रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
भाषाटीकासहित । (२६१) लौंग, सोंठ, काली मिरच और भुना हुआ सुहागा इन सब औष- धियोंको समान भाग लेकर चिरचिटे और चित्रकके रसकी सात सात भावना देकर गोलियां बना लेवे । इस औषधिके भक्षण करनेसे भारी पदार्थ और देरमें पचनेवाले मांसादि पदार्थ शीघ्र ही पच जाते हैं । इसको लवंगादि वटी कहते हैं ॥ ७१ ॥ बृहल्लवंगादि वटी । लवङ्गजातीफलधान्यकुष्ठं जीरद्वयं त्र्यूषणत्रैफलञ्च । एलात्वचं टंकवराटमुस्तं वचाजमोदाविडसैन्धवञ्च ॥ ७२ ॥ तदर्धकं पारदगन्धमभ्रं लौहञ्च तुल्यं सुविचूर्ण्य सर्वम् । तन्नागवल्लीदलतोयपिष्टं वल्ल- प्रमाणां वटिकाञ्च कृत्वा ॥ ७३॥ प्रातर्विदद्यादपि चोष्णतोयैरियं निहन्याद्ग्रहणीविकारम् । आमानु- बन्धं सरुजं प्रवाहं ज्वरं तथा श्लेष्मभवं सशूलम् ॥ ७४ ॥ कुष्ठाम्लपित्तं प्रबलं समीरं मन्दानलं कोष्ठगतञ्च वातम् । वटी लवङ्गाद्यवसुप्रणीता तथाऽऽमवातं विनिहन्ति शीघ्रम् ॥ ७५ ॥ लौंग, जायफल, धनिया, कूठ, जीरा, काला जीरा, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, इलायची, दालचीनी, सुहागा, कौड़ीकी भस्म, नागरमोथा, वच, अजमोद, विडनमक और सेंधानमक यह समस्त प्रत्येक औषधि एक एक भाग और पारा, गंधक, अभ्रक- भस्म, लोहाभस्म यह प्रत्येक औषधि आधा आधा भाग; इन सब औषधियोंको एकत्र कर पानके रसमें खरलकर तीन तीन रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके प्रातःकाल गरम जलके साथ सेवन कर- नेसे संग्रहणी रोग, आमसहित पीड़ायुक्त प्रवाहिका, ज्वर, कफजनित
( २६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शूल,कुष्ठ,अम्लपित्त,प्रबल वातरोग, मंदाग्नि और कोष्ठगत वात रोगोंको शीघ्र ही नष्ट करती है । इसको बृहल्लवंगादि वटी कहते हैं ॥७२-७५॥ जातीफलादि वटी । जातीफलं लवंगञ्च पिप्पलीं सिन्धुरामृतम् । शुण्ठीधूस्तूरबीजञ्च दरदं टंकणन्तथा ॥ ७६ ॥ समं सर्वं समाहृत्य जम्भाम्भसा विमर्दयेत् । वल्लमाना वटी कार्या चाग्निमान्द्यप्रशान्तये ॥ ७७॥ जायफल, लौंग, पीपल, सम्हालूके पत्ते, विष, सोंठ, धतूरेके बीज, सिंग्रफ और सुहागा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जम्बीरी नींबूके रसमें भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलि- योंके यथोचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे अग्निमांद्य रोग नष्ट होता है । इसको जातीफलादि वटी कहते हैं ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ शंखवटी । सार्धकर्षं रसेन्द्रस्य गन्धकस्य तथैव च । विषं कर्षत्रयं दद्यात्सर्वतुल्यं मरीचकम् ॥ ७८ ॥ दग्धशंखञ्च तत्तुल्यं पञ्च कर्षाणि नागरात् । स्वर्जिका रामठकणा सिन्धुसौवर्चलं विडम् ॥७९ ॥ सामुद्रमौद्भिदञ्चैव भावयेन्निम्बुकद्रवैः । वटी ग्रहण्यम्लपित्तशूलघ्नी वह्निदीपनी ॥ ८० ॥ वह्निमान्द्यकृतान् रोगान्सामदोषं विनाशयेत् ॥८१॥ पारा १॥ तोले, गन्धक १॥ तोले, विष ३ तोले, काली मिरच ६ तोले, शंखकी भस्म ६ तोले, सोंठ ५ तोले, सज्जी ५ तोले, हींग ५ तोले, पीपल ५ तोले, सेंधानमक ५ तोले, कालानमक ५ ताल,
भाषाटीकासहित । ( २५३ ) विडनमक ५ तोले, सामुद्रक नमक ५ तोले और सांभर नमक ५ तोले इन सब औषधियोंमें एकत्र अच्छे प्रकारसे कागजी नींवूके रसकी भावना देकर गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे संग्रहणी, अम्लपित्त और शूल रोग नष्ट होते हैं । अग्नि दीप्त होती है, मन्दाग्निजन्य रोग और आमदोष नष्ट होते हैं । इसको शंखभस्म- वटी अथवा शंखवटी कहते हैं ॥ ७८-८१ ॥ चिन्तामणि रस । रसं गन्धो मृतं ताम्रं मृतमभ्रं फलत्रयम् । त्र्यूषणं दन्तिबीजञ्च सर्वं खल्ले विमर्दयेत् ॥८२॥ द्रोणपुष्पीरसैश्चापि भावयेच्च पुनः पुनः । अस्य मात्रा प्रदातव्या गुञ्जैका वा त्रिगुञ्जिका ॥८३॥ चिन्तामणिरसो ह्येष चाजीर्णे शस्यते सदा । आमवातं ज्वरं हन्ति सर्वशूलनिषूदनः ॥८४॥ पारा, गन्धक, तांबा भस्म, अभ्रक भस्म, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, जमालगोटा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर गूमाके रसकी सात भावना देवे, पश्चात् एक रत्तीसे तीन रत्तीतककी गोली बनावै । यह औषधि अजीर्ण रोगमें अतीव हितकारी है । इससे आमवात, ज्वर और सब प्रकारका शूल नष्ट होजाता है । इसको चिन्तामणि रस कहते हैं ॥ ८२-८४ ॥ प्रदीपन रस । रसनिष्कं गन्धनिष्कं निष्कमात्रं प्रदीपनम् । मानमर्द्धं प्रदातव्यं चुल्लिका लवणं भिषक् ॥ ८५ ॥ मर्दयित्वा प्रदातव्यमथास्य माषमात्रकम् । अजीर्णे चाग्निमान्द्ये च दातव्यो रसवल्लभः ॥ ८६ ॥
( २५४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा आधा तोला, गन्धक आधा तोला, विष आधा तोला और चूलही लवण ३ मासे इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर एक मासे परिमाण जलके साथ सेवन करे तो अजीर्ण रोग और अग्निमांद्य रोग नष्ट होते हैं । इसको प्रदीपन रस कहते हैं ॥ ८५-८६ ॥ विजय रस । रसस्यैकं पलं दत्त्वा नागञ्च गन्धकं पलम् । क्षारत्रयं पलं देयं लवंगं पलपञ्चकम् ॥ ८७ ॥ दशमूलीजयाचूर्णं तद्द्रवेण तु भावयेत् । चित्रकस्य रसेनाथ भृङ्गराजरसेन तु ॥ ८८ ॥ शिग्रुमूलद्रवैश्चापि ततो भाण्डे निरुध्य च । याममात्रं पचेदग्नौ मर्दयेदार्द्रकद्रवैः ॥ ८९ ॥ ताम्बूलीपत्रसंयुक्तं खादेन्निष्कमितं सदा ॥ ९० ॥ पारा १ पल, सीसा भस्म १ पल, गन्धक १ पल, जवाखार १ पल, सज्जी १ पल, सुहागा १ पल, लौंग ५ पल, दशमूल ५ पल, भांगका चूर्ण ५ पल इन सब औषधियोंको एकत्र करके चीतेकी जड़, भांगरा और सहिंजनेकी जड़ इन प्रत्येकके रसकी सात सात भावना देवे । पश्चात् एक हांडीमें रखकर उसका मुख बंद करके एक प्रहर- तक अग्नि देवे । जब अपने आप शीतल होजाय तब उसको अदरखके रसमें खरल करके चार चार मासे पानमें रखकर सेवन करना चाहिये । इसको विजय रस कहते हैं ॥ ८७-९० ॥ महाभक्तपाक वटी । माक्षिकं रसगन्धौ च हरितालं मनःशिला । गगनं कान्तलौहञ्च सर्वमेतच्च कार्षिकम् ॥ ९१ ॥
भाषाटीकासहित । ( ३५६ ) त्रिवृद्दन्ती वारिवाहं चित्रकञ्च महौषधम् । पिप्पलीमरिचं पथ्या यवानी कृष्णजीरकम् ॥ ९२॥ रामठं कटुकापानी सैन्धवं साजमोदकम् । जातीफलं यवक्षारं समभागं विचूर्णयेत् ॥ ९३ ॥ आर्द्रकस्य रसेनैव निर्गुण्ड्याः स्वरसेन च । सूर्यावर्तरसेनैव ज्योतिष्मत्या रसेन च ॥ ९४ ॥ आतपे भावयेद्वैद्यः कृत्वा गुञ्जामितां वटीम् । भक्षयेत्तां वटीं प्राज्ञो लवङ्गेन नियोजिताम् ॥ ९५॥ भुक्तोत्तरीये बहुभोजनान्ते आमानुबन्धे चिरवह्निमान्द्ये । विड्विग्रहे वातकफानुबन्धे शोथोदरानाहगदेऽप्यजीर्णे । शूले त्रिदोषप्रभवे ज्वरेच शस्ता वटी भक्तविपाकसंज्ञा ॥ ९६ ॥ सोनामखी भस्म, पारा, गंधक, हरताल भस्म, मैनशिल, अभ्रकभस्म और कान्तलोह भस्म, यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला; निसोध, दंतीकी जड़, नागरमोथा, चीतेकी जड़, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, अजवायन, काला जीरा, हींग, कटुकापानी ( मकोय ), सेंधानमक, अजमोद, जायफल और जवाखार इन सब औषधियोंको भी एक एक तोला- लेकर अदरख, सम्हालू, हुलहुल और मालकांगुनी इन प्रत्येकके रसमें सात सात भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । भोजनके अन्तमें, अथवा बहुत भोजन करनेपर, आमके रोगोंमें, बहुत दिनोंके अग्निमांद्यरोगमें, मलावरोध, वात और कफ संबन्धी रोगोंमें, शोथरोगमें, उदररोगमें, आनाहरोगमें, अजीर्णरोगमें, शूल और त्रिदोषज रोगमें, तथा ज्वर इन सब रोगोंमें यह औषधि लवंगोंके साथ खाना अतीव हितकारी है । इसको महाभक्तपाक वटी कहते हैं ॥ ९१-९६ ॥
