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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

भाषाटीकासहित । ( २४५ ) भुक्त्वाऽऽकण्ठं तु तस्यान्ते खादेच्च गुटिकामिमाम् । तत्क्षणाज्जारयत्याशु पुनर्भोजनमिच्छति ॥ ४६ ॥ शंखकी भस्म, पांचों लवण, इमलीकी छालका खार, त्रिकुटा, हींग, विष, पारा और गंधक यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परि- माण लेकर चिराचिटे और चित्रकके क्वाथमें तथा कागजी नींबूके रसमें खरल करके चूर्ण कर लेवे । फिर इसको समस्त अम्लवर्गकी औषधि- योंमें भावना देकर गोली बना लेवे । यह औषधि अमृतके तुल्य है । इस औषधिके सेवन करनेसे तत्काल अग्निकी वृद्धि होती है और भस्मक रोग दूर होता है । कण्ठपर्यन्त भोजन कर लेनेपर इसकी एक गोली सेवन करे तो तत्काल सब भोजन जीर्ण होकर फिर भोजनकी इच्छा उत्पन्न होती है ॥ ४३-४६ ॥ हन्ति वातं तथा पित्तं कुष्ठानि विषमज्वरम् । गुल्मारुख्यं पाण्डुरोगञ्च निद्राऽऽलस्यमरोचकम् ॥४७॥ शूलञ्च परिणामोत्थं प्रमेहञ्च प्रवाहिकाम् । वक्त्रस्रावञ्च शोथञ्च दुर्नामानि विशेषतः ॥ ४८ ॥ इस औषधिके सेवन करनेसे वातरोग, पित्तरोग, कुष्ठ, विषम ज्वर, गुल्म, पांडु, निद्रा, आलस्य, अरुचि, शूल, परिणामशूल, प्रमेह, प्रवा- हिका, लालास्राव, शोथ और बवासीर नष्ट होती है । इसको बृहच्छङ्ख वटी कहते हैं ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ भक्तविपाक वटी । माक्षिकं रसगन्धौ च हरितालं मनःशिला । त्रिवृद्दन्तीवारिवाहं चित्रकञ्च महौषधम् ॥ ४९ ॥ पिप्पली मारिचं पथ्या यमानी कृष्णजीरकम् । रामठं कटुकापाठसैन्धवं साजमोदकम् ॥५०॥

( २४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । जातीफलं यवक्षारं समभागं विचूर्णयेत् । आर्द्रकस्य रसेनैव निर्गुण्ड्याः स्वरसेन च ॥ ५१ ॥ सूर्यावर्त्तरसेनैव तुलस्याः स्वरसेन च । आतपे भावयेद्वैद्यः खल्लपात्रे च निर्मले ॥ पेषयित्वा वटीं खादेद्गुञ्जाफलसमप्रभाम् ॥ ५२ ॥ सोनामाखी, पारा, गंधक, हरिताल, मैनशिल, निसोध, दंती, नागरमोथा, चित्रक, सोंठ, पीपल, मरिच, हरड़, अजवायन, काला जीरा, हींग, कुटकी, पाढ़, सेंधानमक, अजमोद, जायफल और जवा- खार इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर अदरख, सम्हालू, हुलहुल और तुलसी इन प्रत्येकके स्वरसकी सात सात भावना देवे और उत्तम खरलमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे ॥ ४९–५२ ॥ भुक्तोत्तरीये बहुभोजनान्ते मुहुर्मुहुर्वाञ्छति भोज- नानि । आमानुबन्धे च चिराग्निमान्द्ये विड्विग्रहे पित्तकफानुबन्धे ॥ ५३ ॥ शोथोदरे चार्शसि चाप्यजीर्णे शूले प्रदोषप्रभवे ज्वरे च । शस्ता वटी भक्तविपाकसंज्ञा सुखं विपाच्याशु निरस्य कोष्ठम् ॥ ५४ ॥ इस औषधिको भोजनके पश्चात् सेवन करनेसे वारंवार भोजन कर- नेकी अभिलाषा उत्पन्न होती है । आमानुबन्धी, बहुत समयकी मंदाग्नि, मलरोध, पित्त और कफका अनुबन्ध, शोथ, उदररोग, अर्श, अजीर्ण, दोषोंके प्रकोपसे उत्पन्न हुए शूल और ज्वर रोग नष्ट होते हैं । इसको भक्तविपाक वटी कहते हैं ॥ ५३ ॥ ५४ ॥

