भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

( ३३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ दाहचिकित्सा । सूतात्पञ्चार्कतश्चैकं कृत्वा पिण्डं सुशोधनम् । जम्बीरस्वरसैर्मर्द्यं सूततुल्यञ्च गन्धकम् ॥ १ ॥ नागवल्लीदलैः पिष्ट्वा ताम्रपत्रीं प्रलेपयेत् । प्रपुटेद्भूधरे यन्त्रे यावद्भस्मत्वमाप्नुयात् ॥ २ ॥ द्विगुञ्जामाईकद्रावैरूषणेन च योजयेत् । निहन्ति दाहसन्तापं मूर्च्छा पित्तसमुद्भवाम् ॥ ३ ॥ इति दाहाधिकारः । पारा ५ भाग और तांबाभस्म १ भाग इन दोनों औषधियोंको जम्बीरी नींबूके रसमें खरल करे; फिर इसमें पांच भाग गन्धक मिला लेवे और इसको पानोंके रसमें भावना देकर कल्क बनाकर उस कल्कसे तांबेके पत्रमें लेप कर देवे; फिर इसको भूधर यंत्रमें भस्म कर लेवे । दो रत्ती परिमाण इस औषधिको अदरखके रस और त्रिकुटेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे दाहजनित सन्ताप और पित्तजनित मूर्च्छा दूर होती है ॥ १-३ ॥ इति दाहचिकित्सा । अथ उन्मादरोगचिकित्सा । उन्मादगजांकुश रस । त्रिदिनं कनकद्रावैर्महाराष्ट्रीद्रवैः पुनः । विषमुष्टिजलैः सूतं समुत्थाप्यार्कचक्रिकाम् ॥ १ ॥ कृत्वा तप्तां सगन्धां तां युक्त्या बन्धनमाचरेत् । तत्समं कानकं बीजमभ्रकं गन्धकं विषम् ॥ २ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३३५ ) मर्दयेत्रिदिनं सर्वं वल्लमात्रं प्रयोजयेत् । दोषोन्मादं द्रुतं हन्ति भूतोन्मादविशेषतः ॥ ३ ॥ शुद्ध पारा और शुद्ध ताम्रको समानभाग लेकर तीन दिन तक धतू- रेके पत्तोंके रसमें, तीन दिन तक ब्रह्मदण्डीके रसमें और तीन तक कुचिलेके रसमें भावना देकर चक्रिका बना लेवे । फिर पारेकी बरा- बर गन्धक लेकर चक्रिकाको गंधकके बीचमें रखकर लघुपुट दे जिससे गंधक जल जाय और पारा न उडे ऐसे ५-७ वार करनेसे ताम्र और पारेका बन्धन होजायगा । इसतरह बन्धन करनेके पश्चात् धतूरेके बीज, अभ्रक, गन्धक और विष यह प्रत्येक उसके समान भाग लेकर एकत्र तीन दिनतक खरल करे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधिसे दोषजनित और भूतजनित उन्माद रोग नष्ट होता है । इसको उन्मादगजां- कुश रस कहते हैं ॥ १-३ ॥ भूतांकुश रस । सूतायस्ताम्रमभ्रञ्च मुक्ता चापि समं समम् । सूतपादोत्तमं वज्रं शिलागन्धकतालकम् ॥ ४ ॥ तुत्थं रसाञ्जनं शुद्धमहिफेनं शिलाञ्जनम् । पञ्चानां लवणानाञ्च प्रतिभागं रसोन्मितम् ॥ ५ ॥ भृङ्गराजचित्रवज्रीदुग्धेनापि विमर्दयेत् । दिनान्ते पिण्डिकां कृत्वा रुद्धा गजपुटे पचेत् ॥६॥ भूतांकुशो रसो नाम नित्यं गुञ्जाद्वयं लिहेत् । आर्द्रकस्य रसेनापि भूतोन्मादनिवारणम् ॥ ७ ॥ पिप्पल्याक्तं पिबेच्चानु दशमूलकषायकम् । स्वेदयेत्कटुतुम्ब्या च तीक्ष्णं रूक्षञ्च वर्जयेत् ॥ ८ ॥ माहिषञ्च घृतं क्षीरं गुर्वन्नमपि भक्षयेत् । अभ्यङ्गः कटुतैलेन हितो भूतांकुशे रसे ॥ ९ ॥

( ३३६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा, लोहभस्म, तांबाभस्म, अभ्रकभस्म और मोतीभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, हीराभस्म पारेसे चौथाई भाग, मैन- शिल, गन्धक, हरितालभस्म, शुद्ध तूतिया, रसौत, समुद्रफेन, काला सुर्म्मा और पांचों लवण यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे । इन सब औषधियोंको भांगरेके रसमें, चित्रककी जड़के रसमें और थूह- रके दूधमें एक २ दिन तक खरल करके पिंडाकार बनाकर मूषामें रख- कर गजपुटमें पकावे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि अदरखके रसके साथ सेवन करके पश्चात् ऊपरसे पीपलका चूर्ण दशमूलके क्वाथमें डालकर पान करे । तथा इसके ऊपर रोगीको कड़वी तोम्बीसे स्वेद देवे । इसपर तीक्ष्ण और रूक्ष पदार्थोंको त्याग देवे । तथा भैंसका घी, दूध और भारी पदार्थ भक्षण करे। तथा कड़वे तेलका शरीरमें मर्दन करे। इससे भूतोन्माद दूर होता है। इसको भूतांकुश रस कहते हैं ४-

