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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

एकोनविंशस्तरङ्गः ४७१ प्रसङ्गात् सुतीव्रकाञ्जिकाम्लस्य निर्माणप्रकारः अत्यम्लं निर्मलं शुक्तं गृहनीरमथापि वा । समाहरेद्भिषग्वर्यो रससेरकसंमितम् ॥ ७६ ॥ काचलिप्ते तु मृत्पात्रे नाडिकायन्त्रयोगतः । पचेन्मन्दांग्निना तावत्पञ्चसेरकसंमितम् ॥ ७७ ॥ यावत्तु गृहनीरस्थं जलांशं न परिस्रवेत् । परिस्रुताम्बुसन्त्यक्तं जायते तीव्रकाञ्जिकम् ॥ ७८ ॥ प्रासंगिकः सुतीव्राम्लकाञ्जिकनिर्माणप्रकारः—गृहनीरं काञ्जिकं रससेरकं षट्- सेरकम्, नाडिकायन्त्रमर्कनिष्कासनयन्त्रम्। ५ सेरकं परिस्रुतं च तस्माज्जलं त्याज्यम्। एवं सति प्रभूतजलभागापनयात् सुतीव्रता भवति काञ्जिकस्येति ॥ ७६-७८ ॥ भा.टी.—छः सेर अत्यन्त खट्टा और साफ सिरका अथवा काञ्जी लें । अब इस काञ्जी या सिरके को एक कांचलिप्त मिट्टी के भभके में डालकर चूल्हे पर चढ़ा दें । इसी भभके में अर्क निकालने की विधि के अनुसार नली भी जोड़ दें । अब इसके नीचे मन्द अग्नि तब तक देते रहें जब तक कि नली से पाँच सेर जल उड़कर निकल आये । पाँच सेर जल उड़कर निकलने के बाद अव- शिष्ट एक सेर काञ्जी या सिरका बहुत तीव्र होता है । इसी को तीव्रकाञ्जिकाम्ल कहते हैं ॥ ७६-७८ ॥ अथ सजलारनालीयक्सीसद्रवस्य निर्माणप्रकारः आरनालीयकाहेस्तु द्रवे शुभ्रांशुभागिके । निक्षिपेद्रसतन्त्रज्ञस्तन्मितां निर्मलां सुराम् ॥ ७९ ॥ परिस्रुतं तु सलिलं शुद्धं वस्वश्वभागिकम् । दत्त्वा सम्मेलयेद्वैद्यः काचकुप्यां निधापयेत् ॥ ८० ॥ अयमेव समाख्यातो रसायनविचक्षणैः । द्रवः खलु ससलिलः काञ्जिकीयकसीसजः ॥ ८१ ॥ शुभ्रांशुभागिके इति शुभ्रांशुश्चंद्रः, तस्मादेकभागिके इति सम्पन्नम्, तन्मिता- मेकभागम्, वसवोऽष्टौ अश्वाश्च सप्त वामतोगतिन्यायात् ७८ भागिकमिति निष्पन्नम् ॥ ७६-८१ ॥ भा.टी.—एक भाग आरनालीय सीसकद्रव में उतनी ही निर्मल सुरा और अठहत्तर ७८ भाग शुद्ध परिस्रुत जल मिलाकर एक काँच की बोतल में रख लें । इसी को सजल आरनालीय सीसक द्रव कहते हैं ॥ ७६-८१ ॥

४७२ | रसतरङ्गिणी अथ सजलारनालीयणसीसकद्रवस्य प्रयोगक्रमः आरनालीयकाह्वत्थं द्रवन्तु सकलं भिषक् । सलिले सप्तगुणिते सम्मेल्य विनियोजयेत् ॥ ८२ ॥ अस्य च प्रयोगसमये भूयः सप्तगुणं जलमेलनं विधेयमिति ॥ ८२ ॥ भा.टी.-जब उक्त सजल आरनालीयका सीसकद्रव का प्रयोग करना हो तो इसे सातगुणा शुद्ध जल मिश्रित करके प्रयोग करना चाहिये ॥ ८२ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः जलाभस्राविणां दाहवतां पूयवतामपि । व्रणानां धावनार्थन्तु विधानज्ञः प्रयोजयेत् ॥ ८३ ॥ मेढ्रमार्गेण चेन्नॄणां व्रणमेहस्य हेतुना । स्रावो जायेत मतिमान् बस्तिकर्मविचक्षणः ॥ ८४ ॥ आरनालीयकाह्वत्थं द्रवन्तु सजलं तदा । जलेनोद्दिष्टमानेन युञ्जीतोत्तरबस्तिना ॥ ८५ ॥ रक्तिद्वयमितं सारं त्वहिफेनसमुद्भवम् । षष्टिबिन्दुमितञ्चैव काञ्जिकाम्लीयकाहिजम् ॥ ८६ ॥ द्रवन्तु सजलञ्चाथ सार्द्धकोलद्वयं जलम् । सम्मेल्य भिषजां वर्यस्त्वक्शोफे तु विसर्पजे ॥ ८७ ॥ अभिघातोत्थशोथे च घृष्टसंपिष्टितास्थिषु । धावनार्थं प्रयुञ्जीत सर्वथैव विधानतः ॥ ८८ ॥ अभिघातोत्थितं दाहं कण्डूतिञ्च हरेद् ध्रुवम् । योनिपायुप्रदेशोत्थां कण्डूतिञ्च विनाशयेत् ॥ ८६ ॥ नागद्रवं त्वन्तराले मणिशिश्नाग्रचर्मणोः । काचबस्तिप्रयोगेण शल्यवित्त्तु प्रदापयेत् ॥ ६० ॥ फिरङ्गजं महाघोरं शोथदाहरुजान्वितम् । नाशयेदाशु योगोऽयं निरुद्धप्रकशामयम् ॥ ६१ ॥ अस्य रोगयोग्यः प्रयोगः-फिरंगोपद्रवे निरुद्धप्रकशे छेदनेन नव्या रुग्णास्य महतीं व्यापदमापादयन्ति इति तत्रापि उक्तनागद्रवस्यैव काचबस्तिद्वारा निवेशात् लघीयसी भवति सिद्धिरित्यभिनव एवाय प्रभूतफलः प्रयोगप्रकारं उद्भावित आचार्यैरिति तदेतदाह नागद्रवन्वन्तराले इति ॥ ८३-६१ ॥ भा.टी.-उक्त सजल आरनालीयका सीसकद्रव को सातगुणा जल में मिला-

