भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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अन्त में अज ने प्रियम्वद नामक गन्धर्व से प्राप्त गन्धर्वदेवतात्मक निद्राकारक अस्त्र का प्रक्षेप किया, जिसके प्रभाव से सबके सब राजा एवं सैनिक ज्यों के त्यों चेष्ट-शून्य होकर सो गये। अज ने विजय-शंख बजाया, शंखध्वनि सुनकर अज के सैनिक उनके पास लौट आये। इस प्रकार विजय लक्ष्मी प्राप्त कर अज घबड़ाई हुई इन्दुमती के पास आकर बोले—प्रिये ! देखो, इन राजाओं को, वे इसी बल पर मुझसे युद्ध कर तुमको छीनना चाहते थे। इस समय ये ऐसे निश्चेष्ट हो गये हैं कि छोटे-छोटे बच्चे भी इनके अस्त्र छीन सकते हैं।

पति की वीरता एवं विजय से इन्दुमती को बड़ी प्रसन्नता हुई किन्तु लज्जावश स्वयं कुछ न कहकर अपनी दासी के द्वारा उनका अभिनन्दन किया। इस प्रकार उन पूर्व विरोधी राजाओं को परास्त कर मूर्तिमती विजय लक्ष्मी के समान इन्दुमती को लेकर अज अपनी राजधानी अयोध्या लौट आये। राजा रघु ने यह सारा वृत्तान्त पहले ही सुन लिया था। अतः विजयी और प्रशंसनीय भार्या के साथ लौटे हुए अपने पुत्र अज का स्वागत करने के बाद कुटुम्बपालन करने का कार्य एवं राज्य भार सौंप दिया और स्वयं शान्ति मार्ग का आश्रय लिया। ठीक ही है, सूर्यवंशी राजे, कुल का भार सँभालने योग्य पुत्र के हो जाने पर गृहस्थाश्रम में नहीं रहते, किन्तु चतुर्थाश्रमी हो जाते हैं।

अष्टम सर्ग

अभी अज ने विवाह का मंगल सूत्र उतारा भी नहीं था कि राजा रघु ने अपने हाथों सारी पृथ्वी उन्हें समर्पित कर दी और अज ने भी उस राज को अपने पिता की आज्ञा मानकर स्वीकार कर लिया। जिस समय अज का राज्याभिषेक हुआ उस समय गुरु वसिष्ठजी ने उनके ऊपर पवित्र जल छिड़का जिससे सभी को भी बड़ा सन्तोष हुआ। राज्याभिषेक के बाद अज इतने तेजस्वी हो उठे कि उनके सभी शत्रु काँप उठे क्योंकि ब्रह्मतेज के साथ क्षात्र तेज मिल जाता है तब राजा इतना बलशाली हो जाता है कि जैसे वायु का सहारा पाकर अग्नि भभक उठता है। प्रजा ने रघु को राजा पाकर यही समझा मानो रघु ही पुनः युवा हो गये क्योंकि उन्होंने केवल अपने पिता का राज्यमात्र नहीं पाया, किन्तु रघु के सभी गुण उसमें आ गये।

अज ने नई पायी पृथ्वी का पालन बड़ी दयालुता के साथ करना आरम्भ कर

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दिया। वे अपनी प्रजा को बड़ा प्यार करते थे। वे न तो कठोर थे न अत्यन्त कोमल ही। उन्होंने अपने शत्रुओं को वायु के झोकों के समान प्रभाव दिखाकर दबा दिया। जब रघु ने देखा कि मेरे पुत्र अज का प्रजा में बड़ा आदर है तो उन्होंने स्वर्ग के सुख की चाह कर अपने गुणवान् पुत्र अज को राज्य का भार सौंप कर राज्य के बाहर कुटिया बनाकर सस्त्रीक रहने लगे। उस समय सूर्यवंश उस आकाश के समान लग रहा था जिसमें एक ओर चन्द्रमा छिप रहे हों और दूसरी ओर सूर्य का उदय हो रहा हो। इधर राजा अज प्रजाजनों की देखभाल करने के लिए राज्यासन पर विराजमान थे तो दूसरी ओर राजा रघु कुशासन पर बैठकर मनको साधने का अभ्यास कर रहे थे। अज ने तो अपने प्रभुत्व से राजाओं को वश में कर लिया और रघु ने ज्ञान की अग्नि से अपने शरीर को योगबल से परमात्मा में विलीन कर दिया। अपने पिता का देहत्याग सुनकर अज बहुत रोए; अन्त में रोगियों के समान उनको समाधि देकर बड़ी भक्ति से पिता का बड़े धूमधाम से और्ध्वदेहिक संस्कार कर दिया। ज्ञानी विद्वानों के समझाने-बुझाने से अब धीरज बाँध कर धर्मपूर्वक प्रजा पालन करने लगे।

कुछ दिनों के बाद इन्दुमती ने एक वीर पुत्र को जन्म दिया। ये अज के पुत्र सूर्य के समान तेजस्वी थे, जिनका यश दसों दिशाओं में फैल गया जिसे पण्डित लोग दशरथ कहते थे। वेदों का अध्ययन कर ऋषि ऋण से, यज्ञ करके देव ऋण से और पुत्र उत्पन्न कर पितृ ऋण से मुक्त होकर अज सूर्य के समान शोभा पा रहे थे। एक दिन अज अपनी रानी इन्दुमती के साथ नन्दन वन में बिहार कर रहे थे। उसी समय शंकर जी को वीणा के साथ गान सुनाने के लिए देवर्षि नारद आकाश मार्ग से चले जा रहे थे जिनकी वीणा के सिर पर स्वर्गीय फूलों से गुथी हुई माला लटकी हुई थी। वायु के वेग से वह माला खिसककर अचानक इन्दुमती के स्तनों के बीच आकर गिर पड़ी। इन्दुमती ने देखते ही व्याकुल होकर आँखें मूद लीं और प्राणविहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। प्राण निकलने पर इन्दुमती का शरीर पीला पड़ गया। उनका धीरज छूट गया गला भर गया और उसे वीणा के समान गोद में लेकर राजा विलाप करने लगे, राजा कहने लगे जब फूल भी शरीर छूकर प्राण ले सकता है तब तो दैव किसी वस्तु से भी किसी को मार सकता है। यदि माला में प्राण हरने की शक्ति है तो मैं भी इसे छाती पर रख लेता हूँ।

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ईश्वर की इच्छा से कहीं विष भी अमृत हो जाता है और कहीं अमृत भी विष हो जाता है । प्रिये ! मैंने बहुत अपराध किये पर तुमने कभी मेरा तिरस्कार नहीं किया । मैंने मन से भी तुम्हारी बुराई नहीं की फिर तुम क्यों छोड़ जा रही हो । देखो चन्द्रमा को रात्रि पुनः मिल जाती है, चकवे को चकवी प्रातः मिल जाती है पर तुम तो सदा के लिए चल बसी ! अब मैं क्या करूँ ? तुम्हारे चरणों की कृपा का स्मरण कर यह अशोक वृक्ष फूलों की आँसू बरसाकर तुम्हारे लिए रो रहा है । तुम्हारे सुख-दुःख की साथी सखियाँ रो रही हैं, चन्द्रमा के समान प्रसन्न मुख वाला तुम्हारा पुत्र विलख रहा है और तुम्हारा अनन्य प्रेमी मैं अत्यन्त दुःखी हूँ । आज मेरा धीरज छूट गया है । आनन्द जाता रहा, तुम्हीं बताओ मुझसे तुम्हें छीनकर निर्दयी विधाताने मेरा क्या नहीं छीन लिया ।

जब कोशलनरेश अपनी प्रिया के लिए इस प्रकार शोक कर रहे थे उस समय उन्हें देखकर वृक्ष भी मानों अपना शाखाओं से रस बहाकर आँसू बहाने लगे । कुटुम्बियों ने अज के गोद से इन्दुमती को हटाया और पुष्प माला से सजाकर ज्योंही चन्दन की लकड़ियों से उसका दाह संस्कार किया त्योंही अज पत्नी के वियोग में व्याकुल हो उठे । शास्त्रविधिके अनुसार दश दिन कृत्य सम्पन्न कर जब वे नगर में घुसे तब उन्हें देखकर नगर भर के लोग फूट-फूट कर रोने लगे ।

