रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
भाषाटीकासहित । ( ५३९ ) रसके द्वारा और घीक्वारके रसमें अच्छे प्रकारसे खूब खरल करके सुखा लेवे । फिर उसको आतसी शीशीमें रख देवे और उसके ऊपर कपड़रौटी करके सूर्यकी धूपमें सुखा देवे । फिर खड़िया मिट्टीसे उसके मुखको बंद करके वालुकायंत्रमें तीन दिनतक पकावे । जब शीतल होजाय नवीन पल्लवके समान लाल रंगके रससिंदूरको ग्रहण करलेवे । इस प्रकार बनाया हुआ स्वर्णसिंदूर ४ तोले, कपूर ४ तोले, जायफल ४ तोले, पीपल ४ तोले, लौंग ४ तोले और कस्तूरी ४ मासे लेवे, इन सबको एकत्र पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे, प्रतिदिन एक गोली पानमें रखकर खाय । इस औषधिके भक्षण करनेसे मनुष्य कामदेवसे उन्मत्त होकर सैकड़ों स्त्रियोंसे रमण करके उनके गर्वको भञ्जन करता है । इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् घृत, गाढ़ा दूध ( या रबड़ी ), कोमल मांस, नागरमोथा, पिष्टकपंदार्थ और अन्याय आनन्दजनक पथ्य सेवन करे ॥ ६६-६९ ॥ रतिकाले रतान्ते वा सेवितोऽयं रसेश्वरः । मानहानिं करोत्येष प्रमादानां सुनिश्चितम् ॥ ७० ॥ कृत्रिमं स्थावरञ्चैव जङ्गमञ्चैव यद्विषम् । न विकाराय भवति साधकेन्द्रस्य वत्सरात् ॥७१॥ यथा मृत्युञ्जयोऽभ्यासान्मृत्युं जयति देहिनाम् । तथायं साधकेन्द्रस्य जरामरणनाशनः ॥ ७२ ॥ इन्द्रपुष्पं लवंगं स्यात्कार्पासकुसुमद्रवैः । तन्त्रान्तरे प्रसिद्धोऽयं मकरध्वजनामतः ॥ ७३ ॥ मैथुनके समय अथवा मैथुनके अंतमें इस औषधिके सेवन कर- नेसे कामिनियोंके मानकी हानि होती है । इसको एक वर्षतक सेवन करनेसे कृत्रिमविष, स्थावर और जंगमविष और किसी प्रकारका विकार भी शरीरमें कुछ हानि नहीं कर सकता । जिस प्रकार मृत्युञ्जय
( ५४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । औषधिके सेवन करनेसे मनुष्योंकी मृत्यु दूर हो जाती है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे जरा और मृत्यु दूर होती है । इस चंद्रो- दयको तन्त्रान्तरोंमें मकरध्वज कहते हैं ॥ ७०–७३ ॥ मकरध्वज रस । स्वर्णस्य भागौ वङ्गश्च मौक्तिकं कान्तलोहकम् । जातीकोषफले रूप्यं कांस्यकं रससिन्दुरम् ॥ ७४॥ प्रवालं कस्तूरीचन्द्रमभ्रकञ्चैकभागिकम् । स्वर्णसिन्दूरतो भागाश्चत्वारः कल्पयेद्बुधः ॥ ७५ ॥ नातः परतरः श्रेष्ठः सर्वरोगनिषूदनः । सर्वलोकहितार्थाय शिवेन परिकीर्तितः ॥ ७६ ॥ सोना २ भाग, वंग, मोती, कान्तलोह, जावित्री, जायफल, रूपा, कांसा, रससिंदूर, मूंगा, कस्तूरी, कपूर और अभ्रक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और स्वर्णसिंदूर ४ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र जलमें पीसकर अच्छे प्रकारसे खरल करके यथामात्राकी वटी बनाकर यथोचित अनुपानके साथ सेवन करे तो सब प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । यह मकरध्वज रस समस्त प्राणियोंके हितके लिये महादेवने कहा है ॥ ७४–७६ ॥ वसन्ततिलक रस । हेम्नो भस्मकतोलकं घनयुगं लौहात्त्रयः पारदा- च्चत्वारो नियतन्तु वङ्गयुगलञ्चैकीकृतं मर्दयेत् । मुक्ताविद्रुमयो रसेन समता गोक्षूरवासेक्षुणा, सर्वं वन्यकरीषकेण सुदृढं तत्तत्पचेत्सप्तधा ॥ ॥७७॥ कस्तूरीघनसारमर्दितरसः पश्चात्सुसिद्धो भवेत्, कासश्वाससपित्तवातकफजित् पाण्डु-
