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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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भक्ति-भावना सवैया मानुष हो तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन । जो पसु हौ तो कहा बसु मेरो चरौ नित नन्द की धेनु मंझारन । पाहन हौ तो वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर धारन । जो खग हौ तो बसेरो करौ मिलि कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन ।।१।। शब्दार्थ—मानुष हौ=यदि मुझे आगामी जन्म मे मनुष्य-योनि मिले । मंझारन=मध्य मे । पाहन=पत्थर । छत्र=छाता । पुरन्दर=इन्द्र । धारन=गर्व नष्ट करने के लिए । कालिन्दी-कूल-कदम्ब=यमुना के तट पर खड़े हुए कदम्ब के वृक्ष जिन पर कृष्ण अनेक प्रकार की क्रीडाएँ किया करते थे । डारन=डालियो मे । अर्थ—कृष्ण के प्रति अपनी स्वतन्त्र भाव की भक्ति की अभिव्यक्ति करते हुए रसखान कहते है कि यदि मुझे आगामी जन्म मे मनुष्य-योनि मिले तो मैं वही मनुष्य बनूँ जिसे ब्रज और गोकुल गाँव के ग्वालो के साथ रहने का अवसर मिले । आगामी जन्म पर मेरा कोई बस नही है, ईश्वर जैसी योनि चाहेगा, दे देगा, इसलिए यदि मुझे पशु-योनि मिले तो मेरा जन्म ब्रज या गोकुल मे ही हो, ताकि मुझे नित्य नन्द की गायो के मध्य मे विचरण करने का सौभाग्य प्राप्त हो सके । यदि मुझे पत्थर-योनि मिले तो मै उसी पर्वत का बनूँ जिसे श्रीकृष्ण ने इन्द्र का गर्व नष्ट करने के लिए अपने हाथ पर छाते की भाँति उठा लिया था । यदि मुझे पक्षी-योनि मिले तो मैं ब्रज मे ही जन्म पाऊँ ताकि मै यमुना के तट पर खडे हुए कदम्ब के वृक्ष की डालियो मे निवास कर सकूँ । विशेष—१ कवि ने अपना सम्बन्ध उन्ही वस्तुओ से जोडने की इच्छा प्रकट की है, जिनसे कृष्ण का सम्बन्ध रहा है । भक्त को चाहे जिस अवस्था मे रहना पड़े, उसे उसके आराध्यदेव के दर्शन नित्य मिलते रहे, यही उसके १५५

३५६ रसखान-ग्रन्थावली जीवन का लक्ष्य होता है । रसखान ने भी उपर्युक्त सवैये मे इस लक्ष्य की भावमयी अभिव्यञ्जना की है । २. 'बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन' मे तथा 'कालिन्दी-कूल-कदम्ब की' मे छेकानुप्रास अलकार है । ३. 'पाहन ही तौ वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर-धारन' मे निम्नलिखित अन्तर्कथा निहित है— कृष्ण के आदेश से ब्रजवालो ने इन्द्र की पूजा छोडकर गौओ की पूजा करनी आरम्भ कर दी । इस बात से इन्द्र अत्यन्त कुपित हुआ । उसने ब्रज को डुवाने के लिए मूसलाधार वर्षा कर दी । कृष्ण ने ब्रज की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को उठाकर छाते की भाँति ब्रज के ऊपर लगा दिया । तब इन्द्र ब्रज का कुछ भी न बिगाड सका । उसका गर्व नष्ट हो गया । 'पाठान्तर—'मानुष हौं तो वही रसखानि बसो नित गोकुल गाँव के ग्वारन । जौ पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन । पाहन हौं तो वही गिरि को जो कियो ब्रज छत्र पुरन्दर-धारन । जौ खग हौं तौ बसेरो करौं वही कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन ।' तुलना—'ब्रज के लता पता मोहि कीजै ।' —हरिश्चन्द्र सवैया जो रसना रस ना बिलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन । मो कर नीकी करै करनी जु पै कुज-कुटीरन देहु बुहारन । सिद्धि समृद्धि सबै रसखानि नहीं ब्रज-रेनुका-अंग-सवारन । खास निवास लियो जु पै तौ वही कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन ॥२॥ शब्दार्थ—रसना = जीभ । रस = इन्द्रियो को आनन्द देने वाले मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कपाय और तिक्त रस । नीकी = अच्छी । बुहारन = साफ करना, झाडू देना । रेनुका = धूल । कालिन्दी-कूल = यमुना का तट । अर्थ—रसखान अपने आराध्यदेव से प्रार्थना करते हुए कहते है कि हे देव, मुझे सदा अपने नाम का स्मरण करने दो, ताकि मेरी जीभ इन्द्रियो के आनन्द मे डूब जाये । मुझे कुंजो मे बनी हुई अपनी कुटियो मे झाडू लगाने दो,