उन दिनों महर्षि वशिष्ठ अपने आश्रम पर ही एक यज्ञ में संलग्न थे, योग बल से राजाके शोक का कारण जानकर एक शिष्यसे सन्देश भेजा । एक बार तृणविन्दु नामक ऋषि तप कर रहे थे । उनकी तपस्या से डरकर इन्द्र ने उनका तप भंग करने के लिए हिरणी नामकी अप्सरा भेजी । जैसे गंगा की लहर तट को गिरा देती है वैसे ही ऋषि को तप से डिगाने के लिए वह अप्सरा वहाँ आ पहुँची । उसे देखते ही मुनि ने क्रुद्ध होकर शाप दिया कि जा तू संसार में मनुष्य की स्त्री हो जा । वह शाप सुनते ही घबड़ाकर मुनि से हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाती हुई बोली—भगवन् ! मैंने दूसरों के कहने से यह काम किया है । इसमें मेरा दोष नहीं हैं, मुझे क्षमा कीजिए । यह सुन ऋषि ने कहा जब तक तुम्हें स्वर्गीय पुष्प नहीं दिखाई पड़ेगा तब तक तुम्हें भूतल पर रहना पड़ेगा । वही अप्सरा विदर्भ वंश में जन्म लेकर तुम्हारी रानी बनी थी अब स्वर्गीय पुष्प देखकर वह शाप से मुक्त होकर स्वर्ग चली गई । अतः आप उसकी मृत्यु का शोक न करें। अब शोक छोड़कर पृथ्वी का पालन कीजिए ।

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राजाओं की सच्ची पत्नी तो पृथ्वी ही है । तुम्हारे मरने पर भी वह अब न मिलेगी, क्योंकि मरने पर प्राणी अपने अपने कर्म के अनुसार अलग-अलग मार्ग से जाते हैं । शास्त्र कहते हैं कि जब कुटुम्बी अधिक रोते हैं तब प्रेतात्मा को बड़ा कष्ट होता है । जब शरीर और आत्मा का बिछोह हो जाता है तब पुत्र स्त्री आदि की क्या बात है । आप जितेन्द्रियों में श्रेष्ठ हैं अतः शोक मत कीजिए । इस प्रकार राजा ने आठ वर्ष किसी तरह बिताकर अपने सुशिक्षित कुमार दशरथ को शास्त्र के अनुसार प्रजापालन का उपदेश देकर भगवद्भजन करते हुए गंगा-सरयू संगम पर अपना शरीर त्यागकर स्वर्ग के नन्दन वन में चले गये । ( रघुवंश के आठवें सर्ग का इन्दुमती के मरने पर राजा अज का विलाप तथा कुमार संभव के चतुर्थ सर्ग में शङ्कर जी के क्रोधाग्नि से भस्म हुए कामदेव को देखकर रति का विलाप संस्कृत काव्यों में करुण रस का हृदयविदारक दृश्य है । )

नवम सर्ग

संयम से अपनी इन्द्रियों को जीत लेनेवाले योगियों में तथा प्रजापालक राजाओं में सर्वश्रेष्ठ राजा दशरथ ने अपने पिता के पश्चात् उत्तर कोशल का राज्य बड़ी योग्यता से संभाला । वे कार्तिकेय के समान बलवान् और समुद्र के समान गम्भीर थे । विद्वानों का कहना है कि इस विश्व में दो ही व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने कर्तव्यपालन करने वाले लोगों को समुचित फल दिया—एक मनुवंशी राजा दशरथ और दूसरा देवराज इन्द्र । दशरथ देवताओं के समान तेजस्वी और सागर के समान शान्त एवं धैर्यवान् थे । वे सबको समान समझते थे और सबसे एक-सा व्यवहार करते थे । वे कुबेर के समान प्रजाओं में धन बरसाते थे । हँसी में भी उन्होंने झूठ नहीं बोला । वे धनुष लेकर और अकेले रथ पर बैठकर समुद्र तक फैली हुई पृथ्वी का शासन करते थे । बादल के समान गरजता हुआ समुद्र उनका जय-जयकार करता था ।

जैसे इन्द्र ने अपने वज्र से पर्वतों के पंख काट दिये थे वैसे ही दशरथ ने अपने बाणों से शत्रुओं का सफाया कर दिया था । उनकी अयोध्या नगरी कुबेर की अलका से कम न थी । चक्रवर्ती राजा होने पर भी उनमें आलस्य नहीं था । जैसे पर्वतों से निकलनेवाली नदियां समुद्र को पा लेती हैं वैसे ही कोशल;

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मगध तथा कैकय देश की राजाओं की कौशल्या, सुमित्रा तथा कैकेयी नामक कन्याओं ने राजा दशरथ को पति के रूप में प्राप्त किया । दशरथ अपनी तीनों रानियों के साथ ऐसा जान पड़ते थे मानों पृथ्वी पर राज्य करने के निमित्त स्वयं इन्द्र ही प्रभाव, उत्साह एवं मन्त्र नामकी अपनी तीन शक्तियों के साथ अवतार लेकर चले आये हैं ।

दशरथ ने युद्ध में इन्द्र की सहायता करके अपने बाणों से उनके शत्रुओं का नाश करके देवताओं की स्त्रियों का डर दूर कर दिया था । उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ किये थे । अकेले रथ पर चढ़कर युद्ध करने वाले इन्द्र से भी आगे चलने वाले दशरथने सूर्य पर छाई हुई युद्ध की धूल राक्षसों के खून से सींच-सींचकर दबा दी थी । राजा दशरथ की चतुर नीति से उनके पास बहुत सा धन इकट्ठा हो गया था जिससे वे अपनी प्रजाओं का उपकार करते थे । विष्णु के समान पराक्रमी, वसन्त के समान प्रसन्न और कामदेव के समान सुन्दर राजा दशरथ ने भी सुन्दरी स्त्रियों के साथ उस प्रफुल्लित वसन्त ऋतु का आनन्द लिया और फिर भी उनके मन में आखेट खेलने की इच्छा होने लगी । मन्त्रियों से सलाह कर वे आखेट के लिए निकल पड़े । जंगल में हरिण, सूकर, भैंसे, बारहसिंहे, सिंह, हाथियां, चामर मृग आदि का शिकार खेलते हुए एक दिन रुरु मृग का पीछा करते हुए अपने साथियों से दूर भटक गये घोड़े पर चढ़े हुए तमसा नदी के तट पर निकल गये जहां तपस्वियों के आश्रम बने हुए थे । वहां जल में कोई घड़ा भर रहा था । राजा ने समझा कि यह कोई हाथी है । उन्होंने उसका लक्ष्य कर झट शब्दवेधी बाण चला दिया । सहसा कोई चिल्ला उठा हाय पिता ? यह सुनकर राजा का माथा ठनका । पास जाकर देखा कि बाणों से विधा घड़े पर झुका हुआ कोई मुनिकुमार है । जब राजा ने उसके वंश का परिचय पूछा तो उसने बताया कि मेरे पिता वैश्य हैं और माता शूद्रा है । मुझे मेरे अन्धे माता-पिता के पास पहुँचा दो । तब राजा ने उसे उनके पास पहुँचा कर बताया कि भूल से मैंने आपके पुत्र पर बाण चला दिया है । यह सुनते ही वे रोने लगे और उन्होंने कहा पुत्र की छाती से बाण निकाल दो । बाण निकालते ही उसके प्राणपखेरू निकल गये । इस पर उसने शाप दिया कि जाओ तुम भी हमारे समान बुढ़ापे में पुत्र शोक से प्राण छोड़ोगे । राजा ने कहा कि मैं आपके शाप को वरदान समझता हूँ क्योंकि इसी बहाने मुझे पुत्र का मुख तो देखने का सौभाग्य प्राप्त होगा । यह कहकर राजा ने पुनः कहा—मैं तो आपके बध के

