रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
भाषाटीकासहित । (२३१) चन्द्रप्रभा वटिका । क्रिमिरिपुदहनव्योषत्रिफलासुरदारुचव्यभूनिम्बम् । मागधिमूलं मुस्तं सशटा वचा धातुमाक्षिकञ्चैव ॥ लवणक्षारनिशायुगकुस्तुम्बुरुगजकणातिविषा ।१२॥ कर्षांशकान्येव समानि कुर्यात्पलाष्टकं चाश्मज- तोर्विदध्यात् । निष्पत्रशुद्धस्य पुरस्य धीमान् पलद्वयं लौहरजस्तथैव ॥ १३ ॥ सिताचतुष्कं पलमत्र वांश्यां निकुम्भकुम्भात्रिसुगन्धियुक्तम् । चन्द्रप्रभेयं गुटिका विधेया अर्शांसि निर्णाशयते षडेव॥१४॥भगन्दरं कामलपाण्डुरोग विनष्टवह्नेः कुरुते च दीप्तिम् । हन्त्यामयान् पित्तकफानिलो- त्थान्नाडीगते मर्मगते व्रणे च ॥ १५ ॥ ग्रन्ध्यर्बुदे विद्रधिराजयक्ष्ममेहे भगाख्ये प्रदरे च योज्या । शुक्रक्षये चाश्मरिमूत्रकृच्छ्रे मूत्रप्रवाहेऽप्युदरा- मये च ॥१६॥ तक्रानुपानं त्वथ मस्तुपानमाजो रसो जाङ्गलजो रसो वा । पयोऽथवा शीतजलानु- पानं बलेन नागस्तुरगो जवेन ॥ १७ ॥ दृष्ट्या सुपर्णः श्रवणे वराहः कान्त्या रतीशो धिषणश्च बुद्धया । न पानभोज्ये परिहार्यमस्ति न शीत- वातातपमैथुनेषु । शम्भुं समभ्यर्च्य कृतप्रणामं प्राप्ता गुटी चन्द्रमसःप्रसादात् ॥१८॥ शुक्रदोषान् निहन्त्याशु प्रमेहानपि दारुणान् । वलीपलित- निर्मुक्तो वृद्धोऽपि तरुणायते ॥ १९ ॥
( २३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वायविडंग, चीतेकी जड़, सोंठ, मरिच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, देवदारु, चव्य, चिरायता, पीपलामूल, नागरमोथा, कचूर, वच, सोनामाखी भस्म, सेंधानमक, जवाखार, सज्जीखार, हल्दी, दारु- हल्दी, धनिया, गजपीपल और अतीस यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष लेवे, शिलाजीत ८ पल लेवे, शुद्ध गूगल २ पल, लोहा २ पल, मिश्री ४ पल, वंशलोचन १ पल, दन्तीकी जड़ १ पल, निसोथ १ पल, दालचीनी १ पल, इलायची १ पल और तेजपात १ पल लेवे; इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर गोली बना लेवे । इस चन्द्रप्रभा गुटिकाके सेवन करनेसे छः प्रकारकी बवासीर, भगन्दर, कामला और पांडुरोग नष्ट होते हैं । मंदाग्नि नष्ट होकर अग्नि दीप्त होती है । पित्त, कफ और वातजन्य रोग नष्ट होते हैं । तथा नाड़ीगत व्रण, मर्मगत व्रण, ग्रंथि, अर्बुद, रसौली, विद्रधि, राजयक्ष्मा, प्रमेह, भगन्दर, प्रदर, शुक्रक्षय, पथरी रोग, मूत्रकृच्छ्र, मूत्रप्रवाह और उदरामय प्रभृति समस्त रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् तक्र, दहीका तोड़, बकरीका दूध, जंगल प्रदेशके जीवोंका मांस, दूध अथवा शीतल जल पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे हाथीके समान बल; घोड़ेके समान गतिशक्ति, गरुड़के समान दृष्टिशक्ति, सूअरके समान श्रवणशक्ति, कामदेवके समान कांति और बृहस्पतिके समान बुद्धिशक्ति उत्पन्न होती है । इस औषधिके सेवन करनेपर पान भोजन, शीतल वायुका सेवन, सूर्यकी धूप और स्त्री प्रसंग आदिका कुछ नियम नहीं.है । इससे वीर्यदोष और अत्यंत दारुण प्रमेह रोग नष्ट होता है तथा वलीपालित रोग नष्ट होकर वृद्ध भी तरुणताको प्राप्त होता है । इसको चन्द्रमाके प्रसादसे प्राप्त हुई चन्द्रप्रभा वटी कहते हैं ॥ १२-१९ ॥ माणाद्य लोह । माणशूरणभल्लातत्रिवृद्दन्तीसमन्वितम् । त्रिकत्रयसमायुक्तं लौहं दुर्नामनाशनम् ॥ २० ॥