कर, अत्यन्त पतला जल के समान स्राववाले, दाहयुक्त और पीत्रवाले व्रणों को धोने के लिए इस द्रव को काम में लाया जाता है । यदि सुजाक के कारण मूत्रे- न्द्रिय में व्रण से स्राव होता हो तो उत्तरवस्ति विधान से इस द्रव में सातगुणा जल मिलाकर पिचकारी देनी चाहिये । वीसर्परोग की त्वचा के शोथ, अभिघात- जन्य शोथ, अस्थियों में रगड़े लगने या बुरी तरह दब जाने से होनेवाले शोथ और व्रणों में साठ बूँद सजल आरनालीयक सीसकद्रव में दो रत्ती अफीम और पाँच तोला शुद्ध जल मिलाकर व्रणों और शोथ को धोने के काम लाया जाता है । इस अहिफेनयुक्त आरनालीय सजल सीसकद्रव से धोने पर अभिघातजन्य दाह और कण्डू तथा योनि प्रदेश और गुद प्रदेश में होनेवाली कण्डू में शीघ्र आराम आता है । फिरंग रोग के उपद्रव स्वरूप उत्पन्न होनेवाले निरुद्धप्रकश- रोग में उक्त सीसकद्रव को काचवस्ति द्वारा मणि (शिश्नमुण्ड) और शिश्न के अग्र चर्म में प्रवेश करने से शोथ दाह तथा अत्यन्त पीड़ा में शीघ्र ही आराम आता है ॥ ८३-६१ ॥ अस्य प्रयोगनिषेधः अक्ष्णोर्नाञ्जीत मतिमान् खलु द्रवमिमं भिषग् । अञ्जनेन भवेदान्ध्यं व्रणशुक्रमथापि वा ॥ ६२ ॥ अस्य च द्रवस्य भ्रान्त्यापि चक्षुषोर्नोपयोग इत्याह-अक्ष्णोर्नाञ्जीतेति ॥६२॥ भा.टी.-उक्त सजल आरनालीयक सीसकद्रव को नेत्रों के व्रणों में कभी प्रयोग नहीं करना चाहिये, अन्यथा इससे आँखें अंधी हो जायेंगी अथवा उनमें व्रणशुक्र हो जायेगा ॥ ६२ ॥ अथ अशुद्धामृतसीसकसेवनविकृतौ विधानम् अविशुद्धामृताह्वोत्थविकारपरिशान्तये । विशुद्धगन्धं चूर्णन्तु योजयेद् भिषजां वरः ॥ ६३ ॥ अशुद्धसीसकभक्षणदोषश्च शुद्धगन्धकसेवनादपनेयः ॥ ६३ ॥ भा.टी.-अशुद्ध और ठीक विधि से भस्म न किये गये नाग के सेवन से उत्पन्न विकारों को शान्त करने के लिए कुछ दिन शुद्धगन्धक का सेवन करना चाहिये ॥६३ अथ यशदस्य नामानि यशदं यसदश्चैव जशदं जसद्ं तथा । रीतिहेतुः खर्परजं समाख्यातं भिषग्वरैः ॥ ६४ ॥ भा.टी.-यशद, यसद, जशद, जसद्, रीतिहेतु, खर्परज, ये सब नाम जस्त ( Zinc ) के हैं ॥ ६४ ॥

४७४ रसतरङ्गिणी वक्तव्य—खर्पर ( खपरिया ) जो यशद का कार्बोनेत् ( Zinc carbo- nate ) होता है, स्वभावतः खानों से प्राप्त होता है। इसमें से यशद प्राप्त करने के लिए खर्पर को जल और तैलों के घोलों में अच्छी तरह मिला दिया जाता है जिससे मिट्टी और पत्थर नीचे बैठ जाते हैं और धात्वीय तेल के साथ ऊपर के भाग में आ जाता है। फिर इसे भूनने से यशदओषित् बन जाता है। इस यशदओषित् को चारकोल के साथ ऊर्ध्वपातन यन्त्र में डाल १३०० डिग्री का ताप देने से यशद ऊर्ध्वपातित होकर जम जाता है। स्वरूप—यशद एक नीली श्वेत सी धातु है। १०० से १५० डिग्री तक गरम करने से वह मृदु और चमकीली हो जाती है तब इनके पत्र बनाये जा सकते हैं। २०० डिग्री के ताप पर फिर यह भंगुर हो जाता है। जिससे फिर इसका चूर्ण कर सकते हैं। ४०६ डिग्री के ताप पर यशद पिघलने लगती है और ४१६ डिग्री ताप पर उबलने लगती है। खुली हवा में गरम करने से यह चमकीली नीली ज्वाला से जलती और श्वेत चूर्ण के रूप में हो जाती है, यही यशद का ओषित् होता है। इसे ताम्र के साथ मिला पित्तल नामक धातु बनायी जाती है। ग्राह्ययशदस्य स्वरूपम् छेदे समुज्ज्वलं स्निग्धं मृदुलं निर्मलं तथा। द्रुतद्रावं महाभारं यशदं ग्राह्यमुच्यते ॥ ६५ ॥ महाभारं भारवत्तरम्, मूर्त्तिलघुत्वेऽपि बहुभारमित्यर्थः ॥ ६५ ॥ भा.टी.—जो यशद काटने पर चमकीली चिकनी दिखती हो, मोड़ने में कोमल और साफ हो, अग्नि में शीघ्र ही पिघल जाती और गुरुभार युक्त हो तो उसे उत्तम यशद समझना चाहिये ॥ ६५ ॥ अग्राह्ययशदस्य स्वरूपम् कठिनं कठिनद्रावं रूक्षं रूक्षप्रभं लघु। मलिनं यशदं यत्तु तदग्राह्यं प्रकीर्तितम् ॥ ६६ ॥ भा.टी. —मोड़ने में कठिन, अग्नि में देर से पिघलनेवाला, बाहर से रूक्ष तथा खुश्क चमकवाला, लघुभार, मैला यशद औषधि कार्य के लिये अग्राह्य समझना चाहिये ॥ ६६ ॥ अथं यशदशोधनस्य प्रयोजनम् विशुद्धिहीनं यशदं मृतञ्चेद् विशोधितं वाप्यमृतं त्वविज्ञैः। निषेवितं वै जनयेद् विकारान् गुल्मप्रमेह क्षयकुष्ठकादीन् ॥ ६७ ॥

एकोनविंशस्तरङ्गः ४७५ अशुद्धं यशदं गुल्मादीन् जनयतीति तस्माच्छोध्यम् ॥ ६७ ॥ भा.टी.—बिना शुद्ध किये यशदभस्म का सेवन किया जाय अथवा शुद्ध करके पूर्ण रूप से उसकी भस्म किये बिना ही सेवन किया जाय तो उससे गुल्म, प्रमेह, क्षय, कुष्ठ आदि विकार उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ६७ ॥ यशदस्य प्रथमः शोधनप्रकारः जात्यं यशदमादाय लोहदर्व्यान्तु विन्यसेत् । तीव्राग्निना तु विद्राव्य चूर्णवारिप्रपूरिते ॥ ६८ ॥ सच्छिद्रेण पिधानेन पिहितास्ये घटे क्षिपेत् । सप्तवारं प्रयत्नेन यशद् शुद्धिमाप्नुयात् ॥ ६९ ॥ यशदशोधनं चूर्णवारिणि सप्तधा निर्वापणाद् भवति प्रथमम् ॥ ६८, ६९॥ भा.टी.—उत्तम यशद को लोहे की करछी में डाल तीव्र अग्नि के ऊपर रखकर पिघलायें। जब यशद अच्छी तरह पिघल जाय तो उसे चूने के जल से भरे हुए और मुख पर एक छिद्रयुक्त शराव रखे हुए पात्र में शराव छिद्र से चूने के जल में बुझा दें। इस प्रकार सात बार गरम करके चूने के जल में बुझाने से यशद शुद्ध हो जाता है ॥ ६८, ६९ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः यशदं द्रावितं यत्नात् सप्तवारं विधानतः । सिन्दुवारशिफाद्रावे स्नपयेद्भिषजां वरः ॥ १०० ॥ रीत्यानया तु यशदं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् । एवं शुद्धन्तु यशदं मारणाय प्रयोजयेत् ॥ १०१ ॥ अथवा सप्तवारं निर्गुण्डीमूलरसे निर्वापणेन शुद्धिः ॥ १००, १०१॥ भा.टी.—यशद को करछी में पिघलाकर सावधनी के साथ उक्तविधि से निर्गुण्डीमूलस्वरस में सात बार बुझा दें। इस प्रकार यशद उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है और इसको भस्म करने के काम में लाना चाहिये ॥१००, १०१॥ वक्तव्य—प्राचीन ग्रन्थों में यशद का शोधन-मारण वंग के सदृश ही लिखा है, परन्तु यहाँ पर लिखी हुई विधि से शोधन करने पर इसमें किसी प्रकार का दोष रहने का सन्देह नहीं रहता है। तृतीयः शोधनप्रकारः यशदं द्रावितं यत्नाद् गोदुग्धे स्नपयेद्भिषक् । त्रिसप्तवारं यत्नेन यशदं शुद्धिमाप्नुयात् ॥ १०२ ॥

