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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

तेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५४५ सूर्य १-२-४-७-८-१०-११ शनि का अष्टक वर्ग चन्द्र ३-६-११ मंगल ३-५-६-१०-११-१२ बुध ६-८-९-१०-११-१२ बृहस्पति ५-६-११-१२ शुक्र ६-११-१२ शनि ३-५-६-११ लग्न १-३-४-६-१०-११ इस प्रकार शनि के अष्टक वर्ग में कुल ३९ शुभ बिन्दु पड़ते हैं : सूर्य से ७, चन्द्र से ३, मंगल से ६, बुध से ६, बृहस्पति से ४, शुक्र से ३, शनि से ४, लग्न से ६ ॥९॥ इति निगदितमिष्टं नेष्टमन्यद्विशेषा- दधिकफलविपाकं जन्मिनां तत्र दद्युः । उपचयगृहमित्रस्वोच्चगैः पुष्टमिष्टं त्वपचयगृहनीचारातिगैर्नेष्टसम्पत् ॥१०॥ ऊपर अष्टक वर्गों में जहाँ-जहाँ शुभ बिन्दु डाले गये हैं वहां-वहां जब गोचरवश ग्रह भ्रमण करेगा तब शुभ फल देगा । जिन स्थानों का नाम नहीं लिया गया वहां-वहां अशुभ फल करेगा ऐसा समझना चाहिये । उदाहरण के लिए सूर्य से १-२-४-७-८-१०-११ इन स्थानों पर जब शनि गोचर वश आता है तब शुभ फल करता है यह ऊपर श्लोक ९ में बताया गया है। उदाहरण कुंडली में (देखिये पृष्ठ ५३८) सूर्य वृश्चिक राशि में है इस कारण सूर्य के विचार से वृश्चिक से १ वृश्चिक, २ धनु, ४ कुम्भ, ७ वृष, ८ मिथुन, १० सिंह, ११ कन्या ।

५४६ फलदीपिका इन राशियों में जब शनि गोचर वश आवेगा तब शुभ फल करेगा। बाकी राशियों में अर्थात् मेष, कर्क, तुला, मकर, मीन, इन राशियों में जब गोचर वश शनि आवेगा तो शुभ फल नहीं करेगा। इस कारण जैसे ऊपर सूर्य से विचार करके बताया गया है वैसे ही सातों ग्रहों से और लग्न से (कुल आठ से—इसीलिए इसे अष्टक वर्ग कहते हैं) यह देखना चाहिए कि कितने शुभ बिन्दु पड़े। यदि किसी स्थान पर ८ शुभ बिन्दु पड़ें, तो समझना चाहिए कि उस स्थान पर ग्रह गोचर वश पूर्ण शुभ फल देगा यदि किसी स्थान पर एक भी शुभ बिन्दु न पड़े तो वहाँ गोचर वश पूर्ण अशुभ फल समझना चाहिए। यदि किसी स्थान पर ४ शुभ बिन्दु हों तो यह समझना चाहिये कि ४ ग्रहों के विचार से तो वहाँ शुभ फल होगा और बाकी ४ के विचार से अशुभ फल। * ऊपर जो शनि का अष्टक वर्ग बनाया गया है उसमें सिंह राशि में ७ शुभ बिन्दु हैं। केवल शुक्र से वह राशि गोचर वश शनि के लिये शुभ स्थान नहीं बनती। जन्म कुंडली में (देखिये पृष्ठ ५३८) शुक्र वृश्चिक में है और शुक्र से केवल ६-११-१२ इन स्थानों में—शनि के अष्टक वर्ग में शुभ बिन्दु पड़ते हैं। (देखिये पृष्ठ ५४५)। सिंह, वृश्चिक से १०वाँ स्थान है इस कारण ऊपर जो शनि का अष्टक वर्ग बनाया गया है उसमें केवल ७ बिन्दु पड़े। क्योंकि यह सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि और लग्न से, शनि के गोचर के लिये शुभ स्थान है। ७ शुभ बिन्दु होने से काफ़ी अच्छा शुभ-फल गोचर वश होगा। जिस राशि में केवल एक शुभ बिन्दु पड़ा है वहाँ शनि गोचर वश काफ़ी अशुभ फल देगा। ४ शुभ बिन्दु जहाँ हों वहां मध्यम फल समझना चाहिये। चार से अधिक जितने शुभ बिन्दु पड़ें उतना ही अधिक शुभ और चार से जितने कम शुभ बिन्दु पड़ें ७ ग्रह और एक लग्न इस प्रकार कुल आठ हुए।

तेईसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग ५४७ उतना ही अधिक अशुभ समझना चाहिये । यह साधारण नियम है । इसके अतिरिक्त दो बातें और ध्यान में रखनी चाहियें :— (अ) यदि ग्रह गोचर वश अपनी स्वयं की राशि, अपनी उच्च राशि या अपने मित्र की राशि में जा रहा हो या उपचय* स्थान में जा रहा हो तो ख़राब फल में कमी करता है और अच्छे फल को और भी बढ़ाता है । इसका अर्थ यह हुआ कि मान लीजिये तीन बिन्दु है किन्तु स्वराशि और उपचय स्थान में जा रहा है तो उतना खराब नहीं होगा । यदि ५ बिन्दु हों और उपचय स्थान में हो—मित्र राशि में हो तो जितना शुभ फल ५ बिन्दु के कारण करना चाहिये उससे भी अधिक करेगा । (ब) यदि ग्रह नीच राशि, शत्रु राशि या अनुपचय** स्थान में गोचर वश जा रहा हो तो यदि थोड़े बिन्दु होने के कारण अशुभ फल देने वाला है तो और भी अशुभ फल करेगा । यदि अनुपचय राशि में हो—नीच राशि में हो तों अधिक बिन्दु होने के कारण जैसा शुभ फल करना चाहिए वैसा न करके उससे कम शुभ फल करेगा । यहाँ एक शंका उठती है । मित्र राशि में तो है लेकिन अनुपचय राशि में हो या शत्रु राशि में हो किन्तु उपचय राशि में, तो क्या फल ? इसका उत्तर यही है : शुभ अशुभ (क) अधिक बिन्दु होना (घ) थोड़े बिन्दु होना

  • लग्न से तीसरा, छठा, दसवाँ, ग्यारहवाँ—यह चार जगह उपचय कहलाती हैं । ** लग्न से १, २, ४, ५, ७, ८, ९, १२ अनुपचय स्थान कहलाते हैं ।

५४८ फलदीपिका (ख) स्वराशि, उच्चराशि, अधिमित्र (ङ) नीच राशि, अधि शत्रु या या मित्र राशि में होना या शत्रु राशि में होना (ग) उपचय स्थान में होना (च) अनुपचय स्थान में होना (क) (ख) (ग) शुभता के द्योतक हैं। (घ) (ङ) (च) अशुभता के द्योतक हैं। यदि कोई लक्षण शुभता का हो और कोई लक्षण अशुभता का हो तो मिश्रित फल समझना चाहिए। कृत्वाष्टवर्गं द्युसदां क्रियादि- ष्वक्षंविहीने मृतिरेकबिन्दोः । नाशो व्ययो भीतिभयार्थनारी- श्रीराज्यसिद्धिः क्रमशः फलानि ॥११॥ जब अष्टक वर्ग बनाये जा चुकें तो यह देखना चाहिए कि किस राशि में कितने बिन्दु हैं, यदि किसी राशि में एक भी शुभ बिन्दु न हो और उसमें ग्रह गोचर वश आंवे तो मृत्यु समान कष्ट हो। यहाँ शंका यह होती है कि मान लीजिये सूर्य के अष्टक वर्ग में किसी राशि में कोई भी शुभ बिन्दु नहीं हैं—सूर्य तो उस राशि में प्रत्येक वर्ष एक महीने के लिए आवेगा। तब क्या प्रत्येक वर्ष उस मास में मृत्यु के समान कष्ट होगा ? यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि केवल एक ग्रह मात्र मृत्यु नहीं करता। जब अनेक ग्रह अनिष्ट होते हैं—दशा, अन्तर्दशा और गोचर दोनों बिगड़ते हैं तब मृत्यु होती है। और केवल गोचर में भी जब अनेक ग्रह अनिष्ट होते हैं तब विशेष कष्ट होता है। यदि आठ ग्रह अनुकूल हुए और केवल एक ग्रह अनिष्ट हुआ तो जैसे आठ लोटे ठंढे जल में एक लोटा गरम जल बहुत कम गरमाई पैदा करता है वैसे ही अनिष्ट ग्रह के गोचर का प्रभाव विशेष रूप से अनुभव में नहीं आता। दूसरे, ऊपर जो मृत्यु कहा गया उसका अर्थ मृत्यु ही नहीं

तेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५४९

समझना चाहिए बल्कि मृत्यु समान कष्ट आदि—व्याधि, द्रव्य हानि आदि समझना । यदि एक शुभ बिन्दु हो तो नाश या हानि होती है; यदि दो बिन्दु हों तो व्यय, तीन बिन्दु हों तो भय, चार बिन्दु हों तो भी भय। यद्यपि मन्त्रेश्वर महाराज ने तीन बिन्दु और चार बिन्दु दोनों का प्रायः एक ही फल दिया है किन्तु हमारे विचार से चार बिन्दु वाली राशि में गोचर वश अनिष्ट फल नहीं होगा। यदि पाँच बिन्दु हों तो वाञ्छित वस्तु की प्राप्ति या धन, ६ बिन्दु हों तो स्त्री प्राप्ति, ७ बिन्दु हों तो लक्ष्मी प्राप्ति और ८ बिन्दु हों तो राज्य सिद्धि होती है अर्थात् राज दरबार में मान सम्मान बढ़े ॥११॥

