राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
प्रथम तरंग १२७ शतमन्युः शान्तमन्योगो॑त्रभिद्रोत्ररक्षिणः । लेभे यस्य सुरेन्द्रस्य सुरेन्द्रो नोपमानताम् ॥ ९२ ॥ ९२. इन्द्र सुरेन्द्र १ की इस सुरेन्द्र से तुलना नहीं हो सकती क्योंकि सुरेन्द्र शतमन्यु अर्थात् शतक्रोधी था और सुरेन्द्र शान्त मन्यु अर्थात् शान्त क्रोध था। यह सुरेन्द्र गोत्र अर्थात् पर्वत रक्षक था और वह सुरेन्द्र गोत्रभिद् अर्थात् पर्वत संहारक था। कश्मीर के बाहर विदेश नहीं भेजता। कश्मीर में हिन्दू धर्म का प्रभाव था। सुरेन्द्र स्वयं धार्मिक राजा था। उसके लिए यह संभव नहीं हो सकता था कि वह अपनी एक मात्र सन्तान का विवाह एक विधर्मी से कर देता। ईरान के राजा ने उस पर आक्रमण नही किया था। एक सौदागर के कहने और एक हकीम से संदेश सुनकर, राजपुत्री को विवाह के लिए भेज देना तर्क सम्मत नही मालूम होता। यदि वह अपनी कन्या का विवाह करना स्वीकार करता तो दो राज्यों के विवाह सम्बन्ध के अनुसार पिता किंवा वर स्वयं एक दूसरे के यहाँ आकर करते। कश्मीर मण्डल के चारो ओर हिन्दू राज्य था। कन्या के लिए वर मिलना कठिन नहीं था। राजा सुरेन्द्र अपना राज्य कैसे दूसरे कुल में, अपनी कन्या ईरान के राजा को देकर, जाना पसन्द करता, कुछ बात दिमाग में बैठती नहीं। हसन अथवा मुस्लिम इतिहास- कारों के दिमाग में मुस्लिम काल की बातें याद आई होंगी। जहाँ लड़कियाँ छोटे राजाओं के यहाँ से खूबसूरती की शोहरत सुनने पर मँगा ली जाती थी। उनका धर्म परिवर्तन कर विवाह कर लिया जाता था। यह सब मनगढ़न्त और इतिहास पर दूसरा रंग देने का विचित्र प्रयास किया गया है, जो कल्पना तथा मानव-प्रवृत्ति के परे की बात है। (२) दीर्घवहिष्कृतः—इसका श्री स्टीन ने दो प्रकार से अनुवाद किया है।—उसका एक अनुवाद उन्होंने किया है—'जिसने कि इन्द्र के राज्य को भी मात कर दिया था—।' पाठभेद : श्लोक संख्या ९२ में 'सुरेन्द्रो नोपमानदाम्' का पाठभेद 'न सुरेन्द्रः समानताम्' तथा 'यस्य' का 'तस्य' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ८२(१) सुरेन्द्र—सुरेन्द्र का अर्थ यहाँ इन्द्र है। दोनों सुरेन्द्रों के आचरणों की तुलना कल्हण ने की है। उसने राजा सुरेन्द्र को 'शान्तमन्यु' अर्थात् शान्त क्रोध और इन्द्र को 'शतमन्यु' अर्थात् 'सैकड़ों से क्रुद्ध' कहा है। इन्द्र को पर्वत नाशक अर्थात् गोत्रभिद् और सुरेन्द्र राजा को गोत्र रक्षक अर्थात् पर्वत का रक्षक कहा है। कश्मीर मण्डल पर्वतीय क्षेत्र है। पर्वत द्वारा आवृत है। अतएव कल्हण ने सुरेन्द्र को पर्वतीय कश्मीर का रक्षक कहा है। उत्तर वैदिक साहित्य में वर्णन है। पर्वतों को पंख होते थे। वे उड़ते थे। एक स्थान से दूसरे स्थान पर उड़कर बैठ जाते थे। जनता तथा भूमि नष्ट हो जाती थी। इन्द्र ने पर्वतों का पंख काट दिया। उस समय से पर्वतों का उड़ना बन्द हो गया। पूर्व वैदिक साहित्य के अनुसार इन्द्र को गोत्रभिद् कहा गया है। वैदिक कथानक के अनुसार गोत्रपर्वत का भेद किया था जिससे जल मुक्त होकर निकला। इन्द्र का निवासस्थान स्वर्ग है। राजधानी अमरा- वती है। नन्दन उद्यान है। ऐरावत श्वेत हाथी है। अश्व उच्चैः श्रवा है। सारथि मातलि है, धनुष शक्र- धनुष है। तलवार का नाम पेरेज है। क्षत्रिय राजाओं की उपमा प्रायः इन्द्र से दी जाती है। भारतीय राजतन्त्र का सिद्धान्त इन्द्र की कल्पना पर आधारित है। इन्द्र स्वर्ग का राजा है। पृथ्वी का राजा क्षत्रिय है, मनुष्य है। अतएव इन्द्र की तुलना पृथ्वो के श्रेष्ठ राजाओं से की जाती है।
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
१२८ राजतरंगिणी दरद्देशान्तिके कृत्वा सोरकाख्यं स पत्तनम् । श्रीमान्बिहारं विदधे नरेन्द्रभवनाभिधम् ॥ ९३ ॥ ९३. उसने दरद देश १ के समीप सोरक २ नामक पत्तन बसाया और उस श्रीमान् ने ३ नरेन्द्र भवन विहार का निर्माण कराया । तेन स्वमण्डलेऽखण्डयशसा पुण्यकर्मणा । विहारः सुकृतोदारो निर्मितः सौरसाभिधः ॥ ९४ ॥ ९४. उस अखण्ड यशशाली पुण्यकर्मा राजा ने अपने मण्डल में सौरस १ विहार की स्थापना की जो सुकृत तथा उदारता के लिये प्रसिद्ध था । यहाँ कल्हण ने सुरेन्द्र शब्द का अच्छा निर्वाह किया है । पाठभेद : श्लोक संख्या ९३ में 'सोरकाख्यं' का पाठभेद 'सरोकाख्यं' तथा 'सौरसारव्यं' मिलता है । पादटिप्पणियाँ . ९३ (१) दरद देश : इसका वर्णन प्राचीन ग्रन्थों में आता है । यह अंचल कश्मीर का आज भी एक भाग है। कश्मीर प्रदेश के उत्तर में है। इसको दर्दस्तान कहते हैं। जातकों में इसकी स्थिति हिमवा अर्थात् हिमालय में बतायी गयी है। हिमालय की शाखा हिन्दुकुश में है । मार्कण्डेय पुराण में दर्दुर पर्वत का उल्लेख है। इस अंचल के पर्वत को दर्दुर कहा जाना ठीक है। यूनानियों ने दरदाई नामक जाति का उल्लेख किया है। जातकों में उपचर के पाँचवें पुत्र के दद्दरपुर नगर बसाने का उल्लेख मिलता है। ( चेतिय जातक : जातक भाग १:६७ ३:१५-१६ । विशेष परिशिष्ट दरद जाति में देखिये ) । (२) सोरक : दरद अर्थात् दर्दस्तान के साथ कल्हण के स्वमण्डल शब्द के प्रयोग से प्रतीत होता है कि यह स्थान कश्मीर के बाहर था। इस स्थान का पता अभी तक नहीं लग सका है। एक मत है कि दर्दस्तान की सीमा पर वह स्थान है । (३) नरेन्द्र भवन : कल्हण ने भवन शब्द का प्रयोग विहारों के लिए किया है। नरेन्द्र-भवन-सुह्य स्पंद भवन, अमृत भवन, मोराक भवन आदि विहारों का वर्णन मिलता है। भवन शब्द का साधारण अर्थ निवास स्थान होता है । सोरक तथा नरेन्द्र भवन विहार स्थानों के विषय से निश्चय पूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ये कहाँ थे । पाठभेद : श्लोक संख्या ९४ में 'सुकृतोदारः' का पाठभेद 'स्वकृतोदारे' और सुकृतोदारे' तथा 'सौरसाभिधः' का पाठभेद 'सौरसाभिध'' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ९४ (१) सौरस : पंडित पी० गोविन्द कौल ने सौरस विहार का स्थान वर्तमान ग्राम सुरस बताया है । यह नागाम परगना के संगरफेद ( छतस्कनी ) पर स्थित है । यह स्पष्ट है कि नाम सौरस स्थान का सुरस शब्द की व्युत्पत्ति के आधार पर रखा गया है । (२) विहार स्थापना : विहार शब्द का राजतरंगिणी एवं कश्मीर के इतिहास में यहाँ प्रथम बार उल्लेख मिलता है । मालूम होता है कि राजा सुरेन्द्र के समय बौद्ध धर्मावलम्बी कश्मीर में आए और राजा ने उस धर्म की ओर आकर्षित होकर विहारों की स्थापना की थी। विहार की स्थापना भिक्षुओं के लिए की जाती है । अतएव यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बौद्ध धर्म के प्रचारक कश्मीर मंडल में पहुँच चुके थे । उनका प्रभाव कश्मीर में बढ रहा था ।
प्रथम तरंग. १२९ तस्मिन्निस्सन्ततौ राज्ञि प्रशान्तेऽन्यकुलोद्भवः । बभार गोधरो नाम सम्भूधरवरां धराम् ॥९५॥ गोधर ९५. राजा सुरेन्द्र जब सन्तान हीन स्वर्ग गमन किया तो अन्य कुलोद्भव गोधर१ राजा हुआ । उसने सुरम्य पर्वतों सहित पृथ्वी का भार उठाया । गोधराहस्तिशालारव्यमग्रहारमुदारधीः । म प्रदाय द्विजन्मभ्यः पुण्यकर्मा दिवं ययौ ॥९६॥ ९६. उस उदारधी राजा ने गोधर१ हस्तिशाला२ अग्रहार द्विजन्मों को प्रदान किया और पुण्य कर्म करते हुए स्वर्ग गमन किया । . विहार शब्द रहने तथा कोठरी जिसमें भिक्षु- निवास करते हैं दोनों के लिये आता है । संघाराम के अन्दर अनेक कोठरियां होती है। उनमें एक कोठरी का नाम विहार पड़ता है। मूलगन्धकुटी विहार भगवान् बुद्ध के रहने की कोठरी थी । बौद्ध मठों के लिये कालान्तर में विहार शब्द की संज्ञा दी जाने लगी । विहारों की अधिकता के कारण बिहार प्रदेश का नाम पड़ा है। विहार शरीफ एक स्थान पटना से लगभग ३० मिल दक्षिण पूर्व पंचानन नदी पर स्थित है। पाठभेद : श्लोक संख्या ९५ में 'वरां धरां' का पाठभेद 'वसुन्धराम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ९५ (१) आइने अकबरी में गोधर नाम दिया गया है । हसन इस राजा का राज्य-काल ३२ वर्ष देता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ९६ में 'गोधराह' का पाठभेद 'गोधरोह' तथा 'गोधर अस्ति हिल्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ९६ (१) गोधरं दिवसर परगना के वर्तमान ग्राम गोधर, अस्तेल प्राचीन गोधर तथा हस्तिशाला अग्रहार हैं । गोधर विशोका नदी के तट पर ग्राम है । यह विशोका में मिलने वाली स्थानीय नदी १७ गोदावरी के संगम पर है। गोदावरी माहात्म्य में गोदर नाम से गुदर ग्राम का उल्लेख पाया है। उसे गोदावरी उद्भव गया से सम्बन्धित करता है। अस्मिन् गिरौ महादेवी गौतमेन महात्मना । गौर्वा विदारिता प्रोक्तो गौद्रो गिरिसत्तमः ॥ यह गोदावरी नदी दक्षिणापथ की सबसे लम्बी बड़ी और प्रसिद्ध नदी नहीं है। कश्मीर की साधारण एक स्रोतस्विनी है । नीलमत पुराण में उल्लेख हैं। नदी चित्ररथा पुण्या भृगनन्दा भृगा तथा । गोदावरी वैतरणी तथा मन्दाकिनी शुभा ॥ १२५४ : १४६६, १४६७ गोदावरी माहात्म्य में उल्लेख आता है । यस्मिन्गिरौ महादेवि गौतमेन महात्मना । कृत्या गौर्दारिता प्रोक्तो गोदरः सः गिरिर्महान् ॥ यस्मिन् ग्रामे गोद्राख्यः पर्वतः संप्रतिष्ठितः । स ग्रामो प्रथितः क्वापि गोदराख्यो महेश्वरि ॥ गौर्वा विदारिता यत्रोत्थिता गंगा जलोच्छिता । सैव गोदावरी नाम गंगा परमपावनी ॥ (रघुनाथ मंदिरजम्मूः सं० ३६६४।३६ बी०) थ्तीन यहाँ आये थे । उन्हें यहाँ के मियां, जागीरदार तथा स्थानीय पुरोहितों से मालूम हुआ था कि एक जनश्रुति प्राचीन काल से सुनाई पड़ती चली आती है कि इस स्थान पर राजा गुदर ने एक नगर