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योग्य हूँ मेरे लिए क्या आज्ञा है ? यह सुनकर मुनि ने कहा—हम और हमारी स्त्री अब अपने पुत्र के साथ ही मर जायेंगे । अतः आप हमारे लिए ईंधन और आग जुटा दो । राजा ने तत्काल इंधन और आग जुटा दी । वे चिता में साथ मर कर स्वर्ग सिधार गये और राजा अपने पाप से अधीर होकर मुनि का शाप लेकर अपने घर लौटे ।

दशम सर्ग

इन्द्र के समान तेजस्वी राजा दशरथ को पृथ्वी पर राज्य करते-करते लग-भग दश हजार वर्ष बीत गये । उन्हें कोई सन्तान नहीं हुई । तब ऋष्यशृंग की प्रधानता में ऋषियों ने सन्तान के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराना प्रारम्भ किया । उसी समय रावण के अत्याचार से घबड़ाकर देवता लोग ज्यों ही क्षीरसागर में विष्णु की शरण में गये त्यों ही भगवान् विष्णु योग निद्रा से उठ गये । शेष-शायी विष्णु के चरण कमल को लक्ष्मी जी गोद में लेकर पलोट रही हैं, सुनहले वस्त्र पहने हुए विष्णु के वक्षःस्थल पर कौस्तुभ मणि चमक रहा था भृगुलता-श्रीवत्स का चिह्न सुशोभित था । गरुड़ जी बड़ी नम्रता से हाथ जोड़े खड़े थे । देवताओं ने भगवान् विष्णु को प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगे और कहे कि जैसे समुद्र के रत्न, सूर्य की किरणें नहीं गिनी जा सकतीं और पृथ्वी के कण नहीं गिने जा सकते वैसे ही स्तुति करके आपका चरित वर्णन नहीं किया जा सकता है । प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने उनसे कुशल प्रश्न पूछा, जिसके उत्तर में देवताओं ने कहा—आज कल ऐसे राक्षस उत्पन्न हो गये हैं जिन्होंने संसार की मर्यादा भंग कर सर्वत्र हाहाकार मचा दिया है । यह सुनकर वे बोले देवताओं ! जैसे संसार के जीवों को सत्त्व, रज तथा तम दबा देता है वैसे ही आपके तेज और बल को रावण दबा बैठा है इसलिए रावण को मिटा देना मेरा और इन्द्र का काम है, आग की सहायता के लिए वायु से कहना नहीं पड़ता है, वह तो स्वयं आग को उभाड़ देता है । शिवजी को प्रसन्न करने के लिए रावण ने अपने नव शिर काटकर चढ़ा दिया है । मालूम पड़ता है कि दशवाँ शिर मेरे चक्र से कटने के लिए रख छोड़ा है । ब्रह्माजी ने जो वरदान दे दिया है उसी से मैं उसका चढ़ाना उसी प्रकार सहता हूँ जैसे अपने ऊपर चढ़ते हुए सांप को चन्दन वृक्ष सह लेता है । जब ब्रह्माजी उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए तब उसने यही वर

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मांगा कि मैं देवताओं के हाथ से न मारा जा सकूँ' । अतः मैं राजा दशरथ के यहाँ जन्म लेकर अपने बाणों से उसके शिरों को काटकर पृथ्वी को भेंट कर दूँगा। अब आप लोग निडर होकर अपने-अपने विमानों पर चढ़कर आकाश घूमिए तथा रावण के पुष्पक विमान का डर छोड़ दीजिए। जैसे सूखे खेत पर पानी बरसाकर बादल निकल जाय वैसे ही मधुर वचन से देवताओं को तृप्त कर वे अन्तर्धान हो गये।

इधर ज्यों ही राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ समाप्त हुआ त्यों ही यज्ञाग्नि से एक पुरुष प्रगट हुआ, जिसके हाथ में खीर भरा हुआ सोने का कटोरा था। जैसे इन्द्र ने समुद्र से निकले हुए अमृत कलश को अपने हाथ में ले लिया वैसे ही राजा दशरथ ने भी उस दिव्य पुरुष के हाथ से वह खीर ले ली। खीर के रूप में विष्णु से पाये हुए क्षीर को राजा दशरथ ने कौशल्या और कैकेयी में बराबर बाँट दिया। पुनः उन दोनों ने अपनी-अपनी खीर का आधा-आधा भाग अपनी प्रिय सपत्नी सुमित्रा को दे दिया। परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने लोक कल्याण के लिए विष्णु के अंश से भरे गर्भ को धारण किया। यद्यपि विष्णु का एक ही रूप है पर जैसे निर्मल जल में चन्द्रमा के अनेक प्रतिबिम्ब पड़ जाते हैं वैसे ही वे तीनों रानियों के गर्भो में अलग-अलग निवास कर रहे थे। कौशल्या जी के गर्भ से श्री राम, कैकेयी के गर्भ से भरत जी तथा सुमित्रा जी के गर्भ से लक्ष्मण और शत्रुघ्न दो जोड़वा पुत्र उत्पन्न हुए । अयोध्या में बड़ा हर्ष और उत्सव मनाया गया तथा लङ्का में रावण के मुकुटमणि पृथ्वी पर गिर पड़े, मानो राक्षसों की लक्ष्मी की आंसू ढुलक रही हो। जातकर्म आदि संस्कार हो जाने पर चारो राजकुमार बढ़ने लगे, चारो कुमार मानो धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के रूप माने जाने लगे और गुरु वसिष्ठजी के घर ब्रह्मचर्य पूर्वक विद्याभ्यास करने लगे।

एकादश सर्ग

एक दिन विश्वामित्रजी राजा दशरथ के पास आये और उन्होंने कहा कि मेरे यज्ञ की रक्षा के लिए राम को मेरे साथ भेज दीजिए। यद्यपि दशरथ ने राम-लक्ष्मण को बड़ी तपस्या से वृद्धावस्था में पाया था पर ऋषि के प्रभाव से प्रभावित हो तत्काल उन्होंने राम-लक्ष्मण को उनके साथ भेज दिया। पिता की आज्ञा से दोनों राजकुमार धनुष लेकर विश्वामित्रजी के पीछे चल दिये। राजा

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ने इनकी सहायता के लिए सेना नहीं भेजी, ऋषि का आशीर्वाद ही पर्याप्त था। आज तक दोनों बालकों ने घर से बाहर पैर रखा ही न था इसलिए मार्ग में ही विश्वामित्रजी ने उन्हें बला और अतिबला विद्याएँ सिखा दी जिनके प्रभाव से उनको न तो थकान लगी, न भूख-प्यास ही। कमलों से सुशोभित सरोवरों तथा वृक्षों की छाया में भी आश्रमवासी उतने प्रसन्न नहीं थे जितना इन दोनों राजकुमारों को देखकर प्रसन्न हुए।

मार्ग में उन्हें सुकेतु की कन्या ताड़का राक्षसी मिली, जिसने समस्त आश्रम को उजाड़ बना दिया था। जिसकी कथा विश्वामित्रजी ने पहले ही बता दी थी। उसे देखते ही दोनों भाइयों ने धनुष को पृथ्वी पर टेककर डोरियाँ चढ़ा लीं। उसकी ध्वनि सुनते ही अमावस्या की रात्रि के समान काली-कलूटी ताड़का उनके आगे आकर खड़ी हो गयी और बड़े वेग से गरजती हुई राम पर टूट पड़ी। यह देखकर राम ने स्त्री-वध की घृणा और बाण दोनों एक साथ छोड़े। राम के बाण से ताड़का की छाती फट गयी और वह जमीन पर गिर गयी। साथ ही रावण की राजलक्ष्मी भी कांप उठी। ताड़का के मरने से प्रसन्न होकर विश्वामित्रजी ने राक्षसों का संहार करने वाला दिव्य अस्त्र भी मन्त्र सहित दे दिया। उसके बाद ऋषि के आश्रम पर पहुँचकर उन्होंने बड़े-बड़े राक्षसों को मारा। दिव्य अस्त्र चलाने में राम का हाथ इतना सधा हुआ था कि उन्होंने झट अपने धनुष पर वायव्य अस्त्र चढ़ाया और ताड़का के पुत्र मारीच को दूर फेंक दिया तथा सुबाहु को भी मार गिराया। यह अद्भुत पराक्रम देखकर ऋषियों ने राम की बड़ी प्रशंसा की और विश्वामित्रजी ने विधि के साथ यज्ञ समाप्त कर राम और लक्ष्मण को बड़ा ही शुभाशीर्वाद दिया और उसके शिर पर अपनी हथेली रखकर अपना बड़ा स्नेह दिखाया।