( २५६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । रसराक्षस । ताम्रं पारदगन्धकं त्रिकटुकं तीक्ष्णञ्च सौवर्चलं, खल्ले मर्द्य दिनं निधाय सिकतात्कुम्भेषु यामं ततः । स्विन्नं तेष्वपि रक्तशाकिनिभवं क्षारं समं भावये- देकीकृत्य च मातुलुंगकजलैर्नाम्ना रसो राक्षसः॥९७॥ तांबाभस्म, पारा, गंधक, सोंठ, पीपल, मरिच, तीक्ष्ण लोहभस्म, कालानमक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर वालुकासे भरे हुए कुम्भमें स्थापन करके एक प्रहर तक पकावे । जब शीतल हो जाय तब उसमेंसे औषधिको निकालकर उसमें एक भाग लाल पुनर्नवेका खार मिलाकर बिजौरे नींबूके रसकी सात भावना देवे । इसको यथोचित मात्रानुसार रोगीको सेवन करावे । इसको राक्षस रस कहते हैं ॥ ९७ ॥ त्रिफला लोह । त्रिफलामुस्तवेल्लैश्च सितया कणया समम् । खरमञ्जरिबीजैश्च लौहं भस्मकनाशनम् ॥ ९८ ॥ हरड़, बहेडा, आमला, नागरमोथा, वायविडंग, मिश्री, पीपल, चिर- चिटेके बीज यह प्रत्येक एक एक भाग और सबकी बराबर लोहभस्म इन सबको एकत्र पीसकर गोली बनाकर प्रयोग करनेसे भस्मक रोग नष्ट होता है ॥ ९८ ॥ विषूच्यञ्जन । अपामार्गस्य पत्रं च मरिचञ्च समं समम् । अम्लेरोलीयुतं पिष्टमञ्जनात्सूचिकां जयेत् ॥ ९९ ॥ चिरचिटेके पत्ते और कालीमिरचोंको समान भाग लेकर चांगेरीके रसमें घिसकर नेत्रोंमें लगानेसे विषूचिका रोग नष्ट होता है ॥ ९९ ॥
भाषाटीकासहित । (२५७) अग्निकुमार रस । टंकणं रसगन्धौ च समं भागत्रयं विषात् । कपर्दशंखयोर्द्व्यंशं वसुभागं मरीचकम् । दिनं जम्भारम्भसा पिष्टं वल्लमात्रं प्रदापयेत्॥१००॥ विषूचीशूलविष्टम्भवह्निमान्द्ये ज्वरे तथा । अजीर्णे संग्रहण्याञ्च सिद्धश्चाग्निकुमारकः ॥१०१॥ सुहागा,पारा और गंधक यह प्रत्येक एक २ भाग,विष तीन भाग, कौडीकी भस्म और शंख भस्म तीन २ भाग, कालीमिरच ८ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इसको विषूचिका, शूल, विष्टम्भ, मंदाग्नि, ज्वर, अजीर्ण, संग्रहणी आदि रोगोंमें प्रयुक्त करे । इसको अग्निकुमार रस कहते हैं ॥ १०० ॥ १०१ ॥ शंखवटी । द्वौ क्षारौ रसगन्धकौ सलवणौ क्षारेण तुल्यं विषं, चिञ्चा शङ्खचतुर्गुणं रसवरैर्निम्पाकजातैः कृतम् । वारंवारमिदं सुपाकरचितं लौहं क्षिपेद्धिङ्गुके, भूयष्टङ्कसमं सुमर्दितमिदं गुञ्जाप्रमाणं भजेत् ॥ २॥ ख्याता शङ्खवटी महाग्निजननी शूलान्तकृत्पाचनी, कासश्वासविनाशिनी क्षयहरी मन्दाग्निसन्दीपनी । वातव्याधिमहोदरादिशमनी तृष्णामयोच्छेदिनी, सर्वव्याधिनिषूदनी क्रिमिहरी दुष्टामयध्वंसिनी॥३॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहेऽजीर्णाधिकारः ।
( ३५८ ) रसेंद्रसारसंग्रह । जवाखार, सज्जीखार, पारा, गंधक, सेंधानमक, विडनमक और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेवे । इमलीका खार चार तोले, शंखकी भस्म चार तोले लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र कागजी- नींबूके रसमें सात वार भावना देकर पश्चात् उसमें लोहा भस्म १ भाग, हींग १ भाग और सुहागा १ भाग मिलाकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । यह गोली अग्निको अतिशय दीपन करती है । शूलको नष्ट करती है, पाचक तथा श्वास, खांसी और क्षयरोगको नष्ट करती है। मंदा- ग्निको दीपन करनेवाली, वातव्याधि, उदररोग, तृषा, कृमि और समस्त दुष्ट रोग नाशक है । इसको शंखवटी कहते हैं ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ इति अजीर्णरोगचिकित्सा समाप्त । अथ क्रिमिरोगचिकित्सा । क्रिमिकालानल रस । विडंगं द्विपलञ्चैव विषचूर्णं तदर्द्धकम् ॥ लौहचूर्णं तदर्द्धञ्च तदर्द्धं शुद्धपारदम् ॥ १ ॥ रसतुल्यं शुद्धगन्धं छागीदुग्धेन पेषयेत् । छायाशुष्कां वटीं कृत्वा खादेत्षोडशरक्तिकाम्॥२॥ धान्यजीरातुपानेन नाम्ना कालानलो रसः । उदरस्थं क्रिमिं हन्याद्ग्रहण्यर्शःसमन्वितम् ॥ ३ ॥ अग्निदः शोथशमनो गुल्मप्लीहोदराञ्जयेत् । गहनानन्दनाथेन भाषितो विश्वसम्पदे ॥ ४ ॥ वायविडंग २ पल, शुद्ध विष १ पल, लोहभस्म आधापल, शुद्ध पारा १ तोला और शुद्ध गंधक १ तोला इन सबको एकत्र पीसकर बकरीके दूधमें खरल कर सोलह सोलह रत्तीकी गोली बना लेवे और
भाषाटीकासहित । (२५९) छायामें सुखा देवे । धनिये और जीरेके अनुपानके साथ सेवन करनेसे संग्रहणी, अर्श और समस्त क्रिमिरोग नष्ट होते हैं । यह अग्निको अत्यन्त दीपन करनेवाला, तथा सूजन, गुल्म और प्लीहोदर रोगको दूर करता है । संसारके हितके लिये श्रीमद्गहनानन्दनाथने यह कहा है । इसको क्रिमिकालानल रस कहते हैं ॥ १-४ ॥ क्रिमिविनाश रस । शुद्धसूतं समं गन्धमभ्रं लोहं मनःशिला । धातकी त्रिफला लोध्रं विडंगं रजनीद्वयम् ॥ ५ ॥ भावयेत्सप्तधा सर्वं शृंगवेरभवै रसैः । चणमात्रां वटीं कृत्वा त्रिफलारससंयुताम् ॥ ६ ॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय क्रिमिरोगोपशान्तये । वातिकं पैत्तिकं हन्ति श्लैष्मिकञ्च त्रिदोषजम् । क्रिमिविनाशनामायं क्रिमिरोगकुलान्तकः ॥ ७ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, अभ्रकभस्म, लोहभस्म, मैनशिल, धायके फूल, हरड़, बहेड़ा, आमला, लोध, वायविडंग, हलदी, दारु- हलदी यह सब औषधि समान भाग लेकर अदरखके रसकी सात भावना देकर चनेकी बराबर गोली बना लेवे । प्रातःकाल त्रिफलेके रसके द्वारा सेवन करनेसे वातज, पित्तज, कफज और त्रिदोषज क्रिमिरोग दूर होते हैं । यह क्रिमिरोगोंका नाशक है । इसको क्रिमि- विनाश रस कहते हैं ॥ ५-७ ॥ क्रिमिरोगारि रस । सूतं गन्धं मृतं लोहं मरिचं विषमेव च । धातकी त्रिफला शुण्ठी मुस्तकं सरसाञ्जनम् ॥ ८ ॥ त्रिकटु मुस्तकं पाठा वालकं बिल्वमेव च । भावयेत्सर्वमेकत्र स्वरसैर्भृङ्गजैस्ततः ॥ ९ ॥
( २६० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वराटिकाप्रमाणेन भक्षणीयो विशेषतः । क्रिमिरोगविनाशाय रसोऽयं क्रिमिनाशनः ॥ १० ॥ पारा, गन्ध, लोहाभस्म, कालीमिरच, विष, धायके फूल, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, नागरमोथा, रसौंत, त्रिकुटा, मोथा,पाठ,सुगंध- वाला और बेलगिरी इन सबको एकत्र खरल करके भांगरेके रसकी सात भावना देवे । फिर इसमेंसे एक कौड़ीभर सेवन करनेसे क्रिमिरोग नष्ट होता है । इसको क्रिमिरोगारि रस कहते हैं ॥ ८-१० ॥ कीटमर्द रस । शुद्धसूतं शुद्धगन्धमजमोदाविडङ्गकम् । विषमुष्टि ब्रह्मबीजं क्रमाद्द्विगुणितं भवेत् ॥ ११ ॥ चूर्णयेन्मधुना मिश्रं निष्कैकं क्रिमिजिद्भवेत् । कीटमर्दो रसो नाम मुस्ताक्वाथं पिबेदनु ॥१२॥ पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, अजमोद ४ भाग,वायविडंग ८ भाग, कुचला १६ भाग और ढाकके बीज ३२ भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर प्रतिदिन इसमेंसे चार मासे परिमाण शहतमें मिलाकर सेवन करे तो क्रिमिरोग नष्ट होता है । इसके ऊपर नागरमोथेका क्वाथ पान करे । इसको कीटमर्द रस कहते हैं ॥ ११ ॥ १२ ॥ क्रिमिघ्न रस । क्रिमिघ्नं किंशुकारिष्टबीजं सुरसभस्मकम् । वल्लद्वयं चाखुकर्णीरसैः क्रिमिविनाशनः ॥ १३ ॥ वायविडंग, ढाकके बीज, नीमके बीज और तुलसीके पत्तोंकी भस्म इन सबको समान भाग लेकर चूर्ण कर ले । फिर इस चूर्णमेंसे चार रत्ती परिमाण लेकर मूसाकानीके रसके साथ पान करनेसे क्रिमिरोग नष्ट होता है । इसको क्रिमिघ्न रस कहते हैं ॥ १३ ॥
[da with dirgha ee] -> सन्दी.