१३० राजतरंगिणी तस्य सूनुः सुवर्णाख्यस्ततोऽभूत्स्वर्णदोऽर्थिनाम् । सुवर्ण सुवर्णमणिकुल्यायाः कराले यः प्रवर्तकः ॥६७॥ ९७. उसके पश्चात् य.चकों का सुवर्ण१ दाता उसका पुत्र सुवर्ण राजा हुआ। उसने कराल२ में सुवर्ण मणि कुल्या३ लाया।
बसाया था। यहाँ कोई ध्वंसावशेष नही मिलता। बड़ा नगर आबाद होने योग्य स्थान नहीं है। सम्भव है प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक उथल-पुथल में उनका प्राचीन रूप नष्ट हो गया तथा बचे-खुचे ध्वंसावशेषों का उपयोग वही ओर हो गया हो। (२) हस्तिशाला : गुदर से लगभग १ मील उत्तर-पूर्व विशांका नदी के बलुए द्वीप पर हस्तिशाला स्थित है। इसे अस्ति हेल कहते हैं। मालूम होता है कि हेलराज द्वारा उल्लिखित राजा गोधर के कारण कल्हण तथा पद्ममिहिर का ध्यान इस ग्राम की ओर गया होगा। यहाँ गोधर राजा सम्बन्धी कुछ गाथा प्रचलित है। गोधर का अर्थ होता है। गाय का स्थान गोशाला। ६७(१) सुवर्ण : आइने अकबरो सुरेन नाम देती है। हसन लिखता है कि सन् ११६६ क० में राजा सुवर्ण गद्दी पर बैठा। उसने आडोन का परगना आबाद किया। राज्य-काल ३५ वर्ष कहता है। (२) कराल : जोन राज (८६१-६२) तथा श्रीवर ने (३:१९४) अपनी राजतरंगिणियो में कराल का उल्लेख किया है। वहाँ बडशाह जैनुल आबदीन ने जैनपुरी परगना कराल विषय मे बसाया था। जैनपुरी (दत्त ४७,२४८) वर्तमान जैनपुर है। यह अद्विन अर्धवन परगना की अधित्यका में रामब्यार नदी के दक्षिणी क्षेत्र का बाधक है। यही क्षेत्र कराल है। हैदर मलिक ने भी राजा सुवर्ण के कार्य स्थान का सम्बन्ध इससे जोड़ा है। (३) सुवर्ण मणि कुल्या : कुल्या शब्द वैदिक है। ऋग्वेद में यह उस नहर के लिए व्यवहृत किया गया है जो किसी शोल किंवा हृद में गिरती अथवा मिलती है। (ऋग्वेद ३:४५:३; १०:४३:७;)
कश्मीर की अनेक कुल्याएं इन लेक तथा उत्तर लेक में मिलती हैं या उनसे निकाली गयी हैं। पुराणों में मुल्या का उल्लेख मिलता है : त्रिसामा ऋषिकुल्या च इक्षुला त्रिदिवा च या । लांगलिनी वंशधरा महेन्द्र-तनया स्मृता ॥ ऋषिकुल्या कुमारी च मन्दगा मन्दवाहिनी । क्रिया पलाशिनो चैव शुक्तिमत्प्रभवाः स्मृताः ॥ त्रिसादा ऋषिकुल्याद्या महेन्द्रप्रभवाः स्मृताः । ऋषिकुल्या कुमारांद्याः शुक्तिमत्पादसम्भवाः ॥ मार्कण्डेय पुराण में 'पितृ सामपि कुल्पा; 'वायु पुराण में 'त्रिसामा ऋषिकुल्या,' 'त्रिसामा ऋतु कुल्या,' ब्रह्माण्ड पुराण में 'त्रिमामा ऋषिकुल्या,' विष्णु पुराण में 'त्रिसामा ऽचार्यकुल्यायाः,' 'ऋषि कुल्या कुमार्याद्या', ब्रह्माण्ड पुराण में 'त्रिसाग्य- ष्टाष्टि कुल्याया,' 'त्रिमाया ऋषिकुल्याया' तथा 'ऋषिकुल्या कुमाराया' का उल्लेख आया है। कूर्म पुराण में 'ऋषिकुल्या त्रिसामा', मत्स्य पुराण में 'त्रिभागा ऋषिकुल्या' का उल्लेख मिलता है। ऋषिकुल्या नामक एक धारा बरहमपुर के दक्षिण पूर्वी रेलवे स्टेशन पर स्थित गंजाम जिला उत्कल प्रदेश के समीप बंगाल की खाडी में गिरती है। एक दूसरी ऋषिकुल्या और धारा है। उसे छोटा नागपुर में कोइल कहते हैं। कुल्या का अपभ्रंश कोइल हो गया। तीसरो ऋषिकुल्या गंगा की एक सहायक नदी कियुल है। कियूल शब्द भी कुल्या शब्द का अपभ्रंश है। कुल्या शब्द वैदिक काल से अब तक जलधारा के लिए मुख्यत. वे धाराएं जो जल सिंचन निमित्त निकाली गयी है, प्रयुक्त होता रहा है। नाला शब्द
प्रथम तरंग १३१ तत्सूनुर्जनको नाम प्रजानां जनकोपमः । विहारमग्रहारं च जालोराख्यं च निर्ममे ॥९८॥ जनक । ९८. प्रजागण के लिये जनक तुल्य उसका पुत्र जनक¹ राजा हुआ । उसने जालोर² विहार तथा अग्रहार निर्मित किया । शचीनरस्तस्य सूनुः क्षितिं क्षितिशचोपतिः । ततः श्रीमान्क्षमाशीलो ररक्षाऽक्षतशासनः ॥६६॥ शचीनर ९९. उसके पश्चात् उसका पुत्र शचीनर¹ जो पृथ्वी पर शचीपति तुल्य था, पृथ्वी की रक्षा किया । उस श्रीमान् क्षमा शील के शासन का कोई स्वेच्छया उल्लंघन नहीं करता था । कुल्या के तत्सम रूप से प्रयुक्त होता है । कुल नाला के लिए व्यवहार किया गया है। सम्भव है किसी रूप में कुल्या का अपभ्रंश नाला शब्द हो गया है । नलिका शब्द छोटी धारा के लिए प्रयुक्त किया गया है । नलिका का अपभ्रंश नाली है । ऋषिकुल्यामासाद्य देवकुल्यां तथैव च । अश्वतीर्थं प्रभासं च वारुणं तीर्थमेव च ॥ 1316 : १५३० सुवर्ण मणि कुल्या को स्वर्णमय नादो कहते हैं । यह वर्तमान सुनमन् कुल है। जैनपुरी अधित्यका के पूर्वीय अंचल में निल्लू, परगम, कुजुरू, आदि गाँवों में बीम मिल बहती आदयिन गांव से थोड़ी दूर पर विशोका अर्थात् विसावू नदी में पुनः मिल जाती है। यह विशोका नदी से ही लागू ग्राम के समीप निकाली गयी है । ९८ (१) जनक : आइने अकबरी ने जन्नेक नाम दिया है। वैदुद्दीन इतिहासकार कहता है कि जनक ने अपने पुत्र को ईरान पर आक्रमण करने के लिए भेजा । उस समय ईरान का राजा होमार्द्र था । वहमन के पुत्र दरब द्वारा आक्रमणकारी राजपुत्र मार डाला गया । (२) जालोर : हसन ने जालोर तथा जालोर बाग का दान देना लिखा है। विहार का अर्थ उसने गांव लगाया है। यह गलत है। हसन को इतना भी ऐतिहासिक ज्ञान नहीं है कि विहार बौद्धों के देवस्थान को कहते हैं । यदि रत्नाकर पुराण से अथवा अन्य किसी ग्रन्थ से यह लिया गया है तो विहार का अर्थ सर्वदा बौद्ध स्थान के रूप में किया गया है। इस राजा का राज्य-काल वह ३२ वर्ष देता है । पं० गोविन्द कौल जालोर को वर्तमान ग्राम जोलुर बताते हैं। यह जैनगिर परगना में है। हैदर मल्लिक 'जालुर:' को 'विहू' अर्थात् 'वोहों' परगना में होना बताते हैं। इस पर कुछ और अन्वेषण की आवश्यकता है । ९९ (१) शचीनर : आइने अकबरी में नाम सजोनीर दिया गया है। हसन ने राजा शचीनर का राज्य-काल ४० वर्ष दिया है। यह केवल अनुमान है। वैदिक साहित्य में शची शब्द का प्रयोग शक्ति, सामर्थ्य के अर्थ में किया गया है । इंद्र का नाम शचीपति है। यहाँ शचीपति का शाब्दिक अर्थ होगा इन्द्र । (ऋग्वेद १:१७:४. १:६२:१२; १:१०३:२; १:१०९:७, ३:६० ६ शाखायन गृह्यसूत्र १:१२, वाजसनेयि संहिता १९:८१ तथा ऐतरेय ब्राह्मण ७:३३ ) । कल्हण ( तरंग ८:३४११ ) ने शचीनर की माता का नाम शची दिया है ।
