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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

११२ राजतरंगिणी
तिब्बत के दक्षिण में स्थित है। इस प्रकार निश्चय पर पहुँच सकते हैं। तिब्बत की पश्चिमी सीमापर इसे
होना चाहिए। यह स्थान लद्दाख का पर्याय तथा हिमाचल प्रदेश का उत्तरीय अंचल होता है। हिमालय में
स्थान का होना निश्चय हो जाता है। बद्रीनाथ से लेकर लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के मध्यवर्ती स्थान तक
इस पर्वत का होना बैठता है। तिब्बत का उत्तरीय पश्चिमी सीमावतीय प्रदेश प्रतीत होता है
हित्वा सबगवांल्लंकामाविशद् गन्धमादनम् ।
गन्धर्वयक्षानुगतो रक्षःकिम्पुरुषैः सह ॥ वनपर्वः २७५:३३
महाभारत में और वर्णन मिलता है। कुवेर के क्रीडास्थल सरोवर की रक्षा में किम्पुरुष गण तत्पर
रहते थे। यह सरोवर निःसन्देह तिब्बत प्रदेश में था। किम्पुरुष तथा किन्नर दो वर्ग थे। उनका स्पष्टीकरण
महाभारत करता है।
सेवितामृषिभिर्दिव्यैर्यक्षैः किम्पुरुषैस्तथा ।
राक्षसैः किन्नरैश्चापि गुप्तां वैश्रवणेन च ॥ वनपर्व : ५३:९
किम्पुरुषों का भारत आगमन तथा भ्रमण सिद्ध होता है। किम्पुरुषगण अगस्त्य ऋषि के समुद्रपान
का दृश्य देखने के लिए उनका अनुगरण किये थे। वे उत्तर से दक्षिण गये थे।
मनुष्योरगगन्धर्वयक्षकिम्पुरुषास्तथा ।
अनुजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुकामस्तदद्भुतम् ॥ वनपर्व : १०५:२१
किम्पुरुषों तथा तिब्बत का सम्बन्ध महाभारत काल में घनिष्ठ था। महाराज युधिष्ठिर के राजसूय में
किम्पुरुष गण सम्मिलित हुए थे। महाभारत में किम्पुरुष तथा किन्नर दो शब्दों का प्रयोग सिद्ध करता है
कि, एक जाति होने पर भी ये एक ही पूर्व जाति की दो उपजातियां हो गयी थी।
न किम्पुरुषसङ्कीर्णैः किन्नरैश्चोपशोभितः ।
सिद्धेश्च विविधाकारैश्च समन्तादभिसंवृतः ॥ आश्वमेधिक पर्व ८८ : १७९
पुराणों में प्रकट होता है। ये श्रीकृष्ण का दर्शन करने द्वारका जी तक गये थे। उनके जाति के
सम्बन्ध में कहा गया है। ये पुलह की सन्तान है। और दक्ष कन्या की सन्तति है। पुलह एक मनु है। ब्रह्मा
ने उन्हें उत्पन्न किया था।
पुलहस्य सुता शम्भुस्तस्माद्य प्रकीर्तिताः ।
सिंहाः किम्पुरुषा व्याघ्रा ऋक्षा ईहामृगास्तथा ॥ आदिपर्व : ६६:८
इभांस्तु श्येनयांश्च गन्धर्वांस्तुरगान् द्विजान् ।
गाश्च किम्पुरुषांस्तथानुद्भिञ्जांश्च वनस्पतीन् ॥ शान्तिपर्व : २०७ : २२
दक्षं मरीचिमत्रिं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।
वसिष्ठं गौतमं चैव भृगुमङ्गिरसं मनुम् ॥ हरिवंश पुराण अ० १४

परिशिष्ट ढ ११३
मयस्य भवनं तत्र दानवस्य स्वयं कृतम् ।
मैनाकस्तु विचेतव्यः समानुप्रस्थकन्दरः । ।३०।।
स्त्रीणामश्वमुखीनां तु निकेतस्तत्र तत्र तु ।
तं देशं समतिक्रम्य आश्रमं सिद्धसेवितम् ॥३१॥
'यहाँ से वैखानस सर के पश्चात् सूना आकाश दिखाई देगा । मेघो की घटा नहीं दिखाई देगी ।
तत्पश्चात् शीतोदा नामक नदी मिलेगी । शीतोदा के तटपर उत्तर कुरु प्रदेश है । यहां पर गन्धर्व, किन्नर,
सिद्ध, नाग और विद्याधर सर्वदा नारियों के साथ विहार करते हैं ।
गन्धर्वाः किन्नराः सिद्धा नागा विद्याधरास्तथा ।
रमन्ते सततं तत्र नारीभिर्भास्वरप्रभाः ॥५०।।
पुराणों के अनुसार किम्पुरुष वर्ष हिमालय के पश्चात् माना गया है। विष्णु पुराण (२:१:
१७:१९) के अनुसार किम्पुरुष एक राजा था । वह अग्नीध्र का पुत्र तथा प्रियव्रत का पौत्र था । उसके
पिता ने १०:५२:११ के अनुसार किम्पुरुष को हेमकूट दिया था । भागवत में किम्पुरुष देश के राजा
द्युम्न का उल्लेख है । उसने कृष्ण के विरुद्ध जरासन्ध के पक्ष से युद्ध किया था । जिस समय जरासन्ध ने
गोमन्त पर आक्रमण किया था उस समय वह पर्वत के पश्चिम दिशा में अपनी सेना के साथ था । भागवत
(१:६:१२) के अनुसार राजा परीक्षित ने किम्पुरुष वर्ष को जीता था ।
किन्नर जाति शंकर पूजक मानी गयी है । गुह्यक, यक्ष आदि पर्वतीय जातियां शिवपूजक थीं । उनके
विषय में कहा गया है कि वे शिव की सेवा करते थे । कैलास तथा उसका समीपस्थ क्षेत्र किन्नरों का मुख्य
निवास स्थान था । यक्षों, गन्धर्वों के समान गायक तथा नृत्यशील जाति थी । विराट पुरुष, इन्द्र तथा हरि
उनके मुख्य उपास्य देव थे । सप्तर्षियों से उन्हें धर्म ज्ञान प्राप्त हुआ था । महाभारत के अनुसार अमरकोष
की दी गयी उनकी परिभाषा सत्य प्रतीत होती है । किम्पुरुष तथा किन्नर एक ही जाति की दो उपजातियां
अलग अलग थीं ।
किन्नर भाषा में संस्कृत तथा तिब्बती दोनों भाषाओं के शब्दों का मिश्रण है। कुछ उर्दू शब्दों का
भी मिश्रण मिलता है । वह अत्यन्त स्वल्प है । भारत की स्वाधीनता के पश्चात् हिन्दी तथा संस्कृत शब्दों
का प्रयोग बढ रहा है । तिब्बती शब्दों का प्रयोग घटने का मुख्य कारण है कि तिब्बत से आवागमन, याता-
यात तथा व्यापार समाप्त हो गया है। चीन में तिब्बत के सम्मिलित हो जाने के कारण सम्बन्ध पूर्ण-
तया विच्छिन्न हो गया है ।
कुछ विद्वान् लेखक किन्नर जाति को गन्धर्व तथा किरात वर्ग की श्रेणी में रखते हैं। यह गलत है।
किन्नर जाति का अपना मौलिक अस्तित्व रहा है । महाभारत, रामायण तथा पुराण इसके साक्षी हैं ।
किन्नरो का एक निश्चित अंचल हिमालय प्रदेश में है । उनकी भाषा में शू-सू-देवता वाचक शब्द
है । उसमें संस्कृत शब्द यहाँ लगाकर महाशू बनाया गया है । इसी प्रकार ग्रामों के साथ भी शू या भू शब्द
लगाते हैं ।

परिशिष्ट 'त'
कर्णाट
( तरंग : १ : ३०० : पृष्ठ ३१२ )
कर्णाट किंवा कर्णाटक का उल्लेख सुदूर प्राचीन काल से पुराणाधीन ग्रन्थों में उल्लिखित होता
आया है। यह भारतवर्ष का एक सुनिश्चित भू-खण्ड था। यहाँ की भाषा अलग थी। आजकल के कन्नड
भाषा-भाषी इस भूखण्ड के निवासी हैं। स्वतन्त्रता के पश्चात् कन्नड भाषा-भाषियों की एक इकाई मैसूर
राज्य के रूप में बन गयी है।
महाभारत भीष्म पर्व (९.५९) में कर्णाटक को एक जनपद की संज्ञा दी गई है। कर्णाटक का
उल्लेख द्रविड, केरल, प्राच्य, मूषिक, वनवासिक, महिषक, विकल्प, मूषक, तिल्लिर, कुन्तल, मोहुद,
नभ कानन, कौकुट्टक, चोलादि के साथ प्राय किया गया है।
भागवत पुराण (५.६.७) में कर्णाटक का उल्लेख किया गया है। यहाँ उसे बड़ा मण्डल
कहा गया है। स्कन्द पुराण में देशों की तालिका में कर्णाट का स्थान ८४ तथा ग्राम संख्या १२५०० दी
गयी है। बृहद् संहिता में गोनर्द, केरल के साथ कर्णाट का उल्लेख किया गया है। उक्त उदाहरणों से
स्पष्ट प्रतीत होता है। कर्णाटक का नाम कल्हण ने ठीक कर्णाट दिया है। कर्नाट किंवा कर्णाटक प्राचीन
मूल नाम नहीं हैं। कन्नड भी प्राचीन मूल नाम नहीं है। यह सब कर्णाट के अपभ्रंश किंवा उसके बिगड़े
रूप हैं। कर्णाटक देश वासियों की भाषा कन्नड है। उसका साहित्य कन्नड साहित्य कहा जाता है।
वर्तमान मैसूर राज्य कन्नड भाषियों का राज्य है। कन्नड शब्द निःसन्देह कर्णाट का अपभ्रंश है।
सम्मोह तन्त्र की रचना सन् १४५० ई० के पूर्व हुई थी। उसमें सौराष्ट्र, द्रविड, सैंधव, मलय
विदर्भ तथा मालवा आदि के साथ की गयी है (४)। शक्ति संगम तन्त्र (३ : ७ : १) में महाराष्ट्र के
साथ कर्णाटक का उल्लेख किया गया। आज भी कर्णाटक अर्थात् कन्नड भाषी मैसूर महाराष्ट्र की पूर्वी
तथा दक्षिणी सीमा पर स्थित है।
इसी ग्रन्थ में कर्णाटक की सीमा दी गयी है। शक्ति संगम तन्त्र के पूर्व में बैजनाथ, उत्तर में
अमरकंटक और दक्षिण में कांचीपुरम के मध्य में कर्णाटक देश था। इसका विस्तार रामनाथ से आरम्भ
होकर श्रीरंग तक दिया गया है। (३ : ८ : १६)
उक्त तन्त्र ग्रन्थों के अनुसार प्राचीन कर्णाटक प्रदेश रामनाथ से श्रीरंग तक विस्तृत था। श्रीरंग
वर्तमान श्रीरंगपत्तत के लिये व्यवहृत किया गया है। रामनाथ स्थान रामनाथपुरम् अर्थात् पूर्व रामनद
जिला अथवा रामनाथ मठ मदुरा जिला अथवा तुंग और भद्रा नदियों के संगम पर रामेश्वर तीर्थ हो
सकता है।
प्राचीनकाल में यह राज्य पाण्ड्य तथा चोल राज्यों में विभाजित था। पाण्ड्य राज्य मदुरा तथा
तिन्ने वली अंचल तक विस्तृत था। चोल राज्य कारोमण्डल तट पर पदुकोट्टायो तक विस्तृत था। चौथी
शताब्दी में यहाँ पल्लवों का राज्य स्थापित हुआ था। उनकी राजधानी कांची थी। यह आठवीं शताब्दी