Then प (pa), य (ya), त्य (tya), ग्नि (gni), म (ma), यं (yam).
So it is सन्दी Rogue? NO, don't output Latin letters!
It is सन्दी followed by पयत्यग्निमयं:
Let's write it in Devanagari only:
सन्दी + पयत्यग्निमयं = सन्दी + पयत्यग्निमयं.
Wait, is there a space? In the image:
जांश्च रोगान् सन्दी Rogue... -> Look at the space between रोगान् and सन्दी...:
There is a space after रोगान्.
Then सन्दी and पयत्यग्निमयं are joined!
Wait, look at line 7:
जांश्च रोगान् सन्दी - wait, is there a space between सन्दी and पयत्यग्निमयं?
No, it's one continuous word:
सन्दी Rogue -> wait, look at the text:
स न् दी प य त्य ग्नि म यं
त्रि रा त्रा त् ॥१५॥
Yes! सन्दी + पयत्यग्निमयं
( २६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गोली बना लेवे। प्रातःकाल तीन गोलियोंका सेवन करे और ऊपरसे शीतल जलका अनुपान करे तो केवल पैत्तिक क्रिमिरोग तथा कदाचित वातपैत्तिक क्रिमिरोग भी नष्ट होता है। इसको श्रीमान् गहनानन्दनाथने कहा है। इसको क्रिमिशूलिजलप्लव रस कहते हैं ॥ १६-१८ ॥ क्रिमिकाष्ठानल रस । विशुद्धं पारदं गन्धं वङ्गं तालं वराटकम् । मनःशिला कृष्णकाचं सोमराजीं विडङ्गकम् ॥१९॥ दन्तीबीजञ्च जैपालं शिवा टङ्कणचित्रकम् । कर्षमात्रन्तु प्रत्येकं वज्रीक्षीरेण मर्दयेत् ॥ २० ॥ कलायसदृशीं कृत्वा वटिकां भक्षयेत्ततः । क्रिमिकाष्ठानलो नाम रसोऽयं परिनिर्मितः ॥ श्लैष्मिके श्लेष्मपित्ते च श्लेष्मवाते च शस्यते ॥२१॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, वंगभस्म, हरतालभस्म, कौड़ीकी भस्म, मैन- शिल, काले रंगका कांच, बावची, वायविडंग, दन्तीके बीज, जमाल- गोटा, हरड़, सुहागा और चित्रककी जड़ यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेकर थूहरके दूधमें खरल करके मटरकी बराबर गोली बना लेवे। इस औषधिके सेवन करनेसे कफजक्रिमि, कफपित्तजक्रिमि और कफवातजक्रिमि रोग नष्ट होता है । इसको क्रिमिकाष्ठानल रस कहते हैं ॥ १९-२१ ॥ लाक्षादि वटी । लाक्षाभल्लातश्रीवासश्वेतापराजिताशिका । अर्जुनस्य फलं पुष्पं विडङ्गमथ गुग्गुलुः ॥ २२ ॥ एभिः कीटाश्च शाम्यन्ते तिष्ठतापि गृहे सदा ।
भाषाटीकासहित । ( २६३ ) भुजङ्गा मूषिका दंशाः संघनामा मतङ्गजाः । दूरादेव पलायन्ते किं न कीटाश्च ये पराः ॥ २३ ॥ लाख, भिलावे, श्रीवासका गोंद ( गंधबिरोजा ), सुफेद कोइलकी जड़, अर्जुनके फल, अर्जुनके फूल, वायविडंग और गूगल इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र मर्दन करके गोली बना लेवे; इन गोलियोंके सेवन करनेसे क्रिमिरोग नष्ट होता है । जिस घरमें यह औषधि स्थित रहती है उस घरमेंसे साँप, चूहे, डांस, मकोड़े आदि जीव दूर भाग जाते हैं । इसको लाक्षादि वटी कहते हैं ॥ २२ ॥ २३ ॥ क्रिमिहर रस । शुद्धसूतमिन्द्रयवमजमोदा मनःशिला । पलाशबीजं गन्धश्च देवदाल्या द्रवैर्दिनम् ॥ २४ ॥ संमर्द्य भक्षयेन्नित्यं शालपर्णीरसैः सह । सितायुक्तं पिबेच्चानु क्रिमिपातो भवत्यलम्॥ २५ ॥ पारा, इन्द्रजौ, अजमोद, मैनशिल, ढाकके बीज और गंधक इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर देवदाली ( वंदाल ) के रसमें एक दिन तक खरल करके गोली बना लेवे, शालिपर्णीके रस और मिश्रीके साथ इन गोलियोंके सेवन करनेसे उदरस्थित सम्पूर्ण क्रिमि नष्ट हो जाते हैं । इसको क्रिमिहर रस कहते हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥ विडंगलोह । रसं गन्धञ्च मरिचं जातीफललवंगकम् । कणा तालं शुण्ठि टङ्कं प्रत्येकं भागसम्मितम् ॥ २६ ॥ सर्वचूर्णसमं लौहं विडङ्गं सर्वतुल्यकम् । लौहं विडङ्गकं नाम कोष्ठस्थक्रिमिनाशनम् ॥२७॥
