पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
५६० पञ्चदशी वस्तुस्वभावमाश्रित्य व्यवस्था तूभयोः समा । अनुभूत्यनुसारेण कल्प्यते हि नियामकम् ॥१२॥ वस्तु का जैसा स्वभाव हो उसके अनुसार व्यवस्था मानना तो दोनों ही पक्षों में समान है। क्योंकि नियामक की जब कल्पना की जाती है तब वह अनुभव के अनुसार ही तो की जाती है। न घोरासु न मूढासु सुखानुभव ईक्ष्यते । शान्तास्वपि क्वचित् कश्चित् सुखानुभव ईक्ष्यताम् ॥१३॥ लोक में देखते हैं कि—घोर या मूढ अवस्थाओं में सुखानुभव होता दीखता ही नहीं। इसी तरह अनुभव के अनु- सार यह भी देख लो कि—शान्त वृत्तियों में भी सुखानुभव होता है या नहीं ? गृहक्षेत्रादिविषये यदा कामो भवेत् तदा । राजसस्यास्य कामस्य घोरत्वात् तत्र नो सुखम् ॥१४॥ घर या खेत आदि की कामना जब किसी पर सवार हो जाती है तब फिर कामावस्था में उसे सुख हो ही नहीं सकता । क्योंकि वह राजस काम घोर होता है। [ वह सुख को उद्भूत होने ही नहीं देता । ] सिद्ध्येन्नवेत्यस्ति दुःखमसिद्धौ तद् विवर्धते । प्रतिबन्धे भवेत् क्रोधो द्वेषो वा प्रतिकूलतः ॥१५॥ यह मेरा काम सिद्ध होगा या नहीं ? यह विचार जब आता है तब दुःख होने लगता है। जब काम सिद्ध नहीं होता तब दुःख बढ़ने लगता है। जब कोई उस काम में प्रतिबन्ध
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६१
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६१ डालता है तब क्रोध आने लगता है। जब कामना के प्रतिकूल बात देखनी पड़ जाती है तब उससे द्वेष होने लगता है। अशक्यश्चेत् प्रतीकारो विषादः स्यात् स तामसः। क्रोधादिषु महद् दुःखं सुखशङ्कापि दूरतः ॥१६॥ जब उसका कुछ इलाज नहीं हो सकता तब उस समय जो विषाद होता है वह तामस कहाता है [उसमें भी सुख नहीं होता]। क्रोधादियों में तो स्पष्ट ही बड़ा दुःख देखा जाता है वहाँ तो सुख की थोड़ी सी भी संभावना नहीं होती। काम्यलाभे हर्षवृत्तिः शान्ता तत्र महत् सुखम् । भोगे महत्तरं, लाभप्रसक्तावीषदेव हि ॥१७॥ महत्तमं विरक्तौ तु विद्यानन्दे तदीरितम् । एवं क्षान्तौ तथौदार्ये क्रोधलोभनिवारणात् ॥१८॥ काम्यपदार्थ का लाभ जब किसी को हो जाता है उस समय जो शान्त हर्ष वृत्ति उत्पन्न होती है उसमें बड़ा सुख होता है। जब तो हम उस काम्यपदार्थ को भोगते हैं तब और भी बड़ा सुख होता है। लाभ की आशा होने पर तो थोड़ा ही सुख होता है। वैराग्य में तो बड़े से भी बड़ा सुख होता है यह बात विद्यानन्द नाम के प्रकरण में कही गई है। इसी प्रकार क्षमा और उदारता के समय भी बड़ा सुख होता है। क्योंकि क्षमा और उदारता क्रम से क्रोध और लोभ का निवारण कर देती हैं। यद्यत् सुखं भवेत् तत्तद् ब्रह्मैव प्रतिबिम्बनात् । वृत्तिष्वन्तर्मुखास्वस्य निर्विघ्नं प्रतिबिम्बनम् ॥१९॥ यों जहाँ कहीं जो भी कुछ सुख होता है, वह सब ब्रह्म का प्रतिबिम्ब होने के कारण ब्रह्मतत्व ही है।
५६२ पञ्चदशी प्राप्त हो जाने पर जब इस प्राणी की वृत्ति अन्तर्मुख होती है तब ] वह ब्रह्म उस अन्तर्मुख वृत्ति में निर्विघ्नता के साथ [बेरोक टोक] प्रतिबिम्बित हो जाता है [ तभी उस प्राणी को सुख होता है । ] सत्ता चितिः सुखं चेति स्वभावा ब्रह्मणस्त्रयः । मृच्छिलादिषु सत्तैव व्यज्यते नेतरद् द्वयम् ॥२०॥ 'सत्ता' 'चैतन्य' तथा 'आनन्द' ये तीन ही तो ब्रह्म के स्वभाव हैं। मिट्टी और पत्थर आदि में ब्रह्म की सत्ता ही सत्ता व्यक्त होती है। चैतन्य और सुख दोनों ही उनमें व्यक्त नहीं होते । सत्ता चितिर्द्वयं व्यक्तं धीवृत्त्योर्घोरमूढयोः । शान्तवृत्तौ त्रयं व्यक्तं, मिश्रं ब्रह्मेत्थमीरितम् ॥२१॥ घोर और मूढ वृत्तियों में [ब्रह्म के] 'सत्ता' और 'चैतन्य' नाम के दो स्वभाव व्यक्त हुए रहते हैं। शान्तवृत्तियों में तो [ब्रह्म के] सत्ता चैतन्य तथा आनन्द ये तीनों ही स्वभाव व्यक्त होते हैं। इस प्रकार मिश्र [अर्थात् प्रपंच-सहित ] ब्रह्म का निरूपण किया गया । अमिश्रं ज्ञानयोगाभ्यां, तौ च पूर्वमुदीरितौ । आद्येऽध्याये योगचिन्ता ज्ञानमध्याययोर्द्वयोः ॥२२॥ यदि कोई चाहे तो ज्ञान और योग की चलनी में छानकर उस ब्रह्म को अमिश्र अर्थात् प्रपंच से रहित कर सकता है। उन ज्ञानयोगों का वर्णन पहले ही कर दिया गया है। पहले अध्याय में योग का चिन्तन किया गया है। पिछले दो अध्यायों में ज्ञान का वर्णन है।