उन्हीं दिनों मिथिलानरेश राजा जनक ने धनुषयज्ञ ठान रखा था जिसमें उन्होंने मुनियों को भी निमन्त्रित किया था। धनुषयज्ञ की बात सुनकर राम-लक्ष्मण दोनों को बड़ा कुतूहल हुआ, अतः विश्वामित्र उन दोनों राजकुमारों को साथ लेकर मिथिलापुरी की ओर चल दिये। कुछ दूर जाने के बाद शाम हो गयी और वे उस आश्रम के वृक्षों के नीचे टिक गये जहाँ गौतम मुनि की पत्नी अहल्या पति के श्राप से पत्थर बन गयी थी। राम की चरण-धूलि के स्पर्श से वह सुन्दर स्त्री बन गयी। राजा जनक ने ऋषि का आगमन सुनकर राजकुमारों के साथ उनका बड़ा सत्कार किया। जनकपुर निवासी राज-

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कुमारों को देखकर अत्यन्त मगन हो गये। विश्वामित्रजी ने कहा—राजन् ! ये राजकुमार धनुष देखना चाहते हैं। इसपर उन्हें बड़ा विषाद हुआ ओर अपनी प्रतिज्ञा पर पश्चात्ताप होने लगा। उन्होंने सोचा कि ऐसे राजकुमारों के रहते धनुषयज्ञ का अड़ङ्गा क्यों लगाया। जब इस धनुष को उठाने में बड़े-बड़े राजा मुँहकी खाकर चले गये तों ये बालक उसे कैसे उठा सकते हैं ? यह सुनकर मुनि बोले—राजन् ! इनकी शक्ति मैं जानता हूँ, कहने से क्या होता है ? जैसे वज्र की परीक्षा पहाड़ पर होती है वैसे ही इनकी शक्ति की परीक्षा उस धनुष पर होगी। छोटे मन्त्र या आग की चिनगारी में बड़ी शक्ति छिपी रहती है। बाद जाकर राम ने सबके देखते-देखते शङ्करजी के धनुष को उठाकर उसकी डोरी इतनी तान दी कि उससे भयङ्कर शब्द हुआ। बाद सीताजी ने राम के गले में जयमाला डाल दी। अनन्तर जनकजी ने राजा दशरथजी के पास सन्देश भेजकर बरात लाकर विवाह करने की प्रार्थना की। तदनुसार दशरथ बड़े उत्साह से बरात लेकर जनकपुर पधारे। दोनों प्रतापी राजाओं ने मिलकर शास्त्रविधि से चारों भाइयों का विवाह कर दिया। बरात लौटते समय परशुराम से मार्ग में भेंट हुई ओर वे राम को अपना परशु देकर तपस्या करने चले गये और राजा दशरथ पुत्र तथा पुत्रवधुओं के साथ अयोध्या पहुँचे। वधुओं को देखने के लिए स्त्रियाँ उत्सुक थीं।

द्वादश सर्ग

राजा दशरथ ने संसार के सब सुख भोग लिये और वृद्ध हो चले। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को राज्याभिषेक करने का विचार किया जिसे सुनकर अयोध्यावासी फूले नहीं समाये। पर निष्ठुर कैकेयी ने ऐसा चक्र चलाया कि राम को वनवास जाना पड़ा। देवासुर संग्राम के समय उनके प्राण की रक्षा के बदले दो वर धरोहर के रूप में रख छोड़ा था। कैकेयी ने एक वर तो यह मांगा कि चौदह वर्ष के लिए राम वन चले जायें और दूसरा यह कि मेरे पुत्र को राज्य मिले। यह सुनकर लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। राम का मुखभाव जैसा राज्याभिषेक के समय था ठीक वैसे ही वन जाने के समय भी था। अपने पिता के वचन को सत्य करने के लिए वे सीता और लक्ष्मण के साथ दण्डक वन में चले गये। इधर राम के वियोग में राजा दशरथ ने अ-

३ २० भू०

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प्राण छोड़ दिये। कुल मन्त्रियों ने दूत भेजकर ननिहाल से भरत को बुलाया। जब भरतजी को अपने पिता की मृत्यु तथा रामके वनवास का समाचार मालूम हुआ तब वे केवल अपनी मां से ही नहीं बल्कि अयोध्या की राजलक्ष्मी से भी चिढ़ गये और साथ में सेना लेकर राम को ढूँढ़ने निकल पड़े।

जब आश्रमवासियों ने उन्हें वे वृक्ष दिखाये जिनके नीचे निवास कर राम आगे बढ़े थे तो उनकी आँखों में आँसू छलक आये। उन दिनों राम चित्रकूट के वन में निवास करते थे। वहाँ जाकर भरतजी ने उन्हें पिता की मृत्यु का समाचार सुनाया और कहा कि आप चलकर अयोध्या का राज्य संभालें, किन्तु राम अपने स्वर्गीय पिता की आज्ञा से तनिक भी न डिगे। अन्त में भरत की प्रार्थना पर उन्हें अपनी खड़ाऊँ दे दी। उसे लेकर भरतजी ने लौटकर नन्दीग्राम में ही डेरा डाल दिया और वहीं से अयोध्या के राज्य की रक्षा करते रहे। इस प्रकार अपने बड़े भाई राम में भक्ति करके राजपद को ठुकराकर मानो भरतजी ने अपनी मां के पाप का प्रायश्चित्त कर डाला। इधर राम भी सीता और लक्ष्मण के साथ कन्द-मूल-फल खाते हुए व्रतपालन करने लगे। एक बार इन्द्रपुत्र जयन्त ने सीता के पैर में चोंच मारा, जिसके परिणामस्वरूप उसकी एक आँख गायब हो गयी। बाद अत्रि मुनि के आश्रम पर पहुँचने के बाद सीताजी को अनसूयाजी ने पातिव्रत्य धर्म का सुन्दर उपदेश दिया। बाद वे जब पञ्चवटी में गये तब रावण की बहिन शूर्पणखा सुन्दर रूप बनाकर राम के पास आ पहुँची और सीताजी के सामने ही राम को अपना पति बनाने का प्रस्ताव रखा तो राम ने कहा—मेरा विवाह तो हो चुका है, तुम मेरे छोटे भाई के पास जाओ। वह झट लक्ष्मण के पास पहुँची और सीता को डरवाने लगी। तब झट लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काटकर उसे कुरूप बना दिया। वहाँ से चलकर वह नकटी जनस्थान जाकर खर, दूषण, त्रिशिरा आदि को उभाड़ी। राम ने अपने बाणों से सबको मार गिराया। तब शूर्पणखा रावण के पास जाकर रोने लगी। बहिन के अपमान से उसने मारीच को मायामृग बनाकर लक्ष्मण को धोखा देकर सीता को चुराकर लङ्का ले गया। मार्ग में गृद्धराज जटायु उससे लड़कर मारा गया। उसने बताया कि रावण सीता को चुरा ले गया है। उसका दाह-संस्कार कर आगे बढ़े तो हनुमान् के माध्यम से सुग्रीव से भेंट हो गयी। उसके भाई बालि को मारकर उससे मित्रता कर उनके सहयोग से वानरी सेना इकट्ठा कर लङ्का पर चढ़ाई कर दी। रावण को रथ पर और

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राम को पैदल देखकर इन्द्र ने अपना रथ भेजा । इन्द्र के सारथि मातलि का हाथ पकड़कर रामजी उस रथ पर चढ़ गये । राम और रावण का परस्पर भयङ्कर युद्ध हुआ । अन्त में राम ने रावण को मारने के लिए धनुष पर वह ब्रह्मास्त्र चढ़ाया जो कभी व्यर्थ नहीं होता । उस ब्रह्मास्त्र से राम ने रावण के दशों शिरों को काटकर पृथ्वि पर गिरा दिया । राम ने धनुष की डोरी उतार दी और मातलि रथ लेकर स्वर्ग में चला गया । राम ने रावण की राज्यश्री विभीषण को सौंप दी और सीता को अग्नि में शुद्ध कर हनुमान्, सुग्रीव, विभीषण और लक्ष्मण आदि को पुष्पक विमान पर चढ़ाकर अयोध्या की ओर लौट पड़े ।