तत्तद्ग्रहाधिष्ठितसर्वराशीं- स्तत्संज्ञितं लग्नमिति प्रकल्प्य । तेभ्यः फलान्यष्टविधान्यभूवं- स्तत्तद्गृहाद्वा ववशाद्वदन्तु ॥१२॥

भारतवर्ष में दो प्रकार के अष्टक वर्ग चक्र बनाए जाते हैं—एक तो जैसे हमने सूर्य का अ

५५० फलदीपिका। रखना। अब इस लग्न से आप सूर्य का अष्टक वर्ग देखिये कि किस भाव में कितने शुभ बिन्दु हैं। इस लग्न से जिस भाव में अधिक बिन्दु हैं उस भाव सम्बन्धी फल—जब सूर्य उस राशि में गोचर वश आवेगा, उत्तम करेगा। उदाहरण के लिये सूर्य जन्म कुण्डली में वृश्चिक में है इससे सप्तम वृषभ राशि है और वृषभ में ७ बिन्दु हैं इस कारण जब सूर्य वृषभ राशि में जावेगा तो स्त्री सम्बन्धी या सप्तम भाव सम्बन्धी उत्तम फल करेगा। ऊपर वृश्चिक से पाँचवें मीन में केवल एक बिन्दु है, इस कारण जब मीन में सूर्य आवेगा तब मानसिक चिन्ता, उद्वेग, सन्तान कष्ट, उदर विकार आदि करेगा। जिस ग्रह का गोचर विचार करना हो, वह ग्रह जिस राशि में जन्म कुण्डली में हो उस राशि को लग्न मानकर फलादेश कीजिये, यह इस श्लोक का सार है ॥१२॥ तत्तद्ग्रहाक्षांशकतुल्यभांश स्थिता ग्रहाश्चारवशादिदानीम् । तथैव तद्भावसमुत्थितानि फलानि कुर्वन्ति शुभाशुभानि ॥१३॥ अब यह बताते हैं कि गोचर वश शुभाशुभ फल कब होगा। जिस राशि में थोड़े बिन्दु हैं वहाँ अशुभ फल और जिस राशि में अधिक बिन्दु हैं वहाँ शुभ फल। परन्तु बृहस्पति एक राशि में साल भर रहता है और शनि २½ वर्ष; तब यह कैसे निश्चय किया जाय कि इस साल भर में या २½ साल के लम्बे अर्से में गोचर वश ग्रह अपना इष्ट या अनिष्ट प्रभाव

तेईसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग ५५१ कब दिखलावेगा। यही बताते हैं। मान लीजिये उदाहरण जन्म कुण्डली में देखिये पृष्ठ ५३८ बृहस्पति के १४ अंश हैं और कन्या राशि में (लग्न से दूसरे) बृहस्पति के ७ शुभ बिन्दु हैं तो जब कन्या राशि में बृह- स्पति के गोचर वश करीब १४ अंश होंगे तब वह अपना फल दिखावेगा। क्योंकि प्रत्येक जन्म कुण्डली में ग्रहों के अंश भिन्न-भिन्न होते हैं, इसीलिये कोई ग्रह गोचर वश शुभ या अशुभ होने पर भी भिन्न-भिन्न अंश प्राप्त होने पर भिन्न-भिन्न लोगों को फल दिखाता है अर्थात् मान लीजिये यज्ञदत्त, देवदत्त, भवदत्त तीनों को धनु का बृहस्पति गोचर वश अनुकूल है, किन्तु यज्ञदत्त की कुण्डली में बृहस्पति के ७ अंश हैं, देवदत्त की कुण्डली में १४ अंश और भवदत्त की कुण्डली में २१ अंश तो गोचर वश धनु राशि में जब बृहस्पति के ७ अंश होंगे तब यज्ञदत्त को शुभ फल प्राप्त होगा। जब १४ अंश बृहस्पति के होंगे तब देवदत्त को शुभ फल प्राप्त होगा और जब इसी धनु राशि में २१ अंश होंगे तब भवदत्त को शुभ फल-प्राप्ति होगी ॥१३॥ कृतेऽष्टवर्गे सति कारकर्क्षात्- य द्भावमुक्ताङ्कमुपैति खेटः । तद्भावपुष्टिं सशुभोऽशुभो वा करोत्यनुक्ते विपरीतमेव ॥१४॥ इस श्लोक में प्रायः वही बात दोहरायी गई है जो श्लोक १२ में बता चुके हैं कि जिस ग्रह का गोचर वश विचार किया जा रहा हो वह जन्म कुण्डली में जिस राशि में है वहाँ से इस समय किस भाव में जा रहा है—उसी भाव सम्बन्धी शुभाशुभ फल करेगा। यदि अधिक बिन्दु हैं तो शुभ फल करेगा। यदि कम बिन्दु हैं तो अशुभ फल करेगा। इसी को उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जाता है। श्लोक १३ के उदाहरण में मान लिया है कि गोचरवश धनु राशि क

