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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

२१० पद्मावत । जस सेवंती गुलाल चमेली । तैसि एकजन वहू अकेली ॥ दो० अब सुदरशनें गूजा, तब सतें वरगै योग । मिला भँवर नागेसरसेते, वही देहि सुखभोग ॥ सुनि पद्मावत रिस न सँभारी । सखिनसाथ आई फुलवारी ॥ दोउ सौत मिल पाटें जो बैठी । हियविरोधे मुख बातें मीठी ॥ बारीहँटि सो रँग सो आई । पद्मावत हँस बात चलाई ॥ बारी सुफल अहै तुम रानी । है लाई पै लाय न जानी ॥ नागेसर औ मालति जहां । सुगन्धराव नहिं चाही तहां ॥ रहा जो मधुकर कमल पिरीता । लाग्यो जाय करीलकी रीता ॥ जहँ इमली बांकी हियँ माहाँ । तहँ न भाव नारँगकीछाहाँ ॥ दो० फलहि फूलके फरजहां, देखहु मनहिं विचार । अम्ब लाग जेहि बारी, चम्प लाग तेहिबार ॥ अनतुम कही नीक यह शोभा । पै फलसोई भँवर जेहिलोभा ॥ श्यामै जाम्ब कस्तूरी चोवा । अम्बजोऊँच हृदय तेहिरोवा ॥ तेहिगुन असभइ जाम्बनेवारी । लाई आन मांझ केवारी ॥ जल बाढै वहिया जो आई । है वांकी इमली शिर नाई ॥ तु कस पराई बारी दोखी । तैंजे पानि धावहु मुख सूखी ॥ उठै आग दोउ डार अभैरा । कौन साथ तुहिं वैरी केरा ॥ जों देखी नागेसर बारी । लाग मरी अब सूगाँसारी ॥ दो० जो सरवरै जल बाढ़े, रहै सो अपनी ठाउँ । तथा नागमती वा राजा १ तथा पद्मावत २ तख्त ३ दुश्मनी ४ फुल- वारी खुशरंग देख ५ भँवर कमलका आशिक़ ६ दिल ७-६ कालीजामुन ८ मुश्क ८ जो मैं जवाबदौं तौ पानी छोड़दो और मुँह सूखजाय १० जो मेरे बागको नागेसर देखे ११ तोता मैना १२ तालाब १३ ॥

तजें नागेसर को वहि, जाउँ न तुहिं अँबराउँ ॥ तेहि अँबराउँ लीन्हकाजूरी। काहे भई नींब मुख मूरी॥ भई बेर कित कुटिल कटीली। तेंदू कीन्ह चाह बकसीली ॥ नारँगदारिख न तुम्हरी बारी। देखमराहिं जेहि सूगाँसारी ॥ औ न सदाफर तुरँज जँभीरा। कटहर बड़हर लौका खीरा ॥ कमल के हिरदय रोवां केसर। तोहू न सर पूजी नागेसर ॥ जहँकटहरकोउ बरहिं न पूँछी। बड़ पीपर का बोलहि छूछी॥ जो फल देखी सोई फीका। ताकर काह सरौहे नीका ॥ दो० रहु तू अपनी बारी, मोसों जूझ न बारू। मालतिउपमन पूँजी, पुनि करखोजाखाज॥ जो कटहर बड़हर बड़बेरी। तोहिअसनाहिंजोकोकाबेरी ॥ श्यामजानमोर तुरँगजँभीरा। कडुइ नींब तू छाँह गँभीरा ॥ नरियर दारिखें बिही कहँ राखौं। गलगलजाउँसौतैं नहिंभाखों॥ तोरें कहे होय मोर काहा। फरे वृक्ष कोउ ढेल न बाहा ॥ वै सदाफर सो नित फरै। दाँड़िम देख फाटहिर्यै मरै ॥ जाफर लौंग सुपारि छुहारा। मिर्च होय जो सहै न पारा ॥ हौं सुपान रंग पूजन कोई। बिरह जो जरे चून जस होई ॥ दो० लाजहि बूड़ मरेसि नहिं, ऊभे उठावसबाँह । हौं रानी पिय राजा, तो कहँ योगी नाँह ॥ हौं पद्मिनी मानसरे कँवों। भँवर मराले करहिंमोरसेवा ॥

नागेसर छोड़ तेरेबाग न जाऊँ १ बाग २ मुक़ाबिले ३ नींव ऐसी कडुवी ४ बैंगन जंगली से बेर कांटादार अच्छाहोगा ५ अंगूर ६ तोता मैना ७ दिल ८ बराबर ६ कटहर वलंद १० तारीफ़ ११ बराबर १२ अंगूर इसी वास्ते रक्खा है १३ सौतका मुँह से नाम न लों १४अनार १५छाती १६ खाविंद के बिरह में जलके चूना हुई १७ वलन्द १८ खाविन्द १६ नाम तालाव २० कमल २१ हंस २२ ॥

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२१२ पद्मावत। पूजा योग दई हौं गढ़ी। मन महेशके माथे चढ़ी ॥ जानी जगत कमल की करी। तोहि असनहिंनागिनविषभरी ॥ तुइँ सब लिये जगतके नागा। कोयल वेष न छांडेसिकागा ॥ तू भुजैल हौं हंसकी जोरी। मोहिंतोहिंमोतिपोतकीचोरी ॥ कंचनकली रतन नग बिना। जहांपदार्थसोहनहिं पनाँ ॥ तुइँतोराहुहौं शँशि उजियारी। दिनहिनपूँजीनिशिंअँधियारी ॥ दो० ठाढ़ होसि जेहिठाईं, मँसिलागै तेहि ठाउँ। तेहि डर रांध न बैठों, जनु साँवरहोयजाउँ ॥ कमल सो कौन सुपौरी रोठा। जेहिके हिये सहसदश कोठा॥ रही न झापै आपन गठा। सखंति उघेल चहै परगटा ॥ कमलपत्र दोँड़िम तोर चोली। देखोसि मूर देश है खोली ॥ ऊपर रातौ भीतर पियरा। जौंरौँ वही हरद अस हियरा ॥ यहां भँवर सुखवातहि लावसि। वहां मूर्य कहँ हँसहँसलावसि ॥ सबनिशितपतपमरेसिपियासी। भोर भये पावसि पिय बासी ॥ सेजवा रोय रोय निशिँ भरसी। तू मोसों का सरवरि करसी ॥ दो० सूर्य्यकिरन तेहि रौँवी, सरवरि लहर न पूज। सँचर यहां तोह पावै, धूप देह तोर भूज ॥ मैंहौं कमल सूर्य्य की जोरी। जोपिय आपन तेहिकाचोरी ॥ हौं वह आपन दरपन लेखों। करों शृंगार भोर मुख देखों ॥ मोर विकांसं बहक परकाशू। तुइँजरमरेसि निहारअकाशू ॥ सोने की अँगूठी १ लाल २ पन्ना ३ चाँद ४ बराबर ५ रात ६ सियाही ७ सुपारी सख्त के सामने कमल की क्या हक़ीक़त ८ कमल अपना गट्टा नहीं छिपासक्का ६ सखती उघेरडालो तब ज़ाहिर हो १० अनार ११ सूर्य्य १२ लाल १३ हल्दी की तरह जलाता हूं १४ रात १५ बराबर १६-१७-१८ सूर्य्य से जल १६ खिलना २० ॥

