भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

अम्लपित्तविनाशिनी ।" "वह्निसन्दीपनो श्रेष्ठा त्वरोचकविनाशिनी ॥ ६९ ॥" or "वह्निसन्दीपनौ"? Look at the image of that exact word: ह्नि न्दी नी Wait, look at the glyph for 'नी' in 'विनाशिनी': The right bar of 'नी' has an arch that goes over to the left bar of 'न'. Now look at वह्निसन्दीपनो: Wait, does it have 'ी'? Let's look at the top of the right bar: It has a slant going up and left. Wait, does it have a loop? Wait, could it be वह्निसन्दीपनो? Wait, look at त्वरोचकविनाशिनी: त्व - रो - च - क - वि - ना - शि - नी 1 2 3 4 5 6 7 8 = 8 syllables! Look at रो in त्वरोचक: The letter has a vertical bar to its right? No, with is just with an on top and an bar? In Devanagari, रो is + , where the vertical

भाषाटीकासहित । (३१५) इयं यदि सदा सेव्या तदा स्याद्योगवाहिका ॥ वृद्धोऽपि तरुणः शक्तः स्त्रीशतेषु वृषायते ॥७२॥ पारा १ भाग और गंधक २ भाग लेवे, दोनोंकी एकत्र कजली बनाकर उसमें त्रिकुटा ३ भाग और त्रिफला ३ भाग मिलावे । फिर बकरीके दूधकी भावना देकर गोली बनाकर अदरखके साथ सेवन करे और ऊपरसे थोड़ा शीतल जल पीवे । यह औषधि खाँसी और श्वासको हरनेवाली और अग्निको दीपन करनेवाली है । इस योगवाही औषधिको नित्य प्रातःकाल सेवन करनेसे वृद्ध मनुष्य भी तरुणके समान होजाता है तथा सौ स्त्रियोंसे रमण करनेको समर्थ होता है । इसको पुरन्दरवटी कहते हैं ॥ ७०-७२ ॥ कासांतक रस । सूतं गन्धं विषञ्चैव शालपर्णी च धान्यकम् । यावन्त्येतानि चूर्णानि तावन्मात्रं मरीचकम् ॥ गुञ्जाचतुष्टयं खादेन्मधुना कासशान्तये ॥ ७३ ॥ पारा, गंधक, विष, शालिपर्णी और धनिया यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और कालीमिरचोंका चूर्ण पांच भाग लेवे, सबको एकत्र पीसकर चार २ रत्ती परिमाण सहतके साथ सेवन करनेसे कासरोग नष्ट होता है । इसको कासान्तक रस कहते हैं ॥ ७३ ॥ कासकुठार रस । हिंगुलं मरिचं गन्धं सव्योषं टंकणन्तथा । द्विगुञ्जमार्द्रकद्रावैः सन्निपातं सुदारुणम् ॥ कासं नानाविधं हन्ति शिरोरोगं विनाशयेत् ॥७४॥ हिंगुल, काली मिरच, गंधक, सोंठ, मिरच, पीपल और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, सबको एकत्र बारीक खरल करके दो रत्ती परिमाण औषधि अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे

( ३१६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दारुण सन्निपातरोग नष्ट होता है । इससे अनेक प्रकारकी खांसी और शिरोरोग नष्ट होते हैं । इसको कासकुठार रस कहते हैं ॥ ७४ ॥ चन्द्रामृत लोह । त्रिकटु त्रिफला धान्यं चव्यं जीरकसैन्धवम् । दिव्यौषधिहतस्यापि तत्तुल्यमयसो रजः ॥७५॥ नवगुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् । प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा चिन्तयित्वाऽमृतेश्वरीम्॥७६॥ एकैकां वटिकां खादेद्रक्तोत्पलरसाप्लुताम् । नीलोत्पलरसेनैव कुलत्थस्वरसेन च ॥ ७७ ॥ निहन्ति विविधं कासं दोषत्रयसमुद्भवम् । वातिकं पैत्तिकञ्चैव गरदोषसमुद्भवम् ॥ ७८ ॥ सरक्तमथ नीरक्तं ज्वरं श्वाससमन्वितम् । भ्रमतृड्दाहशूलघ्नं रुच्यं वह्निप्रदीपनम् ॥ ७९ ॥ बलवर्णकरं वृष्यं जीर्णज्वरविनाशनम् । इदं चन्द्रामृतं लौहं चन्द्रनाथेन निर्मितम् ॥ ८० ॥ त्रिकुटा, त्रिफला, धनिया, चव्य, जीरा और सेंधानमक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, मैनशिलके द्वारा मारा हुआ लोहा दश भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र जलमें खरल करके नौ नौ रत्तीक गोलियां बना लेवे । प्रातःकाल पवित्र होकर अमृतेश्वरीका ध्यान करके एक एक गोली लाल कमोदिनीके रसके द्वारा अथवा नीलोत्पलके रसके द्वारा, अथवा कुलथीके द्वारा सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे अनेक प्रकारकी खाँसी, त्रिदोषज कास, वातज कास, पित्तज कास, विषदोषोद्भव कास, रुधिरयुक्त कास, रक्तरहित कास, श्वास- युक्त ज्वर, भ्रम, तृषा, दाह और शूलरोग शमन होते हैं ।

