पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
१५८ पद्मावत । करि शिंगार तापन कहँ जाऊँ । ओही देखों ठांवहिं ठाऊं ॥ जो जियमहँ तो वही पियारा । तनमहँ सोइ न होय निरारों ॥ नयनहि महँ तो वही समाना । देखों जहां न देखों आना ॥ आपहिं रस आपहि पै लेई । अधरैं सहस लागे रस देई ॥ हियौ थार कुच कंचन लाडू । अगमन भेंट दीन्ह कै चाडू ॥ हुलसी लङ्क लई सो लसी । रावेनें रहस कसौटी कसी ॥ यौबन सबै मिला वह जाई । हौंरी बिच हुत गयो हेराई ॥ दो० जस कुछ दीजे धरने कहँ, आपन लेह सँभार । तस शिंगार सबलीन्हेसि, कीन्हेसि मोहिं ठठार ॥ एरी छबीली तुहिं छब लागी । नेत्र गुलाल कंत सँग जागी ॥ चम्प सुदरशन अस भा सोई । सोन जर्द जस केंसरै होई ॥ बैठि सँवर कुचै नारँग बारी । लागी नखें अधरैं रंगधारी ॥ अधरैं अधरसों भीज तंबोरी । अलकावलि सुरसुरगइ मोरी ॥ राय सुँनी तुम्ह औ रतमूँहीं । अलि मुखलाग भईफुलचुँहीँ ॥ जैसे शिंगार हार सों मिली । मालति ऐसी सदारहिखिली ॥ पुनि शिंगाररस किरौं नेवारी । कदम सेवति पियहिपियारी ॥ दो० गोंद कलीसम बिकैंसी, ऋतु बसन्त औ फाग । फूलहु फरहु सदा सुख, औ सुख सुफल सुहाग ॥ कहि यह बात सखी उठ धाई । चम्पावतैं कहँ आय सुनाई ॥ आज निरँगैं पद्मावत बारी । जीव न जाने पवनअधारी ॥ जगह १ अलग २ होंठ ३ छाती ४ सोने के लड्डुवासी छातियां ५ पहिले ६ पियार ७ खुश होना ८ कमर ६ तथा राजा १० धरोहर ११ आँख १२ खाविंद १३ पीली १४ छाती १५ लड़की १६ नाखून लगनेसे रंगजाता रहा १७ होठपर पानकी लाली १८ बाल १६ लाल २० सुर्ख मुँह २१ भँवर २२ नाम चिंड़िया २३ बराबर २४-२५ खिलना २६ मायपद्मावत २७ बेरंग २८ ॥
पद्मावत । १५६ तड़क तड़क गौ चन्दन चोला । धड़क धड़क डर उठै न बोला ॥ अहे जो कली कमल रस पूरी । चूर चूर होय गई सो चूरी ॥ देखो जाय जैसी कुँभलानी । सुनि सुहाग रानी बेहँसानी ॥ ले सँग सबही पद्मिन नारी । आई जहाँ पद्मावत बारी ॥ आय रूप सबही जो देखा । सोन बरन होयरही सो रेखा ॥ दो० कुसुम फूल जस मखी, निरँगै देख सब अंग। चम्पावत भइ वारी, चूँब केश औ मंग ॥ सब रनवास बैठि चहुँ पासा । शशिमंडल जनु बैठ अकासा ॥ बोली सबहिं वारि कुँभलानी । करहु शिंगार देहु खड़वानी ॥ कमल कली कोमल रंगभीनी । अतिसुकुमार लङ्क की छीनी ॥ चांद जैसी धन बैठि गिरासी । सहस किरन होय सूर्य विकासी ॥ तेहिके भारै गहन अस गही । भइ निरंग मुखज्योति न रही ॥ दर्ब वार कुछ पुण्य करेहू । औ लै बर्र संन्यासहि देहू ॥ भरके थार नखत गजमोती । वरंती कीन्ह चांदकी ज्योती ॥ दो० कीन्ह अरगजा मखना, औ सुख दीन्ह नहान । पुनि भइ चांद जो चौदस, रूप गयो द्विप भान ॥ पटवैहि घेर आन सब छोरी । सारी कंचुकै पहिर पैंतोरी ॥ पहँदयीं और कैस्यौं रौती । बायरलै पिंडवाँही गुजराती ॥ चकवों चीर मखोनौ लीने । मोति लाग औ छापे सोने ॥ सुरंग चीर भल सिंहलदीपी । कीन्ह जो छापा धनवहछीपी ॥ पेमचौं डुरयाँ और बुँदेरी । श्यामँ सेतें पीरी औ हेरी ॥ हँसना १ पीली २ चेरंग ३-८ चाँद ४ शरबत ५ कमर पतली ६ किसके मुलाकात के लूकसे ७ दरवाज़ा ६ न्योछावर १० खुशबूदार उबटन ११ सूर्य १२ दारोगा तोशाखाना १३ अँगिया १४ रेशम १५ नाम कपड़ा १६- १७-१८-२०-२१-२२-२४-२५-२६ लाल १८ खूबसूरत २३ काला २४ सफ़ेद २५॥