५५२ फलदीपिका बृहस्पति, यज्ञदत्त, देवदत्त, भवदत्त तीनों के अनुकूल है, तब तीनों को क्या एक ही फल प्राप्त होगा ? नहीं। यदि यज्ञदत्त की जन्म कुण्डली में मेष का बृहस्पति है तो मेष से धनु नवम होने से उसे नवम भाव सम्बन्धी हर्ष होगा—भाग्योदय होगा। यदि देवदत्त की जन्म कुण्डली में मिथुन का बृहस्पति है तो मिथुन से धनु सप्तम होने के कारण स्त्री सम्बन्धी हर्ष होगा और भवदत्त की कुण्डली में सिंह का बृहस्पति है तो सिंह से धनु पंचम होने के कारण पुत्र या विद्या सम्बन्धी हर्ष होगा ॥१४॥ एकत्र भावे बहवो यदानी- मुक्ताङ्गाश्चारवशाद्व्रजन्ति । पुष्णन्ति तद्भावफलानि सम्यक् तत्कारकात्तत्तनुपूर्वभावे ॥१५॥ ऊपर यह सिद्धांत बता चुके हैं कि किस भाव सम्बन्धी फल होगा। इसका विचार करने के लिये यह देखना चाहिये कि जिस ग्रह का गोचरवश विचार किया जा रहा है, वह जन्मकुण्डली में किस राशि में है। मान लीजिये कि बृहस्पति अपनी जन्माधिष्ठित* राशि से दशम में जा रहा है और बृहस्पति के अष्टक वर्ग में वहाँ अधिक बिन्दु हैं; शनि अपनी जन्माधिष्ठित राशि से दशम में जा रहा है और शनि के अष्टक वर्ग में वहाँ (जहाँ कुण्डली में शनि है वहाँ से दशम स्थान पर) अधिक बिन्दु हैं; सूर्य अपनी जन्माधिष्ठित राशि से दशम में जा रहा हैं और सूर्य के अष्टक वर्ग में वहाँ उसके अधिक बिन्दु हैं। इस प्रकार जब अपनी-अपनी जन्म स्थानीय राशि से अनेक ग्रह एक साथ

  • जन्माधिष्ठित राशि का अर्थ है जन्म कुण्डली में जिस राशि में ग्रह हो ।

तेईसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग ५५३ ही जिस भाव में जा रहे हों और उन राशियों में उनके स्वयं के अष्टक वर्ग में अधिक बिन्दु हों तो उस भाव सम्बन्धी विशेष शुभ फल होता है। जैसे ऊपर सूर्य, बृहस्पति, शनि अपनी-अपनी जन्माधिष्ठित राशि से गोचरवश दशम में हों और वहाँ उनके स्वयं के अष्टक वर्ग में अधिक बिन्दु हों तो दशम भाव सम्बन्धी शुभ फल होगा ॥१५॥ बिन्दौ स्थिते तत्फलसिद्धिकाल विनिर्णयाय प्रहितेऽष्टवर्गे । भान्यष्टधा तत्र विभज्य कक्षा क्रमेण तेषां फलमाहुरन्ये ॥१६॥ आलिख्य चक्रं नव पूर्वरेखाः याम्योत्तरस्था दश च त्रिरेखाः । प्रस्तारकं षण्णवतिप्रकोष्ठं पङ्क्त्यष्टकं चाष्टकवर्गजं स्यात् ॥१७॥ होराशशीबोधनशुक्रसूर्य- भौमामरेन्द्रार्चितभानुपुत्राः । याम्यादिपङ्क्त्यष्टकराशिनाथाः क्रमेण तद्विन्दुफलप्रदाः स्युः ॥१८॥ राश्यष्टभागप्रथमांशकाले शनिर्द्वितीये तु गुरुः फलाय । कक्षाक्रमेणैवमिहान्त्यभाग- काले विलग्नं फलदं प्रदिष्टम् ॥१९॥ श्लोक १६ में यह बताया गया है कि गोचर फल कब होता है। आगे के पृष्ठ पर शनिका प्रस्ताराष्टक वर्ग दिया जा रहा है