भाषाटीकासहित । ( २३३ ) मानकन्द, जमींकंद, भिलावे, निसोध, दन्तीमूल, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, तेजपात, दालचीनी और इलायची यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबके बराबर लोहा लेवे; इन सबको एकत्र करके जलमें पीसकर गोली बना लेवे । प्रतिदिन इस- मेंसे यथामात्रानुसार उचित अनुपानके साथ सेवन करे तो बवासीर नष्ट होती है ॥ २० ॥ चंचुकुठार रस । रसगन्धकलौहानां प्रत्येकं भागयुग्मकम् । दन्तित्रिकटुकुष्ठैकं षड्भागं लाङ्गलस्य च ॥ २१ ॥ क्षारसैन्धवटङ्गानां प्रत्येकं भागपञ्चकम् । गोमूत्रस्य च द्वात्रिंशत्स्नुहीक्षीरं तथैव च ॥ २२ ॥ यावच्च पिण्डितं सर्वं तावन्मृद्वग्निना पचेत् । माषद्वयं ततः खादेद्दिवास्वप्नादि वर्जयेत् । रसश्चञ्चुकुठारोऽयमर्शासां कुलनाशनः ॥ २३ ॥ पारा दो भाग,गंधक दो भाग और लोहेकी भस्म दो भाग लेवे; सोंठ, मरिच, पीपल, दंतीकी जड़, कूठ और कलिहारी यह प्रत्येक औषधि छः छः भाग लेवे; जवाखार, सेंधानमक और सुहागा यह प्रत्येक पांच पांच भाग, गोमूत्र और थूहरका दूध प्रत्येक बत्तीस २ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके मंद मंद अग्निसे तब- तक पकावे जबतक कि औषधिका गोला न हो जाय । प्रतिदिन इस- मेंसे दो मासे औषधि खाये और इसपर दिनमें सोना आदि त्याग देवे । यह चंचुकुठार रस बवासीरको समूल नष्ट करता है ॥२१-२३॥ शिलागन्धक वटक । शिलागन्धकयोश्चूर्णं पृथग्भृङ्गरसाऽऽप्लुतम् । सप्ताहं भावयेत्सर्पिर्मधुभ्याञ्च विमर्दयेत् ॥२४॥
( २३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अर्शसश्चानुलोम्यार्थं हताग्निबलवर्द्धनम् । रक्तिकाद्वितयं खादेत्कुष्ठादिरहितो नरः ॥ २५ ॥ मैनशिल और गंधक दोनोंको समान भाग लेकर चूर्ण कर लेवे । फिर भांगरेके रसकी सात भावना देकर घी और शहदमें खरल करके दो रत्ती परिमाण सेवन करनेसे बवासीर रोग नष्ट होता है । तथा मंदाग्नि दीप्त होती है और कुष्ठादि रोग दूर होते हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥ जातीफलादि वटी । जातीफलं लवङ्गञ्च पिप्पली सैन्धवन्तथा । शुण्ठीधूस्तूरबीजञ्च दरदं टङ्कणं तथा ॥ २६ ॥ समं सर्वं विचूर्ण्याथ जम्भीराम्भसा विमर्दयेत् । जातीफलवटिकेयमर्शोऽग्निमान्द्यनाशिनी ॥ २७ ॥ जायफल, लौंग, पीपल, सेंधानमक, सोंठ, धतूरेके बीज, सिंगरफ और सुहागा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे बवासीर और मंदाग्नि नष्ट होती है । इसको जातीफलादि वटी कहते हैं ॥ २६ ॥ २७ ॥ पञ्चानन वटी । मृतसूताभ्रलोहानि मृतार्कगन्धकैः सह । सर्वाणि समभागानि भल्लातं सर्वतुल्यकम् ॥ २८ ॥ वन्यसूरणकन्दोत्थैर्द्रवैः पलप्रमाणतः । मर्दयेद्दिनमेकञ्च माषमात्रं पिबेद् घृतैः ॥ २९ ॥ भक्षणाद्धन्ति सर्वाणि चार्शांसि च न संशयः । असाध्येष्वपि कर्तव्या चिकित्सा शंकरोदिता ॥ कुष्ठरोगं निहन्त्याशु मृत्युरोगविनाशिनी ॥३०॥ पारेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, लोहेकी भस्म, तांबेकी भस्म और शुद्ध गंधक इन सब औषधियोंको समान भाग लेवे और सबके बरा-
भाषाटीकासहित । ( २३५ ) बर भिलावे लेवे, सबको एकत्र पीसकर वनजमीकंदके चार पल रसमें एक दिनतक खरल करे । इसमेंसे प्रतिदिन एक मासे औषधि लेकर घृतके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे असाध्य अर्शरोग, कुष्ठरोग और मृत्युजनक घोर रोग भी शीघ्र ही नष्ट हो जात हैं; इसको महादेवने कहा है ॥ २८-३० ॥ अष्टांग रस । गन्धं रसेन्द्रं मृतलौहकिट्टं फलत्रयं व्यूषणवह्नि- भृङ्गम् । कृत्वा समं शाल्मलिका गुडूचीरसेन यामत्रितयं विमर्द्य । निष्कप्रमाणं गदितानुपानैः सर्वाणि चार्शांसि हरेद्रसस्य ॥ ३१ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अर्शोऽधिकारः । गन्धक, पारा, लोहेका मण्डूर, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मरिच; पीपल, चीतेकी जड़ और भांगरा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर सेमल और गिलोयके रसमें तीन प्रहर खरल करके चार मासे औषधि यथोचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारकी बवा- सीर दूर होती है । इसको अष्टांगरस कहते हैं ॥ ३१ ॥ इति अर्शोऽधिकार समाप्त । अथ अजीर्णाधिकार । महोदधि वटी । ऐकैकं विषसूतञ्च जातीटंकं द्विकं द्विकम् । कृष्णात्रिकं विश्वषट्कं गन्धं कापर्दकं द्विकम् ॥ १॥ देवपुष्पं बाणमितं सर्वं संमर्द्य यत्नतः । महोदधिवटी नाम्ना नष्टमग्निं प्रदीपयेत् ॥ २ ॥