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६३
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६३ असत्ता जाड्यदुःखे द्वे मायारूपं त्रयं त्विदम् । असत्ता नरशृङ्गादौ जाड्यं काष्ठशिलादिषु ॥२३॥ घोरमूढधियोर्दुःखमेवं माया विजृम्भिता । शान्तादिबुद्धिवृत्त्यैक्यान्मिश्रं ब्रह्मेति कीर्तितम् ॥२४॥ 'असत्ता' 'जडता' तथा 'दुःख' ये तीनों ही माया के स्वरूप हैं। जिनमें से 'असत्ता' मनुष्य के सींगों में होती है, 'जडता,' काष्ट और शिला आदि में पाई जाती है । घोर और मूढ वृत्तियों में दुःख रहता है। इस प्रकार संसार में सब ही जगह माया का प्रतिभास हो रहा है। बुद्धि की जो शान्त आदि वृत्तियाँ हैं उनके साथ एकता हो जाने के कारण वह ब्रह्म शान्त आदि वृत्तियों में मिश्रित हो जाता है। एवं स्थितेऽत्र यो ब्रह्म ध्यातुमिच्छेत् पुमानसौ । नृशृङ्गादिमुपेक्षेत शिष्टं ध्यायेद् यथायथम् ॥२५॥ यह सब कुछ हमने इसलिए कहा है कि जो पुरुष ब्रह्मतत्व का ध्यान करना चाहे, नृशृंगादि के समान मिथ्या पदार्थों की उपेक्षा करके [ जो तत्व शेष रह जाता है, उस ] शेष रहे हुए तत्व का ध्यान यथा योग्य रीति से करता रहे । शिलादौ नामरूपे द्वे त्यक्त्वा सन्मात्रचिन्तनम् । त्यक्त्वा दुःखं घोरमूढधियोः सच्चिद्विचिन्तनम् ॥२६॥ शान्तासु सच्चिदानन्दांस्त्रीनप्येवं विचिन्तयेत् । कनिष्ठमध्यमोत्कृष्टास्तिस्रश्चिन्ताः क्रमादिमाः ॥२७॥ शिलादि के नाम रूपों को छोड़ कर सन्मात्र का चिन्तन करना चाहिए। घोर और मूढ बुद्धियों में से तो दुःख को छोड़ कर ब्रह्म के सच्चिद्रूप का चिन्तन करना चाहिए। सात्विक
५६४ पञ्चदशी शान्त वृत्तियों में तो सत्-चित् तथा आनन्द इन तीनों को भी इसी तरह ध्यान करना चाहिए । ये ऊपर कही तीनों चिन्तायें क्रमानुसार कनिष्ठ मध्यम और उत्कृष्ट कहाती हैं। ये तीनों चिन्तायें एक समान नहीं हैं । मन्दस्य व्यवहारेऽपि मिश्रब्रह्मणि चिन्तनम् । उत्कृष्टं वक्तुमेवात्र विषयानन्द ईरितः ॥२८॥ [ जिन मन्द लोगों को निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करने का अधिकार नहीं है, वे ] मन्द लोग मिश्र [ सोपाधिक ] ब्रह्म का चिन्तन व्यवहार काल में भी करते रहें तो उनके लिये यही उत्कृष्ट बात है । इसी बात को बताने के लिये विषयानन्द का वर्णन हमने किया है । औदासीन्ये तु धीवृत्तेः शैथिल्यादुत्तमोत्तमम् । चिन्तनं, वासनानन्दे ध्यानमुक्तं चतुर्विधम् ॥२९॥ उदासीनावस्था में धीवृत्ति के शिथिल हो जाने पर [ बिना वृत्ति का] सर्वोत्तम चिन्तन [ध्यान] हो जाता है । यों वासना- नन्द में ध्यान चार प्रकार का हो गया । उदासीनता के आ जाने पर बुद्धिवृत्ति के शिथिल हो जाने के कारण [ जब कि किसी प्रकार की भी वृत्ति शेष नहीं रह जाती ] यह बिना वृत्ति का ध्यान सब ध्यानों से ऊँचे दर्जे का माना गया है । इस विषयानन्द नाम के प्रकरण में यहां तक चार प्रकार का ध्यान बताया जा चुका । तीन तरह का सवृत्तिक ध्यान ऊपर के श्लोकों में बताया गया है । इस श्लोक में चौथे अवृत्तिक ध्यान का वर्णन किया गया है । जड में सत्ता का ध्यान
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६५
