रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
भाषाटीकासहित । ( ३४३ ) बहुदोषान्वितं वातं कामजं चित्तविभ्रमम् । पित्तकृतञ्च यद्दोषं दग्धञ्च दृष्टिमागतम् ॥ शस्यते सर्वरोगेषु सर्वापस्मारेकेषु च ॥ १९ ॥ इति अपस्माररोगचिकित्सा । पारा, हीरा, सोना, चांदी, मोती, हरिताल, गंधक, रससिन्दूर, खपरिया, मैनशिल, अभ्रक, कान्तलोह, सिंग्रफ और सीसेकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेकर सबको एकत्र पीसकर मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । फिर पत्थरके पात्रमें डालकर ब्राह्मीके रसमें, जयंतीके रसमें, सम्हालूके रसमें और पानोंके रसमें अलग २ सात सात भावना देकर सुखा लेवे । फिर इसको घोटकर गोलासा बनाकर केलेकी जड़में रखकर एक दिन, दो दिन, तीन दिन अथवा चार दिन पीछे निकालकर उसे रातमें ओस और दिनमें सूर्यकी धूपमें रखे । पश्चात् इसको पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको प्रातःकाल सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । इससे अनेक दोषयुक्त वातरोग, कामजव्याधि, चित्तभ्रम, पित्तजव्याधि, दग्धदृष्टि और सर्व प्रकारके अपस्मार रोग नष्ट होते हैं । इसको पाषाणवज्र रस कहते हैं ॥ १३–१९ ॥ इति अपस्माररोगचिकित्सा । अथ वातव्याधिचिकित्सा । द्विगुणाख्य रस । गन्धकाद्विगुणं सूतं शुद्धं मृद्वग्निना क्षणम् । पक्त्वाऽवतार्य संचूर्ण्य तुल्याभयसमन्वितम् ॥ १ ॥ सप्तगुंजामितं खादेद्वर्द्धयेच्च दिने दिने । गुञ्जैकैकक्रमेणैव यावत्स्यादेकविंशतिः ॥ २ ॥
( ३४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । क्षीराज्यशर्कराभिश्च शाल्यन्नं पथ्यमाचरेत् । कम्पवातप्रशान्त्यर्थं निर्वीते निवसेत्सदा ॥ द्विगुणाख्यरसो नाम त्रिपक्षात्कम्पवातजित् ॥ ३ ॥ गंधक १ भाग और पारा २ भाग इन दोनोंको एकत्र खरल करके कज्जली बना लेवे, फिर थोड़ी देरतक मंद मंद अग्निसे पकाकर चूर्ण कर लेवे, पश्चात् पारे और गंधक दोनोंके बराबर हरड़का चूर्ण मिला- कर सात रत्ती परिमाण भक्षण करे । यह सात रत्तीकी पहिले दिनकी मात्रा है । दूसरे दिन आठ रत्ती, तीसरे दिन नौ रत्ती इसी क्रमसे प्रति- दिन एक एक रत्ती बढ़ाकर इसका सेवन करे । जब बढ़कर २१ रत्ती परिमाण हो जाय तब फिर आगेको नहीं बढ़ावे । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें दूध, घी और मिश्री मिलाकर शालि चावलोंका भात खाय । कम्पवातको दूर करनेके लिये रोगीको सदैव वायुरहित स्थानमें निवास करावे । इसके सेवन करनेसे तीन पक्षमें कम्पवात रोग नष्ट होता है । इसको द्विगुणाख्यरस कहते हैं ॥ १-३ ॥ वातगजाङ्कुश । मृतं सूतं मृतं लौहं ताप्यं गन्धकतालकम् । पथ्या भृङ्गी विषं व्योषमग्निमन्थञ्च टङ्कणम् ॥ ४ ॥ तुल्यं खल्ले दिनं मर्द्यं मुण्डीनिर्गुण्डिकाद्रवैः । द्विगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्ववातप्रशान्तये ॥ ५ ॥ कणाचूर्णयुतञ्चैव जिंगीक्वाथं पिबेदनु । साध्यासाध्यं निहन्त्याशु रसो वातगजांकुशः ॥ ६॥ सप्ताहाद्गृध्रसीं हन्ति दारुणं सन्निपातिकम् । क्रोष्टुशीर्षकवातञ्चाप्यपबाहुकसंज्ञकम् ॥ ७ ॥
भाषाटीकासहित । ( ३४५ ) मन्यास्तम्भमुरुस्तम्भं हनुस्तम्भं विनाशयेत् । पक्षाघातादिरोगेषु कथितः परमोत्तमः ॥ ८ ॥ रससिन्दूर, लोहा, सोनामाखी, गंधक, हरिताल, हरड़, काकड़ा- शिंगी, विष, त्रिकुटा, अरणी और सुहागा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर गोरखमुंडी और सम्हालूके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । सब प्रकारके वातरोगोंको शमन करनेके लिये जो इस औषधिका भक्षण करे तो इसके ऊपर पीपलका चूर्ण डाल- कर जिंगीके क्वाथका पान करे । इससे साध्यासाध्य वातरोग दूर होते हैं, एक सप्ताहमें गृध्रसी रोग दूर होता है । सन्निपात, क्रोष्टुशीर्ष, वात- रोग, अपबाहुक वातरोग, मन्यास्तम्भ, ऊरुस्तम्भ और हनुस्तम्भ रोग नष्ट होते हैं । पक्षाघातादि रोगोंमें यह औषधि अतीव हितकारी है । इसको वातगजांकुश रस कहते हैं ॥ ४-८ ॥ रसो वारिशोषणोऽत्र युक्तोऽन्यो योगवाहिकः ॥ ९ ॥ वातव्याधि रोगमें वारिशोषण रस और अन्यान्य योगवाही रसोंका भी प्रयोग करना चाहिये ॥ ९ ॥ बृहद्वातगजांकुश रस । सूताभ्रतीक्ष्णकान्तानि ताम्रतालकगन्धकम् । स्वर्णं शुण्ठी बला धान्यं कट्फलञ्चाभया विषम् ॥ पथ्या शृङ्गी पिप्पली च मरिचं टङ्कणं तथा ॥१०॥ तुल्यं खल्ले दिनं मर्द्यं मुण्डीनिर्गुण्डिजैर्द्रवैः । द्विगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्ववातप्रशान्तये ॥ साध्यासाध्यं निहन्त्याशु बृहद्वातगजांकुशः ॥११॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, तीक्ष्ण लोहभस्म, कान्तलोहभस्म, तांबा- भस्म, हरितालभस्म, गन्धक, सोनाभस्म, सोंठ, खिरैंटी, धनिया,
( ३४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कायफल, हरड़, विष, छोटी हरड़, काकड़ासिंगी, पीपल, काली मिरच और सुहागा यह सब औषधि समान भाग लेकर गोरखमुंडी और सम्हालूके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इससे साध्यासाध्य सब प्रकारका वात रोग नष्ट होता है । इसको वृहद्वात- गजांकुश रस कहते हैं ॥ १०-११ ॥ महावातगजांकुश रस । मृताभ्रतीक्ष्णताम्रञ्च सूततालकगन्धकम् । भार्गी शुण्ठी बला धान्यं कट्फलञ्चाभया विषम् १२ संपिष्य चपलाद्रावैर्निष्केकां भक्षयेद्वटीम् । वातश्लेष्महरो ह्येष महावातगजांकुशः ॥ १३ ॥ अभ्रकभस्म, तीक्ष्ण लोहभस्म, तांबाभस्म, पारा, हरिताल, गंधक, भारंगी, सोंठ, खिरैंटी, धनिया, कायफल, हरड और विष इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र पीपलके क्वाथमें खरल करके एक एक निष्क परिमाणकी गोली बना लेवे । प्रतिदिन एक गोली भक्षण करनेसे वातकफजनित रोग नष्ट होते हैं । इसको महावात- गजांकुश रस कहते हैं ॥ १२ ॥ १३ ॥ वातनाशन रस । सूतहाटकवज्राणि ताम्रं लोहञ्च माक्षिकम् । तालं नीलाञ्जनं तुत्थं सिन्धुफेनं समांशिकम्॥१४॥ पञ्चानां लवणानाञ्च भागैकं सुविमर्दयेत् । वज्रीक्षीरैर्दिनैकन्तु रुध्वा तं भूधरे पचेत् ॥ १५ ॥ माषैकमार्द्रकद्रावैर्लिह्याद्वातविनाशनम् । पिप्पलीमूलकक्वाथं सकृष्णमनुपाययेत् ॥ सर्वान्वातविकारांश्च निहन्त्याक्षेपकादिकान् ॥ १६॥
भाषाटीकासहित । ( ३४७ ) रससिन्दूर, सोनाभस्म, हीराभस्म, तांबाभस्म, लोहाभस्म, सोना- माखीभस्म, हरितालभस्म, रसौत, तूतिया, समुद्रफेन और पांचोंलवण यह सब औषधि समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके मूषामें रखकर भूधरयन्त्रमें पकावे । इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे वातरोग नष्ट होता है । इसके सेवन करनेके अन्तमें पीपलके क्वाथमें पीपलका चूर्ण डालकर पान करे । इससे आक्षेपकादि समस्त वातरोग नष्ट होते हैं ॥ १४-१६ ॥ वातारि रस । रसभागो भवेदेको द्विगुणो गन्धको मतः । त्रिगुणा त्रिफला ग्राह्या चतुर्भागं तु चित्रकम्॥१७॥ गुग्गुलोः पञ्चभागं चैरण्डतैलेन मर्दयेत् । क्षिप्त्वात्र पूर्वकं चूर्णं पुनस्तेनैव मर्दयेत् ॥ १८ ॥ गुटिकां कर्षमात्रान्तु भक्षयेत्प्रातरुत्थितः । नागरैरण्डमूलानां क्वाथं तदनुपाययेत् ॥ १९ ॥ अङ्ग-मेरण्डतैलेन स्वेदयेत्पृष्ठदेशतः । विरेके तेन सञ्जाते स्निग्धमुष्णञ्च भोजयेत् ॥ वातारिसंज्ञको ह्येष रसो निर्वातसेवितः ॥ २० ॥ पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, त्रिफला ३ भाग, चित्रककी जड़ ४ भाग, गूगल ५ भाग लेवे । प्रथम गूगलको एरण्डीके तेलमें खरल करके पूर्वोक्त पारा आदि औषधियोंको मिलाकर फिर एरण्डीके तेलमें सबको एकत्र घोटे । इसमेंसे प्रतिदिन एक कर्ष परिमाण गोली बना- कर भक्षण करे । ऊपरसे सोंठ और एरण्डीकी जड़का क्वाथ पीवे । पृष्ठसे लेकर सम्पूर्ण शरीरमें एरण्डीके तेलका मर्दन करे । जो एरण्डीतेलके मर्दन करनेसे दस्त होने लगे तो स्निग्ध और उष्ण पदार्थ भक्षण करे । वातरहित स्थानमें रहकर इस औषधिका सेवन करे । इसको वातारि रस कहते हैं ॥ १७-२० ॥