[Page Header] पद्मावत । २१३

हौं वह सों वह मोसों राताँ । तिमिरैं बिलाय होत परभाताँ ॥ कमल के हिरदर्ये महँ जोगटा । हरियरै हार कीन्ह का घटा ॥ जाकर दिवसँ तेही पै आवा । कार रयैनि कित देखै पावा ॥ तुइउडुम्बर जेहि भीतर माँखी । चाहहिं उठहिं मरनकी पाँखी ॥ दो० धूप न देखी बिषभरी, अमृत सो सर पाव । जेहि नागिन डस सोमरे, लहर सूर्य्यकी आव ॥ फूलहिं कमल भानु के उये । पानी मैल होय जड़ छुये ॥ फिरहिं भँवर जिम तो नयनाहाँ । नील बिषायँध सब तो पाहाँ ॥ मच्छ कच्छ दादुर तोहिं आंसा । बकें औ पंख बसहिं तोहिं पासा ॥ जे जे पंख बास तोहिं लये । पानी महँ सो बिषायँध भये ॥ जो उजियार चांद होय उई । बदनैं कलंक डोम लै छुई ॥ औ मोहिं तोहिं निशिँ दिनकर बीचू । राहुके हाथ चांद की मीचूँ ॥ सहसँ बार जो धोवै कोई । तौहू बिषायँध जाय न धोई ॥ दो० काह कहूं वह पियसों, मोहिं शिर धरेसि अँगार । तेहि के खेल भरोसें, तू जीती मैं हार ॥ तोर अकेल का जीत्यौं हारू । मैं जीता जग केर शँगारू ॥ बदन जित्यों जो शशि उजियारी । बेनी जित्यों भुवंगिनिकारी ॥ औ मैं जीते मृग के नैना । कण्ठ जित्यों कोकिल के बैना ॥ भौंह जित्यों अर्जुन धनुकारी । ग्रीवैं जित्यों तमचोर पुछारी ॥ नासिका जित्यों पुहुप तिल सुवा । शूकै जित्यों बेसर होय उवा ॥

[Footnotes] १ खुश १ अँधियारी २ भोरे ३ दिल ४ हरे कमलगट्टा का हार पहिने से क्या नुक़सान ५ दिन ६ रात ७-१४ गूलर ८ सूर्य्य ६ हिलाने से पानी मैला होता १० मेढक ११ बगुला १२ चांद में सियाही १३ मौत १५ हज़ार १६ चांद १७ नागिन १८ गर्दन १६ मुर्ग-मोर २० नाक २१ फूल २२ नाम नक्षत्र २३ ॥

२१४ पद्मावत । दोंमिनिजित्यों दशन चमकाहीं। अधरै रंगरविजीत्यो साहीं ॥ केहरें जित्यों लंकै मैं लीन्हीं । जित्यों मराल चालवैदीन्हीं ॥ दो० पुहुप बासमलयाँगिरि, निरमल अंग बसाय । नागिनमआशालुबुध, मारसिकेहरकोजाय ॥ का तोहिं गैर्ब शृँगार पराये । अवहीं लेह लौट सब ठाये ॥ हौं सांवर सलोन मोर नैना । श्वेतैं चीरमुखचातकै बैना ॥ नासिक स्वर्ग फूल ध्रुवतारा। भौंहैं धनुष गगनै काहारा ॥ हीरादशनै श्वेतैं अरु श्यामा । छिपै बीजैं जो विहँसैरामा ॥ बिद्रुमै रंग अधरै रसरोंती। जोदामिनि असरे विमहँताती॥ चाल गयंदै गैर्ब अतिभरी। विसालंकै नागेसर करी ॥ साँवर जहाँ लवनसुठ नीकी । का सरबरै तू करेसि जो फीकी ॥ दो० पुहुँप बास हौं पवन अहारी, कमल मोरनिरहेलें । चहों केश धर नाऊँ, तोर मरन मोर खेल ॥ पद्मावत सुनि उतरै नहिंसही । नागमती नागिन जिम कही ॥ वै वह कहि वह वै कहैं कहा । काह कहों तस जाय न कहा ॥ दोउ नवल भर यौवन गार्जें । अप्सर जानु अखारै बाजें ॥ भा बाहुन बाहुन सो जोरा। हियसोहिय कोइ वाग न मोरा॥ कुचैं मों कुच भई सोहैं अनी । नवहिं ननाये टूटहिं तैनी ॥ कुंभस्थल द्वौ गर्जें मैमन्ता । दोनों उपर परे चौदन्ता ॥ बिजुली १ दांत २ होंठ ३ चीता ४ कमर ५ हंस ६ फूल ७ चन्दन ८ आरजू खाविंद के पास जानेकी रखती ६ गरूर १० सफ़ेद ११ पपीहा १२ आसमान १३ दांत १४ सफ़ेद-काला १५ बिजुली १६ मूंगा १७ होंठ १८ लाल १६ बिजुली २० सूर्य २१ हाथी २२ गरूर २३ भँवराकी कमर २४ बराबर २५ फूल हवाके सहारे २६ तरताज़ा २७ बाल २८ जवाब २६ परी इन्द्रलोक ३० छाती ३१ नांफ सामने ३२ अँगियाके बन्द ३३ नाम हाथी मस्त ३४ ॥