यद्वा एकविंशतिधा गोदुग्धेन निर्वापणात् ॥ १०२ ॥ भा.टी.—यशद को करछी में पिघला कर गाय के दूध में इक्कीस बार बुझाने से भी यह उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ १०२ ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः प्रद्राव्य यशदं वैद्यः सुधादुग्धे निषेचयेत् । सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १०३ ॥ स्नुहीदुग्धे सप्तधा निर्वापणात् । प्राचीनैस्तु यशदशोधनमारणं वङ्गस्येवेति परिभाषितम् । तन्तु विस्तरप्रियैराचार्यैर्नादृतम् । अनुभूतं निर्णीतञ्चेति ॥१०३॥ भा.टी.—यशद को करछी में पिघलाकर थोहर के दूध में सात बार बुझा देने से भी वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ १०३ ॥ अथ यशदस्य प्रथमो मारणप्रकारः शुद्धं यशदमादाय कटाहे तीव्रवह्निना । प्रद्राव्य भिषजां वर्यः समपारदगर्भके ॥ १०४ ॥ खल्वे विनििक्षिपेद्यत्नात्ततः सम्पेपयेद् द्रुतम् । पिष्टिं विधाय यत्नेन क्षालयेन्निम्बुवारिणा ॥ १०५ ॥ यशदप्रमितं गन्धं दत्त्वा सञ्चूर्णयेत्ततः । शरावसम्पुटस्थन्तु पुटयेदथ यत्नतः ॥ १०६ ॥ रीत्यानया तु यशदं मृतिमायात्यनुत्तमाम् । इत्थं मृतन्तु यशदं सर्वयोगेषु योजयेत् ॥ १०७ ॥ अथास्य मारणप्रकारः प्रथमः सूतगन्धकयोगजातः । निम्बुवारिभिः क्षालनं पिष्टिनैर्मल्यार्थम् । व्याख्यातप्रायपाठमन्यत् ॥ १०४-१०७ ॥ भा.टी.—शुद्ध यशद को एक लोहे की कड़ाही में डाल चूल्हे पर तीव्र अग्नि से पिघलायें। जब पिघल जाय तो इसमें समभाग शुद्ध पारद डालकर शीघ्र ही नीचे उतार खरल में डालें और तुरन्त ही मूसली से खूब रगड़कर इसकी पीठी बना लें। अब इस पिष्टी को नींबू के स्वरस से घोंटकर अच्छी तरह धो डालें । अब इस पिष्टी में यशद के समभाग शुद्ध गन्धक मिला अच्छी तरह घोटकर चूर्ण को शरावसम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक देवें। इस प्रकार यशद को पुट देने से उसकी उत्तम भस्म बन जाती है ॥ १०४-१०७ ॥

एकोनविंशस्तरङ्गः ४७७ द्वितीयो मारणप्रकारः [ गीतिका ] यशदं विशुद्धमादौ विनिधाय वै कटाहे । अतितीव्रवह्नियोगात् खलु गालयेन्निकामम् ॥ १०८ ॥ दृढनिम्बदण्डदर्व्या परिचालयेत्प्रयत्नात् । सुमृतं ततो विलोक्य त्ववतारयेत्कटाहम् ॥ १०९ ॥ विमलं प्रदाय तालं चरणांशिकं रसज्ञः । खलु पेषयेत्प्रयत्नात् पुटवित् पुटेत् पुटस्थम् ॥ ११० ॥ रीत्यानया तु यशदं मृतिमेति निर्विशेषाम् । विविधानुपानयोगात् वितरेत्तु वीतशङ्कः ॥ १११ ॥ द्वितीयः प्रकारः तालकयोगसाध्यो निगदव्याख्यातश्च ॥ १०८-१११ ॥ भा.टी.—शुद्ध यशद को लोहे की कड़ाही में डाल चूल्हे पर रखकर अत्यन्त तेज अग्नि से अच्छी तरह पिघलायें और एक मजबूत कच्चे नीम के दण्डे से तब तक रगड़ते जायें और पकाते जायँ जब तक कि यशद की भस्म न हो जाय । जब भस्म हो जाय तो कड़ाही को नीचे उतार भस्म को खरल में डालें और उसमें यशद से चतुर्थांश शुद्ध हरतालचूर्ण मिला खूब घोट करके एक शरावसम्पुट में बन्द करके धूप में सुखा लें । अच्छी तरह पुट के सूखने पर इसे पुट में फूँक दें । इस विधि से यशद की उत्तमभस्म हो जाती है । इसको विविध अनुपान योग से निःशंक होकर प्रयोग में लायें ॥ १०८-१११ ॥ तृतीयो मारणप्रकारः यशदं विमलं न्यस्य कटाहे गालयेद्भिषक् । अपामार्गस्य चूर्णञ्च स्वल्पं स्वल्पं मुहुर्मुहुः ॥ ११२ ॥ विनिक्षिपेत् भिषग्वर्यो लोहदर्व्याथ चालयेत् । भस्म यावद् भवेत्सम्यक् चूर्णं तावत् समापयेत् ॥ ११३ ॥ राशीकृत्य ततो भस्म शरावेण पिधापयेत् । ज्वलदङ्गारवर्णं स्याद्यशदं तु यथा चिरम् ॥ ११४ ॥ तथा प्रदीपयेदग्निं दिनमेकं भिषक्तमः । स्वतः शीतं ततो ज्ञात्वा यशदं मृतमाहरेत् ॥ ११५ ॥ तृतीयः प्रकारस्त्वपामार्गचूर्णक्षेपसाध्यो वंगस्येवाल्पव्ययो बहुफलश्चेति॥११२॥ भा.टी.--शुद्ध यशद को लोहे की कड़ाही में डालकर उसको आग पर

४७८ रसतरङ्गिणी रख गरम करें। जब यशद पिघल जाय तो उसमें थोड़ा-थोड़ा करके अपामार्ग का चूर्ण तब तक डालते जायँ और लोहे की करछी से चलाते जायँ जब तक कि यशद की अच्छी तरह से भस्म न हो जाय। अच्छी तरह भस्म होने पर इसको कड़ाही के बीच में एकत्र करके एक मिट्टी के सिकोरे से अच्छी तरह ढक दें। और कड़ाही के नीचे अति तीव्र आग देते जायँ। जब देखें कि शराव से ढकी हुई भस्म जलते हुए अंगारों के समान लाल हो गयी है तो अग्नि देना बन्द कर दें। इस तरह एक दिन भर अग्नि देने के बाद स्वतःशीत यशद्भस्म को कड़ाही से निकाल लें ॥ ११२-११५ ॥ वक्तव्य--यद्यपि उक्त मारण प्रकार में भस्म को क्षारशून्य करने का कोई उल्लेख नहीं है, तथापि वंग या नाग की भाँति इसको क्षारशून्य कर लेना चाहिये। अन्यथा इसको बाह्यप्रयोग में काम लाना चाहिये। चतुर्थो मारणप्रकारः कटाहसंस्थं यशदं विमलन्तु शनैः शनैः। विघट्टयँल्लोहदर्य्या पचेत्तीव्राग्निना भिषक् ॥ ११६ ॥ यशदं चूर्णतां यातं वस्त्रपूतन्तु कारयेत् । स्थूलांशञ्च पुनः कामं कटाहस्थं विपाचयेत् ॥ ११७॥ एवं नातिचिरादेव यशदं मृतिमाप्नुयात् । कुन्देन्दुधवलं भस्म जायते चातिशोभनम् ॥ ११८ ॥ रीत्यानया खलु मृतं यशदन्तु विधानतः । नावनाञ्जनकार्यादौ योजयेद्भिषजां वरः ॥ ११९ ॥ चतुर्थः प्रकारः केवलं बाह्यप्रयोगयोग्यो भक्षणायऽनुपयुक्तः। अत्र अति- तीव्राग्निना यशदं पाच्यमित्यवधेयम् ॥ ११६-११९ ॥ भा. टी.-एक लोहे की कड़ाही में शुद्ध यशद डालकर उसको चूल्हे की अग्नि पर रखें और तीव्र अग्नि देते हुए पिघलायें। पिघलाने पर इसको केवल लोहे की चम्मच से चलाते जायँ और तीव्र अग्नि देते जायँ। जब यशद का चूर्ण बन जाय तो उसे नीचे उतार ठंडा करके कपड़े में छान लें। छानने में जो यशद के मोटे-मोटे कण रह जायँ उनको पुनः कड़ाही में डाल तीव्र अग्नि से पकायें। फिर ठंडा करके कपड़े से छान लें। इस तरह यशद की चाँदनी- पुष्प या चन्द्रमा के समान श्वेत उत्तम भस्म हो जाती है। इसी विधि से बनायी हुई यशद की भस्म को नस्य तथा अञ्जन आदि बाह्य प्रयोग में काम लायें ॥ ११६-११९ ॥