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तक स्थित थी । तत्पश्चात् वह चोलों तथा पाण्ड्यों के अधिकार सीमा में चला गया । पन्द्रहवीं शताब्दी में
विजय नगर साम्राज्य के अन्तर्गत कर्णाटक का भूखण्ड आ गया था ।
विजय नगर साम्राज्य के शक्तिहीन होने पर सत्तरहवीं शताब्दी में यह प्रदेश तीन छोटे हिन्दू राज्यो
में विभक्त हो गया था । उनको राजधानी क्रम से मदुरा, तंजोर तथा कांची थी । आरंगजेब की सेना ने
सत्तरहवी शताब्दी के अन्त में इस प्रदेश पर आक्रमण किया था । जुलफिकार अली कर्णाटक का नवाब
बनाया गया । तत्पश्चात् यह प्रदेश मुसलमानों, मराठों, फ्रांसीसियों तथा अंग्रेजों के संघर्ष का क्षेत्र बन गया ।
कर्णाटक का ज्ञान काश्मीरी लेखकों को था । प्राचीनकाल में कर्णाटक एवं कश्मीर में विचारों का
आदान-प्रदान होता रहा है । कश्मीर निवासी ब्राह्मण कर्णाटक में आकर निवास करते थे । इसी प्रकार
कर्णाट देशीय ब्राह्मण कश्मीर में पहुँचते थे । दोनों का एक दूसरे स्थान पर सम्मान तथा आदर होता रहा ।
कल्हण ने राज तरंगिणी में कर्णाटक का उल्लेख ( १ : ३००; ४ : १४१, १५२; ७ : ६७५, ९३५,
९३६, १११९, ११२४ में किया है। सर्वप्रथम कल्हण ने मिहिरकुल के प्रसंग में कर्णाटक का उल्लेख किया
है। उसने श्री लंका आक्रमण से लौटते समय चोल, कर्णाट एवं लाट के राजाओं को व्यदारित किया था ।
( त० १ : ३०० ) ।
'कल्हण कर्णाट निवासियों के वेश भूषा तथा केश रखने की प्रथा का उल्लेख राजा ललितादित्य के
दक्षिण विजय के सन्दर्भ ( ४ : १५१ ) में करता है । इसी प्रसंग में वह कर्णाटक की रानी देवी रट्टा का भी
उल्लेख करता है। उस समय रट्टा नाम्नी चंचललोचना कर्णाट कामिनी विशाल दक्षिणापथ पर राज्य
करती थी । असीमित प्रभावशालिनी इस देवी ने दुर्गा के समान विन्ध्याद्रि मार्ग को पर्याप्त किया विस्तृत
एवं निष्कंटक बना दिया था। वह प्रणाम करते समय ललितादित्य के पाद कमल के नख दर्पण मण्डल में अपनी
मूति देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुई । उसके ताल वृक्षतले नारिकेल के रसोर्मि पान कर कावेरी तटवर्ती समीर से
श्रान्ति दूर कर दिया । उस मलयाचल पर उसके आक्रमण भय से सरकते हुए सर्पों के व्याज भय से चन्दन
वृक्ष के बाहु मण्डल से निपतित असि तुल्य लग रहे थे । वह उत्तरण प्रस्तर तुल्य द्वीप पुंजों पर निर्विघ्न
चरण पाद रखकर कुल्या सदृश समुद्र का शीघ्र ही अनायास गतागत करने लगा । विजेताग्रणी सागर
तरंग के निर्घोषों से जयमंगल गान श्रवण कर वहाँ से पश्चिम दिशा प्रस्थान किया ।' ( रा. त० :
१५२-१५८ )
कश्मीर राजा कलश ( सन् १०६३-१०८१ ) के सन्दर्भ में कल्हण पुनः कर्णाट का उल्लेख कलश
तथा हर्ष के संघर्ष के सन्दर्भ में करता है। कर्णाटक निवासी केशी उस संघर्ष में युद्ध करता राजविरोधी
सैनिको द्वारा कश्मीर में मारा गया था । ( रा० ७ : ६७५ ) इस उद्धरण से यह प्रकट होता है कि
कश्मीर की सेना में अथवा राजा के प्रश्रय में कर्णाटक निवासी थे । उनका वहाँ उचित स्थान तथा
सम्मान था ।
कवि विल्हण के प्रसंग में पुनः कल्हण कर्णाटक का उल्लेख करता है। कश्मीरी राजा हर्ष ( सन्
१०८९-११०१ ई० ) के समय में विल्हण कर्णाटक चला आया था । कल्हण कहता है—विल्हण कवि राजा
कलश के शासन काल में कश्मीर देश त्याग कर कर्णाटक देश के राजा परमाडि के पास चला गया था ।
राजा परमाडि ने कवि विल्हण को अपनी राज सभा में विद्यापति पदपर नियुक्त किया था । विल्हण हाथी
पर आरूढ़ होकर कर्णाटक देश के पर्वतीय प्रदेशों में भ्रमण करते समय समस्त कर्णाटक प्रदेश में केवल

विल्हण को ही यह पद गौरव प्राप्त था कि वह राजा के सम्मुख छत्र धारण करता था।' (रा० ७ :
८३५-८३७)
विल्हण की प्रसिद्ध रचना विक्रमांक देव चरित्र तत्कालीन कर्णाटक के इतिहास तथा वहाँ के सामा-
जिक, राजनैतिक तथा आर्थिक स्थिति पर यथेष्ट प्रकाश डालता है। विल्हण, राजा अलूप का उल्लेख इसी
सन्दर्भ में करता है। विल्हण कोंकण के राजा जयकेशिन का भी उल्लेख नाटक में करता है। कवि विल्हण
ने कुन्तल देश को कर्णाटक देश का समानार्थी माना है। विक्रमादित्य षष्ठ को कुन्तलेश तथा कर्णाटेन्द्र
कहा है। राजा हरिहर (सन १३०७ ई०) के एक शिलालेख से पता चलता है कि कुन्तल विषय कर्णाट
देश में था।
कल्हण ने कर्णाटक का पुनः उल्लेख राजा हर्ष के सन्दर्भ में किया है- 'किसी समय वह राजा (हर्ष)
कर्णाटक देश के राजा परमाडि की चन्दला नामक सर्वांग सुन्दरी पत्नी को चित्र में देखकर उस पर मोहित
हो गया। धूर्त विटगण विचार शून्य एवं मन्दमति राजाओं को मजाक मजाक में कुत्तों के समान छू-छू करके
प्रोत्साहित एवं संघर्ष के लिये उत्तेजित कर देते हैं। उस निर्लज्ज राजा ने विटों के प्रोत्साहन से उत्तेजित
होकर अपनी राजसभा में कर्णाटक सुन्दरी चन्दला की प्राप्ति हेतु परमाडि को पराजित करने की प्रतिज्ञा की।
चन्दला न प्राप्ति काल तक कच्चे कपूर का सेवन न करने की प्रतिज्ञा की।*****कर्णाटक देश के राजा
परमाडि का वध कर चन्दला की प्राप्ति द्वारा उसके आलिंगन का सुख भोग करना, कल्याणपुर में प्रविष्ट
होकर विष्णला देवी का दर्शन करना, और उस राजा के उपवन में एकत्रित कर गुप्त रूप से रखी गयी
अपरिमित सम्पत्ति को अपने आधीन करना इन सब कार्यों के पूर्ण होने तक परम प्रतापशाली महाराज हर्ष-
देव ने धोतास कपूर चर्वण त्याग दिया।' (रा० त० ७: १११९-११२४ तथा ११२५-११३३)
कल्हण काश्मीर राजा हर्ष के कर्णाटक के समान ही मुद्रा टंकणित कर चलाने का उल्लेख करता
है-'राजा हर्ष को दाक्षिणात्यों की पद्धति अधिक रुचिकर थी अतएव उसने कर्णाटक शैली पर मुद्रा टंकणित
करवायी। (रा० त० ७: ६२६)
यदि कर्णाटक के इतिहास पर विहंगम दृष्टि डाली जाय तो कश्मीर का सम्बन्ध अति निकट का
प्रकट होता है। केवल कश्मीर में ही कर्णाटकवासियों का आदर नहीं होता था। कर्णाटक के राजाओं ने
भी कश्मीर के ब्राह्मणों का सम्मान, तथा दान द्वारा आदर प्रदर्शन किया था। पाण्ड्य महादेवी ने बारहवीं
शताब्दी में कश्मीर के प्रवरपुर (श्रीनगर) निवासी शारदा देवी के उपासकों को भूमि दान की थी।
(एनसिएण्ट कोंकन भास्कर, आनन्द सलतोरे : पृष्ठ १६१)
पन्द्रहवीं शताब्दी में कर्णाटक विजयनगरम् राज्य के अन्तर्गत आ गया। विजय नगर राज्य विस्तार
के साथ कर्णाटक प्रदेश की सीमा दक्षिण में विस्तृत हो गयी थी। तल्ली कोट के युद्ध (सन् १६६५ ई०)
के पश्चात् विजयनगर के राजा चन्द्रगिरी अर्थात् चित्तूर जिला तत्पश्चात् बेल्लोर जिला उत्तरीय अरकाट
तक चले आये थे। उनकी राज्य सीमा सीमित हो गयी थी। लघु राज्य होने पर भी उन्हें कर्णाटक का
राय कहा जाता था।