पद्मावत। ३१ देवलोक देखत हुत ठाढ़े। लागबान हिये'जाहिनकाढ़े॥ दो० जनहु दीन्ह ठगलाड़, देख आय तस मीचें। रहा न कोइ धरहरियाँ, करै जो दोउमहँबीच॥ पवन श्रवनैं राजा के लागा। कहेसिलड़हिंपद्मिनऔनागा॥ दोनों सौत श्याम औ गोरी। मरहिंतोकहँपावसियसजोरी॥ चल राजा आवा तेहि बारी। जरत बुझाई दोनों नारी॥ एक वार जेहिपिय मन चूमा। सो दूसरे सों काहेक झूमा॥ ऐसो ज्ञान मन जान न कोई। कबहूँ रात कबहूँ दिन होई॥ धूप छाँह दोऊ इक रंगा। दोनों मिले रहें इक संगा॥ जूझवै छांड़हु बूझौ दोऊ। सेव करहु सेवाफल होऊ॥ दो० गंग यमुन तुम नारि दोउ, लिखी मुहम्मदयोग। सेव करहु मिल दोनों, तो मानहु सुख भोग॥ अस कहि दोनों नारि मनाई। बिहँसिदोउतबकण्ठ लगाई॥ लै दोउ संग मँदिर महँ आई। सोन पलँग तहँ जायबिछाई॥ सीझी पाँच अमृत ज्योणारा। औ भोजन बावन परकारा॥ हुलसी सरस घचिचर्चा खायें। भोग करत बिहँसीं रहसायें॥ सोनमँदिरनगमतिकहँदीन्हा। रूप मँदिर पद्मावत लीन्हा॥ मन्दिर रतन रतन के खंभा। बैठा राज जोहारे सभा॥ सभा सो सबै शुर्म मन कहा। सोईअसे गुरु जो भलकहा॥ दो० बहु सुगन्ध बहु भोगसुख, कुरलहिं केलकराहिं। दोहु सो केल नितमानी, रहसअनन्ददिनजाहिं॥ जाई नागमती नगसेनी११। ऊँच भाग ऊँची दिन रेनी॥ १दिल १ मौत २ पड़नेवाला ३ कान ४ लड़ना ५-खिदमत ६ गलेलगाया ७ अंगूर ८ अच्छी बात कहीं ६ वह अच्छा जिसको गुरू पसन्दकरै १० नागमती से नगसेन पैदाहुआ ११॥

२१६ पद्मावत । कमलसेन पद्मावत जोई। जानहु चन्द्र धर्ति महँ आई॥ पण्डित बहु बुधवन्त बुलाये। राशि वर्ग औ गिरहगिनाये॥ कहेन बड़े दोउ राजा होहीं। ऐसे बूत दैसे सब तोहीं॥ नवें खण्डके राजा जाहीं। औ कुछदण्डै होयदलमार्ही॥ खुल भंडार कुछ दान देवावा। दुखी सुखी कर नाम बढ़ावा॥ याचक लोग गुनीजन आये। अरु आनंदके बजे बधाये॥ दो० अतिकुछ पावा ज्योतिपिन, औ दैचले अशीस। पुत्रै कलत्र कुटुम्ब सब, जीवहिं कोटि वरीस॥ राघव चेतन चेतन महा। आय उरकेँ राजा यहँ रहा॥ चितचिन्ता जानै बहु भेउँ। कविव्यास पण्डित संहदेउँ॥ बरैनी आय राज की कथा। पिंगल महँ सब सिंहलमथा॥ जो कवि सुनै शीशँ सो धुना। श्रवणैं नाद वेद कवि सुना॥ दृष्टि सो धर्मपन्थ जेहिसूझा। ज्ञानैं सो परमअर्थ मनबूझा॥ योग जो रहै समाधि समाना। भोग जोगुनीकेर गुनजाना॥ बीरै सुरिस मारै मन कहा। सोइ शृङ्गार कन्त जो चहा॥ दो० वेद भेद जस बरैंचि, चितचिन्ता तस चेत। राजा भोजैं चतुरदश, भा चेतन सो हेत॥ घड़ी अचेतैं होय जो आई। चेतनकी सब चेत भुलाई॥ भादौं एक अमावस सोई। राजैं कहा दुइज कव होई॥ पद्मावत से कमलसेन १ बलमें दशगुना २ आपस में फ़रेब ३ बेटा- औरत-ख़ानदान ४ पास ५ दिलका हाल ६ भेद ७ कविताई में व्यासजी ८ पण्डिताई में सहदेव ६ बयान १० छन्द ११ शिर १२ कान में वेदनाद की तरह सुना १३ निगाह १४ अक़्ल से मुश्किल बात दरियाफ़्त क- रता १५ बहादुर १६ नाम पण्डित १७ चौदह विद्या जाननेवाला राजा भोजकी तरह १८ बुरी १६॥

पद्मावत। २१७ राघव के मुख निकसा आजू। पण्डितन कहा काल्ह बड़राजू॥ राजैं दुहूँ दिशा फिर देखा। पण्डित बावरे कौन सरेखाँ॥ भुजा टेक के पण्डित बोला। छोड़हिं देश बचनँ जो डोला॥ राघव करी जाघनी पूजा। चहै स्वभाव देखावै दूजा॥ तेहिं ऊपर राघव बरै खांचा। दुइज आज तौ पण्डित सांचा॥ दो० राघव पूज जाघनी, दुइज देखायस सांझ। वेद पन्थ जे नहिं चलहिं, ते भूलहिं वन माँझ॥ पण्डित कहौं परानहिं धोखा। कौन अगस्त समुद्र जेहि सोखा॥ सो दिन गयो सांझ भइ दूजी। देखी दुइज घड़ी वह पूजी॥ पण्डितन राजा दीन्ह अशीशा। अब कस ये कंचन औ शीशा॥ जो यह दुइज काल्ह की होती। आज तेज देखत शश ज्योति॥ राघव दृष्टिवन्द कलह खेला। सभों माँझ घेटकें अस मेला॥ यहिकर गुरु चमारिन लोना। सिखा कामरू पाठत टोना॥ दुइज अमावस महँ जो देखावै। दिन इक राहु चांद कहँ लावै॥ दो० अस गुणी नहिं चहि नृपसभा, जेहि टोना कर खोज। यही छन्द ठग विद्या, छला सो राजा भोज॥ राघव बैनँ जो कंचैनै रेखा। कसे बान पीतर अस देखा॥ अज्ञा भई रिसान नरेशू। मारों काहि निसारों देशू॥ झूठ बोल थिरै रहै न राचा। पण्डित सोई वेदमति साँचा॥ वेद वचनैं मुख सांच जो कहा। सो युग युग इस्थिरै थिर रहा॥ खोटे रतन सोई फटकरा। केहि घर रतन जो दारिदै हरा॥ कौन पंडित नादान १ होशियार २ बात ३ भारी पूजा ४ क़सम ५ चाँद ६ दरबार ७ जादू ८ राजदरबार में ऐसा जादूगर न चाहिये ९ बात १० सोना ११ हुक्म १२ राजा १३ इज्ज़त नहीं रहती १४ वेद के मुक़ाबिल १५ क़ायम १६ झूठा जवाहर फिटकरी की तरह १७ दारिद दूर नहीं करता १८॥