भाषाटीकासहित । ( ५४१ ) क्षयादीन्हरेत् । शूलादिग्रहणीं विषादिहरणो मेहां- स्तथा विंशतिं, हृद्रोगादिहरो ज्वरादिशमनो वृष्यो वयोवर्द्धनः ॥ श्रेष्ठः पुष्टिकरो वसन्ततिलको मृत्युञ्जयेनोदितः ॥ ७८ ॥ सोनेकी भस्म १ तोला, अभ्रककी भस्म २ तोले, लोहेकी भस्म ३ तोले, रससिन्दूर ४ तोले, वंगभस्म २ तोले, मोतीभस्म ४ तोले और मूंगाभस्म ४ तोले लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर गोखरू, अडूसा और ईखके रसमें खरल करके अरने उपलोंकी अग्निसे पुट देवे । इस प्रकार गोखरूआदिके रसमें सात वार भावना देकर सात वार पुट देवे। फिर कस्तूरी ४ तोले और कपूर ४ तोले मिलाकर यथोचित मात्राकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करने खांसी, श्वास, वात, पित्त, कफ, पाण्डुरोग, क्षय, शूल,संग्रहणी,अनेक प्रकारका विष, बीस प्रकारके प्रमेह, हृद्रोग और ज्वर रोगादि समस्त नष्ट होते हैं । यह औषधि वीर्य और आयुको बढ़ानेवाली है । यह अतीव पुष्टिकारक वसन्ततिलक नामक रस स्वयं महादेवने कहा है ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ वसन्तकुसुमाकर रस । द्विभागं हाटकं चन्द्रं त्रयो वङ्गाहिकान्तकाः । चतुर्भागं शुद्धमभ्रं प्रवालं मौक्तिकं तथा ॥७९॥ भावयेद्गव्यदुग्धेन भावनेक्षुरसेन च । वासालाक्षारसोदीच्यरम्भाकन्दप्रसूनकैः ॥ ८० ॥ शतपुत्रीरसेनैव मालत्याः कुंकुमोदकैः । पश्चान्मृगमदैर्भाव्यं सुगन्धिरससम्भवम् ॥ ८१ ॥ कुसुमाकरविख्यातो वसन्तपदपूर्वकः । गुञ्जाद्वयेन संसेव्यः सितामध्वाज्यसंयुतः ॥ ८२ ॥
( ५४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मेहघ्नः कान्तिदश्चैव कामदः पुष्टिदस्तथा । वलीपलितनाशश्च श्रुतिभ्रंशं विनाशयेत् ॥ ८३ ॥ पुष्टिदो बल्यमायुष्यं पुत्रप्रसवकारणः । प्रमेहान्विंशतिश्चैव क्षयमेकादशं तथा ॥ तथा सोमरुजं हन्ति साध्यासाध्यमथापिवा ॥८४॥ सोनाभस्म २ भाग, चान्दीभस्म २ भाग, वंगभस्म ३ भाग, सीसा- भस्म ३ भाग, कान्तलोह भस्म, ३ भाग, अभ्रकभस्म, मूंगाभस्म और मोती यह प्रत्येक औषधि चार चार भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर गायके दूध, ईखके रस, अडूसेके पत्तोंके रस, लाखके क्वाथ, सुगंधवालेका रस, केलेकी जडका रस, केलेके फूलोंका रस, सतावरका रस और मालतीके फूलोंके रसमें अलग अलग सात सात भावना देवे, फिर सुगंधिके लिये कस्तूरीके क्वाथकी भावना देवे। फिर इसकी दो दो रत्तीकी गोली बनाकर मिश्री, सहत और घृतके साथ सेवन करनेसे प्रमेह रोग नष्ट होता है। इससे कान्ति, काम और पुष्टिकी वृद्धि होती है। वली, पलित और श्रुतिभ्रंश नष्ट होता है। यह पुष्टि, बल और आयुवर्द्धक है तथा पुत्रको उत्पन्न करनेवाली है। इससे बीस प्रकारके प्रमेह, ग्यारह प्रकारके क्षय और साध्यासाध्य सोमरोग नष्ट होते हैं। इसको वसन्तकुसुमाकर रस कहते हैं ॥ ७९-८४ ॥ नीलकण्ठ रस । सूतकं गन्धकं लोहं विषं चित्रकपञ्चकम् । वरांगरेणुकामुस्ताग्रन्थैला नागकेशरम् ॥ ८५ ॥ त्रिकत्रयञ्च त्रिफला शुल्वभस्म तथैव च । एतानि समभागानि द्विगुणो गुड उच्यते ॥ ८६ ॥ संमर्द्य वटकं कृत्वा भक्षयेच्चणकोन्मितम् । कासे श्वासे क्षये गुल्मे प्रमेहे विषमज्वरे ॥ ८७ ॥