( २३६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विष १ भाग, पारा १ भाग, जायफल २ भाग, सुहागा २ भाग, पीपल ३ भाग, सोंठ ६ भाग, गंधक २ भाग, कौड़ीकी भस्म २ भाग और लौंग ५ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जलमें खरल करके यथोचित मात्रानुसार वटी बनाके सेवन करनेसे नष्ट अग्नि फिरसे दीप्त हो जाती है । इसको महोदधि वटी कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ अग्नितुण्डी रस । शुद्धसूतं विषं गन्धमजमोदा फलत्रिकम् । स्वर्जिक्षारं यवक्षारं वह्निसैन्धवजीरकम् ॥ ३ ॥ सौवर्चलं विडङ्गानि सामुद्रं त्र्यूषणन्तथा । विषमुष्टिसमं सर्वं जम्बीराम्लेन मर्दयेत् ॥ मरिचाभां वटीं खादेद्वह्निमान्द्यप्रशान्तये ॥ ४ ॥ शुद्ध पारा, विष, गंधक, अजवायन, हरड़, बहेड़ा, आमला, सज्जी, जवाखार, चीतेकी जड़, सेंधानमक, जीरा, कालानमक ( बिरिया संचर नमक ) वायविडंग, सामुद्रलवण, सोंठ, मरिच, पीपल और कुचला इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके मरिचकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिके यथोक्त मात्रानुसार सेवन करनेसे मंदाग्नि नष्ट होती है ॥ ३ ॥ ४ ॥ वडवानल रस । शुद्धसूतस्य कर्षैकं गन्धकं तत्समं मतम् । पिप्पली पञ्चलवणं मरिचञ्च फलत्रयम् ॥ ५ ॥ क्षारत्रयं समं सर्वं, चूर्णं कृत्वा प्रयत्नतः । निर्गुण्डयाश्च द्रवेणैव भावयेद्दिनमेकतः ॥ वडवानलनामाऽयं मन्दाग्निश्च विनाशयेत् ॥ ६ ॥ शुद्ध पारा १ कर्ष, शुद्ध गंधक १ कर्ष, पीपल १ कर्ष, पांचों लवण प्रत्येक एक एक कर्ष, काली मिरच १ कर्ष, त्रिफला ३ कर्ष,
भाषाटीकासहित । ( २३७ ) जवाखार १ कर्ष, सज्जी १ कर्ष और सुहागा १ कर्ष इन सब औषधि- योंको एकत्र खरल करके सम्हालूके रसमें एक दिन भावना देकर यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे मंदाग्नि दूर होती है । इसको वड- वानल रस कहते हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥ हुताशन रस । गन्धेशटंकणैकैकं विषमत्र त्रिभागिकम् । अष्टभागन्तु मरिचं जम्भाम्भोमर्दितं दिनम् ॥ ७ ॥ तद्वटीं मुद्गमानेन कृत्वाऽद्रेण प्रयोजयेत् । शूलारोचकगुल्मेषु विषूच्यां वह्निमान्द्यके ॥ अजीर्णे सन्निपातादौ शैत्ये जाड्ये शिरोगदे ॥ ८ ॥ गन्धक, पारा और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, विष ३ भाग, काली मिरच ८ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र जम्बीरी नींबूके रसमें एक दिन अच्छे प्रकारसे खरल करके मूंगकी बराबर गोली बना लेवे । इन गोलियोंको अदरकके रसके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे शूल, अरुचि, गुल्म, विषूचिका, अग्निमान्द्य, अजीर्ण, सन्निपात, शैत्य, जडता और शिरोरोग नष्ट होता है । इसको हुताशन रस कहते हैं ॥ ७ ॥ ८ ॥ बृहत् हुताशन रस । एकद्विकद्वादशभागयुक्तं योज्यं विषं टंकणमूष- णञ्च । हुताशनो नाम हुताशनस्य करोति वृद्धिं कफजिन्नराणाम् ॥ ९ ॥ विष एक भाग, सुहागा दो भाग और कालीमिरच १२ भाग लेवे; इन सबको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे अग्निकी वृद्धि होकर कफ नष्ट होता है ॥ ९ ॥ ९
