भारतकोश
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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

प्रथमस्तरङ्गः ३ आ.टी.--तीन वर्षों तक गुरु की सेवा कर रसशास्त्र के गूढ़ तत्त्वों का और गुरूपदेश से कर्म मार्ग का जो हमने ज्ञान प्राप्त किया है-उन्हीं ज्ञानों को सरल एवं मधुर पद्यों द्वारा इस ग्रंथ में ग्रथित कर रहा हूँ ॥ ३ ॥ प्राचीनेषु दुरूहेषु रसतन्त्रेषु मुह्यताम् । सन्दिग्धास्वतिकष्टासु रसपाकक्रियासु च ॥५॥ पदे पदे विशेषेण नित्यं व्यामोहितात्मनाम् । ग्रन्थसम्पद्विहीनानां स्वल्पाध्ययनसम्पदाम् ॥६॥ इदानींतनबालानां स्वल्पेन समयेन तु । सुखतः प्रतिपत्त्यर्थं प्रयत्नोऽयं कृतो मया ॥७॥ घिल्डियालोपसंज्ञेन सदानन्देन शर्मणा । निबध्यते महायतनादियं रसतरङ्गिणी ॥८॥ अथ ग्रन्थानूबन्धचतुष्टयं दर्शयति विशेषकेण — प्राचीनेष्विति । दुरूहेषु कष्टलभ्यतत्त्वेषु = रसहृदयतन्त्रादिषु, मुह्यतामाकुलानाम् , सन्दिग्धासु स्फुटनि- श्चायकवर्णनरहितासु अत एव अतिकष्टासु बहुसमारम्भाल्पफलासु रसपाकक्रि- यासु = पारदादिजारणमारणव्यापारेषु,पदे पदे इति बाहुल्याभिप्रायेण स्वल्पेन समयेन तु इति तुर्विशेषार्थे, यदयमेव प्राक्तनतन्त्रेभ्यो रसतरङ्गिण्यां विशेषो यावता परिमितकालमप्येतदध्ययनं जिज्ञासुमनःसु रसरहस्यमाधातुमलमलमिति । तदेतदाह-सुखतः प्रतिपत्त्यर्थमिति प्रतिपत्तिः ज्ञानम् , महायत्नात् गुर्वनुकम्पास- हायविशिष्टाद् यत्नात् इत्यर्थः ॥५-८॥ एतेन स्वगुरूणां श्रीनरेन्द्रनाथ-मित्रम- होदयानां रसतरङ्गिणीनिर्माणे साहाय्यं ध्वनितम् । भा.टी.—अत्यन्त दुरूह रसशास्त्र में और संदिग्ध एवं अतिकष्टकारी रस- पाकक्रिया में व्यामोह प्राप्त वैद्यों के लिए, ग्रन्थ की कमी के कारण, स्वल्प अध्ययन करनेवाले, आजकल के अल्पज्ञ वैद्यों को स्वल्प समय में सुखपूर्वक ज्ञान कराने के लिए घिल्डियालोपाधियुक्त सदानन्द शर्मा ने रसतरंगिणी नामक ग्रंथ रचने का प्रयास किया है ॥ ५-८ ॥ रसतरंगिण्याः परिचयः सशिलापि निराघाता सनागापि भ्योज्झिता । सुखावगाहा बोभूयादियं रसतरङ्गिणी ॥९॥ ससत्त्वापि निराबाधा सघोषापि स्थिरक्रिया । सुखावगाह। जयति भृशं रसतरङ्गिणी ॥१०॥

४ रसततरङ्गिणी अथ रसतरङ्गिण्या अलौकिकत्वं ध्वनयति युग्मकेन सशिलापीति । लोको- पलब्धा हि तरंगिणी नदी शिलापाषाणयुता चेदाघातविशिष्टा, ससर्पा च भय- प्रदा जलजन्तुसमन्विता चेत् प्रविष्टपुरुषप्राणहरा च, सजलशब्दा चञ्चला च, इयन्तु सह शिलया=मनःशिलया उपलक्षितापि निराघाता=सङ्घट्टनवर्जिता, सनागा=सीसकयुतापि भयोझिता=निर्भयसाधना, ससत्त्वा=अभ्रकादिसत्त्वयु- तापि निराबाधा=प्राणबाधारहिता, घोषः=कांस्यं तद्युतापि स्थिरक्रिया=निश्चि- त्तगुणसाधना च, सेयमध्यापकाध्येतृणां सुखावगाहा सरसवर्णानायुक्तत्वेन सुख- प्रवेशा भृशं = अत्यर्थं बोभूयात्=आस्तामित्याशिषः । जयतीत्यस्याः सर्वोत्कर्षो बोधितः ॥६, १०॥ भा.टी.-अपने ग्रंथ की उत्तमता बताते हुए रसों का तरंग है जिसमें ऐसी, रसतरंगिणी की, गंगा इत्यादि पवित्र नदियों से तुलना करते हैं- जहाँ नदियों में पत्थर का चट्टान इत्यादि रहता है वहाँ आघात अवश्य रहता है और जहाँ सर्प रहता है वहाँ भय अवश्य रहता है पर इस रसशास्त्र रूपी नदी में शिला ( मैनशिल ) और नाग ( सीसा ) के रहते हुए सुख- पूर्वक प्रवेश करने योग्य है ॥९॥ जहाँ सत्त्व, मारक जीव ( नक्रादि ) रहते हैं वहाँ बाधा अवश्य होती है और जहाँ नदी में = भ्रमर (चकोह) रहता है वहाँ कोई कार्य स्थिर नहीं होता है । पर सत्त्व ( अभ्रक धात्वादि सत्त्व, एवं घोष (कांसा) इत्यादि के रहते हुए भी इस रसशास्त्र में सुखपूर्वक प्रवेश कर सकते हैं । अतः इस रसतरं- गिणी की जय हो ॥ १० ॥ रसवैद्यस्य प्रशंसा तत्तत्संस्काररीत्या सपदि रसवरः शोधितः स्यान्न यावद् यावद्वा मारितः स्यात्सकृदपि न रसो नो कृता स्याद्बुभुक्षा । यद्वा नैवाभ्रसत्त्वं खलु कृतमथवा जारितं वा सुवर्णं प्राणाचार्यः क्व तावद्भवति हि भिषजां मण्डले मण्डनीयः॥११॥ अथ चिकित्साप्रधानपादं रसवैद्यं स्तौति स्रग्धरया, तत्तदिति--मारणं भस्मत्वापादनं, बुभुक्षा पारदस्य धात्वादिश्राससामर्थ्यम्, एतावता च पारद- संस्कारादि जारणान्तं कर्म भिषग्वपुणावश्यं ज्ञातव्यमिति ध्वनितम् ॥११॥ भा.टी.-जो वैद्य भिन्न-भिन्न संस्कारों द्वारा पारद का अच्छी तरह से शोधन कर लेता है और जो पारद का मारण (भस्म) तथा पारद को बुभुक्षित (धातुओं