त्रयोदश सर्ग

राक्षसराज रावण के बध के बाद मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् राम ने अग्नि-परीक्षा में विशुद्ध सीताजी को स्वीकार कर तथा लङ्का के राज्य पर रावण के भाई विभीषण को अभिषिक्त कर प्रिय पत्नी सीता, भ्राता लक्ष्मण, कपीश्वर सुग्रीव, भक्त हनुमान् जी, विचक्षण विभीषण तथा वानर एवं भालुओं के साथ पुष्पक विमान पर आरूढ होकर अयोध्या के लिए प्रस्थान करते समय मार्ग में सीता जी को तत्तत् स्थानों को दिखाते हुए उनका मनोरम वर्णन किया था । श्रीराम ने पहले अपने पूर्वजों से संबंधित फेनिल समुद्र, उसकी तटभूमि, वायु एवं मेघमार्ग का आकर्षक वर्णन करने के बाद उस दण्डकारण्य को दिखाया, जहाँ राक्षसों के भय से वल्कलधारी तपस्वियों ने पहले निवास करना छोड़ दिया था, फिर उस स्थान को बताया जहाँ रावण द्वारा हरण के समय उनके पैर से गिरा हुआ एक नूपुर प्राप्त हुआ था और लताओं ने अपने पल्लवों को हिलाकर, मृगियों ने दक्षिण की तरफ मुँह कर सीताजी के जाने का संकेत किया था । बाद माल्यवान् पर्वत तथा उस पम्पासर का सुन्दर वर्णन किया है, जिसके जल की मनोहरता के कारण उनकी दृष्टि उसे छोड़ना नहीं चाहती थी । अनन्तर सारस पक्षियों से पूर्ण गोदावरी नदी, पञ्चवटी, स्वर्ग से राजा नहुष को च्युत करने वाले अगस्त्य जी का आश्रम, शातकर्णि मुनि का पञ्चाप्सर नामक सरोवर, सुतीक्ष्ण मुनि, शरभङ्ग मुनि के आश्रम, गगनचुम्बी विचित्र चित्रकूट, निर्मल मन्दाकिनी नदी, अत्रि मुनि के शान्त तपःस्थान एवं अनसूया जी द्वारा लाई गयी गङ्गाजी का वर्णन है । तीर्थराज प्रयाग में गङ्गा-यमुना के सङ्गम का मनोहर एवं साहि-

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त्यिक वर्णन के पश्चात् निषादराज की निवासभूमि शृंगवेरपुर के परिचय के अनन्तर धाई के रूप में मानसरोवर से निर्गत सरयू नदी का सुन्दर वर्णन किया है।

इसके बाद श्रीराम ने कहा—सीते ! पृथ्वी से उठती हुई जो सामने धूलि दिखाई दे रही है, इससे मालूम पड़ता है कि हनुमान् जी से मेरे आगमन का समाचार सुनकर भरत सेना के साथ मेरी आगवानी करने के लिए आ रहे हैं। जैसे युद्ध में खरदूषण, त्रिशिरा आदि को मारकर लौटे हुए मुझको लक्ष्मण ने संरक्षित तथा निर्दोष तुम्हें सौंप दिया था, उसी प्रकार भरत भी पिता की प्रतिज्ञा का पालन करने वाले मुझको संरक्षित तथा निर्दोष राज्यलक्ष्मी को सौंप देंगे ।

वैदेही ! यह देखो, वल्कलवस्त्रधारी भरत पैदल ही गुरु वशिष्ठ जी को आगे एवं सेना को पीछे रखकर वृद्ध मन्त्रियों के साथ स्वयं हाथ में अर्घ्यपात्र लेकर स्वागत करने के लिए मेरे पास आ रहे हैं । ये पिताजी से प्राप्त राज्यलक्ष्मी को तरुण होते हुए भी मेरी भक्ति से भोग के बिना चौदह वर्षों से दुष्कर आचरण कर रहे हैं। रामचन्द्र जी के ऐसा कहने के बाद ही उनकी इच्छा से चलने वाला वह पुष्पक विमान भरत के अनुगामियों द्वारा देखते-देखते आकाश मण्डल से सहसा भूमि पर उतर पड़ा । बाद श्रीराम ने सेवा में निपुण वानरराज सुग्रीव के हाथ का सहारा लेकर आगे-आगे चलते हुए विभीषण द्वारा प्रदर्शित सोपान मार्ग से उस पुष्पक विमान से जमीन पर उतरकर कुलाचार्य वसिष्ठजी को प्रणाम करने के बाद भरत के अर्घ्य को स्वीकार करते हुए आनन्दाश्रुओं के साथ उनका आलिङ्गन किया और कुशल प्रश्न आदि से उन मन्त्रियों को अनुगृहीत किया, जो उनके वियोग में दाढ़ी-मूंछ बढ़ाकर जटावान् बरगद वृक्ष के समान विकृत मुख हो गये थे ।

अनन्तर श्रीराम ने भरत को सुग्रीव एवं विभीषण का परिचय देते हुए कहा—ये मेरे आपत्ति के बान्धव वानर और भालुओं के राजा सुग्रीव हैं तथा ये मेरे शत्रुओं पर प्रथम प्रहार करने वाले विभीषण हैं । यह सुन भरत जी ने सुग्रीव एवं विभीषण का अभिवादन आदि से सत्कार करने के बाद नतमस्तक हुए लक्ष्मण जी का सस्नेह गाढ़ आलिङ्गन किया । बाद रामचन्द्र जी की आज्ञा से सुग्रीव आदि वानरों ने कामरूपी होने के कारण मनुष्यशरीर धारण कर बड़े-बड़े हाथियों पर सवार होकर पहाड़ों पर चढ़ने के सुख का अनुभव किया । अनुचरों के सहित विभीषण आदि श्रीराम के आदेश से उत्तम रथों पर आरूढ

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हुए। अनन्तर रामचन्द्र जी, भरत एवं लक्ष्मण के साथ शोभित पताकायुक्त इच्छानुगामी पुष्पक विमान पर वैसे ही आरूढ़ हुए जैसे बुध एवं वृहस्पति के संगति से दर्शनीय तारापति चन्द्रमा रात में चञ्चल बिजली वाले मेघ पर आरूढ़ होते हैं। विमान पर ही भरत जी ने प्रलयकाल में आदि वराह द्वारा उद्धृत पृथ्वी के समान श्रीराम द्वारा रावण के सङ्कट से उद्धृत सीता जी की पादवन्दना की। रावण की प्रणय प्रार्थना को ठुकराने से परम पवित्र एवं वन्दनीय पतिव्रता सीता जी का चरणयुगल तथा भ्राता राम के अनुसरण से जटायुक्तभरत जी का मस्तक ये दोनों मिलकर एक दूसरे को परम पवित्र करनेवाले हुए। बाद श्रीराम की शोभायात्रा आरम्भ हुई।

श्रीराम ने जिसके आगे-आगे अयोध्या के प्रजाजन चल रहे थे, ऐसे मन्दगति वाले पुष्पक विमान से आधा कोस जाकर शत्रुघ्न द्वारा सजाये गये तम्बू आदि से युक्त अयोध्या के सुन्दर उपवनों में सपरिवार निवास किया।