परिशिष्ट 'थ'
लाट
( तरंग १:३००: पृष्ठ ३१३ )
महाभारत अनुशासन पर्व ( ३५:१७-१८ ) में वर्णन आता है । लाट क्षत्रिय जाति थी । परन्तु
ब्राह्मणों के साथ ईर्ष्या करने के कारण नीच हो गयी थी ।
संमोह तन्त्र में ( २:३ ) देशों की तालिका में लाट देश का नाम चोल, कर्णाटक आदि के साथ
दिया गया है । इसी प्रकार शक्ति संगम तन्त्र ( ३:७:५५ ) में लाट देश को सीमा दी गई है । उससे निश्चय
किया जा सकता है कि लाट देश प्राचीन काल में कहां तक विस्तृत था ।
लाट देश उक्त उद्धरण के आधार पर अवन्तो के पश्चिम तथा विदर्भ ( वरार ) के उत्तर-पश्चिम
ठहरता है । लाट देश माही तथा ताप्ती के मध्य में पश्चिमी क्षेत्र में था । राजाओं की शक्ति एवं राज्य
विस्तार के कारण यह सीमा कभी-कभी माहो के ओर परे तक जातो थी । उसमे भृगुकच्छ ( भड़ौच ) तथा
नवसारिका ( नवसारी ) के अंचल सम्मिलित हो जाते थे । वात्स्यायन कामसूत्र ( ६ ५.२६ ) तृतीय
शताब्दी की रचना के अनुसार लाट देश की स्थिति मालवा के पश्चिम दिशा में बतायी गयी है ।
विनयचन्द्र की काव्य शिक्षा में लाट देश के ग्रामों की संख्या २१ हजार तथा गुर्जर देश की ७०
हजार दी गयी है । स्कन्द पुराण में देशों की तालिका में लाड किंवा लाट देश की क्रमसंख्या ३८ तथा उसके
ग्रामों की संख्या भी २१ हजार दी गयी है । उसमे कच्छ की ग्राम-संख्या १४ हजार, सौराष्ट्र की ५५
हजार तथा गुजरात की ग्रामसंख्या ७० हजार दी गयी है । इससे स्पष्ट है कि लाट देश का अस्तित्व प्राचीन
काल में गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ से स्वतन्त्र तथा भिन्न था । लाट प्रदेश गुजरात तथा सौराष्ट्र से छोटा और
कच्छ से बड़ा था ।
लाट तथा लाटविषय का उल्लेख प्रथम शताब्दी से सातवी तथा आठवीं शताब्दी तक भारतीय
वाङ्मय में मिलता है । इस प्रदेश का नाम पुराण तथा महाभारत और रामायण में नहीं मिल सका
है । प्लोस्मी ने इसका उल्लेख किया है । उसके अनुसार लारिक भारतीय समुद्र तट पर था । वह मोफी
( माहो ) नदी के मुहाने पर था । माही अन्तरीप का नर्मदा तथा माही के मध्य कहीं होना लिखता है ।
कालान्तर में लाट देश का प्राकृत रूप लार देश हो गया था । इसमें गुजरात तथा उत्तरीय कोंकन का
अंचल आ जाता था । मुगल काल में लार समुद्र भाषा और मसूदी लारो का उल्लेख मिलता है । लाट देश
के अन्तर्गत वरयगजा ( भड़ौच भृकच्छ ) तथा ओजेन ( उज्जैन ) नगर थे । गोसारिद भी उसमें सम्मिलित
था । वह नोसारिका किंवा वर्तमान नोसारी है ।
लाट प्रदेश को अष्टाश इक्कीस तथा वारस अर्थात् ताप्ती और माही नदियों के मध्य कतिपय विद्वानों
ने माना है । वह सम्भावना प्रकट की गयी है कि आदित्य वर्धन के पुत्र प्रभाकर वर्धन के संघर्ष में देवगुप्त ने
यथेष्ट सहायता राजा डांकरगण के अन्य अधीनस्थ राजाओं से ली थी जिनमें निरिहुल तथा गुर्जर
थे । उनके मध्य उस समय लाट देश विभाजित हो गया था । लाट देश के कुछ सैनिक मालवा के पक्ष

११८ राजतरंगिणी
से युद्ध में भाग लिये थे। वह युद्ध सातवी शताब्दी के प्रारम्भिक काल में हुआ था। बाण ने प्रभाकर वर्धन
को अराजक लाटजनों के लुटेरा रूप में चित्रित किया है। निस्सन्देह लाट जाति जब स्वतन्त्र अस्तित्व रखती
थी तो वह भारत को एक प्रसिद्ध गौरवशालिनी जाति थी।
पुलिकेशिन द्वितीय की एहोल प्रशस्ति (शक संवत् प्रसिद्ध ५५६ में लाट का उल्लेख किया गया
है। उसमे उल्लेख है। उस शक्ति से लाट, मालव गुर्जर को उसने किस प्रकार अधीनस्थ राजा सदृश आचरण
करने के लिये वाध्य किया। गुजरात राज नशोह तथा राष्ट्रकूट के दानपत्रो से प्रतीत होता है कि शासकीय
विभाजन केवल सौराष्ट्र में ही नही अपितु आनर्त देश में भी थे। वे लाट देश में भी पाये जाते
थे। (एनसियण्ट हिस्टोरी आफ सौराष्ट्र डॉ० के० जे० काजी) धी जे० घ. प्लीट का मत है कि लाट देश
की संज्ञा पुरा काल में वडोदा तथा सूरत क्षेत्र से दी जाती थी।

परिशिष्ट 'द'
चोल
( तरंग १ : ३०० : पृष्ठ ३११ )
कर्नल जेरिनी ने 'चोल' शब्द को संस्कृत शब्द 'काल' तथा 'कोल' से सम्बन्धित करने का प्रयास
किया है। उसे कृष्ण वर्ण आर्य समुदाय का सूचक माना है। संस्कृत शब्द 'चोर' तथा तामिल शब्द 'चोलम्'
से भी सम्बद्ध किया जाता है । बात कुछ तथ्यहीन मालूम पडती है । चोल शब्द प्राचीन काल से चोल
वंश तथा भूखण्ड के लिए प्रयुक्त होता रहा है । एक मत है कि ये 'शिवि' वंशीय है। बारहवी शताब्दी के
अनेक राजवंशो ने करिकाल से उद्भूत अपने को कश्यप ,गोत्रीय माना है। कात्यायन ने उन्हें चोड लिखा
है । संगम युग काल में चोलों ने दक्षिणी भारतीय इतिहास को सर्वप्रथम प्रभावित किया था । तत्पश्चात्
उनका इतिहास लुप्त हो जाता है ।
नवीं शताब्दी में चोलों का पुनः पुनरुत्थान हुआ । इस वंश का संस्थापक विजयपाल ( स० ८५०-
८७०-७१ ई० ) पल्लव राजा के शासन में उरैपुर प्रदेश का शासक था। उसकी वंश परम्परा में २०
राजा हुए । जिन्होंने लगभग ४०० वर्षों तक शासन किया था । इस वंश का प्रतिभाशाली राजा राजराज
का पुत्र राजेन्द्र प्रथम ( सन् १०१२ से १०४४ ई० ) था । उसने चेर पाण्ड्य तथा सिंहल विजय किया था ।
कलिंग जीतता हुआ यह दक्षिण बंगाल और दक्षिण कोशल तक पहुँचा था । वह गंगाजल लाना चाहता था ।
उसने पराजित राजाओं से अपने लिए गंगाजल ढुलवाया ।
चोल राज्य पूर्वीय सागर तट, पेन्नार नदी से वेल्लारु तथा पश्चिम में कुर्ग तक विस्तृत था । यह
भी मत है। वेल्लारु नदी के उत्तर-दक्षिण ( एक ही नाम की दो नदिया हैं ) पूर्व में समुद्र तथा पश्चिम में
कोट्टाडंबकराय तक चोल क्षेत्र फैला था । वर्तमान त्रिचनापल्ली, तंजोर तथा पदुकोटाह का उसमें कुछ भाग
सम्मिलित था । राजधानी उरगपुर किंवा उरैपुर अर्थात् प्राचीन त्रिचनापल्ली थी । कवि दण्डी ने अपने
काव्यादर्श में चोल देश का उल्लेख किया है। कावेरी पट्टन कावेरी नदी के उत्तर इस राज्य का बड़ा
बन्दरगाह था । कांची अर्थात् वर्तमान काजीवरम चोल प्रदेश का विशाल नगर था । नागपटन अर्थात्
नागीपतनम भी इसका एक बन्दरगाह था। नागोपतनम बन्दरगाह आज भी चलता है। मैं यहां दो बार
आ चुका हूँ । समुद्र उथला होने के कारण जहाज २ मील दूर समुद्र में ठहरते हैं ।
तंजोर, त्रिचनापल्ली, कुम्भकोणम पूर्वकालीन चोल राज्य के प्रसिद्ध नगर थे । और आज भी है।
ग्यारहवी तथा बारहवी शताब्दी में गंगई कोण्डा, चोलपुरम चोल राज की राजधानी थी । दक्षिण भारत
के अभिलेखों में कावेरी नदी का नाम चोल दिया गया है। चोल शब्द देश तथा देशवासी दोनों के लिए
प्रयुक्त किया है । ( सभा पर्व ५२ : ३५ ) ।
मार्कण्डेय ( ५७:५:४५ ), वायु ( ४५:५:१२४ ) तथा मत्स्य पुराणों ( ११२:५:४६ ) में चोल
राज्य का नाम पाण्ड्य तथा केरल के साथ मिलता है। पद्म पुराण ( ३०, १०८, १०९ ); तथा स्कन्द
पुराण ( २:४:२६-२७ ) में भी उल्लेख मिलता है ।