( ३४८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अनिलारि रस । रसेन गन्धं द्विगुणं विमर्द्य वातारिनिर्गुण्डिरसै- र्दिनैकम् । निवेशयेत्ताम्रमये पुटे तत्सर्वं मृदावेष्ट्य च. वालुकाख्ये ॥ २१ ॥ यन्त्रे पुटेद्रोमयचूर्णवह्नौ स्वभावशीते तु समुद्धरेत्तत् । निर्गुण्डिकावात- हराग्नितोयैः संचूर्ण्य यत्नेन विभावयेत्तत् ॥२२॥ रसोऽनिलारिः कथितोऽस्य वल्लमेरण्डतैलेन ससै- न्धवेन । मरीचचूर्णेन ससर्पिषा वा निर्गुण्डि- चित्रैश्च कटुत्रिकैर्वा ॥ २३ ॥ पारा १ भाग और गंधक २ भाग लेवे, दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर एरण्डकी जड़ और सम्हालूके पत्तोंके रसमें एक दिन तक खरल करके तांबेके सम्पुटमें रखकर ऊपरसे कपरोटी करके वालुकायंत्रमें अरने उपलोंकी अग्निसे पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब औषधिको निकालकर चूर्ण कर ले । फिर इस चूर्णको सम्हालूके पत्तेकी जड़ और चित्रककी जड़के रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर एरण्डीके तेल और सेंधा- नमक अथवा काली मिरचोंके चूर्ण और घृत अथवा सम्हालूके पत्तोंके रस और त्रिकुटेके चूर्णके साथ इसका सेवन करे ॥ २१–२३ ॥ वातकंटक रस । वज्रं मृताभ्रहेमार्कतीक्ष्णमुण्डं क्रमोत्तरम् । मरिचे मर्दयेदम्लवर्गेण दिवसत्रयम् ॥ २४ ॥ द्विक्षारं पञ्चलवणं मर्दितं स्यात्समं समम् । ततो निर्गुण्डिकाद्रावैर्मर्दयेद्दिवसत्रयम् ॥ २५ ॥
भाषाटीकासहित । ( ३४९ ) शुष्कमेतद्विचूर्ण्याथ विषञ्चास्याष्टमांशतः । टङ्कणं विषतुल्यांशं दत्त्वा जम्बीरजैर्द्रवैः ॥ २६ ॥ भावयेद्दिनमेकन्तु रसोऽयं वातकण्टकः । दातव्यो वातरोगेषु सन्निपाते विशेषतः ॥ २७ ॥ द्विगुञ्जामाईकद्रावैर्घृतैर्वा वातरोगिणे । निर्गुण्डीमूलचूर्णन्तु महिषाक्षञ्च गुग्गुलुम् ॥ २८ ॥ समांशं मर्दयेदाज्ये तद्वटी कर्षसंमिता । अनुयोज्य घृतैर्नित्यं स्निग्धमुष्णञ्च भोजयेत्॥२९॥ मण्डलं नाशयेत्सर्वं वातरोगे विशेषतः । सन्निपाते पिबेच्चानु तालमूलीकषायकम् ॥ ३० ॥ हीराभस्म १ भाग, अभ्रकभस्म २ भाग, सोनाभस्म ३ भाग, तांबाभस्म ४ भाग, तीक्ष्णलोहभस्म ५ भाग, मुण्डलोह ६ भाग और काली मिरच ७ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके अम्ल वर्गकी औषधियोंमें तीन दिन तक खरल करके फिर इसके बराबर बराबर सज्जीखार, जवाखार, पांचों लवण मिलाकर सम्हालूके रसमें तीन दिन तक भावना देवे । जब शुष्क हो जाये तब चूर्णका आठवां भाग विष और विषकी बराबर सुहागा मिलाकर जम्भीरी नींबूके रसमें एक दिन तक भावना देवे । इस औषधिका वातरोग और सन्निपात रोगमें प्रयोग करे । इसको दो रत्ती परिमाण अदरखके रसके साथ अथवा घृतके साथ वातरोगीको देवे । इसके सेवन करनेके अन्तमें सम्हालूकी जड़का चूर्ण और गूगल समान भाग लेकर घृतमें मर्दन करके घृतके साथ एक कर्ष परिमाण भक्षण करावे । इसपर स्निग्ध और उष्ण पदार्थ पथ्य देवे । इसके सेवन करनेसे मण्डल- रोग और सर्व प्रकारके वातरोग नष्ट होते हैं । सन्निपातरोगमें इस औषधिका सेवन कराकर ऊपरसे मुसलीका क्वाथ पान करावे ! इसको वातकण्टक रस कहते हैं ॥ २४-३० ॥
( ३५० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लघ्वानन्द रस । पारदं गन्धकं लौहमभ्रकं विषमेव च । समांशं मरिचस्याष्टौ टङ्गणन्तु चतुर्गुणम् ॥ ३१ ॥ भृङ्गराजरसेनेव दातव्या पञ्च भावना । तथा दाडिमतोयेन वटीं कुर्यात्समाहितः ॥ निहन्ति वातजान्रोगान्भ्रमदाहपुरःसरान् ॥ ३२ ॥ पारा, गंधक, लोहाभस्म, अभ्रकभस्म और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, काली मिरच ८ भाग और सुहागा ४ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र भांगरेके रसकी पांच और अनारके रसकी पांच भावना देकर गोली बना लेवे। इस औषधिके सेवन कर- नेसे भ्रम और दाहसंयुक्त वातरोग नष्ट होते हैं। इसको लघ्वानन्द रस कहते हैं ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ चिन्तामणि रस । कर्षैकं रससिन्दूरं तत्समं मृतमभ्रकम् । तदर्थं मृतलौहञ्च स्वर्णशाणं क्षिपेद्बुधः ॥ ३३ ॥ कन्यारसेन संमर्द्य गुञ्जामात्रां वटीञ्चरेत् । अनुपानादिकं दद्याद्बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ॥ ३४ ॥ हन्ति श्लेष्मान्वितं वातं केवलं पित्तसंयुतम् । हृल्लासमरुचिं दाहं वान्ति भ्रान्ति शिरोग्रहम् ॥३५॥ प्रमेहं कर्णनादञ्च जडगद्गदमूकताम् । बाधिर्यं गर्भिणीरोगमश्मरीसूतिकामयम् ॥ ३६ ॥ प्रदरं सोमरोगञ्च यक्ष्माणं ज्वरमेव च । बलवर्णाग्निदः सम्यक् कान्तिपुष्टिप्रसाधकः ॥ चिन्तामणिरसश्चायं चिन्तामणिरिवापरः ॥३७॥
भाषाटीकासहित । ( ३५१ ) रससिन्दूर २ कर्ष, अभ्रकभस्म १ कर्ष, लोहेकी भस्म आधा कर्ष, सोनेकी भस्म चौथाई कर्ष इन सब औषधियोंको एकत्र घींक्वारके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । दोषोंका बला- बल विचार कर इसके अनुपानोंकी कल्पना कर ले । इस औषधिके सेवन करनेसे कफयुक्त वायु, पित्तयुक्त वायु, हल्लास, अरुचि, दाह, वमन, भ्रम, मस्तककी पीड़ा, प्रमेह, कर्णनाद, जडता, गद्गदपन, मूकता, बधिरता, गर्भिणीरोग, अश्मरीरोग, सूतिका, प्रदर, सोमरोग, राजयक्ष्मा और ज्वर नष्ट होते हैं । यह बल, वर्ण, अग्नि, कांति और पुष्टिको बढ़ाता है । यह चिन्तामणिरस चिन्तामणिके समानहै॥३३-३७॥ चतुर्मुख रस । रसगन्धकलौहाभ्रं समं सूतांह्रि हेम च । सर्वं खल्वतले क्षिप्त्वा कन्यास्वरसमर्दितम् ॥ ३८ ॥ एरण्डपत्रैरावेष्ट्य धान्यराशौ दिनत्रयम् । संस्थाप्य च तदुद्धृत्य त्रिफलारससंयुक्तम् ॥ ३९ ॥ एतद्रसायनवरं सर्वरोगेषु योजयेत् । तद्यथाग्निबलं खादेद्वलीपलितनाशनम् ॥ ४० ॥ पौष्टिकं बल्यमायुष्यं पुत्रप्रसवकारकम् । क्षयमेकादशविधं कासं पञ्चविधं तथा ॥ ४१ ॥ कुष्ठमष्टादशविधं पाण्डुरोगान्प्रमेहकान् । शूलं श्वासञ्च हिक्काञ्च मन्दाग्निश्चाम्लपित्तकम् ॥४२॥ अपस्मारं महोन्मादं सर्वार्शांसि त्वगामयान् । क्रमेण शीलितं हन्ति वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ४३ ॥ जगतां च हितार्थाय चतुर्मुखमुखोदितः । रसश्चतुर्मुखो नाम चतुर्मुख इवापरः ॥ ४४ ॥
( ३५२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा, गंधक, लोहाभस्म, अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और पारेसे चौथाई भाग सोनेकी भस्म लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर घींकारके रसमें खरल करके एरण्डके पत्तोंमें लपेटकर तीन दिनतक धानोंके ढेरमें रख देवे । पश्चात् उसको निकालकर त्रिफ- लेके रसके साथ सर्व रोगोंमें प्रयोग करे । अग्निका बलाबल देखकर इसकी मात्राका निरूपण करे । इसके सेवन करनेसे वली और पलित रोग नष्ट होकर पुष्टि, बल और आयुकी वृद्धि होती है । इसके सेवन करनेसे पुत्ररहित स्त्री पुत्र प्रसव करनेको समर्थ होती है । इससे एका- दश प्रकारके क्षय रोग, पांच प्रकारकी खाँसी, अठारह प्रकारके कुष्ठ, पांडु, प्रमेह, शूल, कास, हिचकी, मंदाग्नि, अम्लपित्त, अपस्मार, उन्माद, अर्श और सब प्रकारके चर्मरोग नष्ट होते हैं । जिस प्रकार वज्रसे वृक्षोंका समूह नष्ट होता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे समस्त रोग नष्ट होते हैं । पृथिवीकी रक्षाके लिये यह औषधि स्वयं ब्रह्मदेवने कही है । यह औषधि ब्रह्माके समान है इस कारण इसका नाम चतुर्मुख रस है ॥ ३८-४४ ॥ लक्ष्मीविलास रस । पलं कृष्णाभ्रचूर्णस्य तदर्द्धौ रसगन्धकौ । बला नागबला भीरु विदारीकन्दमेव च ॥ ४५ ॥ कृष्णधूस्तूरनिचुलं गोक्षुरवृद्धदारयोः । बीजं शक्राशनस्यापि जातीकोषफले तथा ॥ ४६ ॥ कर्पूरञ्चैव कर्षांशं श्लक्ष्णचूर्णं पृथक्पृथक् । गृहीत्वा चाष्टमांशेन स्वर्णं पर्णरसेन च ॥ ४७ ॥ वटिकां स्विन्नचणकप्रमाणां कारयेद्भिषक् । रसो लक्ष्मीविलासोऽयं पूर्ववद्गुणकारकः ॥४८॥ कृष्णाभ्रकका चूर्ण १ पल, पारा २ तोले, गंधक २ तोले, खिरैंटी १ तोला, गंगेरन १ तोला, सतावर १ तोला, विदारीकंद १ तोला, काले