१३२ राजतरंगिणी राजाग्रहारयोः कर्त्ता शमाङ्गाशानारयोः । सोऽभूदपुत्रः सुत्रामविष्टरार्धसमाश्रयी ॥१००॥ १००. यह राजा राजकीय अग्रहार शमांगासा तथा शनार की स्थापना किया। राजा निःसन्तान था उसने इन्द्र का आधा सिंहासन प्राप्त किया । प्रपौत्रः शकुनेस्तस्य भूपतेः प्रपितृव्यजः । अथावहदशोकाख्यः सत्यसन्धो वसुंधराम् ॥१०१॥ अशोक १०१. तत्पश्चात् सत्यसंध १ अशोक २ जो भूपति के प्रपितृव्य तथा शकुनी ३ का प्रपौत्र था, वसुंधरा पर राज्य किया । १०० (१) समांगासा : यह वर्तमान सामत ग्राम है। यह एक बड़ा ग्राम है। कोठार अथवा कुठहार परगना के अरपथ नदी के वाम तट पर स्थित है । हैदर मलिक लिखता है 'शमाल काश' नामक गाव कुटहार परगना मे राजा ने बसाया था । समानासा का उल्लेख पुनः कल्हण ने रा० तं० ८:६५ में किया है । (२) शनार : वीही परगना में शार नाम ग्राम है। यह रन्भू के दक्षिण पूर्व एक भील पर होगा । हैदर मल्लिक के अनुसार राजा शचीनर ने वीही परगना में 'शरार' ग्राम आबाद किया था । शार लोहे के कारवार का केन्द्र था । सार का अर्थ लोहा होता है । यह पूर्व काल में लोहा बनाने का केन्द्र था । स्टोन ने यहा की यात्रा सन् १८९१ में की थी । यहाँ के गाँव के मध्य की जियारत 'ख्वाजा खिज़्र' में प्राचीन ध्वस्तावशेष के विशाल पत्थर लगे हैं। यह जियारत सन् १५८० ई० की बनी है। एक नाग अर्थात् निर्भर के समीप कुछ अलंकृत स्तम्भ पड़े हैं। श्री वाइने ने अपने यात्रा-वर्णन (ट्रेवेल्स २:३५) में इसका उल्लेख किया है । हसन ने शनार को शारदा गांव माना है । १०१ (१) सत्यसंध का अर्थ होता है सत्य- प्रतिज्ञ, सत्यवादी, सत्य संकल्प, वचन पालक तथा ईमानदार । निःसन्देह अशोक सच्चरित्र था । सत्य- प्रिय था । सत्य प्रतिज्ञ था । मालूम होता है । कल्हण के समय अशोक नाम से सम्बन्धित प्रसिद्ध विशेषण 'देवानाम् प्रिय' 'प्रियदर्शी' जनता विस्मृत कर गयी थी । सम्भव है अशोक कालीन लिपि, भाषा तथा पालि भाषा विज्ञ उस समय कोई नहीं रह गया था । अशोक सम्बन्धी ऐतिहासिक स्वल्प किंवा प्रचुर सामग्री कल्हण को नही प्राप्त थी । अतएव उसने विस्तार के साथ अशोक जैसे महान् राजा के विषय में नहीं लिखा है । अशोक का जन्म ईसा पूर्व २९७ में हुआ था । वह सिंहासन पर ईसा पूर्व २७२ में बैठा । उसकी मृत्यु ईसा पूर्व २३२ मे हुई थी । इस प्रकार कल्हण और अशोक के काल में १३८० वर्षों का अन्तर पड़ता है । कल्हण के समय देवानाम् प्रिय एवं प्रियदर्शी विशेषण लोग भूल गये थे । कल्हण ने अशोक जैसे सम्राट् का राज्य काल एवं समस्त वर्णन केवल ७ श्लोकों ( १ : १०१-१०७ ) में समाप्त कर दिया है । स्पष्ट है कि उस समय कश्मीर में अशोक सम्बन्धी ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध नहीं थी । उसके निर्मित चैत्य, विहार जिन पर पालि भाषा तथा ब्राह्मी लिपि आदि में शिलालेख अंकित रहे उनका पढ़ना तथा अर्थ लगाना लोग भूल गये थे । अन्यथा अशोक द्वारा निर्मित विहारो, चैत्यों
प्रथम तरंग १३३ एवं स्तूपों के स्थान, कालादि के वर्णन द्वारा कल्हण अशोक का पूर्णतया वर्णन करता । उनके कारण इतिहास पर नवीन प्रकाश पड़ता । यदि कश्मीर में अशोक सम्बन्धी ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त होती तो कल्हण जैसी पैनी दृष्टि वाला इतिहास लेखक, इस प्रकार की दुर्लभ सामग्रियों की उपेक्षा नहीं कर सकता था । तथापि सत्यसंध शब्द देवानाम् प्रिय तथा प्रियदर्शी से कम महत्त्व नहीं रखता । सम्भव है इस विशेषण का उल्लेख किसी भूगर्भ स्थित शिला- लेखादि में कभी प्राप्त हो जाय । यह भी सम्भावना हो सकती है । कश्मीर के किसी शिलालेख किंवा ग्रन्थ में अशोक के नाम के साथ सत्यसंध विशेषण लगा कल्हण को मिल गया हो, जो अब लुप्त हो गया है । मुझे इसकी सम्भावना अधिक मालूम होती है । कल्हण ने अपने पूर्व इतिहासकारों के अशोक सम्बन्धी उल्लेखों से लेखन सामग्री प्राप्त की थी । शिलालेखादि यदि मिला होता, उन्हें पढ़ लिया होता और अशोक जैसे महान् सम्राट् पर उन आलेखों के आधार पर बहुत कुछ लिखता । कल्हण ने स्वयं लिखा है । उसने तत्कालीन प्राप्त शिलालेखों आदि का अध्ययन किया था । उनके आधार पर इतिहास लिखा था । अतएव अशोक द्वारा निर्मित स्तम्भों, स्तूपों तथा चैत्यों के अभिलेखों पर अशोक का प्रसिद्ध विशेषण, देवा- नाम् प्रिय मिलना सम्भव था । क्योंकि अशोक के समस्त साम्राज्य में लिखने की यह शैली प्रचलित थी । कल्हण ने स्तूपों, चैत्यों तथा स्तम्भों के आलेखों का अपनी इतिहास सामग्री में उल्लेख नहीं किया है । उन्हें अपना स्रोत नहीं माना है। उनकी गणना अपने इतिहास सामग्री में नहीं की है । कल्हण से सात शताब्दी पूर्व हुएनसांग ने भारत की यात्रा की थी । उसके समय में बुद्ध धर्म ह्रास की ओर कश्मीर में था । यही प्रतिक्रिया समस्त भारत- वर्ष में हो रही थी । कश्मीर उसका अपवाद नहीं था । हुएन सांग स्वयं लिखता है। कश्मीर में किसी एक धर्म विशेष की ओर जनता की आस्था नहीं थी । कश्मीर में सनातन धर्म एवं शैव सिद्धान्त की प्रबलता उत्तरोत्तर होती गयी । लोग भारतवर्ष के समान कश्मीर में बुद्ध धर्म को बारहवीं शताब्दी में प्रायः भूल चुके थे । कश्मीर में कुछ उत्सव बुद्ध धर्म सम्बन्धी पूर्व काल से होते चले आये थे । वे किसी रूप में कुछ होते रहे । वे पूर्व काल की केवल धुँधली स्मृति मात्र थे । कश्मीर के राजा नव निर्माण निमित्त पुरानी सामग्रियों का भी उपयोग करते थे । मन्दिरों, चैत्यों, स्तूपों, मठों, शाला तथा विहारों के ध्वंसावशेषों, शिलाखण्डों, पत्थरों, ईंटों का प्रयोग मुक्तहस्त करते थे । भारत में भी सारनाथ के धर्मराजिक स्तूप के पूरे स्तूप के ईंटों तथा शिलाखण्डों का उपयोग तत्कालीन काशी के राजा तथा उनके कुटुम्बियों ने किया था। उस विशाल स्तूप की केवल नींव मात्र रह गयी है । भगवान् ने सारनाथ में प्रथम उपदेश किंवा धर्मचक्र प्रवर्त्तन जहाँ किया था वहाँ बहुत बड़ा स्तूप था । वर्तमान धमेक स्तूप जैसा बना था । वह धर्मराजिक स्तूप था । अज्ञान के कारण लोगों ने उसे ईंटों का खदान या पहाड़ समझ लिया था। उस स्तूप में से भगवान् की धातु मिली थी । भ्रम के कारण उसे अस्थि समझ कर गंगा में प्रवाह कर दिया गया था । भारत ही केवल इसका अपवाद नहीं है । इसराइल की यात्रा में मैंने देखा कि क्रूसेड के समय निर्मित गिरजाघरों, उपासना स्थानों तथा प्रासादों में लगे स्तम्भों तथा पत्थरों का उपयोग 'केसरिया' (हैफा के समीप ) के बन्दरगाह तथा घाटों के बनाने में किया गया था । भारत में इसी प्रकार
१३४ राजतरंगिणी
मन्दिरों को खण्डित कर उनके पत्थरों से मसजिद तथा जिमारत बनाना साधारण बात हो गयी थी । काशी विश्वनाथ का मन्दिर, मथुरा तथा अयोध्या का जन्म स्थान, महरौली दिल्ली में विष्णु पर्वत पर, विष्णु मन्दिर के स्थान पर, कुतुबमीनार तथा मसजिद, कूबते इसलाम आदि का बन जाना अनेक उदाहरण हैं । कश्मीर में राजाश्रय न मिलने के कारण बुद्ध धर्म तथा उससे सम्बन्धित इमारतों की उपेक्षा हो गयी । बुद्ध धर्म के प्रति रुचि न होने के कारण तत्स- म्बन्धी धार्मिक स्थान क्षीणता को प्राप्त होते होते सुप्त हो गये । कल्हण अशोक के १६ शताब्दी पश्चात् हुआ था । इतने लम्बे काल तक बिना जीर्णोद्धार किंवा मरम्मत के किसी भी रचना का कायम रहना कठिन था । कश्मीर का प्रत्येक राजा किंवा रानी अपने काल में अपने नाम से किसी न किसी नवीन इमारत की रचना अपना नाम कायम रखने के लिए करता था । मेरी समझ में यही कारण है । बौद्ध भुवन रचना सामग्रियां जो प्रायः उस समय जीर्णा- वस्था में थीं, बिसरी थीं और जिनका जन जीवन में विशेष महत्त्व नही रह गया था । कल्हण ने उनका प्रयोग नहीं किया। इसलिये 'देवानाम् प्रिय' 'प्रियदर्शी' शब्दों का अभाव कल्हण के साहित्य में मिलता है ।
जीर्णोद्धार कराया । कालान्तर में उसने जैन शासन चलाया । राजा जैनेह का अशोक भतीजा था । उसके काल में ब्राह्मण संस्कार के स्थान पर जैन शासन कश्मीर में चलाया गया । राजा जैनेह कौन था इसपर अबुल फजल आइने अकबरी में कोई प्रकाश नहीं डालता । हसन लिखता है—'राजा शचोनर वल्द शकुनी के पोतों में से अशोक था। कलयुग संवत् १६५५ में अपनी ख्वाहिश से तख्त कश्मीर को जीनत देकर परगना खादर भारत मे एक शहर आलीशान और दिलपसन्द महलात वाला बनाया । पिछले मुअरखीन इन मकानों की तायदाद ६ लाख लिखते हैं । शहर के आस-पास एक निहायत ऊँचो और पायदार फसील बनवायी । पनगलवा और पतेख के गाँव आबाद करके बरहमनों को बख्शिश दिये और मजहब जैन यानी बुद्ध मजहब जिसका जिक्र पहले हिस्सा में आ चुका है, अपने लिए पसन्द किया । उसकी इशाअत और तबलीग में दिल व जान से कोशिश की और सारे मुल्क मे उमके अहकाम जारी कर दिये। कसबा बिजबारह मे पिछले तमाम मन्दिर तबाह व बरबाद करके उनकी जगह अपने मजहब के इबादतखाने निहायत आलीशान और पुख्तगी से बनवाये । बैजवारह के मुत्तसिल ही एक और मन्दिर बनवाया जिसका नाम अपने नाम पर अशोकेश्वर रखा । मोजा हैवलतरो और मोजा बतर द्रेल में के बहुत से मन्दिर बनवाये । बिल आखीर अछूतों की मुखालिफत और उनकी नाफरमानी से पेशनजर तारिकुल दुनिया होकर पहाट बदेश्वर की तलहटी में नारायण नाग के चश्मा पर बूनेश्वर का मन्दिर जिसके निशानात ताहान मौजूद हैं बनवाया । यहां आतों बकिया उम्र इबादत बग्ग हकूमत करके इस दारेफानी से रुख्सत हुआ ।'
हसन का यह कहना है कि ५१ वर्ष अशोक ने राज्य किया सर्वथा मिथ्या है । अशोक का यह क०