२१८ पद्मावत । चह लक्षं बावर कवि सोई। जहँसरस्वती लक्षकित होई॥ कविताँसँगदारिद मतिभंगी। कांटे कुटिल पुहुपँ के संगी ॥ दो० कविता चेला विधिँ गुरु, सीप सेवाती बुन्द । तेहि मानुषकी आशँ का, जो मरजियासमुन्द॥ यहि सो बात पद्मावत सुनी। देश निसारा राघव गुनी॥ ज्ञानदृष्टि धनअगम विचारा। भलनकीन्हअसगुनीनिसारा॥ जे जार्यैनीपूज शशिक़ाढ़ी। सूर्य्यकी ठांवकरें पुनि ठाढ़ी ॥ कबकी जीभ खड्ग हरवानी। इकडिशआगदुसरदिशपानी ॥ जनं अयुक्तै मुख काढै भोरे। यश बहुतै अपयश है थोरे ॥ रानी राघव बेगेँ हँकारा। सूरय गढ़तरि लेहु उतारा ॥ ब्राह्मण जहां दक्षिणा पावा। स्वर्गजाय जो होय बोलावा ॥ दो० आवा राघव चेतन, धौराहरेँ के पास। ऐसि न जानी तेहिहृदयेँ, विजुली बसे अकास॥ पद्मावत जो झरोखे आई। नेहिकलङ्कजसर्शशि देखराई॥ ततखनेँ राघव दीन्हअशीशा। भयो चकोर चन्दमुख दीशा ॥ पहिरेर्शशिँ नखतनकीमारेँ। धरंती स्वर्गे भयो उजियारा ॥ औ पहिरे कर कंकन जोरी। नग जोलागतेहितीसकरोरी ॥ कङ्कन एक काढ़ दै डारी। काढ़त नारटूट गयें हारी ॥ जानहुँ चांद टूटले तारा। छूट्यो स्वर्ग काल कर धारा ॥ जनहुँ टूट बिजुली भुइँ परी। उठा चौंध राघव चित हरी ॥ दो० परा आइ भुइँकङ्कन, जगतभयो उजियार। दौलत १ इक़वाल २ कविदारिद्री होता है ३ फूल ४ ईश्वर ५ उम्मेद ६ अक़िल ७ भारीपूजा ८ चाँद ६ तलवारतेज १० बेमौक़ा ११ जल्द १२ महल १३ दिल १४ बेऐब १५ चाँद १६-१८ तुरन्त १७ माला १६ ज़मीन २० आसमान २१ ॥

पद्मावत । २१६ राघव बिजुली मारा, बेसँभरकुछ न सँभार ॥ पद्मावत हँस दीन्ह झरोखा । अब जो गुनीमरैसुहिं दोखो ॥ सबै सहेली देखी धाई । चेतन चेत जगावैं आई ॥ चेतन परा न आवै चेतू । सबहिं कहा यहि लाग परेत् ॥ कोई कहि कांपै कोईसम्पात् । कोईकहि अहि मिरगी बातू ॥ कोईकहि लागपवनै करझोला। कैसहिं समुझन चेतनबोला ॥ पुनि उठाय बैठारो छाहां । पूँछहिकौन पीर जिय माहां ॥ धौं काहू के दरशन हरा । कै ठग धूतै भूत जेहि हरा ॥ दो० कै तोहि काहू दीन्ह कुछ, कैरे डसातोहि सांप । कहो सो चितहोय चेतन, देह तोर कस कांप ॥ भयो सो चित चेतन जब चेता । नयन झरोखें जीव संकेताँ ॥ पुनि जो बोला मीत बुधिखोवा। नयन झरोखा लायें रोवा ॥ बावर फेर शीश पै धुना । आपन कहि न पराई सुना ॥ जानहु लाई काहुँ ठंगोरी । खने पुकार खन बांधे बोरी ॥ होरे ठगा यहि चितोर माहां । कासों कहों जाउँ केहि पाहां ॥ यहि राजा शठ बड़ हत्यारा । जेँ रखा यहि ठग बटपारो ॥ नाकोइवरजेनै लाग गुहारी । अस यहि नगर होय बटपारी ॥ दो० दृष्टि रहीठगलाडू, अलकें फाँस पर ग्रीवै । जहां भिखारि न बाचै, तहां बचै को जीव ॥ कित धौराहर आय झरोखें। लैगयोजोव दखनाकै धोखें ॥ स्वर्गसूर शशि करै अँजोरी । तेहितेअधिकदेउँ केहिजोरी ॥ पाप १ जूड़ी २ मिरगी को रोग ३ फालिज ४ किसीठग या दगाबाज़ने मन्त्र चलाया ५ खिलादिया ६ कुँभलाया ७ शिर ८ जादू ९ कभी १० छुप ११ राहलूंटनेवाले १२ मनाकरनेवाला १३ निगाह १४ बाल १५ गर्दन १६ महल १७ सूर्य १८ चाँद १६ रोशनी २० बहुत २१ ॥