भाषाटीकासहित । ( ३१७ ) यह औषधि अतीव रुचिकारक, अग्निप्रदीपक, बल, वर्ण और वीर्य्यको बढ़ानेवाली तथा जीर्णज्वरको हरनेवाली है । इस चन्द्रामृत लोहको महादेवने कहा है ॥ ७५-८० ॥ श्रीचन्द्रामृत रस । रसगन्धकलौहानां प्रत्येकं कार्षिकं क्षिपेत् । टंकणस्य पलं दत्त्वा मरिचस्य पलार्द्धकम् ॥ ८१॥ त्रिकटु त्रिफला चव्यं धान्यजीरकसैन्धवम् । प्रत्येकं तोलकं ग्राह्यं छागीदुग्धेन पेषयेत् ॥ ८२ ॥ नवगुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् । प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा चिन्तयित्वाऽमृतेश्वरीम्॥८३॥ एकैकां वटिकां खादेद्रक्तोत्पलरसेन च । नीलोत्पलरसेनापि कुलत्थस्वरसेन च ॥ ८४ ॥ छागीक्षीरेण मण्डेन केशराजरसेन च । निहन्ति विविधं कासं वातरक्तसमुद्भवम् ॥ ८५ ॥ वातश्लेष्मज्वरं कासं पित्तश्लेष्मज्वरं तथा । वातिकं पैत्तिकं वापि गरदोषसमन्वितम् ॥ ८६ ॥ वासा गुडूचिका भार्ङ्गी मुस्तकं कण्टकारिका । समभागकृतं क्वाथं प्रत्यहं भक्षयेदनु ॥ ८७ ॥ पारा, गन्धक और लोहाभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे, सुहागा १ पल, काली मिरच आधा पल, त्रिकुटा, त्रिफला, चव्य, धनिया, जीरा और सेंधानमक यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेवे, सबको एकत्र खरल करके बकरीके दूधमें पीस- कर नौ नौ रत्तीकी बराबर गोली बना लेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल

( ३१८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मलमूत्रादिसे शुद्ध होकर और अमृतेश्वरी देवीका ध्यान करके एक एक गोली खाये । रक्तोत्पलका रस, नीलोत्पलका रस, कुथलीका क्वाथ, बकरीका दूध, मांड और कुकुरभांगरेका रस इनमेंसे एक किसी अनुपानके साथ सेवन करनेसे अनेक प्रकारकी खाँसी, वात- रक्तोत्पन्न खाँसी, वातश्लेष्म ज्वर, पित्तश्लेष्म ज्वर, वातिक ज्वर, पैत्तिक ज्वर और विषदोषसमन्वितज्वर यह सब नष्ट होते हैं । अड़ू- सा, गिलोय, भारंगी, नागरमोथा और कटेरी इनको समान भाग लेकर क्वाथ बनाकर ऊपरसे पान करे ॥ ८०-८७ ॥ अमृतमञ्जरी । हिंगुलञ्च विषञ्चैव कणा मरिचटङ्कणम् । जातीकोषं समं सर्वं जम्बीररसमर्दितम् ॥ ८८ ॥ रक्तिमानां वटीं कुर्यादार्द्रकरससंयुताम् । वटीद्वयं त्रयं खादेत्सन्निपातं सुदारुणम् ॥ ८९ ॥ अग्निमांद्यमजीर्णञ्च सामवातं सुदारुणम् । उष्णतोयानुपानेन सर्व व्याधिं नियच्छति ॥ ९० ॥ कासं पञ्चविधं श्वासं सर्वाङ्गग्रहमेव च । जीर्णज्वरं क्षयं चैव हन्यादमृतमञ्जरी ॥ ९१ ॥ सिंग्रफ, विष, पीपल, काली मिरच, सुहागा और जावित्री इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बनाकर अदरखके रसके साथ दो अथवा तीन गोली सेवन करनेसे दारुण सन्निपात, मन्दाग्नि, अजीर्ण और आमवात रोग नष्ट होते हैं । गरम जलके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग शमन होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे पांच प्रकारकी खांसी, श्वास, सर्वांगपीड़ा, जीर्णज्वर और क्षय दूर होते हैं । इसको अमृतमञ्जरी वटी कहते हैं ॥ ८८-९१॥