भाषाटीकासहित । ( ३३७ ) बराबर गोली बनाकर छायामें सुखा लेवे । इस औषधिको प्रातः- काल, संध्याके समय और रात्रिके समय नेत्रोंमें लगावे । दिनमें सह- तके साथ और रात्रिमें जलके द्वारा अंजन लगावे । इससे चातुर्थिक ज्वर, अपस्मार और उन्माद ज्वर नष्ट होते हैं । इसको उन्मादभञ्जिनी वटिका कहते हैं ॥ १०-१३ ॥ त्रिकत्रयाद्य लोह । त्रिकत्रयसमायुक्तं जीवनीययुतं त्वयः । हन्त्यपस्मारमुन्मादं वातव्याधिं सुदुस्तरम् ॥ १४ ॥ हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रककी जड़, नागरमोथा, वायविडंग, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुद्रपर्णी, माषपर्णी, जीवन्ती और मुलैठी यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और लोहा भस्म १८ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके सेवन करनेसे उन्माद रोग, अपस्मार और वातव्याधि रोग नष्ट होते हैं । इसको त्रिकत्रयाद्य लोह कहते हैं ॥ १४ ॥ उन्मादभञ्जन रस । त्रिकटु त्रिफला चैव गजपिप्पलिका तथा । देवदारु विडङ्गं च किरातं कटुकी तथा ॥ १५ ॥ कण्टकारी च यष्टीन्द्रयवं चित्रकमेव च । बला च पिप्पलीमूलं मूलं च वीरणस्य च ॥ १६ ॥ शोभाञ्जनस्य बीजानि त्रिवृता चेन्द्रवारुणी । वङ्गं रूप्यकमभ्रं च प्रवालं समभागिकम् ॥ १७ ॥ सर्वचूर्णसमं लौहं सलिलेन विमर्दयेत् । उन्मादमपि भूतोत्थमुन्मादं वातजं तथा ॥ १८ ॥

( ३३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अपस्मारं तथा कार्श्य रक्तपित्तं सुदारुणम् । नाशयेद्विकल्पेन रसश्चोन्मादभञ्जनः ॥ १९ ॥ त्रिकुटा, त्रिफला, गजपीपल, वायविडंग, देवदारु, चिरायता, कुटकी, कटेरी, मुलैठी, इन्द्रजौ, चित्रककी जड़, खिरैंटी, पीपलामूल, खस, सहिजनेके बीज, निसोध, इन्द्रायन, वंग भस्म, चांदी भस्म, अभ्रक भस्म और मूंगा भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और सबकी बराबर लोहा इन सबको एकत्र करके जलमें पीसकर सेवन करनेसे भूतोन्माद, वातोन्माद, अपस्मार, शरीरकी कृशता और रक्तपित्त रोग नष्ट होते हैं । इसको उन्मादभञ्जन रस कहते हैं ॥ १५-१९ ॥ चतुर्भुज रस । मृतसूतस्य भागौ द्वौ भागैकं हेमभस्मकम् । शिला कस्तूरिका तालं प्रत्येकं हेमतुल्यकम् ॥२०॥ — सर्वं खल्वतले क्षिप्त्वा कन्यया मर्दयेद्दिनम् । एरण्डपत्रैरावेष्ट्य धान्यगर्भे दिनत्रयम् ॥ २१ ॥ संस्थाप्य च तदुद्धृत्य सर्वरोगेषु योजयेत् । एतद्रसायनवरं त्रिफलामधुमर्दितम् ॥ २२ ॥ तद्यथाग्निबलं खादेद्वलीपलितनाशनम् । अपस्मारे ज्वरे कासे शोषे मन्दानले क्षये ॥ २३ ॥ हस्तकम्पे शिरःकम्पे गात्रकम्पे विशेषतः । वातपित्तसमुत्थांश्च कफजान्नाशयेद्ध्रुवम् ॥ २४ ॥ सर्वौषधिप्रयोगैर्ये व्याधयो न प्रसाधिताः । कर्मभिः पञ्चभिश्चैव मन्त्रौषधिप्रयोगतः ॥ २५ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३३९ ) सर्वांस्तान्नाशयत्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा । चतुर्भुजरसो नाम महेशेन प्रकाशितः ॥ २६ ॥ रससिन्दूर २ भाग, सोनेकी भस्म १ भाग, मैनशिल १ भाग, कस्तूरी १ भाग और हरिताल १ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके घीक्वारके रसमें एक दिनतक खरल करे, फिर इसका गोलासा बनाकर एरण्डके पत्तोंमें लपेटकर धानोंके ढेरमें रख देवे; पश्चात् तीन दिनके उपरान्त निकालकर सब रोगोंमें प्रयोग करे । यह उत्तम औषधि यथोचितमात्रानुसार त्रिफलेके काथ और सहतके साथ सेवन करनेसे वलीपलित, अपस्मार, ज्वर, खाँसी, शोष, मन्दाग्नि, क्षय, हस्तकम्प, शिरःकम्प और शरीरकम्पप्रभृति रोग नष्ट होते हैं । इसका वातज, पित्तज और सम्पूर्ण कफके रोगोंमें प्रयोग करे । सर्व प्रकारकी वमन विरेचन और मन्त्रौषधिके द्वारा जो रोग शमन नहीं होते वे रोग इस औषधिके भक्षण करनेसे वज्राहत वृक्षके समान अवश्य नष्ट हो जाते हैं । यह चतुर्भुजरस स्वयं महादेवने कहा है ॥ २०-२६ ॥ उन्मादपर्पटी रस । कृष्णधुस्तूरजैर्बीजैः पञ्चभिः पर्पटीरसः । सम्प्रयोज्यः प्रशान्त्यर्थमुन्मादं भूतसम्भवम् ॥२७॥ इत्युन्मादाधिकारः । काले धतूरेके पांच बीजोंको पित्तपापड़ेके रसमें पीसकर सेवन करनेसे भूतोन्माद रोग नष्ट होता है । इसको उन्मादपर्पटी रस कहते हैं ॥ २७ ॥ इत्युन्मादाधिकारः ।

( ३४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथापस्माररोगचिकित्सा । भूतभैरव रस । मृतसूतार्कलौहानां शिलागन्धकतालकम् । रसाञ्जनं च तुल्यांशं नरमूत्रेण मर्दयेत् ॥ १ ॥ तद्गोलं द्विगुणं गन्धं लौहपात्रे क्षणं पचेत् । पञ्चगुञ्जामितं खादेदपस्मारहरं परम् ॥ २ ॥ हिंगु सौवर्चलं व्योषं नरमूत्रेण सर्पिषा । कर्षमात्रं पिबेच्चानु रसोऽयं भूतभैरवः ॥ ३ ॥ रससिन्दूर, तांबा, लोहा, मैनशिल, गंधक, हरिताल और रसोत इन सब औषधियोंको एकत्र मनुष्यके मूत्रमें पीसकर गोलासा बना लेवे । फिर सब औषधिसे दुगुना गंधक मिलाकर लोहेके पात्रमें क्षणभर पकावे । इस औषधिमेंसे पांच रत्ती परिमाण सेवन करनेसे अपस्मार रोग दूर होता है । और ऊपरसे हींग, काला नमक, त्रिकुटा, इनको नरमूत्र और घृत इनमें पीसकर भक्षण करे । इसको भूतभैरव रस कहते हैं ॥ १-३ ॥ सूतभस्म प्रयोग । शङ्खपुष्पी वचा ब्राह्मी कुष्ठमेलारसैः सह । सूतभस्मप्रयोगोऽयं रक्तिकाद्वयमानतः ॥ सर्वापस्मारनाशाय महादेवेन भाषितः ॥ ४ ॥ शंखाहुली, वच, ब्राह्मी, कूठ और इलायचीके रसके साथ दो रत्ती परिमाण रससिन्दूरके सेवन करनेसे सर्व प्रकारका अपस्मार नष्ट होता है ॥ ४ ॥ इन्द्रब्रह्मवटी । मृतसूताभ्रकं तीक्ष्णं तारं ताप्यं विषं समम् । पद्मकेशरसंयुक्तं दिनैकं मर्दयेद्द्रवैः ॥ ५ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३४१ ) स्नुह्यग्निविजयेरण्डवचानिष्पावशूरणैः । निर्गुण्ड्याश्च द्रवैर्मर्द्यं तद्गोलं पाचयेत्पुनः ॥ ६ ॥ कङ्गनीसर्षपोत्थेन तैलेन गन्धसंयुक्तम् । ततः पक्त्वा समुद्धृत्य चणमात्रा वटी कृता ॥ ७ ॥ इन्द्रब्रह्मवटी नाम भक्षयेदार्द्रकद्रवैः । दशमूलकषायञ्च कणायुक्तं पिबेदनु ॥ अपस्मारं जयत्याशु यथा सूर्योदये तमः ॥ ८ ॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, तीक्ष्ण लोहभस्म, रूपाभस्म, सोनामाखी भस्म, विष और कमलकेशर यह सब औषधि समान भाग लेकर थूहरके दूध, चीतेकी जड़के रस, भांगके पत्तोंके रस, एरण्डीकी जड़का रस, वचका रस, सेमका रस, जमीकंदका रस और सम्हालूके पत्तोंका रस इन सबमें एक एक दिन तक खरल करके पिंडाकार बनाकर पुटपाक करे । फिर उसमें १भाग गंधक मिलाकर कंगुनीके तेल और सरसोंके तेलमें पीसकर दुबारा पुटपाक करे । पश्चात् चनेकी बराबर गोली बनाकर अदरखके रसके साथ सेवन करे । इस औषधिके सेवनके अन्तमें पीपलका चूर्ण दशमूलके क्वाथमें डालकर पान करे । जिसप्रकार सूर्यके उदय होनेसे अंधकारका समूह नष्ट होता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे अपस्माररोग नष्ट होता है ॥ ६-८ ॥ वातकुलान्तक रस । मृगनाभिशिवा नागकेशरं कलिवृक्षजम् । पारदं गन्धकं जातीफलमेलालवङ्गकम् ॥ ९ ॥ प्रत्येकं कार्षिकञ्चैव श्लक्ष्णचूर्णञ्च कारयेत् । जलेन मर्दयित्वा तु वटीं कुर्याद्विरक्तिकाम् ॥ १०॥ यथाव्याध्यनुपानेन योजयेच्च चिकित्सकः । अपस्मारे महाघोरे मूर्च्छारोगे च शस्यते ॥ ११ ॥