२२० पद्मावत । शशि सूरहि जोहोतवहज्योती । दिनपहाड़हतरंयनि न होती ॥ तैं हँकारे मोहिं कङ्कनदीन्हा । दृष्टि जोपड़ी जीवहरलीन्हा ॥ नयनभिखार डीठि सतछुंडी । लागे तहां बान हियँ गड़ी ॥ नयनहिं नयन जो बेधसमाने । शीशँधुनहिं निसरेनहिंताने ॥ नवहिं न नाये निलज भिखारी । तबहूँ बुरी लाग मुखगारी ॥ दो० कित करमुखी नयनभै, जीव हरा तेहि बाट। सरवरनीरबिछोह ज्यों, तरकतरक हियफाट ॥ सखिन कहा चेतनबे सँभारा । हिये चेत जिव जाय न मारा ॥ जो कोई पावै आपन मांगा। ना कोइ मरै न काहू खाँगा ॥ वह पद्मावत ऐसी सुरुपा । बरन न जाय काहके रूपा ॥ जें चीन्हीं सो गुप्तै चल गयऊ । परगटगुप्तै जीवविन भयऊ ॥ तुम अस बहुत बिमोहितभये । धुन धुन शीश जीव दै गये ॥ बहुतहिं दीन्ह नाय के ग्रीवों । उतरैं न देइ मारके जीवा ॥ तुइँ पुनि मरत होय जर भुई । अबहिं उघेल कानकी रुई ॥ दो० कोइ मांग मार ना पावै, कोइ बिन मांगा पाव । तूचेतन औरहिसमझावे, बहुतहिंको समझाव ॥ भयो चेत चित चेतन चेता । बहुर न आयसहों दुखएता ॥ रोवत आय परे हम जहां । रोवत चले कौन सुख तहां ॥ जहँवां बहुतसाँसू जिय केरा । कौन रहन पर चलौं सबेरा ॥ अब यहि भीख तहां होय मांगौं। यतनादे जगजन्म न खाँगों॥ औ अस कंकन जोपाऊँ दूजा। दारिद हरै आश मन पूजा ॥ देहली नगर आव तुरकानू । शाह अलाउद्दीं सुलताणू ॥ चाँद १ सूर्य २ बोलाना ३ शोख ४ ईमान छोड़ानेवाले ५ दिल ६ शिर ७ तालाब का पानी घटने से ८ कमी ९-१६ छिपा १० ज़ाहिर वां छिपा ११ आशिक़ १२ गर्दन १३ जबाब १४ अंदेशा १५ ॥

पद्मावत। २२१ सोन जरी जेहि की टकसारा। बारहबौनी परहिं दिनारा ॥ दो० कमलबखानौं जायतहँ, जहँ अलि अलाउद्दीन। सुनिके चढ़ैभानु होय, रतन होय जलमीनै ॥ खण्ड बत्तीसवां देहली गवनराघव चेतन ॥ राघव चेतन कीन्ह पयानां। देहली नगर जाय नयराना ॥ आय शाह के द्वार जो पहुँचा। देखा राज जगतपर ऊँचा ॥ छविसलाख तुरुक असवारा। तीससहस हस्ती दरवारा ॥ जहँतक तपै जगतपर भानूँ। तहँलग राजकरै सुलतानू ॥ चहूँखंड के राजा आवहिं। ठाढ़झुराहिंजुहारैं न पावहिं ॥ मनतेवान कै राघव भूरा। नाहिं उबार जिया डर पूरा ॥ जहां झुरान दिये शिर छाता। तहँ हमार को चालै बाता ॥ दो० वारपार नहिं सूझै, लाखन उमर अमीर। अब खुरखैहै जाव मिल, आयपरे यहिभीर ॥ बादशाह सब जाना बूझा। स्वर्गपतौरै हिये १५ में सूझा ॥ जो राजा अस सजर्गे न होई। काकर राज कहांकर कोई ॥ जगत भार वह एक सँभारा। तौथिरे रहै सकल संसारा ॥ औ असबहक सिंहासन ऊँचा। सब काहूँपर दृष्टिजो पहुँचा ॥ सब दिन राजकाज सुखभोगी। रात फिरे घरघर द्वै योगी ॥ रावरंक जहँतक सब जाती। सबकी बाँहं लेइ दिनराती ॥ पंथी २१ परदेशी जब आवहिं। सबकीचाँहें दूतपहुँचावहिं ॥ बारह् तरह १ पद्मावत की तारीफ़ २ भँवर ३ सूर्य ४-१० मछली ५ कूच ६ दरवाज़ा ७ हज़ार ८ हाथी ६ चारों तरफ़ ११ सलाम १२ टापकी धूर १३ ज़मीन-आसमान १४ दिल १५ होशियार १६ क़ायम १७ नि- गाह १८ अमीर गरीब १६ ख़बर २०-२२ मुसाफ़िर २१॥ : ,,, :, :-

२३२ पद्मावत । दो० यहू बात तहँ पहुँची, सदा छत्र सुख छाथ । ब्राह्मण एक हारहै ठाढ़ा, कँकन जड़ाऊ हाथ ॥ मयों शाह मन सुनत भिखारी । परदेशी कहँ पूँछ हँकारी ॥ हम पुनि जाना है परदेशा । कौनपन्थै गवनव केहिभेशा ॥ देहलीराज चिन्तमनेँ काढ़ी । यहिजग जैसी दूबकी साढ़ी ॥ सेंतें मिलाय छाँछ के फेरा । मंथ घिवलीन्हमहिउकहँकेरा ॥ यहि देहली कित द्वै द्वै गये । कै कै गर्व खेहँ मिल गये ॥ यहि देहली की रही ढिलाई । साढ़ी काढ ढील जब ताई ॥ रावण लङ्क जार सत्र तापा । रहा न यौवन औ तरुनापा ॥ दो० भीख भिखारी दीजिये, का ब्राह्मण का भाट । अज्ञा भई वोलावहु, धरती धरा ललाटै ॥ राघव चेतन हुत जो निरासा । ततखनेँ वेगेँ वोलावा पासा ॥ शीशेँ नायके दीन्ह अशीशा । चमकत नग कंकन करदीशा ॥ अज्ञा भई सो राघव पाहां । तुइँ मंगनेँ कंकन का वाहां ॥ राघव फेर शीशेँ भुइँ धरा । जुगयुग राज भानु की करा ॥ पद्मिनि सिंहलद्वीप की रानी । रतनसेन चितोरगढ़ आनी ॥ कमलन सैर पूजी तेहि बासा । रूप न पूजी चन्द अकासा ॥ जहां कमल शेशि सूरे न पूजा । केहि सैर देउँ और को दूजा ॥ दो० सो रानी संसार मन, दछना कङ्कन दीन्ह । अप्सरै रूप देखायके, जीव झरोके लीन्ह ॥ सुनि के उतरै शाह मन हँसा । जानहु वीजै चमक परगसा ॥ ४ मेहरबानी १ बोलाना २ राह ३ अन्देशा ४ नरमी ५-८ गरूर ६ धूर ७ जवानी ६ हुक्म १० माथा ११ नाउम्मेद १२ तुरन्त १३ जल्द १४ शिर १५- १७ मांगनेवाला १६ सूर्य १८-२१ बराबरी १६-२२ चाँद २० परीइन्द्र- लोक २३ जवाब २४ विजुली २५ ॥