१२० राजतरंगिणी
रामायण किष्किन्धा काण्ड (४१:१३) में चोल का उल्लेख आन्ध्र, पुण्ड, पाण्ड्य, केरल के साथ
किया गया है। उसकी दिशा दक्षिण बतायी गयी है। कावेरी नदी का उल्लेख इसी स्थल पर किया गया है।
महाभारत सभा पर्व (२७:२१) में उल्लेख है। अर्जुन ने चोल सेना पर विजय प्राप्त किया था।
भीष्म पर्व (९:६० तथा ५०:५१) में उल्लेख मिलता है कि धृष्टद्युम्न द्वारा निर्मित क्रोंच व्यूह के दक्षिण
पार्श्व में चोल सैनिक रक्षा निमित्त तत्पर थे। कर्ण पर्व (१२:१५) में उल्लेख आता है। पाण्डवों का
पक्ष चोल ने महाभारत युद्ध में लिया था। द्रोण पर्व (११:१७) में वर्णन मिलता है। भगवान् कृष्ण ने
इस देश को जीता था।
कात्यायन ने पाणिनि के वार्तिक में चोल तथा पांड्य का उल्लेख किया है। पाणिनि ने अपनी
अष्टाध्यायी (४.१:१७५:७) में काचीपुरम का उल्लेख किया है। अशोक ने द्वितीय और तेरहवें
शिलालेख में चोल, पाण्ड्य, केलल पुत्तो (केरल) तथा सतियपुत्तो (सत्यपुत्र) का उल्लेख किया है।
तिब्बतीय बौद्ध ग्रन्थो से मालूम होता है। मौर्यों ने दक्षिण पर आक्रमण किया था। इसका समर्थन
आधुनिक अनुसन्धानों से मिलता है। महावंश में चोल तथा कावेरी पत्तनम का उल्लेख है। जातक में कावेरी
पत्तनम का उल्लेख मिलता है। चोल का इतिहास उतार-चढ़ाव से भरा है।
पाणिनि ने अष्टाध्यायी में चोल का उल्लेख किया है। (४:१:१७५) बौद्ध ग्रन्थों में समन्त पसा-
दिका तथा जातक में कोल जनपद का अर्थ चोलजनपद लगाना चाहिए। चीनियों ने चोल देश का नाम
चुल्ली-ए रखा है। उसका क्षेत्र २४०० ली बताते है। यहा संघाराम तथा देव मन्दिरो की प्रचुरता थी।
परमार राज लक्ष्मणदेव की प्रशस्ति में चोल विजय का वर्णन है। यह कल्पना मात्र प्रतीत होती
है। पोल ने चाल का उल्लेख 'सोर' शब्द से किया है। उस पर अरकाट का शासन होना बताता है।
मार्कण्डेय पुराण (५७०८५), वायु पुराण (४५ १२४), मत्स्य पुराण (१२१:४६) में चोल देश का
उल्लेख है।
मार्कण्डेय पुराण में—'चोला: कुल्यास्तथैव च'
वायु और ब्रह्माण्ड पुराण में—चोल्या: कुल्यास्तथैव च'
शैलेन्द्र साम्राज्य के विरुद्ध राजेन्द्र चोल ने मलय, जावा, सुमात्रा पर जहाजी बेड़े से आक्रमण कर,
विजय प्राप्त किया था। भारत का यह अभूत पूर्व नाविक अभियान एवं नौशक्ति प्रदर्शन भारतीय इतिहास
के लिये गौरव की बात है। इस वंश में राजाधिराज प्रथम, कुलोत्तुंग तथा विक्रम चोल आदि शक्ति सम्पन्न
और प्रतिभाशाली राजा हुए थे। चोल वंश का अंतिम राजा राजेन्द्र तृतीय था। तत्पश्चात् चोल राज्य पाण्ड्य
के आधीन हो गया। सन् १३१० ई० में अलाउद्दीन खिलजी के समय मलिक काफूर ने आक्रमण कर चोल
सत्ता उसी प्रकार नष्ट कर दी जिस प्रकार सन् १३३९ ई० में शाहमीर ने कोटारानी को राज्यच्युत कर
दिया था।
चोलों के आम लेखो से ज्ञात होता है। उनकी राज्य व्यवस्था सुसंपादित थी। राज्य अनेक मण्डलों
में विभाजित था। मण्डल को कोट्टम् किंवा वलनाडु कहते थे। तत्पश्चात् नाडु अर्थात् जिला और उसके
पश्चात् कुर्रम् तथा ग्राम थे। चोल राज्य में जन सभाओं द्वारा कार्य संचालन होता था। इन सभाओं का
नाम 'उर' था। उन्हें सभा भी कहते थे। सभा की कार्यकारिणी अर्थात् आलुगणम् का निर्वाचन सभासद
परस्पर मिलकर करते थे। मैमूर से प्राप्त लेख से ग्राम सभा के कार्यों पर प्रकाश पड़ता है। ग्राम शासन

परिशिष्ट 'द' ३३१
पाँच उपसमितियों द्वारा होता था। कार्य काल एक वर्ष तथा सदस्यता अवैतनिक होती थी। उनके कार्यों में
राजा किंवा सम्राट् भी हस्तक्षेप नहीं कर सकते थे।
चोल राजा निर्माण प्रिय थे। उन्होंने विशाल भवनों, मन्दिरों का निर्माण कराया है। तंजौर का
राजेश्वर मन्दिर राजा राजराज ने निर्माण कराया था। उसको भित्तियों पर चित्र महत्त्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय
हैं। राजेन्द्र प्रथम ने इसी प्रकार का मन्दिर त्रिचनापल्ली में निर्माण कराया था। तत्कालीन धातु एवं पाषाण
मूर्ति कलापूर्ण एवं सजीव है।
कश्मीर के समान चोल राज्य में भी साहित्य की विशेष प्रगति तथा उन्नति हुई थी। शक्तिशाली
राजाओं के विजय प्रसंग को लेकर अनेकानेक प्रशस्ति पूर्ण ग्रन्थों की रचना की गयी थी। कुलोत्तुंग तृतीय
के शासन काल में कंबन कवि ने कम्बु रामायण की रचना की थी। व्याकरण, कोश, काव्यशास्त्र तथा छंद
आदि विषयों की रचना का यह गौरवमय काल था।
सम्राट् किंवा राजा अपने जीवन काल में ही युवराज का चयन कर लेता था। सामंतों पर कठोर
नियन्त्रण रखता था। उडनकुट्टम अधिकारी गण राजा को सर्वदा सलाह देते थे। उसके सम्पर्क में रहते थे।
सम्राट् के निकट एक संगठित विभाग था। उसे ओले कहते थे। अधिकारियों के निम्न शिरुदनम् तथा उच्च
पेरुंदनम् वर्ग थे। केन्द्रीय तथा स्थानीय अधिकारियों से सम्पर्क एवं नियन्त्रण रखने के लिये कणक्कगणी
अधिकारी होते थे।
भूमि व्यवस्था सुचारु थी। समस्त भूमि नापी हुई थी। उनको करमुक्त तथा करयुक्त दो वर्गों में वर्गीकृत
किया गया था। कर के लिये समग्र ग्राम उत्तरदायी होता था। भूमिकर के अतिरिक्त चुंगी, व्यवसाय तथा
भवनों पर भी कर लगते थे। स्थानीय संस्थाएँ सुसंगठित थी। स्थानीय जीवन के विभिन्न अंगों के लिये
विभिन्न संस्थाएँ थी।
सेना भी गठित थी। राज्यों के विभिन्न भागों में उसके शिविर या कडगम थे। न्याय, सामाजिक
व्यवस्थाओं, लेखपत्र, साक्षी आदि प्रमाणों के आधार पर होता था। नगरम् उन स्थानों की संस्थायें थी जहाँ
व्यापारी किंवा व्यवसायी वर्ग प्रमुख था। उर ग्रामीणों की सभा थी जिनके पास भूमि होती थी। ब्रह्मदेय
ग्रामों में ब्राह्मणों की सभा थी। सभायें कार्य के लिये स्वतन्त्र थीं। किन्तु ग्रामों के आय व्यय का निरीक्षण
राज्य के अधिकारी करते थे। कार्यों के संचालन के लिये समितिया थी। उन्हें वारियम् कहते थे। उनकी
सभा द्वारा उनके विधान में संशोधन, परिवर्तन एवं परिवर्धन किया जाता था।
कश्मीर के समान चोल नरेशों ने सिंचाई तथा कृषि समृद्धि की सुनियोजित व्यवस्था की थी।
वे बाँध बँधवाते थे। नदियों का प्रवाह रोका था। कूप तथा सरो की श्रृंखलायें बनवायी थीं। कावेरी जैसी
बड़ी नदी पर बाँध बँधवाया था। गंगैकोड-चोलपुरम् के समीप राजेन्द्र प्रथम ने एक सर खुदवाया था।
उसपर सोलह मील लम्बा बाँध था। इसमें दो नदियों से जल लाया गया था। उससे पाषाण प्रणालियाँ
तथा नहरें सिंचाई के लिये निकाली गयी थी। सरोवरों, वापियों तथा नदियों पर कश्मीर के वितस्तादि
तट तुल्य घाट बने थे। प्रशस्त राजपथो से नगर शोभित था।
सामाजिक व्यवस्था कश्मीर के समान धर्मशास्त्र पर आधारित थी। नारियाँ कश्मीर के समान
स्वतन्त्र रूप से कार्य कर सकती थीं। उन पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं था। ये सम्पत्ति की स्वामिनी
हो सकती थी। बहुविवाह प्रथा प्रचलित थी। सती का प्रचलन था। मन्दिरों में देवदासियाँ होती थीं।
१६