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६५ मूढ में सत्ता और चैतन्य का ध्यान, सात्विक में सत्ता चित् तथा आनन्द का ध्यान यों तीन तरह का सवृत्तिक ध्यान है। न ध्यानं ज्ञानयोगाभ्यां ब्रह्मविद्यैव सा खलु। ध्यानेनैकाग्र्यमापन्ने चित्ते विद्या स्थिरीभवेत् ॥३०॥ इस ब्रह्मानन्द नाम के ग्रन्थ में ज्ञान और योग के द्वारा जिस ध्यान को बताया है वह कोई ध्यान नहीं है। वह तो ब्रह्मविद्या ही है। ध्यान करते करते जब चित्त एकाग्र हो जाता है तब यह ब्रह्मविद्या स्थिर हो जाती है। [इसका स्थिर हो जाना ही इसका उत्पन्न होना कहाता है ] विद्यायां सच्चिदानन्दा अखण्डैकरसात्मताम् । प्राप्य भान्ति न भेदेन भेदकोपाधिवर्जनात् ॥३१॥ विद्या [ज्ञान-साक्षात्कार] हो जाने पर तो सत् चित् आनन्द ये तीनों ही अखण्ड एकरस होकर दीखने लगते हैं। फिर ये तीनों पृथक् पृथक् नहीं रहते। क्योंकि उस समय भेदक उपाधियां ही शेष नहीं रहतीं । शान्ता घोराः शिलाद्याश्च भेदकोपाधयो मताः । योगाद् विवेवतो वैषामुपाधीनामपाकृतिः ॥३२॥ शान्त या घोर वृत्तियां तथा शिला आदि पदार्थ ही भेदक उपाधियें मानी गयी हैं। इन उपाधियों का परिहार या तो 'योग' से हो सकता है या फिर 'विवेक' [ज्ञान] से ही इनका परिहार किया जा सकता । निरुपाधिब्रह्मतत्वे भासमाने स्वयंप्रभे । अद्वैते त्रिपुटी नास्ति भूमानन्दोऽत उच्यते ॥३३॥ इस सब का निचोड़ यही है कि—जब उपाधि रहित स्वयं-
५६६ पञ्चदशी प्रकाश भासने लग पड़ता है तब फिर यह दीखने वाली त्रिपुटी नहीं रह जाती। यही कारण है कि उस को 'भूमानन्द' कहा जाता है। ब्रह्मानन्दाभिधे ग्रन्थे पंचमोध्याय ईरितः । विषयानन्द एतेन द्वारेणान्तः प्रविश्यताम् ॥३४॥ ब्रह्मानन्द नाम के ग्रन्थ में विषयानन्द नाम का पांचवां अध्याय समाप्त हुआ। मन्दाधिकारी लोग इसी को द्वार बना कर आत्ममन्दिर में घुस बैठें । प्रीयाद्धरिर्हरोऽनेन · ब्रह्मानन्देन सर्वदा । पायाच्च प्राणिनः सर्वान् स्वाश्रिताञ्छुुद्धमानसान्॥३५॥ इस ब्रह्मानन्द नाम की पुस्तक से हरि और हर प्रसन्न हो जांय । [ अपना प्रसन्न रूप साधकों को दिखाने पर उतारू हो जांय ]। शुद्ध मन वाले जितने भी प्राणी उनके आश्रय में पड़े हैं वे उन सब का पालन करें [ उन्हें इस संसार सागर से पार कर दें । ] इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां ब्रह्मानन्दे विषयानन्दः समाप्तः [ पंचदशी समाप्ता ]
Summary of 15 Chapters
ओम् पंचदशी के प्रत्येक प्रकरण के भावपूर्ण संक्षेप श्लोकों को पढ़ने से पूर्व यदि इन संक्षेपों को पढ़ लिया जायगा तो प्रकरण का भाव समझने में बहुत सहायता मिलेगी ।
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1. Tattvaviveka
ओम् [ १ ] तत्त्वविवेक का संक्षेप जिन को जिस बात की आवश्यकता हो और उसको ग्रहण करने में समर्थ भी हों, तो वे उसके 'अधिकारी' कहाते हैं । जो जिस बात के अधिकारी नहीं होते, वे यदि उस बात को सुनें भी तो वे उसे न समझने के कारण उससे कुछ भी लाभ नहीं उठा सकते । जिनके चित्त रागादि दोषों से रहित हो चुके हों, जिन्हें संसार की सच्ची स्थिति का पूर्ण परिज्ञान हो चुका हो, जिन पर माया का मोहक प्रभाव पड़ना बन्द होगया हो, जिनका ज्ञाननेत्र खुलना चाहता हो, वसन्त ऋतु के आने पर सर्वतः अंकुरित पौधे के समान ज्ञानाङ्कुर जिनके अन्दर से फूट निकलने की तैयारी कर चुका हो, संक्षेप में यों कहो कि जो नित्यानित्य वस्तुओं को पहचान चुके हों, इसी कारण इस लोक और परलोक के भोगों से जिन्होंने मुंह मोड़ लिया हो, जिनकी इन्द्रियाँ भी निगृहीत होगयी हों, जिनके मन के पांव में शम की भारी शंखला पड़ गयी हो, जिनके लिये अब केवल एक मुक्ति का ही दर्वाज़ा खुला रह गया हो, उन लोगों को सरलता से तत्वज्ञान कराने के लिये इस प्रकरण का निर्माण किया गया है, वे ही इसको पढ़ने के अधिकारी हैं । इससे उनको तत्व अर्थात् अनारोपित रूप की पहचान हो जायगी कि वह कौनसा है ?