( २३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अमृतकल्प वटी । शुद्धौ पारदगन्धौ च समानौ कज्जलीकृतौ । तयोरर्द्धं विषं शुद्धं तत्समं टंकणं भवेत् ॥ १० ॥ भृङ्गराजद्रवैर्भाव्यं त्रिदिनं यत्नतः पुनः । मुद्गप्रमाण! वटिकाः कर्त्तव्या भिषजां वरैः ॥ ११ ॥ वटीद्वयं हरेच्छूलमग्निमान्द्यं सुदारुणम् । अजीर्णं जरयत्याशु धातुपुष्टिं करोति च ॥ १२ ॥ नानाब्याधिहरा चेयं वटी गुरुवचो यथा । अनुपानविशेषेण सम्यग्गुणकरी भवेत् ॥ १३ ॥ शुद्ध पारा १ भाग, गन्धक १ भाग, विष १ भाग और सुहागा १ भाग लेवे । पहले पारे गंधककी कज्जली कर ले; फिर इन सब औष- धियोंको एकत्र करके भांगरेके रसमें तीन भावना देकर मूंगकी बराबर गोली बना लेवे। इनमेंसे दो गोली नित्य खानेसे शूल, अग्निकी मंदता और अजीर्ण रोग नष्ट होते हैं, धातुकी वृद्धि होती है और अनेक प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । यह गुरुदेवके वचनानुसार अनुपानविशे- षोंके साथ सेवन करनेसे श्रेष्ठ गुणोंको उत्पन्न करती है ॥ १०-१३ ॥ अग्निकुमार रस । रसेन्द्रगन्धौ सह टंकणेन समं विषं योज्यमिह त्रिभागम् । कपर्दशंखाविह नेत्रभागौ मरीचमत्रा- ष्टगुणं प्रदेयम् ॥ १४ ॥ सुपक्वजम्बीररसेन घृष्टः सिद्धो भवेदग्निकुमार एषः । विषूचिकाजीर्णसमी- रणार्त्ते दद्याद्धि वह्नौ ग्रहणीगदे च ॥ १५ ॥
भाषाटीकासहित । (२३९) पारा, गंधक,सुहागा प्रत्येक एक एक भाग, विष तीन भाग,शंखकी भस्म २ भाग, कौड़ीकी भस्म २ भाग और काली मिरच ८ भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र करके अच्छे प्रकारसे पके हुए जम्बीरी नींबूके रसमें खरल करके चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे। इन गोलियोंके सेवन करनेसे विषूचिका, अजीर्ण, वातरोग और ग्रहणी रोग नष्ट होते हैं। इसको अग्निकुमाररस कहते हैं ॥ १४ ॥ १५ ॥ बृहदग्निकुमार रस। शुद्धसूतं द्विधा गन्धं गन्धतुल्यञ्च टंकणम् । फलत्रयं यवक्षारं व्योषं पञ्चपटूनि च ॥ १६ ॥ द्वादशैतानि सर्वाणि रसतुल्यानि दापयेत् । संमर्द्य सप्तधा सर्वं भावयेदार्द्रकद्रवैः ॥ १७ ॥ संशोष्य चूर्णयित्वा तु भक्षयेदार्द्रकाम्बुना । शाणमात्रं वयो वीक्ष्य नानाऽजीर्णप्रशान्तये ॥ रसश्चाग्निकुमारोऽयं महेशेन प्रकाशितः ॥ १८ ॥ पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, सुहागा २ भाग, त्रिफला, जवा- खार, त्रिकुटा और पांचों लवण यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके अदरखके रसकी सात भावना देवे और धूपमें सुखा लेवे। पश्चात् इसका चूर्ण करके रोगीकी अवस्थाको देखकर चार मासे परिमाण अदरखके रसके साथ सेवन करे। अनेक प्रकारके अजीर्णोंको दूर करनेवाली यह औषधि स्वयं महादेवने कही है ॥ १६-१८ ॥ महाग्निकारकश्चै कालभास्करतेजसाम् । अग्निमान्द्यभवान् रोगान् शोथं पाण्ड्वामयं जयेत् १९ दुर्नामग्रहणीसामरोगान् हन्ति न संशयः । यथेष्टाहारचेष्टस्य नास्त्यत्र नियमः क्वचित् ॥२०॥
( २४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । इससे अत्यन्त बढ़ी हुई मंदाग्नि,शोथ, पाण्डुरोग, बवासीर,संग्रहणी और आमरोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेपर यथेष्ट आहार विहार करे, इसपर किसी प्रकारका नियम नहीं है । यह प्रलयके सूर्यके समान अग्निको अत्यंत प्रदीप्त करता है ॥ १९ ॥ २० ॥ व्योषं जातीफले द्वे च लवङ्गञ्च वरांगकम् । पत्रं शृंगीं कणा टङ्कं यमानी जीरकद्वयम् ॥ २१ ॥ सैन्धवञ्च विडं हिङ्गु रसं गन्धञ्च रौप्यकम् । लोहमभ्रं समं सर्वं जम्बीररसमर्दितम् ॥ २२ ॥ चतुर्गुञ्जां वटीं कृत्वा खादेदजीर्णशान्तये । अत्यग्निकारकश्चायं रसश्चाग्निकुमारकः ॥ २३ ॥ संग्रहग्रहणीञ्चैव वातपित्तकफोद्भवाम् । नाशयेदामदोषञ्च त्रिदोषजनितञ्च यत् ॥ शूलदोषं विषूचीञ्च भास्करस्तिमिरं यथा ॥ २४ ॥ अपर बृहदग्निकुमार रस—सोंठ,पीपल,कालीमिरच, जायफल,जावित्री, लौंग, दालचीनी, तेजपात, काकड़ासिंगी, पीपल, सुहागा, अजवायन, जीरा, कालाजीरा, सेंधानमक, विडनमक, हींग, पारा, गंधक, रूपा भस्म, लोहभस्म और अभ्रकभस्म इन सब द्रव्योंको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । अनेक प्रकारके अजीर्णोंको शमन करनेके लिये इन गोलियोंका सेवन करे । यह अग्निको अत्यन्त दीपन करता है । इसके सेवन करनेसे वातज, पित्तज और कफज ग्रहणी रोग नष्ट होता है तथा आमदोष, त्रिदोषजरोग, शूल और विषूचिका रोग ऐसे नष्ट होते हैं जिसप्रकार सूर्योदयसे अन्धकारका समूह नष्ट होता है । इसको अपर बृहदग्निकुमार रस कहते हैं ॥ २१-२४ ॥