प्रथम तरंग. १३५ यः शान्तवृजिनो राजा प्रपन्नो जिनशासनम् । शुष्कलेत्रवितस्तात्रौ तस्तार स्तूपमण्डलैः ॥१०२॥ १०२. यह नृप जिसके पाप शान्त हो गये थे, जिन¹ शासन स्वीकार किया। शुष्कलेत्र² तथा वितस्तात्र³ स्थानों को स्तूप मण्डलों से आच्छादित कर दिया। १६५५ संवत् में राज्यारोहण तथा उसके पश्चात् इतिहास का यह वह काल है जब रोम और जलोक का राज्यारोहण क० १७२६ संवत् में बताता कार्थेज यूनिक युद्ध में रत थे। बुद्ध धर्म का कश्मीर हैं। इस प्रकार अशोक का राज्य काल ७१ वर्ष में प्रवेश करने के कारण बौद्धधर्मानुयायियो को कष्ट होता है न कि एक्कावन वर्ष। वह अशोक तथा सहने का आदत पड़ गयी थी। सहिष्णुता की भावना जलोक के बीच किसी और राजा को नहीं रखता। बढ़ गयी थी। भूकम्प विसूचिका तथा महामारी अशोक के पश्चात् जलोक का होना स्वीकार आदि का स्थिरतापूर्वक सामना करना चाहिये यह करता है। भावना बढ़ने लगी थी। उन्हें केवल दैवो प्रकोप ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध हो चुका है कि मानकर चुप बैठने की पुरानी आदत बुद्ध धर्म के राज्य उत्तराधिकार का संघर्ष २७० वर्ष ईशा पूर्व व्यावहारिक रूप और ज्ञान के कारण बदल रही थी। आरम्भ हुआ था। अशोक २७४ वर्ष ई० पू० राज नास्तिक बुद्ध धर्म के वैज्ञानिक तर्क ने पुराने विचारों सिंहासन पर बैठा था। उसकी मृत्यु ई० पू० २३२ में एक क्रान्ति उपस्थित कर दी थी। कर्म, वर्ष में हुई। (परिशिष्ट ए० 'अशोक' ले० राधाकुमुद आचरण, और शील की ओर लोगो को उन्मुख किया मुकर्जी, १९६२ संस्करण)। था। अन्ध विश्वास, निष्क्रियता, केवल सैद्धान्तिक इस प्रकार उसका राज्यकाल केवल ३८ वर्ष आकाशीय उड़ान के स्थान पर भूमि पर चलने की ठहरता है। अतएव हसन का राज्यारोहण, राज्य- ओर लोगो को प्रवृत्त किया था। काल आदि सब भ्रामक, परस्पर विरोधी तथा अशोक के कारण कश्मीरियो के चरित्र निर्माण अप्रमाणित उसकी अन्य बातों की तरह होता है। में बौद्ध धर्म का अत्यधिक प्रभाव पड़ा है। यही अशोक ने कितने दिनों तक शासन किया, इस पर कारण है कि कश्मीर की मसजिदें बौद्ध पगोड़ा तुल्य कोई प्रकाश कल्हण नहीं डालता। उसका सम्बन्ध दिखायी पड़तो है। यद्यपि नूरजहाँ ने सर्व प्रथम मौर्य वंश से भी नही जोड़ता है। अपने मसजिद के निर्माण द्वारा सेमेटिक स्थापत्य एवं रत्नाकर पुराण की बात केवल कपोलकल्पना वास्तु कला का प्रवेश कश्मीर में कराया था। है। इसका लाभ उठाकर हसन ने अनुमान से समय निश्चित किया है। बुद्ध धर्म कल्हण के समय तक कश्मीर में किसी अशोक के जीवन की प्रमुख घटनाओ पर तिथि- न किसी रूप में अत्यन्त लघु पैमाने पर प्रचलित वार प्रकाश डाल देने से इतिहास समझने मे सुविधा था। कल्हण स्वयं शैव था। 'अशोक' परिशिष्ट में होगी। कश्मीर के इतिहास पर प्रकाश पड़ेगा। विस्तार के साथ विवेचन किया गया है। अन्यथा इसका उल्लेख परिशिष्ट 'अशोक' में किया टिप्पणी स्वतः बहुत बड़ी हो जातो। गया है। जोनराज, श्रीवर, प्रज्ञाभट्ट एवं शुक की राज- अशोक कश्मीर का राजा था। इसपर विस्तृत तरंगिणियों में अशोकेश्वर तथा अशोक का विवेचन मैने परिशिष्ट 'अशोक' में किया है। अशोक उल्लेख मै प्राप्त नही कर सका। उनका किसी का एक राज्यपाल तक्षशिला में रहता था। सन्दर्भ मे भी वर्णन नही मिलता।
१३६ राजतरंगिणी [बायाँ स्तम्भ / Left Column] पाठभेद : श्लोक संख्या १०२ के 'वितस्तात्र' का पाठभेद 'वितस्ताद्रौ' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १०२ (१) जिन-शासन : कल्हण यहाँ स्पष्ट उल्लेख करता है कि राजा ने जिन-शासन स्वीकार कर लिया था। यह मगध सम्राट् 'देवानाम् प्रिय', 'प्रियदर्शी' अशोक था इसमें सन्देह नहीं रह जाता । अशोक जन्मजात बुद्धधर्मावलम्बी नहीं था । कलिंग युद्ध के पश्चात् इतिहास की प्रचलित धारणाओं के अनुसार बुद्ध धर्म स्वीकार किया था। उसका व्यापक प्रचार किया था। शंकराचार्य ने 'बौद्ध-शासन' शब्द का प्रयोग किया है। 'धर्म' के स्थान पर 'शासन' शब्द का प्रयोग वस्तुस्थिति में अन्तर नहीं उत्पन्न करता। कल्हण के 'जिन-शासन' शब्द का कुछ लेखकों ने अर्थ 'जैन धर्म' लगाया है। यह गलत है। उस समय हिन्दू अथवा सनातन धर्म शब्द प्रचलित नहीं थे। एक ही धर्म था। वह था भारतीय धर्म। उसमें अनेक सम्प्रदाय एवं पन्थ थे। उसी प्रकार 'बुद्ध शासन' भी कश्मीर में तथा भारत में एक पन्थ, सम्प्रदाय किंवा शासन था। धर्म शब्द आधुनिक काल की देन है। जैसे सिख पन्थ है। राजनीतिक कारणों से सिख धर्म को धर्म की संज्ञा देकर उसे भारतीय हिन्दू धर्म से अलग करने का प्रयास किया गया है। काशी में श्री गुरु तेगबहादुर देव जी की संगत है। श्री गुरु नानक देव जी का बाग है। मुझे अच्छी तरह याद है। हम छोटेपन में एक बैनर लेकर चलते थे। उस पर लिखा रहता था 'हिन्दू धर्म रक्षक श्री गुरु गोविन्द सिंह जी जयन्ती।' मैं कितने ही वर्षों तक इस उत्सव में सम्मिलित होता रहा। परन्तु पचास वर्षों में सब कुछ बदल गया है। अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है। कल्हण के वर्णन की सत्यता प्रमाणित करता है। इस श्लोक में स्तूपों के [दायाँ स्तम्भ / Right Column] स्थापित करने का उल्लेख मिलता है। अशोक ने समस्त भारत में स्तूपों तथा स्तम्भों की शृंखला स्थापित की थी। भगवान् के धातुओं पर चारों ओर धर्मराजिक स्तूपों का निर्माण कराया था। कल्हण अशोक द्वारा स्तूप मण्डलों की स्थापना का उल्लेख करता है। यह अशोक के राज्यकाल एवं जीवन की विशेषता थी। कल्हण इस अकाट्य सत्य का समर्थन करता है। इस तरंग के श्लोक संख्या १०३ से बातें और साफ हो जाती हैं। अशोक ने चैत्य तथा विहार शब्द की स्थापना करायी थी। चैत्य एवं विहार शब्द शुद्ध बौद्ध धर्म सम्बन्धी शब्द हैं। उनके द्वारा पूजनीय स्थान चैत्य तथा प्रव्रजितों के निवासस्थान विहारों का बोध होता है। उनका निर्माण कराना बौद्ध धर्म के प्रति श्रद्धालु भक्त का कर्तव्य माना जाता है। धार्मिक पुण्य कर्म उसी प्रकार हैं जिस प्रकार हिन्दू मन्दिर, धर्मशाला, मठ और मुसलमान मस्जिद, जियारत, तथा सराय का निर्माण कराता है। कल्हण अशोक के जीवन से इस पहलू पर प्रकाश डालता है। जिसकी साक्षी भारतीय इतिहास स्पष्ट और बलवती भाषा में करता है। (२) शुष्क लेत्र : श्री स्टीन ने सन् १८९१ में पं० काशीराम को इस स्थान की जाँच के लिये भेजा था। यह स्थान हुष्केलेत्र कहा जाता था। यह वर्तमान ग्राम हुष्कलित्तर है। इसे हकलित्री भी कहते हैं। श्री स्टीन द्वारा प्रस्तुत मानचित्र में इसे हकलेट्री नाम से दिखाया गया है। दुस्त परगना में है। श्री काशीराम को इस स्थान पर प्राचीन भग्नावशेष तथा चिह्न नहीं मिले। मैं यहाँ आया था। आधुनिक विकास के कारण ग्राम का पुराना रूप बदलता जा रहा है। मुझे दो चार शिला खण्ड अवश्य मिले। उनके देखने से किसी समय यहाँ किसी इमारत के होने का अनुमान किया जा सकता है। वर्तमान समय में पत्थर लाना और उनसे निर्माण कराना प्रायः समाप्त हो गया है। कश्मीर
प्रथम तरंग १३७ धर्मारण्यविहारान्तर्वितस्तात्रपुरेऽभवद् । यत्कृतं चैत्यमुत्सेधावधिप्राप्त्यक्षमेक्षणम् ॥१०३॥ १०३. वितस्तात्र पुर में धर्मारण्य विहान्तर्गत राजा द्वारा निर्मित एक चैत्य' था। वह इतना ऊँचा था कि आँखें उसके शिखर तक नहीं पहुँच पाती थीं। में इतने मन्दिर, देवालय एवं विहार पत्थरों से बने थे कि लगभग सात या आठ शताब्दी से पत्थर कही से लाने की आवश्यकता ग्रामों तथा छोटे स्थानों में नहीं थी। पुराने पत्थरों से काम. चल जाता था। कश्मीर में शायद ही कोई ऐसी जियारत या दरगाह मिलेगा जिसमें प्राचीन ध्वंसावशेषों के शिला खण्ड न लगे हों अथवा वे मन्दिरों तथार विहार के स्थान पर न निर्मित किये गये हों। कल्हण ने इसका उल्लेख पुनः तरंग १:१७० में किया है। (३) वितस्तात्र : यह स्थान वनिहाल पर्वत मूल में वैरी नाग के वायव्य दिशा में लगभग एक मिल पर विद्ययत्रो ग्राम है। इस ग्राम का वर्तमान नाम वियवृतुर है, गाँव छोटा है। ग्राम के समीप एक सरोवर है। उसमें एक बड़ा जलस्रोत है। यह झरना वितस्ता नदी का मुख्य उद्गम कहा जाता है। वनिहाल नाम का मूल वितस्तात्र ग्राम ही था। उसी का अपभ्रंश तथा बिगड़ता. रूप वनिहाल एक मत के अनुसार हो गया है। स्थानीय हिन्दू इसे एक तीर्थ मानते है। वाइन ने अपने भ्रमण में इसका उल्लेख किया है। वितस्ता माहात्म्य (२ : ४०) में इसे 'वितस्ता वतिका' कहा गया है। राजा अनन्त के समय में कल्हण ने (७:३६४) वितस्तात्रपुर का उल्लेख किया है। महाराज सुस्सल के राज्य काल (सन् ११२१-११२८ ई०) में कल्हण ने 'वितस्ता' स्थान का उल्लेख (८: १०७३) किया है। कल्हण के निम्नलिखित उद्धरण इस स्थान के सम्बन्ध में द्रष्टव्य है। (१:१०२; १०३; १:१७० ७:३५४, ८:१०७३-७४) १८ नील नाग किंवा वैरी नाग की यात्रा के समय इस स्थान की यात्रा की जा सकती है। यह स्थान किसी बड़े नगर के लिये उपयुक्त स्थानाभाव के कारण नहीं है। इसका महत्त्व प्राचीन काल में पूर्वीय पंजाब से आवागमन मार्ग के कारण था। रावलपिण्डी तक रेलवे लाइन और वहाँ से राजपथ द्वारा उरी होते बारहमूला सडक से पहुँचा जाता था। यह सड़क सर्वदा खुली रहती है। हिमपात के कारण मार्गविरोध नही होता। भारतीय स्वाधीनता और कश्मीर पर पाकिस्तानी आक्रमण के कारण यह मार्ग बन्द हो गया है। रावलपिण्डी पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद नाम से हो गया है। अतएव बनिहाल मार्ग का महत्त्व बढ़ गया है। भारत और कश्मीर को सम्बन्धित करने वाला यही एक मात्र मार्ग शेष रह गया है। सन् १९६३ के पूर्व बनिहाल के पास का मार्ग शीतकाल में तुषारपात के कारण अवरुद्ध हो जाता था। अब वहाँ बहुत नीचे दूसरी सुरंग खोद कर मार्ग बनाया गया है। इससे यह मार्ग अब पूर्णतया खुला रहता है। कश्मीर आने वालो को प्रथम दर्शन बनिहाल से वितस्तात्र ग्राम तथा नील कुण्ड किंवा वैरी नाग का मिलता है। इस स्थान का महत्त्व अब बढ़ गया है। इस स्थान पर स्तूपों के ध्वन्सावशेष नहीं मिलते। कुछ स्थानों में प्राचीन इमारतों के आकार मात्र भूमि में मिलते हैं। वहाँ गढ़े और अनगढ़ पत्थर भी कुछ पड़े हैं। परन्तु स्थान का रूप आधु- निक प्रगति के साथ बदलता जा रहा है। कुछ वर्षों में यह सब भी लुप्त हो जायगा। पत्थरों का प्रयोग स्थानीय जनता मुक्तहस्त करती है।
१३८ राजतरंगिणी स षण्णवत्या गेहानां लक्षैर्लक्ष्मीसमुज्ज्वलैः । गरीयसीं पुरीं श्रीमांशक्रे श्रीनगरों नृपः ॥१०४॥ १०४. उस श्रीमान् ने श्रीनगरी१ की स्थापना की जिसका महत्त्व उसके लक्ष्मी द्वारा समुज्ज्वल छानवे लाख गेहों के कारण थी।
पाठभेद : श्लोक संख्या १०३ में 'यत्कृतं' का पाठभेद 'यात्कृतं' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : : १०३ (१) चैत्य : कश्मीर में चैत्यों की श्रृंखला थी। प्रत्येक ग्राम तथा महत्त्वपूर्ण स्थानों में चैत्य निर्मित थे। उनकी पूजा बौद्ध तथा हिन्दू दोनों करते थे। धर्मारण्य विहार तथा चैत्य दोनों का लोप हो गया है। कल्हण के वर्णन से प्रतीत होता है कि उसके समय विहार तथा चैत्य दोनों का अस्तित्व था। कश्मीर में हिन्दूराज के लोप तथा जनता के मुस्लिम धर्म ग्रहण करने के कारण विहारों तथा चैत्यों का कोई महत्त्व नहीं रह गया। वे गिरते-पड़ते खँडहर हो गये। उनके पत्थर लोग उठा ले जाने लगे। जब केवल आकार मात्र शेष रह जाता था तो उन पर इमारत बना दी जाती थी, इस प्रकार प्राचीन स्थानों का अस्तित्व लोप हो जाता था। यह बात केवल हिन्दू अथवा बौद्ध धर्मस्थानों के सम्बन्ध में ही नहीं लागू होती । बड़ी-बड़ी जियारतें तथा मजारें इसी तरह लोप की जाती है। मैं सन् १९४८ में दिल्ली आया था तो सफदरजंग से महरौली तक बिलकुल आबादी नहीं थी। चारों ओर कब्रिस्तान, मजार तथा जियारतें थीं आज वहाँ कुछ भी नहीं है। बदायूँ में बहुत बड़ा कब्रिस्तान है। वहाँ पर ऊँची पक्की कब्र के चारों ओर जमीन खोद देते हैं। दो-चार वर्षों के पश्चात् कब्र स्वतः गिर जाती है। पत्थर तथा ईंट बेच दिये जाते हैं। जमीन समथर हो जाती है। उन पर नवीन इमारत बन जाती है। पाठभेद : श्लोक संख्या १०४ में 'लक्षै' का पाठभेद 'लक्ष्यै' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ : १०४ (१) श्रीनगरो : अशोक ने दो नगरियों का निर्माण कराया था। कश्मीर में श्रीनगर तथा नेपाल में देवपत्तन। नेपाल में अशोक की कन्या चारुमति गयी थी उसका विवाह देवपाल से हुआ हुआ था। पति-पत्नी दोनों नेपाल में धर्म प्रचारार्थ आबाद हो गये थे। अशोक की नेपाल यात्रा के स्मरणार्थ नगर बसाया गया था। देवपत्तन नगर के नाम से अनुमान किया जा सकता है कि देवपाल ने अपने श्वशुर अशोक की यात्रा की स्मृति में नगर बसाया होगा। ऋग्वेद में श्री शब्द सम्पदा के अर्थ में व्यवहृत किया गया है ( ८:२:१९; अथर्ववेद ६:५४;१, ६:७३:१, ९:५:३१, १०:६:२६, ११:१:१२ २१, १२:१:६३, १२.५:७ ) श्री शोभा, सम्पन्न, वृद्धि, विभूति, कीर्ति, यश, प्रभा, सिद्धि, विष्णुपत्नी लक्ष्मी, सरस्वती तथा वाणी के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है। शतपथ ब्राह्मण में ( ११:४.३ ) श्री को देवी माना गया है। अतएव श्रीनगरो का अर्थ संपदा, वृद्धि, यश, कीर्ति तथा सरस्वती नगरी हुआ। श्रीराज्य वर्तमान मैसूर राज्य का पुराना नाम था। दक्षिण-पूर्व एशिया में श्रीविजय साम्राज्य स्थापित था। जनरल कनिंघम ने वर्तमान ग्राम पाण्डरेथन अर्थात् पुराणधिष्ठानपुर को अशोक निर्मित श्रीनगरो की संज्ञा दी है। वह वितस्ता के वाम तट पर है, वर्तमान श्रीनगर से २ मील ऊपर श्रीनगर अनन्त-नाग सड़क पर स्थित है। कनिंघम ने कल्हण के रा० त० १.१२४ तथा रा० त० २:९९ के आधार
प्रथम तरंग १३९ पर इसका निर्धारण किया है। क्योकि जलौक ने ज्येष्ठ रुद्र देवस्थान की स्थापना श्रीनगरो में की थी। इस देवस्थान को शंकराचार्य पर्वत पर स्थित मन्दिर से सम्बन्धित करते हैं। पर्वत मूल में दक्षिण-पूर्व २ मील दूर पर पाण्डेरेन्यन है। किन्तु प्रोफेसर बुहलर ने इस मत को ठीक नहीं माना है। वर्णनों से प्रतीत होता है कि जलौक का मन्दिर या तो पर्वत पर था अथवा उसके समीप कहीं आसपास होना चाहिए । पुराधिष्ठान शब्द का अर्थ पुरानी राजधानी है। सोदर जलस्रोत समीप होने ( रा० त० १:१२४ ) के कारण इसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। योग वासिष्ठ में राजा यशस्कर के सन्दर्भ में अधिष्ठान नगर का उल्लेख किया गया है। वास्तव में नगर का नाम अधिष्ठान था। नगर प्राचीन होने पर उसमे पुरा अर्थात् प्राचीन शब्द विशेषण की तरह जोड़ दिया गया था। यह नगर राजा यशस्कर के समय तक समृद्धशाली था। योग वासिष्ठ मे कहा गया है कि वृक्षों तथा पर्वतों से सुशोभित पुराधिष्ठान कश्मीर के मध्य में स्थित है। यह वर्णन आज की परिस्थितियों में भी मिलता है। बौद्ध ग्रन्थ महावंश में उल्लेख आता है। उत्कल जनपद के अधिष्ठान नगर के तपस्सु और मल्लिक व्यापारी थे। भगवान् को बुद्धत्व प्राप्त होने के पश्चात् उरुवेला में राजायतन वृक्ष के नीचे प्रथम बार भोजन उन लोगों ने दिया था। उक्त नगर कश्मीर में नही उड़ीसा में था । गुप्त काल में छोटे राज्यो की राजधानियो को अधिष्ठान कहा जाता था। उड़ीसा में अधिष्ठान नामक एक आबादी है। नवीन राजधानी प्रवरसेनपुर है। प्रवरसेन द्वितीय ने उसका निर्माण कराया था। वह वर्तमान श्रीनगर है। उसे प्रवरपुर कहा गया है। श्रीनगर का नपुंसक लिंग में कल्हण ने सब स्थानो पर वर्णन किया है। वह केवल इस स्थान पर उसका स्त्री रूप में प्रयोग किया है। हैदर मल्लिक तथा मुहम्मद अजीम आदि इतिहास लेखक अशोक-द्वारा निर्मित राजधानी को लिदर नदी के वाम तटपर 'शीर' स्थान को बताते हैं जो खादरयार परगना में है। प्रोफेसर बुहलर ने एक स्थान पर कहा है कि कुछ काश्मीरी पण्डितों का मत है कि यह नगर इस्लामाबाद अर्थात् अनन्त नाग के समीप था । पण्डरेथन में खनन कार्य किया गया है। जिस सरोवर में पण्डरेथन का मन्दिर निर्माण किया गया था उसका जल निकाल कर उसके नींव तक खनन कार्य किया गया था। मन्दिर १८ वर्ग फीट क्षेत्रफल में स्थित है। मन्दिर का निर्माण कश्मीर के राजा पार्थ ने सन् ९२१ ई० में कराया था। जहाँगीर अपनी आत्मकथा में लिखता है : 'नगर का नाम श्रीनगर है। झेलम नदी इसके बीच से बहती है। इसका उद्गम वैरनाग कहलाता है। जो चौदह कोस दक्षिण है। हमारी आज्ञा से सोते के पास एक इमारत तथा बाग बनवाया गया है। नगर में पत्थर तथा लकड़ी के बड़े मजबूत चार पुल बने हुए हैं। जिनसे लोग आते जाते हैं। इस देश की भाषा मे पुल को कदल कहते हैं। नगर में एक बड़ी ऊँची मसजिद है। जो सुलतान सिकन्दर के चिह्न स्वरूप वर्तमान है। और हिजरी सन् ७९५ ई० में बनी थी। कुछ दिनों के बाद यह जल गयी। और तब पुनः सुलतान हुसेन ने इसे बनवाया। यह पूरी नहीं हुई थी कि उसके जीवन का प्रासाद ढह गया। सन् ९०९ हिजरी के सुलतान के वजीर इब्राहीम माकरी ने इसे सुंदरता के साथ पूर्ण किया। उस समय से अब तक १२० साल से यह बनी हुई है। मेहराब से पूर्वी दिवाल तक एक सौ पैंतालीस गज है और चौड़ाई एक सौ चौवालीस गज है। इसमें चार ताक हैं और चारों ओर दालान तथा खंभे हैं। संक्षेप में कश्मीर के शासकों का इससे अच्छा स्मारक और कोई नहीं है। मीर सैय्यद