४ पञ्चदशी
ब्रह्म का जो सच्चिदानन्द स्वरूप शास्त्र में बताया गया है ठीक वही लक्षण इस जीव में भी पाया जाता है। पहले 'सत्ता' को ही देख लें। सभी कहते हैं कि 'मैं हूँ' अर्थात् मेरी सत्ता है [मैं सत् हूँ] मैं एक त्रिकाल में रहने वाला पदार्थ हूँ। अब ज्ञान के विषय में भी विचार करें—जागरण काल में हमें शब्दस्पर्शादि के अन- गिनत ज्ञान होते हैं। उन ज्ञानों में, ज्ञान के विषय, शब्द या स्पर्श आदि, भले ही पृथक् पृथक् होते जायें, परन्तु उन सब विषयों को प्रकाशित करने वाला 'ज्ञान' तो सदा एकरूप ही रहता है। इस ज्ञान में जो कि भेद प्रतीत होने लगा है, वह शब्दस्पर्शादि उपाधियों के कारण ही है। जागरण और स्वप्न के ज्ञानों का विचार भी इसी प्रक्रिया से कर लेना चाहिये। जागरण और स्वप्न भले ही भिन्न भिन्न होते जायं, परन्तु उभयवर्ती सूत्र- रूप जो ज्ञान है, वह तो अखण्ड ही रहता है। सोते समय जो हमें अज्ञान का ज्ञान रहता है, वह ज्ञान भी एक अखण्ड तत्व ही है। कहने का तात्पर्य यही है कि दिन पर दिन, मास पर मास, वर्ष पर वर्ष, युग पर युग और कल्प पर कल्प बीत गये और बीतते चले जायेंगे; परन्तु यह ज्ञानदेव लुहार के ऐरन के समान, वैसे के वैसे ही स्वयंप्रकाश बन कर डट रहे हैं और डटें रहेंगे। इन ज्ञानदेव ने इस त्रिभुवन को व्याप्त कर रक्खा है। यदि अरबों कोस दूर अपने मन को भेजें या अनन्त कोटि सूर्यों का चक्कर लगाने का अपने मन को आदेश दे दें, तो भी यह ज्ञानदेव वहां पहले से ही बैठे पाये जाते हैं। सृष्टि बनने से पहले भी ये थे और नष्ट हो जाने के पश्चात् भी रहेंगे ही। ये न हों तो उन दोनों अवस्थाओं को कैसे जानें ? बस. ये व्यापक (देश और काल में व्यापक) ज्ञान ही आत्मा हैं। अब इनकी
तत्वविवेक का संक्षेप ५
तत्वविवेक का संक्षेप ५ परमानन्दरूपता का भी थोड़ा विचार करें। हरएक प्राणी अपने को ऐसा आशिष देता है कि मैं तो सदा ही बना रहूँ। जानते हो ऐसी आशंसा का गुप्त कारण क्या है ? इसका कारण आत्मा की सामान्य आनन्दरूपता नहीं है, किन्तु आत्मा की परमानन्द- रूपता ही ऐसी सर्वहृदयेश्वरी अभिलाषा का मुख्य कारण है। इस आत्मप्रेम को परमानन्दरूप कह देने का साहस हमने यों किया है कि यह प्रेम अपने स्वार्थ से तो दूसरों में भी हो जाता है, परन्तु दूसरों के स्वार्थ से अपने में प्रेम होने की बात कहीं देखी नहीं गई। यों जो (सत् चित् आनन्द) लक्षण ब्रह्म में बताये जाते हैं वे सभी इस आत्मा में भी पाये जाते हैं। अब जिसको अधिकारी देखते हैं, उससे वेदान्त और आचार्य यह महावार्ता कह देते हैं कि ओ दिङ्मूढ प्राणी! आत्मा और ब्रह्म ये दो पदार्थ नहीं हैं। ये तो एक ही वस्तु के दो नाम रख लिये गये हैं। आत्मा की जिस परमानन्दरूपता का वर्णन ऊपर किया है, वह ऐसी विचित्र परिस्थिति में फँस गई है कि वह ज्ञात भी रहती है और अज्ञात भी बनी रहती है। आत्मा की इस परमानन्द- रूपता को अंशतः छिपा लेने वाली अविद्या के ही 'माया' और 'अविद्या' नाम के दो बड़े भेद हैं। इन्हीं से ईश्वर, प्राज्ञ, आकाश आदि पांच भूत, पांच ज्ञानेन्द्रियें, मन, बुद्धि, पांच कर्मेन्द्रियें, पांच प्रकार के प्राण, ये सब कुछ उत्पन्न हो जाते हैं। इनसे फिर तैजस और हिरण्यगर्भ का जन्म होता है। फिर इन पांचों भूतों को स्थूल रूप में लाने के लिये इनका मिश्रण किया जाता है, जिसे 'पंचीकरण' कहते हैं। उन पंचीकृत भूतों से ब्रह्माण्ड भुवन तथा अनेक प्रकार के स्थूल शरीरों की उत्पत्ति होती है।