भाषाटीकासहित । ( २४१ ) बृहन्महोदधि वटी । लवंगं चित्रकं शुण्ठी जयपालं समं समम् । टंकणञ्च प्रदातव्यं वृद्धदारस्य कार्षिकम् ॥ २५ ॥ चतुर्दश भावनाश्च दन्तीद्रावैः प्रदापयेत् । निम्पाकेन त्रिधा देया वृद्धदारेण पञ्चधा ॥ २६ ॥ रसं गन्धञ्च गरल मेलयित्वा विभावयेत् । आर्द्रकस्य रसेनैव चित्रकस्य रसेन वा ॥ २७ ॥ मुद्गप्रमाणां वटिकां कृत्वा खादेद्दिने दिने । क्षुत्पिपासाकरी चेयं जीर्णज्वरविनाशिनी ॥ २८ ॥ लौंग, चित्रकमूल, सोंठ, जमालगोटे, सुहागा और विधारके बीज यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर दंतीकी जड़के रसमें चौदह भावना देवे, फिर कागजी नींबूके रसमें तीन भावना देवे, पश्चात् विधारके क्वाथकी पांच भावना देवे । फिर इसमें पारा एक कर्ष, गंधक एक कर्ष और विष एक कर्ष परिमाण लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर अदरखके रसकी सात और चित्रक जड़की सात भावना देकर मूंगकी बराबर गोली बना लेवे । इनमें से प्रतिदिन एक गोली भक्षण करे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे क्षुधा और पिपासाकी वृद्धि होती है तथा जीर्णज्वर नष्ट होता है । इसको बृहन्महोदधि वटी कहते हैं ॥ २५-२८ ॥ रामबाण रस । पारदामृतलवंगगन्धकं भागयुग्ममरिचेन मिश्रि- तम् । जातिकाफलमथार्द्धभागिकं तिन्तिडीफल- रसेन मर्दितम् ॥ २९ ॥ माषमात्रमनुपानयोगतः सद्य एव जठराग्निदीपनः। संग्रहग्रहणीकुम्भकर्णकं
( २४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सामवातखरदूषणं जयेत् । वह्निमान्द्यदशवक्त्र- नाशनो रामबाण इव विश्रुतो रसः ॥ ३० ॥ पारा, विष, लौंग और गंधक यह प्रत्येक एक एक भाग, काली- मिरच दो भाग, जायफल आधा भाग इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके कच्ची इमलीके रसमें भावना देकर यथोचित मात्रानुसार अथवा एक मासे औषधि यथोक्त अनुपानके साथ सेवन करे तो जठराग्निकी वृद्धि होकर मंदाग्नि नष्ट होती है । इसके सेवन करनेसे कुम्भकर्णकी समान संग्रहणी, खरदूषणके समान आमवात और दशाननकी समान मंदाग्नि नष्ट होती है । इसको रामबाण रस कहते हैं ॥ २९ ॥ ३० ॥ अजीर्णकण्टक रस । शुद्धसूतं विषं गन्धं समं सर्वं विचूर्णयेत् । मरिचं सर्वतुल्यञ्च कण्टकार्याः फलद्रवैः ॥ ३१ ॥ मर्दयेद्भावयेत्सर्वमेकविंशतिवारकम् । त्रिगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्वाजीर्णप्रशान्तये । अजीर्णकण्टकः सोऽयं रसो हंति विषूचिकाम्॥३२॥ शुद्ध पारा, विष और गंधक समान भाग लेकर एकत्र पीसकर बारीक चूर्ण कर ले और सब चूर्णके बराबर काली मिरचोंका चूर्ण लेवे । सबको एकत्र कटेरीके फलोंके रसमें २१ बार भावना देकर तीन तीन रत्तीकी गोलियां बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे सब प्रकारका अजीर्ण रोग दूर होता है तथा विषूचिका नष्ट होती है । इसको अजीर्णकण्टक रस कहते हैं ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ पाशुपत रस । कर्षं सूतं द्विधा गन्धं त्रिभागं तीक्ष्णभस्मकम् । त्रिभिर्विषं समं देयं चित्रकक्वाथभावितम् ॥ ३३ ॥