भाषाटीकासहित । ( ५४३ ) हिक्कायां ग्रहणीदोषे शोथे पाण्ड्वामये तथा । मूत्रकृच्छ्रे मूढगर्भे वातरोगे च दारुणे ॥ ८८ ॥ नीलकण्ठो रसो नाम ब्रह्मणा निर्मितः पुरा । अनुपानविशेषेण सर्वरोगहरो भवेत् ॥ ८९ ॥ शुद्ध पारा, गंधक, लोहाभस्म, विष, चित्रककी जड़, पद्माख, दाल- चीनी, रेणुका, नागरमोथा, पीपलामूल, इलायची, नागकेशर, त्रिकुटा, त्रिफला और तांबाभस्म यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबसे दुगुना पुराना गुड़ लेवे । सबको एकत्र मिलाकर चनेकी बरा- बर गोली बना लेवे । इस औषधिको खाँसी, श्वास, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषमज्वर, हिचकी, संग्रहणी, शोथ, पाण्डु, मूत्रकृच्छ्र, मूढगर्भ और दारुण वातरोगमें यथोचित अनुपानके साथ सेवन करे । अनुपान- विशेषके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे सब रोग नष्ट होते हैं । इस नीलकण्ठ रसको स्वयं ब्रह्माजीने कहा है ॥ ८५-८९ ॥ महानीलकण्ठ रस । पलैकं नागभस्माथ भावयेत्तिमिपित्ततः । तन्नागं सुसृतं स्वर्ण तोलैकं वापि मिश्रयेत् ॥ ९० ॥ द्विपलं भस्म सूतस्य त्रिपलं मृतमभ्रकम् । त्रिपलं लौहभस्माथ सर्वमेकत्र कारयेत् ॥ ९१ ॥ भावयेच्च पृथक्कन्या ब्राह्मी निर्गुण्डिका शमी । मुण्डी शतावरी छिन्ना कोकिलाक्षस्य बीजकैः॥९२॥ मूसली वृद्धदारोऽग्मिद्रवैरेभिर्भिषग्वरः । ततः संचूर्णयेत्सर्वं तुल्यमेकादशाभिधम् ॥ ९३ ॥ वराव्योषाब्दवह्रयेला जातीफललवङ्गकम् । पूजयेद्वृषपुष्पाद्यैर्नीलकण्ठं महेश्वरम् ॥ ९४ ॥
( ५४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । द्विगुञ्जं भक्षयेदस्य मृत्युञ्जयमनुस्मरन् । क्षयमेकादशविधं ग्रहणीं रक्तपित्तकम् ॥ ९५ ॥ विविधान्वातजान्रोगांश्चत्वारिंशच्च पैत्तिकान् । हन्ति सर्वामयानेव कामिनीनां शतं व्रजेत् ॥ ९६ ॥ एकविंशतिरात्राद्धं परिहार्यं त्यजेदिह । यथेष्टाहारचेष्टो हि कन्दर्पसदृशो नरः ॥ ९७ ॥ मेधावी बलवान्प्राज्ञो बह्वाशी भीमविक्रमः । पुत्रार्थिनी तथा नारी सैव पुत्रं प्रसूयते ॥ अस्य सूतस्य माहात्म्यं वेत्ति शंभुर्नचापरः ॥९८॥ तिमि मत्स्यके पित्तके द्वारा भावना दिया हुआ सीसेका चूर्ण १ पल, सोनेकी भस्म १ तोला, रससिन्दूर २ पल, अभ्रकभस्म ३ पल और लोहाभस्म ३ पल इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर घीका- रके रस, ब्राह्मी, सम्हालू, शमी ( छोंकर ), गोरखमुंडी, सतावर, गिलोय, तालमखाना, मुसली, विधारेके बीज और चित्रककी जड़ इन प्रत्येकके रसमें अलग अलग सात सात भावना देवे । पश्चात् त्रिफला, त्रिकुटा, नागरमोथा, चित्रककी जड़, इलायची, जायफल और लौंग इन प्रत्येकका चूर्ण रससिन्दूरकी बराबर मिलाकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । प्रथम अडूसेके फूलोंसे महादेवकी पूजा करके इस औषधिका सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे ग्यारह प्रकारके क्षय, संग्रहणी, रक्तपित्त, अनेक प्रकारके वातरोग, चालीस प्रकारके पित्तरोग और इसके अतिरिक्त अन्यान्य सब प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । सैकड़ों स्त्रियोंसे मैथुन करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है, इस- पर यथेच्छ आहार और विहार करे । इस औषधिके प्रभावसे मनुष्य कामदेवके समान शरीरवाला, मेधायुक्त, बलवान्, प्राज्ञ, बह्वाशी और