( ३४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वातजान् सर्वरोगांश्च हन्यादचिरसेवनात् । नातः परतरं श्रेष्ठमपस्मारेषु वर्त्तते ॥ ब्रह्मणा निर्मितः पूर्व्वं नाम्ना वातकुलान्तकः ॥ १२॥ कस्तूरी, हरड़, नागकेशर, बहेड़ा, पारा,गंधक, जायफल, इलायची और लौंग यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेकर जलमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। इन गोलियोंको यथोचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे अपस्मार और मूर्च्छारोग नष्ट होते हैं। इस औषधिको थोड़ेही दिन सेवन करनेसे सर्व प्रकारका वातरोग नष्ट होता है। अपस्मारको दूर करनेवाली इसकी समान अन्य औषधि नही है। इस वातकुलान्तक रसको स्वयं ब्रह्मदेवने कहा है ॥ ९-१२ ॥ पाषाणवज्र रस । रसं वज्रं हेम तारं मौक्तिकं तालमेव च । गन्धकं रसभस्मैव खर्परं च मनःशिला ॥ १३ ॥ मृताभ्रकं कान्तभस्म रुधिरं नागभस्मकम् । एतेषां तोलकैर्भागैः पुटं दद्याद्गजाव्हके ॥ १४ ॥ पाषाणे विमले पात्रे घर्षयेच्च प्रयत्नतः । ब्राह्मी जयन्ती निर्गुण्डी नागवल्ल्या रसैस्तथा॥१५॥ दिनमणिकरजालैः शोषयेच्च पुनः पुनः । ततश्च गोलकं कृत्वा स्थापयेत्कदलीदले ॥ १६ ॥ समुद्धृत्यापि गुटिकां नीहारे सूर्य्यसंकुले । एकद्वित्रिचतुर्थं वा स्थापनीयं यथाविधि ॥ १७ ॥ मर्दयित्वा वटी कार्या द्विगुञ्जाफलसंमिता । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय सर्वरोगकुलान्तकृत् ॥ १८ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३४३ ) बहुदोषान्वितं वातं कामजं चित्तविभ्रमम् । पित्तकृतञ्च यद्दोषं दग्धञ्च दृष्टिमागतम् ॥ शस्यते सर्वरोगेषु सर्वापस्मारेकेषु च ॥ १९ ॥ इति अपस्माररोगचिकित्सा । पारा, हीरा, सोना, चांदी, मोती, हरिताल, गंधक, रससिन्दूर, खपरिया, मैनशिल, अभ्रक, कान्तलोह, सिंग्रफ और सीसेकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेकर सबको एकत्र पीसकर मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । फिर पत्थरके पात्रमें डालकर ब्राह्मीके रसमें, जयंतीके रसमें, सम्हालूके रसमें और पानोंके रसमें अलग २ सात सात भावना देकर सुखा लेवे । फिर इसको घोटकर गोलासा बनाकर केलेकी जड़में रखकर एक दिन, दो दिन, तीन दिन अथवा चार दिन पीछे निकालकर उसे रातमें ओस और दिनमें सूर्यकी धूपमें रखे । पश्चात् इसको पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको प्रातःकाल सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । इससे अनेक दोषयुक्त वातरोग, कामजव्याधि, चित्तभ्रम, पित्तजव्याधि, दग्धदृष्टि और सर्व प्रकारके अपस्मार रोग नष्ट होते हैं । इसको पाषाणवज्र रस कहते हैं ॥ १३–१९ ॥ इति अपस्माररोगचिकित्सा । अथ वातव्याधिचिकित्सा । द्विगुणाख्य रस । गन्धकाद्विगुणं सूतं शुद्धं मृद्वग्निना क्षणम् । पक्त्वाऽवतार्य संचूर्ण्य तुल्याभयसमन्वितम् ॥ १ ॥ सप्तगुंजामितं खादेद्वर्द्धयेच्च दिने दिने । गुञ्जैकैकक्रमेणैव यावत्स्यादेकविंशतिः ॥ २ ॥

( ३४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । क्षीराज्यशर्कराभिश्च शाल्यन्नं पथ्यमाचरेत् । कम्पवातप्रशान्त्यर्थं निर्वीते निवसेत्सदा ॥ द्विगुणाख्यरसो नाम त्रिपक्षात्कम्पवातजित् ॥ ३ ॥ गंधक १ भाग और पारा २ भाग इन दोनोंको एकत्र खरल करके कज्जली बना लेवे, फिर थोड़ी देरतक मंद मंद अग्निसे पकाकर चूर्ण कर लेवे, पश्चात् पारे और गंधक दोनोंके बराबर हरड़का चूर्ण मिला- कर सात रत्ती परिमाण भक्षण करे । यह सात रत्तीकी पहिले दिनकी मात्रा है । दूसरे दिन आठ रत्ती, तीसरे दिन नौ रत्ती इसी क्रमसे प्रति- दिन एक एक रत्ती बढ़ाकर इसका सेवन करे । जब बढ़कर २१ रत्ती परिमाण हो जाय तब फिर आगेको नहीं बढ़ावे । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें दूध, घी और मिश्री मिलाकर शालि चावलोंका भात खाय । कम्पवातको दूर करनेके लिये रोगीको सदैव वायुरहित स्थानमें निवास करावे । इसके सेवन करनेसे तीन पक्षमें कम्पवात रोग नष्ट होता है । इसको द्विगुणाख्यरस कहते हैं ॥ १-३ ॥ वातगजाङ्कुश । मृतं सूतं मृतं लौहं ताप्यं गन्धकतालकम् । पथ्या भृङ्गी विषं व्योषमग्निमन्थञ्च टङ्कणम् ॥ ४ ॥ तुल्यं खल्ले दिनं मर्द्यं मुण्डीनिर्गुण्डिकाद्रवैः । द्विगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्ववातप्रशान्तये ॥ ५ ॥ कणाचूर्णयुतञ्चैव जिंगीक्वाथं पिबेदनु । साध्यासाध्यं निहन्त्याशु रसो वातगजांकुशः ॥ ६॥ सप्ताहाद्गृध्रसीं हन्ति दारुणं सन्निपातिकम् । क्रोष्टुशीर्षकवातञ्चाप्यपबाहुकसंज्ञकम् ॥ ७ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३४५ ) मन्यास्तम्भमुरुस्तम्भं हनुस्तम्भं विनाशयेत् । पक्षाघातादिरोगेषु कथितः परमोत्तमः ॥ ८ ॥ रससिन्दूर, लोहा, सोनामाखी, गंधक, हरिताल, हरड़, काकड़ा- शिंगी, विष, त्रिकुटा, अरणी और सुहागा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर गोरखमुंडी और सम्हालूके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । सब प्रकारके वातरोगोंको शमन करनेके लिये जो इस औषधिका भक्षण करे तो इसके ऊपर पीपलका चूर्ण डाल- कर जिंगीके क्वाथका पान करे । इससे साध्यासाध्य वातरोग दूर होते हैं, एक सप्ताहमें गृध्रसी रोग दूर होता है । सन्निपात, क्रोष्टुशीर्ष, वात- रोग, अपबाहुक वातरोग, मन्यास्तम्भ, ऊरुस्तम्भ और हनुस्तम्भ रोग नष्ट होते हैं । पक्षाघातादि रोगोंमें यह औषधि अतीव हितकारी है । इसको वातगजांकुश रस कहते हैं ॥ ४-८ ॥ रसो वारिशोषणोऽत्र युक्तोऽन्यो योगवाहिकः ॥ ९ ॥ वातव्याधि रोगमें वारिशोषण रस और अन्यान्य योगवाही रसोंका भी प्रयोग करना चाहिये ॥ ९ ॥ बृहद्वातगजांकुश रस । सूताभ्रतीक्ष्णकान्तानि ताम्रतालकगन्धकम् । स्वर्णं शुण्ठी बला धान्यं कट्फलञ्चाभया विषम् ॥ पथ्या शृङ्गी पिप्पली च मरिचं टङ्कणं तथा ॥१०॥ तुल्यं खल्ले दिनं मर्द्यं मुण्डीनिर्गुण्डिजैर्द्रवैः । द्विगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्ववातप्रशान्तये ॥ साध्यासाध्यं निहन्त्याशु बृहद्वातगजांकुशः ॥११॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, तीक्ष्ण लोहभस्म, कान्तलोहभस्म, तांबा- भस्म, हरितालभस्म, गन्धक, सोनाभस्म, सोंठ, खिरैंटी, धनिया,

( ३४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कायफल, हरड़, विष, छोटी हरड़, काकड़ासिंगी, पीपल, काली मिरच और सुहागा यह सब औषधि समान भाग लेकर गोरखमुंडी और सम्हालूके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इससे साध्यासाध्य सब प्रकारका वात रोग नष्ट होता है । इसको वृहद्वात- गजांकुश रस कहते हैं ॥ १०-११ ॥ महावातगजांकुश रस । मृताभ्रतीक्ष्णताम्रञ्च सूततालकगन्धकम् । भार्गी शुण्ठी बला धान्यं कट्फलञ्चाभया विषम् १२ संपिष्य चपलाद्रावैर्निष्केकां भक्षयेद्वटीम् । वातश्लेष्महरो ह्येष महावातगजांकुशः ॥ १३ ॥ अभ्रकभस्म, तीक्ष्ण लोहभस्म, तांबाभस्म, पारा, हरिताल, गंधक, भारंगी, सोंठ, खिरैंटी, धनिया, कायफल, हरड और विष इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र पीपलके क्वाथमें खरल करके एक एक निष्क परिमाणकी गोली बना लेवे । प्रतिदिन एक गोली भक्षण करनेसे वातकफजनित रोग नष्ट होते हैं । इसको महावात- गजांकुश रस कहते हैं ॥ १२ ॥ १३ ॥ वातनाशन रस । सूतहाटकवज्राणि ताम्रं लोहञ्च माक्षिकम् । तालं नीलाञ्जनं तुत्थं सिन्धुफेनं समांशिकम्॥१४॥ पञ्चानां लवणानाञ्च भागैकं सुविमर्दयेत् । वज्रीक्षीरैर्दिनैकन्तु रुध्वा तं भूधरे पचेत् ॥ १५ ॥ माषैकमार्द्रकद्रावैर्लिह्याद्वातविनाशनम् । पिप्पलीमूलकक्वाथं सकृष्णमनुपाययेत् ॥ सर्वान्वातविकारांश्च निहन्त्याक्षेपकादिकान् ॥ १६॥