भाषाटीकासहित । (२४७) पञ्चामृत वटी । अभ्रकं पारदं ताम्रं गन्धकं मरिचानि च । समभागमिदं चूर्णं चाङ्गेरीरसमर्दितम् ॥ ५५ ॥ मर्दिते हि रसे भूयो जयन्तीसिन्धुवारयोः । • भावनाऽपि च कर्त्तव्या गुञ्जापरिमिता वटी ॥५६॥ तप्तोदकानुपानेन चतस्रस्तिस्र एव वा । वह्निमान्द्ये प्रदातव्या वट्यः पञ्चामृतास्तथा ॥५७॥ अभ्रक भस्म, पारा, तांबा भस्म, गन्धक और कालीमिरच यह सब औषधि समान भाग लेकर चांगेरी रसकी भावना देवे, फिर जयन्ती और सम्हालूके रसकी भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । मंदाग्नि रोगमें तीन या चार गोली गरम जलसे प्रयोग करे । इसको पञ्चामृतवटी कहते हैं ॥ ५५-५७ ॥ क्रव्याद रस । पलं रसस्य द्विपलं बलेः स्याच्छुल्वायसी चार्द्धप- लप्रमाणे । संचूर्ण्य सर्वं द्रुतमग्नियोगादेरण्डपत्रेऽथ निवेशनीयम् ॥५८॥ कृत्वाथ तां पर्पटिकां विदध्या- ल्लोहस्य पात्रे त्ववपूत मस्मिन् । जम्बीरजं पक्वरसं पलानां शतं नियोज्याग्निमथालपमल्पम् ॥ ५९ ॥ जीर्णे रसे भावितमेतदेतैः सुपञ्चकोलोद्भववारिपूरैः । सवेतसाम्लैः शतमत्र योज्यं समं रजष्टंकणजं सुभृष्टम् ॥ ६० ॥ विडं तदर्द्धं मरिचं समञ्च तत्सप्तवारं चणकाम्लकेन । क्रव्यादनामा भवति

( २४८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रसिद्धो रसस्तु मन्थानकभैरवोक्तः ॥ माषद्वयं सैन्धवतक्रपीतमेतत्सुधन्यं खलु भोजनान्ते ॥ ६१ ॥ पारा १ पल, गंधक २ पल, तांबा भस्म आधा पल, लोहाभस्म आधा पल इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर अग्निके योगसे गला लेवे और एरण्डके पत्तोंपर ढाल देवे, जब यह पर्पटीके समान हो जाय तब पीसकर चूर्ण कर लेवे । फिर जम्भीरी नींबूके १०० पल रसमें यह चूर्ण डालकर मंद मंद अग्निसे पकावे, फिर पंचकोल, बिजौरा नींबू और अमलवेत इन प्रत्येकके एकसौ पल रसकी भावना देवे । पश्चात् इसमें सुहागा १६ तोला, संचरनमक सबसे आधा और काली मिरच सबके बराबर मिलाकर चनाखारकी सात भावना देवे । पश्चात् इसकी दो दो मासेकी गोली बनाकर नित्य एक गोली तक्र और सेंधानमकके साथ भोजनके अंतमें सेवन करे ॥ ५८-६१ ॥ गुरूणि मांसानि पयांसि पिष्टं घृतानि सेव्यानि फलानि चापि । मात्रातिरिक्तान्यपि सेवितानि यामद्वयाज्जारयति प्रसिद्धः ॥६२॥ कार्श्यस्थौल्य- निबर्हणो गरहरः सामार्त्तिनिर्णाशनो, गुल्मप्लीह- निषूदनो ग्रहणिकाविध्वंसनः संसनः। वातश्लेष्म- निबर्हणः श्रमहरः शूलार्तिशूलापहो, वातग्रन्थि- महोदरापहरणः क्रव्यादनामा रसः ॥ ६३ ॥ भारी पदार्थ, मांस, दूध, मिष्टान्न और पक्वान्न, घृत और फल खूब पेट भरकर भोजन करके इस औषधिके सेवन कर लेने पर दो प्रहरमें समस्त जीर्ण हो जाता है । इस औषधिके सेवन करनेसे कृशता, स्थूलता, विषदोष, आमरोग, गुल्म, प्लीहा, संग्रहणी, वात- कफज रोग, श्रम, शूल, वातज ग्रंथि और उदररोग नष्ट होते हैं । इसको क्रव्याद रस कहते है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥

भाषाटीकासहित । ( २४९ ) ज्वालानल रस । क्षारद्वयं सूतगन्धौ पञ्चकोलमिदं समम् । सर्वतुल्या जया देया तदर्द्धं शिग्रुवल्कलम् ॥ ६४ ॥ एतत्सर्वं जयाशिग्रुवह्निमार्कवजै रसैः । भावयेत्त्रिदिनं घर्मे ततो लघुपुटे पचेत् ॥ ६५ ॥ भावयेत्सप्तधा चार्द्रद्रवैर्ज्वालानलो भवेत् । पाचनो दीपनो हृद्यश्चोदरामयनाशनः ॥ ६६ ॥ जवाखार, सज्जीखार, पारा, गंधक और पंचकोल यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबकी बराबर भांग लेवे, भांगसे आधा भाग सहिंजनेकी छाल लेवे। इन सबको एकत्र करके भांग, संहजना, चित्रक और भांगरा इन प्रत्येकके रसकी तीन दिनतक भावना देवे । फिर धूपमें सुखाकर लघुपुटमें पकावे । फिर अदरखके रसमें सात वार भावना देवे । यह औषधि अत्यंत पाचक, अग्निप्रदीपक, हृदयको हितकारी और उदररोग को दूर करती है । इसको ज्वालानल रस कहते हैं ॥ ६४-६६ ॥ अमृतावटी । अमृतवराटमरिचैर्द्विपञ्चनवभागयोजितैः क्रमशः । वटिका मुद्गसमाना कफत्रिदोषवह्निमांद्यहारिणी ॥६७॥ शुद्ध विष २ भाग, कौड़ीकी भस्म ५ भाग, काली मिरच ९ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र जलमें पीसकर मूंगकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे कफादि त्रिदोष और मंदाग्नि नष्ट होती है । इसको अमृतावटी कहते हैं ॥ ६७ ॥ बृहद्भक्तपाक वटी । अभ्रं पारदगन्धकौ सदरदौ ताम्रञ्च तालं शिला, वङ्गञ्च त्रिफला विषञ्च कुनटी भागास्त्रयो दन्तिनः ।