एकोनविंशस्तरङ्गः ४७६ अथ सुमृतयशदस्य गुणाः यशदं तुवरं शिशिरं कटुकं परमं नयनामयनाशकरम् । कफपित्तसमुत्थितरोगहरं बलवीर्यविवेकसमृद्धिकरम् ॥१२०॥ यशदं पाण्डुशमनं बहुमेहनिषूदनम् । कासश्वासप्रशमनं निशास्वेदनिबर्हणम् ॥ १२१ ॥ यशदं परमं श्लेष्मकलासंकोचकृन्मतम् । समाख्यातं विशेषेण व्रणस्रावरोधनम् ॥ १२२ ॥ श्रमावसादशमनं रजःस्रावनिषूदनम् । कम्पवातपहं चैव विशेषात्परिकीर्तितम् ॥ १२३ ॥ मृतयशदगुणाः—यशदं शीतलम् । प्राञ्चोऽप्याहुः—"यशदं तुवरं तिक्तं शीतलं कफपित्तनुत् । चक्षुष्यं परमं मेहान् पाण्डुं श्वासञ्च नाशयेत् ॥” इति । बहुविधो मेहो बहुमेहस्तस्य बहुमेहस्य नाशकम्, निशास्वेदनिबर्हणमित्यारभ्य गुणानां नवानुभवः । श्लेष्मकलासंकोचनं नस्यद्वारा वक्ष्यति हि 'नासिकाश्लैष्मि- ककलादौर्बल्यं विनिहन्त्यलम् ।' इति ॥ १२०-१२३ ॥ भा.टी.—उत्तम प्रकार से बनायी हुई यशद की भस्म कषाय और कटुरस, और शीत गुण युक्त होती है । बाह्य प्रयोग में यह नेत्ररोग को नष्ट करती है । इसके अन्तःप्रयोग कफपित्तप्रकोपजन्य रोग नष्ट होते हैं और शरीर में बल वीर्य तथा बुद्धि की वृद्धि होती है। यशदभस्म पाण्डुरोगशामक, बहुमूत्ररोगनाशक, कास श्वासरोगशामक, राजयक्ष्मा या जीर्णज्वर में होनेवाले रात्रिस्वेद को दूर करती है। इसके अतिरिक्त यशदभस्म उत्तम श्लैष्मिककलासंकोचक और विशेष रूप में व्रणस्रावरोधक है। अति-परिश्रमजन्य थकावट को मिटाती है और ऋतुकाल में अधिक मात्रा में होनेवाले मासिकस्राव को नियमित करती है । इसके सेवन से हाथ-पैरों में होनेवाला कम्पवात रोग दूर हो जाता है ॥१२०-१२३॥ यशदस्य विशिष्टो गुणः संशीलितं वै यशदं मृतन्तु विनाशयेदाशु भृशं विशेषात् । प्रसादसंज्ञं पवनं प्रवृद्धमेकाङ्गगं वै सकलाङ्गगं वा ॥ १२४ ॥ भा.टी.—उत्तम प्रकार से बनी हुई यशद की भस्म सेवन करने से शीघ्र ही एकांग अथवा सर्वांग में प्रकुपित प्रसाद संज्ञक वायु का शमन हो जाता है । अर्थात् यह उत्तम वातशामक द्रव्य है ॥ १२ ॥ वक्तव्य—यशदभस्म बाह्याभ्यन्तर प्रयोग में स्रावशोषक और ग्राही होती

३१ एकोनविंशत्तरङ्गः ४८१ मृतगगनसमेतं शीलितं क्षौद्रयुक्तं सुमृतयशदचूर्णं रक्तिकैकप्रमाणम् । हरति झटिति कासं श्वासकृच्छ्रोग्रवेगं व्यपनयति विशेषाद् राजरोगोत्थकासम् ॥ १३३ ॥ आर्द्रकस्वरसोपेतं सक्षौद्रं यशदं मृतम् । शीलितं नाशयत्याशु श्वासं परमदारुणम् ॥ १३४ ॥ आत्मगुप्ताशिफारास्नाबल्लैरण्डकषायतः । कम्पयुक्तं पक्षवधं यशदं हन्ति शीलितम् ॥ १३५ ॥ लौहाभ्रकसमायुक्तं यशदं परिशीलितम् । कणाक्षौद्रेण हन्त्याशु श्वासं प्रतमकाभिधम् ॥ १३६ ॥ स्वर्णवङ्कसमायुक्तं यशदं परिशीलितम् । चित्तावसादसंयुक्तं स्वप्नमेहं व्यपोहांत ॥ १३७ ॥ अशोकत्वक्कषायेण यशदं परिशीलितम् । त्रिचतुर्माससम्भूतरजरोधसमुत्थितम् ॥ १३८ ॥ अति-बलवेगेन जायमानं सुदारुणम् । तीव्रवेदनयोपेतं रजःस्रावं निवारयेत् ॥ १३९ ॥ लोहसर्जैरसोपेतं यशदं परिशीलितम् । निहन्ति शुक्लप्रदरं रजोरोधसमुत्थितम् ॥ १४० ॥ यशदं रससिन्दूरयुतं कर्पूरसंयुतम् । सःलापं कम्पवातं हन्ति वै सान्निपातिकम् ॥ १४१ ॥ टङ्काभ्रवंशजायुक्तं यशदं परिशीलितम् । श्वासं निवारयत्याशु संकष्टं कफनिगमम् ॥ १४२ ॥ यशदं रससिन्दूस्त्युतं क्षौद्रेण शीलितम् । हन्ति मस्तिष्कदौर्बल्यं विषादश्रमसंयुक्तम् ॥ १४३ ॥ सुवर्णभस्मसंयुक्तं यशदं परिशीलितम् । समाख्यातं विशेषेण योषापस्मारनाशनम् ॥ १४४ ॥ सतारताप्यं यशदं चित्रककाथयोग-: । अर्धावभेदकं सूर्यावर्तं संनाशयत्यलम् ॥ १४५ ॥ अथास्य रोगांयोग्यः प्रयोगः प्राचीनतन्त्रानुक्तोऽपि अल्पायासो बहुफलश्चेति । पत्रं तेजपत्रम्, पुराणं नेति विशेषः । न चात्रात्यन्तं पुराणं कुम्भाह्वयं सर्पिर्ग्राह्यमिति

