भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

( २७२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पाण्डुसूदन रस । रसं गन्धं मृतं ताम्रं जयपालञ्च गुग्गुलु । समांशमाज्यसंयुक्तां गुटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ३९ ॥ एकैकां भक्षयेन्नित्यं पाण्डुशोथप्रशान्तये । शीतलञ्च जलञ्चाम्लं वर्जयेत्पाण्डुसूदने ॥ ४० ॥ पारा, गंधक, तांबा भस्म, जमालगोटेके बीज और गूगल यह सब औषधि समान भाग लेकर घृतमें मर्दन करके यथोक्त मात्राकी गोली बना लेवे । इनमेंसे प्रतिदिन एक एक गोली पाण्डु और शोथरोग शान्त करनेके लिये खावे । इसके सेवन करनेपर शीतल जल और अम्लरसवाले पदार्थोंको त्याग देवे । इसको पाण्डुसूदन रस कहते हैं ॥ ३९ ॥ ४० ॥ मण्डूरवज्र वटक । पञ्चकोलं समरिचं देवदारुफलत्रिकम् । विडंगमुस्तयुक्ताश्च भागास्त्रिपलसम्मिताः ॥ ४१ ॥ यावन्त्येतानि चूर्णानि मण्डूरं द्विगुणं ततः । पक्त्वा चाष्टगुणे मूत्रे घनीभूते तदुद्धरेत् ॥ ४२ ॥ ततोऽक्षमात्रान् वटकान्पिबेत्तक्रेण तक्रभुक् । पाण्डुरोगं जयत्याशु मन्दाग्नित्वमरोचकम् ॥४३ ॥ अर्शांसि ग्रहणीदोषमूरुस्तम्भमथापि वा । क्रिमिं प्लीहानमानाहं गलरोगञ्च नाशयेत् । मण्डूरवज्रनामायं रोगानीकप्रणाशनः ॥ ४४ ॥ पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीतेकी जड़, सोंठ, मरिच, देवदारु, हरड़, बहेड़ा, आमला, वायविडंग और नागरमोथा यह प्रत्येक औषधि तीन तीन पल और सब औषधिसे दुगुना मण्डूर लेवे, और मण्डूरस आठगुना गोमूत्र लेवे । प्रथम मण्डूर और गोमूत्रको एकत्र करके '

भाषाटीकासहित । (२७३) पकावे । जब पकते पकते गाढा हो जाये तब उसमें उपरोक्त पंच- कोलका चूर्ण डालकर एक एक तोलेकी वटी बना लेवे । एक एक वटी तक्रके साथ सेवन करनेसे पांडुरोग, मंदाग्नि, अरुचि, बवासीर, संग्- हणी, ऊरुस्तम्भ, कृमि, प्लीहा, आनाह और गलरोग नष्ट होते हैं । इसको मण्डूरवज्र वटक कहते हैं ॥ ४१-४४ ॥ लघ्वानन्द रस । पारदं गन्धकं लौहं विषमभ्रकमेव च । समांशं मरिचस्याष्टौ टङ्गणञ्च चतुर्गुणम् ॥ ४५ ॥ भृङ्गराजरसैः सप्त भावना चाम्लवेतसैः । गुञ्जाद्वयं पर्णखण्डे खादेत्सायं निहन्ति च ॥ ४६ ॥ पाण्डुतामरुचिश्चैव मन्दाग्निं ग्रहणीं ज्वरम् । वातश्लेष्मभवान् रोगाञ्जयेदचिरसेवनात् ॥ ४७ ॥ पारा, गंधक, लोहाभस्म, विष और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, काली मिरच आठ भाग, सुहागा चार भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके भांगरेके रसकी सात भावना और खट्टे अनारके बीजोंके रसकी सात भावना देकर दो २ रत्तीकी गोली बना कर पानके साथ सेवन करनेसे पाण्डुरोग, अरुचि, मन्दाग्नि, ग्रहणी, ज्वर, वातकफके विकार थोड़े ही समय सेवन करनेसे नष्ट होते हैं। इस- को लघ्वानन्द रस कहते हैं ॥ ४५-४७ ॥ सम्मोह लोह । त्रिकटुत्रिफलावह्निविडङ्गं लौहमभ्रकम् । एतानि समभागानि घृतेन वटिकां कुरु ॥ ४८ ॥ कामलां पाण्डुरोगञ्च हृद्रोगं शोथमेव च । भगन्दरं क्रिमिकोष्ठं मन्दानलमरोचकम् ॥ ४९ ॥

( २७४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । तान्सर्वानाशयेदाशु बलवर्णाभिवर्द्धनः । सम्मोहलोहनामायं पाण्डुरोगे च पूजितः ॥ ५० ॥ त्रिकुटा, त्रिफला, चित्रक, वायविडङ्ग, लोहभस्म, अभ्रकभस्म यह सब समान भाग लेकर घृतमें गोलियां बनावे । यह रस सेवन करनेसे कामला, पाण्डुरोग, हृद्रोग, शोथ, भगन्दर, कोष्ठगतक्रिमि, मन्दाग्नि, अरुचि इन सब रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है और बल, वर्ण और अग्निको बढ़ानेवाला है; पाण्डुरोगके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ है । इसको सम्मोह लोह कहते हैं ॥ ४८-५० ॥ त्र्यूषणादि मण्डूर । स्विन्नमष्टगुणे मूत्रे लौहकिट्टं सुशोधितम् । पाकान्ते त्र्यूषणं वह्निवरादार्वीसुरद्रुमान् ॥ ५१ ॥ विडंगबीजचूर्णञ्च मुस्तं किट्टसमं क्षिपेत् । प्रातःकर्षं भजेदस्य जीर्णे तक्रौदनं भजेत् ॥ ५२ ॥ हलीमकं पाण्डुरोगमर्शांसि श्वयथुं तथा । ऊरुस्तम्भं जयेदेतत्कामलां कुम्भकामलाम् ॥५३॥ शुद्ध मण्डूरको आठ गुणे गोमूत्रमें पकाकर गाढ़ा करके त्रिकुटा, चित्रकमूल, त्रिफला, दारुहल्दी, देवदारु, वायविडंग, नागरमोथा यह सब मण्डूरके बराबर लेकर (कूटकपड़छानकर) मिलावे । इसमेंसे १ तोला परिमाण प्रातःकाल सेवन करे । औषधिके पचजानेपर भात और माठा खाना चाहिये । इससे हलीमक, पाण्डुरोग, बवासीर, शोथ, ऊरुस्तम्भ, कामला और कुम्भकामला यह सब रोग नष्ट होते हैं ॥ ५१-५३ ॥