६ · पञ्चदशी कारण और सूक्ष्म शरीर तो सम्पूर्ण प्राणियों के एक समान ही होते हैं केवल स्थूल शरीरों में ही भिन्नता है । 'वैश्वानर' और 'विश्व' की कल्पना भी इन ही स्थूल शरीरों के आधार से की जाती है । विश्व कहाने वाले इन देवता पशु पक्षी और मनु- ष्यादियों को, अन्दर के गुप्त तत्व का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है । तमाशा देखने वाले बालक जैसे द्वारों पर खड़े रहते हैं, उसी तरह ये अपने अज्ञान के कारण सदा ज्ञानेन्द्रिय द्वार पर खड़े रहते हैं और कर्मेन्द्रिय रूपी मज़दूरों से कुछ उलट पुलट कराया करते हैं । इनकी बेसमझी को कहां तक कहा जाय, ये ऐसे चक्कर में फंसे हैं, ये ऐसे भंवर में पड़ गये हैं कि इनका निस्तार होना ही कठिन हो गया है । ये काम करते हैं इसलिये कि कुछ भोग [ मज़ा ] करेंगे । ये भोगते हैं इसलिये कि कुछ काम करेंगे । कर्म करने के कारण तो इनको उस कर्म का फल भोगना आवश्यक हो जाता है । भोग कर जब इन्हें कुछ क्षुद्र मज़ा हाथ आ जाता है तब ये दुगने उत्साह से फिर-फिर कर्मजाल में फँस जाते हैं। यों कर्म से भोग और भोग से कर्म की उत्पत्ति होती रहती है । इन कर्म और भोगों का पार ही इनके हाथ नहीं आता । इनके मन में कभी यह सवाल ही पैदा नहीं होता कि क्या हम सदा इस कर्म और भोग की श्रृंखला में ही जकड़े रहेंगे ? या कभी हमको इससे छुट्टी भी मिलेगी ? बेद्वार के दर्वाजे में बन्द किये अन्धों की तरह ये जन्मजन्मान्तरों में चक्कर लगाते रहते हैं। इन्हें कभी भी सुख के दर्शन नहीं होते । इनकी हालत नदी में बहते हुए उन कीड़ों की सी होती है जो एक भंवर से निकल कर दूसरे में फँस जाते हैं, उसमें से निकल कर तीसरे में जा गिरते हैं। जब कभी किसी
तत्वविवेक का संक्षेप ७
तत्वविवेक का संक्षेप ७ के कोटि पुण्यों का उदय होता है तब उसे संसार के गहन तत्व के पारखी गुरु के दर्शन मिल जाते हैं । संसार में जल के अथाह समुद्र भर पड़े हैं परन्तु मेघ के द्वारा आया हुआ जल ही पेय होता है । इसी प्रकार आत्मतत्व इस संसार में अनन्त रूप से परिपूर्ण हो ही रहा है, परन्तु वह हमारा उपयोगी तो गुरु के द्वारा हीं होता है । गाय के शरीर में जो घी रहता है वह उसके शरीर को पुष्ट नहीं करता । जब तो उसी को दुहकर बिलोकर फिर उस गाय को खिलाते हैं तब उसके शरीर की पुष्टि होती है । इसी प्रकार जो हमारा मथन करके आत्मसर्पि निकाल कर हमें ही खिला सके, वैसे गुरु की आव- श्यकता रहती ही है । गुरु की आवश्यकता पर कबीर के शब्द बड़े ही हृदयग्राही हैं:— वस्तु कहीं ढूँढे कहीं केह विध आवे हाथ । कहे कबीर तब पाइया जब भेदी लीना साथ ॥ भेदी लीना साथ कर दीना वस्तु लखाय । कोटि जनम का पन्थ था क्षण में पहुँचा जाय ॥ उस आचार्य के उपदेश से पांच कोशों में छिपे हुए आत्मा की सम्भावना मन में दृढतापूर्वक बैठ जाती है । जब यह आत्मा पांचों कोशों से छिप जाता है तब आत्मविस्मरण होकर इसे संसार में फंसना पड़ जाता है । मूँज में से जैसे तुली को निकाल लेते हैं इसी प्रकार आचार्यों की बताई युक्ति से जब धीर लोग इन तीनों शरीरों में रमे हुए आत्मतत्व का उद्धार कर चुकते हैं, तब उस उद्धृत आत्मा में वे ही लक्षण स्पष्ट दीखने लगते हैं जो कि ब्रह्म में बताये गये हैं । लक्षण की एकता को देख कर तब साधक को कहना पड़ जाता