१६० पद्मावत। सात रंग सो चित्रं चितेरे। भरके दीठं जाहिं नहिं हेरे॥ चन्दनोताँ जो खरदुकें भारी। बांसपूरै झिलमिलंकी सारी॥ दो० पुनि अभरणँ बहु काढ़ा, आनोभांति जुड़ाउ। फेरफेर सब पहिरहिं, जैस जैस मन भाउ॥ रतनसेन गये अपनी सभा। बैठे पाटैं जहां अठ खंभा॥ आयमिले चितौर के साथी। सबै विहँसके दीन्हा हाथी॥ राजांकर भल मानहु आई। जें हमकहँयह भूमि दिखाई॥ जो हम कहँ नहिं एतनरेसू। तब हम कहां कहां यहि देशू॥ धनि राजा तुइँ राज विशेखा। जेहिकीरजायसुसबकुछदेखा॥ भोग बिलास सभी कुछ पांवा। कहां जीभ तस अस्तुतिआवा॥ अब तुमआयअन्तरपटसाजा। दरशन कहँ न तपावहु राजा॥ दो० नयनें सेराने भूखगइ, देख दरश तुम आज। आजभयो अवतोरँ नव, औसव भे नये काज॥ हँसके राज रजायसुँ दीन्हा। मैं दरशन कारणें तप कीन्हा॥ अपनी योग लाग अस खेला। गुरुभा आप कीन्ह तुम चेला॥ अहकमोर बर्षारितु देखहु। गुरु चीन्ह के योग्य विशेपहु॥ जो तुम तपसाधा मोहिं लागी। अब जन हिये १६ होहु वैराँगी॥ जोजेहिं लाग सहै तप योगू। सो तेहिके सँग मानै भोगू॥ सोरह सहसँ पद्मिनी मांगी। सबै दीन्ह नहिं काहू खाँगी॥ सबके धौरहरं सोने साजा। सब अपने अपने घर राजा॥ दो० हस्तिं घोर औकापर, सबहि दीन्ह बड़ साज। तसवीर १ निगाह २ क़िस्म लहँगा ३-४ नाम कपड़ा ५-६ ज़ेवर ७ तख़्त ८ ज़मीन ६ राजा १० आंख ठंडी ११ नई पैदाइश १२ हुक्म १३ वास्ते १४ तथा रीना १५ दिल १६ दुखी १७ हज़ार १८ कमी १९ महल २० हाथी २१॥
भये गृहस्त सब लखपती, घरघर मानहु राज ॥ पद्मावत सब सखी बोलाई। चीर पटोरे हार पहिराई ॥ शीशं सबन के सेंदुर पूरा। शीश पूर सब मांग सिंदूरा ॥ चन्दन अगर चित्रसम भरी। नयन चार जानहुँ औतेरी ॥ जानु कमलसँग फूली कोई। औ सो चांद संगतंरई उई ॥ धन पद्मावत धनतोर नाहूँ। जेहि अभरण पहिरा सबकाहू॥ बारह अभरण सोरह शिंगारा। तोहिसोहेपियर्शोशमस्यारा ॥ शशि सुकलङ्की राहुहि पूजा। तुइनिकलङ्कनकोइसरं दूजा ॥ दो० काहूँ बीन गहा करै, काहूँ नाद मृदंग । सब दिन अनन्दबधावा, रहसकूद इकसंग ॥ पद्मावत कहि सुनहु सहेली। हौं सों कमलतुमकुमुदने बेली ॥ कलश मानिहौं तेहिदिनआई। पूजा चलो चढ़ावहिं जाई ॥ मँझै पद्मावतका जो विवानू। जनु परभाते उठे रतिभानू ॥ आस पास वाजत चौडोला। झाँझे मृदंगे झाँझ डफ ढोला ॥ एक संग सब सोंधी भरी। देव दुवारे उतर भईं खरी ॥ अपने हाथ देव अन्हवावा। कलशसहसें इकघूंटैभरवावा ॥ पोता मँडफ अगर औ चन्दन। देवभशअरगजै औ बिन्दन ॥ दो० कै प्रणाम आगे भई, विनयं कीन्ह बहुभांति । रानी कहा चलहु घर, सखी होत है राति ॥ भइनिशै धने जसशौशि परकैसी। राजेदेखिभूमि फिरबसी ॥ किस्म कपड़ा १ शिर २ तसवीर के बराबर ३ छोटे नखत ४-६ कोका- बेली ५-१२ खाविंद ७ ज़ेवर ८ चाँद ६-२७ बराबर १० हाथ ११ बीच १३ भोर १४ लाल सूर्य्य १५ नाम बाजा १६-१७-१८ सहेली १६ हज़ार २० घीव २१ खुशबू २२ दंडवत् २३ आजज़ी २४ रात २५ पद्मावत २६ रोशनी २८ ज़मीन २६ ॥
१६३ पद्मावत ! भइकटकैई शरद शशिआवा । फेर गगन रविचाही छावा ॥ मुनि धनै धनुष भौंहकरफेरी । काम कटाक्षै मकोरतैंहेरी ॥ जानैहुँ न कै बीच पै खाचों । पितासौं हों आज न बाचौं ॥ काल्ह न होय रहे सुख रामा । आज करों रावणसंग्रामा ॥ सैनै शिंगार मुहूँ है सजा । गजंगतचालअँचलगकधुजा ॥ नयनसमुद्र खड्ग नासिकों । सरबरे जूभको मोसोंजिता ॥ दो० हों रानी पद्मावती, मैं जीता सुख भोग । तू सरबेरे कर तासों, जसयोगी तोहि योग ॥ हौ असयोगि जान सब कोऊ । बीरैं श्रृंगार जिते मैं दोऊ ॥ वहँ तो हनूँ बीर घट माहीं । यहँतो कामकटकैं तुम्हपाहीं ॥ वहां तो हर्य चढ़के महि मंडों । यहां तो अधरं अमीरसखंडों ॥ वहां तो खड्ग नरन्दहि मारों । यहां तो बिरहतुम्हार सँहारों ॥ वहां तो गजैं पेलों होय केहेरै । यहां तो कुचै कामिनकरहेहर ॥ वहां तो लूटौं कटकैं खँडारू । यहां तो जीत तुम्हार शिंगारू ॥ वहां तो कुम्भस्थलें गजनाऊँ । यहां तो गजकलश हिकरलाऊँ ॥ दो० पड़ा बीच तब घर घर, प्रेमै राज के टेक । मानौ भोग छहू ऋतु, मिल दोनों होय एक ॥ खण्ड चौबीसवां छहऋतुबारहमास ॥ प्रथमै बसन्तनवलऋतु आई । सुऋतु चैत बैशाख सुहाई ॥ हुक्म १-आसमान पर सूर्य्य तथा कोठे पर जाना २ पद्मावंत ३ रामज़ा ४ कोर से देखना ५ भौंह चढ़ाके न बचोगे ६ क़सम ७ रावण की तरह लड़ो ८ फ़ौज ६-१७-२४ हाथी १०-२१ तलवार ११ नाक १२ बराबरी १३-१४ मैदान लड़ाई वा भोग १५ हनुमान् जी १६ घोड़ा १८ ज़मीन १६ होंठ २० शेर २२ औरत की छाती से काम २३ नाम हाथी २५ प्रेमने बीचबचाव कर दिया २६ पहिले २७ ॥