पद्मावत । २२३ कांच योग जो कंचन१ पावा। मंगन ताहि सुमेरु२ चढ़ावा ॥ नाउँ भिखार जीभ मुख बांची । अबहिंसँभार बातकहु सांची ॥ कहँ अस नारि जगत उपराहीं। जेहिके सरि सूरज शँशि नाहीं ॥ जो पद्मिनि तुइँ मन्दिर मोरे। सातों द्वीप जहां करै जोरे ॥ सप्तद्वीप महँ चुन चुन आनी। सो मोरे सोरहसै रानी ॥ जो उनमहँ देखेसि इक दासी । देख लोन है लोन बिलासी ॥ दो० चहूँखण्ड हौं चकवै, जस रवि तप आकाश । जो पद्मिनि मोरे मंदिर, अप्सर तौ कैलाश ॥ तुम बड़राज छत्रपति भारी। अन ब्राह्मण हौं अहौं भिखारी ॥ चारहुँ खण्ड भीखका बाजाँ। उदय अस्त तुम्ह ऐसो न राजा ॥ धर्मराज औ संतकुल माहां। झूठ जो कहौं जीभ गहि बाहां ॥ कुछ जौ चार सब कुछ उपराहीं। सो यहि चहूँ दीप महँ नाहीं ॥ पद्मिनि अमृत हंस सदूरू१० । सिंहलद्वीप भलाहिं सो मूरू ॥ सातों द्वीप देख हौं आवा। तब राघव चेतन कहवावा ॥ अजहूँ होय न राखौं धोखा । कहौं सो सब नारिन गुणदोखाँ ॥ दो० यहां हस्तिनी सिंहिनी, औ चित्रिनि बनबास । कहौं पद्मिनी पड़ै शिर, भँवर फिरै चहुँपास ॥ खण्ड तैंतीसवां स्त्री वर्णन ॥ पहिले कहौं हस्तिनी नारी। हस्ती की परकीरति१६ सारी ॥ शिर औ पांव सुझै गँय छोटी। उर की खीनं लङ्क की मोटी ॥ कुम्भस्थल गज अमित अमाहीं। गवनै गयन्द ढाल जनु बाहीं ॥ सोना १ नामबड़ाइ २ बराबरी ३ चाँद ४ हाथ ५ चारौंतरफ़ ६ सारी दुनियांका राजा ७ सूर्य ८ पहुँचा ६ लालशेर १० असिल ११ हुक्म १२ ऐब-हुनर १३ कमल १४ हाथी १५ स्वभाव १६ मोटा १७ गर्दन १८ छाती १६ पतली २० कमर २१ नाम हाथी २२ चाल २३ ॥

३२४ पद्मावत । दृष्टि¹ न आवै आपन पीउ । पुरुष पराये ऊपर जीउ ॥ भोजन बहुत बहुत रतिचाऊ² । अच्छवाई³ सो थोर समाऊ ॥ मधु⁴ जस मन्द बसाय पसेऊ । औ विश्वासै⁵ धरै जसदेऊ ॥ डर औ लाज न एको हिये । रहे जो राखै अंकुश⁶ दिये ॥ दो० गर्जगत चलै चहूँदिश, लायजगत कहँ चोखँ । कही हस्तिनी नारि ये, सब हस्तिनि के दोखँ ॥ दूसर कहौं सिंहिनी नारी । करै बहुत बल अल्प अहारी ॥ उरे⁸ अतिसुअै खीनैं¹² अतिलङ्कौ¹³ । गर्व्व¹⁴ भरी मन धरै न शङ्का ॥ बहुत रोषै¹⁵ चाही पिय हना । आगे घालन काहूँ गिना ॥ अलंकारै अपनी वह भावा । देख न सकै शृंगार परावा ॥ सिंह की चाल चलै डरा¹⁷ ढीली । रोंवां बहुत जांघ औ फीली ॥ मोट मांस रुच भोजन तासू । औ मुख आव विपाएँध वासू ॥ दृष्टि तराहीं हेरै आगे । जन मथवाह रहे शिर लागे ॥ दो० सेजवां मिलत सो स्वामी, लावे उर नख बान । यहि गुण सबै सिंहके, वह सिंहन सुलतान ॥ तीसर कहूँ चित्रिनी नारी । महाचतुर रस प्रेम पियारी ॥ रूप स्वरूप शृंगार सवाई । अप्सरै¹⁸ जैसी रही अच्छवाँई¹⁹ ॥ रोषै²⁰ न जानै हसता मुखी । जहँ अस नारिकन्तै²¹ सो सुखी ॥ अपने पुरुषकी जानै पूजा । एक पुरुष कें जान न दूजा ॥ चन्द्रबदने²² रंगकुमुँदिनी²³ गोरी । चाल सुहाय हंस की जोरी ॥ खीर²⁴ खांड़ कुछ अल्पअहारूँ । पान फूल से बहुत पियारूँ ॥ निगाह १ चाह २ सफ़ाई ३ शहद ४ ख्याल ५ हाथी ६ पियार ७ पेव = थोड़ा ६ खुराक १० छाती ११ चौड़ी १२ वारीक १३ कमर १४ गरूर १५ गुस्सा १६ सूरत १७ नज़र १८ इन्द्रलोककी परी १६ सफ़ाई २० गुस्सा २१ खाविन्द २२ मुँह २३ कोकांयेली २४ दूध २५ थोरी खुराक २६ ॥