१४० राजतरंगिणी हमदानो कुछ दिन इस नगर में रहा था। इसका स्मारक यहाँ एक खानकाह है। नगर के पास दो झीलें हैं जो वर्ष भर जल से भरी रहती हैं। इनके जल का स्वाद कभी बिगड़ता नहीं। मनुष्यों के आने जाने और अन्न ईधन आदि लाने के लिए नावें काम में आती हैं। नगर तथा परगनो में सत्तावन सो नावें तथा चौहत्तर सो नाविक हैं। कश्मीर प्रान्त में अड़तालीस परगने हैं। यह दो भागों में विभक्त हैं। और नदी के ऊपरी भाग को बमराज कहते हैं। यहाँ भूमि का कर या व्यापार के लेन-देन में सोना चाँदी देने की प्रथा नहीं है। केवल कुछ सायर कर में दिया जाता है। ये वस्तुओं का मूल्य चावल के खरवारों से करते हैं और हर खरवार तीन मन आठ सेर वर्तमान तोल से होता है। कश्मीरियों में २ सेर का एक मन होता है और चार मन अर्थात् आठ सेर का एक तर्क होता है। कश्मीर की आय तीस लाख तिरसठ हजार पचास खरवार ग्यारह तर्क है। यह नगदी में सात करोड़ छियालीस लाख सत्तर सहस्र दाम होता है। साधारणतः यहाँ आठ सहस्र सवार रहते हैं।' (पृष्ठ ६५३) बरनीयर लिखता है—'कश्मीर प्रदेश तथा उसकी राजधानी दोनों का नाम कश्मीर है।' मुसलिम काल में श्रीनगर का नाम छोड़कर श्रीनगर को कश्मीर कहने लगे थे। सिक्खों ने सन् १८६१ ई० में जब कश्मीर विजय किया तो उन्होंने पुराना नाम श्रीनगर कश्मीर की राजधानी का पुनः प्रचलित किया। बरनीयर तथा उन्नीसवीं शताब्दी तक मुसलमान लोग श्रीनगर को 'कश्मीर' या 'कशूर' कहा करते थे। बरनीयर श्रीनगर का वर्णन करता है—'नगर के चारों ओर चहार दिवारी नहीं है। यह तीन चौथाई लीग लम्बा तथा आधा लीग चौड़ा शहर है। यह मैदान के अर्ध चन्द्राकार पर्वत से २ लीग दूर पर बसा है। ताजे पानी वाले लेक के तटपर बसा है। यह सरोवर ४ से ५ लीग होगा। इस लेक मे बहुत से चलते निर्भर हैं। तथा पर्वत से स्रोतस्विनीयाँ आकर मिलती हैं। यह वितस्ता में एक नहर द्वारा मिलती है। उसमें नावें आगो जाती हैं। नदी नगर के बीच में बहती है। नदी में ७ तरडो के पुल (झेलम या वितस्ता) पर बाँधे गये हैं। नगर के मकान अधिकतर दो तथा तिमजले लकड़ी के बने हैं। कुछ पुरानी इमारतें तथा प्राय. पत्थरों के बने मन्दिर टूटे पड़े हैं। पत्थर की अपेक्षा लकड़ी सस्ती होती है। उसे नदियों द्वारा पहाड़ से लाते हैं। नदी के प्रायः सभी किनारों के मकानों के साथ वाटिकाएँ हैं अर्थात् नगर में वाटिका गृहों की अधिकता है। ये गर्मी तथा वसन्त ऋतु में बहुत ही रुचिकर लगते हैं। नगर के भीतरी भाग के बहुत मकानों में वाटिकाएं हैं। अनेक मकानों के के समीप महरे हैं। जहाँ मकान मालिक अपनी नावें रखते हैं। उनमें वे सम्पर्क स्थापित करते हैं। 'नगर के समीप एक अकेला पहाड़ है। उसके ढाल पर बड़े ही सुन्दर मकान बने हैं। मकानों में बगीचा है। चोटी पर मसजिद तथा आश्रम हैं। दोनों ही अच्छी इमारतें हैं। पर्वत की चोटी पर हरित पादपों के मुकुट हैं। अपने वृक्षों तथा बागों के कारण स्थानीय लोग उसे 'हरीपर्वत' कहते हैं। 'हरीपर्वत' के दूसरी तरफ एक और पर्वत है। उसपर एक छोटी मसजिद है। उसमें वाटिका हैं। वहाँ पर एक बहुत ही पुरानी इमारत है। उसके चिन्हों के देखने से स्पष्ट मालूम होता है। वह मन्दिर था। यद्यपि उसे तख्ते सुलेमान कहते हैं। मुसलमान कहते हैं। राजा सुलेमान जब कश्मीर में आए थे तो उन्होंने इसे बनवाया था। परन्तु मुझे सन्देह है। कभी हजरत सुलेमान का यहाँ प्रवेश हुआ था। 'दल लेक द्वीपो से भरी है। वे आरामगाह हैं। जल के बीच में वे बहुत ही हरे भरे और सुन्दर लगते हैं। उनमें फलदार वृक्ष तथा नियमित झफ्री- दार भ्रमण मार्ग से पूर्ण हैं। दो-दो फिट की दूरी पर लगाए गये हैं, यह वृक्ष इतने कम मोटे हैं कि
दोनों हाथों के बीच में आ जाते हैं। किन्तु वे जहाज के मस्तूल इतने ऊंचे है। केवल शिरोभाग पर ताड़ के वृक्ष की तरह उनमें शाखों का गुच्छा होता है। 'लेक के तटवर्ती पर्वतों के ढालों पर मकानो तथा फूलों के बागों की भरमार है। हवा स्वास्थ्यकर है। इनका जलवायु बहुत ही अच्छा है। उनमें झरने तथा स्रोतस्विनियां खूब हैं। वहाँ से लेक, द्वीप तथा नगर का बहुत ही हृदयग्राही दृश्य मिलता है।' शालीमार बाग का बर्नियर ने ऐसा ही वर्णन किया है जैसा आज भी वह मौजूद है। केवल इतना और कहता है, 'शाहजहाँ द्वारा तोड़े गये मन्दिरों के खम्बो तथा द्वारों से नहरों के मध्य में ग्रीष्म भवन बनाया गया है। उनका मूल्यांकन करना कठिन है।' केप्टन नाइट (१८६०) श्रीनगर के विषय में लिखता है 'पूरे शहर में कोई भी प्राचीन निर्माणों के ध्वंसावशेषों को देख सकता है। वे विशाल शिलालेखों में अलंकृत मिलेंगे। ये लेख सब यहाँ लिखे मिलेंगे जो गौरवशाली प्राचीन काल की दुःखभरी कहानी कहते है। नदी के दोनों तटोंपर लकड़ियों के दर्शनीय मकानो की पंक्तियां मिलेगी।........बहुत से मकान मुझे मिलें। वे अपनी नींव की ओर जैसे 'पिसा के लीनिंग टावर' को भी लज्जित करते झाँक रहे हैं।........मकान छह मंजिलों तक ऊँचे है। इनकी खिडकियां लकड़ी के नक्काशी के कामो से सुन्दर बनी रहती हैं। 'पूर्व के वेनिस सदृश इस शहर की नदी में सैर करते हुए मैंने देखा कि नदी के तटपर बने भवनो की दीवारों में बहुत से अलंकृत शिलाखण्ड लगे थे। हम घूमते हुए एक मुसलिम कब्रिस्तान में पहुँचे। यहाँ एक गिरी मसजिद थी। उसमें बहुत से पुराने मन्दिरों के अलंकृत शिलाखण्ड लगे थे। वे प्राचीन मालूम होते थे। उन्होंने अपना जीवन इस मुसलिम भूमि से कही और प्रारम्भ किया था।' पण्डरेथन का मन्दिर सुन्दर है। में जिस समय यहाँ अपनी यात्रा में चौथी बार १३-९-१९६२ ई० में पहुँचा तो मन्दिर का द्वार वितस्ता जल के बाढ के कारण डूबने में केवल एक फीट ओर बाकी रह गया था। वितस्ता में बाढ आई थी। श्रीनगर अनन्त नाग तथा श्रीनगर-पठानकोट की सड़कों की सतह तक पानी की धारा बह रही थी। श्रीनगर पामपुर वाली सडक पर बाँध बँधने के कारण जल नहीं आ सका था। पंडरेथन का कुछ ऐसा विशद वर्णन लेखको ने किया है कि मैने समझा था कोई बहुत बड़ा मन्दिर होगा। ध्वंसा- वशेष तथा स्मारक अत्यधिक होंगे परन्तु यहाँ जितनी बार आया निराशा हुई। कश्मीर में जल प्लावन तथा वितस्ता के बाढ़ तथा उसके कारण हुए विनाश का बहुत वर्णन किया गया है। अतएव इस भयंकर बाढ के समय अपनी आँखों से कुछ देख लेने के मोह के कारण यात्रा की थी। इस समय यहाँ भारतीय सेना की छावनी पडी है। मन्दिर के पृष्ठभाग में पाकिस्तानी आक्रमण काल के समय वीरता प्रदर्शित करने के कारण मेजर शोभनाथ शर्मा, कमायूँ रेजिमेण्ट का स्मारक बना है। मन्दिर के दक्षिण मुख्य सड़क तक एक छोटा उद्यान बनाया गया है। चिनार का पेड़ लगा है। यहाँ पहले विलो अर्थात् बेंत के वृक्ष बहुत थे। परन्तु उनकी संख्या कम हो गयी है। मन्दिर का सरोवर ४० वर्ग गज होगा। मन्दिर १८ वर्ग फीट में है। सरोवर के पूर्व तरफ २ छोटे जलस्रोत हैं। उनका जल सरोवर में निरन्तर आता रहता है। सरोवर का जल झेलम नदी में एक गहरी नहर द्वारा निकल जाता है। झेलम मन्दिर से केवल २०० फीट दूर बहती है। मन्दिर कश्मीर के अन्य मन्दिरो तुल्य कश्मीर शैली पर बना है। मन्दिर का कलश गायब है या
'१४२ राजतरंगिणी