( २६४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दुर्नाममरुचिश्चैव मन्दाग्निश्च विसूचिकाम् । शोथं शूलं ज्वरं हिक्कां श्वासं कासं विनाशयेत् ॥ २८॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे क्रिमिचिकित्सा । पारा, गंधक, कालीमिरच, जायफल, लौंग, पीपल, हरिताल, साँठ और सुहागा ये प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोह सबकी बरा- बर लेवे, सबको एकत्र पीसकर चूर्ण कर ले और सब चूर्णकी बराबर वायविडंगका चूर्ण मिलावे । इसको जलमें पीसकर यथोचित मात्रानु- सार यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करे तो कोष्ठगत क्रिमि, बवा- सीर, अरुचि, मंदाग्नि, विसूचिका, शोथ, शूल, ज्वर, हिक्का, श्वास और कास यह समस्त रोग नष्ट होते हैं ॥ २६–२८ ॥ इति क्रिमिरोग चिकित्सा । अथ पाण्डुरोगचिकित्सा । निशालोह । लोहचूर्णं निशायुग्मं त्रिफलारोहिणीयुतम् । प्रलिह्यान्मधुसर्पिर्भ्यां कामलापाण्डुशान्तये ॥ १ ॥ हलदी, दारुहलदी, हरड़, बहेडा, आमला और कुटकी यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और सबकी बराबर लोहेकी भस्म लेवे । इस औषधिके शहद और घीमें मिलाकर सेवन करनेसे पाण्डु और कामला रोग नष्ट होते हैं । इसको निशालोह कहते हैं ॥ १ ॥ धात्री लोह । धात्रीलौहरजोव्योषनिशाक्षौद्राक्षशर्कराः । भक्षणाद्विनिहन्त्याशु कामलाञ्च हलीमकम् ॥ २ ॥ आमले, लोहेकी भस्म, त्रिकुटा, हलदी, शहद, बहेड़ा और मिश्री इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार सेवन कर- नेसे कामला और हलीमकरोग दूर होते हैं ॥ २ ॥
३. तृतीय अध्याय: गुल्म, पाण्डु, कामला, राजयक्ष्मा, कास-श्वास एवं वातरोग चिकित्सा
भाषाटीकासहित । ( २६५ ) पञ्चानन वटी । शुद्धसूतं तथा गन्धं मृतताम्राभ्रगुग्गुलु । जैपालबीजं तुल्यांशं घृतेन वटकीकृतम् ॥ ३ ॥ भक्षयेद्वदरास्थ्याभं शोथपाण्डुप्रशान्तये । पञ्चाननवटी ख्याता पाण्डुरोगकुलान्तिका ॥ ४ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, तांबेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, गूगल और जमालगोटे इन सबको एकत्र करके घृतमें पीसकर बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना लेवे। इन गोलियोंके सेवन करनेसे शोथ और पांडु रोग नष्ट होते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ प्राणवल्लभ रस । हिंगुलसम्भवं सूतं काश्मीरोद्भवगन्धके । लौहं ताम्रं वराटञ्च तुत्थं हिंगु फलत्रिकम् ॥ ५ ॥ स्नुहीक्षीरं यवक्षारं जैपालं दन्तिकं त्रिवृत् । प्रत्येकं शाणभागन्तु छागीक्षीरेण पेषयेत् ॥ ६ ॥ चतुर्गुञ्जां वटीं खादेद्वारिणा मधुना सह । प्राणवल्लभनामायं गहनानन्दभाषितः ॥ ७ ॥ श्लेष्मदोषं समालोक्य युक्त्या च त्रुटिवर्द्धनम् । निहन्ति कामलां पाण्डुमानाहं श्लीपदं तथा ॥ ८ ॥ गलगण्डं गण्डमालां व्रणानि च हलीमकम् । शोथं शूलमुरुस्तम्भं संग्रहग्रहणीं जयेत् ॥ ९ ॥ वान्तिं मूर्च्छां भ्रमिं दाहं कासं श्वासं गलग्रहम् । असाध्यं सन्निपातञ्च जीर्णज्वरमरोचकम् ॥ १० ॥