४८२ रसतरङ्गिणी तस्योन्मादौपयिकत्वेऽपि सर्वत्र भक्षणानर्हत्वात् इत्याचक्षीरन् नव्याः, तस्मात् वार्षिकं द्वित्रिवार्षिकं वा पुराणमादेयं स्यादिति, पुराणं हि स्वल्पश्लेष्मलं भवति, तदेतत् ध्वनितं यत्नादित्यनेन पदेन इति, तन्न सम्यक् । तथाहि यद्यपि “योजयेन्नवमेवाज्यं भोजने तर्पणे श्रमे । बलक्षये पाण्डुरोगे कामलानेत्ररोगयोः ॥” इति प्राचीनसंवादात् नेत्ररोगे नवीनघृतप्रयोगः साधुः तथापि पुराणघृतस्यैव तिमिरापहत्वम्, नवीनस्य तु सामान्यतो नेत्ररोगनाशकत्वम्, पुरा- णत्वं च घृतस्य वर्षादूर्ध्वं भवत्येव उक्तं हि—“वर्षादूर्ध्वं भवेदाज्यं पुराणं तत् त्रि- दोषनुत् । मूर्च्छाकुष्ठविषोन्मादापस्मारतिमिरापहम् ॥” इति । अपि च “यथा यथाऽ- खिलं सर्पिः पुराणमधिकं भवेत् । तथा तथा गुणैः स्वैः स्वैरधिकं तदुदाहृतम् ॥” इत्यप्याहुः । तस्मात् प्रकृते तिमिररोगे पुराणस्यैव घृतस्योपयोग इति सिद्धम् । प्रवालभस्मसहितमिति प्रवालभस्म गुञ्जार्धं गुञ्जैकं वा मृतं यशदं गुञ्जैकमेतद्वयं सम्मेल्य मधुना प्राशयेदिति सम्प्रदायः । राजरोगो यक्ष्मा, तत्समुत्पन्नं कासम् । आत्म- गुप्ताशिफा मर्कटीमूलम् । कषायत इति सार्वविभक्तिकस्तसिः, तेन कषायेण सहे- त्यर्थः । चित्तावसादः आलस्यं, खेदः । टङ्कः टङ्कणम्, वंशजा वंशरोचना ॥१४५॥ भा.टी.-इलायचीबीजचूर्ण, दालचीनीचूर्ण, तेजपत्रचूर्ण के साथ यशदभस्म मिलाकर सेवन करने से त्रिदोषप्रकोप शान्त हो जाता है । जाठराग्नि को दीप्त करने के लिये यशदभस्म को अरणीमूलत्वक्चूर्ण के साथ कुछ दिन प्रयोग करना चाहिये । दृष्टिशक्ति की दुर्बलता में यशदभस्म को एक वर्ष के पुराने घी के साथ सेवन करने से शीघ्र ही नेत्रों की ज्योति बढ़ने लगती है बार-बार प्रतिश्याय हो जाने के कारण उत्पन्न होनेवाली नासिका की श्लैष्मिक कला की दुर्बलता में एक मास तक आधी रत्ती यशदपुष्प को घी में मिलाकर नस्य लेने से शीघ्र आराम आता है । क्षय रोग में होनेवाले रात्रिखेद में यशदभस्म को प्रवालभस्म के साथ सेवन करने से शीघ्र ही रात्रिस्वेद बन्द हो जाता है । विचर्चिका रोग में यशदभस्म या पुष्प को गोघृत में मिलाकर सात दिन तक प्रतिदिन लेप करने से शीघ्र ही विच- र्चिका में आराम आता है। एक रत्ती यशदभस्म को अभ्रकभस्म में मिलाकर शहद के साथ चटाने से शीघ्र ही उग्रवेग श्वास तथा कास में विशेषतः क्षयजन्य कास में आराम आता है। यशदभस्म को अदरखरस और शहद में मिला दिन में दो बार सेवन करने से भयंकर श्वास रोग में शीघ्र ही आराम आ जाता है। यशदभस्म को कौंच की जड़, रास्ना, बला तथा एरण्डमूल कषाय के साथ सेवन करने से कंपयुक्त पक्षाघात में आराम आ जाता है। प्रतमक श्वास में यशदभस्म को लोह-

भस्म, अभ्रकभस्म और पिप्पलीचूर्ण मिला शहद के साथ चटाने से शीघ्र ही आराम आने लगता है। यशदभस्म को पूर्वोक्त स्वर्णवङ्ग में मिलाकर कुछ दिन सेवन करने से मानसिक खिन्नतायुक्त स्वप्नप्रमेह में आराम आता है। अशोक- त्वक्कषाय अनुपान से यशदभस्म सेवन करने से तीन चार मास रुकने के बाद अतिप्रबलरूप से होनेवाले और तीव्र वेदनायुक्त भयंकर मासिकस्राव में शीघ्र ही आराम आ जाता है। मासिकस्राव रुकने के कारण होनेवाले श्वेतप्रदर रोग में यशदभस्म को लोहभस्म और रालचूर्ण के साथ सेवन करने से श्वेतप्रदर में आराम आता है। सान्निपातिक ज्वर में, जिसमें रोगी के हाथ-पैर काँपने लगे हों और वह प्रलाप करता हो, यशदभस्म में रससिन्दूर और भीमसेनी कपूर मिलाकर सेवन कराने से आराम आता है। बड़ी कठिनाई से कफ निकलनेवाले श्वास में यशदभस्म को सुहागा, अभ्रकभस्म और वंशलोचनचूर्ण के साथ मिलाकर देने से शीघ्र आराम आने लगता है। यशदभस्म में रससिन्दूर मिलाकर शहद के साथ कुछ दिन सेवन करने से बेचैनी या थकावट युक्त मस्तिष्क की दुर्बलता में लाभ होता है। हिस्टीरिया-रोग को दूर करने के लिये यशदभस्म का स्वर्णभस्म के साथ मिलाकर सेवन करने से शीघ्र लाभ होता है। आधासीसी के दर्द तथा सूर्यावर्त शिरोरोग में यशदभस्म को रजतभस्म तथा स्वर्णमाक्षिकभस्म मिलाकर चित्रकमूलत्वक्- अनुपान से सेवन करने पर शीघ्र आराम आता है ॥ १२६-१४५ ॥ अथ यशदामृतमलहरः त्रिकर्षं सिक्थतैलन्तु पूर्वोक्तविधिसोधितम् । तोलकैकमितं दद्यात् यशदं वह्निजारितम् ॥ १४६ ॥ खल्वेऽतिमसृणे क्षुद्रे मर्दयेदतियत्नतः । समाख्यातो मलहरो यशदामृतसंज्ञकः ॥ १४७ ॥ यशदामृतमलहरः—वह्निजारितमिति चतुर्थमारणप्रकारेण साधितम् ॥ १४७॥ भा.टी.—तीन कर्ष सिक्थतैल ( मोम और तैल ) एक तोला अग्निजारित यशद अर्थात् जस्त का फूला लेकर दोनों को एकत्र खरल में अच्छी तरह मर्दन करके मलहम बना लें। इसको यशदामृतमलहम कहते हैं ॥ १४६, १४७ ॥ अस्य गुणाः मतो मलहरोऽयं तु विविधव्रणरोपणः । विचर्चिकाहरः काममग्निदग्धव्रणापहः ॥ १४८ ॥

४८४ रसततरङ्गिणी भा.टी.—यह यशद मलहर विविध प्रकार के व्रणों को रोपण करता और विचर्चिका में लाभदायक है तथा अग्निदग्ध व्रणों के लिये विशेष रूप से लाभदायक है ॥ १४८ ॥ अथ गन्धकाम्लीययशदस्य निर्माणप्रकारः विमलयशदचूर्णं काचपात्रे तु पूर्वं विशदविपुलबुद्धिः स्थापयेद्वैद्यवर्यः । तदनु खलु सनीरं गन्धकाम्लं क्षिपेद्वै द्रवति यशदचूर्णं यावता द्रावकेण ॥ १४६ ॥ ततः सारकपत्रेण सारयेत्तु विधानतः । काचपत्रे निधायाथ पचेन्मन्दाग्निना भिषक् ॥ १५० ॥ द्रवांशं शोषयेद्यत्नाद्रसकर्मविचक्षणः । किञ्चिद्द्रवाविशेषे च पात्रं भूमौ निधापयेत् ॥ १५१ ॥ समुज्ज्वलं सुधवलं काचपात्रतलस्थितम् । गन्धकाम्लीययशदचूर्णं शुद्धं समाहरेत् ॥ १५२ ॥ गन्धकाम्लीययशदः—अस्य च द्रुतस्यैव प्रायः प्रयोग इत्युक्तं रसवेदिभिः नव्यरासायनिकैः ॥ १४६–१५२ ॥ भा.टी —एक काँच के पात्र में पहिले शुद्ध यशदचूर्ण डालें, अब उसमें सजल (हल्का) गन्धकाम्ल थोड़ा-थोड़ा करके डालते जायँ, जब सम्पूर्ण यशद- चूर्ण इस गन्धकाम्ल से गल जाय तो इस द्रव को सारकपत्र (Filler Paper) से छानकर छने हुए द्रव को फिर एक काँचपत्र में डालें और मन्द-मन्द अग्नि से पकायें । जब उसमें से द्रवांश सूख जाय और यह किञ्चित् गीला-सा रहे, तो इस पात्र को नीचे उतार ठंडा कर लें । ठंडा होने पर पात्रतल में श्वेत वर्ण का शुद्ध गन्धकाम्ल यशदचूर्ण प्राप्त होता है । इसको यशदगन्धित् अथवा Zinc Sulphate) कहते हैं ॥ १४६–१५२ ॥ गन्धकाम्लीययशदस्य गुणाः गन्धकाम्लीययशदचूर्णं पूयघ्नमुत्तमम् । व्रणसंस्त्रावशमनं नेत्राभिष्यन्दनाशनम् ॥ १५३ ॥ व्रणमेहहरं चैव श्वेतप्रदरकप्रणुत् । सङ्कोचकृद्विशेषेण कीर्तितं रसवेदिभिः ॥ १५४ ॥ शुष्कं गन्धाम्लयशदं क्षारकर्मकरं परम् । क्षारकर्मप्रयोगाथेमतस्तद् विनियुज्यते ॥ १५५ ॥