भाषाटीकासहित । ( ३४७ ) रससिन्दूर, सोनाभस्म, हीराभस्म, तांबाभस्म, लोहाभस्म, सोना- माखीभस्म, हरितालभस्म, रसौत, तूतिया, समुद्रफेन और पांचोंलवण यह सब औषधि समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके मूषामें रखकर भूधरयन्त्रमें पकावे । इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे वातरोग नष्ट होता है । इसके सेवन करनेके अन्तमें पीपलके क्वाथमें पीपलका चूर्ण डालकर पान करे । इससे आक्षेपकादि समस्त वातरोग नष्ट होते हैं ॥ १४-१६ ॥ वातारि रस । रसभागो भवेदेको द्विगुणो गन्धको मतः । त्रिगुणा त्रिफला ग्राह्या चतुर्भागं तु चित्रकम्॥१७॥ गुग्गुलोः पञ्चभागं चैरण्डतैलेन मर्दयेत् । क्षिप्त्वात्र पूर्वकं चूर्णं पुनस्तेनैव मर्दयेत् ॥ १८ ॥ गुटिकां कर्षमात्रान्तु भक्षयेत्प्रातरुत्थितः । नागरैरण्डमूलानां क्वाथं तदनुपाययेत् ॥ १९ ॥ अङ्ग-मेरण्डतैलेन स्वेदयेत्पृष्ठदेशतः । विरेके तेन सञ्जाते स्निग्धमुष्णञ्च भोजयेत् ॥ वातारिसंज्ञको ह्येष रसो निर्वातसेवितः ॥ २० ॥ पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, त्रिफला ३ भाग, चित्रककी जड़ ४ भाग, गूगल ५ भाग लेवे । प्रथम गूगलको एरण्डीके तेलमें खरल करके पूर्वोक्त पारा आदि औषधियोंको मिलाकर फिर एरण्डीके तेलमें सबको एकत्र घोटे । इसमेंसे प्रतिदिन एक कर्ष परिमाण गोली बना- कर भक्षण करे । ऊपरसे सोंठ और एरण्डीकी जड़का क्वाथ पीवे । पृष्ठसे लेकर सम्पूर्ण शरीरमें एरण्डीके तेलका मर्दन करे । जो एरण्डीतेलके मर्दन करनेसे दस्त होने लगे तो स्निग्ध और उष्ण पदार्थ भक्षण करे । वातरहित स्थानमें रहकर इस औषधिका सेवन करे । इसको वातारि रस कहते हैं ॥ १७-२० ॥

( ३४८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अनिलारि रस । रसेन गन्धं द्विगुणं विमर्द्य वातारिनिर्गुण्डिरसै- र्दिनैकम् । निवेशयेत्ताम्रमये पुटे तत्सर्वं मृदावेष्ट्य च. वालुकाख्ये ॥ २१ ॥ यन्त्रे पुटेद्रोमयचूर्णवह्नौ स्वभावशीते तु समुद्धरेत्तत् । निर्गुण्डिकावात- हराग्नितोयैः संचूर्ण्य यत्नेन विभावयेत्तत् ॥२२॥ रसोऽनिलारिः कथितोऽस्य वल्लमेरण्डतैलेन ससै- न्धवेन । मरीचचूर्णेन ससर्पिषा वा निर्गुण्डि- चित्रैश्च कटुत्रिकैर्वा ॥ २३ ॥ पारा १ भाग और गंधक २ भाग लेवे, दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर एरण्डकी जड़ और सम्हालूके पत्तोंके रसमें एक दिन तक खरल करके तांबेके सम्पुटमें रखकर ऊपरसे कपरोटी करके वालुकायंत्रमें अरने उपलोंकी अग्निसे पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब औषधिको निकालकर चूर्ण कर ले । फिर इस चूर्णको सम्हालूके पत्तेकी जड़ और चित्रककी जड़के रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर एरण्डीके तेल और सेंधा- नमक अथवा काली मिरचोंके चूर्ण और घृत अथवा सम्हालूके पत्तोंके रस और त्रिकुटेके चूर्णके साथ इसका सेवन करे ॥ २१–२३ ॥ वातकंटक रस । वज्रं मृताभ्रहेमार्कतीक्ष्णमुण्डं क्रमोत्तरम् । मरिचे मर्दयेदम्लवर्गेण दिवसत्रयम् ॥ २४ ॥ द्विक्षारं पञ्चलवणं मर्दितं स्यात्समं समम् । ततो निर्गुण्डिकाद्रावैर्मर्दयेद्दिवसत्रयम् ॥ २५ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३४९ ) शुष्कमेतद्विचूर्ण्याथ विषञ्चास्याष्टमांशतः । टङ्कणं विषतुल्यांशं दत्त्वा जम्बीरजैर्द्रवैः ॥ २६ ॥ भावयेद्दिनमेकन्तु रसोऽयं वातकण्टकः । दातव्यो वातरोगेषु सन्निपाते विशेषतः ॥ २७ ॥ द्विगुञ्जामाईकद्रावैर्घृतैर्वा वातरोगिणे । निर्गुण्डीमूलचूर्णन्तु महिषाक्षञ्च गुग्गुलुम् ॥ २८ ॥ समांशं मर्दयेदाज्ये तद्वटी कर्षसंमिता । अनुयोज्य घृतैर्नित्यं स्निग्धमुष्णञ्च भोजयेत्॥२९॥ मण्डलं नाशयेत्सर्वं वातरोगे विशेषतः । सन्निपाते पिबेच्चानु तालमूलीकषायकम् ॥ ३० ॥ हीराभस्म १ भाग, अभ्रकभस्म २ भाग, सोनाभस्म ३ भाग, तांबाभस्म ४ भाग, तीक्ष्णलोहभस्म ५ भाग, मुण्डलोह ६ भाग और काली मिरच ७ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके अम्ल वर्गकी औषधियोंमें तीन दिन तक खरल करके फिर इसके बराबर बराबर सज्जीखार, जवाखार, पांचों लवण मिलाकर सम्हालूके रसमें तीन दिन तक भावना देवे । जब शुष्क हो जाये तब चूर्णका आठवां भाग विष और विषकी बराबर सुहागा मिलाकर जम्भीरी नींबूके रसमें एक दिन तक भावना देवे । इस औषधिका वातरोग और सन्निपात रोगमें प्रयोग करे । इसको दो रत्ती परिमाण अदरखके रसके साथ अथवा घृतके साथ वातरोगीको देवे । इसके सेवन करनेके अन्तमें सम्हालूकी जड़का चूर्ण और गूगल समान भाग लेकर घृतमें मर्दन करके घृतके साथ एक कर्ष परिमाण भक्षण करावे । इसपर स्निग्ध और उष्ण पदार्थ पथ्य देवे । इसके सेवन करनेसे मण्डल- रोग और सर्व प्रकारके वातरोग नष्ट होते हैं । सन्निपातरोगमें इस औषधिका सेवन कराकर ऊपरसे मुसलीका क्वाथ पान करावे ! इसको वातकण्टक रस कहते हैं ॥ २४-३० ॥

( ३५० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लघ्वानन्द रस । पारदं गन्धकं लौहमभ्रकं विषमेव च । समांशं मरिचस्याष्टौ टङ्गणन्तु चतुर्गुणम् ॥ ३१ ॥ भृङ्गराजरसेनेव दातव्या पञ्च भावना । तथा दाडिमतोयेन वटीं कुर्यात्समाहितः ॥ निहन्ति वातजान्रोगान्भ्रमदाहपुरःसरान् ॥ ३२ ॥ पारा, गंधक, लोहाभस्म, अभ्रकभस्म और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, काली मिरच ८ भाग और सुहागा ४ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र भांगरेके रसकी पांच और अनारके रसकी पांच भावना देकर गोली बना लेवे। इस औषधिके सेवन कर- नेसे भ्रम और दाहसंयुक्त वातरोग नष्ट होते हैं। इसको लघ्वानन्द रस कहते हैं ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ चिन्तामणि रस । कर्षैकं रससिन्दूरं तत्समं मृतमभ्रकम् । तदर्थं मृतलौहञ्च स्वर्णशाणं क्षिपेद्बुधः ॥ ३३ ॥ कन्यारसेन संमर्द्य गुञ्जामात्रां वटीञ्चरेत् । अनुपानादिकं दद्याद्बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ॥ ३४ ॥ हन्ति श्लेष्मान्वितं वातं केवलं पित्तसंयुतम् । हृल्लासमरुचिं दाहं वान्ति भ्रान्ति शिरोग्रहम् ॥३५॥ प्रमेहं कर्णनादञ्च जडगद्गदमूकताम् । बाधिर्यं गर्भिणीरोगमश्मरीसूतिकामयम् ॥ ३६ ॥ प्रदरं सोमरोगञ्च यक्ष्माणं ज्वरमेव च । बलवर्णाग्निदः सम्यक् कान्तिपुष्टिप्रसाधकः ॥ चिन्तामणिरसश्चायं चिन्तामणिरिवापरः ॥३७॥

भाषाटीकासहित । ( ३५१ ) रससिन्दूर २ कर्ष, अभ्रकभस्म १ कर्ष, लोहेकी भस्म आधा कर्ष, सोनेकी भस्म चौथाई कर्ष इन सब औषधियोंको एकत्र घींक्वारके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । दोषोंका बला- बल विचार कर इसके अनुपानोंकी कल्पना कर ले । इस औषधिके सेवन करनेसे कफयुक्त वायु, पित्तयुक्त वायु, हल्लास, अरुचि, दाह, वमन, भ्रम, मस्तककी पीड़ा, प्रमेह, कर्णनाद, जडता, गद्गदपन, मूकता, बधिरता, गर्भिणीरोग, अश्मरीरोग, सूतिका, प्रदर, सोमरोग, राजयक्ष्मा और ज्वर नष्ट होते हैं । यह बल, वर्ण, अग्नि, कांति और पुष्टिको बढ़ाता है । यह चिन्तामणिरस चिन्तामणिके समानहै॥३३-३७॥ चतुर्मुख रस । रसगन्धकलौहाभ्रं समं सूतांह्रि हेम च । सर्वं खल्वतले क्षिप्त्वा कन्यास्वरसमर्दितम् ॥ ३८ ॥ एरण्डपत्रैरावेष्ट्य धान्यराशौ दिनत्रयम् । संस्थाप्य च तदुद्धृत्य त्रिफलारससंयुक्तम् ॥ ३९ ॥ एतद्रसायनवरं सर्वरोगेषु योजयेत् । तद्यथाग्निबलं खादेद्वलीपलितनाशनम् ॥ ४० ॥ पौष्टिकं बल्यमायुष्यं पुत्रप्रसवकारकम् । क्षयमेकादशविधं कासं पञ्चविधं तथा ॥ ४१ ॥ कुष्ठमष्टादशविधं पाण्डुरोगान्प्रमेहकान् । शूलं श्वासञ्च हिक्काञ्च मन्दाग्निश्चाम्लपित्तकम् ॥४२॥ अपस्मारं महोन्मादं सर्वार्शांसि त्वगामयान् । क्रमेण शीलितं हन्ति वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ४३ ॥ जगतां च हितार्थाय चतुर्मुखमुखोदितः । रसश्चतुर्मुखो नाम चतुर्मुख इवापरः ॥ ४४ ॥