व्याख्या भाग १५७. जिससे मेरे हाथ सत्कार्य करते रहे । मुझे ब्रज की धूल मे अपने शरीर को धूसरित करने दो, जिससे मुझे अणिमा आदि आठो सिद्धियो का सुख मिल जाये । यदि आप मुझे निवास करने के लिए कोई स्थान देना चाहते है तो यमुना-तट पर खडे हुए उन्ही कदम्ब की डालियो मे दीजिए जहाँ पर आप अनेक प्रकार की क्रीडाएँ किया करते थे । विशेष—'जो रसना रसना विलसे' मे यमक तथा 'करै करनी,' 'कुज- कुटीरन', 'सिद्धि-समृद्धि' और 'कालिदी-कूल-कदम्ब की' मे छेकानुप्रास- अलकार है। सवैया 'बैन वही उनको गुन गाइ औ कान वही उन बैन सो सानी । हाथ वही उन गात सरै अरु पाइ वही जु वही अनुजानी । जान वही उन आन के सग औ मान वही जु करै मनमानी । त्यौ रसखान वही रसखानि जु है रसखानि सो है रसखानी ।' शब्दार्थ—बैन = वाणी । सानी = युक्त । सरै = माला पहनाये । पाइ = पैर, चरण । अनुजानी = अनुगामी । जान = प्राण । रसखानी = अन्तिम पक्ति मे यह शब्द चार बार प्रयुक्त हुआ है, अत. इसके अर्थ क्रमश' ये है—(१) कवि का नाम, (२) आनन्द का भण्डार, (३) श्री कृष्ण, (४) प्रेम का खजाना, अर्थात् अत्यन्त प्रेम करने वाला । अर्थ—मनुष्य-जीवन की सफलता एव सार्थकता तभी है जब वह स्वयं को अपने आराध्य देव के प्रति पूर्णतया समर्पित कर दे, इसी भाव को प्रकट करते हुए रसखान कहते है कि वही वाणी सार्थक है जो कृष्ण के गुणो का गान करती है, वे ही कान सार्थक है जो कृष्ण की वाणी से युक्त रहते है, वे ही हाथ सार्थक है जो कृष्ण के शरीर पर माला पहनाते है; वे ही चरण सार्थक है जो कृष्ण का अनुगमन करते है, उनके पीछे-पीछे चलते है, वे ही प्राण सार्थक है जो सदैव कृष्ण के साथ रहते है; वही मान सार्थक है जो कृष्ण को द्रवित करके उनसे मनमानी बात करा लेता है । इसी प्रकार वही आनन्द के भण्डार श्री कृष्ण है जो अपने भक्तो को अत्यन्त प्यार करते है । विशेष—इस सवैया की अन्तिम पक्ति मे यमक अलकार का अत्यन्त चमत्कारपूर्ण एव भावपूर्ण प्रयोग है ।

१५८ रसखान ग्रन्थावली दोहा कहा करै रसखानि को, कोऊ चुगुल लवार । जो पै राखनहार है, माखन चाखनहार ॥४॥ शब्दार्थ—चुगुल = चुगलखोर । लवार = झूठा, दुष्ट । राखनहार = रक्षक । माखनमाखनहार = श्रीकृष्ण । अर्थ—श्रीकृष्ण जिसके रक्षक हैं, उनका कोई कुछ नही बिगाड़ सकता, इस भाव को प्रकट करते हुए रसखान कहते हैं कि यदि श्रीकृष्ण मेरे रक्षक हैं तो मेरा कोई भी चुगलखोर तथा दुष्ट व्यक्ति कुछ नही बिगाड़ सकता । विशेष— १. 'जो पै राखनहार है, माखन-चाखनहार' मे यमक अलकार है । २. कहते हैं कि बादशाह अकबर ने रसखान को दीने-इलाही में दीक्षित होने के लिए कहा, किन्तु ये दीने-इलाही में सम्मिलित न होकर कृष्ण-भक्त बन गये । तब किसी व्यक्ति ने बादशाह से आकर इनकी चुगली की और इन्हे कठोर दण्ड देने का परा- मर्श दिया । इस घटना की प्रतिक्रिया-स्वरूप रसखान ने उपर्युक्त दोहे की रचना की । पाठान्तर—कहा करै रसखान को, लपट लोग लवार । जो पत राखनहार है, माखन-चाखनहार ॥ तुलना—१. 'जो प राखि है राम तो मारि है कोरे ।' —तुलसीदास २. रहिमन को कोउ का करै, ज्वारी चोर लवार । जो पत राखनहार है, माखन-चाखनहार ॥ —रहीम दोहा विमल सरल रसखानि, भई सकल रसखानि ॥ सोई नव रसखानि को, चित चातक रसखानि ॥५॥ शब्दार्थ—विमल = शुद्ध । रसखानि मिलि = कृष्ण से मिलकर । रसखानि = कृष्ण ।

ऽव्याख्या भाग १५६ अर्थ—रसखान कवि कहते हैं कि शुद्ध एव सरल स्वभाव वाली गोपियाँ जिस कृष्ण से मिलकर उसी का रूप बन गई, मेरा मन उसी दयालु रसखान (आनन्द-सागर कृष्ण) का घातक बना हुआ है। विशेष— १. यमक अलकार । २. चातक का प्रेम आदर्श प्रेम माना गया है, अतः अपने प्रेम की अभिव्यक्ति सभी भक्त-कवियो ने चातक के माध्यम से ही की है। गोस्वामी तुलसीदास ने तो चातक प्रेम का सागोपाग ही वर्णन किया है। दोहा सरस नेह लवलीन नव, द्वै सुजान रसखानि। ताके आस बिसास सो पगे प्रान रसखानि ॥६॥ शब्दार्थ—नेह = प्रेम। लवलीन = तन्मय। नव = नूतन। द्वै = दोनो, कृष्ण और राधा। अर्थ—कवि कृष्ण और राधा के मिलन की स्तुति करता हुआ कहता है कि जो राधा और कृष्ण के सरस तथा नूतन प्रेम मे तन्मय हैं, उन्ही की दया की आशा और विश्वास से मेरे प्राण सदैव सम्पृक्त है। कृष्ण का अलौकिकत्व सवैया ऽसकर से सुर जाहि जपै चतुरानन ध्यानन धर्म बढावै। नैक हिये जिहि आनत ही जड मूढ महा रसखानि कहावै। जा पर देव अदेव भू-अंगना वारत प्रानन प्रानन पावै। ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥७॥ शब्दार्थ—सकर से सुर = शिव जैसे देव। चतुरानन = ब्रह्मा। नैक = थोडा-सा। आनत ही = लाते ही। जड़ मूढ = अत्यन्त मूर्ख। महा रसखानि = विपुल ज्ञान के भंडार। अदेव = किन्नर। भू-अगना = पृथ्वी पर रहने वाली स्त्रियाँ। वारत प्रानन = प्राणो को न्यौछावर करके। अर्थ—कृष्ण की भक्त-वत्सलता एव लौकिक लीला का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जिस कृष्ण का जप शकर जैसे देव करते हैं, जिनका