( २६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वातरक्तं तथा शोषं कण्डूं विस्फोटकापचीम् । नातः परतरं किञ्चित्कामलार्त्तिरुजापहम् ॥११॥ सिंग्रफमेंसे निकाला हुआ पारा, गंधक, केशर, लोहभस्म, ताम्र- भस्म, कौड़ीकी भस्म, तुत्थ, हींग, हरड, बहेडा, आमला, थूहरका दूध, जवारखार, जमालगोटे, दंतीकी जड और निसोध यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे लेकर बकरीके दूधमें पीसकर चार २ रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको शहदमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे थोडा जलपान करे । जो कफकी अधिकता हो तो एक एक गोली बढ़ाकर खाये । इस औषधिसे कामला, पांडु, आ- नाह, श्लीपद, गलगण्ड, गण्डमाला, व्रण, हलीमक, शोथ, शूल, ऊरुस्तम्भ, संग्रहग्रहणी, वमन, मूर्च्छा, भ्रम, दाह, खांसी, श्वास, गलग्रह, असाध्य सन्निपात, जीर्णज्वर, वातरक्त, शोष, कण्डू, विस्फो- टक और अपची यह समस्त रोग नष्ट होते हैं । कामला रोगको हरनेके लिये इससे उत्तम अन्य औषधि नहीं है । इसको प्राण- वल्लभ रस कहते हैं ॥ ५-११ ॥ कामेश्वर रस । पलं सूतं पलं गन्धं पथ्याचित्रकयोः पलम् । मुस्तैलापत्रकाणाञ्च प्रतिसार्द्धं पलं क्षिपेत् ॥१२॥ त्र्यूषणं पिप्पलीमूलं विषञ्चापि पलं न्यसेत् । नागकेशरकं कर्षमेरण्डस्य पलं तथा ॥ १३ ॥ पुरातनगुडेनैव तुल्येनैव विमिश्रयेत् । मर्दयेत्कनकद्रावैर्भावयेच्च घृतान्विताम् ॥१४॥ वटिकां बदरास्थ्याभां कारयेद्भक्षयेन्निशि । पाण्डुरोगहरः सोऽयं रसः कामेश्वरःस्वयम् ॥ १५ ॥ पारा १ पल, गंधक १ पल, हरड १ पल, चित्रककी जड १ पल, नागरमोथा, इलायची और तेजपात यह प्रत्येक औषधि डेढ़ डेढ़ पल,
भाषाटीकासहित । ( २६७ ) सोंठ, मिरच, पीपलामूल और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक पल लेवे, नागकेशर १ कर्ष और एरण्डके बीज एक पल लेवे, सबको एकत्र पीस लेवे और सबके बराबर पुराना गुड़ लेवे, सबको एकत्र मिलाकर धतूरेके रसमें भावना देकर घीके योगसे बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना नित्यप्रति रात्रिके समय एक गोली खाये । यह गोली पांडुरोगको नष्ट करती है । इसको कामेश्वर रस कहते हैं ॥ १२–१५ ॥ त्रिकत्रयाद्य लोह । पलं लौहस्य किट्टस्य पलं गव्यस्य सर्पिषः । सितायाश्च पलञ्चैकं क्षौद्रस्यापि पलं तथा ॥ १६ ॥ तोलैकं कान्तलौहस्य त्रिकत्रयसुभावितम् । ततः पात्रे विधातव्यं लोहे च मृन्मये तथा ॥ १७ ॥ हविषा भावितञ्चापि रौद्रे च शिशिरे तथा । भोजनादौ तथा मध्ये चान्ते चापि प्रदापयेत् ॥१८॥ अनुपानं प्रदातव्यं बुद्ध्वा दोषबलाबलम् । कामलां पाण्डुरोगञ्च हलीमकं सुदारुणम् ॥ निहन्ति नाऽत्र सन्देहो भास्करस्तिमिरं यथा॥१९॥ मण्डूर १ पल, गायका घी १ पल, मिश्री १ पल, शहद १ पल और कांतलोहेकी भस्म १ तोला परिमाण लेवे । प्रथम लोहे और मण्डूरको एकत्र पीसकर; घी मिलाकर त्रिकत्रय ( हरड़, बहेड़ा, आमला; सोंठ,मरिच,पीपल, दालचीनी,इलायची और नागकेशर ) के क्वाथमें सात और घृतमें सात लोहेके अथवा मिट्टीके पात्रमें भावना देवे । सूर्योदयके समय क्वाथकी और रात्रिमें सरदीके समय घृतसे भावना देवे;जब भावना समाप्त हो जायें तब मिश्री और शहद मिलावे । दोषोंका बलाबल विचार कर अनुपानकी कल्पना करे । इसका भोज-
( २६८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । नसे पहिले, भोजनके मध्यमें और भोजनके अन्तमें सेवन करावे । जिस प्रकार सूर्योदयके होनेसे अन्धकारका समूह नष्ट होजाता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे कामला, पाण्डु और हलीमक रोग नष्ट होते हैं । इसको त्रिकत्रयाद्य लोह कहते हैं ॥ १६-१९ ॥ विडंगादि लोह । विडंग-मुस्त-त्रिफला-देवदारु-षडूषणैः । तुल्यमात्रमयश्चूर्णं गोमूत्रेऽष्टगुणे पचेत् ॥ २० ॥ तैरक्षमात्रां गुटिकां कृत्वा खादेद्दिनेदिने । कामलापांडुरोगार्त्तः सुखमापद्यतेऽचिरात् ॥ २१ ॥ वायविडंग, नागरमोथा, त्रिफला, देवदारु और षडूषण ( पीपल पीपलामूल, चव्य, चित्रक, सोंठ, और मरिच ) यह प्रत्येक औषधि समान भाग और सबकी बराबर लोहाभस्म लेवे और लोहेसे अठगुना गोमूत्र लेवे। प्रथम लोहेके चूर्णको और गोमूत्रको एकत्र मिलाकर एक हांडीमें रखकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब पकते पकते गोमूत्र जल जाय केवल लोहा बाकी रहजाय तब उतारकर उपरोक्त विडंगादि चूर्ण मिलाकर एक एक तोलेकी गोली बना लेवे। प्रतिदिन एक गोली खानेसे कामला और पाण्डुरोग नष्ट होकर सुखकी वृद्धि होती है । इसको विडंगादि लोह कहते हैं ॥ २० ॥ २१ ॥ विडंगत्रिफलाव्योषं शुद्धलोहन्तु तत्समम् । पुरातनगुडेनात्र लेहयेद्दिनसप्तकम् ॥ श्वयथुं नाशयेच्छीघ्रं पाण्डुरोगहलीमकम् ॥ २२ ॥ अन्य विडंगादि लोह-वायविडंग, त्रिफला और त्रिकुटा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और सबकी बराबर लोहेकी भस्म लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर पुराने गुड़में मिलाकर सात दिन खानेसे शोथ, पाण्डुरोग और हलीमक रोग नष्ट होते हैं ॥ २२ ॥
भाषाटीकासहित । (२६९) त्रैलोक्यसुन्दर रस । मानश्चैकं चतुःसूतं षडभ्रं वसुलौहकम् । गन्धकं त्रिफलाव्योषं चूर्णं मोचरसस्य च ॥ २३ ॥ मुसली चामृतासत्त्वं प्रत्येकं पञ्चभागिकम् । भावयेत्सर्वमेकत्र त्रिफलानां कषायके ॥ २४ ॥ भावना विंशतिर्देया दशरात्रं सुभावना । शिग्रुचित्रकमूलाभ्यामष्टधा च पृथक् पृथक् ॥ २५ ॥ त्रैलोक्यसुन्दरो नाम रसो निष्कमितो हितः । सितया च समं क्षौद्रैः शोथपाण्डुक्षयापहः ॥ ज्वरातिसारसंयुक्तसर्वोपद्रवनाशनः ॥ २६ ॥ मानकन्द १ भाग, पारा ४ भाग, अभ्रक भस्म ६ भाग, लोहेकी भस्म ८ भाग, गंधक, त्रिफला, त्रिकुटा, मोचरस, मुसली और गिलो- यका सत्त्व यह प्रत्येक पांच पांच भाग लेवे, सबको एकत्र पीसकर दश दिनतक त्रिफलेके क्वाथकी बीस भावना देवे । पश्चात् सहंजिनेके रसमें आठ भावना देवे और चित्रककी जड़के रसमें आठ भावना देवे । इसमेंसे नित्य चार मासे औषधि मिश्री और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे सूजन, पांडु, क्षयरोग और सर्वोपद्रवसंयुक्त ज्वरातिसार नष्ट होते हैं । इसको त्रैलोक्यसुन्दररस कहते हैं ॥ २३-२६॥ दार्वादि लोह । दार्वीसत्रिफलाव्योषविडङ्गान्ययसो रजः । मधुसर्पिर्युतं लिह्यात्कामलापाण्डुरोगवान् ॥ २७ ॥ दारुहल्दीकी छाल, त्रिफला, त्रिकुटा और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और सबकी बराबर लोहभस्मका चूर्ण १०
( २७० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लेवे । सबको एकत्र पीसकर घृत और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे कामला और पांडुरोग नष्ट होते हैं ॥ २७ ॥ पांडुरोगपर पथ्यापथ्य । शालियष्टिकगोधूमयवमुद्गादयो हिताः । रसाश्च जांगलभवा मधुराः पाण्डुरोगिणाम् ॥ २८ ॥ शालिधान, साँठीधान, गेहूं, जौ और मूंग आदि अन्न, जांगलप्रदे- शके जीवोंके मांंसरस और मधुर रसवाले पदार्थ यह सब पांडुरोगि- योंको हितकारी हैं ॥ २८ ॥ अथ कामलाचिकित्सा । पाण्डुरोगोदिता योगा घ्नन्ति ते कामलामपि ॥२९॥ जो प्रयोग पांडुरोगमें कहे हैं वह सब कामलारोगको भी नष्ट करते हैं ॥ २९ ॥ चन्द्रसूर्यात्मक रस । सूतकं गन्धकं लौहमभ्रकञ्च फलं पलम् । शंखटंकवराटं च प्रत्येकार्द्धपलं हरेत् ॥ ३० ॥ गोक्षुरबीजचूर्णञ्च पलैकं तत्र दीयते । सर्वमेकीकृतं चूर्णं बाष्पयन्त्रे विभावयेत् ॥ ३१ ॥ पटोलपर्पटौ भार्ङ्गी विदारीशतपुष्पिका । दन्ती वासा कुण्डली च काकमाचीन्द्रवारुणी ॥३२॥ वर्षाभूकेशराजञ्च शालिश्च द्रोणपुष्पिका । प्रत्येकार्द्धपलैर्द्रवैर्भावयित्वा वटीं कुरु ॥ ३३ ॥ चतुर्दशवटीं खादेच्छागीदुग्धानुपानतः । गहनानन्दनाथोक्तश्चन्द्रसूर्यात्मको रसः ॥ ३४ ॥