( ३५२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा, गंधक, लोहाभस्म, अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और पारेसे चौथाई भाग सोनेकी भस्म लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर घींकारके रसमें खरल करके एरण्डके पत्तोंमें लपेटकर तीन दिनतक धानोंके ढेरमें रख देवे । पश्चात् उसको निकालकर त्रिफ- लेके रसके साथ सर्व रोगोंमें प्रयोग करे । अग्निका बलाबल देखकर इसकी मात्राका निरूपण करे । इसके सेवन करनेसे वली और पलित रोग नष्ट होकर पुष्टि, बल और आयुकी वृद्धि होती है । इसके सेवन करनेसे पुत्ररहित स्त्री पुत्र प्रसव करनेको समर्थ होती है । इससे एका- दश प्रकारके क्षय रोग, पांच प्रकारकी खाँसी, अठारह प्रकारके कुष्ठ, पांडु, प्रमेह, शूल, कास, हिचकी, मंदाग्नि, अम्लपित्त, अपस्मार, उन्माद, अर्श और सब प्रकारके चर्मरोग नष्ट होते हैं । जिस प्रकार वज्रसे वृक्षोंका समूह नष्ट होता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे समस्त रोग नष्ट होते हैं । पृथिवीकी रक्षाके लिये यह औषधि स्वयं ब्रह्मदेवने कही है । यह औषधि ब्रह्माके समान है इस कारण इसका नाम चतुर्मुख रस है ॥ ३८-४४ ॥ लक्ष्मीविलास रस । पलं कृष्णाभ्रचूर्णस्य तदर्द्धौ रसगन्धकौ । बला नागबला भीरु विदारीकन्दमेव च ॥ ४५ ॥ कृष्णधूस्तूरनिचुलं गोक्षुरवृद्धदारयोः । बीजं शक्राशनस्यापि जातीकोषफले तथा ॥ ४६ ॥ कर्पूरञ्चैव कर्षांशं श्लक्ष्णचूर्णं पृथक्पृथक् । गृहीत्वा चाष्टमांशेन स्वर्णं पर्णरसेन च ॥ ४७ ॥ वटिकां स्विन्नचणकप्रमाणां कारयेद्भिषक् । रसो लक्ष्मीविलासोऽयं पूर्ववद्गुणकारकः ॥४८॥ कृष्णाभ्रकका चूर्ण १ पल, पारा २ तोले, गंधक २ तोले, खिरैंटी १ तोला, गंगेरन १ तोला, सतावर १ तोला, विदारीकंद १ तोला, काले

भाषाटीकासहित । ( ३६३ ) धतूरेके बीज १ तोला, जलवेंत ( समुद्र फल ) के बीज १ तोला, गोखुरू १ तोला, विधारेके बीज १ तोला, भांगके बीज १ तोला, जावित्री १ तोला, जायफल १ तोला, कपूर १ तोला और सोनाभस्म आधा तोला लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके पानोंके रसमें खरल करके सीजे हुए चनेकी बराबर गोली बना लेवे । यह औषधि चतुर्मुख रसके समान गुणकारक है । इसको महालक्ष्मी- विलास रस कहते हैं ॥ ४५–४८ ॥ रोगैभसिंह । सूताह्वयो घनवरानलवेल्लभाङ्गी तिक्ताकटुत्रयविषैः सवचैः समांशैः । रोगैभसिंह इति वातकफामयघ्नः सान्द्रोऽयमल्पपटुतो विहितो द्विगुञ्जः ॥ ४९ ॥ रससिन्दूर २ भाग, पारा, नागरमोथा, हरड़, बहेड़ा, आमला, चित्रककी जड़, वायविडंग, भारंगी, कुटकी, सोंठ, पीपल, मरिच, विष और वच यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इसके सेवन करनेसे कफवातज रोग नष्ट होते हैं, इस- लिये इसको रोगैभसिंह कहते हैं ॥ ४९ ॥ श्रीखण्डवटी । एतैर्गुडप्रमृदितै रसवर्जितैः स्यात्, श्रीखण्डनामगुटिका विहिता द्विगुञ्जा । शैत्याद्यजीर्णकफवातभवान् विकारान्, हन्त्यार्द्रकेण नियुताप्यथ केवला वा ॥ ५० ॥ पूर्वोक्त रोगैभसिंह रसमें जो औषधि कही हैं उनमेंसे रससिन्दूरको निकालकर उसके स्थानमें गुड़ डालकर दो २ रत्ती परिमाणकी गोली बना लेवे । अदरखके रसके साथ अथवा अनुपानके विना इस औषधिके सेवन करनेसे शीतता, अजीर्ण और कफवातज रोग नष्ट होते हैं । इसको श्रीखण्डवटी कहते हैं ॥ ५० ॥