चतुर्दश सर्ग

अयोध्या के उपवन में विश्राम करने के बाद राम और लक्ष्मण ने आश्रय वृक्ष के भग्न हो जाने पर मुरझायी हुई दो लताओं के समान अपने पति राजा दशरथ के स्वर्गवास से शोचनीय अवस्था को प्राप्त दोनों माताओं-कौशल्या तथा सुमित्रा को एक ही साथ देखा। क्रम के अनुसार प्रणाम करनेवाले उन दोनों पुत्रों को दोनों माताओं ने आंसुओं से भरी आंखों से साफ-साफ नहीं देख पाया, किन्तु केवल पुत्रस्पर्श के सुख के अनुभव से जान लिया। दोनों माताओं ने आनन्दजन्य शीतल आंसू एवं शोकजन्य गर्म आंसू को पोंछकर दूर कर दिया। बाद उन्होंने राम एवं लक्ष्मण की देह को राक्षसों के प्रहार से हुए पुराने घावों को नये के समान दया से स्पर्श करती हुई क्षत्रियाणियों को अभीष्ट वीरमाता कहलाना अच्छा नहीं समझा। बाद में सीताजी ने पतिदेव को कष्ट देनेवाली, शुभ लक्षणों से रहित 'मैं सीता हूँ' इस प्रकार कहकर उन दोनों के चरणों पर गिरकर समान रूप से अभिवादन किया। इसपर उन्होंने कहा—कल्याणी ! उठो, लक्ष्मण के साथ तुम्हारे पति राम ने तुम्हारे पवित्र चरित्र से ही इस कठोर कष्ट को पार किया।

इसके बाद बड़े समारोह के साथ वृद्ध मन्त्रियों ने गङ्गा आदि पवित्र तीर्थों से लाये गये जलों से श्रीराम का राज्याभिषेक किया जिससे उनकी और शोभा

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बढ़ गयी। अनन्तर श्रीराम ने बाजा-गाजा के साथ नागरिकों को आनन्दित करते हुए राजधानी अयोध्या में प्रवेश किया और सुग्रीव आदि मित्रों को विविध सामग्रियों से सम्पन्न भवनों को देकर चित्रमात्र से अवशिष्ट पिता-राजा दशरथ के पूजागृह में आँखों से अश्रु बहाते हुए प्रवेश करके कैकेयी को प्रणाम करके मीठे वचनों से उनकी लज्जा को दूर किया। अनन्तर अभिनन्दन करने के लिए आये हुए अगस्त्य आदि मुनियों का सत्कार कर राम ने उनसे रावण के जन्म का वृत्तान्त श्रवण किया। एक पक्ष के बाद श्रीराम ने सीताजी के द्वारा सत्कार कराकर सुग्रीव, विभीषण आदि को विदा कर पुष्पक विमान को कुबेर के पास भेज दिया और भाइयों के साथ धर्मपूर्वक न्यायपूर्ण शासन करते हुए प्रजाओं को सुख पहुँचाया। कुछ दिनों के बाद सीताजी को गर्भ रह गया। श्रीराम ने गर्भिणी-मनोरथ के लिए उनसे जब पूछा, तब उन्होंने गङ्गातटवर्ती तपोवनों को देखने की इच्छा प्रकट की। उसी समय गुप्तचरों के द्वारा सीता के विषय में लोकापवाद सुनकर श्रीराम ने उस लोकापवाद को दूर करने के विचार से लक्ष्मण के द्वारा वाल्मीकि मुनि के आश्रम के पास सीताजी को छोड़ आने की आज्ञा दे दी। तदनुसार लक्ष्मण ने सीताजी को रथ पर बैठाकर तपोवन देखने के बहाने गङ्गा के तट पर ले जाकर उतार दिया और बड़े दुःख से श्रीराम का आदेश सुना दिया, जिसे सुनते ही सीताजी मूच्छित हो गयीं। लक्ष्मण के प्रयास से होश में आने पर सीताजी ने बिना अपराध के परित्याग करने-वाले श्रीराम को दोष नहीं दिया, किन्तु वे अपने भाग्य को ही कोसने लगीं। बाद लक्ष्मण ने दुःख से उनके चरणों पर गिरकर कहा—आर्ये ! मुझे क्षमा कीजिए, मैं पराधीन हूँ। सीताजी ने उनको उठाकर आशीर्वाद देते हुए कहा—लक्ष्मण ! उठो, तुम्हारा कल्याण हो, मेरी सासुओं से मेरा प्रणाम कहना और उनके पुत्र के द्वारा निहित मेरे गर्भ का शुभ चिन्तन करने को कह देना। और

बड़े भाई से मेरा यह वचन भी कहना—राजन्, साधारण प्रजा के समान मेरा भी पालन करना आपका धर्म है। लङ्का में सबके सामने प्रत्यक्ष अग्नि में विशुद्ध होने पर भी आपने मुझे मिथ्या लोकापवाद के भय से जो छोड़ दिया है, क्या यह आपके पावन कुल के योग्य है ? मालूम पड़ता है कि राजलक्ष्मी का परित्याग कर आप मेरे साथ वन को चले गये थे, उसी से नाराज होकर उसने राजभवन में मेरा रहना सहन नहीं किया है। अब मैं सूर्य में दृष्टि लगाकर तप करूँगी कि अगले जन्म में भी आप ही मेरे पतिदेव हों। सीताजी के वचन को

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स्वीकार कर लक्ष्मण के चले जाने पर दुःख के कारण सीताजी कुररी पक्षी के समान विलाप करने लगीं, जिससे समस्त वन करुणामय हो गया—मोरों ने नाचना, पेड़ों ने पुष्प तथा हरिणों ने चबाते हुए कुशों को छोड़ दिया। कुश और समिधा को लेने के लिए आश्रम से बाहर निकले हुए वाल्मीकि मुनि रोने के शब्द का अनुसरण करते हुए सीता के सम्मुख आकर बोले—वत्से ! मैं समाधिदृष्टि से जानता हूँ कि राम ने मिथ्यावाद से क्षुब्ध होकर तुम्हारा त्याग किया है। तुम दूसरे देश में स्थित पिता के ही घर में आ गयी हो, तुम्हारे श्वसुर दशरथ मेरे मित्र थे तथा तुम्हारे पिता जनक सबको ज्ञान देने वाले हैं और तुम पतिव्रताओं में अग्रगण्य हो । तपस्वियों से शान्त इस तपोवन में रहो, तुम्हारी सन्तति का संस्कार कर्म विधिवत् हो जायेगा । शोक को दूर करने वाली तमसा में स्नान कर देवपूजन करती हुई मुनि-कुमारियों के साथ रहो । इस प्रकार आश्वासन देकर अपने आश्रम पर सीता को ले जाकर तपस्विनियों के साथ एक पर्णकुटी में रख दिया । वहाँ वे मुनि-कुमारियों के साथ रहकर नियम से समय बिताने लगीं ।

इधर लक्ष्मण ने श्रीराम के पास आकर सारा समाचार कह सुनाया, जिसे सुनकर श्रीराम के नेत्रों से आँसू गिरने लगे, क्योंकि उन्होंने तो सीता को घर से निकाला था, हृदय से नहीं ।

अनन्तर वे शोक को हटाकर प्रजाओं का पालन करने लगे । उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया, बल्कि अश्वमेध यज्ञ में स्वर्णमयी सीता की मूर्ति बनाकर उसे सम्पन्न किया । यह सुनकर सीताजी ने परित्याग-दुःख को किसी प्रकार सहन किया ।

पञ्चदश सर्ग

सीताजी का परित्याग कर देने के बाद रामचन्द्रजी ने किसी दूसरी स्त्री से विवाह नहीं किया । एक दिन यमुना तटवर्ती कुछ तपस्वियों ने श्रीराम के पास आकर प्रार्थना की कि लवणासुर के उपद्रव के कारण हमारी यज्ञक्रियाएँ बन्द हो गयी हैं। राम ने उनके विघ्न दूर करने की प्रतिज्ञा की, क्यों कि धर्म की रक्षा करने के लिए ही तो उन्होंने पृथ्वी पर अवतार लिया था। राम ने उन मुनियों की रक्षा का भार शत्रुघ्न को सौंपा । जब शत्रुघ्न रथ पर सवार होकर चले तब राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया और वे वनों की छटा देखते हुए चल पड़े ।