। पद्मावत । २२५ पद्मिनि चाहे घाट दुइकरां । और सबै वह गुण निरमराँ ॥ दो० चित्रिनि जैस कुमुदैं रँग, और बासना अंग। पद्मिनि बास चन्दन जस, भँवर फिरहिं तेहि संग ॥ चौथे कहौं पद्मिनी नारी। पद्म गन्ध शशि दईसवँारी ॥ पद्मिनि जात पद्म रँग ओई। पदम बास मधुकर सँग होई ॥ नासुठ लांबी नासुठ छोटी। नासुठ पातर नासुठ मोटी ॥ सोरहों करन रंग है बनी। सो सुलतान पद्मिनी गुनी ॥ दीर्घ चारु बार लघु सोई। शुभ्र चार चहुँ खीनी होई ॥ औशशि वदन देख सब मोहा। चाल मरालै चलत गत सोहा ॥ खीर अहार न कर सुकवारा। पान फूल कें रहै अधारा ॥ दो० मोह किरन मम बूरन, औ सोरहों शृँगार। अब यह भांति बरन के, जस बरनै संसार ॥ प्रथमहिं केश दीर्घ शिर सोहैं। औ दीर्घ अँगुरी कर सोहैं ॥ दीर्घ नयन तीख तहँ देखा। दीर्घ ग्रीव कण्ठ त्रयरेखा ॥ पुनि लघु दशनँ होहिं जनु हीरा। औ लघुकुँच उतंग गम्भीरा ॥ लघु ललाटैं दुइज परकासू। औ नाभी लघु चन्दन बासू ॥ नासिकै खीनैं खड्ग की धारा। खीनलंक जनु केहरि हारा ॥ खीन पेट जानहु नहिं आंता। खीन अधरैं बिद्रुमँ रँगराताँ ॥ शुभ्र कपोलैं देख मुख शोभा। शुभ्र नितम्बैं देख मन लोभा ॥ दो० शुभ्र कलाई अति बनी, शुभ्र जंघ गजचौल । ज्यादा १ दोहिस्सा २ पाकसाफ ३ कोकावेली ४ कमल ५ चाँद ६-१२ भँवर ७ बड़े ८-१६-१७ छोटे ६-१६ मोटा १० पतला ११ हंस १३ पहिले १४ चाल १५ हाथ १८ दांत २० छाती २१ माथा २२ नाक २३ पतली २४ तलघार २५ पतली कमर २६ चीता २७ होठ २८ मूंगा २६ लाल ३० मोटा गाल ३१ चूतर ३२ हाथी की चाल ३३ ॥

२२६ पद्मावत। सोरहशृंगार वरन के, करहि देवता लाल ॥ यहिपद्मिनिचितोर जो आनी। कुंदन कार्या द्वादश बानी॥ कुन्दनकनकें ताहिनहिं वासा। बहुसुगन्धजसकमलविकासाँ॥ कुन्दन कनकेंकठोर सोअङ्गा। वह कोमलरँग पुहुपं सुरङ्गा॥ वह लुइ पवन बृक्ष जेहिलागा। सोइमलयगिरि भयोसभाग॥ काह न मूठ भरी वह देही। अस मूरति केहि दई उरेही॥ सबै पठेतरं चित्र के हारीं। वहक रूपकोइलखी न पारीं॥ कया कपूर हाड़ सब मोती। तेहितेअधिकं दीन्हविधिज्योती॥ दो० सूर्य किरण जस निरमलें, तेहिते अधिक शरीर। सौंहेदृष्टि नहिं जाय कर, नयनहिं आवै नीरें॥ शॅशिमुखजबहिंकहैकछुवाता। उठततन्त सूरज जस रताँ॥ दर्शनैदशनसोकिरणीफूटहिं। सबजगजानिफुलझरी छूटहिं॥ जानहुँशॅशिमहँ वीजेंदेखावा। चौंधपख्यो कुछ कहै न आवा॥ कौंधत रहि जस भादों रैनी। श्यामरैनिजतुचलैउड़ेनी॥ जनु बसन्तऋतु कोकिलबोली। सरस सुनाय सारसरै डोली॥ जनु अमृतहै बचन विकासाँ। कमल जोवास वासधनवासा॥ यहि सर शीश जो नाग बेहेरा। जाय शंख वेनी है परा॥ दो० सबै मनोहरै जायमर, जो देखै तस चोरैँ। पहिले सो दुख बरन के, वरनो वहकशृंगार॥ कितहों रहा कालकर काढ़ा। जाय धौरहेरै तर भा ठाढ़ा॥ कित वह आय झरोखेझांकी। नयनकुरंगिनि चितवनबांकी॥ वदन १ खालिस २ सोना ३-५ खिलना ४-५२ फूल ६ चन्दन ७ बनाना ८ दूती ९ बहुत १० पाकसाफ़ ११ निगाह सामने १२ पानी १३ चाँद १४-१७ लाल १५ दांत १६ बिजुली १८ रात १६ जुगुन् २० तीर २१ उम्मेद २३ चाल २४ महल २५ हिरनी २६ ॥

पद्मावत । २२७ बिहँसी शशि तरईं जनुपरीं। कैसो रयनि छूटे फुलझरी ॥ चमक वीजै जस भादौं रैनी। जगत दृष्टि भरही उड़ेनी ॥ काम कटाक्ष दृष्टि विष बसा। नागिन अलकँ पलकमहँ डसा ॥ भौंह धनुष परंत काजल बूड़ी। वह भइ बानुकें हौं भइ ऊँड़ी ॥ मार चली मारतहूँ हँसा। पाछे नाग रहा हौं डसा ॥ दो० काल घाल पीछे रखा, गरुड़ न मन्तर कोय। मोर पीठ वह बैठा, कासों पुकारों रोय ॥ बेनी १२ छोर झोर जो केशा। रैनि होय जगदीपकँ लेशा ॥ शिरहत विषहरैं परी झुइँ बारा। सगरे देश भयो अँधियारा ॥ सकपकाहिं विष भरे पसारे। लहरहिं भर लहकहिं अतिकारे ॥ जानहुँ लोटहिं चढ़े भुअङ्गाँ। वेधी बास मलयगिरि अङ्गा ॥ लरहिं मुरहिं जनु मानहिं केली। नाग चढ़े मालति कै बेली ॥ लहरैं देइ जानहु कालिन्दी। फिर फिर भँवर भये चित बन्दी ॥ चँवर धरत आळी चहुँपासा। भँवर न उड़हिं जो लुब्धे बासा ॥ दो० होय अँधेर घने विवि चमके, जयहिं चीर गहि झांप। केशौ नाग कित देख मैं, सँवरि सँवरि जिय कांप ॥ मांग कनकें जो सेंदुर रेखा। जन बसन्त रातौं जग देखा ॥ गइ पत्रावलि पाटी पारी। और चि चित्रविचित्र सँवारी ॥ भई उरेह पण्डुरैं सब नामा। जनु बकें बिखर रहे घनश्यामां ॥ यमुना मांझ सरस्वती मांगा। दुहुँदिश दिये तरंगने गांगा ॥ चांद १ छोटे नखत २ बिजुली ३-२२ निगाह ४-७ जुगनू ५ तिरछी चितवन ६ बाल ८-२३ पलक ६ तीरअन्दाज़ १० निशाना ११ चोटी १२ रात १३ चिराग़ रोशन १४ सांप १५-१६ चन्दन १७ यमुना १८ दिल फँसाना १६ लपटना २० बादल २१ सोना २४ लाल २५ नाम दाया २६ बहुत अच्छी २७ फूल २८ बगुला २६ बादल सियाह ३० लहर ३१ ॥