भाषाटीकासहित । ( ३६३ ) धतूरेके बीज १ तोला, जलवेंत ( समुद्र फल ) के बीज १ तोला, गोखुरू १ तोला, विधारेके बीज १ तोला, भांगके बीज १ तोला, जावित्री १ तोला, जायफल १ तोला, कपूर १ तोला और सोनाभस्म आधा तोला लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके पानोंके रसमें खरल करके सीजे हुए चनेकी बराबर गोली बना लेवे । यह औषधि चतुर्मुख रसके समान गुणकारक है । इसको महालक्ष्मी- विलास रस कहते हैं ॥ ४५–४८ ॥ रोगैभसिंह । सूताह्वयो घनवरानलवेल्लभाङ्गी तिक्ताकटुत्रयविषैः सवचैः समांशैः । रोगैभसिंह इति वातकफामयघ्नः सान्द्रोऽयमल्पपटुतो विहितो द्विगुञ्जः ॥ ४९ ॥ रससिन्दूर २ भाग, पारा, नागरमोथा, हरड़, बहेड़ा, आमला, चित्रककी जड़, वायविडंग, भारंगी, कुटकी, सोंठ, पीपल, मरिच, विष और वच यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इसके सेवन करनेसे कफवातज रोग नष्ट होते हैं, इस- लिये इसको रोगैभसिंह कहते हैं ॥ ४९ ॥ श्रीखण्डवटी । एतैर्गुडप्रमृदितै रसवर्जितैः स्यात्, श्रीखण्डनामगुटिका विहिता द्विगुञ्जा । शैत्याद्यजीर्णकफवातभवान् विकारान्, हन्त्यार्द्रकेण नियुताप्यथ केवला वा ॥ ५० ॥ पूर्वोक्त रोगैभसिंह रसमें जो औषधि कही हैं उनमेंसे रससिन्दूरको निकालकर उसके स्थानमें गुड़ डालकर दो २ रत्ती परिमाणकी गोली बना लेवे । अदरखके रसके साथ अथवा अनुपानके विना इस औषधिके सेवन करनेसे शीतता, अजीर्ण और कफवातज रोग नष्ट होते हैं । इसको श्रीखण्डवटी कहते हैं ॥ ५० ॥
( ३५४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पिण्डी रस । सूतात्पञ्चार्कत्तश्चैकं कृत्वा पिण्डं सुगन्धकम् । सूतांशं नागवल्ल्याश्च द्रवैः पिष्ट्वा प्रलेपयेत् ॥५१॥ ताम्रपत्रीं प्रलिप्तां तां रुद्ध्वा गजपुटे पचेत् । द्विगुञ्जं त्र्यूषणेनार्द्धवपुर्वातं सकम्पकम् ॥ निहन्ति दाहसन्तापमूर्च्छापित्तसमन्वितम् ॥ ५२ ॥ पारा ५ भाग, तांबाभस्म १ भाग, गंधक पारेसे चौथाई भाग इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके पानोंके रसमें घोटकर तांबेके पत्रोंपर लेप करके मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर त्रिकुटेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे अर्द्ध- शरीरगत कंपवात, दाह, सन्ताप, मूर्च्छा और पित्तसंयुक्त वातरोग नष्ट होते हैं । इसको पिण्डी रस कहते हैं ॥ ५१ ॥ ५२ ॥ कुब्जविनोद रस । रसगन्धौ समौ शुद्धौ चाभया तालकं तथा । विषं कटुकिव्योषण्च बोलजैपालकौ समौ ॥५३॥ भृङ्गराजरसैर्मर्द्यं स्नुह्यर्कस्वरसैस्तथा । गुञ्जाद्वयं भक्षयेच्च हृच्छूलं पार्श्वशूलकम् ॥ ५४ ॥ आमवाताढ्यवातादीन्कटीशूलञ्च नाशयेत् । अग्निञ्च कुरुते दीप्तं स्थौल्यञ्चाप्यपकर्षति ॥ रसः कुब्जविनोदोऽयं गहनानन्दभाषितः ॥५५ ॥ पारा, गंधक, हरड़, हरिताल, विष, कुटकी, त्रिकुटा, गंधबोल और जमालगोटे इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर भांगरेके रसके द्वारा खरल करके पश्चात् थूहर और आकके दूधमें अलग अलग खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे
भाषाटीकासहित । ( ३५५ ) हृदयशूल, पार्श्वशूल, आमवात, ऊरुस्तम्भ और कटिशूल नष्ट होते हैं, जठराग्नि दीपन होती है और मेदरोग शमन होता है। इसको कुब्ज- विनोद रस कहते हैं ॥ ५३-५५ ॥ अथ शीतवातलक्षण । हिमवन्ति हि गात्राणि रोमाणि स्फुरितानि च । शिरोक्षिवेदनालस्य शीतवातस्य लक्षणम् ॥ ५६ ॥ जिस रोगमें रोगीका सर्वांग शीतल होजाय, समस्त अंग फड़के, शिर और नेत्रोंमें पीड़ा होय और आलस्य होय उसको शीतवायु रोग कहते हैं ॥ ५६ ॥ शीतारि रस । रसेन गन्धं द्विगुणं प्रगृह्य पुनर्नवाग्निस्वरसै- र्विभाव्य । पक्कार्कपत्रस्य रसेन पश्चाद्विपाचयेदष्ट- गुणेन यत्नात् ॥५७॥ रसार्द्धभागञ्च विषञ्च दत्त्वा विपाचयेदग्निजले क्षणं तत् । शीतारिसंज्ञस्य रसायनस्य बलञ्च सार्द्धं मरिचार्द्धकेन ॥ ५८ ॥ मरीचचूर्णेन घृताप्लुतेन सेवेत मांसञ्च घृतञ्च पथ्यम् ॥ ५९ ॥ पारा १ भाग और गन्धक २ भाग दोनोंको एकत्र खरल करके पुनर्नवे और चित्रकके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर पारे और गन्धकसे अठगुने पक्क आकके पत्तोंके रसके द्वारा मूषा अथवा वालुका यन्त्रमें पकावे । फिर पारेसे आधा भाग विष मिलाकर थोड़ेसे चीतेके रसमें दुबारा पकावे । इस औषधिको दो रत्ती लेकर काली- मिरचोंके चूर्ण और अदरखके रसके द्वारा या कालीमिरचोंके चूर्ण और घृतके द्वारा सेवन करे । इस घृतके सेवन करनेपर मांस और घृत पथ्य देवे । इसको शीतारि रस कहते हैं ॥ ५७-५९ ॥
( ३५६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वातविध्वंसन रस । सूतमभ्रकसत्त्वं च कांस्यं शुद्धञ्च माक्षिकम् । गन्धकं तालकं सर्वं भागोत्तरविवर्द्धितम् ॥ ६० ॥ कज्जलीकृत्य तत्सर्वं वातारिस्नेहसंयुक्तम् । सप्ताहं मर्दयित्वा तु गोलकीकृत्य यत्नतः ॥ ६१ ॥ निम्बुद्रवेण संपीड्य तिलकल्केन लेपयेत् । अर्द्धांगुलदलेनैव परिशोष्य प्रयत्नतः ॥ ६२ ॥ प्रपचेद्वालुकायन्त्रे द्वादशप्रहरं ततः । जठरस्य रुजः सर्वास्तथा च मलनिग्रहम् ॥ ६३ ॥ आध्मानक तथानाहं विषूचीं वह्निमान्द्यकम् । आमदोषमशेषञ्च गुल्मं छर्दिञ्च दुर्जराम् ॥ ६४ ॥ ग्रहणीं श्वासकासौ च क्रिमिरोगं विशेषतः । हन्यात्सर्वाङ्गशूलञ्च मन्यास्तम्भं तथैव च ॥ ६५ ॥ ज्वरे चैवातिसारे च शूलरोगे त्रिदोषजे । पथ्यं रोगानुसारेण देयमस्मिन् भिषग्वरैः ॥ श्रीमता नन्दिनाथेन वातविध्वंसनो रसः ॥ ६६ ॥ पारा १ भाग, अभ्रकभस्म २ भाग,कांसाभस्म ३ भाग, सोनामाखी भस्म ४ भाग, गंधक ५ भाग और हरिताल ६ भाग लेवे, इन सबको एकत्र पीसकर एरण्डीके तेलमें सात दिनतक खरल करके पिंडाकार बना लेवे; पश्चात् तिलोंको नींबूके रसमें पीसकर कल्क बनाकर उस गोलेके ऊपर आधा आधा अंगुल ऊंचा लेप कर देवे । फिर इसको सुखाकर वालुकायंत्रमें द्वादश प्रहर तक पकावे । इस औषधिके सेवन करनेसे उदरस्थित सर्वप्रकारकी पीड़ा, मलरोध, आध्मान, आनाह,
भाषाटीकासहित । ( ३५७ ) विषूचिका, मंदाग्नि, सर्व प्रकारके आमदोष, गुल्म, वमन, संग्रहणी, श्वास, खाँसी, क्रिमि, सर्वांगशूल और मन्यास्तम्भ रोग नष्ट होते हैं । इसको ज्वर, अतिसार, शूल और त्रिदोषज रोगमें यथोचित अनु- पानके साथ सेवन करे । यह वातविध्वंसन रस श्रीमान् महादेवने कहा है ॥ ६०–६६ ॥ पलाशादि वटी । पलाशबीजोत्थरसेन सूतं गन्धेन युक्तं त्रिदिनं विमर्द्य। श्लक्ष्णीकृतं तद्विषतिन्दुबीजं संयोजयेदस्य कलाप्रमाणम् ॥ मासद्वयं निष्कमितं प्रयत्ना- दर्शांसि हन्त्याशु नियोजनीयम् ॥ ६७ ॥ वातरक्तं तथा शोथमस्पर्शाख्यानिलामयम् । वातवत्पित्तरोगेऽपि तत्र पित्तेन भावयेत् ॥ पलाशादिवटी ख्याता वातरोगकुलान्तिका ॥६८॥ पारा और गंधक दोनोंको समान भाग लेकर ढाकके बीजोंके रसमें तीन दिनतक अच्छे प्रकारसे खरल करके फिर उसमें पारे और गंध- कसे सोलहवां भाग कुचिलेका चूर्ण मिला लेवे । इसमेंसे प्रतिदिन चार मासे परिमाण औषधि लेकर प्रातःकाल भक्षण करे । इस प्रकार दो मास पर्यत औषधि सेवन करनेसे बवासीर, वातरक्त, शोथ और स्पर्शज्ञानकी हीनता रोग दूर होते हैं । इस औषधिको पित्तके रोगोंमें प्रयुक्त करे तो पांच पित्तोंके द्वारा भावना देवे । इसको वातनाशक- पलाशादि वटी कहते हैं ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ दशसार वटी । यष्टी धात्री बला द्राक्षा एला चन्दनवालुकम् । मधूकपुष्पं खर्जूरं दाडिमं पेषयेत्समम् ॥ ६९ ॥ सर्वतुल्या सिता योज्या पलार्द्धं भक्षयेत्सदा ।