पद्मावत । १६३ चन्दन चीर पहिर धन अंगा। सेंदुर दीन्ह बेहँसि भरमंगा ॥ कुसुमहार औ परबलँबासू। मलयागिरि छिड़ैंका कैलासू ॥ सूर सेपेती फूलन दासी। धन औ कन्त मिले सुखबासी ॥ पियसँयोगैं धन यौवन बारी। भँवर पुहुपसँग करहिं धमारी ॥ होय फाग भल चाचर जोरी। बिरह जरायदिन्ह जसहोरी ॥ धनशशि सीत तपी पियसूरू। नखतशिंगार होंहिं सबचूरू ॥ दो० जेहि घर कंता ऋतुभली, आव बसन्ता नित्त । सुखभर आवहिं देवँहरे, दुःख न जाने कित्त ॥ ऋतु ग्रीष्म की तपननहिं तहां। जेठ असाढ़ कन्तघर जहां ॥ पहिरे सुरंग चीर धन झीना। परमलै मेदरहीं तन भीना ॥ पद्मावत तन सीरे सुबासा। नैहर राज कन्त घर पासा ॥ औ बड़ि जूड़ तहां सोनारों। अगर पोत सुखै नन्तउहारा ॥ सेते बिछावन सूर सेपेती । भोग बिलास कराहमुखसेती॥ अधर तँबोर कपूर भीउसैना। चन्दन चरच लाव नितबैना ॥ भा अनन्द सिंहल सब कहूँ। भागवन्त कहँ सुख ऋतुछहूँ ॥ दो० दाड़िम दाखें लेहिरस, बरसहिं आंब छुहार। हरिय रतन सोतों कर, जो अस चाखनहार ॥ ऋतुपावस बरसै पिव पावा। सावन भादौं अधिकै सुहावा ॥ पद्मावत चाहंत ऋतु पाई। गगनै सुहावनभूमि सुहाई ॥ कोकिल वैन पांत बर्गे छूटी। धनै निसरी जनु बीरबहूटी ॥ पद्मावत १-२७ खुशबूदार २-चन्दन ३ तोशक लिहाफ़ ४-१७ मुला- क़ात ५ फूल ६ चाँद ७ ठंडा ८-१३ गर्म ९ सूर्य १० महादेवजी ११ बहुत खुशबू १२ रात के रहने का मकान १४ फ़र्श १५ सफ़ेद १६ होंठ १८ अनार १६ अंगूर २० तोता २१ बरसात २२ बहुत २३ आसमान २४ ज़मीन २५ बगुला २६ ॥
१६४ पद्मावत । चमकबीजैं बरसै जल सोना । दादुरे मोरशब्दै मुठलोना ॥ रँगरातीपिय सँग निशँ जागी । गरजेगगनं चौंक कँठलागी ॥ शीतल बुन्द ऊँच चौपारा । हरियर सब देखै संसारा ॥ मलयसमीर वास सुखबासी । बेल फूल सेज सुख दासी ॥ हरियर भूमि कुसुम्भी चोला । औधनपियसँग रचो हिंडोला ॥ दो० पवन झकोरे हैं हरषै, लागै शीतल बास । धनजानी यहि पवनहै, पवनसो अपने पास॥ आयशरदऋतुअधिकैपियारी । नाउँकुवारकातिकउजियारी ॥ पद्मावत भइ पूनोकलों । चौदह चांद उई सिंहला ॥ सोरह किरण शृंगार बनावा । नखतभरामूर्य्यशशि पावा ॥ भा निर्मलै सब धर्ति अकासू । सेज सँवार कीन्ह बलदासू ॥ श्वेतैं बिछावन औ उजियारी । हँसहँस मिलहिंपुरुषऔनारी ॥ सोने फूलहिं पृथिवी फूली । पियधनसों धनपियसोंभूली ॥ नैंधै अंजनदैखंजनै देखावा । होय सारस जोरी रस पावा ॥ दो० यहिऋतु कन्थापासजेहि, सुखतिनके हियमांह । धन हँस लागी पियगले, धनगल पियकेबांह ॥ आयशिशिरऋतुतहां न सीऊ । अगहन पूष जहां घरपीऊ ॥ धनै औपियमहँखीवै सुहागा । दुहूँअंगें एकै मिललागा ॥ मनसों मन तनसों तन गहा । हियें सोंहिय बिचहारनरहा ॥ जानहुँ चन्दन लाग्यो अंगा । चन्दन रहे न पावै संगा ॥ भोगकरहिं सुख राजा रानी । वहँ लेखे सबसृष्टि जुड़ानी ॥ बिजुली १ मेढक २ आवाज़ ३ रात ४ आसमान ५ हवा ६ ज़मीन ७ १४ खुश ८ बहुत ६ पूर्णमासीका चाँद १० चाँद ११ साफ़ १२ सफ़ेद १३ आँख १५ ममोला १६ जाड़ेका मौसिम १७ पद्मावत १८ जाड़ा १६ वदन २० छाती २१ सारी दुनियां २२ ॥
पद्मावत । १६५ जूझैं दुहूँ यौबनें १ सों लागा । बिचहुतसीवैं जीव लै भागा ॥ दुइ घट मिल एकै है जाहीं । ऐसि मिलहिं तबहीं न अघाहिं ॥ दो० हंसा केल करहिं ज्यों, सरवर्रै, कँदनैहि दोउ । सेव पुकारे पारभा, जस चकवीक बिछोउ ॥ ऋतुहेमन्त सँग पियो पियाला । मानहुँ फागुन सुखसेवसाला ॥ सूर संपेती महँ दिन राती । दगल चीर पहिरहिं बहुभांती ॥ घरघर सिंहल है सुख भोजू । रहा न कंतहूँ दुखकर खोजू ॥ जहँ धनपुरुष शीतनहिंलागा । जानहुँ काग देख सर भागा॥ जाय इन्द्र सों कीन्ह पुकारा । हों पद्मावत देश निसारा ॥ यहि ऋतु सदा संग मैं सोवा । अब दरशनतें भरा बिछोवाँ ॥ अब हँसके शशि सूरहँ भेटा । अहाजो शीत बीचहुत मेटा ॥ दो० भयो इन्द्रकर आयसुं, पैरैसे हावहिं झइसोय । काहु काहुकी पीरभा, कोहि काहु की होय ॥ नागमती चितौर पँथहेरैं । पिययोगी पुनि कीन्हन फेरा॥ नागर नारि काहु बस परा । तैं बिमोहें मोसों चित हरा ॥ सुवा कालै होय लैगा पीव । पीव न जात जातपर जीव ॥ भयो नारायण बावन किरा । राज करत नलराजा छरा ॥ करणैं बान लीन्हों कै छंदू । भर्रथींहिं भयो झिलमिलीं नन्दू ॥ मानत भोग गोपिचँदैं भोगी । लैअपसेंवां जलंधर योगी ॥ लैकेकंथं भाकुररैं लोपी । कठिनबिछोह जियहिकिमिगोपी ॥ दो० सारस जोरी किमिहरी, मारगयो किन खांग ।
लड़ाई १ जवानी २ जाड़ा ३ तालाब ४ सुख से कलोल ५ तोशक लि- हाफ़ ६ अलग ७ चाँद ८ सूर्य ६ हुकुम १० तसवीर ११ राह देखना १२ मोह लेना १३ मौत १४ नाम राजा १५ नाम योगी १६-१८ दुख पाया १७ छिपना १६ खाविन्द २० कौआ २१ ॥
१६६ पद्मावत । झुरझुरमांजरधनेँ भई, विरहकी लागी आग ॥ पिय बियोगैं अस बावर जीव । पपिहा जस बोलै पिय पीव ॥ अधिकैं कामदधै सो कामा । हरिलै सुवागयो पिय नामा ॥ बिरहबाण तस लागनडोली । रक्तपसीज भीज तनचोली ॥ संगही हीरहार हिय वारी । हरहर प्राण तँजी अवनारी ॥ खनं इक आव पेटमहँश्वासा । खनहिजाय जिवहोयनिरासा॥ पवनडुलावहिंसींचहिंचोला । फिरकेनारि समुझमुखबोला ॥ प्रान पयानँ होत को राखा । कोयल औचातुकैँ मुखभाखा ॥ दो० आह जो मारी विरहकी, आग उठी तेहि हाग । हंस जो रहा शरीर महँ, पांख जरे तब भाग ॥ पाटँ महादेव हियेँ १० निहारू । समझजीव चितचेत सँभारू ॥ भँवर कमलसँग होय मिलावा। सँवरनेह मालति पुनिआवा ॥ जैसी पपीहा स्वातिहिंप्रीती । टेक प्यास बांधे जिय सेती ॥ धर्ती जैसी गगनैं सों नेहा । पलट फिरै वर्षाऋतु मेहा ॥ पुनिबसन्तऋतु आव नवेली। सुरससुमधुकेरें सारस वेली ॥ जन अस जीव करेसि तू बारी। वहतरुवरै पुनि उठहिं सँवारी ॥ दिनदशबिनजल सूखा कांसा। पुनि सोइ सरवर सोई हांसा ॥ दो० मिलहिं जो बिछुड़े साजन, कैकी भेंट कहन्त । तपन मिरगसर जिनिसहैं, ते अद्रापल हन्त ॥ चढ़ाअसाढ़गगनैं घनैं गाजा। साजा बिरह हुंददल बाजा ॥ धूम श्याम धौरी१६ घन धाये । श्वेतध्वजौं बँकँपांति दिखाये ॥
पाद-टिप्पणी (Footnotes at the bottom): नागमती १ दुख २ बहुत ३ जलना ४ छोड़ना ५ पल ६ कूच ७ पपीहा ८ तख़्त ६ दिल १० आसमान . ११-१४ भँवर १२ पेड़ १३ बादल १५ भूरी काली सफ़ेद १६ सफ़ेद पताका १७ बगुला १८ ॥
पद्मावत । १६७ खङ्ग बीजु चमकै चहुँ ओरा । बुन्दबान बरसहिं घन घोरा ॥ उनई घटा आय चहुँ फेरी । कंत उबार मदन हौं घेरी ॥ दादुर मोर कोकिला पीउ । गिरहि बीज घट रहै न जीउ ॥ पुष्य नक्षत्र शिर ऊपर आवा । हौं बिननाहँ मँदिर को छावा ॥ अद्रा लाग बीज भुइँ लेई । मो पिय बिन को आदर देई ॥ दो० जेहिं घर कंता ते सुखी, तेहि गारू तेहिं गर्व । कन्त पियारे बाहरे, हम सुख भूला सर्व ॥ सावन बरस मेह अवानी । मरन परीहौं विरह झुरानी ॥ लाग पुनरबसु पीउ न देखा । भइबावर कहँ कन्त सरेखाँ ॥ रक्त की आंसुपरहिं भुइँ टूटी । रंग चलीं जनु बीरबहूटी ॥ सखिन रचा पियसंग हिंडोला । हरियर भूमि कुसुम्भी चोला ॥ हिये हिंडोल जस डोलै मोरा । विरह झुलावै देइ झकोरा ॥ बाँटे असूझ अथाह गँभीरी । जिव बावरभा फिरै भँभीरी ॥ जगजल बूड जहाँ लग ताकी । मोरनाव खेवकै बिन थाकी ॥ दो० पर्वत समुद्र अगम वन, औ बीहड़ घन ढाँख । किमकर भेंटूं कन्त तुम, नामो पांव न पंख ॥ भरिभादौं दुपहर अति भारी । कैसें भरौं रयनि अँधियारी ॥ मँदिरसून पिय अन्तहि बसा । सेज नागभइ दहिदहि डंसा ॥ रहौं अकेल गहैं इक पाटी । नयन पसार मरौं हियफाटी ॥ चमकबीज घन गरजत त्राशा । विरहकालहोय जीवनिराशा ॥ बरसै मघौ झकोर झकोरी । मोरदुइनयन चुवैं ज्यों ओरी ॥ तलवार १ बिजली २ कामदेव ३ मेढक ४ ख़ाविन्द ५ गरूर ६ तुला- हुआ ७ होशियार ८ लोहू ६ ज़मीन १० दिल ११ राह १२ गहरी १३ मल्लाह १४ नामनखत १५ ॥