( २५० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शृङ्गीव्योषयमानि चित्रजलदं द्वे जीरके टंकण,- मेलापत्रलवंगहिंगुकटुकीजातीफलं सैन्धवम् ॥६८॥ एतान्यार्द्रकचित्रदन्तिसुरसावासारसैर्बिल्वजैः, पत्रो- त्थैरपि सप्तधा सुविमले खल्ले विभाव्यान्यतः । खादेद्वल्लमितं तथा च सकलव्याधौ प्रयोज्या बुधै- र्विद्बन्धे कफजे त्रिदोषजनिते ह्यामानुबन्धेऽपि च ॥ ६९ ॥ मन्दाग्नौ विषमज्वरे च सकले शूले त्रिदोषोद्भवे, हन्यात्तानपि भक्तपाकवटिका भूयश्च सामं जयेत् ॥ ७० ॥ अभ्रक भस्म, पारा, गंधक, सिंग्रफ, तांबा भस्म, हरितालभस्म, मैनाशिलभस्म, वंगभस्म, त्रिफला, विष और नैपाली मैनशिल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, दंती ३ भाग, काकड़ासिंगी, त्रिकुटा, अजवायन, चित्रक, नागरमोथा, जीरा, कालाजीरा, सुहागा, इलायची, तेजपात, लौंग, हींग, कुटकी, जायफल और सेंधानमक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग; इन सब औषधियोंको एकत्र करके अदरख, चित्रक, दंती, तुलसी, अडूसा और बेलके पत्ते इन प्रत्येकके रसकी सात सात भावना देवे । इसको सब प्रकारके रोगोंमें तीन रत्ती परिमाण प्रयुक्त करनी चाहिये । कफजन्य मलरोध, त्रिदोषजनित आमानुबन्ध, अग्निमांद्य, विषमज्वर और त्रिदोषजनित शूल रोगमें यह औषधि अतीव हितकारी है । इसको भक्तपाक वटी कहते हैं॥६८-७०॥ लवङ्गादि वटी । लवंगशुण्ठीमरिचानि भृष्टसौभाग्यचूर्णानि समानि कृत्वा । भाव्यान्यपामार्गहुताशवारा प्रभूत- मांसादिकजारणाय ॥ ७१ ॥

भाषाटीकासहित । (२६१) लौंग, सोंठ, काली मिरच और भुना हुआ सुहागा इन सब औष- धियोंको समान भाग लेकर चिरचिटे और चित्रकके रसकी सात सात भावना देकर गोलियां बना लेवे । इस औषधिके भक्षण करनेसे भारी पदार्थ और देरमें पचनेवाले मांसादि पदार्थ शीघ्र ही पच जाते हैं । इसको लवंगादि वटी कहते हैं ॥ ७१ ॥ बृहल्लवंगादि वटी । लवङ्गजातीफलधान्यकुष्ठं जीरद्वयं त्र्यूषणत्रैफलञ्च । एलात्वचं टंकवराटमुस्तं वचाजमोदाविडसैन्धवञ्च ॥ ७२ ॥ तदर्धकं पारदगन्धमभ्रं लौहञ्च तुल्यं सुविचूर्ण्य सर्वम् । तन्नागवल्लीदलतोयपिष्टं वल्ल- प्रमाणां वटिकाञ्च कृत्वा ॥ ७३॥ प्रातर्विदद्यादपि चोष्णतोयैरियं निहन्याद्ग्रहणीविकारम् । आमानु- बन्धं सरुजं प्रवाहं ज्वरं तथा श्लेष्मभवं सशूलम् ॥ ७४ ॥ कुष्ठाम्लपित्तं प्रबलं समीरं मन्दानलं कोष्ठगतञ्च वातम् । वटी लवङ्गाद्यवसुप्रणीता तथाऽऽमवातं विनिहन्ति शीघ्रम् ॥ ७५ ॥ लौंग, जायफल, धनिया, कूठ, जीरा, काला जीरा, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, इलायची, दालचीनी, सुहागा, कौड़ीकी भस्म, नागरमोथा, वच, अजमोद, विडनमक और सेंधानमक यह समस्त प्रत्येक औषधि एक एक भाग और पारा, गंधक, अभ्रक- भस्म, लोहाभस्म यह प्रत्येक औषधि आधा आधा भाग; इन सब औषधियोंको एकत्र कर पानके रसमें खरलकर तीन तीन रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके प्रातःकाल गरम जलके साथ सेवन कर- नेसे संग्रहणी रोग, आमसहित पीड़ायुक्त प्रवाहिका, ज्वर, कफजनित