१२२ राजतरंगिणी
आर्थिक ढाँचा कृषि पर आधारित था । तथापि गृह शिल्प, व्यवसाय तथा व्यापार खूब होता था । व्यापा-
रियों की एक विशाल श्रेणी थी । उसे नाना देश-तिसैयायिरत्तु-ऐनूजूंबंर कहते थे । वह जावा, सुमात्रा तथा
दक्षिण पूर्व एशिया से व्यापार करती थी । वह वलंगे तथा इडंगे वर्गों में विभाजित था ।
कश्मीर के समान चोल शिव उपासक थे । परन्तु बुद्ध, जैन तथा अन्य सम्प्रदायों के प्रति सहिष्णुता
एवं समानता का व्यवहार किया जाता था । पुराकालीन तमिल धार्मिक पद वेदों के समान आदर पाते थे ।
उनके रचयिता वेद ऋचाओ के ऋचाकार ऋषियों तुल्य पूजे जाने लगे । नेंबि आडार नंबि ने शैव ग्रन्थों का
संकलन सर्व प्रथम किया था। इसी प्रकार नाथ मुनि ने वैष्णव ग्रन्थों का संकलन किया था । भक्ति मार्ग का
दार्शनिक स्वरूप जगत् के सम्मुख रखा था । उनके पौत्र यामुनाचार्य किंवा आलवंदार वैष्णव आचार्य थे ।
रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया । मन्दिरो की विधि मे परिवर्तन किया । वर्ष
में एक दिन मन्दिरो में हरिजन प्रवेश की व्यवस्था की ।
पाशुपत, कापालिक, तथा कालामुख जैसे सम्प्रदाय थे । उनमें कुछ स्त्रीतत्व की आराधना करते थे ।
देवी के उपासक अपना मस्तक भी काटकर देवी के चरणों में अर्पित करते थे । कश्मीर राजा ललितादित्य
का वृत्तान्त इस प्रथा की ओर संकेत करता है । मन्दिर सामाजिक जीवन के केन्द्र थे । कश्मीर के समान
चोल राज्य था । प्रत्येक ग्राम मन्दिर श्रृंखलाओ से पूर्ण था । मन्दिर शिक्षा के केन्द्र थे । वहाँ नृत्य, गान,
नाट्य, मनोरंजन, आमोद प्रमोद के आयोजन होते थे । कश्मीर के अग्रहारो के समान चोल राज्य में भी
मन्दिरो पर भूमि चढ़ायी जाती थी । मन्दिर भूसम्पत्ति का स्वामी होता था । मन्दिर की सम्पत्ति से बैंकिग
का कारबार चलता था ।
चोल राज काल में कांस्य मूर्तियों का प्रचलन बहुत हो गया था। नटराज की मूर्ति विश्वविख्यात
है । तमिल साहित्य में चोल शासन काल स्वर्णिम युग कहा जाता है । प्रबन्ध साहित्य की प्रचुरता थी ।
चोल वंश के अभिलेखों से प्रकट होता है कि कश्मीर के समान चोल राजाओं ने संस्कृत, साहित्य एवं
भाषा अध्ययन के लिये ब्रह्मपुरी, घटिका तथा पाठशालाएं स्थापित करायी थी । उनकी व्यवस्था हेतु समुचित
दान दिया था । ऋग् वेद का भाष्य वैंकट माधव ने किया था । केशव स्वामिन् ने नानार्थार्णव संक्षेप कोश
की रचना की थी ।
जैन एवं बौद्ध साहित्य ने भी चोल राज में प्रगति की थी। जैन कवि तिरुत्तक् कदेवर ने तमिल
महाकाव्य जीवकचिंतामणि की रचना दशवी शताब्दी में की थी । जैन विद्वान् अमित सागर ने छंदशास्त्र
पर छप्पु रुंगलम नामक ग्रन्थ तथा उसके संक्षिप्त संस्करण करिगै की रचना की थी । व्याकरण ग्रन्थों की
भी रचना की गयी थी । वैष्णव आचार्य नाथ मुनि, यामुनाचार्य एवं रामानुजाचार्य ने संस्कृत में ग्रन्थों की
रचना की थी । कश्मीर के समान चोल राज्य में संस्कृत खूब फलती और फूलती रही है ।
मत्स्य पुराण में 'चोलाः कुल्यास्तथैव च।'
वामन पुराण में 'चोलकुल्याश्च राधस' का उल्लेख आया है ।
शक्ति संगम तंत्र ( ३ : ७ : २२ ) में उल्लेख किया गया है :
द्राविड़तैलंगयोर्मध्ये चोलदेशः प्रकीर्तितः ।
लम्पकणांश्च ते प्रोक्ता भेद्रोऽस्यावान्तरो भवेत् ॥ २२
इससे प्रकट होता है कि चोल देश द्रविड़ तथा तैलंग देश के मध्य स्थित था ।

परिशिष्ट 'घ'
दरद
( तरंग १ : ३१२ पृष्ठ १२८, ३२२ )
पुराणों में उल्लेख आता है :
काम्बोजा दरदाश्चैव बर्बरा ह्यङ्गलोकिकाः ।
चीनाश्चैव तुषाराश्च बहुला बाह्यतोदराः ।। ( वामन० पु० १३.५० )
× × ×
दरदांश्च स काश्मीरान् गान्धारान् भौरसान् कुहून् ।
मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड तथा वामन पुराणों में 'काम्बोजा दरदाश्चैव' एक साथ प्रयुक्त किया गया
है। कृष्णगंगा के ऊर्ध्वभागीय उपत्यका के उत्तरीय कश्मीर में दरदों का स्थान है। उसे आज भी दर-
दिस्तान कहते हैं। दरदापुर किंवा दरतपुरी वहाँ का नगर है। दरद क्षेत्र को दरस भी कहते हैं ( वायु०
: ४५ : ११ ९, मत्स्य १२१ : ४६ विष्णुधर्मोत्तर १ : १० : ९, मार्कण्डेय ५७ : ४० ) वायु तथा ब्रह्माण्ड
पुराण में 'दरदांश्च सकाश्मीरान्', वायु पुराण में 'दरदांश्च सकाश्मीरान', 'मत्स्य पुराण में', 'दरदोर्ज-
गुडाश्चैव' का उल्लेख मिलता है। स्पष्ट है कि दर्दिस्तान को कश्मीर के साथ रखा गया है। कुबेर का
स्थान सुमेरु पर्वत है । वर्तमान पामीर है । दरद देश पामीर के दक्षिण में है। दर्दुर पर्वत का उल्लेख सभा
पर्व ( १० : ३२ ) में आया है। उसके अधिष्ठाता कौरवों की सभा में रहते थे। प्रायः दरद जाति का
उल्लेख पिशाच, पुण्ड्र, तंगण, परितंगण, बाहिक आदि के साथ मिलता है। दारदिक तथा पैशाची भाषा को
आर्य भाषा की एक शाखा माना गया है। एक मत है कि वह ईरानी तथा भारतीय भाषा के मध्य की
भाषा थी । ( ग्रीयर्सन पैशाच आफ नार्थ बेस्ट द्रविड ३ )
जातकों में दद्दुर पर्वत का उल्लेख मिलता है। इसे हिमालय के अन्तर्गत माना गया है। मार्कण्डेय
पुराण में वर्णित दर्दुर पर्वत यही दद्दुर पर्वत है। यूनानी इतिहासकारों ने दरदाई जाति का वर्णन किया है।
यह जाति दद्दुर पर्वत माला में निवास करती थी। कश्मीर उपत्यका के उत्तर में स्थित है। चेतिय जातक
की गाथा है। दद्दरपुर के उपचर के पाँचों पुत्रों ने पाँच नगर हत्थिपुर ( हस्तिनापुर ) अस्सपुर (अंग में )
सीहपुर ( लालराष्ट्र उत्तरीय पंजाब ) उत्तर पंचाल ( सम्भवतः अहिच्छत्र ) तथा दद्दरपुर बसाया था ।
दद्दरपुर नाम रखने का कारण दिया गया है। वहाँ दो पर्वतों के मध्य रगड़ द्वारा दद्दर ध्वनियां उठती
रहती थीं। मनुस्मृति में मनु ने ( १० : ४४ ) दरद जाति का उल्लेख किया है।
हरिवंश पुराण में वर्णन है—कश्मीर राज गोनर्द के साथ दरद राज ने भी जरासंध का पक्ष लेकर
कृष्ण के विरुद्ध मथुरा में युद्ध किया था ।
अहं च दरदश्चैव चेदिराजश्च वीर्यवान् ।
दक्षिणं शैलनिचयं दारयिष्यामि देशितः ॥
हरिवंश विष्णु पर्व ४२ : ३७