१६८ पद्मावत । धने सूखै भर भादों माहां । अबहुँन आयन सींचेसिनाहां ॥ पुरबा लाग भूमि जल पूरी । आँक जवास भईहौं झूरी ॥ दो० जलथल भरे अपूरसब, धर्ति गगन मिल एक । धन यौबन अवगाहँ महँ, वय बूड़ी पिय टेक ॥ लाग कुँवार नीर जस घटा । अबहुँ आवरे प्रीतम लुटा ॥ तुहि देखों पिय पलुहेकर्या । उतरा चीतं बहुतकर मयों ॥ उये अगस्त हस्तै तन गाजा । तुरी पलान चढ़े रण राजा ॥ चित्रा मीत मीन घर आवा । कोकिल पीव पुकारत पावा ॥ स्वाति बूँद चातृकें मुखपरी । सीप समुद्र मोति बहुभरी ॥ सरवर सँवरि हंस चलिआये । सारस कुरलैं खंजन दिखाये ॥ भई निराश कास वन फूले । कन्त न फिरे विदेशहि भूले ॥ दो० बिरहहस्ति तन शाँलै, घाय करै नितचूर । आय बचाओ वेगें पिय, गाजहुहोय सँदूर ॥ सिंह कातिक शरदचन्द उजियारा । जगशीतल मोविरहिनजारा॥ चौदह किरण चन्द परकाशैं । जनहु जरै सबधर्ति अकांशू ॥ तन मन सेज करै इक दाँहू । सबकहँ चन्दभयो मोहिंराहू ॥ चहुँ खण्ड लागै अँधियारा । जो घर नाहीं कन्त पियारा ॥ अबहुँ निठुर आव यहिब़ारा । पर्व देवारी हो संसारा ॥ संगझुमकगावाहिं अँग मोरी । हों झुरवों बिछुरी जेहिजोरी ॥ जेहिघर पियसोमनोरथ पूजा । मोकहँ बिरह सौतदुखदूजा ॥ दो० सखि मानैं त्योहार सब, गाय देवारी खेल । औरत तथा नागमती १ खाविन्द २ नामनखत ३-१०-१२-१३-१५ ज़मीन ४ आसमान ५ गहिरा ६ पानी ७ लौटके ८ बदन हरा होजाय ६ मेहेरवानी ११ घोड़ा १४ मछली १६ पपीहा १७ तालाव १८ ममोला १६ हाथी २० छेदना २१ जल्द २२ शेर २३ रोशन २४ जलाना २५ कामना २६॥
पद्मावत | १६६ हौं का खेलौं कन्त बिन, रही छारै शिर मेल ॥ अगहन दिवस घटा निश बाढ़ी। दुपहर रयनि जाय किमि गाढ़ी॥ अब धन दिवस बिरह भारराती। जरों बिरह जस दीपक बाती ॥ कांपा हियों जनावा सीव। तौ पै जाय होय सँग पीव ॥ घर घर चीर रचे सब काहू। मोर रूप सब लैगा नाहूँ ॥ पलट न बहुरा गा जो बिछोई । अबहूँ फिरै फिरै रँग सोई ॥ बज्रांगिन बिरहिन हिय जारा। सुलग सुलग दग्धै भइ छारा ॥ यह दुख दग्ध न जानै कन्तू । यौवन जन्म करै भसमन्तू ॥ दो० पियसों कहो सँदेशरा, ये भँवरा ये काग। सो धन बिरहिन जर गई, तेहि क धुवां हम लाग ॥ पूष जाड़ थर थर तन कांपा । सूर्य जुड़ाय लंक दिशि तापा ॥ विरह बाढ़भा दारुनै सीव। कँप कँप मरों लेइ हर जीव ॥ कन्त कहां हो लागों हियरे। पन्थ अपार सूझ नहिं नियरे ॥ सौरैं सेती आवै जूड़ी। जानहु सेज हिमंचलै बूड़ी ॥ चकई निश बिछुड़े दिन मिला। हौं दिन रात बिरह कोकिला॥ रयनि अकेल साथ नहिं सखी। कैसे जिये बिछोही पखी ॥ विरह सजान भयो तन जाड़ा। जियत खाय औ मुयेहिन छांड़ा॥ दो० रक्त ढुरा माँसू गिरा, हाड़ भये सब शंख । धने सारस होइ रुरुमुई, आय समेटहिं पंख ॥ लाग्यो माघ परै अति पाला। बिरहा काल भयो जड़काला॥ पहल पहल तन रुई जो झांपों। अहिल अहिल अधिको हिय कंपों ॥ १-६ दिन २ रात ३-४ दिल ५-१८ जाड़ा ६ खाविन्द ७ जलाना ८ उत्तर तरफ १० टेढ़ा ११ छाती १२ राह १३ तोशक लिहाफ़ १४ पालाकी तरह १५ तथा नागमती १६ बहुत १७ ॥
१७० पद्मावत । आय सूरै है तपरे नाहां। तुहि बिन जाड़ न छूटे माहा॥ यही माह उपजी रस मूलू। तो सुभवँर मोर यौवन फूलू॥ नयनचुवहिं जस महवट नीरूँ। तेहिविन आग लागि शिरचीरूँ॥ टपटप बूंद परहिं जनु ओला। विरहपवन है मारै झोला॥ केहिक शिंगार को पहिर पटोरौँ। ग्रीवं न हार रहे है डोरा॥ दो० तुम बिन कन्त धन हरवी, तृणँ तृणवर झा डोलै। तेहि पर बिरह जराय के, चहै उड़ावा झोल॥ फागुन पवन झकोरे महा। चौगुन सीवँ जायनहिंसहा॥ तन जस पियर पात भा मोरा। तेहि पर विरह देइ झकझोरा॥ तरवर झरहिं फरहिं बनदांखा। भई उपन्तँ फूल फलशाखा॥ करहिं बनाफंते कीन्ह हुलासू। मोकहँ जगभा दून उदासू॥ फाग करहिं सब चांचर जोरी। मोतन लाय दीन्ह जस होरी॥ जो पै पिये जरत अस भावा। जरत मरत मोहिं रोस न आवा॥ रात दिवसँ निरभै जिय मोरें। लग्यो निहोरै कन्त जो तोरें॥ दो० यह तन जारों छौर कै, कहों कि पवन उड़ाव। मगँ तेहि मार्गै है परै, कन्त धरै जहाँ पांव॥ चैत वसन्ता होय धमारी। मो लेखे संसार उजारी॥ पंचम बिरह पनव शरैं मारी। रक्त रोय सगरे वन ढारी॥ बूडउठे सब तरवरैं पाता। भीज मँजीठ टेसु बनरातौँ॥ बौरे अम्ब फरे अब लागी। अबहुँ सँवरि घर आव सभागी॥ सहँसै भाव फूली बनपती। मधुकरैं फिरैं सँवरि मालती॥ सूर्य्य १ खाविन्द २ पानी ३ कपड़ा ४ जोड़ा ५ गरदन ६ हलकी तिनका से ७ जाड़ा ८ पेड़ ६-११ पैदा १० दिन १२ तथा न्योछावर हौं १३ राख १४ शायद १५ राह १६ तीर खींच के १७ पेड़ १८ लाख १६ लाल २० हज़ार २१ भँवर २२॥
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पद्मावत। १७१ मोकहँ फूल भये सब कांटे। दृष्टिहेरी जनु लागहिं चांटे ॥ भर यौवन भइ नारँग शाखा। सो अब बिरह तातहैं बाखा ॥ ॥ दो० चरन परेवा आव जस, आय परो पिय टूट। री नारि पराये हाथ है, तुम बिन पांवन छूट॥ भा बैशाख तपन अति लागी। चोला चीर चँदन भा आगी॥ सूरज जरत हिमंचल ताका। बिरहबिजागि सौंहैं रथहांका॥ जरत बचासि होय पियडाहां। आय बुझाव अँग़ारहिंमाहां॥ तोहि दरशनहै शीतल नारी। आय आग सो कर फुलवारी॥ लागे जरै नरै जस भारू। फिरिफिरिभूजेसितज्योंनबारूँ ॥ सरवर्र हियाँ घटत नित जाई। तरक तरक है है भर आई ॥ बेहिरतहियों करहु पिय टेकों। दृष्टि मयाकरमिलवेहु एका ॥ दो० कमलजोविकसंतमानसरे, बिनजलगयो सुखाय। अबहुँ बेलफिर पल्हवै, जो पिय सींचहु आय॥ जेठंजरों जग सुनहि लुवारा। उठहिं बौंडरा परहिं अँङ्गारा ॥ बिरह गाजैं हनुमत हैं जागा। लंका दाँह करै तनलाँगा ॥ चारो पवन झकोरैं आगी। लंका दाह प्रलंका लागी ॥ दह भइश्याम नदी कालिँन्दी। बिरहकी आँग कठिन असमुन्दी॥ उठै आग औ आवै आँधी। नयन न सूझै मरौं दुखबाँधी॥ अधजर भई मांस तन सूखा। लाग्यो बिरह काल है भूखा ॥ मांस खाय अब हाड़हि लागा। अबहुँआव आवत सुनिभागा॥ दो० गिरिसमुद्र शँशिमेघरवि, सहि न सकै यह आग ।
पाद-टिप्पणी (Footnotes): १ चींटी १ जवानी २ कबूतर ३ भारी ४ सामने ५ ठंडा ६ दरवाज़ा ७ तालाब ८ दिल ६ छाती फटना १० मदद ११ निगाह १२ खिलना १३ बि- जुली १४ जलाना १५ यमुना १६ चाँद १७ सूर्य १८॥
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१७२ पद्मावत । मुहम्मद सती सराही, जरै जो अस पिय लाग । तपै लाग अब जेठ असाढ़ी । भइमोकहँ यहिछाजनें गाढ़ी ॥ तृण तृणैं बर भा झूरों खरी । भा वर्षा दुख आगर जरी ॥ बंध नाहिं औ खण्ड न कोई । नागें न आव कहौं कहि रोई ॥ सांठे नांठलग बात को पूँछा । बिनजिय फिरै मूँजतन हूँछा ॥ भई हुँहेली टेक बहूनी । थांभ नाहिं उठ सके न थूनी ॥ बरषहिं मेह चुवहिं नयनाहा । छपर छपर होई बिन नाहा ॥ कोरो कहां ठाठ नव साजा । तुमबिनकंतनछाजन छाजा ॥ दो० अबहूँ दृष्टि मयाँ कर, नाथ निठुर घरआव । मँदिर उजाड़ होत है, नवके आय बसाव ॥ रोय गँवाई बारह मासा । संहसे सहसदुखइकइकश्वासा ॥ तिल तिल बरषबरषपर जाई । पहरपहर युग युगन संरोई ॥ सौंहे आव पिय रूप मुरारी । जासों पाव सुहाग सुनारी ॥ सांझ भई झुरझुरपंथै हेरी । कौन सो घरी करी पिय फेरी ॥ दहि कुइला भइकन्तसनेहा । तोला मांस रहा नहिं देहा ॥ रक्त न रहा बिरह तन गिरा । रती रती है नयनहिं ढुग ॥ पांय लगी जोरै धनै हाथा । जोरा नेह जोराये नाथा ॥ दो० बरस दिवसैं धनरोय के, हारपरी चित झंख । मानुष घर घर बूझिके, पूँछी निसरी पंखि ॥ भई पुंछाैर लीन्ह वन बासू । बैरिनसौत दीन्ह चिलवासूं ॥ हौं खोरि वान बिरहतन लागा । जो अबहूँ आवै घर कागा ॥ छावना १ तिनका के बराबर २ पत्ती ३ रुपया पास नहीं ४ दुबली ५ बेसहारा ६ खाविन्द ७ छावनी ८ निगाह ९ मेहरबानी १० हज़ार ११ मालूम होना १२ सामने १३ राह १४ जलना १५ नागमती १६ दिन १७ जानवरपरिरन्द १८ मोर १९ चिल्लाना २० तिनका २१ ॥