भाषाटीकासहित । ( २७५ ) त्रिफलाया गुडूच्या वा दार्व्या निम्बस्य वा रसः । प्रातर्माक्षिकसंयुक्तः शीलितः कामलापहः ॥ ५४ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे पाण्डुरोगाधिकारः । त्रिफला, गिलोय, दारुहल्दी और नीम इनके रसमें सहत डालकर सेवन करनेसे कामलारोग नष्ट होता है ॥ ५४ ॥ इति पाण्डुरोगचिकित्सा । अथ रक्तपित्तचिकित्सा । अर्केश्वर रस । मृतार्कं सूतवंगञ्च मृताभ्रञ्च समाक्षिकम् । अमृतास्वरसैर्भाव्यं त्रिसप्तकपुटे पचेत् ॥ १ ॥ वासा क्षीरविदारीभ्यां चतुर्गुञ्जाप्रमाणतः । भक्षणाद्विनिहन्त्याशु रक्तपित्तं सुदारुणम् ॥ २ ॥ तांबा भस्म, पारद भस्म, वंग भस्म, अभ्रक भस्म और सोनामाखी भस्म यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर गिलोयके रसमें २१ वार भावना देकर पुटपाककी विधिसे पकाकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको अडूसा और विदारीकन्दके रसके साथ सेवन करनेसे दारुण रक्तपित्तरोग दूर होता है । इसको अर्केश्वर रस कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ सुधानिधि रस ! सूतं गन्धं माक्षिकञ्चैव लौहं सर्वं घृष्ट्वा त्रैफलेनोद- केन । लौहे पात्रे गोमयेऽग्नौ पुटित्वा रात्रौ दद्याद् रक्तपित्तप्रशान्त्यै ॥ ३ ॥

( २७६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा, गन्धक, सोनामाखीकी भस्म और लोहा भस्म यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर त्रिफलेके क्वाथमें लोहेके पात्रमें अरने उप- लोंकी अग्निके द्वारा पकावे । रात्रिके समय इस औषधिके सेवन करनेसे रक्तपित्तरोग नष्ट होता है । इसको सुधानिधि रस कहते हैं ॥ ३ ॥ आमलक्यादि लोह । आमला पिप्पलीलोहं तुल्यया सितया सह । रक्तपित्तहरं लौहं योगराजमिदं स्मृतम् ॥ ४ ॥ वृष्याग्निदीपनं बल्यमम्लपित्तविनाशनम् । पित्तोत्थानपि वातोत्थान्निहन्ति विविधान्गदान् ॥५॥ आमले, पीमल, लोहेका चूर्ण समानभाग और सबकी बराबर मिश्री मिलावे । सबको एकत्र पीसकर सेवन करनेसे रक्तपित्त रोग नष्ट होता है । इसको योगराज कहते हैं, इससे बलकी वृद्धि होती है और अग्नि दीप्त होती है । इससे अम्लपित्त प्रभृति वातिक, पैत्तिक और अनेक प्रकारके रोग नष्ट होते हैं, इसको आमलक्यादि लोह कहते हैं ॥४॥५॥ शतमूल्यादि लोह । शतमूलीसिताधान्यानागकेशरचन्दनैः । त्रिकत्रयतिलैर्युक्तं लौहं सर्वगदापहम् ॥ तृष्णादाहज्वरच्छर्दिरक्तपित्तविनाशनम् ॥ ६ ॥ शतावर, मिश्री, धनिया, नागकेशर, चन्दन, त्रिकुटा, त्रिफला, त्रिजात और तिल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और सबके बराबर लोहेका चूर्ण लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर गोली बनाकर सेवन करनेसे तृषा, दाह, ज्वर, वमन और रक्तपित्त प्रभृति समस्त रोग नष्ट होते हैं ॥ ६ ॥