८ पञ्चदशी
है कि मैं तो परब्रह्म तत्व 'ही हूँ'। इतने से पर और अपर आत्मा की एकता की सम्भावना तो पाठकों के हृदय में बैठ ही जाती है। तत्वमसि आदि जो महावाक्य हैं वे इसी एकता की साक्षी देकर चले जाते हैं। अधिकारी लोग इन वाक्यों को जब विधिपूर्वक सुनते हैं तब उन्हें अखण्ड सच्चिदानन्द ब्रह्म की दिव्य सूचना मिल ही जाती है। श्रवण और मनन के प्रताप से जब इस परमार्थ में की विचिकित्सार्यें भाग जाती हैं और इसी परमार्थ में चित्त को ठहरा कर, तैल की धारा के समान एकाकार वृत्ति का प्रवाह बहा दिया जाता है, तब बस यही 'निदिध्यासन' कहाता है। इस निदि- ध्यासन की जब परिपाकावस्था आती है तब उसके माहात्म्य का क्या वर्णन करें। तब तो ध्याता और ध्यान दोनों ही खोये जाते हैं। उस समय के ध्येयैकगोचर चित्त की अलौकिक अवस्था को तो ऐसा समझो जैसा कि वायुरहित प्रदेश में जलता हुआ या चित्र में खींचा हुआ कोई दीपक ही हो। ऐसी अवस्था जब किसी के चित्त की हो जाय तब उसे समझ लेना चाहिए कि 'समाधि' होने लगी है। इस समाधि का महाद्भुत प्रताप यह है कि हमने अनादिकाल से जो अनन्त कर्मों के कूड़े इकट्ठे कर रक्खे हैं वे सब के सब इस समाधि से नष्ट हो जाते हैं। शुद्ध धर्म की वृद्धि होने लगती है, जिससे कार्यसहित अविद्या को मार भगाने वाला साक्षात्कार आ धमकता है। इस समाधि को करते करते जब सम्पूर्ण वासनाजाल विनष्ट हो चुके हों, जब पुण्य पाप नाम के कर्मों के ढेर का समूल उन्मूलन हो चुका हो, तब कहीं जाकर 'तत्वमसि' आदि वाक्यों का सच्चा अर्थ समझ में आया करता है। ऐसी उदार अवस्था के आने से पहले पहले
तत्त्वविवेक का संक्षेप ९
तत्त्वविवेक का संक्षेप ९ हमें जो कि आत्मविषयक ज्ञान होता है उसे तो परोक्ष ज्ञान ही समझना चाहिए। परन्तु यह जो अपरोक्ष ज्ञान है यह जब किसी को होता है तब उसका संसार का कारण मूलाज्ञान भी जल- भुन कर खाक हो जाता है। ऐसा तत्वविवेक जब कोई कर लेगा और अपने मन को इसी लक्ष्य की महादीक्षा भी दे देगा, तब उसे अपरोक्ष ज्ञान होकर ही रहेगा। उसका संसार-बन्धन टूट फूट कर शतधा विदीर्ण हो जायगा। फिर परम पद को पाने में उसे क्षण भर का भी विलम्ब नहीं होगा। चाह तो उसे यह भी कह सकते हैं कि वह सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म ही हो जायगा। गंभीर सूचना जो तत्त्व है अर्थात् जो अनारोपित ( अकल्पित ) वस्तु है उस का दिग्दर्शन इस प्रकरण में कराया गया है। इस प्रकरण का गंभीर अभिप्राय यह है कि एक ही स्थान पर दो अकल्पित पदार्थ रह ही नहीं सकते हैं। एक स्थान पर अकल्पित पदार्थ तो एक ही ठहर सकता है यह एक सर्वमान्य नियम है। जहां एक अकल्पित ( सच्ची ) रस्सी पड़ी है, वहां ही पर दूसरा अकल्पित (सच्चा) सांप भी हो यह हो ही नहीं सकता। हां, यह तो हो सकता है कि जहां पर सच्ची रस्सी हो वहीं पर कल्पित सांप भी रह रहा हो। सच्चे और कल्पित का एक साथ होना तो भ्रमस्थल में प्रत्यक्ष देखते ही हैं। जहाँ जहाँ भी हमको कल्पित पदार्थ प्रतीत हुआ करते हैं वहाँ-वहाँ उनका तत्त्व अर्थात् उनका अनारोपित स्वरूप उनके साथ तो रहता ही है परन्तु वह उस समय छिप सा जाता है। उस पदार्थ के तत्त्व को यदि हम जान लें, तो कल्पित
१० पञ्चदशी 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