प्रथमस्तरङ्गः ५ को खा जानेवाला ) नहीं कर लेता है और जो पारद में अभ्रक सत्त्व तथा स्वर्ण का जारण नहीं कर सकता है वह किस तरह वैद्यसमुदाय में माननीय हो सकता है अर्थात् उपर्युक्त गुण होने पर ही श्रेष्ठ रसवैद्य हो सकता है ॥११॥ कृतिरियमिह दोषैराचिता स्यान्मदीया यदि तदपि न धीरैः काप्युपेक्षा विधेया । कृमिशतपरिपूर्णा कण्टकाकीर्णकाया स्वनसि नहि नरेन्द्रैरर्प्यते केतकी किम् ॥१३॥ अथ दोषैकदृष्ट्या नेयमुपेक्षणीयेति दृष्टान्तयति कृतिरियमिति—दोषभरिता- पीयं मत्कृतिः धीरैर्नोपेक्षणीया, इति नात्राधीराः प्रार्थ्यन्ते तेषामुपेक्षण-स्वभाव- त्वात्, यतः कृमिशतैः पूर्णा अथ च कण्टकव्यासशरीराऽपि केतकी नरेन्द्रैः किं स्वनसि = स्वकीयनासिकायां नार्प्यते ? अति त्वपर्यत एव । तथा च विधूय पुरोभागितां गुणैकग्रहिभिर्भव्यैर्भाव्यमिति भावः ॥ १२ ॥ भा.टी.—यद्यपि इस मेरी कृति में अनेकों दोष होंगे फिर भी धीर वैद्यों को इसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्या सैकड़ों कृमियों से परिपूर्ण और काँटों से युक्त केतकी ( केवड़ा ) के पुष्प को राजवर्ग नासिका पर नहीं रखते हैं अर्थात् सुगन्ध नहीं ग्रहण करते हैं, किन्तु ग्रहण करते ही हैं ॥ १२ ॥ रसशाला विमलोपवनप्रदेशगां रमणीयां जलयन्त्रशोभिताम् । कमनीयगवाक्षसंयुतां जनबाधारहितामसंकुलाम् ॥१३॥ निखिलौषधवर्गमण्डितां रससिद्धेश्वरचित्रभूषिताम् । विपुलाखिलसाधनान्वितां रसशालां विदधीत शोभनाम् ॥१४॥ अथ साधनप्राथम्यादुपक्रमो रसशालायाः—विमलेत्यादि, वियोगिनीवृत्त- युगलेन—विमले उपवनप्रदेशे स्थापितां, उपवनस्य औषधिसुलभताजनकत्वात् रजोधूमादिबाधारहितत्वात् रम्यत्वाच्च । औषधव्याघातभयात् जनबाधारहिताम्, असङ्कुलां = असङ्कीर्णाम् , निखिलौषधवगैंण रसक्रियोपयोगिभेषजसमूहेन, रस- सिद्धेश्वराः श्रीशङ्करादयः, तेषां चित्रैः भूषितां श्रद्धाप्रोत्साहनहेतोः । स्पष्टमन्यत् ॥ १३-१४ ॥ भा.टी.—औषधि निर्माण करने के लिए एक स्वच्छ उपवन (बगीचा) में जहाँ पर रहट या पानी का नल लगा हो और मनुष्यों के आने जाने से

६ रसतरङ्गिणी जहाँ पर औषधि-निर्माण में कोई विघ्न न हो सके, ऐसी एक रसशाला (Pharmacy) बनानी चाहिये यह शाला विस्तृत और वायु के आने जाने के लिये सुंदर खिड़की तथा रोशनदानों से युक्त होनी चाहिए । इसमें सब औषधियाँ वर्ग-क्रम से रखी हुई और दीवारों पर रस-आचार्यों के चित्र टँगे होने चाहिये । इसमें औषधिसिद्धि के लिये काम में आनेवाले सब साधन पर्याप्त रूप में होने चाहिये ॥१३-१४॥ रसशालायां कर्मविभागः शङ्करं पूर्वदिग्भागे स्थापयेद्भिषजाग्रणीः । आग्नेये वह्निकार्याणि याम्ये प्रस्तरकृत्यकम् ॥१५॥ शस्त्रकृत्यन्तु नैर्ऋत्ये क्षालनादीनि वारुणे । वायव्ये शोषणं शस्तमुत्तरे यन्त्ररक्षणम् ॥१६॥ निदध्यादीशकोणे तु रससाधनमूलकम् । मुख्योपकरणं तत्तन्नित्यकृत्यं समागतम् ॥१७॥ अत्र च कर्मसौकर्यार्थं दिग्भेदेन रसशालायां कर्मविभागमाह-शङ्करं पूर्व दिग्भाग इति-शङ्करो रससाधकेष्टतमः, शङ्करप्रिय इत्याचार्यगुणेषूक्ते । वह्निका- र्याणि भ्राष्ट्रीप्रभृतीनि, प्रस्तरकृत्यं खल्वपेषणादिकम् । याम्ये=दक्षिणस्याम् , वारुणे=पश्चिमायाम् ॥ अन्यत् सुगमम् ॥ १५-१७ । भा.टी.-पुरानी प्रथा के अनुसार पूर्वोक्त रसशाला में पूर्व दिशा में शंकर की स्थापना करनी चाहिये और आग्नेय कोण में आग की भट्टी चूल्हा आदि बनाने चाहिये । दक्षिण दिशा में सिल खरल में पीसने रगड़ने का कार्य करने चाहिये । नैर्ऋत्य कोण में शस्त्र आदि से काटने आदि के कार्य करने चाहिये । पश्चिम दिशा में जल से धोने के कार्य करने चाहिये । वायव्यकोण में औषधि आदि को सुखाने के कार्य करने चाहिये । उत्तर दिशा में भिन्न- भिन्न प्रकार के यन्त्रों को बनाकर रखना चाहिये और ईशान कोण में पारद के शोधन-मारण में प्रतिदिन काम आनेवाले मुख्य-मुख्य उपकरणों को रखना चाहिये । जिससे काम करनेवालों को सुविधा हो और समय नष्ट न हो ॥ १५-१७ ॥ रसशालायां उपकरणद्रव्याणि द्रोणीरूपा वर्तुलाश्च खल्वाः पाषाणनिर्मिताः । आयसाश्चापि संग्राह्यास्तद्योग्याश्चैव मर्दकाः ॥१८॥

प्रथमस्तरङ्गः ७ काचमृत्काष्ठलोहादिनिर्मितानि बहूनि च । पात्राणि कारयेद्धीमान् यत्नतः पात्रमानवित् ॥१६॥ सन्दंशिका कर्तरी च तथा शूर्पमुदूखलम् । चालनी वह्निमित्रा च स्थापनीया प्रयत्नतः ॥२०॥ दोलायन्त्रादिकानाञ्च सामग्रीं निखिलामपि । सुरक्षिते प्रदेशे तु स्थापयेद्भिषजाग्रणीः ॥२१॥ सुदृढा विविधाकाराः कूपिकाः काचनिर्मिताः । सपिधानाः सिद्धरसस्थापनाय समाहरेत् ॥२२॥ विविधानि सुरूपाणि पित्तलादि कृतानि च । मानयुक्तानि वै वैद्यस्तुलायन्त्राणि रचयेत् ॥२३॥ मसृणान्यतिनूतनानि कागदानि सितानि तु । रसौषधप्रदानार्थं प्रशस्यन्ते भिषग्वरैः ॥२४॥ वन्योत्पलानि काष्ठानि तुषादीनि तृणानि च । शिखित्रान् कोकिलांश्चापि रक्षयेद्भिषजां वरः ॥२५॥ यच्चान्यदुपयोगि स्याद् देशकालाद्यपेक्षया । तत्तत्संस्थापयेत्तत्र रसकर्मविशारदः ॥२६॥ प्रत्यहं कारयेद्धीमान् शालायां मार्जनादिकम् । भृत्यैः कर्मसु निष्णातैः सदाऽऽतङ्कनिवृत्तये ॥२७॥ प्रसङ्गादुपकरणद्रव्याणि -- द्रोणीरूपाः = नौकाकाराः, वर्तुलाः = गोलाः, तद् योग्याः खल्वसमानोपादानाः । सन्दंशिका वस्तुदृढग्रहणसाधनम् , चालनी औषधादिशोधनी "तितउ" इति ख्याता, वह्निमित्रा = मूषा, सुरक्षिते रजः- कृम्यादिवर्जिते, सपिधानाः यथायोगं कोमलकाष्ठकाचादिनिर्मितमुखावरणा- न्विताः, विविधानि लघूनि बृहन्ति च, मसृणानि = सुचिकणानि अतिनूतनानि, पुरातनानि विदीर्य्यन्ते, कागदानि सितानि मस्यादिसम्पर्करहितानि तथा च मुद्रितपत्रेष्वौषधं न्यस्तं विगुणीभवतीति । वन्योत्पलानि वने स्वयं शुष्काणि, शिखित्रः जलनिर्वापितं दग्धकाष्ठं, कोकिलः सबाष्परोधं निर्वापितमिति भेदः । "शिखित्राः पावकोच्छिष्टा अङ्गाराः कथिताः पुनः । कोकिलाश्चेतिताङ्गारा निर्वाणाः पयसा विना।।" इति रसरत्नसमुच्चयात् । अन्यदपि योग्यतानुसारमावश्यकं सुरा- प्रदीपादि । आतङ्कनिवृत्तये रोगपरिहारार्थम् । स्पष्टमन्यत् ॥ १८-२७ ॥ भा.टी.—रसशाला में निम्नलिखित उपकरण और समय समय पर यन्त्र