भाषाटीकासहित । ( २७७ ) रक्तपित्ते पिबेद्व्योमसहितं पर्पटीरसम् । वासाद्राक्षाभयानाञ्च क्वाथं वा शर्करान्वितम् ॥ योगवाहिरसान्सर्वान् रक्तपित्ते प्रयोजयेत् ॥ ७ ॥ रक्तपित्तरोगमें पित्तपापड़ेके रसके साथ अभ्रककी भस्मको; अथवा अडूसा, दाख और हरड़ इनके क्वाथमें मिश्री डालकर पीवे; अथवा समस्त योगवाही औषधि प्रयुक्त करे ॥ ७ ॥ रक्तपित्तान्तक रस । मृताभ्रं मुण्डतीक्ष्णञ्च माक्षिकं रसतालकम् । गन्धकञ्च भवेत्तुल्यं यष्टिद्राक्षामृताद्रवैः ॥ ८ ॥ दिनैकं मर्दयेत्खल्ले सिताक्षौद्रसमन्वितम् । माषमात्रं निहन्त्याशु रक्तपित्तं सुदारुणम् ॥ ज्वरं दाहं क्षतक्षीणं तृष्णां शोषमरोचकम् ॥ ९ ॥ अभ्रकभस्म, लोहभस्म, मुण्डलोहभस्म, सोनामाखीभस्म, पारा- भस्म, हरितालभस्म और गंधक यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर मुलहठी, दाख और गिलोय इनके क्वाथमें अलग अलग एक एक दिन पर्यंत खरल करे । इस औषधिको एक मासे परिमाण मिश्री और शहदमें मिलाकर खानेसे शीघ्र ही दारुण रक्तपित्त, ज्वर, दाह, क्षतक्षीण, तृषा, शोष और अरुचि रोग नष्ट होते हैं । इसको रक्त- पित्तान्तक रस कहते हैं ॥ ८ ॥ ९ ॥ रसामृत रस । रसस्य द्विगुणं गन्धं माक्षिकञ्च शिलाजतु । गुडूची चन्दनं द्राक्षा मधुपुष्पञ्च धान्यकम् ॥ १० ॥ कुटजस्य त्वचं बीजं धातकी निम्बपत्रकम् । यष्टीमधुसमायुक्तं मधुशर्करयाऽन्वितम् ॥ ११ ॥

( २७८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विधिना मर्दयित्वा तु कर्षमात्रं तु भक्षयेत् । धारोष्णपयसा युक्तं प्रातरेव समुत्थितः ॥ १२ ॥ पित्तं तथाऽम्लपित्तञ्च रक्तपित्तं विशेषतः । निहन्ति सर्वदोषं च ज्वरं सर्वं न संशयः ॥ रसामृतरसो नाम गहनानन्दभाषितः ॥ १३ ॥ पारा १ भाग, गंधक, सोनामाखी भस्म, शिलाजीत, लालचन्दन, गिलोय, दाख, महुवेके फूल, धनिया, इन्द्रजौ, कुड़ेकी छाल, धायके फूल, नीमके पत्ते, मुलैठी, शहद और मिश्री यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग लेवे, इन सबको विधिवत् एकत्र खरल करके प्रातःकाल मुख धोकर एक कर्ष परिमाण भक्षण करे और ऊपरसे धारोष्ण दूध पीवे । इसके सेवन करनेसे पित्तरोग, अम्लपित्त, रक्तपित्त और ज्वर निश्चय नष्ट होते हैं। इसको स्वयं गहनानन्दनाथने कहा है । इसको रसामृत रस कहते हैं ॥ १०-१३ ॥ खण्डकूष्माण्ड । कूष्माण्डात्पलशतं सुस्विन्नं निष्कुलीकृतम् । पचेत्तते घृतप्रस्थे शनैस्ताम्रमये दृढे ॥ १४ ॥ यदा मधुनिभः पाकस्तदा खण्डं शतं न्यसेत् । पिप्पलीशृङ्गवेराभ्यां द्वे पले जीरकस्य च ॥ १५ ॥ त्वगेलापत्रमरिचधान्यकानां पलार्द्धकम् । न्यसेच्चूर्णीकृतं तत्र दर्व्या संघट्टयेत्पुनः ॥ १६ ॥ तत्पक्वं स्थापयेद्भाण्डे दत्त्वा क्षौद्रं घृतार्द्धकम् । तद्यथाग्निबलं खादेद्रक्तपित्तक्षतक्षयी ॥ १७ ॥ उत्तम प्रकारसे पका हुआ एक पेठा लेकर उसको छीलकर उसके बीज निकाल डाले । इसको अच्छे कली किये हुए पात्रमें पकाकर निचोड़ लेवे और छिलके रहित पेठेके टुकड़े १०० पल लेवे । फिर

भाषाटीकासहित । ( २७९ ) इसको उत्तम कली किये हुए तांबेके पात्रमें डालकर एक प्रस्थ घृतमें पकावे। जब पकते पकते शहदके समानवर्ण होजाय तब १०० पल खांडकी चासनी उसी पेठेमेंसे निकले हुए जलसे बनाकर डाले तथा पीपल, अदरख और जीरा इन प्रत्येकका चूर्ण आठ आठ तोले; दाल- चीनी, इलायची, तेजपात, कालीमिरच और धनिया प्रत्येकका चूर्ण दो दो तोले, सबको मिलाकर अच्छे प्रकारसे करछीसे चलाकर एक- जीव करके रख देवे। फिर घृतसे आधा भाग शहद डालकर एक उत्तम चिकने बासनमें भरकर रख देवे। इसका अग्निके बलानुसार रक्तपित्त, क्षत और क्षयरोगी सेवन करे ॥ १४-१७ ॥ शर्कराद्य लोह । शर्करातिलसंयुक्तं त्रिकत्रययुतं त्वयः। रक्तपित्तं निहन्त्याशु चाम्लपित्तहरं परम् ॥ १८ ॥ मिश्री, तिलका चूर्ण, हरड़का चूर्ण, बहेड़ेका चूर्ण, आमलोंका चूर्ण, सोंठका चूर्ण, पीपलका चूर्ण, काली मिरचोंका चूर्ण, चित्रकका चूर्ण, नागरमोथेका चूर्ण और वायविडंगका चूर्ण यह प्रत्येक एक एक भाग और सब चूर्णकी बराबर लोहाभस्म लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके यथोक्त मात्रानुसार सेवन करनेसे रक्तपित्त और अम्लपित्त रोग नष्ट होते हैं। इसको शर्कराद्य लोह कहते हैं ॥ १८ ॥ समशर्कर लोह । लोहाच्चतुर्गुणं क्षीरमाज्यं द्विगुणमुत्तमम् । चूर्णं पादन्तु वैडङ्गं दद्यान्मधुसिते समे ॥ १९ ॥ ताम्रपात्रे दृढे पक्त्वा स्थापयेद् घृतभाजने । माषकादिक्रमेणैव भक्षयेद्विधिपूर्वकम् ॥ २० ॥ अनुपानं प्रयुञ्जीत नारिकेलोदकादिकम् । रक्तपित्तं जयेत्तीव्रमम्लपित्तं क्षतक्षयम् । प्रकृष्टकान्तिजननमायुष्यमुत्तमोत्तमम् ॥ २१ ॥