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शत्रुघ्न के साथ कुछ सेना भी गयी जो वैसे ही व्यर्थ थी जैसे 'अध्ययन' शब्द में इङ् धातु से लगा हुआ अधि उपसर्ग व्यर्थ है। मार्ग में जाते हुए शत्रुघ्न ने पहली रात महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पर निवास कर बितायी। वाल्मीकिजी ने अपने तप के प्रभाव से शत्रुघ्न का बड़ा सत्कार किया। उसी रात को वन-वास के समय से निवास करती हुई उनकी भाभीजी को दो पुत्र उत्पन्न हुए। यह सुनकर शत्रुघ्नजी का मन खिल उठा। दूसरे दिन हाथ जोड़कर मुनि से आज्ञा लेकर शत्रुघ्न आगे बढ़े। जिस समय वे मधुवन नगर में पहुँचे उसी समय रावण की बहिन कुम्भीनसी का बेटा लवणासुर पशुओं को मारकर अपने नगर में लौट रहा था। शत्रुघ्न ने देखा कि यह अवसर ठीक है, क्योंकि उसके हाथ में भाला नहीं है। बस, शत्रुघ्न ने उसे घेरकर प्रहार करना शुरू कर दिया। उधर लवणासुर ने भी गरजकर एक पेड़ उखाड़कर शत्रुघ्न पर प्रहार किया, पर बीच में ही उन्होंने अपने बाणों से उसे चूर-चूर कर दिया। बाद शत्रु ने एक शिला उठाकर शत्रुघ्न पर फेंकी, पर शत्रुघ्न ने ऐन्द्र अस्त्र चलाकर उसे भी चूर-चूर कर दिया। तब वह राक्षस बवण्डर के समान शत्रुघ्न पर टूट पड़ा पर उन्होंने वैष्णव अस्त्र से प्रहार कर उसे यमपुर भेज दिया। उसे मारने के बाद शत्रुघ्न को अनुभव हुआ कि मेघनाद को मारनेवाले लक्ष्मण का मैं सच्चा भाई हूँ।

लवणासुर के वध से प्रसन्न होकर मुनियों ने शत्रुघ्न को खूब आशीर्वाद दिया और शत्रुघ्न ने यमुना के किनारे मथुरा नाम की नगरी बसायी जहाँ संयमी और सुखी लोग रहने लगे।

इधर मन्त्रद्रष्टा वाल्मीकिजी ने दशरथ तथा जनक दोनों के मित्र होने के नाते सीताजी के पुत्रों का जातकर्म आदि संस्कार बड़ी विधि से किया। ज्येष्ठ पुत्र के उत्पन्न होते समय सीताजी की प्रसव-पीड़ा गाय की पूँछ के बालों से दूर की थी और छोटे पुत्र के समय कुश से दूर की थी इसलिए उनका नाम लव और कुश रखा। जब वे बच्चे बड़े हुए तब ऋषि ने उन्हें वेद-वेदाङ्ग पढ़ाया और फिर अपनी रचना आदिकाव्य रामायण का गान कराया। उन दोनों ने अपनी माँ के आगे राम का यश गा-गाकर उनका मन बहलाया। लौटते समय शत्रुघ्न वाल्मीकि के आश्रम पर इसलिए नहीं गये कि मेरे सत्कार में ऋषि का अमूल्य समय नष्ट होगा। शत्रुघ्न ने सीधे अयोध्या आकर राजसभा में जाकर श्रीराम को प्रणाम किया और सारा समाचार कह सुनाया। श्रीराम सब सुनकर बड़े प्रभावित हुए और शत्रुघ्न को गले लगाकर उनका बड़ा सत्कार किया :

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श्रीराम के पूछने पर शत्रुघ्न ने सारी बातें तो बतायीं पर सीताजी के पुत्र होने की चर्चा नहीं की, क्योंकि वाल्मीकिजी ने उनसे कह रखा था कि समय आने पर मैं स्वयं दोनों पुत्रों को राम को सौंप दूँगा।

कुछ दिनों के बाद एक ब्राह्मण अपने मृत पुत्र को ड्योढ़ी पर अपनी गोद से उतारकर फूट-फूटकर रोने लगा। जब राम ने उसके शोक का कारण पूछा तो उन्हें बड़ी लज्जा हुई क्योंकि इक्ष्वाकु वंश के राजाओं के राज्य में किसी की अकाल-मृत्यु नहीं होती थी। यह कहकर यमराज को जीतने की इच्छा से पुष्पक विमान का स्मरण कर उसपर चढ़कर चलने लगे तो आकाश-वाणी हुई कि श्रीराम ! आपके राज्य में वर्ण सम्बन्धी दोष आ गया है, उसे खोजकर दूर करो। यह सुनकर श्रीराम पृथ्वी पर चक्कर लगाने लगे। घूमते-घूमते एक स्थान पर उन्होंने देखा कि एक पेड़ की शाखा पर उलटा लटका एक मनुष्य नीचे जलती हुई आग का धुआँ पी-पीकर तप कर रहा है। तब उन्होंने उससे पूछा—तुम कौन हो और क्या कर रहे हो ? तब वह बोला—मैं इन्द्रपद पाने के लिए तप कर रहा हूँ। मेरा नाम शम्बूक है और मैं शूद्र हूँ। तब राम ने सोचा कि इसके अनधिकार कर्म से पाप फैल रहा है, फलस्वरूप ब्राह्मण का पुत्र मर गया है। अतः इससे विरत करने के लिए बाण उठाकर उसका शिर काट गिराया। राजा का दण्ड पाने से शूद्र को सद्गति मिल गयी और ब्राह्मण का पुत्र जी उठा। कुछ दिन के बाद राम ने अश्वमेध के लिए घोड़ा छोड़ा। देश के ऋषि, महर्षि एवं राजर्षि इकट्ठे होने लगे। बिना पत्नी के यज्ञ होना सम्भव नहीं था, राम ने दूसरा विवाह भी नहीं किया था, अतः सोने की सीता बनाकर राम ने अपनी पत्नी के रूप में बैठाकर यज्ञ आरम्भ किया। वाल्मीकिजी के शिष्य सीता के पुत्र लव-कुश उनकी आज्ञा से उनका बनाया हुआ रामायण गाते हुए इधर-उधर घूमने लगे। किन्नरों के समान मधुर कंठवाले बालकों के गीत सुनकर यह बात राम के कानों तक भी पहुँची। उन्होंने बालकों को बुलाकर भाइयों के साथ उनके गीत एवं रूप की मधुरता को आश्चर्य के साथ देखा और सुना। सारी सभा स्तब्ध हो गयी। एकटक होकर श्रीराम और उन दोनों बालकों का एकदम मिलता-जुलता रूप रङ्ग देखा। उनमें अन्तर केवल इतना ही था कि वे दोनों अभी कुमार थे तथा वन-वासियों के वस्त्र पहने हुए थे तथा श्रीराम प्रौढ़ थे एवं राजसी वस्त्र पहने हुए थे। जनता को उस समय और आश्चर्य हुआ जब उन्होंने प्रेम से श्रीराम का दिया