पद्मावत। हारिलै भई पंथ मैं सेवा। अब तुहि पठवों कौन प... धौरी पांडुकै कहि पियठाऊँ। जो चितरोखै न दूसरना... जाय बिवाही पिय कंठलुवा। करै मिलाव सोई गौरवा ॥ कोकिलै भई पुकारत रही। महरं पुकार लीन्ह लै दही ॥ पेड़तिलोरी औ जलहंसो। हिरदैं बैठि बिरहलगनंसा ॥ दो० जेहि पंखी के नेर होय, कहै बिरहकी बात। सोई पंख जर तरवरै, जाय होय नहिं पात ॥ कुहुककुहुक जस कोयल रोई। रक्त आंश घुँघची बन बोई ॥ भइकर मुखी नयन तन रँती। को सिराव बिरहाडख तौती ॥ जहँ जहँ ठाढ़ होय बनवासी। तहँतहँहोइघुँघचिन्हकीरासी ॥ बूँद बूँद महँ जानौ जीव। गूँजागूँज करहिं पिय पीव ॥ तेहि दुखभई पलास निपाती। लोहू बूड़ उठी होय रँती ॥ राती बिम्बै भये तेहि लोहूँ। परवर पाक फटे हिये गोहूँ ॥ देखों जहां सोइ है राता। जहँ सो रतन कहै को बाता ॥ दो० नापावर्स वह देशरा, नहिं हेवन्त न बसन्त। ना कोकिल न पपीहरा, जेहिसुनिआवेंकन्त ॥ फिरिफिरि रोयकोई नहिंडोला। आधीरात बिहंगमं बोला ॥ तुइफिरफिरदाँहे सब पांखी। केहिगुन रैयनि न लावेसिआंखी॥ नागमती केहि कारनै रोई। कासों कहूँ जो कन्त बिछोई ॥ मन चित हिये न उतरै भोरे। नयन कजल चपै रहे न मोरे ॥ कोइनजाय तेहि सिंहलदीपा। जेहिसेवाव कह नयनासीपा ॥
- नामचिड़िया १-३-४-५ जानवर परिन्द २ गले लगाया ६ तथा मर्द ७ नामचिड़ियां ८-६-१०-११-२० दिल १२ पेड़ १३ लालआँख १४ जलीहुई १५ लाल १६ कुंदरू १७ छाती १८ बरसात १६ जलाना२१ रात २२. वास्ते २३ अलग २४ आँख २५ ॥
१७४ पद्मावत । योगी होय निसरा सो नाँहूँ । तबहुन कहा सँदेशन काहूँ ॥ नित पूँछौं सब योगी जंगम । कहै न कोइ निजवात विहंगम ॥ दो० चांखो चक्र उजारभये, सकल सँदेशा टेक । कहौं बिरह दुख आपन, बैठसुनहु दँड एक ॥ तासों दुख कहिये हों वीरा । जेहि सुनके लागै परपीरा ॥ कोहोय भिमै दिनको लै रहा । को सिंहलं पहुँचावै चहा ॥ जहां सो कन्त गयेहोय योगी । हों किंगरी भई झूर वियोगी ॥ वह सुनके पूरी करु भेटाँ । हों भई भस्म न आय समेटा ॥ कथा जो कहै आय पियकेरी । पाँवर्र होहुँ जन्म भर चेरी ॥ वहके गुन सँवरत भई माला । अबहुँ न बहुरा उड़गा छाला ॥ बिरह गुरुइ खप्पर के हियों । पवन अधार रहै सो जिया ॥ दो० हाड़भई झुर किंगरी, नसैं भई सब तांति । रोमरोम तन धुनउठै, कहो विथा तेहिभांति ॥ पद्मावत सों कयो विहंगम । कन्त लुभाय रहे जेहि संगम ॥ तूँ घर घरर्न भई पिउ हरता । मोतन जप दीन्हीं औ बरता ॥ रावन कनकें सो तोकहँ भयो । रावेंटे लङ्क मोहिं कै कियो ॥ तोकहँ चैन सुख मिलै शरीरा । मोकहँ हिये द्वंद दुख पीरा ॥ हमहूँ व्याह तोर सँग पीऊ । आपहिपाय जान पर जीऊँ ॥ अबहूँ कर माया जिव फेरो । मोहिं जियाव देहु पिय मेरो ॥ मोहिं भोगसों काज न प्यारी । सौंह दृष्टि १३ की चाहनहारी ॥ दो० सौत न होस तू बैरिन, मोरकन्त जेहि हाथ। आनिभिलाव एकबेरकैसे, तोरपांय मोरमाथ ॥ खाविन्द १ चारोंतरफ़ २ नामपहलवान ३ दुखी ४ मुलाक़ातकर ५ जूती ६ दिल ७ नामचिड़िया ८ घरवाली ६ सोना १० राख ११ अपना पैर जानके मेरी ज़िन्दगी चाह १२ सीधी निगाह १३ ॥
पद्मावत। १७५ रतनसेन की मा सरस्वती। गोपिचन्द जस मैनावती ॥ अँधरी बूढ़ी सुठि दुख रोवा। यौवनै रतन कहां होय खोवा ॥ यौवनै अहा लीन्ह सो काढी। भइ बिन टेकें करै को ठाढी ॥ बिन यौबन भइ आश पराई। कहां सुपूत खम्भ होय आई ॥ नयन दृष्टि नहिं दिया बराहीं। घर अँधियार पूत जो नाहीं ॥ कोरी चला श्रवण की ठाउँ। टेक देह वह टेकों पाउँ ॥ तुम श्रवण द्वै काँवर सजी। डार लाय सो काहे वर्जी ॥ दो० श्रवण श्रवणके रुसई, माता काँवर लाग। तुम बिन पानि न पावै, दशरथ लावै आग॥ लै सुसंदेश विहंगम चला। उठी आग सगरी सिंहला ॥ बिरह विजारग बीज को ठेगा। धूमें सो उठी श्यामै भये मेघा ॥ भरिगा गगन लूक तस छूटी। ह्वै सो नखत गिरहिं भुइँ टूटी ॥ जहाँ जहाँ भूमि जरी भा रेहू। विरहकि दग्धै भई जनु खेहू ॥ राहु केत जस लंका जरी। औ उड़ चिनग चांदमहँ परी ॥ जाय विहंगम समुद्र डफारौ। जरे मच्छ पानी भा खारा ॥ दौंढ़ी बन बीहड़ जल सीपा। जाय नेरभा सिंहल दीपा ॥ दो० समुद्र तीर इक तरवर, जाय बैठ तेहि रुख। जबलग कहि न सँदेशा, तबलग प्यास न भूख॥ रतनसेन वन करत अहेरा। कीन्ह वही तरवर तरि फेरा ॥ शीतल वृक्ष समुद्र के तीरा। अति उतंग औ छांह गंभीरा ॥ १ जवानी १-२ बेसहारे ३ निगाह ४ नाम ब्राह्मण जो अंधी अन्धा मा बाप को काँवर में लिये रहताथा ५ छोड़ना ६ राजा दशरथ ७ नाम चिड़िया ८-१६ जहाँ विरहकी विजुली वहाँ विजुली क्या दुश्मनी करै ६ धुवाँ १० काला ११ आसमान १२ ज़मीन १३ जलना १४ राख १५ चिनगाना १७ जलाना १८ पेड़ १६ शिकार २० ऊँचा २१॥
१७६ पद्मावत । तुरी बांधिके बैठि अकेला । साथी और करहिं सब केला ॥ देखत फिरै सो तरवर शाखा । लाग सुनै पंखिनकी भाखा ॥ पंखिनमहँ जो बिहंगम अहा । नागमती जासों दुख कहा ॥ पूँछहिं सबै बिहंगम नामा । अहो मीत काहे तुम श्यामा ॥ कहेसि मीत मासिकदुई भये । जम्बूद्वीप तहां हम गये ॥ दो० नगर एक हम देखा, गढ़ चितोर वह नाउँ । सो दुखकहूँ कहांलग, हम दाँढ़े तेहि ठाउँ ॥ योगी है निसरा सो राजा । सूननगरजानहु धुन्दैवाजा ॥ नागमती है ताकर रानी । जरै विरह जस कोयल वानी ॥ अबलग जरभइ होयहै छाराँ । कही न जाय विरहकी झाराँ ॥ हियों फाट वह जबहीं कुहके । परै आंशु सब होय होयलूके ॥ चहूँखण्ड छिटकी वह आगी । धर्ती जरत गगनेकहँ लागी ॥ विरह दवानैं को जरतबुझावा । चहूँ लाग सोहेरें धावा ॥ हौं पुनि तहां सो दाढ़े लागा । तनभा श्याम जीव लैभागा ॥ दो० कातुम हँसो गर्व के, करहु समुद्रमहँ केल । मतिअन्हबिरहीवशपरहिं, दहिअंगिनजलमेल॥ सुनि चितोर राजैं मन गुना । बिधि संदेश मैं कासों सुना ॥ को तरवरेँ पर पंखी बेशा । नागमती कर कहै संदेसा ॥ को तुम मीत मन चेतबसेरू । देव कि दानव पवन पखेरू ॥ रुदै ब्रह्म शिव बाचा तोहीं । सो निजवातअन्त कहुमोहीं ॥ कहो सो नागमती तुइ देखी । कहेसिबिरहजस मरोंविशेखी ॥ घोड़ा १ नामचिड़िया २ दोस्त ३ दोमहीना ४ जलना ५ जगह ६ अंधियारा ७ राख ८ लूक ९ छाती १० आसमान ११ आग १२ रारूर १३ पेड़ १४ महादेवजी १५ ॥
पद्मावत १७७ हौं राजा सोई ओ योगी। जेहिकारण वह ऐसो वियोगी ॥ जस तू पंखी^१ हौं दिन भरौं। चाहों कबहिं जाय उड़ परौं ॥ दो० पलक आंख तेहिमारेगैं^२, लागीडुनहुरहाहिं । कोउ न सँदेशी आवहिं, तेहिक सँदेश कहाहिं ॥ पूँछहि कहा सँदेश वियोगू^३। योगी भया न जानहि भोगू ॥ धर्नी संग न संगे पूरे। पानी बूड रात दिन झूरे ॥ तेल बैल जस बायें फिरे। परै भँवर महँ सौहें^४ न टरे ॥ तुरी^५ नाउँ दाहिन रथ हांका। बायें फिरै कुम्हार का चाका ॥ तुहिअस नाहिं जो पंख भुलाना। उड़ै सो आव जगतमहँ जाना॥ एक दीप का आयों तोरे। सब संसार पांयतर मोरे ॥ दहने फिरै सो अस उजियारा। जस जग चांद सूर्य्य औ तारा ॥ दो० मुहसँदबायेंदिशँ^६ तजी, एकश्रवणैं^७ इकआंख। जबते दाहिन होय मिला, बोल पपीहा पांख ॥ हौं ध्रुव अंचल सो दाहिनलावा। फिर सुमेरुँ^६ चितोरगढ़ आवा॥ देखों तोरे मँदिर घमोई। मात तोर आंधर भई रोई ॥ जस श्रवणैं बिन अन्धी अन्धा। तस रुरुमुई तोहिं चितबन्धा ॥ कहेसि मरों को कांवर लेइ। पूत नाहिं पानी को देइ ॥ गई प्यास लाग तुहि साथा। पानी देह दशरथ के हाथा ॥ पानी न पिये आग पै चाहा। तोहिअस पूत जन्म अस लाहा॥ भागीरथी^१२ होहु कर फेरा। जाय सँवारि मरन की बेरा ॥ दो० तू सपूत मन ताकर, अस परदेश न लेहि। अबताईं मुइ होयही, मुयहिं जाय कत देहिं॥
- दुखी १ जानवरपरिन्द २ राह ३ दुख ४ सामने ५ घोड़ा ६ तरफ़ ७ कान ८ नामसितारा ६ पहाड़ १० नाम-मातापिताभक्त ११ गंगाज़ी १२ ॥