मूषा आदि बनाने की सामग्री भी रखनी चाहिये, पत्थर और लोहे के गोल और किश्तीनुमा खरल और उनकी मूसली और अनेक प्रकार के काँच, मिट्टी, लकड़ी, लोहादि धातुओं के बने हुए सँड़सी, कैंची, सूप, ऊखल, चलनी, मूषा और दोलायन्त्र आदि यन्त्रों को बनाने की सामग्री और बने हुए रस भस्म आदि को रखने के लिए मजबूत और डाटवाली काँच की शीशी। इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के धातुओं के बने हुए छोटे बड़े तराजू या काँटे, रसौषधि-वितरण करने के लिए पतले सफेद और बारीक चिकने कागज, जंगली उपलें, लकड़ी, भूसी, फूस, बुझे और अनबुझे कोयले। इसके अति- रिक्त देश काल आदि के अनुसार और भी जो जो उपयोगी चीजें हों उनका भी रसशाला में संग्रह करना चाहिये। इस प्रकार सब सामग्री से परिपूर्ण हुई रसशाला को प्रतिदिन सेवकों द्वारा झाड़ना-बुहारना चाहिए, जिसमें उससे अशुद्ध वायु धूल आदि द्वारा औषधियों में खराबी न आ जाय ॥१८-२७॥ वक्तव्य—उक्त रसशाला में प्रधान रूप से निम्न उपकरण भी होने चाहिये। पारद, उपरस, शंख, शुक्ति आदि जान्तवपदार्थ, विशिष्ट क्षार, सब प्रकार के नमक, जौ, अपामार्ग, पलाश, थोहर, इमली, तिल आदि से प्राप्त होनेवाले क्षार स्वर्ण आदि धातु-उपधातु, मिश्रलोह, महारत्न, क्षुद्ररत्न, विष, उपविष और भिन्न-भिन्न धातु आदि के शोधन-मारण में काम आनेवाली औषधियाँ तथा सुराप्रदीप कांच के प्याले, दृढ़ काँच की नलियाँ, सीसे के पात्र, सारक पत्र, वर्णपत्र, इसके अतिरिक्त गंधकद्राव को रखने के लिए मज- बूत काँच के डाटवाली नीलवर्ण काँच की शीशियाँ और कस्तूरी आदि सुगन्धित औषधियों के रखने के लिए काँच के डाटवाली सुन्दर शीशियाँ और छपे हुए या हाथ से लिखे हुए भिन्न-भिन्न औषधि नाम के लेबल होने चाहिये। गन्धकद्राव तथा विषैली औषधियों के लेबल विशेषरूप से लाल वर्ण के होने चाहिए जिससे इनको सावधानी से प्रयोग किया जाय, भिन्न-भिन्न रसौ- षधियों को शीशियों में भरकर उनके ऊपर अच्छी तरह लेबल लगा देना चाहिए। इसके अतिरिक्त रोगियों के घर जाकर देखनेवाले वैद्यों के लिए सुन्दर और रसौषधियों से भरी हुई शीशियों से युक्त एक करभेषजपेटिका होनी चाहिये। परिचारकलक्षणम् सोद्यमाः सत्यवक्तारो निर्लोभाः शुचयः परम्। शूराः पथ्याशिनो ग्राह्याः भिषग्भिः परिचारकाः ॥२८॥

प्रथमस्तरङ्गः ६ प्रसङ्गाद् योग्यपरिचारकलक्षणम्—पथ्याशिनः, अन्यथा रोगादिभिः कर्म- कालातिपातः ॥ २८ ॥ भा.टी.—रसशाला में काम करने के लिए रखे जानेवाले सेवक लोग, परिश्रमी, सत्यभाषी, निर्लोभ, साफ-सुथरे रहनेवाले, बलवान् और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह समझनेवाले होने चाहिए ॥ २८ ॥ रससिद्धानां नामपरिगणनम् श्रीशङ्करो भैरवश्च नन्दी स्वच्छन्दभैरवः । मन्थानभैरवः शम्भुर्ब्रह्मा विष्णुश्च भास्करः ॥२९॥ कापालिकश्च लङ्केशो ह्यगस्त्यो नरवाहनः । नागार्जुनो नरेन्द्रश्च काकचण्डीश्वराभिधः ॥३०॥ मत्तो माण्डव्यगोविन्दौ नागबोधिर्विशारदः । यशोधनो रत्नकोशो व्याडिर्गोरक्षनाथकः ॥३१॥ सुगृहीताभिधेयास्तु रससिद्धा इमे मताः । नामान्येतानि हि पठेत् प्रत्यहं रससिद्धये ॥३२॥ अथ रससिद्धानां नामपरिगणनं मङ्गलार्थं सम्प्रदायप्रवृत्तये च । सुगृहीता- भिधेयाः पुण्यश्लोकाः । सिद्धिश्च तादृशाऽदृष्टसंपत्त्या ॥ २९-३२ ॥ भा.टी.—पुरानी प्रथा के अनुसार निम्नलिखित नामवाले रसाचार्यों के नाम का जप उक्त रसशाला में होना चाहिए क्योंकि इन पवित्रात्माओं के नाम- कीर्तन से रस की सिद्धि होती है । रसाचार्यों के नाम ये हैं—श्री शंकर, भैरव, नन्दी, स्वच्छन्दभैरव, मन्थानभैरव, शम्भु, ब्रह्मा, विष्णु, भास्कर, कापा- लिक, लङ्केश, अगस्त्य, नरवाहन, नागार्जुन, नरेन्द्र, काकचंडीश्वर, मत्त, माण्डव्य, गोविन्द, नागबोधि, विशारद, यशोधन, रत्नकोश, व्याडि, गोरक्ष- नाथ आदि ॥ २९-३२ ॥ रसशास्त्राचार्यस्य स्वरूपम् सदाचारः सुचरितः समदर्शी सदाशयः । सत्यवादी सिद्धमन्त्रः सर्वदा शङ्करप्रियः ॥३३॥ धीरो वीरः स्थिरप्रज्ञो रसकर्मविचक्षणः । रसतन्त्रस्वतन्त्रो यः स आचार्यः प्रशस्यते ॥३४॥ “ततोऽनन्तरमाचार्यम्परीक्षेत” इति विमानस्थाने चरकस्मरणात् आचार्य-