२२८ पद्मावत । सेंदुर रेख सो ऊपर राती । बीरबहूंटिन की जस पांती ॥ बेलि देवता भये देख सेंदूरू । पूजी मांग भोर उठ सूरू ॥ भोर सांझ रबि होय जो राताँ । वही देख राताँ भा गाताँ ॥ दो० बेनीकारी पुहुप ते, निकसी यमुना आय । पूजइन्द्र आनन्द सों, सेंदुर शीश चढ़ाय ॥ दुइज ललाट अधिकै मनकरा । शङ्कर देख माथ भुइँ धरा ॥ यहि नित दुइज जगत महँ दीशा । जगत जोहारे देइ अशीशा ॥ शशि जो होयन हिंस रवैर छाजै । होय सो अमावस छिप मन लाजै ॥ तिलक सँवारि जो चन्दन रचे । दुइज माँझ जानहुँ कच वेंचे ॥ शशि पर करवट सारा राहू । नखतहिं अस दीन्ह परदाहू ॥ पारस ज्योति ललाटहिं ओती । दृष्टि जो करै होय तेहि ज्योती ॥ श्री १६ जो रतन मांग बैठारा । जानहु गगन टूट निश तारा ॥ दो० शशि और सूर जो निरमलै, तेहिकी ललाट की रूप । निशि दिन चलहिं न सरवैर पावैं, तपत पहो हि अलूप ॥ भौंहें धनुष श्याम जनु चढ़ा । पनचैं करे मानुष कहँ गढ़ा ॥ चन्द कि मूठ धनुष वहताना । जाकर बीजैं बरनि बियवाना ॥ जासों हेर जाय सो मारी । गिरिवर टरहिं सो भौंहहिं टारी ॥ सेतुबन्ध जे धनुष बिडारा । वहू धनुष भौंहहिं सो हारा ॥ हारा धनुष जो बेधा राहू । और धनुष कोइ गिने न काहू ॥ कित सो धनुष भौंह मैं देखा । लाग बान तित आव न लेखा ॥ लाल १-५-६ कुरबान २ सूर्य ३-४-२२ वदन ७ फूल ८ शिर ६ माथा १० ज्यादा ११ चांद १२-१५-२१ बराबर १३-२५ नामनखत १४ रोशनी १६ पेशानी १७ निगाह १८ टीका १६ आसमान २० साफ़ २३ रात २४ गायब २६ निशाना २७ बिजुली २८ पलक के बाल २६ अर्जुन की कमान ३० ॥

तितबानहिं झांझरभा हियां। जो असमार सो कैसें जिया ॥ दो० सोत सोत तन बेधा, रोम रोम सब देह। नसनसमहँझइसोलँहि, हाड़हाड़भये बेहें ॥ नयन चित्र वै रूप चितेरे। कमलपत्रपर मधुकैर फेरे ॥ समुद्रतरंग उलटहिं जनराँती । डोलहिं औ घूमहिं मदमाती ॥ शरदचन्द महँ खञ्जन जोरी। फिरफिरलरहिं अघोर बहोरी॥ चपलं बिलोल डोल वहलागी। थिर्र न रहहिं चंचल बैरागी॥ निरखें अघाहिं न हत्या हंते। फिरफिर श्रवणहिं लागेमेंते ॥ अंगश्वेते मुखश्यामसो ओहीं। तिरछचलहिंखनसूधनहोहीं॥ सुरै नर गन्ध्रब लार्कै फेराहीं। उलटेचलहिंस्वर्गकहँजाहीं ॥ दो० अस वै नयन चक्र दुइ, भँवर समुद्र उलथाहिं । जनु जिव घालहिं डोले, लै आवंहिं लै जाहिं ॥ नासिकँखड्गे हरी धनकीरूँ। योगशृंगार जिता औ बीरू ॥ शशिमुखसोंहै खड्गगहिरामा । रावण सों चाहै संग्रामा ॥ दुहुँ समुद्र महँ जनु रुचि बीरूँ। सेतबन्धै बांधा नलनीलूँ ॥ तिलकफूल असनासिक तासू । औसुगन्धदीन्हींविधि बासू ॥ करनफूल फेरैं उजियारा। जनहुशरदशशि सोहिलबारा॥ सोहिल चाहें फूल वह ऊँचा। धावहिं नखत न जाई पहुँचा ॥ नजनो कैसो फूल वह गढ़ा। विकसैं फूलसबचाहहिंचढ़ा ॥ दो० असवहफूलबासका आगर, भानासकी समुन्द । 'दिल १ सूराख २-३-४ भँवरा ५ लहर ६ लाल ७ पूर्णमासी का चांद ८ ममोला ६ चंचल १० क़ायम ११ देखना १२ कानसे सलाह १३ सफ़ेद १४ देवता १५ आरज़ १६ आसमान १७ नाक १८ तलवार १६ तोता २० सामने २१ पेड़ २२ पुल २३ नामचन्दर २४ ईश्वर २५ ज्यादा २६ खिलना २७ नाक २८ ॥