भाषाटीकासहित । ( ५४६ ) अतिशय पराक्रमी हो जाता है । पुत्रकी इच्छा करनेवाली स्त्रियोंके उत्तम पुत्र उत्पन्न होते हैं । इस औषधिके गुण महादेवके सिवाय अन्य कोई नहीं जान सकता है ॥ ९०-९८ ॥ बृहच्छृङ्गाराभ्र । पारदं गन्धकञ्चैव टङ्कणं नागकेशरम् । कर्पूरं जातिकोषञ्च लवङ्गं तेजपत्रकम् ॥ ९९ ॥ एतेषां कर्षभागानि सुवर्णं तत्समं भवेत् । शुद्धकृष्णाभ्रचूर्णञ्च चतुष्कं पिचुभागिकम् ॥१००॥ तालीशं घनकुष्ठञ्च मांसी पुष्पवरांगकम् । एलाबीजं त्रिकटुकं त्रिफला कारिपिप्पली ॥ १ ॥ एषां कर्षद्वयञ्चैव पिप्पलीक्वाथभावितम् । अनुपानं प्रयोक्तव्यं चोचं क्षौद्रसमायुतम् ॥ २ ॥ नानारोगप्रशमनं विशेषात्कासरोगनुत् । वातिकं पैत्तिकञ्चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् ॥ ३ ॥ हृच्छूलं पार्श्वशूलञ्च शिरःशूलं विशेषतः । स्वरामयं क्षयं कुष्ठं श्लेष्माणं वातशोणितम् ॥ ४ ॥ बृहच्छृङ्गाराभ्रनाम विष्णुना परिकीर्त्तितम् । रक्तपित्तञ्च कासञ्च नाशयेन्नात्र संशयः ॥१०५॥ इति श्रीगोपालकृष्णसूरिप्रणीते रसेन्द्रसारसंग्रहे रसायना- धिकारो वाजीकरणाध्यायश्च समाप्तः ।
(५४६) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा, गन्धक, सुहागा, नागकेशर, कपूर, जावित्री, लौंग, तेजपात और सोनेकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे; कृष्णाभ्रकभस्म ४ तोले, तालीशपत्र, नागरमोथा, कूट, बालछड, लौंग, दालचीनी, इलायची, त्रिकुटा, त्रिफला और गजपीपल यह प्रत्येक औषधि दो दो कर्ष परिमाण लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर पीपलके क्वाथमें सात भावना देकर यथोचित मात्राकी गोली बना लेवे। दालचीनीके चूर्ण और सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे अनेक प्रकारके रोग नष्ट होते हैं। विशेष करके यह खांसीको दूर करता है। इससे वातज, पित्तज, कफज और त्रिदोषज रोग, हृद- यशूल, पार्श्वशूल, शिरःशूल, स्वरभेद, क्षय, कुष्ठ, कफ, वातरक्त, रक्त- पित्त और कासरोग नष्ट होते हैं । यह बृहच्छृङ्गाराभ्र श्रीकृष्णने कहा है ॥ ९९-१०५ ॥ इति रसायनाधिकार वाजीकरणाध्याय समाप्त । इति पटियालाराज्यस्थवैद्यरत्न पं० रामप्रसादराजवैद्यकृतभाषाटीकायां तृतीयखण्डः समाप्तः ॥ ३ ॥
रसेन्द्रसारसंग्रह परिशिष्ट भाग । पुटके गुण । रसादिद्रव्यपाकानां प्रमाणज्ञापनं पुटम् । नेष्टो न्यूनाधिकः पाकः सुपाकं हितमौषधम् ॥ १ ॥ लोहादेरपुनर्भावो गुणाधिक्यं तथोग्रता । अनप्सु मज्जनं रेखापूर्णता पुटतो भवेत् ॥ २ ॥ पुटाद् ग्राव्णो लघुत्वं च शीघ्रव्याप्तिश्च दीपनम् । जारितादपि सूतेन्द्राल्लोहानामधिको गुणः ॥ ३ ॥ यथाश्मनि विशेद्वह्निर्बहिस्थपुटयोगतः । चूर्णत्वादिगुणावाप्तिस्तथा लोहेषु निश्चितम् ॥ ४ ॥ जिससे पारद आदि द्रव्योंके पाकका प्रमाण जाना जाय उसे पुट कहते हैं । क्योंकि प्रमाणसे न्यून अथवा अधिक पाक होनेसे द्रव्य ( रस धातु आदि ) का गुण नष्ट होजाता है । अच्छे प्रमाणसे पाक किया जानेसे द्रव्यमें उत्तम गुण होजाता है और प्रमाणपूर्वक पुट देनेसे ही लोहादि धातुओंकी निरुत्थ भस्म होती है । उनमें गुणोंकी उत्तम प्रकारसे अधिकता आजाती है, वह अधिक तीक्ष्ण अर्थात् तेज ( शीघ्र लाभकारी ) होजाते हैं, एवं जलपर तैरनेवाली तथा मलनेसे हाथकी रेखाओंमें भर जानेवाली उत्तम भस्म होजाती है इसलिये विधिवत् पुट देकर ही धातुओंकी भस्म बनानी चाहिये ॥ पुट देनेसे ही अत्यंत भारी द्रव्यमें हलकापन उत्पन्न होता है । एवं पुटसे ही शीघ्रव्यापित्व और दीपनादि गुण उत्पन्न होते हैं तथा जारण किये हुए पारेसे भी अधिक गुण लोहादिकोंमें उत्पन्न