भाषाटीकासहित । ( ३१९ ) कासान्तक रस । त्रिफलाव्योषचूर्णञ्च समभागं प्रकल्पयेत् । मधुना सह पानात्तु दुष्टकासं नियच्छति ॥ ९२ ॥ त्रिफला और त्रिकुटा समान भाग लेकर दोनोंको एकत्र चूर्ण करके जलमें पीसकर यथोचित मात्रानुसार शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे दुष्ट खाँसी शांत होती है ॥ ९२ ॥ बृहच्छृङ्गाराभ्र । पारदं गन्धकञ्चैव टंकणं नागकेशरम् । कर्पूरं जातिकोषञ्च लवंगं तेजपत्रकम् ॥ ९३ ॥ सुवर्णं चापि प्रत्येकं कर्षमात्रं प्रकल्पयेत् । शुद्धकृष्णाभ्रचूर्णन्तु चतुःकर्षं प्रयोजयेत् ॥ ९४ ॥ तालीशं घनकुष्ठञ्च मांसीत्वग्धातृपुष्पिका । एलाबीजं त्रिकटुकं त्रिफला करिपिप्पली ॥९५॥ कर्षयोर्द्वयमेतेषां पिप्पलीक्वाथमर्दितम् । अनुपानं प्रयोक्तव्यं चोचं क्षौद्रसमायुतम् ॥ ९६ ॥ अग्निमान्द्यादिकान् रोगानरुचिं पाण्डुकामलाम् । औदराणि तथा शोथमानाहं ज्वरमेव च ॥ ९७ ॥ ग्रहणीं श्वासकासञ्च हन्याद्यक्ष्माणमेव च । नानारोगप्रशमनं बलवर्णाग्निकारकम् ॥ ९८ ॥ बृहच्छृंगाराभ्रनाम विष्णुना परिकीर्तितम् । एतस्याभ्यासमात्रेण निर्व्याधिर्जायते नरः ॥ ९९ ॥

( ३२० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सुहागा, नागकेशर, कपूर, जावित्री, लौंग, तेजपात और सुवर्णकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष, कृष्णाभ्रक भस्म ४ कर्ष, तालीशपत्र, नागरमोथा, कूठ, वालछड़, दारचीनी, धायके फूल, इलायची, त्रिकुटा, त्रिफला और गजपीपल यह प्रत्येक औषधि दो दो कर्ष लेवे । सबको एकत्र पीसकर पीपलके क्वाथमें खरल करके दालचीनीके चूर्ण और सहतके साथ सेवन करनेसे मन्दाग्नि, अरुचि, पांडु, कामला, उदररोग, शोथ, आनाह, ज्वर, संग्रहणी, श्वास, खाँसी और राजयक्ष्मारोग यह सब नष्ट होते हैं । इससे अनेक प्रकारके रोग दूर होकर बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है । प्रतिदिन इस औषधिके सेवन करनेसे मनुष्य रोगरहित हो जाते हैं । इसको बृहच्छृङ्गाराभ्र कहते हैं ॥ ९३-९९ ॥ नित्योदय रस । सुशुद्धं पारदं गन्धं प्रत्येकं शुक्तिसम्मितम् । ततः कज्जलिकां कृत्वा मर्दयेच्च पृथक्पृथक् ॥१००॥ बिल्वाग्निमन्थश्योनाकं काश्मरी पाटला बला । मुस्तं पुनर्नवा धात्री बृहती वृषपत्रकम् ॥ १०१ ॥ विदारी बहुपुत्री च एषां कर्षै रसैर्भिषक् । सुवर्णं रजतं ताप्यं प्रत्येकं शाणमात्रकम् ॥ १०२ ॥ पलमात्रं तु कृष्णाभ्रं तदर्द्धन्तु सिताभ्रकम् । जातीकोषफले मांसी तालीशैलालवंगकम् ॥१०३॥ प्रत्येकं कोलमात्रन्तु वासानीरैर्विमर्दयेत् । शोषयित्वाऽऽतपे पश्चाद्विदार्याः पेषयेद्रसैः॥१०४॥ द्विगुंजां वटिकां कृत्वा पिप्पलीमधुना भजेत् । नाम्ना नित्योदयश्चायं रसो विष्णुविनिर्मितः॥१०५॥ १ सिताह्वयम्-इत्यपि केचित पठन्ति ।

पञ्च कासान्निहन्त्याशु चिरकालोद्भवानपि । राजयक्ष्माणमप्युग्रं जीर्णज्वरमरोचकम् ॥१०६॥ धातुस्थं विषमाख्यञ्च तृतीयकचतुर्थकौ । अर्शांसि कामलां पाण्डुमग्निमान्द्यं प्रमेहकम् । सेवनादस्य कन्दर्परूपो भवति मानवः ॥१०७॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे कासाधिकारः । शुद्ध पारा ६ मासे और गन्धक ६ मासे दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर बेलकी जड़, अरणी, सोनापाठा, कुम्भीर, पाढल, खिरैंटी, नागरमोथा, पुनर्नवा, आमले, बड़ी कटेरी, अडूसेके पत्ते, विदारीकंद और सतावर इन प्रत्येकके एक एक कर्ष परिमाण रसके द्वारा अलग अलग खरल करे । पश्चात् इसमें सुवर्णकी भस्म ४ मासे, चांदीकी भस्म ४ मासे, सोनामाखीभस्म ४ मासे, कृष्णाभ्रकभस्म ४ तोले, कपूर २ तोले, जावित्री, जायफल, बालछड़, तालीशपत्र, इलायची और लौंग यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला मिलाकर अडूसेके रसमें खरल करके धूपमें सुखा देवे । फिर दुवारा विदारीकंदके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे पांच प्रकारकी बहुत दिनोंकी पुरानी खाँसी, राजयक्ष्मा, जीर्ण- ज्वर, अरुचि, धातुगत विषमज्वर, तृतीयक और चातुर्थिक ज्वर, बवासीर, कामला, पांडु, मंदाग्नि और प्रमेह रोग नष्ट होते हैं। इस औषधिके सेवन करनेसे मनुष्य कामदेवके समान रूपवान् हो जाता है । यह नित्योदय रस विष्णु भगवान्ने कहा है ॥ १००-१०७ ॥ इति कासाधिकार समाप्त ।