१२४ राजतरंगिणी
दरद राज ने जरासन्ध के पक्ष में लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की थी :
एष्यत्के तु नृपतिर्दरदो नाम वीर्यवान् ।
रामं हलाग्रोप्रभुजं प्रत्ययात् सैन्यमध्यगम् ॥ ५५ ॥
× × ×
तद् युद्धमभवत् ताभ्यां रामस्य दरदस्य च ।
युधे लोकवरिष्ठाभ्यां कुशलाभ्यामिनौजसा ॥ ५७ ॥
योजयित्वा ततः स्कन्धे रामो दरदमाहवे ।
हलेन बलिनां श्रेष्ठो मुसलेनावपोधयत् ॥ ५८ ॥
स्वकायगतमूर्द्धा वै मुसलेनावपोधितः ।
पपात दरदो भूमौ दारिताब्धं इवाचलः ॥ ५९ ॥
रामेण निहते तस्मिन् दरदे राजसत्तमे ।
जरासंधस्य राज्ञस्तु रामेणासीत् समागमः ॥ ६० ॥
स्कन्द पुराण के देशो की तालिका मे दरद का स्थान १० वा तथा ग्राम-संख्या ३ लाख ५० हजार
दी गयी है ।
महाभारत सभा पर्व ( ४४ : ८ ) में उल्लेख मिलता है । अर्जुन ने उत्तर दिशा दिग्विजय काल में
दरद देश पर विजय प्राप्त किया था । इसी ( ५२ : १३ ) में उल्लेख है । वनवास काल में सुबाहु की राज-
धानी जाते समय पाण्डव लोग दरद देश द्वारा गमन किये थे ।
हिमालय पर्वतीय जातिया तथा प्रदेश भारतीय राजनीति तथा युद्धों में भाग लेती रही है । इस
अंचल के लोग वीर माने जाते रहे हैं । महाभारत उद्योग पर्व ( ४ : १५ ) में उल्लेख मिलता है कि पाण्डवो
ने अपने पक्ष से युद्ध करने के लिए दरद लोगों को आमन्त्रित किया था । इस देश की जो भौगोलिक स्थिति
महाभारत में दी गयी है वह आज भी मिलती है । इसे पूर्वोत्तर दिशा का देश माना है । कश्मीर के पूर्वोत्तर
इनका क्षेत्र इस समय कम विस्तृत है । परन्तु महाभारत काल में प्रतीत होता है कि इसका विस्तार आज
की अपेक्षा पूर्व दिशा की ओर अधिक था । ( भीष्म पर्व ९ : ६७ ) । दरद देश के योद्धा दुर्योधन की सेना
में थे । उनकी ओर से युद्ध में भाग लिया था ( भीष्म पर्व ५१ : १६ ) ।
कथा है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने इस देश को जीता था ( द्रोण पर्व ७० : ११ ) । श्रीकृष्ण के विरुद्ध
दरद लोगों ने जरासन्ध के पक्ष से युद्ध किया था । वहाँ का राजा उस युद्ध में मारा गया था । दरद देश
के लोगों ने सात्यकि पर आक्रमण किया था । सात्यकि ने इन लोगो का संहार किया था । अनुशासन पर्व में
इनके जाति के विषय में कहा गया है कि यह लोग क्षत्रिय थे परन्तु ब्राह्मणो के प्रति ईर्ष्या एवं द्वेष रखने के
कारण शूद्र हो गये थे ।
दरद लोग उत्तरीय पश्चिमी भारत के अंचल में रहते थे । उत्तर-पश्चिमीय भारतीय क्षेत्र द्वारा
विदेशी लोग भारत में आते थे । विदेशी लोग भारतीय आर्य परम्परा से भिन्न होते थे । विदेशियो के संसर्ग
के कारण उत्तर-पश्चिम सीमान्त स्थित हिन्दुओं की परम्परा पर प्रभाव पड़ता था । वह प्रभाव उनके जीवन
तथा आचरण को प्रभावित करता था । शीतल जलवायु तथा परिश्रमी जीवन के कारण शरीर गठन पुष्ट एवं
स्वस्थ होता था । ये सुन्दर होते थे ।

परिशिष्ट 'घ' १२५
प्रकृति के साथ दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संघर्ष करते रहने के कारण उनका
स्वभाव लड़ाकू हो जाता था । अच्छे सैनिक समझे जाते थे । परस्पर संघर्ष करते रहते है। गोत्रीय प्रवृत्ति
विदेशी तथा अन्य जातियो के आक्रमण तथा उनके भय के कारण जागृत रहती थी । इस प्रकार वे अपनी
स्थिति और व्यक्तित्व रखने में सफल रहे । पुराकाल में यातायात तथा परिवहन सुगम नही था । कम सम्पर्क
होने के कारण उत्तर-पश्चिम की जातियों के विषय में समय-समय पर विभिन्न धारणाएँ बनती और बिगड़ती
रही है । उनकी भौगोलिक स्थिति के विषय में भी परस्पर विरोधी उल्लेख मिलते है । परन्तु एक बात में
सभी एक मत है । वे पर्वतीय जाति थे । उनका निवास भारत के उत्तर-पश्चिम सीमान्त पर था । दरदों
के प्रदेश, सीमा तथा क्षेत्र के सम्बन्ध में यदि कही अन्तर अथवा भिन्नता पुराकालीन ग्रन्थों में दिखाई पड़ती
है तो उसका एकमात्र कारण ग्रन्थों का रचना-काल तथा तत्कालीन परिस्थितियों में इन पर्वतीय जातियों के
विभिन्न राजनीतिक, भौगोलिक स्थिति दी थी ।
उत्साही, कर्मठ तथा वीर राजाओ अथवा नेताओ के काल में राज्य का विस्तार होता था । गौरव
तथा महत्त्व बढ़ता था । उसके अभाव में राज्य की सीमा संकुचित होती थी । प्रदेश पतनोन्मुख होता था ।
अतएव दरदों की राज्य-सीमा के विषय में विभिन्न उल्लेख मिलते हैं। एक बात में सब एक मत हैं। वे
कश्मीर के उत्तर पश्चिम सिन्धु घाटी में निवास करते थे । उनके राज्य की सीमा उन्नति काल में वर्तमान
लेक साल्ट तक पहुँच जाती थी । अतएव उनके उत्तर-पूर्व में रहने का भी उल्लेख मिलता है । यह बात
सर्वत्र मानी गयी है । इस समय जहां ददिस्तान अर्थात् कश्मीर का उत्तरीय पूर्वीय पर्वतीय भूभाग जो
सिन्धु घाटी को छेंके हैं, वही उनका स्थान था ।
महाभारत तथा पुराणो में स्पष्ट उल्लेख मिलता है । वे भगवान् श्री कृष्ण के विरुद्ध जरासन्ध का पक्ष
ले करके युद्ध करते थे । मथुरा नगर के घेरे में सम्मिलित हुए थे । बलराम ने युद्ध में दरदराज को मारा था ।
कौरव की ओर से खस, शक, यवन, त्रिगर्त तथा मालव के साथ महाभारत युद्ध में दरद भाग लिये थे ।
( द्रोण पर्व १०:१८ ) मत्स्य पुराण में उल्लेख आता है । उनका देश गान्धार, शिवपुर, उसमा आदि औरस
लोगों की तरह सिन्धु उपत्यका का एक भाग था ( २:१८४ ) । विष्णु पुराण उन्हें आभीर तथा कश्मीर से
सम्बन्धित करता है ( १११:४५-५१ ) वे दरद किंवा दर्दुर पर्वत माला में रहते थे । अतएव उनका नाम
दरद पड़ा । उनके इस अंचल में रहने के कारण पर्वतमालाओं का नाम दरद पर्वत पड़ सकता है ।
पाश्चात्य लेखक श्री स्टावों उन्हें दरदाई नाम से अभिहित करता है । श्री प्लेनी ने उन्हें दरदेई भी
कहा है । श्री फिरोज उन्हें दरदाई नाम से सम्बोधित करता है। वह लम्पक ( लगमान ) तथा सेनि-
स्टेन ( स्वात ) उपत्यका तथा सिन्धु उपत्यका के अधो भाग में उनका स्थान बताते है । वह कहता है ।
दरद देश की पर्वतमालाएँ विचित्र रूप से ऊँची है । यह पर्वत वर्तमान जिला दरदो है । पाक-कश्मीर युद्ध
की विराम रेखा के कारण अधिकांश भाग पाकिस्तान के अनधिकृत अधिकार में है । राजतरंगिणी में दरदों
का प्रायः उल्लेख किया गया है । उन्होंने कश्मीर के जीवन को प्रभावित किया था ।
दरद शब्द कई अर्थों में प्रयुक्त किया गया है। महाभारत आदिपर्व में बाल्हीक देश के एक राजा
का वर्णन है । वह सूर्य नामक असुर के अंश से उत्पन्न हुआ था । ( आदि पर्व ६७:५८ )
इनके कारण पृथ्वी भार से दब-सी गयी । ( सभा पर्व ४४:८ )
दरद की संज्ञा महाभारत में एक देश से भी दी गयी है । उत्तर दिग्विजय काल में अर्जुन ने इसे
जीता था । ( सभा पर्व २७:२७ )

१२६ राजतरंगिणी
राजा युधिष्ठिर को दरद देश निवासियों ने उपहार दिया था । ( सभा पर्व ५२:१३ )
वनवास काल में सुबाहु की राजधानी में जाते समय पाण्डव लोग दरद देश होकर गये थे । ( वन
पर्व १७७:१२ )
दरदराजको पाण्डवों ने महाभारत युद्ध में भाग लेने के लिए आमन्त्रित किया था । ( उद्योग
पर्व ४:१५ )
दुर्योधन के पक्ष में महाभारत युद्ध में दरद देश के योद्धाओं ने भाग लिया था। ( भीष्म पर्व ५१:१६ )
भगवान् श्रीकृष्ण ने दरद देश पर आक्रमण किया था । ( द्रोण पर्व ७०:११ )
महाभारत में दरद को एक जाति माना गया है। पूर्वकाल में क्षत्रिय थे कालान्तर में ब्राह्मणों
के कोप के कारण शूद्र हो गये थे । ( अनुशासन पर्व ३५:१७-१८ )
एक भारतीय जनपद दरद का वर्णन शल्य पर्व में किया गया है । ( शल्य पर्व ५०:५० )