( ५४८ ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । होजाते हैं । जैसे पत्थरको आगमें रख देनेसे बाहरकी अग्नि पत्थरके भीतर प्रवेश कर जाती है उसी प्रकार पुटद्वारा भस्म किये जानेसे लोहादि भस्ममें अनेक गुण आजाते हैं, इसलिये पुटविधानसे ही धातुआदिकोंकी भस्म करनी चाहिये ॥ १-४ ॥ १-महापुट । निम्ने विस्तरतः कुण्डे द्विहस्ते चतुरस्रके । वनोत्पलसहस्रेण पूरिते पुटनौषधम् ॥ ५ ॥ क्रौञ्च्यां रुद्धं प्रयत्नेन पिष्टिकोपरि विन्यसेत् । वनोत्पलसहस्रार्द्धं क्रौंचिकोपरि निक्षिपेत् ॥ वह्निं प्रज्वालयेत्तत्र महापुटमिदं स्मृतम् ॥ ६ ॥ दो हाथ गहरा दो हाथ लम्बा चौड़ा चौरस गढ़ा खोदकर साफ़ करे, उसमें एक सहस्र जंगली उपले भरकर लोहादि द्रव्यको पुट देवे । पुट देनेका क्रम यह है कि पहले इस गढ़ेमें पांचसौ ( आधे ) जंगली उपले डालकर आधे भाग तक भरदेवे । फिर जिस द्रव्यको पुट देना हो उसको मूषामें रख दूसरी मूषासे बन्द कर कपड़मिट्टी- करके सुखाया हुआ सम्पुट उस आधे भागतक भरे हुए गढ़ेमें उपलोंके ऊपर मध्यमें रखदेवे, इस सम्पुट के ऊपर बाकी आधे जंगली उपले भरकर अग्नि लगादेवे, ( स्वांग शीतल होनेपर उस संपुटको निकाल उसमेंसे औषधि निकाल ले ) इसको महापुट कहते हैं, ( यदि उपले सहस्रसे न्यून या अधिक डालनेसे यह गढ़ा भरे तो उपरोक्त संख्याकी आवश्यकता नहीं ) ॥ ५ ॥ ६ ॥ २-गजपुट । राजहस्तप्रमाणेन चतुरस्रं च निम्नकम् ॥ ७ ॥ पूर्णं चोपलसाठीभिः कंठावध्यथ विन्यसेत् । विन्यसेत्कुमुदीं तत्र पुटनद्रव्यपूरिताम् ॥ ८ ॥
भाषाटीकासहित । ( ५४९ ) पूर्वाच्छगणतोऽर्धानि गिरिण्डानि विनिःक्षिपेत् । एतद्गजपुटं प्रोक्तं महागुणविधायकम् ॥ ९ ॥ सवा हाथ गहरा, सवा हाथ चारों ओरसे लंबा चौड़ा, ऐसा एक गढ़ा खोदकर उसमें आधे भाग पर्यन्त जंगली उपले भरे, फिर जिस द्रव्यको पुट देना हो उस द्रव्यसे भरी हुई मूषा ( विधिवत् संपुट किये शराव संपुट या गोले आदिको भी ) ठीक मध्यमें रख शेष आधे उपले उसके ऊपर भरकर अग्नि देवे, इसको गजपुट कहते हैं, यह द्रव्यमें अतीव गुण उत्पन्न करनेवाली है ॥ ७-९ ॥ ३-वाराहपुट । इत्थं चारत्निके कुण्डे पुटं वाराहमुच्यते ॥ १० ॥ एकहाथ ( मुष्टिबद्धहस्त ) गहरा लंबा चौड़ा गढा खोदकर उसमें गजपुटके विधानसे पुट देनेको वाराहपुट कहते हैं ॥ १० ॥ ४-कुक्कुट पुट । पुटं भूमितले यत्तद्वितस्तिद्वितयोच्छ्रयम् । तावच्च तलविस्तीर्णं तत्स्यात्कुक्कुटकं पुटम् ॥ ११ ॥ जो गढ़ा दो बालिस्त गहरा, लम्बा, चौड़ा हो उसमें जंगली उपलोंसे पुट देनेको कुक्कुट पुट कहते हैं ॥ ११ ॥ ५-कपोत पुट । यत्पुटं दीयते भूमावष्टसंख्यैर्वनोपलैः । बद्धा सूतकभस्मार्थं कपोतपुटमुच्यते ॥ १२ ॥ विना गढ़ा खोदे ही साफ भूमिपर आठ उपलोंके छोटे छोटे टुकड़े कर उनकी विधिवत् आवाँसी लगावे, बीचमें पारेकी गोली आदिको तांबेके संपुट या अन्य संपुटमें विधिवत् रख संपुट कर रख दे, फिर १ ग्रन्थान्तरमें " वितस्तिमात्रे गर्ते यत्पुटयेत्तत्तु कौक्कुटम्" एक बालिस्त गहरा चौड़ा विस्तारके गढ़ेमें जो पुट दीजाय उसको कुक्कुट पुट कहते हैं।