पदार्थ, सपने के पदार्थों की तरह, क्षण भर में अदृश्य (गुम.) हो जाते हैं। इसी प्रकार यह समझें कि इस संसार का भी जो तत्त्व है, अर्थात् जो इस संसार का अनारोपित स्वरूप है वह तो एक ही है और वह भी छिप सा रहा है। वह 'सत्य' 'ज्ञान' और 'परमानन्द' स्वरूप है। परन्तु इस तत्त्व के ऊपर जो अनेक प्रकार के आरोप होगये हैं, इस तत्त्व के आधार से जो कि अनेक कल्पित देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि तथा अन्य भूत भौतिक पदार्थ प्रतीत होने लग पड़े हैं, उन्होंने हमारा सारा ही ध्यान अपनी ओर खींच लिया है और अब हमें सर्वत्र 'असत्य' 'अज्ञान' और दुःखों के ढेर ही ढेर दिखाई पड़ रहे हैं। जैसे रस्सी का सांप, सारा ध्यान अपनी ओर खींचकर रस्सी को प्रतीत होने ही नहीं देता है, इसी प्रकार इन कल्पित पदार्थों ने तत्त्व की प्रतीति को रोक दिया है और स्वयं हमारे सामने आकर खड़े हो गये हैं। सांप को देखकर जैसे भय और कम्प आदि हो जाते हैं; इसी प्रकार इन देहादि पदार्थों को देखने से अब तो जन्म मरण आदि का चक्र चल पड़ा है। हम अभागे प्राणी जन्मने के लिये मरते हैं और मरने के लिये जन्म लेते हैं। भोग के लिये कर्म करते हैं और कर्म करने के लिये भोगते हैं। यों हम अज्ञानोपहत होकर मूर्ख बालकों की तरह इस चक्कर को निरन्तर घुमाते ही जाते हैं। जब पुण्यपरिपाक से किसी तत्त्व के पारखी से भेंट हो जाती है और वह कृपा करता है तब इन कल्पित चीज़ों की पहचान होकर, अकल्पित सच्चिदानन्द वस्तु पर साधक की दृष्टि जा पड़ती है और बस तभी संसरण बन्द हो जाता है। कारुणिक आचार्य तत्त्व (अकल्पित पदार्थ) का जो स्वरूप है वह बता देते हैं। तब उस पर मनन चल पड़ता है और मनन
तत्त्वविवेक का संक्षेप ११
तत्त्वविवेक का संक्षेप ११ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
करते करते, निःसन्दिग्ध हो जाने पर, चित्त को उसी तत्व में जमा दिया जाता है। इस तत्व में, जमते जमते, जब मन की अवस्था, तसवीर खिंचे हुए दीपक की सी शान्त हो जाय, तब यही समाधि अवस्था कही जाती है। इस समाधि के हाथ लगने पर, कर्मों के ढेर में आग लग जाती है और संसारबन्धन गल जाता है। इस अवस्था में परमपद को साधक के पास आना ही पड़ता है। दर्पण ठोस होता है, उसके अन्दर तिल धरने को भी कहीं स्थान नहीं होता, परन्तु उसी के अन्दर, अनेक पदार्थों को अपने पेट में लिये हुए, लम्बा चौड़ा आकाश व्यर्थ ही दीखा करता है। इसी प्रकार, वह सच्चिदानन्द तत्व भी, सर्वत्र ठसाठस भरा पड़ा है, यह शिला की तरह ठोस है, इसमें जरा सा भी कहीं को छिद्र नहीं है, कि इसमें कहीं कोई तिनका तक भी समा सके। परन्तु इस दुर्घटकारिणी माया के प्रताप से, अनन्त वस्तुओं को अपने पेट में लिये हुए यह सारा जगत्, इसी निश्छिद्र सच्चि- दानन्द में भ्रम से व्यर्थ ही प्रतीत हो रहा है। दर्पण के अन्दर अनन्त आकाश को देखते हुए भी जैसे हम दर्पण की निर्मलता को जानते ही रहते हैं और उस दर्शन पर विश्वास नहीं करते हैं, इसी प्रकार सच्चिदानन्द के अन्दर अनन्त जगत् को देखते हुए भी उसकी निर्मलता यदि हमारे मन पर चढ़ जाय, यदि हमारे मन पर इस सच्चिदानन्द रूपी जल के चार छींटे आपड़ें और मन को इस तत्व की महादीक्षा मिल जाय, मन इसी तत्व में रम जाय और बाह्य दर्शन पर से विश्वास (आस्था) उठ जाय तो समझिये कि अतत्व ( आरोपित ) चीजें हट गयीं और तत्व [ अर्थात् अनारोपित ] चीज हाथ लग गयी है। इस तत्व को पकड़ा देना ही तत्वविवेक नाम के प्रकरण का उद्देश्य है।