५५४ फलदीपिका

मे०वृ०मि०क०सिं०क०तु०वृ०ध०म०कुं०मी०
श०
बृ०
मं०
सू०
शु०
बु०
**चं

तेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५५५

शनि २॥ वर्ष एक राशि में रहता है, किस समय उसका शुभ या अशुभ फल होगा ? निर्णय का एक प्रकार तो १३ वें श्लोक में बता दिया अब दूसरा प्रकार बताते हैं । पृष्ठ ५४४ पर लिखे अनुसार ९६ वर्ग का एक चक्र बनाइये और मान लीजिए आपको शनि का गोचर विचार करना है तो पृष्ठ ५४५ पर जो शनि का अष्टक वर्ग बनाने का प्रकार दिया गया है उसी प्रकार से शनि का अष्टक वर्ग बनाइए । लिखा है कि शनि का अटक वर्ग बनाने में सूर्य से १-२-४- ७-८-१०-११ स्थानों में शुभ बिन्दु डालना इसलिये सूर्य वृश्चिक राशि में है और वृश्चिक से १-२-४-७-८-१०-११ हुये—वृश्चिक, धनु, कुम्भ, वृषभ, मिथुन, सिंह और कन्या—इनमें शुभ बिन्दू लगाइये । इस प्रकार अन्य ग्रहों से भी जहाँ जहाँ शुभ विन्दु पड़ने चाहियें वहाँ वहाँ शुभ बिंदु लगाने से पिछले पृष्ठ पर दिया गया शनि का अष्टक वर्ग तैयार होगा । ऊपर मेष में शनि के दो बिन्दु आये हैं—वृष में ४, मिथुन में ३, कर्क में १, सिंह में ७, कन्या में ६, तुला में ४, वृश्चिक में ३, धनु में १, मकर में ३, कुम्भ में ३ और मीन में २। अब आप पृष्ठ ५४५ देखिये जहां शनि का अष्टक वर्ग बनाया है । सिंह लग्न में ७ बिन्दु हैं लग्न से दूसरे कन्या में ६ बिन्दु हैं लग्न से तीसरे तुला में ४ बिन्दु हैं इत्यादि। पृष्ठ ५४५ पर और पृष्ठ ५५४ पर दोनों एक ही कुण्डली के शनि के अष्टक वर्ग हैं तब पृष्ठ ५५४ फिर वही अष्टक वर्ग पुनः क्यों बनाया गया ? इसलिये कि पृष्ठ ५५४ पर जो अष्टक वर्ग बनाया गया है उसमें यह मालूम होता है कि किस-किस ग्रह ने किस-किस राशि में शुभ बिन्दु डाले हैं। इसका प्रयोजन क्या ? यही बताते हैं । प्रत्येक राशि के आठ भाग कीजिये । यह मालूम ही है कि एक राशि में ३० अंश होते हैं इस कारण ३० को ८ से भाग देने पर ३ अंश ४५ कला आए । तीन-तीन अंश और पेंतालीस-पेंतालीस कलाओं के आठ भाग हो गए । चाहे कोई भी राशि हो प्रथम आठवें

५५६ फलदीपिका भाग पर शनि का अधिकार माना है। इसलिये प्रारम्भिक ३ अंश ४५ कला तक शनि की कक्षा कहलाती है। दूसरे अष्टमांश पर बृहस्पति का अधिकार माना है। इस कारण ३°-४५' से ७½ अंश तक बृहस्पति की कक्षा हुई। बृहस्पति के बाद तृतीय अष्टमांश अर्थात् ७°-३०' से ११°-१५' तक मंगल की कक्षा हुई। मंगल के बाद सूर्य की कक्षा, सूर्य के बाद शुक्र की कक्षा, उसके बाद बुध की और बुध के बाद चन्द्रमा की कक्षा होती है। अन्तिम कक्षा २६°-१५' से ३०° तक लग्न की कक्षा होती है। इसी कारण पृष्ठ ५५४ पर जो शनि का अष्टक वर्ग चक्र दिया है उनमें श० बृ०, मं० सू० शु०, बु० च० ल० यह क्रम रखा है। अब देखिये सिंह राशि में शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य, बुध, चन्द्र, लग्न, इनसे शुभ बिन्दु पड़े हैं इस कारण जब इन कक्षाओं में शनि जावेगा तब गोचर वश शुभ प्रभाव दिखावेगा किन्तु जब शुक्र की कक्षा में जावेगा (शुक्र की पांचवी कक्षा होती है १५° से १८°-४५' तक) तब शुभ फल नहीं दिखावेगा बल्कि अशुभ फल दिखावेगा क्योंकि शनि के अष्टक वर्ग में शुक्र से सिंह राशि में कोई शुभ बिन्दु नहीं पड़ा। यह सूक्ष्म गोचर विचार है ॥ १६-१९ ॥ सर्वग्रहाणां प्रहितेऽष्टवर्गे तत्कालराशिस्थितबिन्दुयोगे । अष्टाक्षसंख्याधिकविन्दवश्चेत् शुभं तदूने व्यसनं क्रमेण ॥२०॥ अब सर्वाष्टक वर्ग बनाना बताते हैं। निम्नलिखित प्रकार से सर्वाष्टक वर्ग बनाइये। पहले जितने शुभ बिन्दु हैं—उनको किस अष्टक वर्ग में, किस राशि में, कितने शुभ बिन्दु हैं यह लिख लीजिये फिर एक नया अष्टक वर्ग चक्र बनाकर भिन्न-भिन्न अष्टक वर्गों में जितने शुभ बिन्दु हैं उनको प्रत्येक राशि के विचार से जोड़ लीजिए।

तेईसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग ५५७ उदाहरण के लिए सिंह राशि में सातों अष्टक वर्ग में क्रमशः ५, ६, ५, ५, ७, ५, ७, यह शुभ बिन्दु क्रमशः सूर्य आदि सातों ग्रहों के अष्टक वर्ग में पड़े हैं। इनका योग ४० हुआ तो सर्वाष्टक वर्ग में सिंह राशि में ४० संख्या लिखेंगे। इसी प्रकार प्रत्येक राशि में जितने शुभ बिन्दु पड़े हैं उनका योग सर्वाष्टक वर्ग में लिखा जाता है। सूर्य का अष्टकवर्गं चन्द्रमा का अष्टकवर्गं मंगल का अष्टकवर्गं बुध का अष्टकवर्गं

५५८ फलदीपिका बृहस्पति का अष्टकवर्ग शुक्र का अष्टकवर्ग शनि का अष्टकवर्ग ऽ——ऽ इस प्रकार सर्वाष्टक वर्ग बनाने पर यह देखना चाहिये कि प्रत्येक राशि में कुल कितने शुभ बिन्दु पड़े। जिस राशि में २८ से अधिक शुभ बिन्दु पड़ें, उसमें जब गोचरवश कोई ग्रह जाता है तो अच्छा फल दिखाता है। यदि २८ से कम संख्या हो और उसमें गोचरवश कोई ग्रह जावे तो अशुभ फल दिखावेगा। २८ से संख्या जितनी कम होगी उतना अशुभ फल अधिक होगा। यहाँ एक शंका यह होती है कि

तेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५५९ मान लीजिये शनि के गोचर का विचार करना है। सर्वाष्टक वर्ग में तो किसी राशि में ३० बिन्दु आवें किन्तु शनि के अष्टक वर्ग में उसके दो ही बिन्दु हैं तब क्या वह शुभ जावेगा ? अथवा मान लीजिये शनि के अष्टक वर्ग में तो ६ बिन्दु हैं किन्तु सर्वाष्टक वर्ग में २२ बिन्दु ही हैं तो क्या शनि का गोचर उस राशि में अशुभ जावेगा । इसका उत्तर यही है कि प्रत्येक ग्रह के स्वयं के अष्टक वर्ग में कितने शुभ बिन्दु हैं और सर्वाष्टक वर्ग में उस राशि में कितने बिन्दु हैं इन दोनों का तारतम्य कर लेना चाहिये । यदि दोनों में शुभ तो गोचर का पूर्ण शुभ फल होगा । यदि दोनों में अशुभ तो पूर्ण अशुभ फल होगा । यदि एक में शुभ और एक में अशुभ तो मध्यम फल समझना चाहिए ॥२०॥ यावन्तस्तुहिनरुचेः शुभाङ्कसंख्या यावन्तः शुभभवने हिमद्युतेर्वा। इत्थं तद्विदितमिहाधिके च तेभ्यः स्वस्त्यूने विपदिति सूचितं परेषाम् ॥२१॥ टिप्पणी :—बहुत से लोग लग्न से भी इस प्रकार विचार करते हैं : मान लीजिये प्रथम भाव में ४० शुभ बिन्दु पड़े तो प्रथम, तेरहवें, पच्चीसवें, ३७वें, ४९वें ६१वें, ७३वें वर्ष में अभ्युदय । यदि अष्टम भाव में कुल १९ बिन्दु पड़े हैं तो ८वें, २०वें, ३२वें, ४४वें, ५६वें, ६८वें वर्ष में शरीर कष्ट आदि। इस प्रकार जिस भाव में अधिक बिन्दु पड़े हों उस-उस वर्ष में और उससे प्रत्येक बारहवें वर्ष में शुभ । जिस भाव में थोड़े बिन्दु पड़े हों उस वर्ष में और उससे प्रत्येक १२वें वर्ष में कष्ट । विशेष विवरण के लिये देखिये श्री जीवनाथ शर्मा विरचित जन्म-पत्रिका विधानम् पृ० ३६-४१ ।