( २८० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लोहभस्म १ भाग, दूध, ४ भाग, घृत २ भाग, वायविडंगका चूर्ण चौथाई भाग, मिश्री एक भाग और सहत १ भाग लेवे । प्रथम लोह भस्म, दूध और घृत इनको एकत्र करके एक दृढ तांबेके पात्रमें मंद मंद अग्निसे पकावे । जब पकते पकते गाढ़ा होजाय तब वायविडंगका चूर्ण और मिश्री डाल देवे । पाक सिद्ध होनेपर चूल्हे परसे उतार लेवे । शीतल होनेपर शहद मिलाकर एक घीके चिकने बासनमें भर- कर रख देवे । इस औषधिको पहिले दिन एक मासा, दूसरे दिन दो मासे और तीसरे दिन तीन मासे इस प्रकार प्रतिदिन छः दिन तक एक एक मासा बढ़ाकर खाये। इसके सेवन करनेके पश्चात् नारियलका जल पान करे । इससे रक्तपित्त, अम्लपित्त, क्षत और क्षयरोग नष्ट होते हैं । यह आनन्दजनक कांतिको उत्पन्न करनेवाला और आयुको बढ़ानेवाला है । इसको समशर्कर लोह कहते हैं ॥ १९-२१ ॥ कपर्दक रस । मृतं वा मूर्च्छितं सूतं कार्पासकुसुमद्रवैः । मर्दयेद्दिनमेकन्तु तेन पूर्या वराटिका ॥ २२ ॥ निरुध्य चान्धमूषायां भाण्डे रुद्धा पुटे पचेत् । उद्धृत्य चूर्णयेच्छ्लक्ष्णं मरिचैर्द्विगुणैः सह ॥ २३ ॥ गुञ्जामात्रां घृतेनैव भक्षयेत्प्रातरुत्थितः । उदुम्बरं घृतञ्चैव अनुपानं प्रयोजयेत् ॥ कपर्दको रसो नाम रक्तपित्तविनाशनः ॥ २४ ॥ पारेकी भस्मको अथवा मूर्च्छित पारेको लेकर कपासके फूलोंके रसमें एक दिनतक खरल करके कौड़ियोंमें भरकर उसका मुख बंद कर देवे । फिर उन कौड़ियोंको अन्धमूषामें रखकर पुटपाक करे; शीतल होनेपर इसका चूर्ण करके दो भाग काली मिरचोंका चूर्ण मिलाकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंका घृतके

भाषाटीकासहित । (२८१) साथ सेवन करे और ऊपरसे गूलर और घीका अनुपान करे । इसके सेवन करनेसे रक्तपित्तरोग नष्ट होता है ॥ २३-२४ ॥ नीलोत्पलसिताक्षौद्रसंयुक्तं पद्मकेसरम् । तण्डुलोदकपानेन रक्तपित्तं नियच्छति ॥ २५ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे रक्तपित्तचिकित्सा । नीलकमल अथवा नीलोत्पल ( नीलोफर ), मिश्री, शहद और कमलकेशर यह सब औषधि समान भाग लेकर एकत्र खरल करके चावलोंके जलके साथ सेवन करनेसे रक्तपित्तरोग नष्ट होता है ॥ २५ ॥ इति रक्तपित्तचिकित्सा । अथ यक्ष्माधिकार । रास्नादि लौह । रास्नाश्वगन्धाकर्पूरभेकपर्णीशिलाह्वयैः । त्रिकत्रयसमायुक्तैर्लोहं यक्ष्मान्तकृन्मतम् ॥ १ ॥ सर्वोपद्रवसंयुक्तमपि वैद्यविवर्जितम् । हन्ति कासं स्वराघातं राजयक्ष्म क्षतक्षयम् ॥ बलवर्णाग्निपुष्टीनां वर्द्धनं दोषनाशनम् ॥ २ ॥ रास्ना, असगंध, कपूर, मण्डूकपर्णी, शिलाजीत, हरड़, बहेडा, आमला, सोंठ, मरिच, पीपल, चित्रक, नागरमोथा और वायविडंग यह प्रत्येक एक एक भाग लेवे और सबकी बराबर लोहभस्म लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र मिलाकर यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करनेसे समस्त उपद्रव युक्त, वैद्य करके छोडा हुआ राजयक्ष्म- रोगी अवश्य आरोग्य होजाता है । इस औषधिके सेवन करनेसे खाँसी, स्वरभेद, राजयक्ष्मा, क्षत और क्षयरोग नष्ट होते हैं; बल, वर्ण अग्नि और पुष्टिकी वृद्धि होती है तथा त्रिदोषको नष्ट करता है । इसको रास्नादि लौह कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥

( २८३ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । राजमृगांक रस । रसभस्म त्रयो भागा भागैकं हेमभस्मकम् । मृततारस्य भागैकं शिलागन्धकतालकम् ॥ ३ ॥ प्रतिभागद्वयं शुद्धमेकीकृत्य विचूर्णयेत् । वराटिका तेन पूर्या चाजाक्षीरेण टङ्कणम् ॥ ४ ॥ पिष्ट्वा तेन मुखं रुद्ध्वा मृद्भाण्डे तां निरोधयेत् । शुष्कं गजपुटे पाच्यं चूर्णयेत्स्वाङ्गशीतलम् ॥ ५ ॥ दशपिप्पलिकैः क्षौद्रैर्मरिचैर्वा घृतान्वितैः । गुञ्जाचतुष्टयञ्चास्य क्षयरोगप्रशान्तये ॥ ६ ॥ सघृतैर्दापयेद्वाथ वातश्लेष्मभवे क्षये । रसो राजमृगाङ्कोऽयं नानारोगनिषूदनः ॥ ७ ॥ पाराभस्म, या रससिन्दूर ३ भाग, सोनेकी भस्म १ भाग, चांदीकी भस्म १ भाग, मैनशिल २ भाग, गंधक २ भाग और हरितालभस्म २ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके कौडीमें भर देवे । पश्चात् बकरीके दूधमें सुहागेको पीसकर उससे कौडीके मुखको बंद कर देवे, फिर उस कौडीको मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । शीतल होने- पर चूर्ण करके दश पीपल और सहतके द्वारा अथवा १० कालीमिरच और घृतके द्वारा इसको चार रत्ती परिमाण क्षयरोगको नष्ट करनेके लिये सेवन करे । वातश्लेष्मज क्षयरोगमें घृतके साथ भक्षण करे । इससे अनेक प्रकारके रोग नष्ट होते हैं ॥ ३-७ ॥ मृगाङ्क रस । स्याद्रसेन समं हेम·मौक्तिकं द्विगुणं भवेत् । गन्धकञ्च समं तेन रसतुल्यन्तु टंकणम् ॥ तत्सर्वं गोलकं कृत्वा काञ्जिकेन च पेषयेत् । भाण्डे लवणपूर्णेऽथ पचेद्यामचतुष्टयम् ॥ ८ ॥

भाषाटीकासहित । ( २८३ ) मृगाङ्कसंज्ञको ज्ञेयो राजयक्ष्मनिकृन्तनः । गुञ्जाचतुष्टयञ्चास्य मरिचैः सह भक्षयेत् ॥ ९ ॥ पिप्पलीदशकैर्वापि मधुना सह लेहयेत् । पथ्यन्तु लघुभिर्मांसैः प्रयोगेऽस्मिन्प्रयोजयेत् ॥१०॥ व्यञ्जनैर्घृतपक्वैश्च संस्कृतैर्ह्यविदाहिभिः ॥ वृन्ताकबिल्वतैलानि कारवेल्लं च वर्जयेत् ॥ स्त्रियं परिहरेद्दूरं कोपञ्चापि विवर्जयेत् ॥ ११ ॥ पारा १ भाग, सोनाभस्म १ भाग, मोती २ भाग, गंधक ३ भाग और सुहागा १ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र कांजीमें पीसकर गोला बना लेवे । फिर इस गोलेको मूषामें रखकर नमकसे भरी हुई हाँडीमें उस मूषाको रखकर चार प्रहर तक पकावे । इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि लेकर काली मिरचोंके चूर्णके साथ; अथवा दश पीपलके चूर्ण और सहतके साथ सेवन करे । इस औषधिके सेव- नके अंतमें लघु ( हलके ) मांसको घृतके द्वारा संस्कार किये हुए और परिपक्व हुए व्यञ्जन और अविदाही पदार्थ पथ्य देवे । बैंगन, बेल, तैल और करेलेको नहीं खाये । तथा स्त्रीप्रसंग और क्रोधका त्याग कर देवे । इसके सेवन करनेसे राजयक्ष्मा रोग नष्ट होता है । इसको मृगांक रस कहते हैं ॥ ८-११ ॥ रत्नगर्भपोट्टली रस । रसं वज्रं हेम तारं नागं लौहञ्च ताम्रकम् । तुल्यांशं मरिचं देयं मुक्ताविद्रुममाक्षिकम् ॥ १२ ॥ शंखं तुत्थञ्च तुल्यांशं सप्ताहं चित्रकद्रवैः । मर्दयित्वा विचूर्ण्याथ तेन पूर्या वराटिका ॥ १३ ॥

( २८४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । टङ्कणं रविदुग्धेन मुखं लिप्त्वा निरोधयेत् । मृद्भाण्डे तां निरुध्याथ सम्यग्गजपुटे पचेत् ॥१४॥ आदाय चूर्णयेत्सर्वं निर्गुण्ड्या सप्त भावयेत् । आर्द्रकस्य रसैः सप्त चित्रकस्य च विंशतिः ॥१५॥ द्रवैर्भाव्यं ततश्चास्य देयं गुञ्जाचतुष्टयम् । क्षयरोगं निहन्त्याशु साध्यासाध्यं न संशयः॥१६॥ योजयेत्पिप्पलीक्षौद्रैः सघृतैर्मरिचैस्तथा । महारोगाष्टके कासे श्वासे चैवातिसारके ॥ पोटलीरत्नगर्भोऽयं सर्वरोगकुलान्तकः ॥ १७ ॥ पारा, हीरा, सोना, चांदी, सीसा, लोहा, तांबा इन सबकी भस्म, काली मिरच, मोती, मूँगाभस्म, सोनामाखीभस्म, शंखकी भस्म और शुद्ध तूतिया इन सब औषधियोंको सम भाग लेकर और एकत्र पीसकर चित्रकके रसमें सात दिन तक खरल करे। फिर इसको कौड़ीमें भरकर उसके मुखको आकके दूधमें पिसे हुए सुहागेसे बन्द कर देवे। फिर मिट्टीके सिकोरेमें रखकर ऊपरसे एक दूसरा सिकोरा ढक देवे और उसकी मूषा बनाकर गजपुटमें पकावे । शीतल होनेपर इसका चूर्ण कर ले । फिर सम्हालूके पत्तोंके रसकी सात भावना देवे, अदरखके रसकी सात भावना देवे और चित्रककी जड़के रसकी २० भावना देकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे साध्य और असाध्य क्षयरोग शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यह औषधि आठ प्रकारके महारोग, खांसी, श्वास और अतिसारमें पीपलके चूर्ण और सहतके साथ सेवन करे । अथवा कालीमिरचोंका चूर्ण और घृतके साथ प्रयोग करे । यह औषधि सर्वरोगनाशक है । इसको रत्नगर्भपोट्टली रस कहते हैं ॥ १२-१७ ॥