१० रसतस्रङ्गिणी परीक्षोपयोगि रसशास्त्राचार्य्यस्वरूपमाह सदाचार इत्यादिना--सदाचारादयो गुणाः प्रभावत्त्वार्थं व्यवहारशुद्ध्यर्थञ्च, सिद्धमन्त्रः == आप्तमन्त्रसिद्धिः । रसत- न्त्रस्वतन्त्रः स्वतन्त्रप्रज्ञः नवनवरसतन्त्रनिर्माणकुशलः ॥३३, ३४॥ आ.टी.---रसशास्त्र को पढ़ानेवाला तथा क्रियात्मक ज्ञान करानेवाला आचार्य (गुरु) सदाचारी, सच्चरित्र, पक्षपातरहित,सद्भावयुक्त,सत्यवक्ता, मन्त्र- सिद्ध किया हुआ, शिव का परमभक्त, धैर्यवान् , बलवान् , स्थिरविचारवाला, पारद की जारणा-मारणादि क्रिया में अत्यन्त चतुर, विज्ञान विचार और अनुभव द्वारा नूतनरसशास्त्र रचने में भी प्रवीण श्रेष्ठ आचार्य कहा जाता है॥३३,३४॥ शिष्यस्य स्वरूपम् सदाशयः सदाचारः स्वकुलाचारदीक्षितः । गुरुपूजारतो वीरः सत्यवादी दृढव्रतः ॥३५॥ आज्ञापरो निरालस्यो कुलीनोऽतिविचक्षणः । आयुर्वेदकृताभ्यासः शिष्यः खलु प्रशस्यते ॥३६॥ सदाशयादयः शिष्यगुणाः शिष्यादृढताव्यवहाररक्षार्थाः। दृढव्रतः प्रतिज्ञा- पालकोऽतिविचक्षण ऊहापोहकुशलः ॥ ३५, ३६ ॥ आ.टी.---रसशास्त्र पढ़नेवाला शिष्य शुद्ध भाववाला, सदाचारी, अपने कुलाचार को जाननेवाला, गुरुपूजक, बलवान् , सत्यवक्ता, प्रतिज्ञा को पूरा करनेवाला, आज्ञापालक, निरालसी, कुलीन, अत्यन्त समझदार और रस- शास्त्र के अतिरिक्त आयुर्वेद का विद्वान् होना चाहिए ॥ ३५, ३६ ॥ शिष्योपनयने वर्जनीयाः दुराचारा दुश्चरिता अकुलीना महोद्धताः । चौर्यच्छलादिना नित्यं विद्याग्रहणलोलुपाः ॥३७॥ अज्ञातकुलशीला ये नास्तिका गुरुनिन्दकाः । शिष्योपनयने हेया नरा रसविशारदैः ॥३८॥ इति रसशालाविज्ञानीयो नाम प्रथमस्तरङ्गः । दुराचारादयः शिष्यदोषास्त्यागार्थाः, नास्तिकाः---“नास्तिको वर्ज्याना- मिति” चरकस्मरणात् , शिष्योपनयने शिष्यतास्वीकारकम्मैणि हेयाः वर्जनीयाः ॥ ३७, ३८ ॥ आ.टी.-रसशास्त्र के अध्यापक को दुराचारी, दुश्चरित्र, नीचकुलोत्पन्न, नम्रतारहित, चोरी और छल से विद्या ग्रहण करनेवाला, जिसके स्वभाव और

द्वितीयस्तरङ्गः ११ कुल का पता न हो ऐसा और नास्तिक तथा गुरु की निन्दा करनेवाला शिष्य विद्या पढ़ाने में स्वीकार नहीं करना चाहिये ॥ ३७, ३८ ॥ रसशालाविज्ञानीय नामक प्रथम तरङ्ग समाप्त हुआ । —:०:— अथ परिभाषाविज्ञानीयो द्वितीयस्तरङ्गः परिभाषाविज्ञानफलम् परिभाषाध्यायमादौ योऽधीते रससाधकः । रसतन्त्रार्थविज्ञाने न स मुह्यति कुत्रचित् ॥१॥ स्पष्टम् ॥ १ ॥ भा.टी.--जो रससाधक वैद्य रसनिर्माण करने के पूर्व रसशास्त्र की परि- भाषा को अपने अध्यापकों से अच्छी तरह पढ़ लेता है उसे रसशास्त्र के अर्थज्ञान में कहीं भी कठिनाई नहीं आती है। अतः परिभाषाज्ञान अत्यावश्यक है ॥१॥ परिभाषालक्षणम् निगूढानुक्तलेशोक्तसन्दिग्धार्थप्रदीपिका । सुनिश्चितार्था विबुधैः परिभाषा निगद्यते ॥२॥ स्पष्टम् ॥ २ ॥ भा.टी.—जिस संक्षिप्त और सांकेतिक शब्द द्वारा शास्त्र के गुप्त अप्रकट अथवा किञ्चित् प्रकट तथा सन्दिग्ध भाव या अर्थ का स्पष्ट और निश्चित अर्थ ( मतलब ) प्राप्त हो उसे परिभाषा कहते हैं ॥ २ ॥ लवणपञ्चकम् सैन्धवञ्चाथ सामुद्रं बिडं सौवर्चलं तथा । रोमकञ्चेति विज्ञेयं बुधैर्लवणपञ्चकम् ।.३॥ बिडसौवर्चले कृत्रिमे ॥ ३ ॥ भा.टी.—सैन्धानमक, समुद्रनमक, विडनमक, सौंचलनमक, रोमक (रेह) नमक, इन पाँच नमकों को लवणपंचक नाम से कहा जाता है ॥ ३ ॥ लवणत्रिकम् सिन्धुजं रुचकं पाक्यमेतत् त्रिज्रवणं स्मृतम् । प्रकीर्तितञ्च लवणत्रिकं वा लवणत्रयम् ॥४॥ रुचकं सौवर्चलम् , पाक्यं विडम् ॥ ४ ॥