५६० फलदीपिका प्रायः षष्ठ, अष्टम, द्वादश—यह तीनों अशुभ भवन माने जाते हैं बाकी के शुभ भवन । शुभ भवनों में अधिक बिन्दु होना शुभ है । इसी प्रकार चन्द्र लग्न से विचार कीजिये । (क) यदि चन्द्र लग्न से शुभ भवनों में २८ से अधिक संख्या हो तो उन-उन भावों की समृद्धि होती है यदि २८ से कम हो तो उन-उन भावों की हानि होती है । (ख) चन्द्रमा से किन भावों में शुभ ग्रह पड़े हैं यह देखिये । यदि इन शुभ ग्रहाधिष्ठित राशियों में २८ से अधिक बिन्दु हैं तो इन भावों की समृद्धि समझनी चाहिये । यदि २८ से कम हों उस-उस भाव सम्बन्धी विपत्ति समझनी चाहिये ॥२१॥ कतुः स्वजन्मसमयावसथग्रहाणां कृत्वाष्टवर्गकथिताक्षविधानमत्र । बह्वक्षयोगवशतः शुभराशिमास- भावग्रहस्थितिषु कर्मशुभं विदध्यात् ॥२२॥ ऊपर जो सर्वाष्टक वर्ग बनाना बताया गया है उसका एक अन्य उपयोग और बताते हैं । अपने जन्म के समय जो ग्रह जिस राशि में थे और जो जन्म लग्न और सात ग्रह—या उन आठ आधारों पर जो सर्वाष्टक वर्ग तैयार किया गया है उसमें जिस-जिस राशि में अधिक बिन्दु हों उनमें शुभ कार्य करने चाहियें । ऐसा करने से विशेष सफलता प्राप्त होगी । उदाहरण के लिये जन्म लग्न सिंह है और सिंह राशि में सर्वाष्टक वर्ग में ४० बिन्दु पड़े हैं तो जब सिंह में सूर्य हो या सिंह में चन्द्रमा हो या सिंह में बृहस्पति हो या जब पूर्वीय क्षितिज पर सिंह लग्न उदित हो तब इस कुण्डली वाला जातक जो-जो कार्य करेगा । उसमें विशेष सफलता होगी। प्रत्येक मनुष्य को कौन सा वर्ष, मास

तेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५६१ या दिन अधिक अनुकूल या सफलता देने वाला होगा यह देखने के लिए सर्वाष्टक वर्ग एक साधन है ॥ २२ ॥ पापोऽपि स्वगृहस्थश्चेद्भाववृद्धिं करोत्यलम् । नीचारातिगृहस्थश्चेत्कुर्याद्भावक्षयं ध्रुवम् ॥२३॥ अब गोचर विचार के सम्बन्ध में एक नवीन सिद्धान्त और बताते हैं। यदि पापी ग्रह भी अपने भाव में जावे तो भाव की वृद्धि करता है। किन्तु यदि कोई ग्रह नीच राशि का हो या शत्रु राशि का हो तो उस भाव को बिगाड़ता है ॥ २३ ॥ स्वोच्चस्थोऽपि शुभो भावहानिं दुःस्थानपो यदि । सुस्थानपश्चेत् स्वोच्चस्थः पापी भावानुकूल्यकृत् ॥२४॥ यदि कोई ग्रह दुःस्थान का मालिक हो तो चाहे वह शुभ हो और उच्च राशि में भी हो--जिस भाव में है उस भाव को बिगाड़ेगा। किन्तु यदि सुस्थान का मालिक होकर उच्च स्थान में है तो उस भाव को बढ़ावेगा ॥२४॥ टिप्पणी :--ऊपर श्लोक २३ और २४ में जो सिद्धान्त बताये गये हैं वे यद्यपि इस अध्याय में गोचर के प्रकरण में कहे गये हैं किन्तु इनका उपयोग जन्म कुण्डली तथा गोचर दोनों में समान रूप से कर सकते हैं।

चौबीसवाँ अध्याय अष्टकवर्गफल अर्कस्थितस्य नवमो राशिः पितृगृहः स्मृतः । तद्राशिफलसंख्याभिर्वर्द्धयेच्छोध्यपिण्डकम् ॥१॥ अब होरासार में जो अष्टक वर्ग का फल दिया है वह बतलाते हैं। सूर्य जिस राशि में हो उस राशि से जो नवम (९वीं) राशि हो उसे “पिता का घर” कहते हैं अर्थात् उस घर से पिता का विचार करना । सूर्य के अष्टक वर्ग में—उस 'पिता के घर' में जितने शुभ बिन्दु हों— उस संख्या से "शोध्यपिण्ड" को गुणा करना । शोध्यपिण्ड कैसे बनाया जाता है, यह आगे बतलावेंगे ॥ १ ॥ सप्तविंशहताल्लब्धं नक्षत्रं याति भानुजे । तस्मिन् काले पितृक्लेशो भविष्यति न संशयः ॥२॥ यह जो (ऊपर के बताये हुए प्रकार से) संख्या आई—उस संख्या को सत्ताइस से भाग देना । शेष संख्या से जो नक्षत्र आवे (जैसे अश्विनी से १, भरणी से २, कृत्तिका से ३ आदि) उस नक्षत्र में जब गोचर में शनि आवे तो जातक के पिता को अवश्य क्लेश होता है । ॥२॥ तत्तत्रिकोणगते वाऽपि पितृतुल्यस्य वा मृतिः । संयोगः शोध्यशेषाणां शोध्यपिण्ड इति स्मृतः ॥३॥ अथवा ऊपर (श्लोक २ में) जो नक्षत्र आया है, उससे त्रिकोण में जब शनि आता है तो पिता के तुल्य—चाचा आदि की मृत्यु

चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्गफल ५६३ होती है। अश्विनी की संख्या १ है—इससे त्रिकोण में मघा और मूल हुए। भरणी के त्रिकोण में पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ हुए। इसी प्रकार अन्य नक्षत्रों का त्रिकोण होता है। त्रिकोण शोधन और एकाधि- पत्य शोधन के बाद जो शुभ बिन्दु बच जाते हैं, उन्हें शोध्य पिंड कहते हैं। यह त्रिकोण शोधन और एकाधिपत्य शोधन का प्रकार आगे बतलावेंगे ॥३॥ लग्नात्सुखेश्वरांशेशदशायां च पितृक्षयः । सुखनाथदशायां वा पितृतुल्यमृतिं वदेत् ॥४॥ लग्न से चौथे घर का स्वामी जिस नवांश में हो—उस नवांश के स्वामी की दशा में पिता की मृत्यु होती है। चौथे घर के मालिक की दशा में पिता-तुल्य (चाचा आदि) की मृत्यु होती है ॥४॥ संशोध्य पिण्डं सूर्यस्य रन्ध्रमानेन वर्द्धयेत् । द्वादशेन हृताच्छेषराशिं याते दिवाकरे ॥५॥ तत्त्रिकोणगते वाऽपि मरणं तस्य निर्दिशेत् । एवं ग्रहाणां सर्वेषां चिन्तयेन्मतिमान्नरः ॥६॥ सूर्याष्टक वर्ग में जो शोध्यपिंड हो उसमें ८ जोड़िये और जो जोड़ आवे, उसमें १२ का भाग दीजिये। जो शेष बचे उस वाली राशि में (जैसे १ शेष बचे तो मेष, २ शेष बचे तो वृष इत्यादि) जब सूर्य आवे या उससे पांचवीं या नवीं राशि में जब सूर्य आवे (गोचरवश) तब पिता की मृत्यु की संभावना होती है। वैसे तो प्रतिवर्ष सूर्य उन राशियों में आता है, किन्तु यहाँ अभिप्राय यह है कि जब दशा, अन्तर्दशा के विचार से, तथा शनि के गोचर विचार से पिता की मृत्यु

५६४ फलदीपिका मालूम पड़ती हो तब उस वर्ष में किस महीने में मृत्यु की संभावना है यह देखने के लिये सूर्य का गोचर फल बताया गया है। जैसे सूर्य के अष्टक वर्ग से ऊपर के श्लोकों में पिता का मृत्युकाल निश्चय करने के नियम बताये गये, इसी प्रकार चन्द्रमा के अष्टकवर्ग से माता का मंगल के अष्टकवर्ग से भाई का··इत्यादि विचार बुद्धिमान् व्यक्ति को करना चाहिये ॥५-६॥ चन्द्रात्सुखफलैः पिण्डं हत्वा सारावशेषितम् । शनौ याते मातृहानिः त्रिकोणक्षंगतेऽपि वा ॥७॥ चन्द्रमा के अष्टकवर्ग में चन्द्रमा से चौथी राशि में जितने शुभ बिन्दु हों उनको चन्द्रमा के अष्टक वर्ग के शोध्यपिंड से गुणा कीजिये। जो गुणन फल आवे उसमें २७ का भाग दीजिये। जो शेष आवे उस नक्षत्र की संख्या में या उससे त्रिकोण के नक्षत्र में जब शनि गोचरवश आवे तब माता की मृत्यु की संभावना होती है ॥७॥ चन्द्रात्सुखाष्टमेशांशत्रिकोणे दिवसाधिपे । मातुर्वियोगं तन्मासे निर्दिशेल्लग्नतः पितुः ॥८॥ चन्द्रमा जिस राशि में हो—उससे चौथे और आठवें घर के मालिक किस नवांश में बैठे हैं यह देखिये । जब इन नवांश से गोचर वश सूर्य त्रिकोण में जावे—तो माता की मृत्यु होती है। जैसे ऊपर चन्द्रमा से चौथे और आठवें के मालिक किन नवांशों में हैं, वैसे लग्न से चौथे और आठवें के मालिक किन नवांशों में हैं यह देखिये—उन नवांश राशियों से जब त्रिकोण में सूर्य जावे तो पिता की मृत्यु होती है ॥८॥