भाषाटीकासहित । ( २८५ ) लोकेश्वरपोट्टली रस । भस्म सूताच्चतुर्थांशं मृतस्वर्णं प्रदापयेत् । द्विगुणं गन्धकं दत्त्वा मर्दयेच्चित्रकाम्बुना ॥ १८ ॥ पूर्या वराटिका तेन टङ्कणेन निरुध्य च । भाण्डे चूर्णप्रलिप्तेऽथ क्षिप्त्वा रुद्ध्वा च मृन्मये ॥१९॥ शोषयित्वा गजपुटे पुटेत्तु चापराह्निके । स्वांगशीतं समुद्धृत्य चूर्णयित्वा तु विन्यसेत् । एष लोकेश्वरो नाम वीर्यपुष्टिविवर्द्धनः ॥२०॥ गुंजाचतुष्टयञ्चास्य पिप्पलीमधुसंयुतम् । मारिचघृतयुक्तैश्च भक्षयेद्दिवसत्रयम् । अङ्गकार्श्येऽग्निमान्द्ये च कासे पित्ते क्षयेपि च ॥२१॥ पारदभस्म या रससिन्दूर ४ भाग; सोनेकी भस्म १ भाग और गन्धक २ भाग लेवे । इन सबको चित्रककी जड़के रसमें खरल करके कौड़ीमें भर देवे और उसका मुख सुहागेसे बन्द कर देवे । पश्चात् एक सिकोरेमें चूनेका लेप करके पश्चात् उसमें कौड़ीको रखकर फिर एक दूसरे सिकोरेसे ढक देवे । फिर उसकी अच्छे प्रकारसे कपड़मट्टी करके सुखा लेवे । पश्चात् इसको दोपहरके बाद गजपुटमें रखकर फूंक देवे । शीतल होनेपर कौड़ीको पीसकर चूर्ण कर ले । यह लोकेश्वर- पोटली रस वीर्य और पुष्टीकी वृद्धि करनेवाला है, इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि लेकर शहद पीपलके चूर्णके साथ सेवन करे । शरी- रकी कृशता, मन्दाग्नि, खाँसी, पित्तरोग और क्षय रोगमें काली मिर- चोंके चूर्ण और घृतके साथ तीन दिन तक सेवन करे ॥ १८-२१ ॥ लवणं वर्जयेत्तत्र साज्यं दधि च भोजयेत् ॥२२॥ एकविंशदिनं यावत्सघृतं मरिचं पिबेत् ।

( २८६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पथ्यं मृगांकवद्देयं शयीतोत्तानपादतः ॥ २३ ॥ ये शुष्का विषमाशनैः क्षयरुजा व्याप्ताश्च येऽष्ठी- लया, पाण्डुत्वेन हताश्च वैद्यविधिना ये त्याजिता दुर्भागाः । ये तप्ता विविधैर्ज्वरैः श्रममदोन्मादैः प्रमादं गता,–स्ते सर्वे विगतामया हतरुजः स्युः पोट्टलीसेवनात् ॥ २४ ॥ इस औषधिके सेवन करनेपर लवणका भक्षण करना त्याग देवे । घृत और दधि अवश्य भक्षण करना चाहिये । इसको २१ दिन तक खाये और घी तथा मरिचोंके चूर्णका सेवन करे । मृगाङ्कके समान पथ्य देवे और ऊपरको पैर करके अर्थात् चित्त शयन करे । जो मनुष्य विषम भोजन करनेसे शुष्क हो गये हैं, जिनके क्षय रोग, अष्ठीला और पांडु रोग है, जिनको अत्यंत दारुण रोगोंसे पीड़ित होनेके कारण वैद्योंने त्याग दिया है, जो अनेक प्रकारके ज्वरोंसे संतप्त हैं, तथा जो श्रम और उन्मादरोगसे पीडित हैं उनको यह औषधि अवश्य सेवन करानी चाहिये । इससे शीघ्र ही उपरोक्त रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ २२–२४ ॥ कनकसुन्दर रस । रसस्य तुर्यभागेन हेमभस्म प्रयोजयेत् । मनःशिला गन्धकञ्च तुत्थं माक्षिकतालकम् ॥२५॥ विषं टङ्कणं सर्वं रसतुल्यं प्रदापयेत् । मर्दयेत्सर्वमेकत्र खल्लपात्रे च निर्मले ॥ २६ ॥ जयन्तीभृंगराजोत्थैः पाठाया वासकस्य च । अगस्तिलांगलाग्नीनां स्वरसैश्च पृथक् पृथक् ॥२७॥ भावयित्वा विशोष्याथ पुनश्चार्द्रकवारिणा । सप्तधा भावयित्वा च रसः कनकसुन्दरः ॥२८॥