टूट कर गिर गया है। आमलक शेष है। मन्दिर सिकन्दर बुतशिकन द्वारा पूर्णतया नष्ट न किये जाने का कारण यह मालूम होता है कि मन्दिर सरोवर के मध्य में है। मन्दिर का आधार भूमि की सतह से नीचा है। मन्दिर तोडने की अपेक्षा सरोवर को मिट्टी से पाट देने पर सरोवर तथा मन्दिर दोनों का अस्तित्व लोप हो जाता है। सम्भव है यही यहाँ किया गया होगा। अन्यथा सिकन्दर बुतशिकन के छापों के सम्मुख बचा रह जाना अनहोनी बात है। अथवा मिट्टी से सरोवर भर गया होगा। मन्दिर दृष्टिगत नही हो सका होगा। मैने स्वयं देखा कि वितस्ता के बाढ के कारण सरोवर पूरा भर गया था। जल में मन्दिर की पूरी भीत डूब गयी थी। मन्दिर उपेक्षित पडा था। उसमे वितस्ता जल से लाई मिट्टी जो शताब्दियो तक जमती रही। मन्दिर सरोवर मे पड़ने के कारण स्वयं आँखों से लोप हो गया होगा। काशी मे घाटो पर बने मन्दिर बरसात में गंगा की मिट्टी जमने के कारण भर जाते है ! मन्दिर के द्वार की ऊपरी देहली पर मूर्तियाँ बनी है। किन्तु ये कुरूप कर दी गयी है। स्थानीय लोग इस मन्दिर को पंचमुखी महादेव का मन्दिर कहते है। मन्दिर के भीतर अलंकृत तथा मूर्तिमय शिलाखण्ड है। यह मेरुवर्धन स्वामी का मन्दिर कहा जाता है। मेरुवर्धन राजा पार्थ का प्रधान मन्त्री था। अशोक द्वारा निर्मित यही प्राचीन श्रीनगर था। राजा प्रवरसेन द्वितीय (११०-७० ई० पू०) ने उक्त मन्दिर निर्माण होने के पूर्व प्रवरपुर अर्थात् वर्तमान श्रीनगर बसाया था। उसे अपनी राजधानी बनाया था। पुराधिष्ठानपुर राजा अभिमन्यु द्वितीय (९६० ई० पू०) के समय आग लगने के कारण भस्म हो गया था। इतनी भयंकर आग लगी थी कि इस मन्दिर के अतिरिक्त जो जल के मध्य मे था और जहाँ आग नहीं पहुँच सकती थी, सब कुछ जल गया। मन्दिर की उत्तर दिशा में कुछ खनन कार्य हुआ था। उसमें पुराने मन्दिरो के पत्थर बिखरे मिले थे। वहाँ एक ६ फीट ऊँचा शिवलिंग तथा लगभग १६ फीट ऊँचा टूटा लिंग मिला था। इन दोनो लिंगो के मध्य एक आसीन मूर्ति का पद तथा पाँव जो ठेहुनी भर ऊँचा था, मिला था। बैरन हुगेल ने इसे बुद्ध की प्रतिमा का अवशेष माना है। ह्यूम ने लिखा है कि पाद तथा पैर २० फिट ऊँची मूर्ति के अवशेष थे। वह बैठी मूर्ति थी। उस सरोवर मे एक छोटी नाव बँधी रहती थी। उससे दर्शक स्वयं नाव लेकर मन्दिर तक पहुँच जाता था। वहाँ बहुत कम लोग आते थे। सरोवर बडे नरकुल से भरा लगभग ४० वर्ग गज मे है। पुराधिष्ठान के अन्य मन्दिरो के ध्वंसावशेषों के कुछ पत्थर समीपस्थ मस्जिद के निर्माण में लगाये गये हैं। प्रश्न उपस्थित होता है ! अशोक ने इस स्थान को अपनी राजधानी के लिए क्यों चुना ? अशोक ने यह स्थान दो कारणों से राजधानी निमित्त चुना होगा। प्रथम कारण यह मालूम होता है कि वितस्ता का जल इस स्थान को डुबा नही सकता। यह ऊँचा है। पृष्ठभाग मे पर्वतमाला है। पर्वत के ढाल के पश्चात् पथरीली ऊँची भूमि है। पर्वत कच्चा नही पक्का है। पत्थर गया जी के पत्थर की तरह सख्त है। मैने स्वयं देखा सडक बनाने के लिए गिट्टी पहाड़ तोड़कर बनाई जा रही थी। बाढ़ आने पर लोग पीछे पर्वत के ढाल पर जाकर अपनी रक्षा कर सकते थे। पर्वत के खिसकने का—भूभ्रंश का भय नही था। इस बात का वितस्ता के बाढ़ तथा अत्यन्त वर्षा के समय यहाँ रहकर मैने अनुभव कर लिया। दूसरा कारण यह मालूम होता है कि वर्तमान पण्डरेथन ग्राम तथा शंकराचार्य पर्वत तक का भूखण्ड वितस्ता तथा पर्वतमाला के मध्य समतल तथा उपजाऊ है। विस्तृत भूखंड है। इस स्थान को बादामो बाग कहते हैं। यहाँ बादाम के बहुत बगीचे
प्रथम तरंग १४३
हैं। बागों की यह श्रृंखला पामपूर तक मिलती चली जाती है। बनिहाल श्रीनगर मार्ग पर है। आगे जाने पर पामपुर पड़ता है। केसर की खेती के लिए प्रसिद्ध है। वहाँ की उपजाऊ भूमि, फलदार वृक्षादि के कारण इस स्थान का चयन अशोक ने किया होगा। इस समय मैदान में भारतीय सैनिक छावनी का कैम्प गत सन् १९४७ ई० से पड़ा है। सैनिक एवं सुरक्षा की दृष्टि से स्थान श्रेष्ठ माना जायगा। इसके दक्षिण-पश्चिम वितस्ता तथा पूर्व ओर ऊँची पर्वत- मालाएँ हैं। दक्षिण में पाण्डु चक पर वितस्ता तथा पर्वत के मध्य अत्यन्त संकीर्ण मार्ग है। पश्चिम हस्तम गढ़ी जिस पर इस समय कश्मीर राजा का प्रासाद बना है। उस पर्वत तथा वितस्ता के मध्य का स्थान हवाखातून की मज़ार के समीप का मार्ग ४० फीट संकीर्ण हो जाता है। यहाँ महासरित वितस्ता पर्वत मूल तक खाई का काम करती है। इस प्रकार यह स्थान प्राकृतिक सुरक्षा वेष्ठित—एक ओर वितस्ता तथा तीन ओर पर्वत से घिर जाता है। यही कारण है कि इस समय भारतीय सेना यहाँ बड़े पैमाने पर रखी गयी है। उसका पूर्ति तथा सम्भरण केन्द्र है। डोगरा काल में यहाँ कैण्टोनमेण्ट था। अर्थात् सेना की छावनी थी। अशोक उत्तर- पश्चिम भारत में रह चुका था। स्वयं युद्ध विद्या में निपुण था। एक सैनिक होने के नाते उसने इस स्थान का सैनिक महत्त्व समझा। अतएव इस स्थान को राजधानी के लिए चुना। अफगानिस्तान में जिस प्रकार भगवान् की बड़ी मूर्ति खण्डित की गयी थी उसी प्रकार इस मूर्ति का हाथ जो सम्भवतः अभय मुद्रा में था खण्डित कर दिया गया। बामियान मूर्ति की मुखाकृति ललाट से नीचे बिल्कुल छील दी गयी है। भगवान् त्रिचीवर धारण किये हुए हैं। इस मूर्ति पर दृष्टि पड़ते ही मुझे अपनी आँखों देखी बामियान की दोनों मूर्तियां स्मरण हो आयीं। मैंने उक्त दोनों बामियान की मूर्तियों का वर्णन विस्तार से अपनी पुस्तक 'आर्याना' में किया है। भगवान् की अभय मुद्रा में एक और मूर्ति है। मूर्ति भव्य है। अनायास मन पर अभय भावना स्थापित करती है। बोधिसत्त्व अवलोकितेश्वर की मूर्ति है। यज्ञोपवीत, धोती, वाम कर में मृणाल सहित पद्म, तथा दायें कर में माला और मूर्धा पर केश के ऊपर मुकुट है। इस मूर्ति की मुद्रा मुझे बहुत अच्छी लगी। मूर्ति की मुखाकृति बड़ी सरल है। मालूम पड़ता है मूर्ति जैसे कुछ कहना चाहती है। देखकर मन अनायास मूर्ति की ओर आकर्षित हो जाता है। संग्रहालय में यहाँ से प्राप्त गगन में गमनशील गन्धर्व यक्षादि की भी मूर्तियाँ प्रदर्शित की गयी हैं। यहाँ से प्राप्त दो और मूर्तियाँ दर्शनीय हैं। एक की संख्या 'ए' १०४ है। यह लुम्बिनी वन में भगवान् के जन्म की घटना प्रदर्शित करती है। देवी महामाया शाल वृक्ष की एक शाखा पकड़े खड़ी हैं। उनका बायाँ हाथ एक महिला के स्कन्ध पर है। कहते हैं यह महा प्रजापति गौतमी देवी महामाया की कनिष्ठ बहन थीं। उनका विवाह उनके पति शुद्धो- दन के साथ हुआ था। भगवान् के जन्म के सातवें दिन देवी महामाया दिवंगत हो गयी थीं। अतएव विमाता प्रजापति गौतमी ने भगवान् बुद्ध का लालन- पालन किया था। भगवान् के बुद्धत्व प्राप्त होने पर महाप्रजापति गौतमी ने स्वयं प्रव्रज्या ले ली और अपने ही पुत्र की शिष्या हुईं। पुत्र को शास्ता स्वीकार किया। देवी ने प्रव्रज्या के पश्चात् यह मार्मिक शब्द कहा था—मैं तुम्हारी माता हूँ और आप मेरे शास्ता हो। किन्तु किसी बुद्ध ग्रन्थ में मुझे नहीं मिला कि प्रजापति गौतमी देवी महामाया के देवदह जाते समय साथ थीं। सम्भव है कालान्तर में इस प्रकार की कहानी प्रचलित हो गयी हो। अथवा किसी लेखक के ग्रन्थ में इसका उल्लेख किया गया है। जिसके आधार पर यह मूर्ति बनायी गयी है।
१४४ राजतरंगिणी मूर्ति के पृष्ठ भाग में एक चामर धारिणी युवती है। कश्मीर में उस समय महिलाओं की क्या वेशभूषा थी, किस प्रकार केशविन्यास, शृंगारादि करती थी इस विषय पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है। उसका वहाँ वर्णन अप्रासंगिक होगा। एक विचित्र खण्डित मूर्ति इस संग्रहालय में और है। मूर्ति का पाद से कटि प्रदेश तक का ही भाग शेष रह गया है। शेष भाग खण्डित कर दिया गया है। कही लुप्त हो गया है। यह पुरुष मूर्ति है। सिंह वाहन है। अर्थात् सिंह पर आसीन है। उसके पैर के अँगूठे से कटि तक, पादत्राण वस्त्रादि से विभूषित है। यह मूर्ति किसी कुषाण वंशीय राजा की हो सकती है। उसने अपनी शक्ति का परिचय सिंह पर बैठ कर दिया है। सिंहवाहिनी दुर्गा या देवी की यह मूर्ति नही है। यह किसी सैनिक राज- पुरुष की मूर्ति है। इसके पद की जो वेशभूषा है वह पेशावर जिला के ग्रामीण क्षेत्रों के बीसवी शताब्दी के प्रारम्भ काल तक प्रचलित थी। पुराधिष्ठान अर्थात् पण्डरेथन का वर्णन तथा विस्तार के साथ उल्लेख महर्षि वाल्मीकि प्रणीत 'योग वासिष्ठ रामायण' में जैसा मै ऊपर लिख चुका हूँ मिलता है। राजा यशस्कर के प्रसंग में मैने इसका वर्णन किया है। योग वासिष्ठ रामायण, पुराधिष्ठान तथा कश्मीर का सम्बन्ध है या नही। यह प्रश्न स्वयं एक स्वतंत्र विषय है। इस प्रसंग के लिये यहाँ इतना ही लिखना पर्याप्त प्रतीत होता है। योग वासिष्ठ के वर्णन और पुराधिष्ठान के भौगोलिक आदि स्थिति का पूरा मेल खाता है। कुछ विद्वान् कह सकते है कि योग वासिष्ठ का यह अंश प्रक्षिप्त है। इस विवाद में यहाँ प्रवेश करना अप्रासंगिक होगा। पर्वत के ढाल पर लगभग एक मील से अधिक के क्षेत्र में पुराने खिलौने, मूर्तियाँ आदि बहुत मिली हैं। वे इस तरह तोड़ी गयी है कि खण्ड मात्र रह गयी हैं। बादामी बाग के पास बैस्ट