2. Pancha Mahabhuta Viveka
[ २ ] पंचभूतविवेक का संक्षेप पंचभूतविवेक नाम के दूसरे प्रकरण में बताया गया है कि वर्षा ऋतु में पर्वत से ही उत्पन्न होने वाले तिनके जिस प्रकार पर्वत को ही ढक लेते हैं, इसी प्रकार ये पांचभूत उसी (सत् अद्वैत तत्व) से उत्पन्न हुए हैं परन्तु इन्होंने उसे ही छिपा डाला है। अब हम साधकों का यह परम कर्त्तव्य है कि इन पांचों भूतों का विश्लेषण करके, छिपे हुए उस तत्व को फिर दुबारा पहचान लें। पहचानने की रीति यह है कि ग्यारह इन्द्रियों से युक्तियों से और शास्त्रों से जिस पसारे को हम देख रहे हैं वह पसारा सृष्टि बनने से पहले नहीं था। तब एक सत् ही सत् था। वह सत् क्योंकि निरवयव तत्व है इस कारण पेड़ में जैसे पत्र पुष्प और फलादियों से होने वाला स्वगत भेद रहता है वह भी तब नहीं था। एक पेड़ का दूसरे पेड़ से जैसे सजातीय भेद होता है वैसा सजातीय भेद भी तब नहीं था। एक पेड़ का विजातीय पत्थर आदि से जैसे भेद होता है वैसा विजातीय भेद भी तब नहीं था। यों स्वगत स्वजातीय और विजातीय भेद से हीन एक तत्व तब था। कई लोगों को तो यह एक तत्व की बात बड़ी ही असह्य प्रतीत होती है। जैसे समुद्र में डूबने से स्थलचारी का दम घुटता है, इसी प्रकार अखण्ड एकरस तत्व को सुन कर और मन के प्रचार के लिये अवकाश न पाकर, वे लोग वहां की गम्भीर शान्ति से घबरा उठते हैं। दूषित वायु में रहने के आदी जैसे सुगन्ध वायु से नाक सकोड़ते हैं और घबराते हैं इसी प्रकार बहुव्याकुल-
पंचभूत का संक्षेप १३
चित्तों को अनन्त शान्तिदायक अखण्ड एकरस तत्व भी भयानक दीखता है। बालक जैसे जंगल में डरता है इसी तरह अखण्ड तत्व से भी कई लोगों को भय लगता है। परन्तु उनके डरने का कोई भी उचित कारण नहीं है। जब कोई समाधि करता है और जब निश्चित हो जाने की गम्भीर अवस्था आती है और तूष्णींभाव का उदय होता है, तब उस अखण्ड सद्वस्तु का अनुभव साधकों को स्पष्ट ही होता है। 'उस समय तो कुछ भी नहीं रहता है' ऐसा विचार ठीक नहीं है, क्योंकि शून्य (कुछ नहीं) को जानने वाला जो कोई तत्त्व है उसको 'कुछ भी नहीं' कहना अनुचित है। शून्य को तो शून्य का ज्ञान होता ही नहीं है। जब हम निर्मनस्क होते हैं, उस निर्मनस्क अवस्था का जो साक्षी है, वही तत्त्व सत् पदार्थ है। इस सत् में इस पसारे को फैलाने की जो शक्ति रहती है, वह न तो असत् ही है, क्योंकि प्रतीत होती है और न सत् ही है, क्योंकि वह सदा नहीं रहती। उसकी बाधा हो जाती है। देवदत्त में देवदत्त की शक्ति भी रहती है, परन्तु शक्ति को और देवदत्त को दो नहीं गिना जाता। ये दोनों मिल कर एक ही गिने जाते हैं। इसी तरह ब्रह्म और उसकी शक्ति दो तत्व नहीं गिने जाते। कहने का तात्पर्य यह है शक्ति के कारण द्वैत नहीं होता है। जैसे शक्ति के कारण द्वैत नहीं होता है, ठीक इसी तरह शक्ति के जो स्थूल कार्य (पृथिव्यादि) हैं उनसे भी द्वैत की शंका को अवकाश नहीं है। उस शक्ति से, सब से प्रथम आकाश उत्पन्न हुआ। उसमें जो सत्ता है वह इस सत् से ही आई है। सत् का ही आकाश बन गया है। 'आकाश की सत्ता' ऐसा कहना दार्शनिक भूल है। यह सत्ता वायु आदि अगले भूतों में भी गई है। आकाश उनमें नहीं गया, इसी कारण कहते हैं कि आकाश