भाषाटीकासहित । (२८७) गुञ्जाद्वयं त्रयं वास्य राजयक्ष्मप्रशान्तये । मधुना पिप्पलीभिर्वा मरिचैर्वा घृतान्वितम्॥२९ ॥ सन्निपाते प्रदातव्यमार्द्रकस्य रसेन वै । जयपालरजोभिर्वा गुल्मिने शूलरोगिणे ॥ ३० ॥ अम्लवर्जं चरेत्पथ्यं बल्यं हृद्यं रसायनम् । वर्ज्जयेल्लवणं हिंगु तक्रं दधि विदाहि यत् ॥ ३१ ॥ पारा ४ भाग, सोनाभस्म १ भाग और मैनशिल, गंधक, तूतिया, सोनामाखी भस्म, हरिताल भस्म, विष और सुहागा यह प्रत्येक औषधि चार चार भाग लेवे। इन सब औषधियोंको अच्छे प्रकारसे खरल करके जयंती, भांगरा, पाठ, अडूसा, अगस्तियाके पत्ते, कलि- हारी, चीतेकी जड़ और अदरख इन प्रत्येकके रसके द्वारा अलग अलग सात भावना देकर धूपमें सुखा लेवे, इसमेंसे दो रत्ती परिमाण अथवा तीन रत्ती परिमाण औषधि लेकर राजयक्ष्माको शांत करनेके लिये पीपलके चूर्ण और सहतके साथ अथवा कालीमिरचोंके चूर्ण और घृतके साथ; सन्निपात ज्वरमें अदरखके रसके साथ और गुल्म तथा शूल रोगमें जमालगोटेके चूर्णके साथ प्रयोग करे । इसके सेवन करनेपर अम्ल रसवाले पदार्थ, लवण, हींग, तक्र, दही और दाह- कारक पदार्थोंका त्याग कर देवे । तथा बलकारक, हृदयको हितकारी और शरीरमें रसको बढ़ानेवाले पदार्थोंका सेवन करे । इसको कनक- सुन्दर रस कहते हैं ॥ २५-३१ ॥ हेमगर्भपोट्टली रस । रसभस्म त्रयो भागा भागैकं हेमभस्मकम् । मृतताम्रस्य भागैकं भागैकं गन्धकस्य च ॥ ३२ ॥ मर्दयेच्चित्रकद्रावैर्द्वियामान्ते समुद्धरेत् ।

( २८८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पूर्या वराटिका तेन टंकणेन विलेपयेत् ॥ ३३ ॥ वराटीं पूरयेद्भाण्डे रुद्धां गजपुटे पचेत् । विचूर्णयेत्स्वांगशीते पोट्टलीं हेमगर्भिकाम् । मृगांकवच्चतुर्गुञ्जामक्षणाद्राजयक्ष्मनुत् ॥ ३४ ॥ पारेकी भस्म ३ भाग, सोनेकी भस्म १ भाग, तांबा भस्म १ भाग, गंधक १ भाग इन सब औषधियोंको एकत्रकर चित्रकके रसमें दो प्रहर तक खरल करके एक कौड़ीमें भर देवे और उस कौड़ीके मुखको सुहा- गेसे बंद कर देवे, फिर उस कौड़ीको मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे, शीतल होनेपर कौड़ीको पीसकर चूर्ण कर ले । फिर इसको चार रत्ती परिमाण मृगांकके समान सेवन करनेसे राजयक्ष्मा रोग नष्ट होता है । इसको हेमगर्भपोट्टली रस कहते हैं ॥ ३२-३४ ॥ सर्वांगसुन्दर रस । रसं गन्धञ्च तुल्यांशं द्वौ भागौ टंकणस्य च । मौक्तिकं विद्रुमं शंखभस्म देयं समांशकम् ॥ ३५॥ हेमभस्मार्धभागञ्च सर्वं खल्ले विमर्दयेत् । निम्बुद्रवेण संपिष्य पिडिकां कारयेत्ततः ॥ ३६ ॥ पश्चाद्गजपुटं दत्त्वा सुशीतञ्च समुद्धरेत् । हेमभस्मसमं तीक्ष्णं तीक्ष्णार्धं दरदं मतम् ॥ एकीकृत्य समस्तानि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् ॥३७॥ पारा १भाग, गन्धक १ भाग, सुहागा २ भाग तथा मोती, मूंगा और शंखकी भस्म यह सब एक २ भाग और स्वर्णभस्म आधा भाग लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर कागजी नींबूके रसमें खरल करके पिण्डा- कार बनाकर मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । शीतल होनेपर मूषा- मस औषधिको निकालकर पश्चात् उसमें आधा भाग तीक्ष्ण लोहभस्म और लोहेसे आधा भाग सिंग्रफ मिलाकर बारीक पीस लेवे ॥ ३५-३७॥

भाषाटीकासहित । ( ३८९ ) ततः पूजां प्रकुर्वीत रसस्य दिवसे शुभे । सर्वांगसुन्दरो ह्येष राजयक्ष्मनिकृन्तनः ॥ ३८ ॥ वातपित्तज्वरे घोरे सन्निपाते सुदारुणे । अर्शांसि ग्रहणीदोषे मेहे गुल्मे भगन्दरे ॥ ३९ ॥ निहन्तिवातजान्रोगाञ्छ्लैष्मिकांश्च विशेषतः । पिप्पलीमधुसंयुक्तं घृतयुक्तमथापि वा । भक्षयेत्पर्णखण्डेन सितया चार्द्रकेण वा ॥ ४० ॥ फिर किसी उत्तम दिनमें पारेकी पूजा करके इस औषधिका सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे राजयक्ष्मा, घोरतर वातपित्तज्वर, दारुण सन्निपातज्वर, बवासीर, संग्रहणी, प्रमेह, गुल्म,भगन्दर, समस्त वातज रोग और कफज रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिको पीपलके चूर्ण, सहत अथवा घृत किंवा पान या मिश्री या अदरखके रसके साथ सेवन करे । इसको सर्वांगसुन्दर रस कहते हैं ॥ ३८-४० ॥ लोकेश्वर रस । पलं कपर्दचूर्णस्य पलं पारदगन्धयोः । माषञ्च टंकणस्यैव जम्बीराद्भिर्विमर्दयेत् ॥ ४१ ॥ पुटेल्लोकेश्वरो नाम्ना लोकनाथरसोत्तमः । ऋते कुष्ठं रक्तपित्तमन्यान् रोगान्बलाज्जयेत् ॥ ४२ ॥ पुष्टिवीर्यप्रसादौजः कान्तिलावण्यदः परः । कोऽस्ति लोकेश्वरादन्यो नृणां शम्भुमुखोद्भूतः ॥४३॥ पथ्यं शाल्योदनं सर्पिर्दधि शाकं सहिंगुकम् । नित्यं यामद्वयादूर्ध्वं कार्यं वारत्रयं दिवा ॥४४॥