भाषाटीकासहित । (२४३) धूर्त्तबीजस्य भस्मापि द्वात्रिंशद्भागसंयुक्तम् । कटुत्रयं त्रिभागं स्याल्लवंगैला च तत्समम् ॥ ३४ ॥ जातीफलं तथा कोषमर्द्धभागं नियोजयेत् । तथाऽर्द्धं लवणं पञ्च स्नुह्यर्कैरण्डतिन्तिडी ॥ ३५ ॥ अपामार्गाश्वत्थजञ्च क्षारं दद्याद्विचक्षणः । हरीतकी यवक्षारं स्वर्जिका हिंगुजीरकम् ॥ ३६ ॥ सूततुल्यं टङ्कणं च चाम्लयोगेन मर्दयेत् । भोजनान्ते प्रयोक्तव्यो गुञ्जाफलप्रमाणतः ॥ ३७ ॥ रसः पाशुपतो नाम सद्यः प्रत्ययकारकः । दीपनः पाचनो हृद्यः सद्यो हन्ति विषूचिकाम्॥३८॥ पारा १ भाग , गंधक २ भाग, लोहाभस्म ३ भाग और विष छः भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर चित्रकके रसमें भावना देकर सुखा लेवे । फिर इसमें ३२भाग धतूरेके बीजोंकी भस्म, त्रिकुटेका चूर्ण ३ भाग, लौंग ३ भाग, इलायची ३ भाग, जायफल आधा भाग, जावित्री आधा भाग, पांचों नमक प्रत्येक आधा आधा भाग तथा थूहर, आक, अरण्ड, इमली, चिरचिटा और पीपल इन प्रत्येकका क्षार एक एक भाग लेवे । फिर हरड़, जवाखार, सज्जी, हींग, जीरा और सुहागा यह समस्त औषधि प्रत्येक एक एक भाग मिलाकर पूर्वोक्त अम्लवर्गकी औषधियोंमें खरल करे । भोजनके पश्चात् इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि सेवन करनी चाहिये। यह औषधि तत्काल गुण- दायक है; अग्निको दीपन करनेवाली, पाचक, हृदयको हितकारी और तत्काल विषूचिका रोगको दूर करती है ॥ ३३-३८ ॥ तालमूलीरसेनैव उदरामयनाशनः । मोचरसेनातिसारं ग्रहणीं तक्रसैन्धवैः ॥ ३९ ॥
( २४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सौवर्चलकणाशुण्ठीयुतः शूलं विनाशयेत् । अर्शो हन्ति च तक्रेण पिप्पल्या राजयक्ष्मकम्॥४०॥ वातरोगं निहन्त्याशु शुण्ठीसौवर्चलान्वितः । शर्कराधान्ययोगेन पित्तरोगं निहन्त्ययम् ॥ ४१ ॥ पिप्पलीक्षौद्रयोगेन श्लेष्मरोगञ्च तत्क्षणात् । अस्मात् परतरो नास्ति धन्वन्तरिमतो रसः ॥४२॥ इस औषधिको मुसलीके रसके साथ सेवन करनेसे उदरामय नष्ट होता है, मोचरसके साथ सेवन करनेसे अतिसार रोग, तक्र और सेंधा- नमकके साथ सेवन करनेसे संग्रहणी, कालानमक पीपल और सोंठके साथ सेवन करनेसे शूल, तक्रके साथ सेवन करनेसे बवासीर, पीपलके साथ सेवन करनेसे राजयक्ष्मा, सोंठ और काले नमकके साथ सेवन करनेसे वातरोग, मिश्री और धनियेके साथ सेवन करनेसे पित्तरोग, पीपलके चूर्ण और शहदके साथ सेवन करनेसे कफरोग तत्काल नष्ट होजाता है । इसके समान संसारमें अन्य औषध गुणकारक नहीं है । इसको पाशुपत रस कहते हैं ॥ ३९-४२ ॥ बृहच्छंखवटी । दग्धशंखस्य चूर्णं स्यात्तथा लवणपञ्चकम् । तिंतिडीक्षारकञ्चैव कटुकत्रयमेव च ॥ ४३ ॥ तथैव हिंगुकं ग्राह्यं विषपारदगन्धकम् । अपामार्गस्य वह्नेश्च क्वाथैर्निम्पाकजैर्द्रवैः ॥ ४४ ॥ भावयेत्सर्वचूर्णं तदम्लवर्गैर्विशेषतः । यावत्तदम्लतां याति गुटिकाऽमृतरूपिणी ॥ ४५ ॥ सद्यो वह्निकरी चैव भस्मकञ्च नियच्छति ।
भाषाटीकासहित । ( २४५ ) भुक्त्वाऽऽकण्ठं तु तस्यान्ते खादेच्च गुटिकामिमाम् । तत्क्षणाज्जारयत्याशु पुनर्भोजनमिच्छति ॥ ४६ ॥ शंखकी भस्म, पांचों लवण, इमलीकी छालका खार, त्रिकुटा, हींग, विष, पारा और गंधक यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परि- माण लेकर चिराचिटे और चित्रकके क्वाथमें तथा कागजी नींबूके रसमें खरल करके चूर्ण कर लेवे । फिर इसको समस्त अम्लवर्गकी औषधि- योंमें भावना देकर गोली बना लेवे । यह औषधि अमृतके तुल्य है । इस औषधिके सेवन करनेसे तत्काल अग्निकी वृद्धि होती है और भस्मक रोग दूर होता है । कण्ठपर्यन्त भोजन कर लेनेपर इसकी एक गोली सेवन करे तो तत्काल सब भोजन जीर्ण होकर फिर भोजनकी इच्छा उत्पन्न होती है ॥ ४३-४६ ॥ हन्ति वातं तथा पित्तं कुष्ठानि विषमज्वरम् । गुल्मारुख्यं पाण्डुरोगञ्च निद्राऽऽलस्यमरोचकम् ॥४७॥ शूलञ्च परिणामोत्थं प्रमेहञ्च प्रवाहिकाम् । वक्त्रस्रावञ्च शोथञ्च दुर्नामानि विशेषतः ॥ ४८ ॥ इस औषधिके सेवन करनेसे वातरोग, पित्तरोग, कुष्ठ, विषम ज्वर, गुल्म, पांडु, निद्रा, आलस्य, अरुचि, शूल, परिणामशूल, प्रमेह, प्रवा- हिका, लालास्राव, शोथ और बवासीर नष्ट होती है । इसको बृहच्छङ्ख वटी कहते हैं ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ भक्तविपाक वटी । माक्षिकं रसगन्धौ च हरितालं मनःशिला । त्रिवृद्दन्तीवारिवाहं चित्रकञ्च महौषधम् ॥ ४९ ॥ पिप्पली मारिचं पथ्या यमानी कृष्णजीरकम् । रामठं कटुकापाठसैन्धवं साजमोदकम् ॥५०॥