एकोनविंशस्तरङ्गः ४८५ गन्धकाम्लीययशदं शुष्कं प्रायो न युज्यते । योजयेद्विधिना वैद्यो द्रवीकृत्य विधानतः ॥१५६॥ भा.टी.—गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण (Zinc Sulphate) उत्तम पूय- नाशक और व्रणस्रावशोषक द्रव्य है । इसके प्रयोग से नेत्राभिष्यन्द रोग दूर हो जाता है । व्रणमेह (सुजाक) तथा श्वेतप्रदर में उसको उत्तरबस्ति विधान से देने पर शीघ्र लाभ होता है । इसमें संकोचक शक्ति विशेष रूप से होती है । अर्थात् जिंकसल्फेट के द्रव को उक्त रोगों में प्रयोग किया जाता है । इसका शुष्क चूर्ण उत्तम क्षारकर्म ( दाह ) करनेवाला होता है। अतः इसे क्षारकर्म प्रयोगार्थ काम में लिया जाता है । परन्तु गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण शुष्क चूर्णा- वस्था में बहुत कम ही प्रयोग में लिया जाता है । अतः इसको द्रवरूप में उक्तरोगों में प्रयोग करना चाहिये ॥ १५३-१५६ ॥ वक्तव्य—यद्यपि यहाँ पर गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण को दाहक माना है, परन्तु इसकी अपेक्षा यशदहरिद् (Zinc Chloride) अधिक दाहक होता है, उसे दाहकयशद भी कहते हैं । यह तीव्रदाहक और प्रबल जीवाणुहर होता है । अथ गन्धकाम्लीययशदद्रवस्य प्रथमो निर्माणप्रकारः गन्धकाम्लीययशदं रक्तिकैकमितं शुभम् । सार्द्धद्वितोलकमिते सलिले तु परिश्रुते ॥१५७॥ संद्राव्य खलु यत्नेन काचकुप्यां निधापयेत् । गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं नामतो मतः ॥१५८॥ भा.टी.—एक रत्ती शुद्ध गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण को ढाई तोले शुद्ध परिश्रुत जल (Distilled water) में घोलकर छान लें । अब इसे एक काँच की शीशी में रख लें । इसी को गन्धकाम्लीय यशद द्रव कहा जाता है ॥ १५७, १५८ ॥ अस्य गुणाः गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं व्रणमेहहृत् । नेत्राभिष्यन्दशमनो रोपणो भूतनाशनः ॥१५६॥ भा.टी.—उक्त प्रकार से बनाया हुआ गन्धकाम्लीय यशदद्रव व्रणमेह (सुजाक) में उत्तरबस्ति के रूप में देने से शीघ्र लाभ करता है । यह नेत्राभि- ष्यन्दरोगनाशक, व्रणरोपक और कृमिनाशक है ॥ १५६ ॥

४. तरंग १६-२०: रत्न, उपरत्न, क्षार व द्रावक वर्ग निर्माण

४८६ रसतरङ्गिणी अस्य आमयिकः प्रयोगः बिन्दुत्क्षेपकयन्त्रेण द्रवोऽयं लोचनार्पितः । विनिहन्त्यचिरादेव नेत्राभिष्यन्दजां रुजम् ॥ १६० ॥ मेढ्रमूलं दृढं बध्वा स्फीतकेन विधानतः । यत्नादुत्तरबस्त्युक्तविधानेन ह्यनारतम् ॥ १६१ ॥ गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं विनियोजितः । सप्ताहद्वितयेनैव व्रणमेहं व्यपोहति ॥ १६२ ॥ भा.टी.—उक्त द्रव को बिन्दुत्क्षेपक यन्त्र (Dropper) से नेत्रों में डालने से शीघ्र ही नेत्राभिष्यन्द रोग में लाभ होता है। सुजाक में जब मूत्रेन्द्रिय से पूय आता हो तो मूत्रेन्द्रिय के मूल प्रदेश को स्फीतक (पट्टी) से बाँध कर सावधानी से उत्तरबस्ति द्वारा यदि इस द्रव को मूत्रेन्द्रिय में निरन्तर दो सप्ताह तक डाला जाय अर्थात् दिन में दो-तीन बार इस द्रव की उत्तरबस्ति दी जाय तो सुजाक का व्रण अच्छा हो जाता है ॥ १६०-१६२ ॥ गन्धकाम्लीययशदद्रवस्य द्वितीयो निर्माणप्रकारः गन्धकाम्लोययशदं षट्त्रिंशद्रक्तिकोन्मितम् । परिस्रुते तु सलिले षष्टितोलकसंमिते ॥ १६३ ॥ संद्राव्य खलु यत्नेन काचकुप्यां निधापयेत् । गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं भाषितो बुधैः ॥ १६४ ॥ भा.टी.—छत्तीस रत्ती शुद्ध गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण को साठ तोला शुद्ध परिस्रुत जल में घोलकर एक स्वच्छ काँच की शीशी में रख लें। इसको भी गन्धकाम्लीय यशदद्रव (Zinc Sulphate lotion) कहते हैं ॥ १६३, १६४॥ अस्य गुणाः गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं व्रणरोपणः । संकोचकृद्विशेषेण श्वेतप्रदरमुल्बणम् ॥ १६५ ॥ भा. टी.—यह द्वितीय प्रकार का गन्धकाम्लीय यशदद्रव, व्रणरोपक (भरनेवाला) संकोचक और विशेष रूप से श्वेतप्रदरनाशक होता है ॥ १६५ ॥ अस्य प्रयोगविधिः यत्नादुत्तरबस्त्युक्तरीत्या तु विनियोजितः । द्रवोऽयं नाशयत्याशु श्वेतप्रदरमुल्बणम् ॥ १६६ ॥