( ३२२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ हिक्काश्वासाधिकार । सूर्यावर्त्त रस । सूतकं गन्धकं मर्द्यं यामैकं कन्यकाद्रवैः । द्वयोस्तुल्यं ताम्रपत्रं पूर्वकल्केन लेपयेत् ॥ १ ॥ दिनैकं हंडिकायन्त्रे पचेच्छीतं समुद्धरेत् । सूर्यावर्त्तरसो नाम द्विगुञ्जः श्वासकासनुत् ॥ २ ॥ इन्द्रवारुणिकामूलं देवदारु कटुत्रयम् । शर्करासहितं खादेदूर्ध्वश्वासनिवृत्तये ॥ ३ ॥ प्रथम पारे और गंधक दोनोंको घृतकुमारी ( घीकार ) के रसमें खरल करे, पश्चात् पारे और गंधक दोनोंकी बराबर तांबेके पत्र लेकर उनपर उक्त गंधक और पारेके कल्कका लेप कर देवे । फिर इन तांबेके पत्तोंको एक हांडीमें रखकर उसको सराव या अभ्रकसे ढककर बालूसे हांडीको भरकर एक दिन तक पकावे । पश्चात् शीतल होनेपर चूर्ण करके दोरत्ती परिमाण औषधि सेवन करनेसे श्वास और खांसी दूर होती है । इसको सूर्यावर्त्त रस कहते हैं । इन्द्रायणकी जड़, देव- दारु और त्रिकुटा इन सबको एकत्र पीसकर मिश्री मिलाकर सेवन करनेसे ऊर्ध्वश्वास दूर हो जाता है ॥ १-३ ॥ विजयवटी । सूतकं गन्धकं लौहं विषमभ्रकमेव च । विडङ्गं रेणुकं मुस्तमेला ग्रन्थिककेशरम् ॥ ४ ॥ त्रिकटु त्रिफला तालं शुल्वं जैपालचित्रकम् । एतानि समभागानि द्विगुणो दीयते गुडः ॥ ५ ॥ कासे श्वासे क्षये गुल्मे प्रमेहे विषमज्वरे ।

भाषाटीकासहित । ( ३२३ ) सूतायां ग्रहणीदोषे शूले पाण्ड्वामये तथा । हस्तपादादिदाहेषु वटिकेयं प्रशस्यते ॥ ६ ॥ पारा, गंधक, लोहभस्म, विष, अभ्रकभस्म, वायविडंग, रेणुका, नागरमोथा, इलायची, पीपलामूल, नागकेशर, त्रिकुटा, त्रिफला, तांबाभस्म, शुद्ध जमालगोटे और चीतेकी जड़ यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और सबसे दोगुना पुराना गुड़ लेवे । इन सबको एकत्र खरल करके सेवन करनेसे खांसी, श्वास, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषम- ज्वर, सूतिका, संग्रहणी, शूल, पांडु और हाथ पांव आदिकी दाह दूर होती है । इसको विजयवटी कहते हैं ॥ ४-६ ॥ घृतेन पाचयेन्मूलं पत्रञ्च वासकस्य तु । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय कासे श्वासे क्षये तथा ॥ ७ ॥ अडूसेकी जड़ और अडूसेके पत्तोंको घृतमें भूनकर प्रातःकाल सेवन करनेसे खाँसी, श्वास और क्षयरोग नष्ट होते हैं ॥ ७ ॥ शुण्ठीचूर्णं समं देयं पिप्पली देवदारु च । ऊर्ध्वश्वासं सदा हन्ति पिबेदुष्णजलेन च ॥ ८ ॥ पीपल, देवदारु और सोंठके चूर्णको गरम जलके साथ सेवन करनेसे उर्ध्वश्वास नष्ट होता है ॥ ८ ॥ लोहपर्पटी रस । भागौ रसस्य गन्धस्य द्वावेको लौहभस्मतः । एतद् घृष्टं द्रवीभूतं मृद्वग्नौ कदलीदले ॥ ९ ॥ पातयेद्गोमयगते तथैवोपरि योजयेत् । ततः पिष्ट्वा द्रवैरेभिः सप्तधा भावयेत्पृथक् ॥ १० ॥ भार्ङ्गी मुण्डी मुनिवरा जया निर्गुण्डिका तथा । व्योषवासककन्यार्द्रद्रवैरेताः पुटे पचेत् ॥ ११ ॥