तथा अस्पताल आदि सैनिकोपयोगी स्थान बने है। यहाँ के खनन में हयग्रीव, वराह, रुद्र, पार्वती, शिव, भैरव, त्रिमूर्ति, लक्ष्मी की मूर्तियां मिली है। ये इतनी बुरी तरह तोड़ी गयी है कि उन्हें देखकर दया आती है। मूर्तियां भव्य, सुन्दर तथा कलापूर्ण हैं। उनकी अपनी शैली है। पण्डरेथन का सबसे पुराना फोटो कर्नल कोल की पुस्तक में छपा है। उसने पण्डरेथन के मन्दिर तथा कला पर प्रकाश डाला है। मन्दिर उस समय जिस अवस्था में था उसी अवस्था में आज है। केवल कुछ मरम्मत कर दी गया है। सैनिक छावनी के कारण इस स्थान पर कुछ चहल-पहल हो गयी है। यहाँ की मूर्तियां जिस कठोरता के साथ भग्न की गयी थी उसका प्रमाण श्रीनगर कला संग्रहालय में संग्रहीत मूर्तियां है। यहाँ के प्राप्त वस्तुओं से कश्मीर की तत्कालीन स्थिति पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है। प्रतापसिंह संग्रहालय में कुछ मूर्तियाँ तथा मूर्तिखण्ड संग्रहीत हैं। उनमें मूर्ति संख्या १६ गान्धार शैली की है। भगवान् बुद्ध ध्यान मुद्रा में आसीन हैं। महीन चीवर धारण किये है। पद्मासीन हैं। मूर्ति का हस्त नासिकादि खण्डित कर दिया गया है। भगवान् बुद्ध की खड़ी मूर्ति संख्या ११ मथुरा से प्राप्त भगवान् की प्रसिद्ध मूर्ति से मिलती है। कैप्टन सी नाइट (सन् १८६० ई०) के समय पण्डरेथन में खनन कार्य नही हुआ था। परन्तु उनके वर्णन से स्पष्ट होता है। वहीं यथेष्ट भग्नावशेष बिखरे थे। कालान्तर में खनन कार्य यहाँ पर किया गया। उससे प्रमाणित हो गया कि यह स्थान अत्यन्त प्राचीन रहा है। श्री नाइट ने अपनी पुस्तक में मन्दिर का जो चित्र दिया है उससे प्रकट होता है। मन्दिर इतना उपेक्षित एवं जीर्णावस्था में था कि शिखर पर एक
प्रथम तरंग १४५
पेड़ जम गया था। मन्दिर के चारों ओर नरकट के लम्बे-लम्बे पेड़ उगे थे। मन्दिर का मध्य भाग दिवाल सा लगता था। वह लिखता है—'श्रीनगर से तीन कोस इधर हम लोग एक विस्तृत दानव सम्बन्धी भूमि के ध्वंसावशेष पर ठहर गये। यह स्थान पण्डेरेथन कहा जाता है। यहाँ हमने पूर्णावस्था में एक इमारत देखी। इस प्रकार की इमारत अब तक हम लोगों ने नहीं देखी थी। उसके चारों ओर बहुत दूर तक इस प्रकार के चिह्न मिले जिनसे मालूम होता था कि प्राचीन काल में यहाँ विशाल नगर था।' 'अन्य रुचिकर अवशेषों में एक मूर्ति का ठोस अधिष्ठान देखा। वह एक फसल कटे हुए खेत में खड़ा था। मूर्ति की ठेहुनी से अधोभाग का शेष रह गया था। यह शिलाखण्ड सात फिट ऊँचा था। मूर्ति की उँगलियाँ तथा अँगूठे तोड़ डाले गये थे, किन्तु पाँव टूटने से बच गये थे। 'यहाँ से आधा मील दूर पर एक विशाल स्तम्भ की वेदी पड़ी थी। वह कुछ अच्छे स्थान पर थी। इसका व्यास छहफिट था। इसे यहाँ रखने के लिये भारी यन्त्र की आवश्यकता पड़ी होगी। कुछ दूर पर हमें स्तम्भ का भाग मिला। वह तीन भागों में खण्डित था। वह १२ फिट लम्बा था। उसका अधोभाग बहु कोणीय था। मध्य भाग गोलाकार था। शिरस् भाग नोकदार शुण्डाकार था। वह हिन्दुओं के महादेव के मन्दिर में लगे पत्थर के समान था। (पृष्ठ १२२) श्री कनिंघम (सन् १८४८ ई०) पण्डेरेथन के विषय में लिखते हैं—'इस नाम का अर्थ पुरानी राजधानी अथवा प्राचीन मुख्य नगर होता है। विभिन्न यात्रियों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से इसका उच्चारण किया है। श्री मूर क्राफ्ट ने इसे 'पण्डेयन' श्री वाइन ने 'पण्डरेण्टोन' तथा श्री बैरन हुगेल ने 'पण्डरीटन' लिखा है। १९
'इस मन्दिर की इमारत का उल्लेख सन् ६१३ तथा ९२१ के बीच मिलता है। तत्पश्चात् सन् ९५८ तथा ९७२ के मध्यवर्ती कालों में मिलता है। उस समय रोमन सम्राट् नीरो तुल्य राजा अभिमन्यु ने अपनी राजधानी में आग लगवा दी थी। किन्तु यह मन्दिर नष्ट होने से बच गया था। 'चूंकि यह एकमात्र मन्दिर पुरानी राजधानी में स्थित है, अतएव इसमें सन्देह नहीं कि यह वही मन्दिर है जो इस समय वर्तमान है। यह एक सरोवर के मध्य में स्थित है। चारों ओर जल है। यही स्थिति उस अग्निदाह के समय में रही होगी। अतएव अग्निदाह से यह बच गया था। जब कि अन्य इमारतें जलकर चूना और भस्म मात्र रह गयीं। 'बैरन हुगेल मन्दिर को बौद्धों का मानते हैं। कहते हैं। मन्दिर के अन्दर की मूर्तियां सुरक्षित हैं। किन्तु उनकी यह भ्रान्ति है। मन्दिर विष्णु का है। भीतर की मूर्तियों का कोई सम्बन्ध बौद्ध धर्म से नहीं है। 'श्री ट्रिवेक इसके भीतर तैर कर गये। उसे वहाँ किसी प्रकार की मूर्ति का दर्शन नहीं हुआ था। उस समय छत तक पानी था अतएव वह भीतर की मूर्तियां नहीं देख सके थे। 'जल के अन्दर मन्दिर बनाने का यह उद्देश्य रहा होगा कि उन्हें नागों की संरक्षता में रखा जाय। नागों के शरीर का ऊर्ध्व भाग मनुष्य तथा अधोभाग सर्प का होता है। कश्मीर में उनकी पूजा प्राचीन काल से प्रचलित थी।' जनरल एशियाटिक सोसाइटी (भाग : १६) श्री डब्लू० वेल फोहड (सन् १८७९ ई०) ने पण्डेरेथन को 'पण्डरिटन' लिखा है। वह लिखते हैं—'पण्डरिटन एक समय अत्यन्त समृद्धिशाली तथा बड़ा नगर था। प्रदेश की की राजधानी था। कितने दुःख का विषय है। अपने एक पुराने राजा के पागलपन के कारण यह पत्थरों का संग्रह मात्र रह गया है।
१४६ राजतरंगिणी जीर्णं श्रीविजयेशस्य विनिवार्य्य सुधामयम्। निष्कल्मषेणाश्ममयः प्राकारो येन कारितः ॥१०५॥ १०५ उस निष्कल्मष राजा ने विजयेश्वर १ के पवित्र देव स्थान के जीर्ण हुए चूने आदि से बने प्राकार के स्थान पर नवीन पाषाण प्राकार का निर्माण कराया ।
'कहा जाता है। यह नगर एक समय मीलों में विस्तृत था। उसमें दर्शनीय भवन थे। अशोक ने एक देवस्थान निर्माण कराया था। उसमें भगवान् बुद्ध का एक धातु रखा गया था। इस समय उस पवित्र देव स्थान का पता नहीं है। उस गौरवशाली प्राचीन काल की स्मृति को जीवित रखने के लिये, इस एक मन्दिर के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रह गया है। यह मन्दिर सरोवर के मध्य में है। इसके चारों ओर विलों के उद्यान हैं। अतएव इसके भीतर क्या है । बहुत लोग इसके अन्दर जाकर देख नहीं सके हैं। (पृष्ठ २३६)
विजयेश्वर का मन्दिर राजा अनन्तदेव के समय में भस्म हो गया था। राजा कलश ने उसका जीर्णोद्धार कराया था। (रा० त० ७.५२४) पुराना आकार अथवा सुधामय सम्भवतः ईंट अथवा पत्थरों के ढोको का बना था। अशोक ने पत्थरों से उसका निर्माण कराया था।
नीलमत पुराण में दो स्थानों पर विजयेश का उल्लेख मिलता है। पहला वर्णन शक्र संशय तथा दूसरा वितस्ता माहात्म्य के वर्णन के सन्दर्भ में मिलता है। दोनों से कल्हण की बातों की पुष्टि होती है।
पाठभेद : श्लोक संख्या १०५ में 'सुधामयम्' का पाठभेद 'सोधम्' और 'प्राकारो' का पाठभेद 'प्रासादो' तथा 'कारितः' का 'निर्मितः' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ : १०५ (१) विजयेश्वर. काल शिव विजयेश्वर का प्रसिद्ध देवालय वर्तमान बिजवोर तथा उसके आस- पास का क्षेत्र था। इसे विजयेश्वर क्षेत्र कहते थे। स्थानीय पुरोहितों के अनुसार विजयेश्वर का प्राचीन मन्दिर लगभग ४०० गज नदी तट से दूर वितस्ता सेतु के दूसरी तरफ था। यहाँ से कश्मीर के डोगरा राजा रणवीर सिंह ने अपने नवीन मन्दिर निर्माण निमित्त बहुत सामग्री प्राप्त की थी। यहाँ स्टीन सन् १८८९ में आये थे। मन्दिर के अधिष्ठान के पास कुछ टूटे हुए पत्थर तथा मलवे मिले थे। यहाँ पर कुछ निर्माण किया गया है। नवीन मन्दिर के समीप कुछ मूर्तियाँ जो पुरानी नही मालूम होती, रखी थी। यह मन्दिर नदी के ऊपर कुछ दूर पर बना है।
विशोकां विजयेशं च वितस्तां सिन्धुसंगमम् । एतान् सर्वानतिक्रम्य प्रययौ भरतं गिरिम् ॥ 1056 : १२४०
'—विशोका, विजयेश, वितस्ता, सिन्धु संगम पार करते हुए वह भरतगिरि पर पहुँचा । विजयेशाग्रतः स्नात्वा वितस्तायां महीपते । रुद्रलोकमवाप्नोति कुलमुद्धरते सुखम् ॥ 1303 : १५१६,१५१७
'महीपते ! विजयेश्वर के सम्मुख वितस्ता में स्नान करने वाला अपने कुल का उद्धार करता स्वयं रुद्रलोक प्राप्त कर सुख भोगता है । उक्त उद्धरणों से दो बातें स्पष्ट होती हैं। विजयेश्वर तीर्थ था। विजयेश्वर घाटपर स्नान करने पर मुक्ति मिलती थी । कुल का उद्धार होता था । सुख की प्राप्ति होती थी । विजयेश का महत्त्व सिन्धु संगम जैसा महत्त्वपूर्ण था । उसकी गणना पवित्र स्थानों में थी । इन आध्यात्मिक महत्त्व के साथ दूसरा भौगोलिक महत्त्व भी प्रकट होता है। वितस्ता