विंशस्तरङ्गः ४८७ भा.टी.—इसे सावधानी के साथ उत्तरबस्ति विधान (डूस) से प्रयोग में लाया जाय तो इससे श्वेतप्रदर में शीघ्र आराम आता है ॥ १६६ ॥ अथ यशदामृतद्रवस्य निर्माणप्रकारः गन्धकाम्लं ययशदं युगरक्तिकसंमितम् । टङ्कणाम्लद्रवे रम्ये पञ्चतोलकसंमिते ॥१६७॥ निक्षिप्य खलु यत्नेन काचकुप्यां तु विन्यसेत् । समाख्यातो द्रवोऽयं तु यशदामृतसंज्ञकः ॥१६८॥ गन्धकाम्लीययशदद्रवः भूतनाशनः जीवाणुध्वंसी। अस्य च द्वितीयः प्रकारो व्रणरोपणादिगुणः सुगमपाठः । युगरक्तिसम्मितमिति द्विरक्तिप्रमाणमित्यर्थः ॥१६८॥ भा.टी.—चार रत्ती शुद्ध गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण को पाँच तोला शुद्ध टंकणाम्ल द्रव में मिलाकर एक स्वच्छ काँच की शीशी में रख लें । इसी को यशदामृत द्रव नाम से कहा जाता है ॥ १६७, १६८ ॥ अस्य गुणाः यशदामृतसंज्ञोऽयं द्रवः शोथप्रणाशनः । शिशिरश्चैव रक्तार्माभिष्यन्दादिनिपूदनः ॥१६६॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः बिन्दुक्षेपकयन्त्रेण द्रवोऽयं नेत्रयोजितः । विनिहन्त्याशु रक्तार्माभिष्यन्दाद्यक्षिगामयान् ॥१७०॥ इति सीसकादिविज्ञानीयो नाम एकोनविंशस्तरङ्गः । भा.टी.—उक्त यशदामृत द्रव व्रण आदि के शोथ को शान्त करता है और शीत गुण होता है । अतएव यह रक्तार्म तथा रक्तप्रकोपजन्य नेत्राभिष्यन्द आदि रोगों को नष्ट करता है । यशदामृत द्रव को विन्दुक्षेपकयन्त्र से नेत्रों में दो-तीन बार डालने से शीघ्र ही रक्तार्म नेत्राभिष्यन्द आदि नेत्ररोगों में लाभ होने लगता है ॥ १६६, १७० ॥ यह सीसकादिविज्ञानीय नाम एकोनविंश तरङ्ग समाप्त हुआ । अथ लोहादिविज्ञानीयो नाम विंशस्तरङ्गः अथ लौहस्य भेदास्तेषां वैशिष्टयञ्च मुण्डं तीक्ष्णं तथा कान्तं लौहं त्रिविधमुच्यते । मुण्डात्तीक्ष्णं ततः कान्तं प्रशस्तं परिकीर्तितम् ॥१॥

४८८ रसतरङ्गिणी

तत्रादौ लोहभेदाः यद्यपि प्राचीनाचार्यैः बहुविधाः सन्ति निर्दिष्टास्तथापि उपलभ्यमानप्रायिकलोहभेदाभिप्रायेणैव मुण्डं तीक्ष्णं कान्तमिति त्रेधा लोह- संख्यानमुक्तमाचार्यैरिति । जातिभेदेन लोहगुणविनिर्णयविस्तरस्तु लोहसर्व- स्वादावनुसन्धेयः । प्रकृते तु यथाप्राप्तं लौहत्रिकमेवादाय समन्वय इति । एषु चोत्तरोत्तरं गुणप्रकर्ष इत्याह मुण्डात्तीक्ष्णं ततः कान्तमिति ॥ १ ॥ भा.टी.—मुण्डलोह, तीक्ष्णलौह तथा कान्तलौह भेद से लौह के तीन भेद माने जाते हैं। इनमें मुण्डलोह की अपेक्षा तीक्ष्णलौह और तीक्ष्णलौह की अपेक्षा कान्तलौह उत्तम माना जाता है ॥ १ ॥ मुण्डलोहस्य नामानि मुण्डं तथा मुण्डलोहं कृषिलोहं शिलात्मजम् । कृष्णायसं दृप्तसारमायसञ्च निगद्यते ॥ २ ॥ भा.टी.—मुण्डलोह को मुण्ड, कृषिलौह (खेती के काम आनेवाला लोहा), शिलात्मज, कृष्णायस, दृप्तसार तथा आयस नाम से व्यवहार किया जाता है॥२॥ तीक्ष्णलौहस्य नामानि लोहो लौहं लोहकञ्च शस्त्रलोहञ्च तीक्ष्णकम् । सारलोहं काललोहं त्रयश्च तदिहोच्यते ॥ ३ ॥ भा.टी.—लोह, लौह, लोहक, शस्त्रलोह (औजारों के काम आनेवाला), तीक्ष्णक, सारलोह, काललोह और अयः, ये सब नाम तीक्ष्णलौह (फौलाद) के कहे जाते हैं ॥ २ ॥ कान्तलोहस्य नामानि कान्तलोहं तथा कान्तं त्वयस्कान्तञ्च तन्मतम् । कान्तायसं महालोहं तदेव विनिगद्यते ॥ ४ ॥ एतेषां नामानि कानिचित्स्वरूपनिर्णायकानि तन्त्रे व्यवहारार्थञ्चेति ॥ ४ ॥ भा.टी.—कान्तलोह, कान्त, अयस्कान्त, कान्तायस और महालोह, ये सब नाम कान्तलौह के कहे जाते हैं ॥ ४ ॥ मुण्डलोहादीनां परिचयः कटाहपिष्टपचनखल्वादीनां विशेषतः । निर्माणाय मुण्डलोहं साम्प्रतं विनियुज्यते ॥ ५ ॥ कृपाणादिविनिर्माणे तीक्ष्णलोहं प्रयुज्यते । कान्तलोहञ्च कथितं बुधैः परमदुर्लभम् ॥ ६ ॥

विंशस्तरङ्गः ४८६ एतेषां परिचयः साम्प्रतमुपयोगद्वारा निर्णीतरूप इत्याह कटाहेत्यादि । कान्त- लोहञ्च यद्यपि भक्षणद्वारा गुणैरुत्तमं तथापि यन्त्राद्यनुपयुक्तत्वादनुद्धृतप्रायं खनेः इति दुर्लभं प्रायः। कान्तपाषाणध्मानविनिर्गतन्तु क्वचित् प्राप्यत एवाधुनापि इति । आहुश्च रसमाधवाः—"मुण्डन्तु वर्तुलं भूमौ पर्वतेषु च जायते। गजवल्ल्यादितीक्ष्णं स्यात् कान्तं चुम्बकसंभवम् ॥" इति। "मुण्डात् कटाहपात्रादि जायते तीक्ष्णलोहः। खड्गादिशस्त्रभेदाः स्युः कान्तलोहन्तु दुर्लभम् ॥ मुण्डात् शतगुणं तीक्ष्णं तीक्ष्णात् कान्तं शताधिकम् । तस्मान्मुण्डं परित्यज्य तीक्ष्णं वा कान्तमुत्तमम् ॥" इति च । तदिदमुक्तं समलं मुण्डलोहमित्यादिना ॥ ५, ६ ॥ भा.टी.—आजकल बड़े-बड़े कटाह, कड़ाही, खरल, फावड़े, कुदाली आदि बनाने के काम में मुण्डलोह लिया जाता है । अर्थात् ये चीजें जिससे बनायी जाती हैं उसे मुण्डलोह कहा जाता है । छुरी, चाकू, तलवार आदि अस्त्र के बनाने में जो लोहा काम आता है उसे तीक्ष्णलोह ( फौलाद ) कहते हैं । किन्तु कान्तलौह अत्यन्त दुर्लभ माना जाता है ॥ ५, ६ ॥ वक्तव्य—कान्तलोह यद्यपि अन्तःप्रयोग में सब लोहों की अपेक्षा उत्तम गुण करता है। परन्तु आजकल उसकी खोज अस्त्र-शस्त्रादिकों के बनाने में विशेष उपयोगी न होने से नहीं की जाती है । परन्तु कान्त पाषाण ( चुम्बक पत्थर ) को तपाने पर उसमें से इसको कहीं-कहीं प्राप्त भी किया जाता है । मारणोचितं लौहम् समलं मुण्डलोहं तु मारणाय न योजयेत् । तीक्ष्णलोहं कान्तलोहं यथालाभं प्रयोजयेत् ॥ ७ ॥ भा.टी.—भस्म करने के लिये मुण्डलोह को नहीं लेना चाहिये, क्योंकि यह अनेक प्रकार के मलों से मिश्रित होता है । इसके विपरीत तीक्ष्णलोह तथा कान्तलोह को यथासम्भव भस्म करने के लिये ग्रहण करना चाहिये ॥ ७ ॥ वक्तव्य—लोहा कार्वन द्विअम्लजित् के साथ मिला हुआ अम्लजित् के रूप में खानों से निकलता है । इन खानों में से प्राप्त होनेवाले पत्थरों को खूब भूना जाता है । जिससे वह पूरी तरह लोहओषित् बन जाता है । फिर इसमें से लोह को पृथक् करने के लिये भुने हुए कोयले ( जिन्हें कोक कहते हैं ) तथा चूने के पत्थरों के साथ भट्ठी में तपाते हैं। इस क्रिया से लोहओषित् की ओषजन बन जाती है, शेष लोहा पृथक् हो जाता है । परन्तु साधारण अग्नि से यह क्रिया सिद्ध नहीं होती है । अतः इसकी कच्ची धातु को पिघलाने के लिये ६० से १०० फुट ऊँची