( २६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शूल,कुष्ठ,अम्लपित्त,प्रबल वातरोग, मंदाग्नि और कोष्ठगत वात रोगोंको शीघ्र ही नष्ट करती है । इसको बृहल्लवंगादि वटी कहते हैं ॥७२-७५॥ जातीफलादि वटी । जातीफलं लवंगञ्च पिप्पलीं सिन्धुरामृतम् । शुण्ठीधूस्तूरबीजञ्च दरदं टंकणन्तथा ॥ ७६ ॥ समं सर्वं समाहृत्य जम्भाम्भसा विमर्दयेत् । वल्लमाना वटी कार्या चाग्निमान्द्यप्रशान्तये ॥ ७७॥ जायफल, लौंग, पीपल, सम्हालूके पत्ते, विष, सोंठ, धतूरेके बीज, सिंग्रफ और सुहागा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जम्बीरी नींबूके रसमें भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलि- योंके यथोचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे अग्निमांद्य रोग नष्ट होता है । इसको जातीफलादि वटी कहते हैं ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ शंखवटी । सार्धकर्षं रसेन्द्रस्य गन्धकस्य तथैव च । विषं कर्षत्रयं दद्यात्सर्वतुल्यं मरीचकम् ॥ ७८ ॥ दग्धशंखञ्च तत्तुल्यं पञ्च कर्षाणि नागरात् । स्वर्जिका रामठकणा सिन्धुसौवर्चलं विडम् ॥७९ ॥ सामुद्रमौद्भिदञ्चैव भावयेन्निम्बुकद्रवैः । वटी ग्रहण्यम्लपित्तशूलघ्नी वह्निदीपनी ॥ ८० ॥ वह्निमान्द्यकृतान् रोगान्सामदोषं विनाशयेत् ॥८१॥ पारा १॥ तोले, गन्धक १॥ तोले, विष ३ तोले, काली मिरच ६ तोले, शंखकी भस्म ६ तोले, सोंठ ५ तोले, सज्जी ५ तोले, हींग ५ तोले, पीपल ५ तोले, सेंधानमक ५ तोले, कालानमक ५ ताल,

भाषाटीकासहित । ( २५३ ) विडनमक ५ तोले, सामुद्रक नमक ५ तोले और सांभर नमक ५ तोले इन सब औषधियोंमें एकत्र अच्छे प्रकारसे कागजी नींवूके रसकी भावना देकर गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे संग्रहणी, अम्लपित्त और शूल रोग नष्ट होते हैं । अग्नि दीप्त होती है, मन्दाग्निजन्य रोग और आमदोष नष्ट होते हैं । इसको शंखभस्म- वटी अथवा शंखवटी कहते हैं ॥ ७८-८१ ॥ चिन्तामणि रस । रसं गन्धो मृतं ताम्रं मृतमभ्रं फलत्रयम् । त्र्यूषणं दन्तिबीजञ्च सर्वं खल्ले विमर्दयेत् ॥८२॥ द्रोणपुष्पीरसैश्चापि भावयेच्च पुनः पुनः । अस्य मात्रा प्रदातव्या गुञ्जैका वा त्रिगुञ्जिका ॥८३॥ चिन्तामणिरसो ह्येष चाजीर्णे शस्यते सदा । आमवातं ज्वरं हन्ति सर्वशूलनिषूदनः ॥८४॥ पारा, गन्धक, तांबा भस्म, अभ्रक भस्म, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, जमालगोटा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर गूमाके रसकी सात भावना देवे, पश्चात् एक रत्तीसे तीन रत्तीतककी गोली बनावै । यह औषधि अजीर्ण रोगमें अतीव हितकारी है । इससे आमवात, ज्वर और सब प्रकारका शूल नष्ट होजाता है । इसको चिन्तामणि रस कहते हैं ॥ ८२-८४ ॥ प्रदीपन रस । रसनिष्कं गन्धनिष्कं निष्कमात्रं प्रदीपनम् । मानमर्द्धं प्रदातव्यं चुल्लिका लवणं भिषक् ॥ ८५ ॥ मर्दयित्वा प्रदातव्यमथास्य माषमात्रकम् । अजीर्णे चाग्निमान्द्ये च दातव्यो रसवल्लभः ॥ ८६ ॥