१६० रसखान-ग्रन्थावली

ध्यान करके वह्मा अपने धर्म मे वृद्धि करते है, जिसका तनिक सा ध्यान भी हृदय मे लाते ही अत्यन्त मूर्ख भी विपुल ज्ञान के भडार बन जाते है, जिस पर देव, किन्नर और पृथ्वी पर रहने वाली स्त्रियाँ अपने प्राणो को न्यौछावर करके सजीवता प्राप्त करती है, उसी कृष्ण को अहीर की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए नाच नचाती है । विशेष—'सकर से सुर', 'ध्यानान धर्म', 'छोहरिया छछिया भरि छाछ' मे छेकानुप्रास तथा वृत्यनुप्रास, 'नैक हिये जिहि आनत ही जड़ मूढ महा रसखानि कहावै' मे द्वितीय विभावना, 'वारत प्रानन प्रानन पावै'मे विरोधाभास और जापर देव अदेव भू-अगना' मे यमक अलकार है । पाठान्तर—इस सवैया की तृतीय पंक्तित के निम्नलिखित पाठांतर मिलते है— १. जापर सुन्दर देववधू नहिं वारत प्रान अवार लगावै । २. जापर देव भुवंग वरगना वारति प्रान सु प्रान से पावै । ३. जापर देव अदेव भुवंगम वारत प्रानन पार न पावै । सवैया सेप गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरन्तर गावै । जाहि अनादि अनंत अखण्ड अछेद अभेद सु वेद बतावै । नारद से सुक व्यास रहैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावै । ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥८॥ शब्दार्थ—सेष=शेषनाग । महेस=शिव । दिनेस=सूर्य ! सुरेस=इन्द्र । अछेद=अच्छेद्य, अमर । अभेद=अभेद्य, जिसका रहस्य न जाना जा सके । पचि=कोशिश करके । अर्थ—कृष्ण की भक्त-वत्सलता एव लौकिक लीला का वर्णन करते हुए रसखान कहते हे कि जिस कृष्ण के गुणो का शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य, इन्द्र निरन्तर स्मरण करते है । वेद जिसके स्वरूप का निश्चित ज्ञान प्राप्त न करके उसे अनादि, अनन्त, अखण्ड, अच्छेद्य, अभेद्य आदि विशेषणो से युक्त करते है । नारद, शुकदेव और व्यास जैसे प्रकाड पडित भी अपनी पूरी कोशिश करके जिसके स्वरूप का पता न लगा सके और हार मानकर बैठ गए, उन्ही कृष्ण को,

व्याख्या भाग १६१ अहीर की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए नाच नचाती है । विशेष—श्रुत्यनुप्रास, छेकानुप्रास तथा वृत्यनुप्रास का सुन्दर प्रयोग हुआ है । सवैया गावै गुनी गनिका गंधरब्ब औ सारद सेष सबै गुन गावत । नाम अनत गनत गनेस ज्यौ ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावत । जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरन्तर जाहि समाधि लगावत । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत ॥६॥ शब्दार्थ—गनिका = अप्सरा । गंधरब्ब = गंधर्व, संगीत-प्रिय देवयोनि । सारद = शारदा । सेष = शेषनाग । त्रिलोचन = शिव । छोहरियाँ = लड़की । छछिया = मिट्टी का छोटा-सा पात्र । अर्थ—कृष्ण की भवत-वत्सलता एव लोक-लीला का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि जिस कृष्ण के गुणो का गान अप्सरा, गंधर्व, शारदा और शेषनाग सभी करते है, गणेश जिसके अनत नामो का स्मरण करते है, ब्रह्मा और शिव जिसके रहस्य को नहीं जान पाते, जिसे प्राप्त करने के लिए योगी, यति, तपस्वी और सिद्ध निरन्तर समाधि लगाये रहते है, फिर भी उसका भेद नही जान पाते, उन्ही कृष्ण को अहीर की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए नाच नचाती है । विशेष—इस सवैया मे छेकानुप्रास और वृत्यनुप्रास का सुन्दर प्रयोग है । पाठान्तर—'गावत', 'पावत', 'लगावत' और 'नचावत' के स्थान पर क्रमशः 'गावै', 'पावै,' 'लगावै', ओर 'नचावै' पाठ भी मिलते है । सवैया लाय समाधि रहे ब्रह्मादिक योगी भये पर अन्त न पावै । साँझ ते भोरहि भोर ते साझति सेस सदा नित नाम जपावै । ढूंढ़ फिरे तिरलोक मे साख सुनारद लै कर बीन बजावै । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछियां भर छाछ पै नाच नचावै ॥१०॥ शब्दार्थ—भोर = प्रात काल । साँझ ते भोरहि भोर ते साझहि = सन्ध्या- काल से प्रात काल तक और प्रात काल से सन्ध्याकाल तक; अर्थात् हर समय,