परिशिष्ट 'न'
खस
(तरंग : १ : ३१७ : पृष्ठ ३२० )
आजकल की खश जाति ही यहदृण वर्णित खश जाति है। खश का अपभ्रंश खस जाति-
वाचक शब्द है। यह जाति पीर पंचाल पर्वतमाला के दक्षिण और पश्चिम रहती थी। ये सीमित क्षेत्र में
रहते हैं। पीरपञ्चाल उपत्यका के दक्षिण-पश्चिम में वितस्ता की मध्य धारा और किश्तवार पूर्व के
पर्वत के एक भाग में ये अपने को मुस्लिम राजपूत कहते हैं। हिन्दू खश जाति हिमालय के अन्य क्षेत्रों में
रहती है। कुमायूँ की पहाड़ियों में बहुत लोग अपने को खश कहते हैं। राजपूत होने का दावा करते हैं।
राजपुरी का खश सरदार राजपूतों में विवाह-शादी करता था। लोहर के खश सरदार सिंहराज ने काबुल
के शाही राजाओं से विवाह सम्बन्ध स्थापित किया था ( रा० त० ६:१७५, १७७ ) । सिंहराज की कन्या
दिद्दा रानी थी। उसने काश्मीर पर राज्य किया था।
मनु ने ( १० : २२ ) में खशों को दूसरा नामकरण दिया है। उन्हें मनुस्मृति में ( १०.४ -४४ )
क्षत्रिय माना है। खश तथा खस दोनों पाठ मिलता है। नीलमत पुराण खश जाति का उल्लेख निम्न स्थानों
पर करता है।
गन्धर्व्या वाजिनः पुत्रा भद्राश्च सुरभेः सुताः ।
यक्षांश्च राक्षसांश्चैव खशायास्तनयाः स्मृताः ॥ 48 = ७२
× × ×
कद्रूः क्रोधा इरा श्वाषा विनता सुरभिः खशा ।
मुग्धाश्चैव तथा पूज्याः सुप्रभा च तथा जरा ॥ 583 = ७०३-७०४
× × ×
दार्वाभिसारगान्धारजुहुण्डरशकान् खशान् ।
तंगणान् पाण्डवान् मद्राञ्छन्तर्गिरिबहिर्गिरीन् ॥ 80 = १२२
× × ×
दार्वाभिसारगांधारजालन्धरशकाः खसाः ।
तंगणा भाण्डवाश्चैव आन्तर्गिरियहिर्गिरिः ॥ 139 = १८२
नीलमत में 'खशा' तथा 'खस' एक ही शब्द एवं अर्थवानक है। कल्हण ने खशों का प्रचुर वर्णन
किया है। इस समय उन्हें खवशा कहते हैं। खखश मुसलमान भी हैं। वे राजपूत मुसलमान भी कहे जाते हैं।
नीलमत में वर्णन किया गया है कि ब्रह्मा से वर मिलने पर जलोद्भव असुर दार्वाभिसार, गान्धार,
जुहुण्डर, शक तथा खसों का नाश करने लगा। यह सब कश्मीर के सीमावर्ती जातियां एवं क्षेत्र हैं। एक मत
है कि 'कस' शब्द से कश्मीर शब्द बना है यह ठीक नहीं है। 'कस' शब्द खश जाति के लिये व्यवहृत

१२८ राजतरंगिणी
किया गया है । खश तथा कश्मीर जाति जिसे 'कश्मीराह' कहा गया है सर्वथा भिन्न है । नीलमत गश
जाति का अलग तथा स्वतन्त्र रूप से उल्लेख करता है ( नी० ४० )
राजतरंगिणी में अनेक स्थानों पर राजौरी अर्थात् राजपुरी के शासक रूप में गशो को वर्णन किया
गया है । उन्हें राजा नाम से सम्बोधित किया गया है। उसकी सेना खशा कही जाती थी । ( रा० त०
७:६७६, १२७१, १२७६, ८:८८७, १४६६ १८६८, १८६५ ) । राजपुरी के पूर्व अंचल के आम्स नदी
की ऊर्ध्व उपत्यका मिलती है। इस नदी को आजकल पंजगब्बर कहते हैं। श्रीवर ने इसका उल्लेख (४.२१३)
किया है । उसने इस नदी को पंचगह्वर लिखा है। उसे खशो का निवास-स्थान भी माना है। उमगे पूर्व
के अंचल को वाजशाल कहते थे । यह वही आजकल का बनिहाल है। इसी के नीचे बनिहाल पास है ।
यहीं पर भिक्षाचर ने खश राजा भागिक के दुर्ग में शरण ली थी ( रा० त० ८.१६६५) । राजतरंगिणी
( ८.१७७ तथा १०७४ ) के वर्णन से प्रतीत होता है । वह उपत्यका जो बनिहाल और चन्द्रभागा नदी के
मध्य है, उसे इस समय 'विचलारी' कहते हैं। पुरावृत्तकारो ने उसे विश्रालटा कहा है। यह क्षेत्र गशों से
आबाद था ।
खशालय का भी वर्णन कल्हण ने ( रा० त० ४:५६, ५८, २८४, २६०, २६६ ) किया है । यहा
खश जाति रहती थी । खशालय ही खेशल उपत्यका है। इसे कंदोर भी कहते हैं। वह दक्षिण-पूर्व में मारवल
पास से कश्मीर के एक कोने से होतो किश्तवार तक चली जाती है। खशालय का पुराना नाम खशाली
( रा० त० ७:३०६ तथा थीवर ४:४५६ ) प्रतीत होता है ।
राजपुरी से पश्चिम घूमने पर पर्णोत्स अथवा राजतरंगिणी ( ६:३१२ ) में वर्णित प्रान्त है । उसमें
एक व्यक्ति तुंग खश था । वह चरवाहा था । रानी दिद्दा के समय अत्यन्त शक्तिशाली मन्त्री बन गया था ।
( रा० त० ७:७७३ ) तुंग के वंशज रानी दिद्दा के पश्चात् कश्मीर के राजा हुए थे । उन्हें निम्न खश
समझा जाता था ।
आधुनिक खख्ख जाति और खश एक ही है । कश्मीर में वितस्ता उपत्यका के अधोभागीय सरदार
प्रायः इसी जाति के थे । खख्ख शब्द खश का अपभ्रंश है ।
वितस्ता उपत्यका के खखा सरदार कश्मीर में सिख राज के पूर्व अर्ध स्वतंत्र हैसियत रखते थे । अपने
पडोसी बोम्व कबीले के साथ वे कश्मीर के लिए समस्या हो गये थे । उनका भयंकर क्रूर कर्म जो शेख इमा-
मुद्दीन के समय ( १८४६ ) मे उन्होने किया था अभी तक लोगों को याद है । खश लोगो ने मध्ययुग में
लूटपाट में प्रसिद्धि प्राप्त की थी । ( रा० त० ४.३२६ और ८:१८४५, २३८९ ) से यह बात सिद्ध होती
है । श्रीवर ने जैनराज तरंगिणी ४:४४३, ४५२, ४६४, ५६६, ६३३, ६४. में इसी बात की कुपुष्टि की है।
कश्मीर की मर्डुमशमारी १८६१ के रिपोर्ट पृष्ठ १४१ पर खखो की आबादी ४१४६ लिखी है । उनकी
जाति मुस्लिम पर्वतीय राजपूतो की एक उपजाति मानी गयी है । पृष्ठ २०१ ।
खश जाति को मार्कण्डेय पुराण में पर्वताश्रयी जाति कहा गया है । यह जाति पर्वत में रहती थी ।
अतो देशान् प्रवक्ष्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये ।
नीहाराः हंसमार्गाश्च कुरवो गुर्मणाः खशाः ॥
x x v

परिशिष्ट 'न' १२९
गन्धर्वान् किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान् ।
कलापग्रामकांश्चैव तथा किंपुरुषान् खसान् ॥ नी० ५७:५६
खसों की उत्पत्ति के विषय में महाभारत में कथा मिलती है। नन्दिनी गऊ ने अपनी रक्षा निमित्त
उन्हें अपने अंग से उत्पन्न किया था ।
मूत्रतश्चासृजत् कांश्चिच्छवरांश्चैव पार्श्वतः ।
पौण्ड्रान् किरातान् यवनान् सिंहलान् बर्बरान् खसान् ॥
आदिपर्व : १७४ : ३७
× × ×
असृजत् पल्लवान् पुच्छात् प्रस्त्रवाद् द्रविडान् शकान् ।
योनिदेशाच्च यवनान् शकृतः शबरान् बहून् ॥ ३५ ॥
मूत्रतश्चासृजन् कांश्चित् शवरांश्चैव पार्श्वतः ।
पौण्ड्रान् किरातान् यवनान् सिंहलान् बर्बरान् खसान् ॥ ३६ ॥
चिबुकांश्च पुलिंदांश्च चीनान् हूनान् सकेरलान् ।
ससर्ज फेनतः सा गौः म्लेच्छान् बहुविधानपि ॥ ३७ ॥
महाभारत आदिपर्व १७६ : ३६-३७
इस रूपक का यह अर्थ भी लगाया जा सकता है। खस गोरक्षक थे । क्षत्रियों का कार्य गो ब्राह्मण
की रक्षा करना था । उन्हें युद्ध किंवा रक्षा हेतु नन्दिनी गाय ने उत्पन्न किया था। वे क्षत्री थे। उनके क्षत्री
तथा क्षात्रधर्म व्रती होने में सन्देह नही रह जाता ।
वितस्ता उपत्यका के अधोभाग में बारहमूला के आगे खश रहते थे। वीरांका खशों का केन्द्र कहा
गया है। राजतरंगिणी (रा० तं० ८:४०९) के वर्णन से मालूम होता है। यह स्थान प्राचीन द्वारावती
के समीप था । द्वारावती को इस समय द्वारविडी कहते हैं। यह संस्कृत द्वारविद्या का अपभ्रंश है। वितस्ता
उपत्यका का यह भाग कयाई तथा मुजफ्फराबाद के मध्य है। एक मत है। खश पीर पंतसाल के दक्षिण
पश्चिम के निवासी है।
महाभारत सभा पर्व में भी खश जाति का उल्लेख आता है। उन्हें शकों तथा दरद जातियों तुल्य
अर्ध सभ्य जाति में परिगणित किया गया है। (सभापर्व ५२ : २-४) सभा पर्व में पुनः एक स्थान पर
उल्लेख आता है कि ये मरु तथा मन्दर पर्वत के मध्य शैलोदा नदी की उपत्यका में रहते थे ।
मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् ।
ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते ॥ १ ॥
खसा एकासना ह्यर्हाः प्रदरा दीर्घवेणवः ।
पारदाश्च कुलिन्दाश्च तङ्गणाः परतङ्गणाः ॥ ३ ॥
तद् वै पिपीलिकं नाम उद्धृतं यत् पिपीलिकैः ।
जातरूपं द्रोणमेयमहार्षुः पुञ्जशो नृपाः ॥ ४ ॥
महाभारत वन पर्व ५२:२-४