( ३२४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । आगन्धं खर्परे ताम्रे पर्पटाख्यो रसो भवेत् । सर्वरोगहरस्तैस्तैरनुपानैर्हि माषकैः ॥ १२ ॥ ताम्बूलीपत्रसहितः श्वासकासहरः परः । सकणः सुरसाक्वाथोऽनुपानं वासकाजलम् ॥ १३ ॥ अम्लिकातैलवार्त्ताकुकूष्माण्डं कदलीफलम् । वर्ज्यं मांसरसं सर्वं पथ्यं दद्याद्विचक्षणः ॥ वर्जयेच्च विशेषेण कफकृत्स्त्रीसुखादिकम् ॥ १४ ॥ पारा दो भाग, गंधक २ भाग और लोहेकी भस्म १ भाग इन सबको एकत्र खरल करके एक लोहेकी करछीमें रखकर उसमें घी मिलाकर मंद मंद अग्निसे पकावे । जब खूब गल जाय तब गोबरके ऊपर एक केलेका पत्ता रखकर उसके ऊपर उक्त औषधि ढाल देवे और ऊपरसे एक केलेका पत्ता रखकर पत्तेके ऊपर गोबर डालकर ढक देवे । और उसको अच्छे प्रकारसे दबाकर पर्पटीके समान बना लेवे । फिर इसका चूर्ण करके भारंगी, गोरखमुंडी, अगस्तियाके पत्ते, त्रिफला, जयंती, सम्हालू, त्रिकुटा, अडूसा, घीक्वार और अदरक इन प्रत्येकके रसके द्वारा सात सात भावना देकर तांबेके पात्रमें जबतक उसकी गंध दूर न होवे तब तक पकावे । इस औषधिमेंसे एक मासा लेकर यथोचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे सब रोग नष्ट होते हैं। पानके साथ इस औषधिके भक्षण करनेसे श्वास और खाँसी दूर होती है, तुलसीके क्वाथ और पीपलके चूर्णके साथ अथवा अडूसेके रसके साथ इस औषधिका सेवन करे । इस औषधिके सेवन कर- नेके अन्तमें खट्टे पदार्थ, तेल, बैंगन, पेठा और केलेकी फली भक्षण न करे । कफकारक पदार्थ और स्त्रीसंगका त्याग कर देवे । इसपर सब प्रकारके मांसरस पथ्य देवे। इसको लोहपर्पटी रस कहते हैं ॥ ९-१४ ॥ ताम्रपर्पटी । लौहस्थाने ताम्रयोगात्ताम्रपर्पटिका भवेत् ॥ १५ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३३५ ) उक्त लोहपर्पटीमें लोहेके स्थानमें तांबेका प्रयोग करनेसे अर्थात् उपरोक्त विधिसे पर्पटीको बनाकर केवल उसमें लोहेके स्थानमें तांबेको डाले तो ताम्रपर्पटी होती है ॥ १५ ॥ पिप्पल्यादि लोह । पिप्पल्यामलकी द्राक्षा कोलास्थि मधु शर्करा । विडङ्गपुष्करैर्युक्तं लौहं हन्ति सुदारुणम् ॥ छर्दिं हिक्कां तथा तृष्णां त्रिरात्रेण न संशयः ॥१६॥ पीपल, आमले, दाख, बेरकी मींगी, मुलैठी, मिश्री, वायविडंग और पोहकरमूल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और लोह- भस्म आठ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रासे तीन दिन तक सेवन करनेसे वमन, हिचकी और तृषारोग शांत होते हैं । इसको पिप्पल्यादि लोह कहते हैं ॥ १६ ॥ श्वासकुठार रस । टङ्कणं पारदं गन्धं विषं शिला कटुत्रिकम् । निष्पिष्य वटिका कार्या बाणगुञ्जाप्रमाणतः ॥१७॥ उष्णोदकं पिबेच्चानु क्षुद्राक्वाथमथापि वा । कासं पञ्चविधं हन्ति श्वासं श्लेष्मसमुद्भवम् ॥ शिरोरोगं निहन्त्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥१८॥ सुहागा, शुद्ध पारा, गंधक, विष, मैनाशिल और त्रिकुटा यह प्रत्येक औषधि समान लेकर सबको एकत्र पीसकर पांच पांच रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको गर्म जलके साथ; अथवा कटेरीके क्वाथके साथ सेवन करनेसे खाँसी, कफोत्पन्न श्वास और सब प्रकारका शिरो- रोग इसप्रकार नष्ट होते हैं जिस प्रकार वज्रसे वृक्षोंका ध्वंस होता है । इसको श्वासकुठार रस कहते हैं ॥ १७ ॥ १८ ॥

( ३२६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । श्वासकासचिन्तामणि रस । पारदं माक्षिकं स्वर्णं समांशं परिकल्पयेत् । पारदार्द्धं मौक्तिकञ्च सूताद्विगुणगन्धकम् ॥ अभ्रञ्चैव तथा योज्यं व्योम्नो द्विगुणलौहकम् ॥ १९॥ कण्टकारीरसेनैव छागीदुग्धैः पृथक् पृथक् । मधुयष्टिरसेनैव पर्णपत्ररसेन च ॥ २० ॥ भावयेत्सप्तवारञ्च द्विगुञ्जां वटिकां भजेत् । पिप्पलीमधुसंयुक्तां श्वासकासविमर्दिनीम् ॥ २१॥ पारा, सोनामाखीभस्म और सोनाभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, मोती आधा भाग, गंधक २ भाग, अभ्रकभस्म २ भाग और लोहभस्म ४ भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके कटेरीके रस, बकरीके दूध, मुलैठीके रस और पानोंके रसमें अलग अलग सात २ भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। पीपलके चूर्ण और सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे खाँसी और श्वास दूर होते हैं। इसको श्वासकासचिन्तामणि रस कहते हैं ॥ १९-२१॥ अन्य श्वासकुठार रस । रसं गन्धं विषं टङ्कं शिलोषणकटुत्रयम् । सर्वं संमर्द्य दातव्यो रसः श्वासकुठारकः ॥ वातश्लेष्मसमुद्भूतं श्वासं कासं क्षयं जयेत् ॥ २२ ॥ पारा, गंधक, विष, सुहागा, मैनशिल, काली मिरच और त्रिकुटा यह सब औषधि समान भाग लेकर पीसकर सेवन करनेसे वात- कफोत्पन्न रोग, श्वास, खाँसी और क्षयरोग नष्ट होते हैं। इसको श्वासकुठार रस कहते हैं ॥ २२ ॥ अन्य श्वासकुठार रस । रसं गन्धं विषञ्चैव टङ्कणं समनःशिलम् ।