( २५४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा आधा तोला, गन्धक आधा तोला, विष आधा तोला और चूलही लवण ३ मासे इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर एक मासे परिमाण जलके साथ सेवन करे तो अजीर्ण रोग और अग्निमांद्य रोग नष्ट होते हैं । इसको प्रदीपन रस कहते हैं ॥ ८५-८६ ॥ विजय रस । रसस्यैकं पलं दत्त्वा नागञ्च गन्धकं पलम् । क्षारत्रयं पलं देयं लवंगं पलपञ्चकम् ॥ ८७ ॥ दशमूलीजयाचूर्णं तद्द्रवेण तु भावयेत् । चित्रकस्य रसेनाथ भृङ्गराजरसेन तु ॥ ८८ ॥ शिग्रुमूलद्रवैश्चापि ततो भाण्डे निरुध्य च । याममात्रं पचेदग्नौ मर्दयेदार्द्रकद्रवैः ॥ ८९ ॥ ताम्बूलीपत्रसंयुक्तं खादेन्निष्कमितं सदा ॥ ९० ॥ पारा १ पल, सीसा भस्म १ पल, गन्धक १ पल, जवाखार १ पल, सज्जी १ पल, सुहागा १ पल, लौंग ५ पल, दशमूल ५ पल, भांगका चूर्ण ५ पल इन सब औषधियोंको एकत्र करके चीतेकी जड़, भांगरा और सहिंजनेकी जड़ इन प्रत्येकके रसकी सात सात भावना देवे । पश्चात् एक हांडीमें रखकर उसका मुख बंद करके एक प्रहर- तक अग्नि देवे । जब अपने आप शीतल होजाय तब उसको अदरखके रसमें खरल करके चार चार मासे पानमें रखकर सेवन करना चाहिये । इसको विजय रस कहते हैं ॥ ८७-९० ॥ महाभक्तपाक वटी । माक्षिकं रसगन्धौ च हरितालं मनःशिला । गगनं कान्तलौहञ्च सर्वमेतच्च कार्षिकम् ॥ ९१ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३५६ ) त्रिवृद्दन्ती वारिवाहं चित्रकञ्च महौषधम् । पिप्पलीमरिचं पथ्या यवानी कृष्णजीरकम् ॥ ९२॥ रामठं कटुकापानी सैन्धवं साजमोदकम् । जातीफलं यवक्षारं समभागं विचूर्णयेत् ॥ ९३ ॥ आर्द्रकस्य रसेनैव निर्गुण्ड्याः स्वरसेन च । सूर्यावर्तरसेनैव ज्योतिष्मत्या रसेन च ॥ ९४ ॥ आतपे भावयेद्वैद्यः कृत्वा गुञ्जामितां वटीम् । भक्षयेत्तां वटीं प्राज्ञो लवङ्गेन नियोजिताम् ॥ ९५॥ भुक्तोत्तरीये बहुभोजनान्ते आमानुबन्धे चिरवह्निमान्द्ये । विड्विग्रहे वातकफानुबन्धे शोथोदरानाहगदेऽप्यजीर्णे । शूले त्रिदोषप्रभवे ज्वरेच शस्ता वटी भक्तविपाकसंज्ञा ॥ ९६ ॥ सोनामखी भस्म, पारा, गंधक, हरताल भस्म, मैनशिल, अभ्रकभस्म और कान्तलोह भस्म, यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला; निसोध, दंतीकी जड़, नागरमोथा, चीतेकी जड़, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, अजवायन, काला जीरा, हींग, कटुकापानी ( मकोय ), सेंधानमक, अजमोद, जायफल और जवाखार इन सब औषधियोंको भी एक एक तोला- लेकर अदरख, सम्हालू, हुलहुल और मालकांगुनी इन प्रत्येकके रसमें सात सात भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । भोजनके अन्तमें, अथवा बहुत भोजन करनेपर, आमके रोगोंमें, बहुत दिनोंके अग्निमांद्यरोगमें, मलावरोध, वात और कफ संबन्धी रोगोंमें, शोथरोगमें, उदररोगमें, आनाहरोगमें, अजीर्णरोगमें, शूल और त्रिदोषज रोगमें, तथा ज्वर इन सब रोगोंमें यह औषधि लवंगोंके साथ खाना अतीव हितकारी है । इसको महाभक्तपाक वटी कहते हैं ॥ ९१-९६ ॥

( २५६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । रसराक्षस । ताम्रं पारदगन्धकं त्रिकटुकं तीक्ष्णञ्च सौवर्चलं, खल्ले मर्द्य दिनं निधाय सिकतात्कुम्भेषु यामं ततः । स्विन्नं तेष्वपि रक्तशाकिनिभवं क्षारं समं भावये- देकीकृत्य च मातुलुंगकजलैर्नाम्ना रसो राक्षसः॥९७॥ तांबाभस्म, पारा, गंधक, सोंठ, पीपल, मरिच, तीक्ष्ण लोहभस्म, कालानमक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर वालुकासे भरे हुए कुम्भमें स्थापन करके एक प्रहर तक पकावे । जब शीतल हो जाय तब उसमेंसे औषधिको निकालकर उसमें एक भाग लाल पुनर्नवेका खार मिलाकर बिजौरे नींबूके रसकी सात भावना देवे । इसको यथोचित मात्रानुसार रोगीको सेवन करावे । इसको राक्षस रस कहते हैं ॥ ९७ ॥ त्रिफला लोह । त्रिफलामुस्तवेल्लैश्च सितया कणया समम् । खरमञ्जरिबीजैश्च लौहं भस्मकनाशनम् ॥ ९८ ॥ हरड़, बहेडा, आमला, नागरमोथा, वायविडंग, मिश्री, पीपल, चिर- चिटेके बीज यह प्रत्येक एक एक भाग और सबकी बराबर लोहभस्म इन सबको एकत्र पीसकर गोली बनाकर प्रयोग करनेसे भस्मक रोग नष्ट होता है ॥ ९८ ॥ विषूच्यञ्जन । अपामार्गस्य पत्रं च मरिचञ्च समं समम् । अम्लेरोलीयुतं पिष्टमञ्जनात्सूचिकां जयेत् ॥ ९९ ॥ चिरचिटेके पत्ते और कालीमिरचोंको समान भाग लेकर चांगेरीके रसमें घिसकर नेत्रोंमें लगानेसे विषूचिका रोग नष्ट होता है ॥ ९९ ॥