१३० राजतरंगिणी
खसों की वीरता की प्रशंसा के लिए दुर्योधन ने शकुनीपुत्र उलूक को अपना दूत बना कर पाण्डवों के
के पास भेजा था । और खसों के सम्बन्ध में निम्नलिखित बात कहने का आदेश दिया था ।
किं दर्दुरः कूपशयो यथैमां,
न बुध्यसे राजचमूं समेताम् ।
दुराधर्षं देवचयप्रकाशां,
गुप्तां नरेन्द्रैस्त्रिदशैरिव द्याम् ॥ १०२ ॥
प्राच्यैः प्रतीच्यैश्च दाक्षिणात्यै-
रुदीच्यकाम्बोजशकैः खशैश्च ॥ १०३ ॥
महाभारतः उद्योग पर्वः १६०:१०२-१०३
शैलदा नदी पश्चिमी पर्वत के वरुण पर्वत से निकलती है और पश्चिम सागर में गिरती है ।
( मत्स्य पुराण : १२० : ३३ ) । मनु ने उन्हें क्षत्री माना है । ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा न होने के कारण
वे पतित हो गये थे । ( मनुस्मृति १० : ४३ : ४ ) मनु ने स्पष्ट कहा है कि खश जाति क्षत्रिय थी ।
परन्तु क्रिया भ्रष्ट एवं ब्राह्मणों का दर्शन न पाने के कारण धीरे-धीरे स्थान च्युत हो गयी । निस्सन्देह खश
जाति के क्षत्री होने में सन्देह नहीं किया जा सकता ।
शनकैस्तु क्रियालोपाद् क्षत्रियजातयः ।
वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥
मनुस्मृति १० : ४३
× × ×
पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः कम्बोजा यवनाः शकाः ।
पारदाः पह्लवाः चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥
मनुस्मृति १० : ४४
उन्हें काशगर से कुछ विद्वान् सम्बन्धित करते हैं । खशगिरि का अपभ्रंश काशगर कहा जाता है ।
मार्कण्डेय पुराण ( १४६ : ३५० ) में उन्हें शाल्व, शक और शूरसेन आदि जातियो के साथ रखा गया है ।
सेन तथा पाल वंश के शिलालेखों में इनका उल्लेख आता है ।
बृहद् संहिता खशों का कुलूत ( कुलू निवासी ) तंगणा, तथा काश्मीरा के साथ धर्मीकरण करती
है ( १० : १२ ) ।
ऋग्वेद संहिता ( १ : ३१७ ) में खश जाति का उल्लेख मिलता है । ऋग्वेदकाल में गिलगित से
करलो नदी तथा कालान्तर में नेपाल की पूर्वी सीमा तक खश जाति फैल गयी थी । खशा प्राचीनतम
दक्ष प्रजापति तथा असिक्नी की कन्या थी । कश्यप प्रजापति को दी गयी थी । उससे यक्ष राक्षसादि हुए ।
मार्कण्डेय पुराण में 'कुरवो गुर्गणाः खशाः', 'वायु पुराण में 'क्षुपणास्तङ्गणाः खशाः', 'कुणपास्तंगणाः खशाः',
'शुथ्नास्तङ्गनाः खशाः' 'ध्रुवणास्तङ्गणाः रासाः' । ब्रह्माण्ड पुराण में 'कुपथास्तङ्गणाः खशाः', मत्स्य पुराण
में 'कुपथा अप्यास्तथा', वामन पुराण में 'कुपथास्तङ्गणा खशाः', उल्लेख आता है । कुपथ किंवा अपथ
: हिमालय में कोई स्थान था । खश देश का उल्लेख द्रोण पर्व में किया गया है । मत्स्य पुराण में बर्बर तथा

परिशिष्ट 'न' १३१
यवनों के साथ खशों का उल्लेख किया गया है। 'बर्बरान् यवनान् खशान्' वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराण में
'पारदान्, खसान्' 'पारदास्तङ्गणाखशान्', 'किम्पुरुषान् खशान्' का उल्लेख अर्थात् 'पारद, तङ्गण तथा
किम्पुरुष' के साथ आया है।
महाभारत द्रोण पर्व में खश जाति का उल्लेख आया है कि उन्होंने कुरु क्षेत्र के युद्ध में अयोद्दस्ता तथा
शूलहस्ता खश गणों ने सात्यकि पर अश्म वर्षा की थी।
ततः पुनर्व्यात्तमुखस्तेऽश्मवृष्टीः समन्ततः ॥ उद्योग पर्व = १६० : १०३
अयोद्दस्ता शूलहस्ता दरदास्तङ्गणा खशाः ॥ द्रोणपर्व १२१ : ४२
खाशीर जनपद का उल्लेख भीष्म पर्व में पूर्वोत्तर भारत के एक जनपद के लिए किया गया है।
मार्कण्डेय पुराण में खश जाति स्थान मगध तथा लौहित्य के साथ पूर्व दिशा में रखी गयी है। परन्तु यह
कश्मीर साहित्य में वर्णित जाति खस नहीं है। आसाम के खासी पर्वत में रहने वाली खासी जाति हो
सकती है।
खश एवं खस दोनों एक ही जाति के वाचक है। भागवत पुराण (२:४:१८) के अनुसार खस जाति
पतित हो गयी थी। भगवत भक्ति के कारण शुद्ध हो गयी। ब्रह्माण्ड पुराण (२:३६:१४५ तथा ३:६६:१२०)
के अनुसार विन्ध्य पर्वत में निवास करने वाली खस एक निम्न कोटि की क्षत्री जाति थी। उसे निषाद भी
कहते थे। हरिवंश पुराण के अनुसार सगर ने उन्हें जीता था। उन्हें निम्न श्रेणी में रख दिया। वे म्लेच्छ
माने गये । हरिवंश पुराण ( १४:७८४ ) ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य पुराण ने उन्हें पूर्व का एक जनपद माना है।
जिसमें होकर चक्षु नदी बहती है। ब्रह्माण्ड पुराण तथा मत्स्य पुराण (१२०:४३, १४४:५७ ) वायु पुराण
में खश पर्वतीय खश जनपद कहा गया है। यहां खश के स्थान पर खस शब्द का प्रयोग किया गया है।
वायु पुराण ( ४५:१३५ तथा ४७:४७ ) में दरद जाति को खस जाति का पड़ोसी माना गया है। बंगाल के
पाल राजाओं के शिलालेख में हूण तथा खस जाति का उल्लेख मिलता है। निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
खस लोग बंगाल तक आते जाते थे। पूर्वोय भारत का उनको ज्ञान था। वहां वे किसी न किसी रूप में
आबाद थे।
हरिवंश पुराण ( १३:२३-३४) में उल्लेख आता है कि रघुवंशी राजा बाहू और उसके राज्य को
हैहय तथा तालजंघ वंशीय राजाओं ने शक, यवन, कम्बोज, पारद तथा पह्लव की सहायता से नष्ट कर
(१४:४) दिया था। यवन, पारद, काम्बोज, पह्लव तथा खस पांचगणो ने हैहय राजाओं के विजय निमित्त
पराक्रम किया था। यहाँ स्पष्ट उल्लेख मिलता है। खसों की राज्य-व्यवस्था गणतन्त्रीय थी। खसो ने बाहू
राजा तथा उसके राज्य को नष्ट करने में सम्भवतः प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया था क्योकि श्लोक ( १३:३० ) में
खस का उल्लेख नही आता । हैहय तथा तालजंघ राजा के साथ शकों का उल्लेख है। उसने बाहू के राज्य
को छीन लिया था। केवल यह उल्लेख आता है ( १४:४) कि पाँच गणराज्य जिनमें खस भी एक गण राज्य
था, हैहयों के लिए पराक्रम किया था। खस लोग शकों की तरह बाहू के राज्य को लेते हुए दिखाई नहीं देते।
एक मत है कि 'केदारे खसमण्डले' की उक्ति के अनुसार केदार खण्ड खस मण्डल का पर्याय है।
यह मत उचित नहीं मालूम होता। केदार खण्ड में ही नहीं हिमालय के दक्षिणवर्ती पर्वतमाला में खश जाति
फैली थी । अतएव खस जाति केदार खण्ड में भी आबाद थी । परन्तु इसके कारण खसमण्डल का पर्याय
केदार खण्ड मान लिया जाय यह युक्ति पूर्ण दलील नहीं मालूम होती ।