( ३९० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । त्र्यहाद्रुचौ वा वान्ते वा लग्नः सूतो न चेत्पुनः । अष्टमेऽह्नि प्रदातव्यः पूर्ववत्कार्यसिद्धये ॥ ४५ ॥ कौडीकी भस्म १ पल, पारा और गंधक प्रत्येक दो दो तोले और सुहागा १ मासा लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके मूशामें रखकर पुटपाककी विधिसे पकावे । इस औषधिके सेवन करनेसे कुष्ठके अतिरिक्त रक्तपित्तके अन्यान्य समस्त रोग नष्ट होकर शरीर पुष्ट, वीर्यकी वृद्धि, प्रसाद, ओज, कांति और लावण्यताकी वृद्धि होती है । इस औषधिको स्वयं महादेवजीने कहा है । संसारमें इसके समान अन्य कोई भी औषधि गुणकारक नहीं है । इस औषधिके सेवन करनेपर शालि चावलोंका भात, घी, दही, शाक और हींग भक्षण करे । इस औषधिका नित्य दो दो प्रहरमें तीन वार सेवन करे । इसके सेवन करनेसे अरुचि अथवा वमन हो जाये तो तीन दिन तक सेवन कराकर पश्चात् रोक देवे, फिर आठ दिनके पश्चात् औषधि सेवन करे ॥ ४१-४५ ॥ प्रथमे सप्तमे देया लावशूरणमुद्गकाः । द्वितीये माषगोधूमं भक्ष्यं पूर्वोदितञ्च यत् ॥ ४६ ॥ देयानि मत्स्यमांसानि तृतीये मर्दनादिकम् । तैलबिल्वारनालानि कोपस्त्रीस्वप्रजागरान् ॥ ४७ ॥ त्यजेत्कादीनि द्रव्याणि हृद्यं स्वादु च शीलयेत् । वायौ सेव्यं पयः कोष्णं पित्ते तु ससितं हितम्॥४८॥ अत्यग्नौ चोरबीजानि तिलेक्षुकदलीफलम् । खर्जूरं मांसमृद्वीका सितादि सकलं भजेत् ॥ वीर्यच्युतौ नारिकेलजलतालफलानि च ॥ ४९ ॥ इस औषधिके सेवन करते समय पहिले सप्ताहमें लवा पक्षीके मांसके साथ, जमीकंद और मूंगका यूष । दूसरे सप्ताहमें उडद, गेहूं,

भाषाटीकासहित । (२९१) लवाका मांस, जमीकंद और मूंगका यूष । तीसरे सप्ताहमें मछली और मांसको भक्षण करे तथा शरीरपर तेलका मर्दन करे । तेल, बेल, कांजी, क्रोध, स्त्रीसंग, दिनमें सोना, रात्रिमें जागना और ककारादि नामवाले पदार्थोंका त्याग कर देवे । इसपर हृदयको हितकारी और स्वादु पदार्थ सेवन करने चाहिये । वात रोगमें इस औषधिका सेवन कराकर ऊपरसे गरम दूध और पित्त रोगमें मिश्रीके साथ गरम दूध पान करना चाहिये । तीक्ष्णाग्नि रोगमें काला कचूर, तिल, ईख, केलेकी फली, खजूर, मांस, दाख और मिश्री आदि भक्षण करे। वीर्य- स्तम्भके लिये नारियलका जल और ताड़के फल सेवन करे ॥४६-४९॥ आनाहारुचिमूर्च्छार्तिधूमोद्गारविषूचिकाः । एतेषु लघुशाल्यन्नं केवलं सघृतं हितम् ॥ ५० ॥ अतिवान्तौ पिबेच्छिन्नारसं क्षौद्रेण संयुतम् । सक्षौद्रं वासकं रक्तपित्तेऽरुचिविपर्यये ॥ ५१ ॥ भृष्टधान्यं सितायुक्तमथवा क्षौद्रसंयुतम् । यवान्नं मधुसंयुक्तं पिबेद्वा माहिषं दधि ॥ ५२ ॥ घृतान्नं भक्षयेन्नित्यं सुखोष्णेन च वारिणा । च्छिन्नाम्बुसहितं देयं दाहेऽजीर्णे सुधाजलम् ॥५३॥ आर्द्रकं सर्षपं रम्भाफलं भृष्टं कफोल्बणे । अन्येऽप्युपद्रवा ये स्युस्तत्तच्छान्त्यै यथौषधम्॥५४॥ द्वात्रिंशदिवसे कार्यं स्नानमामलकैस्तिलैः । युक्तं सेव्यं बले जाते शनैरग्निबलादनु ॥ ५५ ॥ आनाह, अरुचि, मूर्च्छा, वेदना, धूमोद्गार और विषूचिका इन रोगोंमें घी मिलाकर शालि चावलोंका भात खाये । वमन रोगमें सहत मिलाकर गिलोय सेवन करे । रक्तपित्तमें सहतमें अडूसेका स्वरस मिला-