये जानेपर, प्रतिवादी उदाहरणान्तर के साधर्म्य ( व्याप्त्यनपेक्ष ) से ही प्रतिषेधात्मक प्रयोग करता है—'आत्मा निष्क्रिय है, विभु द्रव्य के निष्क्रिय होने से जैसे आकाश विभु तथा निष्क्रिय है, वैसे ही आत्मा भी विभु हैं, अतः वह निष्क्रिय है ।' यहाँ वादी के उपसंहार तथा प्रतिवादी के प्रत्यवस्थान में कोई विशेष अर्थात् हेतु व्याप्तिविशिष्ट नहीं हैं कि जिससे किसी को प्रमाण माना जा सके । अतः यह कैसे निश्चय किया जाये कि क्रियावत्साधर्म्य से क्रियावान् ही सिद्ध हो; अक्रिय साधर्म्य से निष्क्रिय सिद्ध न हो । यों विशेष हेतु न होने से यह 'साधर्म्य' प्रतिषेध है । इसी में 'वैधर्म्यसम' का उदाहरण सुनिये—'क्रियाहेतुगुणयुक्त लोष्ट परिच्छिन्न देखा जाता है ऐसा आत्मा नहीं देखा जाता, अतः वह लोष्ट की तरह क्रियावान् नहीं हैं'—इस प्रयोग में भी ऐसा कोई विशेष हेतु नहीं दिखाया गया कि जिससे यह सिद्ध हो सके कि क्रियावत्साधर्म्य से क्रियावान् ही सिद्ध हो, तथा क्रियावद्वैधर्म्य से निष्क्रिय न
३४६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० वत्साधर्म्यात् क्रियावता भवितव्यम्, न पुनः क्रियावद्वैधर्म्यादक्रियेणेति । विशेष- हेत्वभावाद् वैधर्म्यसमः । वैधर्म्येण चोपसंहारे—'निष्क्रिय आत्मा, विभुत्वात्; क्रियावद् द्रव्यमविभु दृष्टम्—यथा, लोष्टः, न च तथाऽऽत्मा, तस्मान्निष्क्रियः' इति । वैधर्म्येण प्रत्यव- स्थानम्–'निष्क्रियं द्रव्यमाकाशं क्रियाहेतुगुणरहितं दृष्टम्, न तथाऽऽत्मा, तस्मान्न निष्क्रियः' इति । न चास्ति विशेषहेतुः—क्रियावद्वैधर्म्यान्निष्क्रियेण भवितव्यम्, न पुनरक्रियवैधर्म्यात् क्रियावतेति विशेषहेत्वभावाद्वैधर्म्यसमः । अथ साधर्म्यसमः–'क्रियावान् लोष्टः क्रियाहेतुगुणयुक्तो दृष्टः, तथा चाऽऽत्मा, तस्मात् क्रियावान्' इति । न चास्ति विशेषहेतुः–क्रियावद्वैधर्म्यान्निष्क्रियः, न पुनः क्रियावत्साधर्म्यात् क्रियावानिति । विशेषहेत्वभावात् साधर्म्यसमः ॥ २ ॥ अनयोत्तरम्— गोत्वाद गोसिद्धिवत् तत्सिद्धिः ॥ ३ ॥ साधर्म्यमात्रेण वैधर्म्यमात्रेण च साध्यसाधने प्रतिज्ञायमाने स्यादव्यवस्था, हो । विशेष हेतु न होने से यह 'वैधर्म्यसम' प्रतिषेध है । (साधर्म्यसम के प्रतिषेध में आकाश के साथ निष्क्रियत्वरूप साधर्म्य से आत्मा का निष्क्रियत्व सिद्ध किया था, यहाँ इस प्रतिषेध में परिच्छिन्न लोष्ट के साथ अपरिच्छिन्नत्वरूप वैधर्म्य से ही आत्मा का निष्क्रियत्व सिद्ध किया जा रहा है, अतः यह वैधर्म्यसमप्रतिषेध का उदाहरण उचित ही है । ) वैधर्म्य से उपसंहार में दूसरा उदाहरण देते हैं—हेतु का उदाहरण में वैधर्म्य से यों उपसंहार करने पर कि 'आत्मा निष्क्रिय है, विभु होने से, जब कि क्रियावान् द्रव्य अविभु देखा गया है, जैसे लोष्ट; वैसा आत्मा नहीं है, अतः वह निष्क्रिय हैं' ! इस प्रयोग का वैधर्म्य से ही प्रतिषेध करते हैं—'निष्क्रिय द्रव्य आकाश क्रियाहेतुगुणरहित देखा गया है, आत्मा वैसा नहीं है, ( अर्थात् क्रियाहेतुगुणसहित है ) अतः वह निष्क्रिय नहीं है ।' यहाँ कोई विशेष हेतु नहीं दिखाया गया, जिससे हम माने कि क्रियावद्वैधर्म्य से निष्क्रिय ही होना चाहिये, न कि अक्रिय वैधर्म्य से क्रियावान् ! विशेष हेतु न होने से यह 'वैधर्म्यसम' है । इसी में साधर्म्यसम का का उदाहरण देते हैं—'क्रियावान् लोष्ट क्रियाहेतुगुणयुक्त देखा गया है, आत्मा भी वैसा ही है, अतः वह भी क्रियावान् है ।' यहाँ कोई विशेष हेतु नहीं दिखाया गया कि हम समझें—क्रियावद्वैधर्म्य से ही निष्क्रिय सिद्ध हो तथा क्रियावत्सा- धर्म्य से क्रियावान् सिद्ध न हो । विशेष हेतु न होने से यह प्रयोग 'साध्यसम' है ॥ २॥ इन साधर्म्यसम तथा वैधर्म्यसम के असदुत्तरत्व में हेतु ( = खण्डन ) बतलाते हैं— गोत्व से गोसिद्धि की तरह उसकी सिद्धि है ॥ ३ ॥ केवल साधर्म्य या वैधर्म्य से साध्यसिद्धि की प्रतिज्ञा में तो अव्यवस्था हो जायगी ।