भाषाटीकासहित । (२५७) अग्निकुमार रस । टंकणं रसगन्धौ च समं भागत्रयं विषात् । कपर्दशंखयोर्द्व्यंशं वसुभागं मरीचकम् । दिनं जम्भारम्भसा पिष्टं वल्लमात्रं प्रदापयेत्॥१००॥ विषूचीशूलविष्टम्भवह्निमान्द्ये ज्वरे तथा । अजीर्णे संग्रहण्याञ्च सिद्धश्चाग्निकुमारकः ॥१०१॥ सुहागा,पारा और गंधक यह प्रत्येक एक २ भाग,विष तीन भाग, कौडीकी भस्म और शंख भस्म तीन २ भाग, कालीमिरच ८ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इसको विषूचिका, शूल, विष्टम्भ, मंदाग्नि, ज्वर, अजीर्ण, संग्रहणी आदि रोगोंमें प्रयुक्त करे । इसको अग्निकुमार रस कहते हैं ॥ १०० ॥ १०१ ॥ शंखवटी । द्वौ क्षारौ रसगन्धकौ सलवणौ क्षारेण तुल्यं विषं, चिञ्चा शङ्खचतुर्गुणं रसवरैर्निम्पाकजातैः कृतम् । वारंवारमिदं सुपाकरचितं लौहं क्षिपेद्धिङ्गुके, भूयष्टङ्कसमं सुमर्दितमिदं गुञ्जाप्रमाणं भजेत् ॥ २॥ ख्याता शङ्खवटी महाग्निजननी शूलान्तकृत्पाचनी, कासश्वासविनाशिनी क्षयहरी मन्दाग्निसन्दीपनी । वातव्याधिमहोदरादिशमनी तृष्णामयोच्छेदिनी, सर्वव्याधिनिषूदनी क्रिमिहरी दुष्टामयध्वंसिनी॥३॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहेऽजीर्णाधिकारः ।

( ३५८ ) रसेंद्रसारसंग्रह । जवाखार, सज्जीखार, पारा, गंधक, सेंधानमक, विडनमक और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेवे । इमलीका खार चार तोले, शंखकी भस्म चार तोले लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र कागजी- नींबूके रसमें सात वार भावना देकर पश्चात् उसमें लोहा भस्म १ भाग, हींग १ भाग और सुहागा १ भाग मिलाकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । यह गोली अग्निको अतिशय दीपन करती है । शूलको नष्ट करती है, पाचक तथा श्वास, खांसी और क्षयरोगको नष्ट करती है। मंदा- ग्निको दीपन करनेवाली, वातव्याधि, उदररोग, तृषा, कृमि और समस्त दुष्ट रोग नाशक है । इसको शंखवटी कहते हैं ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ इति अजीर्णरोगचिकित्सा समाप्त । अथ क्रिमिरोगचिकित्सा । क्रिमिकालानल रस । विडंगं द्विपलञ्चैव विषचूर्णं तदर्द्धकम् ॥ लौहचूर्णं तदर्द्धञ्च तदर्द्धं शुद्धपारदम् ॥ १ ॥ रसतुल्यं शुद्धगन्धं छागीदुग्धेन पेषयेत् । छायाशुष्कां वटीं कृत्वा खादेत्षोडशरक्तिकाम्॥२॥ धान्यजीरातुपानेन नाम्ना कालानलो रसः । उदरस्थं क्रिमिं हन्याद्ग्रहण्यर्शःसमन्वितम् ॥ ३ ॥ अग्निदः शोथशमनो गुल्मप्लीहोदराञ्जयेत् । गहनानन्दनाथेन भाषितो विश्वसम्पदे ॥ ४ ॥ वायविडंग २ पल, शुद्ध विष १ पल, लोहभस्म आधापल, शुद्ध पारा १ तोला और शुद्ध गंधक १ तोला इन सबको एकत्र पीसकर बकरीके दूधमें खरल कर सोलह सोलह रत्तीकी गोली बना लेवे और

भाषाटीकासहित । (२५९) छायामें सुखा देवे । धनिये और जीरेके अनुपानके साथ सेवन करनेसे संग्रहणी, अर्श और समस्त क्रिमिरोग नष्ट होते हैं । यह अग्निको अत्यन्त दीपन करनेवाला, तथा सूजन, गुल्म और प्लीहोदर रोगको दूर करता है । संसारके हितके लिये श्रीमद्गहनानन्दनाथने यह कहा है । इसको क्रिमिकालानल रस कहते हैं ॥ १-४ ॥ क्रिमिविनाश रस । शुद्धसूतं समं गन्धमभ्रं लोहं मनःशिला । धातकी त्रिफला लोध्रं विडंगं रजनीद्वयम् ॥ ५ ॥ भावयेत्सप्तधा सर्वं शृंगवेरभवै रसैः । चणमात्रां वटीं कृत्वा त्रिफलारससंयुताम् ॥ ६ ॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय क्रिमिरोगोपशान्तये । वातिकं पैत्तिकं हन्ति श्लैष्मिकञ्च त्रिदोषजम् । क्रिमिविनाशनामायं क्रिमिरोगकुलान्तकः ॥ ७ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, अभ्रकभस्म, लोहभस्म, मैनशिल, धायके फूल, हरड़, बहेड़ा, आमला, लोध, वायविडंग, हलदी, दारु- हलदी यह सब औषधि समान भाग लेकर अदरखके रसकी सात भावना देकर चनेकी बराबर गोली बना लेवे । प्रातःकाल त्रिफलेके रसके द्वारा सेवन करनेसे वातज, पित्तज, कफज और त्रिदोषज क्रिमिरोग दूर होते हैं । यह क्रिमिरोगोंका नाशक है । इसको क्रिमि- विनाश रस कहते हैं ॥ ५-७ ॥ क्रिमिरोगारि रस । सूतं गन्धं मृतं लोहं मरिचं विषमेव च । धातकी त्रिफला शुण्ठी मुस्तकं सरसाञ्जनम् ॥ ८ ॥ त्रिकटु मुस्तकं पाठा वालकं बिल्वमेव च । भावयेत्सर्वमेकत्र स्वरसैर्भृङ्गजैस्ततः ॥ ९ ॥