४६० | रसतरङ्गिणी

तीव्र अग्नि को सहन करनेवाली ईंटों की कोष्ठी (भट्ठी) बनायी जाती है। इस कोष्ठी में चूने के पत्थर इसलिए रखे जाते हैं कि यह लोहे में विद्यमान अन्य अशुद्धियों को फास्फेट, सिलिकेट गन्धित आदि से मिलकर उन्हें कैल्शियम के फास्फेट आदि के रूप में परिवर्तित कर देता है। वह कैल्शियम सिलिकेट आदि नीचे गिरते-गिरते पिघल जाते हैं। किन्तु हल्के होने से लोह के ऊपर तैरते हैं और लोहे का मैल कोष्ठी के पार्श्व में कुछ ऊँचाई पर बने हुए छिद्र से बाहर निकलता रहता है, इसे ही लोहकिट्ट या मण्डूर कहा जाता है। इस विधि से प्राप्त लोहे को ढलवालोह या मुण्डलोह कहते हैं। इसमें समभाग २½% प्रति- शत कार्बन होती है। यह मुंडलोह भंगुर, कठोर, भूरा सा और अपेक्षाकृत शीघ्र द्रवणशील होता है। इसके खंड को गरम कर पीट करके दूसरे टुकड़े से नहीं मिलाया जा सकता है। शुद्ध लोह—उपर्युक्त प्रकार से प्राप्त लोह को फिर कोष्ठी में रखते हैं जिसमें धौंकनी द्वारा अन्दर हवा पहुँचायी जाती है। इस क्रिया से लोह में विद्य- मान सारा कार्बन जल जाती है। फिर वह लोहा मृदु तथा अभंगुर हो जाता है और शीघ्र नहीं पिघलता है। इसके दो खण्डों को गरम करके मिलाया जा सकता है। इसमें २ प्रतिशत कार्बन होती है। इसी को मृदुलोह भी कहते हैं। तीक्ष्ण लौह—यदि भट्ठी में पिघले हुए पूर्वोक्त लौह में ढलवे लोहे की उचित मात्रा डाल दी जाय तो वह तीक्ष्णलोह या फौलाद बन जाता है। यह ढलवे लोह के समान कठोर और मृदुलोह के समान मृदु भी होता है। किन्तु ढलवे लोह के सदृश भंगुर नहीं होता और मृदुलोह की अपेक्षा शीघ्र पिघल जाता है और इसके दो खंडों को गर्म करके मिलाया भी जा सकता है। इसकी विशे- षता यह है कि इसकी कठोरता को न्यूनाधिक कर सकते हैं। यदि इसे लाल ताप तक पहुँचा कर शीघ्र ही शीतल जल में डाल दें तो यह अत्यन्त कठोर होकर काँच को भी काटनेवाला बन जाता है। परन्तु साथ ही भंगुर होता है। और गर्म करके धीरे-धीरे ठंडा होने दें तो यह मृदुलोह के समान मृदु तथा अभंगुर हो जाता है। लोहे का द्रवणांक (Melting Point) 15250 Centi- grade, Atomics भार 56.0, Density (पानी से कितना गुना भारी है) 7.45 है। लोह में जितना अधिक भाग Carbon (कोयला) का होगा उतना न्यून उसका द्रवणांक हो जाता है।

विंशस्तरङ्गः ४६१ ग्राह्यतीक्ष्णलोहस्य लक्षणम् उज्ज्वलं लोहफलकं धात्रीकाशीसलेपितम् । गिरिशृङ्गांकितं यत्स्यात्तीक्ष्णलोहं तदुत्तमम् ॥ ८ ॥ उज्ज्वलमित्यादि ग्राह्यतीक्ष्णलोहलक्षणम् । प्राञ्चस्तु-“कासीसामलकल्काक्ते- लोहेऽङ्गं दृश्यते स्फुटम् । तीक्ष्णलोहं तदुद्दिष्टम्” इत्याहुः । “क्ष्माभृच्छिखराका रायद्यङ्गान्याम्लेन लेपिते। लोहे स्युर्यत्र सूक्ष्माणि तत्सारममिश्रीयते ।।”इति च॥८॥ भा. टी.-जिस लोह के फलक (चौड़े पत्र ) में आंवला और कसीस का लेप कर देने से उसमें कुछ देर बाद पर्वत के शिखराकार उभार से उठ आयें तो उक्त लोह को तीक्ष्ण लोह कहा जाता है ॥ ८ ॥ कान्तलोहस्य लक्षणम् कान्तपाषाणजं लोहं कान्तलोहं प्रकीर्तितम् । आध्मातकान्तपाषाणसत्त्वभूतं तु तन्मतम् ॥ ६ ॥ कान्तलोहन्तु आध्मातकान्तपाषाणसत्त्वभूतमेवेति तत्परिचयः केवलमुक्तः । यद्यपि च प्राचीनतन्त्रेषु तत्र तत्र “यत्पात्रे न प्रसरति जले तैलबिन्दुर्निक्षिप्तो हिंगुर्गन्धं त्यजति च निजां तिक्ततां निम्बकल्कः । तप्तं दुग्धं भवति शिखरा कारकं नैति भूमिं कृष्णाङ्गः स्यात् सजलचणकः कान्तलोहं तदुक्तम् ॥” इति कान्तलोहलक्षणमुक्तम् । तथापि एतलक्षणलक्षितलोहस्यानुपलभ्यत्वात् उपल- भ्यमानकान्तपाषाणसत्त्वभूतं च लोहे उक्तलक्षणानुपलम्भात् यथाप्राप्तं तत्त्वस्व- रूपमात्रमुक्तमिति विचित्रं लक्षणं नोपश्लोकितमाचार्यैरित्यवधेयम् ॥६॥ भा.टी.-कान्तपाषाण को तपाने से प्राप्त होनेवाले सत्त्वस्वरूप लोह को कान्तलोह कहा जाता है ॥ ६ ॥ वक्तव्य--आगे लिखे जानेवाले प्राचीन मत से कान्तलोह के लक्षणों से युक्त लोह आज तक कहीं भी प्राप्त नहीं हो सका है । साथ ही यहाँ पर कान्त, पाषाणसत्वरूप कान्तलोह में भी प्राचीनमत के लक्षण नहीं मिलते हैं । इसी कारण से यहाँ अपना विचार दिखाकर इस वाद-विवाद को छोड़ दिया है। और प्राचीन मत भी कान्तलोह के विषय में दिखा दिया है कि कोई अन्वेषक इस तरह यदि खोज करना चाहे तो इस प्रकार कर सकता है । जिस लोह के पात्र में भरे हुए जल में तेल बूँद डालने से वह न फैले, और उस लोहपात्र में यदि नीम के पत्तों को पीस कर लेप कर दिया जाय तो उसमें कड़वापन न रहे। इसी तरह इस लोहपात्र में स्वच्छ चनों को जल के