( ५५० ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । क्रमसे उपलोंके टुकड़े लगाकर अग्नि दे, इसको कपोतपुट कहते हैं । यह पारद भस्म करनेके लिये कही है ॥ १२ ॥ ६-गोवर पुट । गोष्ठांतर्गोखुरक्षुण्णं शुष्कं चूर्णितगोमयम् । गोवरं तत्समाख्यातं वरिष्ठं रससाधने ॥ १३ ॥ गोवरैर्वा तुषैर्वापि पुटं यत्र प्रदीयते । तद्गोवरपुटं प्रोक्तं सिद्धये रसभस्मनः ॥ १४ ॥ जिस स्थानमें गौवोंका गोमय गौवोंके खुरोंसे कुचला गया हो वह सूखा गोमय लेकर चूर्ण करले ( अथवा साधारण गोमय सुखा- कर चूर्ण करले ) इस चूर्णको गोवर कहते हैं, यह गोबर पारेके साधनमें अतिश्रेष्ठ मानागया है । इस गोबरके चूर्णमें औषधिका संपुट रख पुट देनेको गोबरपुट कहते हैं, अथवा तुषोंमें पुट देना भी गोबर पुट कहा जाता है ॥ १३ ॥ १४ ॥ ७-भाण्ड पुट । स्थूलभाण्डे तुषापूर्णे मध्ये मूषासमन्विते । वह्निना विहिते पाके तद्भाण्डपुटमुच्यते ॥ १५ ॥ एक बड़े पात्रमें तुषभर कर उन तुषोंके मध्यमें मूषा ( या संपुट ) रख ऊपर तुषोंसे भरकर हाथसे खूब दबा दे; फिर इस पात्रको चूल्हे- पर चढ़ा नीचे अग्नि जलावे, इसको भाण्डपुट कहते हैं ॥ १५ ॥ ८-वालुका पुट । अधस्तादुपरिष्टाच्च क्रौञ्चिकाऽऽच्छद्यते खलु । वालुकाभिः प्रतप्ताभिर्यन्त्र तद्वालुकापुटम् ॥१६॥ एक बड़े पात्रमें आधा वालु रेत भरकर उसमें औषधिका सम्पुट रख ऊपरसे और वालु रेत डालकर भर दे, फिर इस पात्रको चूल्हेपर चढ़ा नीचे तीक्ष्णाग्नि जलावे । अग्निके तापसे वालूकी गर्माईमें औषधि पकनेको वालुकापुट कहते हैं ॥ १६ ॥
भाषाटीकासहित । ( ५५१) ९-भूधर पुट । वह्निमित्रां क्षितौ सम्यङ्निखन्याद्व्यङ्गुलादधः । उपरिष्टात्पुटं यत्र पुटं तद्भूधराह्वयम् ॥ १७ ॥ प्रथम पृथिवीमें एक हाथ ( मुकस्सर ) गहरा और चारों ओरसे एकसा गजपुटके गढ़े समान गढ़ा बना ले, उस गढेके भीतर मध्यमें एक और दो अंगुल या चार अथवा छः अंगुलका गढा खोद ले, उसमें औषधीका संपुट रख ऊपरसे मट्टी डालकर दबाकर बंद करदे, फिर उसमें जंगली उपले डालकर अग्नि लगा दे; स्वांगशीतल होनेपर औषधि निकाल ले, इसे भूधरपुट कहते हैं । कोई ऐसा मानते हैं कि साफ भूमिमें दो या चार अंगुलका गढा खोदकर उसमें औषधीका संपुट रख ऊपरसे थोडेसे उपलोंकी पुट देवे इसको भूधरपुट कहते हैं॥१७॥ १०-लावपुट । ऊर्ध्वं षोडशिकामात्रैस्तुषैर्वा गोवरैः पुटम् । यत्र तल्लावकाख्यं स्यात्सुमृदुद्रव्यसाधने ॥ १८ ॥ ( यदि अत्यंत मृदु द्रव्यको अति मृदु अग्नि देनी हो तो ) एक पात्रमें द्रव्यको रखकर उस पात्रमें तुष अथवा गोबरके दो तोले चूर्ण डाल अग्नि लगा दे, शीतल होनेपर द्रव्य निकाल ले, इसको लावपुट कहते हैं ॥ १८ ॥ अनुक्तपुटमाने तु साध्यद्रव्यबलाबलम् । पुटं विज्ञाय दातव्यमूहापोहविचक्षणैः ॥ १९ ॥ तर्क वितर्क द्वारा गहरे विचारको समझनेवाले वैद्यको चाहिये कि जिस द्रव्यके मारणमें पुटका नाम नहीं लिखा उस स्थानमें द्रव्यके कठोर या मृदु आदि बलाबलको विचार कर कठोर ( देरमें भस्म होने- वाले ) द्रव्यको महापुट या गजपुटमें फूंके । मृदु द्रव्यको कुक्कुटादि पुट देना चाहिये ॥ १९ ॥