१६२ रसखान-ग्रन्थावली निरन्तर । सेस = शेषनाग । तिरलोक मे = तीनों लोकों मे । सुनारद = महर्षि नारद । साख = साक्षी । अर्थ- कृष्ण के अलौकिकत्व का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि ब्रह्मा आदि अनेक योगी उस कृष्ण को जानने के लिए समाधि लगाये हुए हैं, पर वे उसका अन्त नही पाते, अर्थात् कृष्ण दुर्बोध्य और अनन्त हैं। शेष- नाग अपनी सहस्रो जिह्वाओ से निरन्तर उसका नाम जपते रहते हैं। महर्षि नारद अपने हाथ मे वीणा लेकर उसे बजाते हुए तीनो लोको मे ढूँढ़ फिरे हैं, पर कोई भी ऐसी साक्षी नही मिली, जिसके आधार पर वे यह दावा कर सकें कि उन्होने कृष्ण के रूप को जान लिया है। ऐसे दुर्बोध्य, अनन्त कृष्ण को अहीर की लडकियाँ एक मटकी छाछ के लिए नाच नचाती हैं। विशेष - यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली' मे नही है। सवैया गुज गरें सिर मोरपखा अरु चाल गयद की मो मन भावै । साँवरो नन्दकुमार सबै ब्रजमंडली मैं ब्रजराज कहावै । साज समाज सबै सिरताज औ लाज की बात नही कहि आवै । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥११॥ शब्दार्थ-गुज = गले मे पहनने का एक आभूषण । गयंद = हाथी । छाज = शोभा । अर्थ - कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का तथा उनकी लौकिक लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि उनके गले मे गुंज नामक आभूषण है, सिर पर मोर-पखो का बना हुआ मुकुट है। हाथी जैसी मस्तानी चाल है जो मुझे बहुत ही अच्छी लगती है। यह साँवरा कृष्ण सारे ब्रज का शिरोमणि है, इसीलिए ब्रजराज कहलाता है। यह सारी शोभा का और सारे समाज का सिरताज है। इसकी शोभा का वर्णन नही किया जा सकता। ऐसे कृष्ण को अहीर की लड़कियाँ छछिया भर छाछ के लिए नचाती रहती हैं। विशेष - 'साज समाज सबै सिरताज' मे वृत्यनुप्रास है।

व्याख्या भाग १६३

सवैया

ब्रह्म मै ढूँढ्यौ पुरानन गानन बेद-रिचा सुनि चौगुने चायन । देख्यौ सुन्यौ कबहुँ न कितूँ वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन । टेरत हेरत हारि पर्यौ रसखानि बतायौ न लोग लुगायन । देखौ दुरौ वह कुज-कुटीर मै बैठौ पलोटत राधिका पायन ॥१२॥

शब्दार्थ—पुरानन गानन=पुराण के गीतो मे । चायन=चाव से । कितूँ=कही भी । सुभायन=स्वभाव । टेरत=पुकारता हुआ । हेरत= खोजता हुआ । लुगायन=स्त्रियो ने । दुरौ=छिपा हुआ । पलोटत राधिका पायन=राधा के पैर दबा रहा है ।