( २६० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वराटिकाप्रमाणेन भक्षणीयो विशेषतः । क्रिमिरोगविनाशाय रसोऽयं क्रिमिनाशनः ॥ १० ॥ पारा, गन्ध, लोहाभस्म, कालीमिरच, विष, धायके फूल, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, नागरमोथा, रसौंत, त्रिकुटा, मोथा,पाठ,सुगंध- वाला और बेलगिरी इन सबको एकत्र खरल करके भांगरेके रसकी सात भावना देवे । फिर इसमेंसे एक कौड़ीभर सेवन करनेसे क्रिमिरोग नष्ट होता है । इसको क्रिमिरोगारि रस कहते हैं ॥ ८-१० ॥ कीटमर्द रस । शुद्धसूतं शुद्धगन्धमजमोदाविडङ्गकम् । विषमुष्टि ब्रह्मबीजं क्रमाद्द्विगुणितं भवेत् ॥ ११ ॥ चूर्णयेन्मधुना मिश्रं निष्कैकं क्रिमिजिद्भवेत् । कीटमर्दो रसो नाम मुस्ताक्वाथं पिबेदनु ॥१२॥ पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, अजमोद ४ भाग,वायविडंग ८ भाग, कुचला १६ भाग और ढाकके बीज ३२ भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर प्रतिदिन इसमेंसे चार मासे परिमाण शहतमें मिलाकर सेवन करे तो क्रिमिरोग नष्ट होता है । इसके ऊपर नागरमोथेका क्वाथ पान करे । इसको कीटमर्द रस कहते हैं ॥ ११ ॥ १२ ॥ क्रिमिघ्न रस । क्रिमिघ्नं किंशुकारिष्टबीजं सुरसभस्मकम् । वल्लद्वयं चाखुकर्णीरसैः क्रिमिविनाशनः ॥ १३ ॥ वायविडंग, ढाकके बीज, नीमके बीज और तुलसीके पत्तोंकी भस्म इन सबको समान भाग लेकर चूर्ण कर ले । फिर इस चूर्णमेंसे चार रत्ती परिमाण लेकर मूसाकानीके रसके साथ पान करनेसे क्रिमिरोग नष्ट होता है । इसको क्रिमिघ्न रस कहते हैं ॥ १३ ॥

[da with dirgha ee] -> सन्दी. Then (pa), (ya), त्य (tya), ग्नि (gni), (ma), यं (yam). So it is सन्दी Rogue? NO, don't output Latin letters! It is सन्दी followed by पयत्यग्निमयं: Let's write it in Devanagari only: सन्दी + पयत्यग्निमयं = सन्दी + पयत्यग्निमयं. Wait, is there a space? In the image: जांश्च रोगान् सन्दी Rogue... -> Look at the space between रोगान् and सन्दी...: There is a space after रोगान्. Then सन्दी and पयत्यग्निमयं are joined! Wait, look at line 7: जांश्च रोगान् सन्दी - wait, is there a space between सन्दी and पयत्यग्निमयं? No, it's one continuous word: सन्दी Rogue -> wait, look at the text: न् दी त्य ग्नि यं त्रि रा त्रा त् ॥१५॥ Yes! सन्दी + पयत्यग्निमयं