भाषाटीकासहित । ( ३२७ ) एतानि समभागानि मरिचं तच्चतुर्गुणम् ॥ २३ ॥ त्रिभागं त्र्यूषणं ज्ञेयं खल्ले सर्वं विचूर्णयेत् । रसः श्वासकुठारोऽयं द्विगुञ्जः श्वासकासजित् ॥२४॥ गता संज्ञा यदा पुंसां तदा नस्यं प्रदापयेत् । घ्रापयेन्नासिकारन्ध्रे संज्ञाजननमुत्तमम् ॥ २५ ॥ प्रतिश्यायं क्षयक्षीणमेकादशविधं क्षयम् । हृद्रोगं श्वासशूलञ्च स्वरभेदं सुदारुणम् ॥ सन्निपातं तथा घोरं तन्द्रामोहान्वितं जयेत् ॥ २६ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे हिक्काश्वासाधिकारः । शुद्ध पारा, गंधक, विष, सुहागा और मैनशिल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, कालीमिरच ४ भाग और त्रिकुटा ३ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बनाकर सेवन करनेसे श्वास और खांसी दूर होती है । जिस मनुष्यकी संज्ञा नष्ट होजाय उसको यह गोली जलमें पीसकर नासिकाके छिद्रमें नस्य देवे । अथवा नासिकाके छिद्रद्वारा इस औषधिकी गंध देवे, इसके सेवन करनेसे प्रतिश्याय, क्षयक्षीण, एकादश प्रकारका क्षय, हृदयरोग, श्वास, शूल, स्वरभेद, मोह और तन्द्रायुक्त सन्निपात ज्वर दूर होते हैं । इसको श्वासकुठार रस कहते हैं ॥ २३-२६ ॥ इति हिक्काश्वासाधिकार समाप्त । अथ स्वरभेदचिकित्सा । भैरव रस । रसं गन्धं विषं टङ्कं मरिचं चव्यचित्रकम् । आर्द्रकस्य रसेनैव संमर्द्य वटिकां ततः ॥ १ ॥

( ३३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गुञ्जात्रयप्रमाणेन खादेत्तोयानुपानतः । स्वरभेदं निहन्त्याशु श्वासं कासं सुदुस्तरम् ॥ २ ॥ पारा, गंधक, विष, सुहागा, कालीमिरच, चव्य और चित्रककी जड़ इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर अदरखके रसमें खरल करके तीन तीन रत्तीकी गोली बना जलके साथ सेवन करनेसे स्वरभेद, श्वास और कास रोग नष्ट होते हैं । इसको भैरव रस कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ चव्यादि चूर्ण । चव्याम्लवेतसकटुत्रयतिन्तिडीकतालीशजीरक- तुगादहनैः समांशैः । चूर्णं गुडप्रमृदितं त्रिसुग- न्धियुक्तं वैस्वर्यपीनसकफारुचिषु प्रशस्तम् ॥ ३ ॥ चव्य, अम्लवेत, त्रिकुटा, तिन्तिडीक, तालीशपत्र, जीरा, वंश- लोचन, चित्रककी जड़, दारचीनी, इलायची और तेजपात यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और गुड़ सबकी बराबर लेवे । सबको एकत्र मिलाकर स्वरभेद, पीनस, कफ और अरुचि रोगमें प्रयोग करे । इसको चव्यादि चूर्ण कहते हैं ॥ ३ ॥ अनेनैवानुपानेन भस्मसूतं प्रयोजयेत् । योगवाहिरसञ्चापि योजयन्ति भिषग्वराः ॥ ४ ॥ सशर्करं शुण्ठिचूर्णं क्षौद्रेण सह योजितम् । कोकिलस्वर एव स्याद्गुटिकाभुक्तमात्रतः ॥ ५ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे स्वरभेदाधिकारः । इसी उपरोक्त चव्यादि चूर्णके साथ रससिन्दूर और योगवाही अन्यान्य समस्त औषधियोंका प्रयोग करे । मिश्री, सोंठका चूर्ण और सहद इनको एकत्र मिलाकर गोली बनाकर सेवन करनेसे स्वर कोकि- लके समान हो जाता है ॥ ४॥५॥ इति स्वरभेदाधिकार समास ॥