( २४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । जातीफलं यवक्षारं समभागं विचूर्णयेत् । आर्द्रकस्य रसेनैव निर्गुण्ड्याः स्वरसेन च ॥ ५१ ॥ सूर्यावर्त्तरसेनैव तुलस्याः स्वरसेन च । आतपे भावयेद्वैद्यः खल्लपात्रे च निर्मले ॥ पेषयित्वा वटीं खादेद्गुञ्जाफलसमप्रभाम् ॥ ५२ ॥ सोनामाखी, पारा, गंधक, हरिताल, मैनशिल, निसोध, दंती, नागरमोथा, चित्रक, सोंठ, पीपल, मरिच, हरड़, अजवायन, काला जीरा, हींग, कुटकी, पाढ़, सेंधानमक, अजमोद, जायफल और जवा- खार इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर अदरख, सम्हालू, हुलहुल और तुलसी इन प्रत्येकके स्वरसकी सात सात भावना देवे और उत्तम खरलमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे ॥ ४९–५२ ॥ भुक्तोत्तरीये बहुभोजनान्ते मुहुर्मुहुर्वाञ्छति भोज- नानि । आमानुबन्धे च चिराग्निमान्द्ये विड्विग्रहे पित्तकफानुबन्धे ॥ ५३ ॥ शोथोदरे चार्शसि चाप्यजीर्णे शूले प्रदोषप्रभवे ज्वरे च । शस्ता वटी भक्तविपाकसंज्ञा सुखं विपाच्याशु निरस्य कोष्ठम् ॥ ५४ ॥ इस औषधिको भोजनके पश्चात् सेवन करनेसे वारंवार भोजन कर- नेकी अभिलाषा उत्पन्न होती है । आमानुबन्धी, बहुत समयकी मंदाग्नि, मलरोध, पित्त और कफका अनुबन्ध, शोथ, उदररोग, अर्श, अजीर्ण, दोषोंके प्रकोपसे उत्पन्न हुए शूल और ज्वर रोग नष्ट होते हैं । इसको भक्तविपाक वटी कहते हैं ॥ ५३ ॥ ५४ ॥
भाषाटीकासहित । (२४७) पञ्चामृत वटी । अभ्रकं पारदं ताम्रं गन्धकं मरिचानि च । समभागमिदं चूर्णं चाङ्गेरीरसमर्दितम् ॥ ५५ ॥ मर्दिते हि रसे भूयो जयन्तीसिन्धुवारयोः । • भावनाऽपि च कर्त्तव्या गुञ्जापरिमिता वटी ॥५६॥ तप्तोदकानुपानेन चतस्रस्तिस्र एव वा । वह्निमान्द्ये प्रदातव्या वट्यः पञ्चामृतास्तथा ॥५७॥ अभ्रक भस्म, पारा, तांबा भस्म, गन्धक और कालीमिरच यह सब औषधि समान भाग लेकर चांगेरी रसकी भावना देवे, फिर जयन्ती और सम्हालूके रसकी भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । मंदाग्नि रोगमें तीन या चार गोली गरम जलसे प्रयोग करे । इसको पञ्चामृतवटी कहते हैं ॥ ५५-५७ ॥ क्रव्याद रस । पलं रसस्य द्विपलं बलेः स्याच्छुल्वायसी चार्द्धप- लप्रमाणे । संचूर्ण्य सर्वं द्रुतमग्नियोगादेरण्डपत्रेऽथ निवेशनीयम् ॥५८॥ कृत्वाथ तां पर्पटिकां विदध्या- ल्लोहस्य पात्रे त्ववपूत मस्मिन् । जम्बीरजं पक्वरसं पलानां शतं नियोज्याग्निमथालपमल्पम् ॥ ५९ ॥ जीर्णे रसे भावितमेतदेतैः सुपञ्चकोलोद्भववारिपूरैः । सवेतसाम्लैः शतमत्र योज्यं समं रजष्टंकणजं सुभृष्टम् ॥ ६० ॥ विडं तदर्द्धं मरिचं समञ्च तत्सप्तवारं चणकाम्लकेन । क्रव्यादनामा भवति
( २४८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रसिद्धो रसस्तु मन्थानकभैरवोक्तः ॥ माषद्वयं सैन्धवतक्रपीतमेतत्सुधन्यं खलु भोजनान्ते ॥ ६१ ॥ पारा १ पल, गंधक २ पल, तांबा भस्म आधा पल, लोहाभस्म आधा पल इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर अग्निके योगसे गला लेवे और एरण्डके पत्तोंपर ढाल देवे, जब यह पर्पटीके समान हो जाय तब पीसकर चूर्ण कर लेवे । फिर जम्भीरी नींबूके १०० पल रसमें यह चूर्ण डालकर मंद मंद अग्निसे पकावे, फिर पंचकोल, बिजौरा नींबू और अमलवेत इन प्रत्येकके एकसौ पल रसकी भावना देवे । पश्चात् इसमें सुहागा १६ तोला, संचरनमक सबसे आधा और काली मिरच सबके बराबर मिलाकर चनाखारकी सात भावना देवे । पश्चात् इसकी दो दो मासेकी गोली बनाकर नित्य एक गोली तक्र और सेंधानमकके साथ भोजनके अंतमें सेवन करे ॥ ५८-६१ ॥ गुरूणि मांसानि पयांसि पिष्टं घृतानि सेव्यानि फलानि चापि । मात्रातिरिक्तान्यपि सेवितानि यामद्वयाज्जारयति प्रसिद्धः ॥६२॥ कार्श्यस्थौल्य- निबर्हणो गरहरः सामार्त्तिनिर्णाशनो, गुल्मप्लीह- निषूदनो ग्रहणिकाविध्वंसनः संसनः। वातश्लेष्म- निबर्हणः श्रमहरः शूलार्तिशूलापहो, वातग्रन्थि- महोदरापहरणः क्रव्यादनामा रसः ॥ ६३ ॥ भारी पदार्थ, मांस, दूध, मिष्टान्न और पक्वान्न, घृत और फल खूब पेट भरकर भोजन करके इस औषधिके सेवन कर लेने पर दो प्रहरमें समस्त जीर्ण हो जाता है । इस औषधिके सेवन करनेसे कृशता, स्थूलता, विषदोष, आमरोग, गुल्म, प्लीहा, संग्रहणी, वात- कफज रोग, श्रम, शूल, वातज ग्रंथि और उदररोग नष्ट होते हैं । इसको क्रव्याद रस कहते है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥
भाषाटीकासहित । ( २४९ ) ज्वालानल रस । क्षारद्वयं सूतगन्धौ पञ्चकोलमिदं समम् । सर्वतुल्या जया देया तदर्द्धं शिग्रुवल्कलम् ॥ ६४ ॥ एतत्सर्वं जयाशिग्रुवह्निमार्कवजै रसैः । भावयेत्त्रिदिनं घर्मे ततो लघुपुटे पचेत् ॥ ६५ ॥ भावयेत्सप्तधा चार्द्रद्रवैर्ज्वालानलो भवेत् । पाचनो दीपनो हृद्यश्चोदरामयनाशनः ॥ ६६ ॥ जवाखार, सज्जीखार, पारा, गंधक और पंचकोल यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबकी बराबर भांग लेवे, भांगसे आधा भाग सहिंजनेकी छाल लेवे। इन सबको एकत्र करके भांग, संहजना, चित्रक और भांगरा इन प्रत्येकके रसकी तीन दिनतक भावना देवे । फिर धूपमें सुखाकर लघुपुटमें पकावे । फिर अदरखके रसमें सात वार भावना देवे । यह औषधि अत्यंत पाचक, अग्निप्रदीपक, हृदयको हितकारी और उदररोग को दूर करती है । इसको ज्वालानल रस कहते हैं ॥ ६४-६६ ॥ अमृतावटी । अमृतवराटमरिचैर्द्विपञ्चनवभागयोजितैः क्रमशः । वटिका मुद्गसमाना कफत्रिदोषवह्निमांद्यहारिणी ॥६७॥ शुद्ध विष २ भाग, कौड़ीकी भस्म ५ भाग, काली मिरच ९ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र जलमें पीसकर मूंगकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे कफादि त्रिदोष और मंदाग्नि नष्ट होती है । इसको अमृतावटी कहते हैं ॥ ६७ ॥ बृहद्भक्तपाक वटी । अभ्रं पारदगन्धकौ सदरदौ ताम्रञ्च तालं शिला, वङ्गञ्च त्रिफला विषञ्च कुनटी भागास्त्रयो दन्तिनः ।
( २५० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शृङ्गीव्योषयमानि चित्रजलदं द्वे जीरके टंकण,- मेलापत्रलवंगहिंगुकटुकीजातीफलं सैन्धवम् ॥६८॥ एतान्यार्द्रकचित्रदन्तिसुरसावासारसैर्बिल्वजैः, पत्रो- त्थैरपि सप्तधा सुविमले खल्ले विभाव्यान्यतः । खादेद्वल्लमितं तथा च सकलव्याधौ प्रयोज्या बुधै- र्विद्बन्धे कफजे त्रिदोषजनिते ह्यामानुबन्धेऽपि च ॥ ६९ ॥ मन्दाग्नौ विषमज्वरे च सकले शूले त्रिदोषोद्भवे, हन्यात्तानपि भक्तपाकवटिका भूयश्च सामं जयेत् ॥ ७० ॥ अभ्रक भस्म, पारा, गंधक, सिंग्रफ, तांबा भस्म, हरितालभस्म, मैनाशिलभस्म, वंगभस्म, त्रिफला, विष और नैपाली मैनशिल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, दंती ३ भाग, काकड़ासिंगी, त्रिकुटा, अजवायन, चित्रक, नागरमोथा, जीरा, कालाजीरा, सुहागा, इलायची, तेजपात, लौंग, हींग, कुटकी, जायफल और सेंधानमक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग; इन सब औषधियोंको एकत्र करके अदरख, चित्रक, दंती, तुलसी, अडूसा और बेलके पत्ते इन प्रत्येकके रसकी सात सात भावना देवे । इसको सब प्रकारके रोगोंमें तीन रत्ती परिमाण प्रयुक्त करनी चाहिये । कफजन्य मलरोध, त्रिदोषजनित आमानुबन्ध, अग्निमांद्य, विषमज्वर और त्रिदोषजनित शूल रोगमें यह औषधि अतीव हितकारी है । इसको भक्तपाक वटी कहते हैं॥६८-७०॥ लवङ्गादि वटी । लवंगशुण्ठीमरिचानि भृष्टसौभाग्यचूर्णानि समानि कृत्वा । भाव्यान्यपामार्गहुताशवारा प्रभूत- मांसादिकजारणाय ॥ ७१ ॥