१२ रसतरङ्गिणी आ.टी.—सैन्धा, सौंचल और विडनमक को त्रिलवण, लवणत्रिक या लवणत्रय नाम से कहा जाता है ॥ ४ ॥ सैन्धवस्य मुख्यत्वम् तत्रापि सैन्धवं मुख्यं विद्वद्भिः परिकीर्तितम् । उक्ते लवणसामान्ये सैन्धवं विनियोजयेत् ॥५॥ मुख्यं नेत्र्यत्वाद् बहुगुणवत्त्वाच्च ॥५॥ भा.टी.--यद्यपि औषधि-प्रयोग में पाँचों नमक काम में आते हैं परन्तु इनमें सैन्धानमक मुख्य माना जाता है । अतः जहाँ पर केवल लवण शब्द लिखा हो वहाँ सैन्धानमक ही लेना चाहिये ॥ ५ ॥ क्षारद्वयं क्षारत्रिकञ्च स्वर्ज्जिक्षारो यवक्षारः क्षारद्वयमुदाहृतम् । सौभाग्येन समायुक्तं क्षारत्रिकमुदाहृतम् ॥६॥ क्षारपञ्चकम् मुष्कक्षारो यवक्षारः किंशुकक्षार एव च । स्वर्ज्जिक्षारस्तिलक्षारः क्षारपञ्चकमुच्यते ॥७॥ किंशुकक्षारः = पलाशक्षारः ॥ ६, ७ ॥ भा.टी.-सजीखार और जवाखार को क्षारद्वय शब्द से कहा जाता है । इन दोनों के साथ सुहागा भी हो तो इसको क्षारत्रिक शब्द से कहा जाता है ॥६॥ पाढल क्षार, जवाखार, ढाकक्षार, सजीखार और तिलक्षार को क्षार- पंचक शब्द से कहा जाता है ॥ ७ ॥ क्षाराष्टकम् सुधापलाशशिखरचिञ्चार्कतिलनालजाः । स्वर्जिका यावशूकश्च क्षाराष्टकमुदाहृतम् ॥८॥ सुधा स्नुही, शिखरी अपामार्गः ॥ ८ ॥ भा.टी.--थोहर, ढाक, अपामार्ग, इमली, आक, तिल के डंठल के क्षार, सजीखार और जवाखार को क्षाराष्टक शब्द से कहा जाता है ॥ ८ ॥ मूत्राष्टकम् सैरिभाजाविकरभगोखरद्विपवाजिनाम् । मूत्राणीति भिषग्वर्यैर्मूत्राष्टकमुदाहृतम् ॥६॥ खरेभोष्ट्रतुरङ्गाणां पुंसां मूत्रं प्रशस्यते ।

द्वितीयस्तरङ्गः १३ गोजाविमहिषीणाञ्च मूत्रं स्त्रीणां हितं मतम् ॥१०॥ निखिलेष्वपि मूत्रेषु गोमूत्रं गुणवत्तमम् । अतो विशेषानुक्तौ तु गोमूत्रं विनियोजयेत् ॥११॥ सैरिभी महिषी, करभः = उष्ट्रः, द्विपः = हस्ती ॥ ६-११ ॥ भा.टी.—भैंस, बकरी, भेड़, ऊँट, गाय, गधा, हाथी और घोड़े के मूत्रों को मूत्राष्टक शब्द से कहा जाता है। इनमें से गधा, हाथी, ऊँट और घोड़े का पुरुष जाति का मूत्र और गाय, बकरी, भेड़ और भैंस का मूत्र लेना हो तो स्त्री जाति का मूत्र लेना चाहिये । सब मूत्रों में गोमूत्र विशेष गुणवाला होता है अतः जहाँ किसी विशेष मूत्र का वर्णन न हो किन्तु केवल मूत्र शब्द ही लिखा हो तो वहाँ पर गोमूत्र का ही प्रयोग करना चाहिये । कहीं-कहीं मनुष्य- मूत्र का भी प्रयोग होता है ॥ ६-११ ॥ गोर्वरम् गोखुरैस्ताडितं गोष्ठे शुष्कं चूर्णोपमञ्च यत् । गोमयं तत्समाख्यातं बुधैर्गोर्वरसंज्ञकम् ॥१२॥ गोष्ठे = गोनिवासस्थले ॥ १२ ॥ भा.टी.--गोशाला या गाय बाँधने की जगह में गाय के खुरों से पिच- कर टूट-टूट करके सूखने के बाद मोटे चूर्ण के समान हुए गोबर को गोमय या गोर्वर शब्द से कहा जाता है ॥ १२ ॥ अम्लवर्गः जम्बीरं निम्बुकञ्चैव त्वम्लवेतसमम्लिका । नारङ्गं दाडिमञ्चैव वृक्षाम्लं बीजपूरकम् ॥१३॥ चाङ्गेरी चणकाम्लञ्च कर्कन्धुः करमर्दकः । चुक्रिका चेति सामान्यादम्लवर्गः प्रकीर्तितः ॥१४॥ वृक्षाम्लं = तिन्तिडीकम् , कर्कन्धुः = बदरीफलम् , चुक्रिका "चूका" इति ख्याता ॥ १३, १४ ॥ भा.टी.—जम्बीरी नींबू, कागजी नींबू, अमलवेत, इमली, नारंगी, दाड़िम, विषांविल, बिजौरा नींबू, चने का क्षार, खट्टा बेर, करौंदा और चूका; इन सब को सामान्यरूप से "अम्लवर्ग" के नाम से लिया जाता है । अर्थात् जहाँ कहीं अम्लवर्ग से मर्दन भावना आदि लिखा हो इन द्रव्यों के रस को लेना चाहिये ॥ १३, १४ ॥

१४ रसतरङ्गिणी अम्लपञ्चकम् अम्लवेतसजम्बीरलुङ्गनारङ्गनिम्बुकैः । फलपञ्चाम्लकं ख्यातं कीर्तितञ्चाम्लपञ्चकम् ॥१५॥ अपरमम्लपञ्चकम् कोलदाडिमवृक्षाम्लचाङ्गेरीचिञ्चिकारसैः । पञ्चाम्लकं समाख्यातं त्वम्लपञ्चकमेव च ॥१६॥ सर्वेषामम्लजातीनां निम्बूकं गुणवत्तरम् । अम्लवेतसकं वापि त्वम्लिका वा गुणाधिका ॥१७॥ लुङ्गं = मातुलुङ्गम् ॥ १५-१७ ॥ आ.टी.-अमलवेत, जम्भौरी नींबू, बिजौरा नींबू, नारंगी और कागजी नींबू को पञ्चाम्लक या अम्लपञ्चक शब्द से कहा जाता है ॥ १५ ॥ बेर (खट्टा), दाड़िम, वृक्षाम्ल, चांगेरी, इमली, इनके रसों को भी पञ्चाम्लक या अम्लपञ्चक शब्द से कहा जाता है । सब प्रकार के अम्लद्रव्यों में कागजी नींबू विशेष गुणयुक्त होता है । अथवा अमलवेत या इमली भी अन्यों की अपेक्षा अधिक गुणवाली होती हैं ॥ १६, १७ ॥ पञ्चतिक्तकम् गूडूची निम्बमूलत्वक् भिषङ्माता निदिग्धिका । पटोलपत्रमित्येतत् पञ्चतिक्तं प्रकीर्तितम् ॥ १८ ॥ भिषङ्माता = वासकः, निदिग्धिका क्षुद्रभण्टाकी ॥ १८ ॥ आ.टी.--गिलोय, नीम की जड़ की छाल, अडूसा, छोटी कटैली और पटोलपत्र, इन पाँच द्रव्यों को पञ्चतिक्त शब्द से ग्रहण किया जाता है ॥१८॥ पञ्चमृत्तिकाः इष्टिकाचूर्णांकं भस्म तथा वल्मीकमृत्तिका । गैरिकं लवणञ्चेति कीर्तिताः पञ्चमृत्तिकाः ॥१९॥ इष्टिकाचूर्णं = पक्वेष्टिकाच्छोदः ॥ १९ ॥ भा.टी.-ईंट का चूर्ण, साधारण घर की राख, बाँबी की मिट्टी, गेरी और नमक इन पाँच द्रव्यों को पञ्चमृत्तिका (मिट्टी) शब्द से लिया जाता है ॥१९॥ मधुरत्रिकम् आज्यं गुडो माक्षिकञ्च विज्ञेयं मधुरत्रिकम् । मतं त्रिमधुरुञ्चापि तथैव मधुरत्रयम् ॥ २० ॥