( ३५८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दशसारवटी ख्याता सर्ववातविकारनुत् ॥ अथ दाडिममित्यत्र गणमिच्छन्ति चापरे॥७०॥ मुलैठी, आमले, खिरैंटी, दाख, इलायची, लालचंदन, सुगंधवाला, महुवेके फूल, खजूर और अनार यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबकी बराबर मिश्री लेवे । सबको एकत्र मिलाकर प्रतिदिन इसमेंसे दो तोले परिमाण औषधि सेवन करे । और कितनेक वैद्य इसमें दाडिमके स्थानमें दाडिमाद्यगण व्यवहार करते हैं । इसको दशसारवटी कहते हैं ॥ ६९ ॥ ७० ॥ गगनादिवटी । मृतगगनरसार्कं मुण्डतीक्ष्णं सताप्यं सवलि सम- मिदं स्याद्यष्टितोयप्रविष्टम् । तदनु सलिलजातै- र्वासकैर्गोस्तनीभिर्मृदितमनुविदारीवारिणा घस्र- मेकम् ॥ ७१ ॥ घृतमधुसहितेयं वल्लमात्रा वटीति क्षपयति गुरुवातं पित्तरोगं क्षयञ्च । भ्रममदकफ- शोषान् दाहतृष्णासमुत्थान् मलयजमिह पेयं चानुपेयं सचन्द्रम् ॥ ७२ ॥ अभ्रकभस्म, शुद्ध पारा, तांबाभस्म, मुण्डलोहभस्म, तीक्ष्णलोह- भस्म, शुद्ध सोनामाखीभस्म और गंधक यह सब औषधि समान भाग लेकर मुलैठीके क्वाथमें मर्दन करके फिर अडूसे और दाखके क्वाथमें घोटे । पश्चात् विदारीकंदके रसमें एक दिन तक खरल करके २-२ रत्तीकी गोली बना लेवे । घी और सहतके साथ इस औषधिके भक्षण करनेसे अत्यंत दुस्तर वातरोग, पित्तरोग, क्षय, भ्रम, मत्तता, कफज शोथ, दाह और तृषारोग नष्ट होते हैं । इसका सेवन करके ऊपरसे सफेद चंदन और कपूरको भक्षण करे । इसको गगनादिवटी कहते हैं ॥ ७१ ॥ ७२ ॥
भाषाटीकासहित । ( ३५९ ) सर्वाङ्गसुन्दर रस । शुद्धसूताभ्रताम्रायोहिङ्गुलं कार्षिकं समम् । गन्धकश्चैकभागः स्यात्सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ ७३ ॥ सप्तपर्णार्कस्नुक्क्षीरवासावातारिवारिणा । विषमुष्टिसमं सर्वं पेष्यं तद्गोलकीकृतम् ॥ ७४ ॥ विपचेद्वालुकायन्त्रे द्वियामान्ते समुद्धरेत् । पिप्पलीविषसंयुक्तो रसः सर्वाङ्गसुन्दरः ॥ सर्ववातविकारघ्नः सर्वशूलनिषूदनः ॥ ७५ ॥ पारा, अभ्रकभस्म, तांबाभस्म, लोहभस्म, सिंग्रफ और गंधक यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर सतोनेके दूध, आकके दूध, थूहरके दूध, अडूसेके रस और एरंडकी जड़के रसके द्वारा खरल करके उसमें समभाग कुचला मिलावे । फिर खरल करते करते जब खूब गाढ़ा होजाय तब गोलासा बना लेवे । फिर इसको दो प्रहरतक बालुकायंत्रमें पकावे । शीतल होनेपर फिर उसमें पीपलका चूर्ण १ कर्ष और विष १ कर्ष मिलावे । इस औषधिको यथोचित मात्रानुसार यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारके वातरोग और सर्व प्रकारके शूल नष्ट होते हैं । इसको सर्वांगसुन्दर रस कहते हैं ॥ ७३-७५ ॥ तालकेश्वर रस । एकभागो रसस्य स्याच्छुद्धस्तालैकभागिकः । अष्टौ स्युर्विजयायाश्च गुटिकां गुडतश्चरेत् ॥ ७६ ॥ ऐकैकां भक्षयेत्प्रातश्छायायामुपवेशयेत् । तालकेश्वरनामायं रोगश्चास्पर्शनाशनः ॥ ७७ ॥ रससिन्दूर १ भाग, हरिताल १ भाग, भांगका चूर्ण ८ भाग लेवे और सब औषधियोंसे दुगुना पुराना गुड़ लेवे । इसकी गोली बना-
( ३६० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कर प्रातःकाल भक्षण करे और छायामें विश्राम करे । इसके सेवन करनेसे स्पर्शज्ञानकी हीनता दूर होती है । इसको तालकेश्वर रस कहते हैं ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ महाराजेश्वर रस । रसभस्म लौहमभ्रं सिंदूरं स्वर्णभस्मकम् । प्रवालं रजतं कांस्यं तालकं च समं समम् ॥ ७८॥ आर्द्रकस्वरसेनैव त्रिदिनं मर्दयेद्भिषक् । ततश्चतुष्टयं यामं पुटं दद्याद्गजाव्हये ॥ ७९ ॥ ततः समुद्धतं चैतद् वाटचालकरसेन च । मर्दयित्वा वटी कार्या त्रिगुञ्जाफलसन्निभा ॥ ८० ॥ बहुदोषान्वितं वातं रक्तेन सह मूर्च्छितम् । एतान्सर्वान्निहन्त्याशु वातपित्तकफोत्थितान् ॥८१॥ रससिन्दूर, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, स्वर्णसिन्दूर, सोनेकी भस्म, मूंगाभस्म, रूपाभस्म, कांसाभस्म और हरिताल यह सब औषधि समान भाग लेकर अदरखके रसमें तीन दिन तक खरल करके चार प्रहरतक गजपुटमें पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब निकाल कर खिरेंटीके रसमें खरल करके तीन तीन रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे बहुत दोषयुक्त वातरोग, रक्तवात, वातपित्त और कफज रोग नष्ट होते हैं ॥ ७८-८१ ॥ वातकेशरी रस । शिलायां निगुंडं नागं ताप्यं भस्मार्द्धभागिकम् । पादं पादं क्षिपेद्भस्म शुद्धस्य विमलस्य च ॥८२॥ कान्ताभ्रसत्त्वयोश्चापि स्फटिकस्य पृथक् पृथक् । सर्वमेकत्र सञ्चूर्ण्य पुटेत्त्रिफलवारिणा ॥ ८३ ॥
भाषाटीकासहित । ( ३६१ ) त्रिंशद्वनोपलेनैव त्रिंशद्वारं विचूर्णयेत् । व्योषवल्कलचूर्णैश्च समांशैः सह लेहयेत् ॥ ८४ ॥ मध्वाज्यसहितं हन्ति प्रलीढं वल्लमात्रया । अशीतिवातजान्रोगान्धनुर्वातं विशेषतः ॥ ८५ ॥ कफरोगानशेषांश्च मूत्ररोगांश्च सर्वशः । कासं श्वासं पाण्डुरोगं श्वयथुं सूतिकामयम् ॥ ८६ ॥ ग्रहणीमामदोषं च वह्निमान्द्यं मृदुज्वरम् । सर्वान् रोगांश्च दोषांश्च नाशयेदनुपानतः ॥ ८७ ॥ सीसेकी भस्म १ भाग, सोनामाखी आधा भाग, शुद्ध रूपामाखी, कांतलोह, अभ्रक और स्फटिककी भस्म यह प्रत्येक औषधि सीसेसे चौथाई भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र त्रिफलेके रसमें खरल करके पुटमें पकावे । इसप्रकार तीस बार त्रिफलेके रसमें खरल करके तीस बार पुटके द्वारा पकावे । पश्चात् चूर्ण करके दो रत्ती परिमाण लेकर दो रत्ती परिणाम त्रिकुटे और दालचीनीके चूर्णके साथ सेवन करे । सहत और घृतमें मिलाकर चाटनेसे अस्सी प्रकारके वातरोग, धनुर्वात, बहुत प्रकारके कफज रोग, सर्व प्रकारके मूत्ररोग, खाँसी, श्वास, क्षय, पांडु, शोथ, सूतिका, संग्रहणी, आमदोष, मंदाग्नि और मन्दज्वर नष्ट होते हैं । इसको भिन्न भिन्न अनुपानोंके साथ सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग और सर्व प्रकारके दोष दूर होते हैं । इसको वातकेशरी रस कहते हैं ॥ ८२-८७ ॥ त्रैलोक्यचिन्तामणि रस । हीरं सुवर्णं सुमृतञ्च तारमेषां समं तीक्ष्णरजश्चतु- र्णम् । समं मृताभ्रं रससिन्दुरञ्च निष्पिष्टतीक्ष्णस्य तथाश्मनो वा ॥ ८८ ॥ खल्ले द्रवेणैव कुमारिकाया गुञ्जाप्रमाणां वटिकां प्रकुर्यात् । त्रैलोक्यचिन्ता-
( ३६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मणिरेष नाम्ना संपूज्य सम्यग्गिरिजां दिनेशम् ॥ ॥ ८९ ॥ हन्त्यामयान्योगशतैर्विवर्ज्यामयप्रणाशाय मुनिप्रणीतः । अस्य प्रसादेन गदानशेषाञ्जरां विनिर्जित्य सुखं विभाति ॥ ९० ॥ हीराभस्म, सोनाभस्म और चाँदीभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, तीक्ष्ण लोहभस्म ३ भाग, अभ्रकभस्म ६ भाग, और रस- सिन्दूर ६ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके लोह अथवा पत्थरके खरलमें घीक्वारके रसके द्वारा खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । पार्वती और सूर्यदेवकी पूजा करके इस औषधिका सेवन करना आरम्भ करे । जो रोग सैकड़ों औषधियोंके सेवन करनेसे भी शांत नहीं होते उन समस्त रोगोंको शमन करनेके लिये यह औषधि मुनिजनोंने कही है । इस औषधिके प्रभावसे मनुष्योंके समस्त रोग और वृद्धता नष्ट होकर सुखकी वृद्धि होती है ॥ ८८–९० ॥ स्निग्धे श्लेष्मण्यार्द्रकस्य रसेन पाययेत्सुधीः । शुष्के च माक्षिकेणैव पित्ते घृतसितायुतम् ॥९१॥ श्लेष्मणि मारुते सम्यग्दुष्टे च समतां गते । कणाचूर्णं क्षौद्रयुतं प्रमेहे दुग्धसंयुतम् ॥ ९२ ॥ बलवर्णाग्निजननः कासघ्नः कफवातजित् । आयुःपुष्टिकरो वृष्यः सर्वरोगनिषूदनः ॥ ९३ ॥ इति वातव्याध्यधिकारः । जो कफकी स्निग्धता हो तो अदरखके रसके साथ, कफ शुष्क ( खुश्क ) होय तो सहतके साथ, पित्तयुक्त वातरोगमें घृत और मिश्रीके साथ, कफाश्रित वायुमें और जो वायु अच्छे प्रकारसे दूषित होकर चिकित्सासे शमन नहीं होती ऐसी वायुमें पीपलके चूर्ण और