( ५५२ ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । उपलोंके पर्याय नाम । पिष्टकं छगणं छाणमुत्पलं चोपलं तथा । गिरिण्डोपलसाठी च वराटी छगणाह्वयम् ॥ २० ॥ पिष्टक, छगण, छाण, उत्पल, उपल, गिरिण्ड, उत्पलसाठी और वराटी यह सब नाम सूखी हुई गोबरी कंडोंके हैं ॥ २० ॥ इति पुटविधान । अथ अञ्जनविधान । निम्बबीजं शिलाजाजीधूमसारं समांशकम् । कारवेल्लरसैर्भाव्यमेकविंशतिवारकम् ॥ १ ॥ यत्पार्श्वतोऽञ्जिते नेत्रे तत्पार्श्वञ्च ज्वरं जयेत् । अर्द्धनारीश्वरो नाम रसकौतुककारकम् ॥ २ ॥ १—नीमकी गिरी, मैनशिल, जीरा और धूमसार ( गृहधूम ) इन सबको पीसकर करेलेके रसमें २१ बार भावना देवे फिर मटरके समान बत्ती बनाकर रक्खे, इस बत्तीको ( स्त्रीके दूध या पानी ) में घिसकर जिस नेत्रमें आंजे उस भागके आधे शरीरका ज्वर उतर जाता है ( दूसरे नेत्रमें आंजनेसे सब ज्वर उतर जाता है ), इस कौतुक करने- वाले रसका नाम अर्द्धनारीनटेश्वर है ॥ १ ॥ २ ॥ ऊर्णाया नाभिजालेन वर्त्तिं कृत्वा प्रयत्नतः । ज्वालयेत्तिलतैलेन कज्जलं प्रहरेच्छनैः । अञ्जयेन्नेत्रयुगलं द्व्याहिकं तु ज्वरं जयेत् ॥ ३ ॥ २—मकड़ीके जालेकी बत्ती बनाकर तिलोंके तेलमें भिगोकर युक्तिसे जलावे, इसकी लोइ ( स्याही ) को यत्नपूर्वक उतार ले, इसको दोनों नेत्रोंमें आंजनेसे तृतीयकज्वर दूर होता है ॥ ३ ॥
भाषाटीकासहित । ( ५५३ ) व्योषञ्च त्रिफलामृतं लौहं वङ्गञ्च ताम्रकम् । पुत्रमातृपयश्चैव कारयेद्वटिकां बुधैः ॥ ४ ॥ दुग्धेन चाञ्जनं कृत्वा एकाङ्गज्वरनाशनम् । द्वितीये चाञ्जनं कृत्वा सर्वांगज्वरनाशनम् ॥ ५ ॥ ३-त्रिकुटा, त्रिफला, मृत पारद, लोहभस्म, वंगभस्म और ताम्र- भस्म इन सबको बांझककौडेकी जड़के रसमें अथवा स्त्रीके दूधमें खरल कर गोली बना ले । इस गोलीको स्त्रीके दूधमें घिसकर एक नेत्रमें अञ्जन करनेसे आधे शरीरका ज्वर नष्ट हो जाता है; दूसरे नेत्रमें आँजनेसे सारे शरीरका ज्वर दूर होता है ॥ ४ ॥ ५ ॥ रसगन्धं शिलातुत्थं तालकं मृतटङ्कणम् । नवसादरकर्षैकमर्कदुग्धेन मर्दयेत् ॥ ६ ॥ चुल्लिकायामथारोप्य पचेद्यामचतुर्दश । स्वांगशीतलमादाय खल्ले तं कज्जलीकृतम् ॥ ७ ॥ अञ्जनं वामनेत्रस्य दक्षिणे कौतुकं भवेत् । दक्षिणे चाञ्जनञ्चैव आरोग्यं भवति क्षणात् ॥ ८ ॥ ४-शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, मैनाशिल, नीलाथोथा, शुद्ध हरिताल, मरा हुआ सुहागा और नौसादर इनको एक एक तोला लेकर आकके दूधमें खरल करे, फिर इसको संपुटमें रख एक हांडीमें वह सम्पुट रख दे । फिर उस हांडीको वालुरेतसे भर चूल्हेपर चढ़ावे और चौदह पहरतक नीचे अग्नि जलावे । फिर स्वांगशीतल होनेपर खरलमें डाल पीसकर कज्जली बनावे । यदि इस अञ्जनको वाम नेत्रमें डाले तो दहनी ओर आधे शरीरका ज्वर दूर होता है और दहने नेत्रमें डाले तो सब शरीरका ज्वर उतर जाता है ॥ ६-८ ॥
( ५५४ ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । ज्वरनाशक नस्य । शुद्धतुत्थं पलैकं च भावयेज्जालिनीरसैः । सप्तविंशतिवारांश्च निम्बूनीरे तथैव च ॥ ९ ॥ शुष्कंनस्यं प्रदातव्यं सर्वज्वरविनाशनम् । यस्मिन्नासापुटे दत्तं ह्यर्द्धाङ्गज्वरनाशनम् ॥१०॥ शुद्ध तूतियेको कड़वी तोरीके रसमें सत्ताईस २७ बार भावना देवे, फिर नींबूके रसमें २७ भावना देकर सुखा ले और पीसकर रखे; इसकी नस्य देनेसे सब प्रकारके ज्वर दूर होते हैं। कौतुक यह है जिस ओरकी नासापुटमें नस्य दे उसी ओरके आधे अंगका ज्वर दूर होता है ॥ ९ ॥ १० ॥ अर्द्धाङ्गज्वरनाशक लेप । पौष्करं कट्फलं शुण्ठी मुस्तं जातीफलं समम् । शतपुष्पा शटी चैव छागीक्षीरेण पेषयेत् ॥ कोष्णं कृत्वा ततश्चार्धेज्वराणां नाशनं परम् ॥११॥ पोहकरमूल, कायफल, सोंठ, नागरमोथा, जायफल, सौंफ और कचूर इनको बकरीके दूधमें रगड़कर लेप करनेसे आधे अंगमें होनेवाला ज्वर नष्ट होता है ॥ ११ ॥ सर्वज्वरनाशक धूलन । भूनिम्बकटुकाव्योषं त्रिफलामरदारु च । प्रियंगुहिंगुमंजिष्ठाः शतपुष्पा च कारवी ॥१२॥ अजमोदाजमानी च कचूरमधुकं तथा । कुलत्थं त्रायमाणा च कट्फलातिविषा तथा ॥१३॥
भाषाटीकासहित । ( ५५५ ) चव्यं कुष्ठं दुरालंभा भार्गी रास्ना च रेणुका । सर्षपा राजिका चैव सिंधुं सर्जरसं तथा ॥ १४ ॥ समभागं विचूर्ण्यैतद्भावयेत् शिग्रुजे द्रवे । शुष्कं विचूर्ण्य तच्चूर्णमातुराङ्गे च मर्दयेत् ॥ ज्वरमष्टविधं हन्यात्सन्निपातं च दारुणम् ॥ १५ ॥ चिरायता, कटुकी, त्रिकुटा, त्रिफला, देवदारु, फूलप्रियंगु, हींग, मंजीठ, सौंफ, सोरा, अजमोद, अजवायन, कचूर, मुलेठी, कुलथी, त्रायमाण, कायफल, अतीस, चव्य, कूठ, जवासा, भारंगी, रास्ना, रेणुका, सरसों, राई, सेंधानमक, राल इन सबको सम भाग लेकर सुहांजनेके रसमें भावना दे, सूखनेपर बारीक पीसकर ज्वरवालेके शरीर- पर इस चूर्णको मर्दन करे तो आठ प्रकारके ज्वर और तेरह प्रकारके सन्निपात दूर होते हैं ॥ १२-१५ ॥ तीव्रज्वरनाशक धूलन । हरिप्रियबलभद्रामाधवीशृङ्गवेरं कवचजलजवीरं बालकं भद्रकन्दम्। दलरजसमभागं धूलनं यस्य गात्रे शमयति ज्वरतीव्रं सर्वदाहं निहन्ति ॥ १६ ॥ अगरु, त्रायमाण, सौंफ, सोंठ, भोजपत्र, कमल, पोहकरमूल, नेत्र- वाला, नागरमोथे और तेजपत्र इन सबका चूर्ण कर शरीरपर मलेनेसे तीव्रज्वर और दाह दूर होती है ॥ १६ ॥ ज्वरनाशक धूप । पलोन्मितं निम्बपटोलपत्रं कुष्ठं वचागुग्गुलुसर्षपानाम् । हरीतकीसर्पिरितं च धूपं विनाशनं वै विषमज्वराणाम् १७ इति श्रीगोपालकृष्णसूरिविरचिते रसेन्द्रसारसंग्रहे परिशिष्टभागः समाप्तः ।
( ५५६ ) रसेन्द्रसार० परिशिष्ट । निंबके पत्र, पटोलपत्र, कूठ, वच, गूगल, पीली सरसों, हरड़का छिलका इन सबको पीसकर घी मिलाकर धूप देनेसे विषम ज्वर दूर होता है ॥ १७ ॥ इति पटियालाराज्यस्थवैद्यरत्नपं० रामप्रसादराजवैद्यवैद्योपाध्यायकृतभाषा- टीकायां परिशिष्टभागः समाप्तः ॥ ऊनविंशशते वर्षे सप्तत्या ह्यधिके शुभे । पौषशुक्लदशम्यां वै टीका पूर्तिमागादियम् ॥ सेयं रामप्रसादेन कृता लोकहितेच्छुना । कृपया शोधनीयं तत् त्रुटितं चात्र यत्क्वचित् ॥ ⸱ समाप्तश्चायं ग्रन्थः ।
पुस्तकें मिलने के स्थान १) खेमराज श्रीकृष्णदास, ३) गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास श्रीवेंकटेश्वर स्टीम प्रेस, लक्ष्मीवेंकटेश्वर स्टीम प्रेस, खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, व बुक डिपो, खेतवाडी, मुंबई - ४०० ००४. अहिल्याबाई चौक, कल्याण २) खेमराज श्रीकृष्णदास, (जि. ठाणे - महाराष्ट्र) ६६, हडपसर इण्डस्ट्रिअल इस्टेट ४) खेमराज श्रीकृष्णदास, पुणे - ४११०१३. चौक - वाराणसी (उ.प्र.)
This page is blank and contains no text to transcribe.
खेमश्री खेमराज श्रीकृष्णदास खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई