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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

भाषाटीकासहित । ( ३७७ ) अन्य योग-शिलाजीत और गूगल अथवा पीपल और सोंठके चूर्ण- को गोमूत्रके साथ अथवा दशमूलके काथके साथ सेवन करनेसे ऊरु- स्तम्भ रोग नष्ट होता है । प्लीहाधिकारोक्त वारिशोषण रस अथवा अन्यान्य योगवाही रस भी इसमें प्रयुक्त करने चाहिये ॥ ४ ॥ ५ ॥ इति ऊरुस्तम्भचिकित्सा । अथ आमवाताधिकार । आमवातारी वटिका । रसगन्धकलौहाभ्रं तुत्थं टङ्कणसैन्धवम् । समभागं विचूर्ण्याथ चूर्णाद्विगुणगुग्गुलुः ॥ १ ॥ गुग्गुलोः पादिकं देयं त्रिवृतामूलवल्कलम् । तत्समं चित्रकं देयं घृतेन परिमर्द्दयेत् ॥ २ ॥ खादेन्माषद्वयञ्चास्य त्रिफलाचूर्णयोगतः । आमवातारिवटिका पाचिका भेदिका मता ॥ ३ ॥ आमवातं निहन्त्याशु गुल्मशूलोदराणि च । [L16

( ३७८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । परिमाण औषधियोंको एकत्र त्रिफलेके चूर्णके साथ सेवन करे । यह औषधि पाचक, भेदक तथा आमवात, गुल्म, शूल, उदर, यकृत, प्लीहोदर, अष्ठीला, कामला, पांडु, अरुचि, ग्रन्थिशूल, शिरःशूल, वातरोग, गृध्रसी, गलगण्ड, गण्डमाला, क्रिमि, कुष्ठ, भगन्दर, विद्रधि, अन्त्रवृद्धि, बवासीर और समस्त गुदाके रोगोंको नष्ट करती है। इसको आमवातारी वटिका कहते हैं ॥ १-६ ॥ अपर आमवातारी वटिका । रसगन्धौ वरा वह्निर्गुग्गुलुः क्रमवर्द्धितः । एतदेरण्डतैलेन मर्दयेदतिचिक्कणम् ॥ ७ ॥ कर्षोऽस्यैरण्डतैलेन हन्त्युष्णजलपायिनः । आमवातमतीवोग्रं दुग्धं मौद्गादि वर्जयेत् ॥ ८ ॥ पारा १ भाग, गंधक २ भाग, त्रिफला प्रत्येक तीन भाग, चीतेकी जड़ ४ भाग और गूगल ५ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर एरण्डके तेलमें खरल करके १तोला परिमाण औषधि अण्डीके तेलके साथ सेवन करे और ऊपरसे गरम जलका अनुपान करे तो अत्यन्त उग्र आमवात रोग नष्ट होता है । इस औषधिपर दूध और मूंग आदि भक्षण करना त्याग देवे, इसको आमवातारी वटिका कहते हैं ॥७॥८॥ आमवातेश्वर रस । शुद्धगन्धं पलार्द्धञ्च मृतताम्रञ्च तत्समम् । ताम्रार्द्धं पारदं शुद्धं रसतुल्यं मृतायसम् ॥ ९ ॥ सर्वं पञ्चांगुलेनैव भावयेच्च पुनः पुनः । संचूर्ण्य पञ्चकोलोत्थैः क्वाथैः सर्वं विभावयेत् ॥१०॥ रौद्रे विंशतिवारांश्च गुडूचीनां रसैर्दश । भृष्टटङ्गणचूर्णेन तुल्येन सह मेलयेत् ॥ ११ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३७९ ) टङ्कणार्द्धं विडं देयं मरिचं विडतुल्यकम् । तिन्तिडी क्षारतुल्यञ्च सूततुल्यञ्च दंतिकम् ॥ १२॥ त्रिकटुतित्रिफलश्चैव लवङ्गश्चार्द्धभागिकम् । आमवातेश्वरो नाम विष्णुना परिकीर्त्तितः ॥ १३ ॥ महाग्निकारको ह्येष आमवातान्तको मतः । स्थूलानां कर्षणः श्रेष्ठः कृशानां स्थौल्यकारकः १४ अनुपानविशेषेण सर्वरोगविनाशनः । अनेन सदृशो नास्ति वह्निदीप्तिकरो महान् ॥ गुल्मार्शोग्रहणीदोषशोथपाण्डुरुजापहः ॥ १५ ॥ शुद्ध गंधक २ तोले, तांबाभस्म २ तोले, पारा १ तोला, लोहभस्म १ तोला इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर एरंडकी जड़के रसमें सात वार भावना देकर पश्चात् पंचकोलके क्वाथमें बीस वार भावना देवे और गिलोयके रसमें दश वार भावना देवे । पश्चात् इसमें सुहागा ६ तोला, विडनमक ३ तोला, काली मिरच ३ तोला, इमलीका खार ३ तोला, दंतीके बीज १ तोला तथा सोंठ, पीपल, काली मिरच, हरड़, बहेड़ा, आमला और लौंग यह प्रत्येक औषधि छः छः मासे लेकर अच्छे प्रकारसे खरल कर यह औषधि सेवन करनेसे अत्यन्त अग्निको दीप्त करनेवाली, आमवातनाशक, स्थूल मनुष्योंको कृश करने- वाली, कृश मनुष्योंको स्थूल करनेवाली और अनुपान विशेषसे सर्व- रोगनाशक है। इसकी समान अग्निको दीप्त करनेवाली अन्य औषधि नहीं है । इससे गुल्म, बवासीर, संग्रहणी, शोथ और पांडुरोग नष्ट होते हैं । इस आमवातेश्वर रसको स्वयं विष्णु भगवान्ने कहा है ॥ ९-१५ ॥ वृद्धदाराद्य लोह । वृद्धदारत्रिवृद्दन्तीगजपिप्पलिमानकैः । त्रिकत्रयसमायुक्तैरामवातान्तकन्त्वयः ॥ सर्वानैव गदान् हन्ति केशरी करिणो यथा ॥१६॥

( ३६० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विधारेके बीज, निसोधकी जड़, दंतीकी जड़, गजपीपल, मानकंद, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रक, नागरमोथा और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहभस्म १४ भाग लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग नष्ट होते हैं ॥ १६ ॥ शिवागुग्गुलु । शिवाविभीतामलकीफलानां प्रत्येकशो मुष्टि- चतुष्टयञ्च । तोयाढके तत्कथितं विधाय पादाव- शेषे त्ववतारणीयम् ॥ १७॥ एरण्डतैलं द्विपलं निधाय पिचुत्रयं गन्धकनामकस्य। पचेत्पुरस्यात्र पलद्वयञ्च पाकावशेषे च विचूर्ण्य दद्यात् ॥१८॥ रास्ना विडंगं मरिचं कणा च दन्ती जटा नागर- देवदारु । प्रत्येकशः कोलमितं तथैषां विचूर्ण्य निःक्षिप्य नियोजयेच्च ॥ १९ ॥ आमवाते कटी- शूले गृध्रसीक्रोष्टुशीर्षके । न चान्यदस्ति भेषज्यं यथाऽयं गुग्गुलुः स्मृतः ॥ २० ॥ हरड़ १६ तोले, बहेड़ा १६ तोले, आमले १६ तोले परिमाण लेकर ८ सेर जलमें पकावे, जब पकते पकते जल चौथाई भाग बाकी रह जाय तब उतारकर छान लेवे । फिर इस क्वाथमें दो पल एरंडीका तेल, गंधक ३ तोले और गूगल २ पल डालकर मंद मंद अग्निसे पकावे । जब पाक समाप्त हो जाय तब इसमें रास्नाका चूर्ण, वायविडं- गका चूर्ण, काली मिरचोंका चूर्ण, पीपलका चूर्ण, दंतिमूल, सोंठका चूर्ण और देवदारुका चूर्ण प्रत्येक एक एक तोला डालकर उतार लेवे । आमवात, कटीशूल, गृध्रसी और क्रोष्टुशीर्षक प्रभृति रोगोंका नाशक इसके समान अन्य औषधि नहीं है ॥ १७-२० ॥

भाषाटीकासहित । ( ३८१ ) आमवातगजसिंह मोदक । शुण्ठीचूर्णस्य प्रस्थैकं यमान्याश्च पलाष्टकम् । जीरकस्य पले द्वे च धन्याकञ्च पलद्वयम् ॥ २१ ॥ पलैकं शतपुष्पाया लवङ्गस्य पलं तथा । टङ्गणस्य पलं भृष्टं मरिचस्य पलत्रयम् ॥ २२ ॥ त्रिवृतात्रिफलाक्षारपिप्पलीनां पलं तथा । शट्चेला तेजपत्रञ्च चविकानां पलन्तथा ॥ २३ ॥ अभ्रं लौहं तथा वंगं प्रत्येकञ्च पलं पलम् । एतेषां सर्वचूर्णानां खण्डं दद्याद्गुणत्रयम् ॥ २४ ॥ घृतेन मधुना मिश्रं कर्षमात्रन्तु मोदकम् । एकैकं भक्षयेत्प्रातर्घृतञ्चानुपिबेत्पयः ॥ २५ ॥ शूलघ्नो रक्तपित्तघ्नश्चाम्लपित्तविनाशनः । आमवातकुलध्वंसी केशरी विधिनिर्मितः ॥ २६ ॥ सोंठका चूर्ण १ प्रस्थ, अजवायनका चूर्ण आठ पल, जीरेका चूर्ण २ पल, धनियेका चूर्ण २ पल, सौंफका चूर्ण १ पल, लौंगका चूर्ण १ पल, सुहागा १ पल, काली मिरचोंका चूर्ण ३ पल, निसोथका चूर्ण १ पल, हरड़का चूर्ण १ पल, बहेड़ेका चूर्ण १ पल, आमलेका चूर्ण १ पल, जवाखार १ पल, पीपलका चूर्ण १ पल, कचूर १ पल, इलायचीका चूर्ण १ पल, तेजपातका चूर्ण १ पल, चव्यक चूर्ण १ पल, अभ्रकभस्म १ पल, लोहाभस्म १ पल और वंगभस्म १ पल लेवे और सब औषधिसे तिगुनी स्वच्छ खांड लेवे, सब औष- धियोंको एकत्र पीसकर घृत और सहत मिलाकर एक एक कर्षके मोदक बना लेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल इस एक मोदकको भक्षण करे और ऊपरसे घृत और दूधका अनुपान करे । इन मोदकोंके

( ३८२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सेवन करनेसे शूल, रक्तपित्त, अम्लपित्त और आमवात रोग नष्ट होते हैं । इस आमवातगजसिंह मोदकको ब्रह्माने कहा है ॥२१-२६॥ रामबाणो रसो देयो योगवाहिरसेन्द्रकाः । आमवाते विधीयन्ते सानुपानैः प्रयत्नतः ॥ २७॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे आमवाताधिकारः । आमवात रोगमें रामबाण रस अथवा और भी योगवाही रसोंका उचित अनुपान या आमवातनाशक औषधियोंके क्वाथसे प्रयोग करना चाहिये ॥ २७ ॥ इति आमवातचिकित्सा । अथ शूलरोगचिकित्सा । सप्तामृत लोह । मधुकं त्रिफलाचूर्णमयोरजः समं लिहन् । मधुसर्पिर्युतं सम्यक् गव्यक्षीरं पिबेदनु ॥ १ ॥ छर्दिं सतिमिरं शूलमम्लपित्तं ज्वरारुचिम् । मूत्रकृच्छ्रं तथा मेह हन्यादेतन्न संशयः ॥ २ ॥ मुलैठी, त्रिफला और लोहभस्मका चूर्ण इन औषधियोंको समान भाग लेकर घृत और सहतमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे गायका दूध पीवे । इसके सेवन करनेसे वमन, तिमिर रोग, शूल, अम्लपित्त, ज्वर, अरुचि, मूत्रकृच्छ्र और प्रमेह रोग नष्ट होते हैं । इसको सप्तामृत लोह कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ त्रिफला लोह । तीक्ष्णायश्चूर्णसंयुक्तं त्रिफलाचूर्णमुत्तमम् । क्षीरेण पाययेद्धीमान्सद्यः शूलनिवारणम् ॥ ३ ॥ तीक्ष्ण लोहेका चूर्ण और त्रिफलेका चूर्ण दोनोंको खरल करके दूधके साथ सेवन करनेसे शूलरोग शांत होता है । इसको त्रिफला लोह कहते हैं ॥ ३ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३८३ ) चतुःसम लोह । अभ्रं ताम्रं रसं लौहं गन्धकं संस्कृतं पलम् । सर्वमेतत्स माहृत्य यत्नतः कुशलो भिषक् ॥ ४ ॥ आज्ये पले द्वादशके दुग्धे वत्सरसंख्यके । पक्त्वा तत्र क्षिपेच्चूर्णं सुपूतं घनवाससा ॥ ५ ॥ विडङ्गत्रिफलावह्नित्रिकटूनां तथैव च । पिष्ट्वा पलोन्मितानेतानथ संमिश्रितान्नयेत् ॥ ६ ॥ ततः पिष्ट्वा शुभे भाण्डे स्थापयेच्च विचक्षणः । आत्मनः शोभने चाह्नि पूजयित्वा रविं गुरुम्॥७॥ घृतेन मधुनालोड्य भक्षयेन्माषकादिकम् । अष्टौ माषान् क्रमेणैव वर्द्धयेच्च समाहितः ॥ ८ ॥ अनुपानं प्रयोक्तव्यं नारिकेलजलं पयः । जीर्णे लोहितशाल्यन्नं मुद्गमांसरसं तथा ॥ ९ ॥ भक्षयेद् घृतसंयुक्तं सद्यः शूलाद्विमुच्यते । हृच्छूलं पार्श्वशूलञ्च आमवातं कटिग्रहम् ॥ गुल्मशूलं शिरःशूलं योगेनानेन नाशयेत् ॥ १० ॥ अभ्रकभस्म, तांबाभस्म, पाराभस्म, लोहाभस्म और गन्धक यह प्रत्येक औषधि एक एक पल लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके बारह पल घृत और बारह पल दूधमें मिलाकर पकावे । जब पाक समाप्त होजाय तब वायविडंग, त्रिफला, चित्रक और त्रिकुटा इन सब द्रव्योंका चूर्ण प्रत्येक ४-४ तोला डालकर उतार लेवे । फिर इसको एक उत्तम चिकने बासनमें भरकर रख देवे । पश्चात् जिस दिन अपनेको चन्द्रमादि उत्तम हों उस दिन सूर्य और बृहस्पतिकी

( ३८४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पूजा करके घृत और सहतमें मिलाकर एक मासे परिमाण इस औष- धिको भक्षण करे और फिर प्रतिदिन एक एक मासे बढ़ाता जाय; जब आठ मासे पर्यंत हो जाय तब आगेको मात्रा नहीं बढ़ावे । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें नारियलका जल और गायका दूध पीवे । जब औषधि जीर्ण हो जाय तब लाल रंगके शालि चावलोंका भात, मूंगका यूष और मांसयूष घृतके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे शूलरोग, हृदयशूल, पार्श्वशूल, आमवात, कटिपीड़ा, गुल्मशूल, और शिरःशूल नष्ट होते हैं । इसको चतुःसम लोह कहते हैं॥४-१०॥ पञ्चात्मक रस । मृतसूताभ्रकं चाम्लवेतसं ताम्रगन्धकम् । विषं फलत्रयाच्चूर्णं तुल्यं मर्द्यं दिनावधि ॥ ११ ॥ जयन्ती मुण्डिरी वासा बृहती च गुडूचिका । महाराष्ट्री जम्बुरसैस्तथा नीलोत्पलस्य च ॥१२॥ प्रतिद्रावैर्दिनं भाव्यं ततः संशोष्य यत्नतः । अर्द्धांशं पञ्चलवणं दत्त्वार्द्रकरसेन च ॥ १३ ॥ दिनं पेष्यं ततः कुर्याद्वटिकां चणसन्निभाम् । प्रातर्मध्याह्ने रात्रौ च भक्षयेद्वटिकात्रयम् ॥१४॥ माषेक्षुपिष्टगुर्वन्नं गोपयश्च हितं तथा । सेवेत वातशूलार्त्तश्चायं पञ्चात्मकः स्मृतः ॥ १५ ॥ पारेकी भस्म, अभ्रकभस्म, अम्लवेत, तांबेकी भस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध विष और त्रिफला यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर सबको एकत्र पीसकर जयंती, गोरखमुण्डी, अडूसा, कटेरी, गिलोय, भारंगी, जामुनकी छाल और नील कमल इन प्रत्येकके रसके द्वारा एक एक भावना देकर और सब औषधियोंसे आधे भाग पांचों लवण

भाषाटीकासहित । ( ३६५ ) मिलाकर अदरखके रसमें एक दिन खरल करके चनेकी बराबर गोली बना लेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल, मध्याह्नके समय और रात्रिके समय एक एक करके तीन गोली भक्षण करे । ऊपरसे उड़द, इख, पिष्टक ( पक्वान्न ), भारी पदार्थ और गोदूध सेवन करे । यह औषधि वात- शूलसे पीड़ित रोगीके लिये अतीव हितकारी है । इसको पञ्चात्मक रस कहते हैं ॥ ११-१५ ॥ धात्रीलोह । कुडवं शुद्धमण्डूरं यवञ्च कुडवन्तथा । पाकार्थञ्च जलं प्रस्थं चतुर्भागावशेषितम् ॥ १६ ॥ शतावरीरसस्याष्टावामलक्या रसस्य च । तथा दधि पयो भूमिकूष्माण्डस्य चतुःपलम् ॥ १७॥ चतुःपलमिक्षुरसं दद्यात्तत्र विचक्षणः । प्रक्षिपेज्जीरकं धान्यं त्रिजातं कारिपिप्पली ॥ १८ ॥ मुस्तं हरीतकी चैव अभ्रं लौहं कटुत्रयम् । रेणुका त्रिफला चैव तालीशं स्वर्णकेशरम् ॥ १९ ॥ कटुकं मधुकं रास्ना चाश्वगन्धा च चन्दनम् । एतेषां कार्षिकं भाग चूर्णयित्वा विनिःक्षिपेत् ॥२०॥ शुद्ध मण्डूर एक कुड़व परिमाण और जौ एक कुड़व परिमाण ले दोनोंको एकत्र कर आठगुने जलम पकावे । जब पकते पकते जल चौथाई भाग बाकी रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर इस क्वाथमें सतावरका रस आठ पल, आमलोंका रस आठ पल, दही आठ पल, दूध आठ पल, विदारीकंद ४ पल और ईखका रस ४ पल डालकर मंद मंद अग्निसे पकावे । जब पाक होजाय तब जीरा, धनियां, दाल- चीनी, इलायची, तेजपात, गजपापल, नागरमोथा, हरड़, अभ्रक- भस्म, लोहभस्म, सोंठ, मिरच, पीपल, रेणुका, हरड़, बहेड़ा, आमला,

( ३८६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । तालीशपत्र, नागकेशर, कुटकी, मुलैठी, रास्ना, असगंध और लाल- चंदन इन प्रत्येकका चूर्ण एक एक कर्ष डालकर पकावे ॥ १६-२० ॥ भोजनाद्यवसाने च मध्ये चैव समाहितः । तोलैकं भक्षयेन्नित्यमनुपानं पयस्तथा ॥ २१ ॥ शूलमष्टविधं हन्ति साध्यासाध्यमथापि वा । वातिकं पैत्तिकञ्चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् ॥२२॥ परिणामसमुत्थञ्च अन्नद्रवभवं तथा । सर्वशूलहरं श्रेष्ठं धात्रीलौहमिदं शुभम् ॥ २३ ॥ इसमेंसे एक तोला औषधि लेकर प्रतिदिन भोजनके आदि, भोज- नके अंत और भोजनके मध्यमें सेवन कराकर दूध पान करावे । इस औषधिके सेवन करनेसे वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज, परिणामज, अन्नद्रवप्रभृति आठ प्रकारका शूल, साध्यासाध्य शूल और सब प्रका- रके शूलरोग नष्ट होते हैं । इसको धात्रीलोह कहते हैं ॥ २१-२३ ॥ शूलराजलोह । कर्षैकं कान्तलौहस्य शुद्धाभ्रस्य पलन्तथा । सितायाश्च पलञ्चैकं मधुसर्पिस्तथैव च ॥ २४ ॥ सर्वमेकीकृतं पात्रे लौहदण्डेन मर्दयेत् । त्रिकटु त्रिफला मुस्तं विडङ्गं चव्यचित्रकम् ॥ २५ ॥ प्रत्येकं तोलकं मानं चूर्णितं तत्र दापयेत् । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय शिशिराम्ब्वनुपानतः ॥ २६ ॥ सर्वदोषभवं शूलं कुक्षिशूलञ्च यद्भवेत् । हृच्छूलं पार्श्वशूलञ्च अम्लपित्तञ्च नाशयेत् ॥२७॥ अर्शांसि ग्रहणीदोषं प्रमेहांश्च विषूचिकाम् । शूलराजमिदं लौहं हरेण परिनिर्मितम् ॥ २८ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३८७ ) कान्तलोहभस्म १ कर्ष, अभ्रक १ पल, मिश्री १ पल, सहत १ पल और घृत १ पल इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर लोहेके डंडेसे खरल करे । फिर त्रिकुटेका चूर्ण ३ तोले, त्रिफलेका चूर्ण ३ तोले, नागरमोथेका चूर्ण एक तोला, वायविडंगका चूर्ण १ तोला, चव्यका चूर्ण १ तोला और चीतेकी जड़का चूर्ण १ तोला मिलावे । प्रतिदिन प्रातःकाल शीतल जलके साथ भक्षण करनेसे त्रिदोषज शूल, कटिशूल, हृदयशूल, पार्श्वशूल, अम्लपित्त, बवासीर, प्रमेह और विसूचिकारोग नष्ट होते हैं । यह शूलराज लोह महादेवने कहा है ॥ २४-२८ ॥ विद्याधराभ्र रस । विडङ्गमुस्तत्रिफलागुडूची दन्ती त्रिवृद्वह्निकटुत्र- यञ्च । प्रत्येकमेषां पिचुभागचूर्णं पलानि चत्वार्य- यसो मलस्य ॥ २९ ॥ गोमूत्रशुद्धस्य पुरातनस्य यद्वायसस्तानिश्शिवाटिकायाः । कृष्णाभ्रचूर्णस्य पलं विशुद्धं निश्चन्द्रकं शुद्धमतीव सूतात् ॥ ३० ॥ पादोनकर्षं स्वरसेन खल्ले शिलातले थानकुनी- दलस्य । संमर्द्य पश्चादतिशुद्धगन्धपाषाणचूर्णेन पिचुन्मितेन ॥३१॥ युक्त्या ततः पूर्वरजांसि दत्त्वा सर्पिर्मधुभ्यामवमर्द्य यत्नात् । निधापयेत्स्निग्ध- विशुद्धभाण्डे ततः प्रयोज्योऽस्य रसायनस्य॥३२॥ प्राङ्माषको वाप्यथवा द्वितीयो गव्यं पयो वा शिशिरं जलं वा । पिबेदयं योगवरः प्रभूतकाल- प्रनष्टानलदीपकश्च ॥ ३३ ॥ गोरखमुंडीके पत्तोंके रसके द्वारा शुद्ध किया हुआ पारा ९ मासे और शुद्ध गन्धक १ कर्ष लेवे । दोनोंको एकत्र खरल करके कज्जली

( ३८८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । बना लेवे, फिर उसमें वायविडंग, नागरमोथा, त्रिफला, गिलोय, दन्ती, निसोथकी जड़, चित्रककी जड़ और त्रिकुटा इन प्रत्येक औषधियोंका चूर्ण एक एक कर्ष परिमाण, गोमूत्रमें शुद्ध किया हुआ पुराना मंडूर भस्म ४ पल, लोहाभस्म ४ पल और कृष्णाभ्रक १ पल इन सब औषधियोंको एकत्र कर सहत और घृतमें मर्दन करके चिकने बासनमें भरकर रख देवे । इस औषधिको एक मासे अथवा दो मासे परि- माण लेकर सेवन करके ऊपरसे गायका दूध अथवा शीतल जलका अनुपान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे बहुत कालकी नष्ट हुई अग्नि फिर दीपन हो जाती है ॥२९-३३॥ रोगं निहन्यात्परिणामशूलं शूलं तथान्नद्रवसंज्ञकं च । यक्ष्माम्लपित्तं ग्रहणीं प्रवृद्धां जीर्णज्वरं लोहितपित्तकञ्च ॥ नश्यन्ति ते यान्न निहन्ति रोगान् योगोत्तमः सम्यगुपास्यमानः ॥ ३४ ॥ परिणामशूल, अन्नद्रव शूल, राजयक्ष्मा, अम्लपित्त, संग्रहणी, जीर्णज्वर और रक्तपित्त रोग दूर होते हैं । सैकड़ों उत्तम औषधियोंके सेवन करनेसे भी जो रोग नष्ट नहीं होते वह रोग इस औषधिके सेवन करनेसे अवश्य नष्ट हो जाते हैं । इसको विद्या- धराभ्र रस कहते हैं ॥ ३४ ॥ बृहद्विद्याधराभ्र । शुद्धसूत तथा गन्धं फलत्रयकटुत्रयम् । विडङ्गमुस्तकञ्चैव त्रिवृतादन्तिचित्रकम् ॥ ३५ ॥ आखुपर्णी ग्रन्थिकञ्च प्रत्येकं कर्षसम्मितम् । पलं कृष्णाभ्रचूर्णस्य मृतायश्च चतुर्गुणम् ॥ ३६ ॥ घृतेन मधुना पिष्ट्वा वटिकां कोलसम्मिताम् । एकैकां वटिकां खादेत्प्रातरुत्थाय नित्यशः ॥ ३७ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३८९ ) अनुपानं गवां क्षीरं नीरं वा नारिकेलजम् । सर्वशूलं निहन्त्याशु वातपित्तभवं तथा ॥ ३८ ॥ एकजं द्वन्द्वजञ्चैव तथैव सान्निपातिकम् । परिणामोद्भवं शूलमामवातोद्भवं तथा ॥ ३९ ॥ कार्श्यं वैवर्ण्यमालस्यं तन्द्रारुचिविनाशनम् । साध्यासाध्यं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ४० शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, त्रिफला, त्रिकुटा, वायविडंग, नागरमोथा, निसोथकी जड़, दन्तीकी जड़, चित्रककी जड़, मूसाकानी और पीपला- मूल यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण, कृष्णाभ्रकभस्म १ पल और लोहभस्म ४ पल लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके घृत और सहतमें खरल करके बेरकी बराबर गोली बना लेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल एक गोली खाकर ऊपरसे गायका दूध अथवा नारियलका जल पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे वातपित्तज, एकदोषज, द्विदोपज, त्रिदोषज, परिणामजन्य और आमवातज शूल, कृशता, विवर्णता, आलस्य, तन्द्रा, अरुचि और अन्यान्य समस्त साध्यासाध्य रोग ऐसे नष्ट होते हैं जिसप्रकार सूर्योदयसे अन्ध- कारका समूह नष्ट होता है । इसको बृहद्विद्याधराभ्र कहते हैं ३५-४०॥ सर्वांगसुन्दर रस । शुद्धसूतं तथा ताम्रं शिलामाक्षिकतालकम् । रजतं स्वर्णवङ्गञ्च लौहमभ्रं सनागरम् ॥ ४१ ॥ चूर्णयेत्पञ्चलवणं देयं सर्वन्तु तुल्यकम् । गन्धकं मिश्रयेत्सर्वं रसैरेषां विभावयेत् ॥ ४२ ॥ शुण्ठीजयन्तीविजयामहाराष्ट्रिकधूर्तजैः । सर्वाङ्गसुन्दरो नाम्ना रसोऽयं विष्णुनिर्मितः ॥ ४३ ॥

( ३९० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । खादेदेरण्डशुण्ठीभ्यां माषमात्रं दिने दिने । कफवातामयं हन्ति चानुपानं वदाम्यहम् ॥ ४४ ॥ व्योषं सौवर्चलं हिङ्गु करञ्जबीजसंयुतम् । पिबेदुष्णाम्बुना चानु सर्वशूलनिकृन्तनम् ॥ ४५ ॥ शुद्ध पारा, तांबाभस्म, मैनशिल, सोनामाखीभस्म, हरिताल- भस्म, चांदीकी भस्म, सोनाभस्म, वंगभस्म, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, सोंठ, पांचों लवण और गंधक यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर सोंठके क्वाथ, जयंतीके पत्तोंका रस और भांगके पत्तोंका रस, भारंगीकी जड़का रस और धतूरेके पत्तोंका रस इनमें अलग अलग सात भावना देकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । अंडीके तेल और सोंठके चूर्णके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे कफज और वातज व्याधि शमन होती हैं । इसके सेवन करनेके अन्तमें त्रिकुटा, काला नमक, हींग और करंजके बीज इनको बराबर भाग लेकर गरम जलके साथ सेवन करनेसे सर्व प्रकारका शूल नष्ट होता है । इस सर्वांगसुन्दर रसको स्वयं विष्णु भगवान्ने कहा है ॥ ४१-४५ ॥ शूलवज्रिणी वटिका । रसगन्धकलोहानां पलार्द्धेन समन्वितम् । त्रिफला रामठं शुल्वं शटी त्रिकटु टङ्कणम् ॥४६॥ पत्रं त्वगेलातालीशजातीफललवङ्गकम् । यमानी जीरकं धान्यं प्रत्येकं तोलकं शुभम् ॥ ४७॥ माषैका वटिका कार्या छागीदुग्धेन वा पुनः। एकैका भक्षिता चेयं वटिका शूलवज्रिणी ॥ ४८॥ शूलमष्टविधं हन्ति प्लीहगुल्मोदरं तथा । अम्लपित्तामवातञ्च पाण्डुत्वं कामलां तथा ॥४९ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३९१) शोथं गलग्रहं वृद्धिं श्लीपदं सभगन्दरम् । वृद्धबालकरी चैव मन्दाग्नेरपि दीपनी ॥ ६० ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक और लोहभस्म यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले; त्रिफला, हींग, ताम्रभस्म, कचूर, त्रिकुटा, सुहागा, तेजपात, दारचीना, इलायची, तालीशपत्र, जायफल, लौंग, अजवायन, जीरा और धनियां यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र बकरीके दूधमें पीसकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । बकरीके दूधके साथ इनमेंसे एक एक गोली सेवन करनेसे आठ प्रकारका शूल, प्लीहा, गुल्म, उदर, अम्लपित्त, आम- वात, पांडु, कामला, शोथ, गलग्रह, वृद्धि, श्लीपद और भगन्दर रोग नष्ट होते हैं । यह औषधि वृद्धको बालकके समान करनेवाली और मन्दाग्निको दीपन करती है। इसे शूलवज्रिणीवटिका कहते हैं॥४६-६०॥ त्रिपुरभैरव रस । भागो रसस्याश्महेम्नो भागो ग्राह्योऽतियत्नतः । तयोर्द्वादश भागानि ताम्रपत्राणि लेपयेत् ॥ ६१ ॥ पचेच्छूलहरः सूतो भवेत्त्रिपुरभैरवः । माषो मध्वाज्यसंयुक्तो देयोऽस्य परिणामजे ॥ अन्ये त्वेरण्डतैलेन हिंगुत्रययुतो रसः ॥ ६२ ॥ शुद्ध पारा १ भाग और गंधक १ भाग दोनोंकी एकत्र कज्जली बनावे । फिर कज्जलीसे बारह गुने तांबेके पत्र लेकर उन पत्रोंपर उक्त कज्जलीका लेप करके मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । पश्चात् इसका चूर्ण बनाकर एक मासे परिमाण औषधि घृत और सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे परिणामशूल नष्ट होता है । कोई कोई वैद्य एरण्डीका तेल, हींग और त्रिकुटेके चूर्णके साथ इस औषधिके सेवन करनेकी व्यवस्था करते हैं ॥ ६१ ॥ ६२ ॥