द्वितीयस्तरङ्गः १५ आज्यं = घृतम् ॥ २० ॥ आ.टी.--घी, गुड़ और शहद इन तीन द्रव्यों को मधुरत्रिक, त्रिमधुर या मधुरत्रय शब्द से ग्रहण किया जाता है ॥ २० ॥ पञ्चामृतम् गव्यं क्षीरं दधि घृतं माक्षिकञ्चाथ शर्करा । पञ्चामृतं समाख्यातं रसकर्मप्रसाधकम् ॥२१॥ पञ्चगव्यम् गव्यं क्षीरं दधि घृतं गोमूत्रं गोमयं तथा । एकत्र योजितं तुल्यं पञ्चगव्यमिहोच्यते ॥२२॥ दधिघृतेऽपि गव्ये ग्राह्ये ॥ २१-२२ ॥ आ.टी.--गाय का दूध, घृत और दही, शहद और शर्करा (खाँड़) को पञ्चामृत शब्द से लिया जाता है । इसके द्वारा रसों के अनेक प्रकार के कार्य सिद्ध होते हैं ॥ २१ ॥ गाय के दूध, दही, घृत, गोमूत्र और गोबर के रस को एकत्र मिलाने पर इसे पञ्चगव्य शब्द से लिया जाता है ॥ २२ ॥ क्षीरत्रयम् रविशीरं वटक्षीरं स्नुहीक्षीरन्तथैव च । क्षीरत्रयमिति ख्यातं मारणादौ प्रशस्यते ॥२३॥ रविशीरं अर्कदुग्धम् ॥ २३ ॥ आ.टी.--आक का दूध, बड़ का दूध, थोंहर का दूध, इन तीनों को एकत्र मिलाकर ग्रहण करने को क्षीरत्रय कहा जाता है । यह क्षीरत्रय धातु आदि के शोधन-मारण में विशेषरूप से काम आता है ॥२३॥ दुग्धवर्गः करिणी घोटिका धेनुस्त्वविका छागिकोष्ट्रिका । महिषी गर्दभी नारी काकोदुम्बरिका सुधा ॥२४॥ दुग्धिकोदुम्बरश्चार्को न्यग्रोधोऽश्वत्थतिल्वकौ । एषां दुग्धैःसमाख्यातो दुग्धवर्गः समासतः ॥२५॥ करिणीतो नारीपर्यन्तं जङ्गमवर्गः, काकोदुम्बरिकातस्तिल्वकपर्यन्तं स्थावर- वर्गः उभयग्रहणं तन्त्रानुरोधात् । तिल्वको लोध्रः ॥ २४-२५ ॥ भा.टी.--हथिनी, घोड़ी, गाय, भेड़, बकरी, ऊँटनी, भैंस, गधी, स्त्री,

१६ रसतरङ्गिणी कठूमर, थोहर, दूधी, गूलर, आक, बड़, पीपल और लोध, इनके दूध को दुग्ध- वर्ग शब्द से लिया जाता है । इनमें हथिनो से स्त्री-पर्यन्त दूध को जंगम दूध और कठूमर से लोध-पर्यन्त दूध को स्थावरदुग्ध कहा जाता है ॥ २४, २५ ॥ तैलवर्गः तिलसर्षपकोन्मत्तभल्लातैरण्डनिम्बजैः । उमादीनाञ्च तैलैस्तु तैलवर्गोऽत्र सम्मतः ॥२६॥ उन्मत्तः धत्तूरः । उमा अतसी ॥ २६ ॥ भा.टी.--तिल, सरसों, धतूरा, भिलावा, एरण्ड, नीम के बीज, जयपाल- बीज, दन्तीबीज, कुसुमभबीज और अलसी आदि के तैलों को तैलवर्ग में लिया जाता है ॥ २६ ॥ कज्जलीस्वरूपम् निर्द्रवैर्धातुभिश्चाथ गन्धादिभिः पेषितः पारदः श्लक्ष्णतां प्रापितः । कज्जलाभो यदा जायतेऽसौ तदा नामतः कोविदैः कज्जलीत्युच्यते ॥२७॥ कज्जली कज्जलञ्चैव मता कज्जलिका च सा । रससम्पादनादौ च विशेषात्सा विधीयते ॥२८॥ रसपङ्कस्य लक्षणम् सद्रवैर्गन्धकाद्यैश्च धातुभिः पेषितो रसः । सुश्लक्ष्णः पङ्कसङ्काशो रसपङ्क इति स्मृतः ॥२९॥ पिष्टिका सूतं विमर्द्य गन्धेन दुग्धाद्यैस्तु द्रवैस्तथा । पेषणात् पिष्टतां नीता मता पिष्टी च पिष्टिका ॥३०॥ हिङ्गुलाकृष्ट रसः ऊर्ध्वपातनयन्त्रेण हिङ्गुलादुत्थितो रसः । हिङ्गुलोत्थः स्मृतश्चैव हिङ्गुलाकृष्ट उच्यते ॥३१॥ निर्द्रवैरित्यारभ्य हिङ्गुलाकृष्ट उच्यत इति पर्यन्तं सुगमम् ॥ २७-३१ ॥ भा.टी.-पारद को गन्धक आदि उपरस द्रव्यों के साथ अथवा किसी धातु के साथ बिना द्रव (पतला, जल, कषाय, रस) योग के ही अच्छी तरह मर्दन कर चिकना चमकीला करके कज्जल के सदृश काला कर लिया जाय तो उसे विद्वान्

२ द्वितीयस्तरङ्गः १७ लोग कजली कहते हैं। इस कजली को कजल और कजलिका भी कहा जाता है पारद गन्धक की कज्जली विशेष रूप से अनेक प्रकार के रसों के बनाने तथा धातुओंके मारण में काम आती है ॥ २७-२८ ॥ पारद को गन्धक आदि उपरस अथवा धातु के साथ किसी द्रव के सहारे अच्छी तरह मर्दन करके चिकना चमकीला लेसदार कीचड़ के समान कल्क जैसा बना लेना रसपंक कहा जाता है ॥ २९ ॥ पारद में गन्धक मिलाकर दूध आदि किसी पतली चीज के साथ अच्छा तरह मर्दन करके पीठी-सी बना लेना रसपिष्टिका या पारदपिष्टी कहा जाता है ॥ ३० ॥ सिंगरफ को नींबू के रस आदि में घोट सुखाकर ऊर्ध्वपातन यन्त्र में बंद करके ऊपर उड़ा लेने से निकाला हुआ पारा, हिंगुलोत्थ पारद या हिंगुलाकृष्ट पारद कहा जाता है। इसकी विधि आगे लिखी जायगी ॥ ३१ ॥ धातुसत्त्वलक्षणम् कोष्ठ्यां ध्मातस्य वज्रादेर्द्वावकोषधिभिः समम् । सारो यो निर्गतः सोऽत्र सत्त्वमित्यभिधीयते ॥३२॥ वनौषधिसत्त्वलक्षणम् वाष्पस्वेदनयन्त्रेण वनौषधिसमुद्भवः । सारः सत्त्वमिति प्रोक्तं रसतन्त्रविचक्षणैः ॥३३॥ द्रावकौषधिभिर्वर्द्ध्यमाणैर्गुडगुग्गुल्वादिभिः ॥ ३२-३३ ॥ भा.टी.—हीरा अभ्रक आदि द्रव्यों को आगे लिखी हुई द्रावक गण की औषधियों के साथ घोटकर भट्ठी में रख तपाने से जो उनका सार भाग पदार्थ प्राप्त होता है उसे उस वस्तु का सार या सत्त्व कहा जाता है ॥ ३२ ॥ बाष्पस्वेदन यन्त्र द्वारा वनौषधियों का जो सार भाग प्राप्त होता है उसे रस-शास्त्रज्ञ, विद्वान् सत्त्व कहते हैं ॥ ३३ ॥ सिक्थतैलस्य लक्षणम् सिक्थकं तिलतैलञ्च युक्तमानविमिश्रितम् । विपक्वं नबनोताभं सिक्थतैलं प्रकीर्तितम् ॥ ३४ ॥ सिक्थकं मधूच्छिष्टम् , युक्तमानविमिश्रितमिति मूर्च्छनाविज्ञानीयांकप्रमाणेन विमिश्रितम् ॥ ३४ ॥ भा.टी.—मोम और तिलों के तैल को आवश्यकतानुसार योग्य मान में

१८ रसतरङ्गिणी मिलाकर अग्नि पर रखकर पका लेने पर जब वह मक्खन के सदृश कोमल और गाढ़ा हो जाय तो उसे सिक्थतैल कहते हैं ॥ ३४ ॥ वक्तव्य—उक्त दोनों तैलों को अग्नि पर रखकर पकावें, जब मोम पिघलकर तैल में मिल जाय तो उसे उतार लें । ठंडा होने पर यह तैल मक्खन के समान गाढ़ा और कोमल होता है । द्रावको गणः गुञ्जा मधु गुडः सर्पिः सौभाग्यं गुग्गुलुस्तथा । पूर्वाचार्यैः कीर्तितोऽयं धातूनां द्रावको गणः ॥३५॥ भा.टी.—रत्ती, शहद, गुड़, घृत, सुहागा और गूगल को प्राचीन आचार्यों ने धातुद्रावकगण माना है ॥ ३५ ॥ ढालनम् संद्रावितस्य द्रव्यस्य द्रवे निक्षेपणन्तु यत् । ढालनं तत्समुद्दिष्टं रसकर्मविशारदैः ॥३६॥ भा.टी.—किसी सोना चाँदी आदि द्रव्य को अग्नि में पिघलाकर किसी क्वाथ स्वरस दूध आदि द्रव्य में डाल देने को रसशास्त्र में ढालन शब्द से कहा जाता है ॥ ३६ ॥ मित्रपञ्चकम् आज्यं गुञ्जाथ सौभाग्यं क्षौद्रं च पुरसंज्ञकम् । एतत्तु मिलितं विज्ञैर्मित्रपञ्चकमुच्यते ॥ ३७ ॥ विविधानां तु लोहानां द्रावणाय विशेषतः । रसतन्त्रविशेषज्ञैर्युज्यते मित्रपञ्चकम् ॥ ३८ ॥ पुरसंज्ञकं गुग्गुलुः ॥ ३७, ३८ ॥ भा.टी.—घी, रत्ती, सुहागा,शहद और गूगल को एकत्र मिलाकर ग्रहण करने को मित्रपञ्चक शब्द से लिया जाता है । विभिन्न प्रकार के धातुओं को पिघलाने के लिए रसशास्त्र में मित्रपञ्चक का प्रयोग होता है ॥३७-३८॥ वक्तव्य—मित्रपञ्चक द्वारा धातुओं का द्रावण भी किया जाता है । इसके द्वारा धातुओं की कच्ची बनी हुई भस्मों की भी परीक्षा हो जाती है । आवापलक्षणम् द्रव्यान्तरविनिक्षेपो द्रुते वङ्गादिके तु यः । क्रियते स प्रतीवाप आवापश्च निगद्यते ॥ ३६ ॥

द्वितीयस्तरङ्गः १६ निर्वापलक्षणम् धात्वादेर्वह्नितप्तस्य जलादौ यन्निषेचनम्। स निर्वापः स्मृतश्चापि निषेकः स्नपनञ्च तत् ॥४०॥ द्रव्यानन्तरस्य अश्वत्थकल्कचूर्णादेः ॥ ३६, ४० ॥ भा.टी.—किसी पिघलनेवाली वंग आदि धातु को पिघलाकर उसमें किसी अन्य द्रव्य डालने को प्रतीवाप अथवा आवाप कहा जाता है ॥३६॥ किसी लोहा, ताँबा, चाँदी आदि धातु को अग्नि में तपाकर जल अथवा मट्ठा, दूध, क्वाथ आदि में डालने या बुझाने को निर्वाप, निषेक अथवा स्नपन शब्द से कहा जाता है ॥ ४० ॥ वक्तव्य—यह आवाप, जब वंग या सीसे की भस्म करते हैं तो उसे पिघलाकर पिघली हुई अवस्था में थोड़ा करके हल्दी, अपामार्गचूर्ण, इमली- छालचूर्ण को डालते हैं जिससे वंगादि की भस्म हो जाती है । शुद्धावर्तलक्षणम् यदा तु ज्वलनो ज्वालाकुलः शुक्लसमुत्थितः। सत्त्वनिर्गमकालः स शुद्धावर्त इति स्मृतः ॥४१॥ ज्वलनोऽग्निः, शुक्लसमुत्थितः शुक्लवर्णज्वालायुक्तः । सत्त्वनिर्गमकालः स इति तदानीं वह्नितीव्रतासद्भावात् ॥४१॥ भा.टी.—जब किसी अभ्रक आदि द्रव्य को सत्त्व निकालने के लिये भट्ठी में रखते और अग्नि तेज करते हैं तब अग्नि एक बार बहुत तेज होकर सफेद ज्वालावाली हो जाती है तो उसे शुद्धावर्त कहते हैं ॥ ४१ ॥ वक्तव्य—अग्नि के इसी अवस्था में आने पर धातु का सत्त्व-पतन होने लगता है । पर्पटीस्वरूपम् संद्राविता कज्जलिकाग्नियोगात् रम्भापलाशे चिपिटीकृता च । रसागमकैः खलु पर्पटी सा प्रकीर्तिता पर्पटिका च सैव ॥४२॥ रम्भापलाशे कदलीपत्रे ॥ ४२ ॥ भा.टी.—पारद गन्धक की कज्जली को किसी लोह आदि धातु के पात्र में रख अग्नि में पिघला करके केले के पत्ते पर डालकर दूसरे केले के पत्ते से दबाकर चपटी पपड़ी सी बना लेने को पर्पटी या पर्पटिका कहते हैं ॥४२॥