भाषाटीकासहित । ( ३३९ ) अथारोचकचिकित्सा । सुधानिधि रस । रसगन्धौ समौ शुद्धौ दन्तीक्वाथेन भावयेत् । जम्बीरस्य रसेनैव आर्द्रकस्य रसेन च ॥ १ ॥ मातुलुङ्गस्य तोयेन तस्य मज्जारसेन च । पश्चाद्विशोष्य सर्वांस्तान् टंकणञ्चोपचारयेत् ॥ २ ॥ देवपुष्पं बाणमितं रसपादं मृतामृतम् । माषमात्रञ्च तत्सर्वं नागरेण गुडेन वा ॥ ३ ॥ सर्वारोचकशूलार्तिसामवातं सुदारुणम् । विषूचीञ्चाग्निमान्द्यं च भक्तद्वेषञ्च दारुणम् ॥ रसोऽयं वारयत्याशु केसरी करिणं यथा ॥ ४ ॥ शुद्ध पारा १ भाग, गंधक १ भाग इन दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर जम्भीरी नींबूका रस, अदरखका रस, बिजौरे नींबूका रस और बिजौरे नींबूकी मज्जाके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर पश्चात् इसमें सुहागा ५ भाग, लौंग ५ भाग और पारेसे चौथाई भाग शुद्ध विष मिला लेवे । इसमेंसे एक मासा औषधि लेकर सोंठके चूर्णके साथ अथवा गुड़के साथ सेवन करनेसे सब प्रकारकी अरुचि, शूल, आमवात, विषूचिका, मंदाग्नि प्रभृति रोग नष्ट होते हैं । इसको सुधानिधि रस कहते हैं ॥ १-४ ॥ सुलोचनाभ्र । पलं सुजीर्णं गगनं तु वज्रकं तेजोवती कोलमुशीर- दाडिमम् । धात्र्यम्लरोलीरुचकं पृथग्दशपलो- न्मतं मर्दितमेव सेवितम् ॥ ५ ॥ अरोचकं

( ३३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वातकफत्रिदोषजं पित्तोद्भवं गन्धसमुद्भवं नृणाम् । कासं स्वराघातमुरुग्रहं रुजं श्वासं वलासं यकृतं भगन्दरम् ॥६॥ प्लीहाग्निमान्द्यं श्वयथुं समीरणं मेहं भृशं कुष्ठमसृग्दरं क्रिमिम् । शूलाम्लपित्त- क्षयरोगमुद्धतं सरक्तपित्तं वमिदाहमश्मरीम् । निहन्ति चार्शांसि सुलोचनाभ्रकं बलप्रदं वृष्यतमं रसायनम् ॥ ७ ॥ वज्राभ्रकभस्म १ पल, चव्य, बेर, खस, अनार, आमले, अम्लनो- निया और सेंधानमक इन सब औषधियोंको १०-१० पल लेकर एकत्र खरल करके सेवन करनेसे वातज, कफज, त्रिदोषज, पित्तज और दुर्गन्धजनित अरुचि रोग, खाँसी, स्वरभेद, ऊरुस्तम्भ, यंत्रणा, श्वास, कफ, यकृत्, भगन्दर, प्लीहा, मंदाग्नि, शोथ, वायु, प्रमेह, कुष्ठ, प्रदर, क्रिमि, शूल, अम्लपित्त, क्षयरोग, रक्तपित्त, वमन, दाह, अश्मरी और अर्शरोग प्रभृति नष्ट होते हैं । यह बलको बढ़ानेवाला, वीर्यवर्द्धक और रसायन है ॥ ६-७ ॥ अरुचिघ्न रस । ससूतमरुचिघ्नं स्यात्तिंतिडीकगुडोषणम् । मृद्धीका जीरकं कृष्णा मातुलुङ्गाम्लवेतसम् ॥ ८ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहेऽरोचकाधिकारः । रससिन्दूर, पक्क इमली, गुड़, काली मिरच, दाख, जीरा, पीपल, बिजौरानींबू और अमलवेत यह सब औषधियां समान भाग लेकर सबको एकत्र पीसकर सेवन करनेसे अरुचि रोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥ इति अरोचकाधिकार समाप्त ।