( ३९२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । रसबलिगगनाकं वेतसाम्लं विषं स्यात्, सवरमिह पृथक्स्याद्भावयेद्द्रसमेतैः । कनकभुजगवल्लीकण्टकारीजयाद्भिः, कमलसलिलवासामुष्टिवज्राम्बुपूरैः ॥ ५३ ॥ अरुणसदृशपाकैर्मातुलुङ्गश्च योज्यः, पटुगण इह तुल्यो भावयेदार्द्रकाद्भिः । दहनवदननाम्ना वल्लमात्रो निहन्ति, प्रबलसकलशूलं तद्विकारानशेषान् ॥ ५४ ॥ पारा, गंधक, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म, अमलवेत, विष और त्रिफला यह सब औषधि समान भाग लेकर धतूरेके पत्ते, पान, कटेरी, भांग, कमल, सुगंधवाला, अडूसा, कुचिला, थूहर और बिजोरा नींबू इन प्रत्येकके रसके द्वारा एक एक भावना देकर फिर उसमें समान भाग लवणवर्ग मिलाकर अदरखके रसके द्वारा सात सात भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना ले

भाषाटीकासहित । (३९३) वचामरिचजं चूर्णं कर्षमुष्णजलैः पिबेत् । असाध्यं नाशयेच्छूलं श्रीशूलगजकेसरी ॥ ५८ ॥ शुद्ध पारा १ भाग और गंधक २ भाग दोनोंकी एकत्र कज्जली बना लेवे । पश्चात् तीन भाग तांबा लेकर उसका सम्पुट बनवाकर उसमें इस कज्जलीको भरकर पश्चात् एक हाँडीमें ४ तोले पिसा हुआ नमक बिछाकर उसमें इस मूसाको स्थापित करे और ऊपरसे एक पल परिमाण पिसा हुआ नमक बिछा देवे । पश्चात् गजपुटमें पकावे । जब स्वयं शीतल हो जाय तब मूसाको पीसकर बारीक चूर्ण कर लेवे । इसमेंसे नित्य दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर पानके रसमें मिलाकर खाये । इस औषधिके भक्षण करनेके पश्चात् हींग, सोंठ, जीरा, वच और काली मिरच यह सब समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके एक कर्ष परिमाण गरम जलके साथ सेवन करे । इससे सर्व प्रका- रका असाध्य शूलरोग नष्ट होता है । इसको श्रीशूलगजकेसरी रस कहते हैं ॥ ५५-५८ ॥ त्रिगुणाख्य रस । टङ्कणं हारिणं शृङ्गं स्वर्णं गन्धं मृतं रसम् । दिनैकमार्द्रकद्रावैर्मर्द्यं रुद्ध्वा पुटे पचेत् ॥ ५९ ॥ त्रिगुणाख्यो रसो ह्यस्य माषैकं मधुसर्पिषा । सैन्धवं जीरकं हिंगु मध्वाज्याभ्यां लिहेदनु ॥ पक्तिशूलहरः ख्यातो याममात्रान्न संशयः ॥६०॥ शुद्ध सुहागा, हिरनके सींगकी भस्म, सोनाभस्म, गंधक और रससिन्दूर यह सब औषधि समान भाग लेकर अदरखके रसमें एक दिन तक खरल करके पश्चात् मूसामें रखकर और अच्छे प्रकार कप- र्रौटीसे बंद करके पुटपाक करे । इसमेंसे एक मासे परिमाण औषधि लेकर सहत और घृतमें मिलाकर भक्षण करे । सेंधानमक, जीरा और

( ३९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । हींग इनको समान भाग लेकर सहत और घृतमें मिलाकर इस औष- धिके ऊपरसे भक्षण करे । इससे एक प्रहरमें परिणामशूल नष्ट होता है । इसको त्रिगुणाख्य रस कहते हैं ॥ ५९ ॥ ६० ॥ शूलहरणयोग । हरीतकी त्रिकटुकं कुचिला हिंगुसैन्धवम् । गन्धकञ्च समं सर्वं वटीं कुर्यात्सुखावहाम् ॥ ६१ ॥ लघुकोलप्रमाणान्तु शस्यते प्रातरेव हि । एकैका वटिका ग्राह्या गुल्मशूलविनाशिनी ॥ ६२ ॥ ग्रहण्यामतिसारे च सजीर्णे मन्दपावके । योजयेदुष्णपयसा सुखमाप्नोति निश्चितम् ॥ सुवर्णञ्च भवेद्देहं सदोत्साहयुतं नृणाम् ॥ ६३ ॥ हरड़, त्रिकुटा, कुचला, हींग, सेंधानमक और गंधक यह सब औषधि समान भाग लेकर जलमें पीसकर गोली बना लेवे । यह गोली छोटे बेरकी बराबर बनानी चाहिये । गुल्म और शूलरोग नष्ट करनेवाली यह गोली प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली खाये । ग्रहणी, अतिसार, अजीर्ण और मंदाग्नि प्रभृति रोगोंमें इसको गरम जलके साथ सेवन करे तो अवश्य आरोग्यता प्राप्त होती है । इसके सेवन करनेसे शरीरमें सुवर्णकी समान कांति उत्पन्न होती है । बल और उत्साहकी वृद्धि होती है । इसको शूलहरण योग कहते हैं ॥ ६१-६३ ॥ शर्करालोह । त्रिफलायास्तथा धात्र्याश्चूर्णं वा काललौहजम् । शर्कराचूर्णसंयुक्तं सर्वशूलेषु योजयेत् ॥ ६४ ॥ त्रिफलेका चूर्ण ३ भाग, आमलेका चूर्ण १ भाग, मिश्री १ भाग और लोहेका चूर्ण ५ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर सर्व- प्रकारके शूलरोगोंमें प्रयोग करे । इसको शर्करालोह कहते हैं ॥ ६४ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३९५ ) शंखादि चूर्ण । शंखचूर्णस्य च पलं पञ्चैव लवणानि च । क्षारं टंकणकं जाती शतपुष्पा यमानिका ॥ ६५ ॥ हिंगु त्रिकटुकञ्चैव सर्वमेकत्र चूर्णयेत् । आमवातं यकृच्छूलं परिणामसमुद्भवम् ॥ अन्नद्रवकृतं शूलं शूलञ्चैव त्रिदोषजम् ॥ ६६ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे शूलरोगाधिकारः । शंखका चूर्ण १पल, पांचों लवण ५ भाग, सुहागा १ पल, आम- लोंका चूर्ण १ पल, सौंफका चूर्ण १ पल, अजवायनका चूर्ण १ पल, हींग १ पल और त्रिकुटेका चूर्ण ३ पल लेवे। इन सबको एकत्र पीस- कर सेवन करनेसे आमवात, यकृत्, परिणाम शूल, अन्नद्रवशूल और त्रिदोषजशूल रोग नष्ट होते हैं। इसे शंखादि चूर्ण कहते हैं॥६५॥६६॥ इति शूलाधिकार समाप्त । अथ उदावर्त्तानाहरोगधिकार । वैद्यनाथवटी । पथ्या त्रिकटु सूतञ्च द्विगुणं कनकं तथा । थानकुनीर सैरम्ललोलिकाया रसैः कृता ॥ १ ॥ गुटिकोदरगुल्मादिपाण्ड्वामयविनाशिनी । क्रिमिकुष्ठगात्रकण्डूपिडिकाश्च निहन्ति च ॥ वटी सिद्धफला चेयं वैद्यनाथेन भाषिता ॥ २ ॥ अब उदावर्त और आनाह रोगकी चिकित्सा कहते हैं । हरड़, त्रिकुटा, रससिन्दूर यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और जमालगोटे २ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र गोरखमुण्डीके

( ३९६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पत्तोंके रस और नोनियाके पत्तोंके रसमें खरल करके गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे उदर, गुल्म, पांडु, क्रिमि, कुष्ठ, गात्रकण्डू और पिड़िकारोग प्रभृति नष्ट होते हैं। इस वैद्यनाथवटीको स्वयं महादेवने कहा है ॥ १ ॥ २ ॥ बृहदिच्छाभेदी रस । शुद्धं पारदटंकणं समरिचं गन्धाश्मतुल्यं त्रिवृद्, विश्वा च द्विगुणा ततो नवगुणं जैपालचूर्णं क्षिपेत् । खल्वे दण्डयुगं विमर्द्य विधिना चार्कस्य पत्रे ततः, स्वेदं गोमयवह्निना च मृदुना स्वेच्छावशाद्भेदकः॥३॥ गुञ्जैकप्रमितो रसो हिमजलैः संसेवितो रेचये- द्यावन्नोष्णजलं पिबेदपि वरं पथ्यञ्च. दध्योदनम् । आमं सर्वभवं सुजीर्णमुदरं गुल्मं विशालं हरे- द्देहदीप्तिकरो बलासहरणः सर्वामयध्वंसनः ॥ ४ ॥ शुद्ध पारा, सुहागा, काली मिरच, गन्धक और निसोथकी जड़, यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, सोंठ २ भाग लेवे और जमालगोटेका चूर्ण नव ९ भाग, इन सब औषधियोंको दो दण्ड ( एक दण्डके २४ मिनट ) पर्यन्त मर्दन करके आकके पत्तोंमें लपेट मूषामें रखकर जंगली उपलोंकी अग्निसे धीरे २ पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब एकत्र पीसकर बारीक चूर्ण कर ले । इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर शीतल जलके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेपर जबतक गरम जल नहीं पीवे तबतक बराबर दस्त होते रहते हैं । इस औषधिको भक्षण करके ऊपरसे दहीके साथ भात खावे । इस औषधिके सेवन करनेसे आमदोष, त्रिदोषज उदररोग और गुल्मरोग नष्ट होते हैं। यह अत्यंत अग्निप्रदीपक, कफनाशक और सर्व रोगोंका हरनेवाला है । इसको बृहत्- इच्छाभेदी रस कहते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