२० रसतरङ्गिणी वक्तव्य—पर्पटी बनाने में पिघले हुए द्रव्य को गोबर के ऊपर रखे हुए केले के पत्ते पर डालकर दूसरे पत्ते से दबाकर पपड़ी बनायी जाती है। ताडनम् यत् श्लिष्टलोहयोरेकतरस्य परिणाशनम्। अपरस्य च लोहस्य भवेच्च परिसाधनम् ॥४३॥ आध्मानाद् वङ्कनालेन ताडनं तदिहोच्यते । सञ्जातताडनं लोहं ताडितं परिकीर्तितम् ॥४४॥ भा.टी.—आपस में मिले हुए दो धातुओं में से एक धातु को नष्ट करने और दूसरे धातु को शुद्ध रूप में प्राप्त करने के लिए मिश्रित धातु को अग्नि में रखकर आगे लिखे हुए वंकनाल द्वारा तीव्र रूप में तपाने को ताड़न कहा जाता है। इस ताड़न क्रिया से प्राप्त लोह को ताड़ित लोह कहा जाता है ॥ ४३–४४ ॥ घोषाकृष्टं ताम्रम् ताडितं वङ्कनालेन सौषधं घोषकं यदा । स्यान्मुक्तवङ्गं तत्ताम्रं घोषाकृष्टमिहोच्यते ॥ ४५ ॥ घोषः कांस्यम्, मुक्तवङ्गं वङ्गविहीनम् ॥ ४५ ॥ भा.टी.—कांसे में होनेवाले राँगा को उससे पृथक् करनेवाली औष- धियों के साथ मिला वंकनाल द्वारा तीव्र अग्नि से तपाने पर जो वंगरहित ताँबा प्राप्त होता है उसे घोषाकृष्ट ताम्र कहते हैं ॥ ४५ ॥ वक्तव्य—इसी विधि से अन्य मिश्रित धातुओं में से एक धातु को प्राप्त किया जाता है, जिस धातु से किसी धातु को पृथक् किया जाता है उसे उस धातु से पृथक्कृत धातु कहा जाता है। जैसे तांबे से अलग किये स्वर्ण को ताम्राकृष्ट स्वर्ण कहेंगे। वङ्कनालम् करप्रमाणं यन्नालं पित्तलादिविनिर्मितम् । वह्नौ फूत्कारदानाय वङ्कनालं तदुच्यते ॥ ४६ ॥ स्वाङ्गशीतस्य लक्षणम् ज्वलनस्थितमेवेह शीतलत्वमुपैति यत् । स्वाङ्गशीतं तदुद्दिष्टं स्वतःशीतञ्च तन्मतम् ॥ ४७ ॥

द्वितीयस्तरङ्गः २१ बहिःशीतलक्षणम् वह्नेर्बहिः समानीय यद् द्रव्यं याति शीतताम्। बहिःशीतं तदुद्दिष्टं बाह्यशीतञ्च तन्मतम् ॥ ४८ ॥ भावनालक्षणम् यच्चूर्णितस्य धात्वादेर्द्रवैः सम्पेष्य शोषणम्। भावनं तन्मतं विज्ञैर्भावना च निगद्यते ॥ ४६ ॥ वङ्कनालं स्वर्णकाराद्युपयुज्यमानमेकतः सूक्ष्मेणापरतश्च विस्तृतेन मुखेनो- पलक्षितं नलिकाकारं फूत्कारदानयन्त्रम् ॥ ४६–४६ ॥ भा. टी.—पीतल आदि धातु की बनी हुई एक हाथ लंबी नली को जिससे अग्नि को तेज करने के लिए फूँक मारी जाती है, वङ्कनाल या वक्त्रनाल कहा जाता है ॥ ४६ ॥ किसी धातु आदि को संपुट में बन्द करके पुट में फूँकने पर अग्नि के बिलकुल शान्त होने पर निकालने को स्वांगशीत कहते हैं। इसी को स्वतः शीत भी कहा जाता है ॥ ४७ ॥ किसी वस्तु को अग्नि में पकाकर उसी समय गरम अवस्था में अग्नि में से बाहर निकालकर ठंडा करने को बहिःशीत या बाह्यशीत शब्द से कहा जाता है ॥ ४८ ॥ किसी धातु आदि औषधि के चूर्ण को जल, क्वाथ, स्वरस आदि द्रव पदार्थ से पीस कर सुखाने को भावन या भावना कहा जाता है ॥ ४६ ॥ वक्तव्य—स्वर्ण आदि धातु को अग्नि पर रखकर पिघलाने के लिए सोनार लोग जिस नली से फूँक मारकर अग्नि तेज करते हैं उसे वङ्कनाल समझना चाहिए। यह नली एक तरफ बहुत पतली और दूसरे मुख की तरफ चौड़ी गोल होती है। इसके भी दो भेद होते हैं एक का मुख सीधा होता है किन्तु दूसरे प्रकार की नली का मुख पतली तरफ से कुछ टेढ़ा होता है। भावनायां द्रवपरिमाणम् द्रवेण यावता द्रव्यं चूर्णितं त्वार्द्रतां व्रजेत्। तावानेव द्रवो देयो भिषग्भिर्भावनाविधौ ॥ ५० ॥ भाव्यद्रव्यमितः क्वाथ्यो जलमष्टगुणं ततः। वस्वंशशोषितः क्वाथो देयः क्वाथेन भावने ॥ ५१ ॥

२२ रसतरङ्गिणी ऽस्वंशशोषितः अष्टमांशावशेषितः। प्रसङ्गात् सुभावितदुर्भावितयोः स्वरूपम्- “पेष्यमाणञ्च यद् द्रव्यं चिपिटीभूय चूर्णताम्। याति मार्दवयुक्तन्तत् सुभावितमु- दाहृतम्॥ यत् पिष्टं सहसा दीर्णं खरस्पर्शन्न कोमलम्। तद्दुर्भावितमित्युक्तं भावनावेदिभिर्जनैः” इति॥ ५०, ५१॥ भा.टी.—किसी चूर्ण रूप औषधि को भावना देनी हो तो उसमें उतना द्रव (पतला) पदार्थ डालना चाहिए जिससे वह चूर्ण गीला लुगदी की तरह हो जाय, यदि किसी औषधि के क्वाथ की भावना देनी हो तो चूर्ण रूप औषधि के बराबर भाग क्वाथ की औषधि लेकर उसको जौकुट करके उसमें अठगुणा जल डालकर पकायें, जब जल आठवाँ भाग शेष रहे तो उसे छान कर क्वाथ को चूर्ण रूप औषधि में डाल दें॥ ५०, ५१॥ शोधनम् उद्दिष्टैरौषधैः सार्द्धं क्रियते पेषणादिकम् । मलविच्छित्तये यत्तु शोधनं तदिहोच्यते॥ ५२॥ आदिपदेन स्वेदनक्षालनादि ग्राह्यम्, मलविच्छित्तये मलनाशाय॥५२॥ भा.टी.—किसी धातु आदि द्रव्य के मल (खराबी, दोष, विष) को दूर करने के लिए उसके शोधन के निमित्त लिखी हुई औषधि के साथ मिलाकर मर्दन, क्षालन, या निर्वापण आदि कर्म करना शोधन कहा जाता है ॥५२॥ वारितरलक्षणम् मृतं लोहं विनििक्षिप्तं यदा तरति वारिणि । रसन्त्रसुनिष्णातैस्तद् वारितरमीरितम्॥ ५३॥ वारितरमिति—अत्रेदवधेयम्—वारितरत्वमेव लोहमृतेर्न निश्चितं लक्षणं व्यभिचारात्, तथा हि दरदयोगमृतस्य शतधा पुटितस्यापि लोहस्य न क्वचिद् वारितरत्वमवलोकितचरम्, क्वचिच्च जम्बूफलादिरसपुटितस्याल्पपुटेब्वपि वारितरत्वमायातीति तस्माद् वारितरत्वं लोहमृतेर्न व्यापकं लक्षणम्। अपरत्र तु दरदादिपुटितस्यापि घृतादिनाऽमृतीकरणात् वारितरतागोधूमादिकणतार- कत्वञ्चावलोक्यते॥ ५३॥ भा.टी.—यदि किसी धातु की भस्म निस्तरंग जल में डालने से ऊपर तैरती है तो उसे वारितर लोहभस्म कहते हैं॥ ५३॥ मृतलोहम् तर्जन्यङ्गुष्ठसंघृष्टं विशेद्रेखान्तरं तु यत्। निविष्टञ्च बहिर्नैति मृतलोहं तदुच्यते ॥ ५४॥