भाषाटीकासहित । ( ३३१ ) अथ छर्दिरोगचिकित्सा । अजाजीधान्यपथ्याभिः सक्षुद्राभिः कटुत्रिकैः । एभिः सार्द्धं भस्मसूतः सेव्यो वान्तिप्रशान्तये ॥१॥ ( हिक्काधिकारोक्तपिप्पल्यादिलौहमत्र विधेयम् ) इति छर्दिरोगचिकित्सा । जीरा, धनिया, हरड़, कटेरी, सोंठ, मिर्च, पीपल समानभाग लेकर पारा भस्म या रससिन्दूर सबसे व्योढ़ा सेवन करनेसे वमनरोग शांत होता है । ( वमनरोगमें हिक्काधिकारोक्त पिप्पल्यादि लोह व्यवहार करना चाहिये ) । [ इस योगमें पारदभस्म अधिक है अतः सब समान भाग लें तो ठीक होगा ] ॥ १ ॥ इति छर्द्यधिकार समाप्त । अथ तृष्णारोगचिकित्सा । महोदधि रस । ताम्रं चक्रिकया वङ्गं सूतं तालं सतुत्थकम् । वटांकुररसैर्भाव्यं तृष्णाहृद्वल्लमात्रतः ॥ १ ॥ सक्षौद्रमाम्रजम्बूत्थं पिबेत्क्वाथं पलोन्मितम् । सकृष्णमधुना कुर्याद्गण्डूषं शीतले स्थितः ॥ २ ॥ तांबाभस्म, वंगभस्म, पारा, हरतालभस्म और शुद्ध तूतिया यह सब औषधि समान भाग लेवे, सबको एकत्र पीसकर वड़के अंकुरके रसमें भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियां बनाकर सेवन करनेसे तृषा रोग शांत होता है । इसके सेवन करनेके पश्चात् आम और जामुनकी छालके क्वाथमें सहत डालकर एक पल परिमाण सेवन करे । और जो इस रोगमें शीत अधिक हो अथवा शीत स्थानमें हो तो इसमें पीपलका चूर्ण और सहतके गण्डूष धारण करे ॥ १ ॥ २ ॥

( ३३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कुमुदेश्वर रस । मृतताम्रस्य भागौ द्वौ भागैकं वङ्गभस्मकम् । यष्टीमधुरसैर्भाव्यं शुष्कं माषार्द्धकं शुभम् ॥ ३ ॥ सेव्यं चैवानुपानेन वक्ष्यमाणेन बुद्धिमान् । चन्दनं शारिवा मुस्तं क्षुद्रैलानागकेशरम् ॥ ४ ॥ सर्वतुल्या तथा लाजा पचेत्षोडशिकैर्जलैः । अर्धशेषं हरेत्क्वाथं सिताक्षौद्रयुतं तु तत् ॥ छर्दिं तृष्णां निहन्त्याशु रसोऽयं कुमुदेश्वरः ॥ ५ ॥ इति तृष्णाधिकारः । तांबेकी भस्म २ भाग, वंगकी भस्म १ भाग इन दोनोंको एकत्र पीसकर मुलैठीके क्वाथकी सात भावना देवे । पश्चात् आधे आधे मासेकी गोली बनाकर सेवन करे और ऊपरसे चन्दन, अनन्तमूल, नागरमोथा, छोटी इलायची और नागकेशर यह सब समान भाग और सबकी बराबर खीलें लेवे, सबको एकत्र करके सोलह गुने जलमें पकावे । जब पकते पकते जल आधा भाग बाकी रह जाय तब उतार लेवे, फिर उसको शीतल करके मिश्री और सहत डालकर पान करे । यह कुमुदेश्वर रस वमन और तृषाको शांत करता है ॥ ३-५ ॥ इति तृष्णाधिकार समाप्त । अथ मूर्च्छारोगचिकित्सा । सुधानिधि रस । कणामधुयुतं सूतं मूर्च्छायामनुशीलयेत् । शीतसेकावगाहादि सर्वं वा शीतलं भजेत् । सुधानिधिरसो नाम मदमूर्च्छाविनाशनः ॥ १ ॥ इति मूर्च्छाधिकारः ।

भाषाटीकासहित । ( ३३३ ) मूर्च्छा रोगमें पीपलके चूर्ण और रससिन्दूरको सहतमें मिलाकर सेवन करे । इस रोगपर शीतल जलका परिषेक (सेचन), शीतल जलमें अवगाहन और अन्यान्य समस्त शीतल वस्तुओंका सेवन करे । इसको सुधानिधि रस कहते हैं । यह औषधि मूर्च्छा रोगको नष्ट करती है ॥१॥ इति मूर्च्छारोगाधिकार समाप्त । अथ मदात्ययरोगचिकित्सा । सचव्यं हिंगुरुचकं धान्याकं विश्वदीप्यकम् । चूर्णं ससूतं मद्येन पीतं पानात्ययं जयेत् ॥ १ ॥ चव्य, हींग, काला नमक, धनिया, सोंठ, अजवायन और रस- सिन्दूर यह सब औषधि समान भाग लेकर बारीक चूर्ण कर लेवे । इसको मदिराके साथ सेवन करनेसे मदात्यय रोग नष्ट होता है ॥१॥ अष्टाङ्गलवण । सौवर्चलमजाज्यश्च वृक्षाम्लं साम्लवेतसम् । त्वगेला मरिचार्धांशं शर्करामधुयोजितम् ॥ २ ॥ हितं लवणमष्टांगमग्निसन्दीपनं परम् । मदात्यये कफप्राये दद्यात्स्रोतोविशोधनम् ॥ ३ ॥ इति मदात्ययाधिकारः । काला नमक, जीरा, चूका, अमलवेत, दालचीनी, इलायची और काली मिरच यह सब औषधि समान भाग लेकर मिश्री और सहत आधा आधा भाग मिलाकर सेवन करनेसे कफजनित मदात्यय रोग नष्ट होता है । इसको अष्टाङ्गलवण कहते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे रोग नष्ट होकर अग्नि संदीप्त होती है और रुधिरके स्रोत शुद्ध होते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ इति मदात्ययरोगचिकित्सा ॥ १२