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हुआ पुरस्कार भी लौटा दिया। जब श्रीराम ने उनसे पूछा कि तुम्हें यह किसने सिखाया है और किस कवि की रचना है? तब उन्होंने वाल्मीकिजी का नाम बता दिया। तब अपने भाइयों के साथ वाल्मीकिजी के पास जाकर प्रणामपूर्वक उन्होंने अपने को छोड़कर सारा राज्य उनके चरणों में भेंट कर दिया। दयालु ऋषि ने श्रीराम से कहा—ये दोनों गायक कुमार सीताजी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं और तुम्हारे पुत्र हैं। अब तुम्हें चाहिए कि सीता को स्वीकार कर लो। तब श्रीराम ने कहा—मुनिवर! आपकी पतोहू सीता लङ्का में मेरे सामने ही अग्नि में शुद्ध हो चुकी है, पर रावण की दुष्टता से मेरी प्रजा को विश्वास नहीं होता। अतः यदि सीता अपनी शुद्धता का प्रमाण देकर प्रजा को विश्वास दिलाये तब मैं आपकी आज्ञा से पुत्रों के साथ इन्हें स्वीकार कर सकता हूँ। श्रीराम की प्रतिज्ञा सुनकर वाल्मीकिजी ने शिष्यों को भेजकर सीताजी को बुलाया और दूसरे दिन इकट्ठी हुई प्रजा के सामने वाल्मीकिजी लव, कुश और सीताजी को साथ लेकर श्रीराम के आगे उपस्थित हुए। उन्हें देखते ही सब लोगों ने अपना शिर नीचे कर लिया, क्योंकि उन्हें लज्जा लगी कि हम लोगों ने व्यर्थ ही इस साध्वी पर कलङ्क लगाया। वाल्मीकिजी ने सीताजी से कहा—बेटी! अपने पति के आगे जनता का सन्देह दूर कर दो। तदनुसार शिष्यों द्वारा लाया गया गंगाजल हाथ में लेकर सीताजी ने आचमन करके कहा—यदि मन, वचन, कर्म किसी प्रकार से भी अपना पातिव्रत्य भंग न किया हो तो हे पृथ्वी माता! तुम मुझे अपनी गोद में ले लो। सीताजी के ऐसा कहते ही पृथ्वी फटी, उसमें से बिजली के समान चमकीला तेजोमण्डल निकला। उसके बीच सिंहासन पर बैठी हुई पृथ्वी प्रगट होकर सीताजी को अपनी गोद में लेकर पाताल में समा गयी। किसी प्रकार यज्ञ समाप्त कर श्रीराम ने सबको छुट्टी दे दी। श्रीराम ने भरत को सिन्धु देश का राज्य दिया, भरत ने गन्धर्वों को जीतकर अपने योग्य पुत्र तक्ष और पुष्कल को तक्ष और पुष्कल दिया। राम की आज्ञा से लक्ष्मण ने अपने दोनों पुत्र अङ्गद और चित्रकेतु को कारापथ का राजा बनाया। यह सब हो जाने पर एक दिन काल ने आकर श्रीराम से एकान्त में मिलकर वैकुण्ठ चलने की प्रार्थना की। बाद श्रीराम ने कुश को कुशावती का राजा बनाया और लव को शरावती का। पुनः अग्निहोत्र की आग लेकर उत्तर की तरफ चल दिये और गोप्रतर में सरयू स्नान कर विमान पर चढ़कर स्वर्ग चले गये।

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षोडश सर्ग

लव आदि सात रघुवंशी वीरों ने अपने सबसे बड़े भाई कुश को अपना मुखिया बनाया, क्योंकि भ्रातृप्रेम उनके कुल का धर्म ही था। एक दिन आधी रात के समय कुश को एक स्त्री दिखाई दी। उसका वेश देखने से मालूम पड़ता था कि उसका पति परदेश चला गया है। कुश के आगे वह स्त्री हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी। उसे देखकर कुश ने पूछा कि शुभे ! तुम कौन हो ? उसने उत्तर दिया—राजन् ! मैं अयोध्यापुरी की नगरदेवी हूँ। आजकल तुम्हारे जैसे प्रतापी राजा के रहते हुए भी मेरी बुरी दशा हो गयी है। स्वामी के न रहने से कोठे-अटारियों के टूट जाने से अलका-सी रमणीय मेरी निवासभूमि उदास लगती है। सरयू के तट पर बनी झोपड़ियाँ भी सूनी पड़ी रहती हैं। अतः तुम राम के समान अपनी इस राजधानी को छोड़कर अपनी कुल-परम्परा की राजधानी अयोध्या में चलकर रहो। जब कुश ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली तब वह अन्तर्धान हो गयी। कुश ने रात की आश्चर्यभरी घटना प्रातःकाल सभा में ब्राह्मणों से कहकर कुशावती को वेदपाठी ब्राह्मणों को सौंप दी और सेना के साथ शुभ मुहूर्त में अयोध्या के लिए चल दिये। कुशावती से चलती हुई कुश की सेना विन्ध्याचल को पार कर गंगाजी पर हाथियों का पुल बनाकर पार उतर गयी। कुश ने गंगाजी को प्रणाम किया क्योंकि कपिल मुनि के कोप से जले हुए उनके पूर्वज सगरपुत्र उसी गंगाजी के जल की कृपा से स्वर्ग पहुँचे थे।

इस प्रकार कुश कुछ दिन मार्ग में बिताकर सरयूजी के किनारे पहुँचे जहाँ उनके पूर्वजों ने बड़े-बड़े यज्ञ करके यज्ञ-स्तम्भों को गाड़ दिया था। अयोध्या के उपवनों में फूले हुए वृक्षों, सरयू के शीतल जल तथा उपवनों के पुष्पवायुओं ने सेना के साथ कुश का स्वागत किया। जैसे इन्द्र की आज्ञा से बादल पृथ्वी को हरी-भरी कर देता है वैसे ही कुश ने कारीगरों की सहायता से अयोध्या का कायापलट कर दिया। अयोध्या के हाटों में सुन्दर-सुन्दर वस्तुएँ सजी हुई थीं। वह नगरी ऐसी सुन्दर लगने लगी मानो कोई स्त्री दिव्य आभूषण धारण किये हुए हो। अयोध्या पुनः पहले-सी सुन्दरी लगने लगी। उसमें निवास कर जानकी-पुत्र कुश को ऐसा सुख मिला जैसा कि न तो उन्हें अप्सराओं से भरे स्वर्ग के स्वामी बनने की इच्छा रह गयी, न कुबेर की अलकापुरी ही लेने की। सरोवरों में कमल, वनों में चमेली की सुगन्ध मनोहर लगने लगी।

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एक दिन कुश की इच्छा हुई कि सरयू के जल में स्त्रियों के साथ विहार करें । अन्त में वे उनके साथ जलक्रीड़ा में लीन हो गये । स्त्रियों के साथ सरयू में जलक्रीडा करते हुए वे ऐसे प्रतीत होते थे मानो देवराज इन्द्र आकाशगंगा में अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा करते हों । अगस्त्य ऋषि ने श्रीराम को जो जैत्र आभूषण दिया था उसे राम ने कुश को राज्य के समय ही दे दिया था । क्रीड़ा करते समय वह रत्न जल में गिर गया, किसी को पता तक नहीं चला । बाद कुश ने उसे ढूंढने के लिए धीवरों को आज्ञा दी, पर वह मिल न सका । तब धीवरों ने कहा—महाराज, मालूम पड़ता है कि इस जल में रहनेवाले कुमुद नामक नाग ने लोभ से उसे चुरा लिया है। तब कुश ने क्रोध कर तट पर खड़े होकर धनुष को ठीक किया ओर उसपर नागों को नाश करनेवाला अस्त्र चढ़ा लिया । उस धनुष के चढ़ाते ही उस जल से अचानक ही एक कन्या को आगे किये हुए नागराज कुमुद इस प्रकार निकले मानो लक्ष्मी को लेकर कल्पवृक्ष निकल रहा हो । वह प्रणाम करके बोला—राजन् ! यह मेरी कन्या गेंद खेल रही थी, उसकी थपकी से गेंद ऊपर उछल गया । उसे देखने के लिए जब आंखें ऊपर उठायीं तो देखा कि यह आपका आभूषण तारे के समान नीचे गिर रहा है। इसने झट उसे पकड़ लिया। आप इसे लीजिए और यह मेरी छोटी बहन कुमुद्वती जीवनभर आपकी सेवा करेगी, आप अपनी पत्नी के रूप में इसे स्वीकार करें। कुश ने आभूषण लेकर कहा कि आज से आप मेरे सम्बन्धी बन गये । बाद कुमुद ने अपने कुटुम्बियों को बुलाकर बड़े धूमधामसे कुमुद्वती का कुश से विवाह कर दिया । अनन्तर उसके साथ आनन्दपूर्वक कुश राज्य करने लगे ।

सप्तदश सर्ग

जैसे रात के ब्राह्म मुहूर्त में बुद्धि को नयापन मिल जाता है वैसे ही कुश को कुमुद्वती से अतिथि नामक पुत्र प्राप्त हुआ । जैसे सूर्य अपने प्रकाश से उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं को पवित्र कर देता है वैसे ही सुशिक्षित अतिथि ने माता और पिता के दोनों कुलों को पवित्र कर दिया । कुश ने चतुर्विध विद्याओं के अध्ययन के बाद राजकन्याओं से अतिथि का विवाह कर दिया । अतिथि भी कुश के समान ही कुलीन, शूर और जितेन्द्रिय थे । इसलिए कुश अपने पुत्र को अपना ही दूसरा रूप समझते थे । अपने कुल के अनुसार कुश भी एक बार युद्ध में इन्द्र की सहायता करने के लिए गये थे । वे शक्तिशाली दुर्जय राक्षस