( २६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गोली बना लेवे। प्रातःकाल तीन गोलियोंका सेवन करे और ऊपरसे शीतल जलका अनुपान करे तो केवल पैत्तिक क्रिमिरोग तथा कदाचित वातपैत्तिक क्रिमिरोग भी नष्ट होता है। इसको श्रीमान् गहनानन्दनाथने कहा है। इसको क्रिमिशूलिजलप्लव रस कहते हैं ॥ १६-१८ ॥ क्रिमिकाष्ठानल रस । विशुद्धं पारदं गन्धं वङ्गं तालं वराटकम् । मनःशिला कृष्णकाचं सोमराजीं विडङ्गकम् ॥१९॥ दन्तीबीजञ्च जैपालं शिवा टङ्कणचित्रकम् । कर्षमात्रन्तु प्रत्येकं वज्रीक्षीरेण मर्दयेत् ॥ २० ॥ कलायसदृशीं कृत्वा वटिकां भक्षयेत्ततः । क्रिमिकाष्ठानलो नाम रसोऽयं परिनिर्मितः ॥ श्लैष्मिके श्लेष्मपित्ते च श्लेष्मवाते च शस्यते ॥२१॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, वंगभस्म, हरतालभस्म, कौड़ीकी भस्म, मैन- शिल, काले रंगका कांच, बावची, वायविडंग, दन्तीके बीज, जमाल- गोटा, हरड़, सुहागा और चित्रककी जड़ यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेकर थूहरके दूधमें खरल करके मटरकी बराबर गोली बना लेवे। इस औषधिके सेवन करनेसे कफजक्रिमि, कफपित्तजक्रिमि और कफवातजक्रिमि रोग नष्ट होता है । इसको क्रिमिकाष्ठानल रस कहते हैं ॥ १९-२१ ॥ लाक्षादि वटी । लाक्षाभल्लातश्रीवासश्वेतापराजिताशिका । अर्जुनस्य फलं पुष्पं विडङ्गमथ गुग्गुलुः ॥ २२ ॥ एभिः कीटाश्च शाम्यन्ते तिष्ठतापि गृहे सदा ।

भाषाटीकासहित । ( २६३ ) भुजङ्गा मूषिका दंशाः संघनामा मतङ्गजाः । दूरादेव पलायन्ते किं न कीटाश्च ये पराः ॥ २३ ॥ लाख, भिलावे, श्रीवासका गोंद ( गंधबिरोजा ), सुफेद कोइलकी जड़, अर्जुनके फल, अर्जुनके फूल, वायविडंग और गूगल इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र मर्दन करके गोली बना लेवे; इन गोलियोंके सेवन करनेसे क्रिमिरोग नष्ट होता है । जिस घरमें यह औषधि स्थित रहती है उस घरमेंसे साँप, चूहे, डांस, मकोड़े आदि जीव दूर भाग जाते हैं । इसको लाक्षादि वटी कहते हैं ॥ २२ ॥ २३ ॥ क्रिमिहर रस । शुद्धसूतमिन्द्रयवमजमोदा मनःशिला । पलाशबीजं गन्धश्च देवदाल्या द्रवैर्दिनम् ॥ २४ ॥ संमर्द्य भक्षयेन्नित्यं शालपर्णीरसैः सह । सितायुक्तं पिबेच्चानु क्रिमिपातो भवत्यलम्॥ २५ ॥ पारा, इन्द्रजौ, अजमोद, मैनशिल, ढाकके बीज और गंधक इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर देवदाली ( वंदाल ) के रसमें एक दिन तक खरल करके गोली बना लेवे, शालिपर्णीके रस और मिश्रीके साथ इन गोलियोंके सेवन करनेसे उदरस्थित सम्पूर्ण क्रिमि नष्ट हो जाते हैं । इसको क्रिमिहर रस कहते हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥ विडंगलोह । रसं गन्धञ्च मरिचं जातीफललवंगकम् । कणा तालं शुण्ठि टङ्कं प्रत्येकं भागसम्मितम् ॥ २६ ॥ सर्वचूर्णसमं लौहं विडङ्गं सर्वतुल्यकम् । लौहं विडङ्गकं नाम कोष्ठस्थक्रिमिनाशनम् ॥२७॥

( २६४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दुर्नाममरुचिश्चैव मन्दाग्निश्च विसूचिकाम् । शोथं शूलं ज्वरं हिक्कां श्वासं कासं विनाशयेत् ॥ २८॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे क्रिमिचिकित्सा । पारा, गंधक, कालीमिरच, जायफल, लौंग, पीपल, हरिताल, साँठ और सुहागा ये प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोह सबकी बरा- बर लेवे, सबको एकत्र पीसकर चूर्ण कर ले और सब चूर्णकी बराबर वायविडंगका चूर्ण मिलावे । इसको जलमें पीसकर यथोचित मात्रानु- सार यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करे तो कोष्ठगत क्रिमि, बवा- सीर, अरुचि, मंदाग्नि, विसूचिका, शोथ, शूल, ज्वर, हिक्का, श्वास और कास यह समस्त रोग नष्ट होते हैं ॥ २६–२८ ॥ इति क्रिमिरोग चिकित्सा । अथ पाण्डुरोगचिकित्सा । निशालोह । लोहचूर्णं निशायुग्मं त्रिफलारोहिणीयुतम् । प्रलिह्यान्मधुसर्पिर्भ्यां कामलापाण्डुशान्तये ॥ १ ॥ हलदी, दारुहलदी, हरड़, बहेडा, आमला और कुटकी यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और सबकी बराबर लोहेकी भस्म लेवे । इस औषधिके शहद और घीमें मिलाकर सेवन करनेसे पाण्डु और कामला रोग नष्ट होते हैं । इसको निशालोह कहते हैं ॥ १ ॥ धात्री लोह । धात्रीलौहरजोव्योषनिशाक्षौद्राक्षशर्कराः । भक्षणाद्विनिहन्त्याशु कामलाञ्च हलीमकम् ॥ २ ॥ आमले, लोहेकी भस्म, त्रिकुटा, हलदी, शहद, बहेड़ा और मिश्री इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार सेवन कर- नेसे कामला और हलीमकरोग दूर होते हैं ॥ २ ॥