अर्थ—कृष्ण की प्रेमाधीनता का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि मैने ब्रह्म को पुराणो के गीतो मे ढूँढा, वेद-ऋचाओ को चौगुने चाव से इसी- लिए सुना कि शायद उन्ही से ब्रह्म का पता चल जाये । मेरे सारे प्रयत्न निष्फल हुए । मैने उसे न तो कही सुना और न कही देखा । मै यह भी नही जान पाया कि उसका स्वरूप और स्वभाव कैसा है । उसे पुकारते हुए, उसकी- खोज करते हुए मै थक गया और किसी भी नर या स्त्री ने उनका पता नहीं बताया । अन्त मे वह मुझे कुज-कुटीर मे छिपकर बैठे हुए राधा के पैरो को दबाता हुआ दिखाई दिया ।

सवैया

कस कुढ्यौ सुनि बानी अकास की ज्यावनहारहि मारन धायौ । भादव साँवरी आठई को रसखान महाप्रभु देवकी जायौ । रैनि अँधेरी मे लै वसुदेव महावन मे अरगै धरि आयौ । काहु न चौजुग जागत पायौ सो राति जसोमति सोवत पायौ ॥१३॥

शब्दार्थ—बानी अकास=आकाशवाणी । ज्यावनहारहि=जन्म लेने वाला ही, देवकी के गर्भ से उत्पन्न होने वाला ही । भादव साँवरी आठई को=भादौ की कृष्ण अष्टमी को । अरगै=धीरे-धीरे, चुपचाप । चौजुग= चारो युगो मे—सतयुग, द्वापर, त्रेता और कलियुग । जागत=जागृत अवस्था ।

अर्थ—कृष्ण-जन्म का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि जब कस ने यह आकाशवाणी सुनी कि देवकी के गर्भ से उत्पन्न होने वाला पुत्र ही तुझे

१६४ रसखान-ग्रन्थावली मारने के लिए अवतार ले रहा है तो वह बहुत अप्रसन्न हुआ । आकाशवाणी के अनुसार ही भादो की कृष्णाष्टमी को आनन्द सागर महाप्रभु कृष्ण ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया । कस के भय से भयभीत होकर वसुदेव उस नवजात शिशु को अँधेरी रात मे चुपचाप लेकर महावन (मथुरा) की ओर चल दिए । जिस कृष्ण को चारो कालो का कोई भी योगी अपनी समाधि की जागृतावस्था मे भी प्राप्त नही कर सका है, उसी कृष्ण को यशोदा ने रात को अपने पास सोते हुए पाया । विशेष १. समाधि अलकार । २. यह सवैया श्री विश्वनाथ मिश्र द्वारा सापादित 'रसखान ग्रंथावली' मे नही है । तुलना १. 'गावत वेद विरंच न पायौ सो गोधन गावत गोपन पायौ । —केशव २ 'जग जाकी गोद मे सो जसुदा की गोद मे ।' —ब्रजेश कवित्त संभु धरै ध्यान जाको जपत जहान सब, ताते न महान् और दूसर अवरेख्यौ मैं । कहै रसखान वही बालक सरुप धरै, जाको कछु रूप रंग अद्भुत अवलेख्यौ मैं । कहा कहूँ आली कछु कहती बनै न दसा, नन्द जी के अँगना मे कौतुक एक देख्यो मैं । जगत को ठाटी महापुरुष विराटी जो, निरंजन निराटी ताहि माटी खात देख्यौ मैं ॥१४॥ शब्दार्थ—अवरेख्यौ मै = मैने देखा। अवलेख्यौ मै = मैने देखा। कौतुक = तमाशा । जगत को ठाटी = ससार की रचना करने वाला, सृष्टि-स्रष्टा । विराटी = विराट रूप धारण करने वाला । निरंजन = विमल, प्रभावातीत । निराटी = अकेला, एकमेव । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की अलौकिकता और उनकी

व्याख्या भाग १६५ बाल-लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि । शिव जिसको आराध्य मानकर ध्यान करते हैं, सारा संसार जिसकी पूजा करता है, जिससे महान् और दूसरा देव मैने कोई नही देखा । वही कृष्ण साकार बनकर अवतरित हुआ है जिसका रूप-रंग मुझे कुछ-कुछ अद्भुत सा लगा है । हे सखि ! क्या कहूँ, मुझसे तो उसकी उस अवस्था का वर्णन ही नही हो पा रहा है । बस यह जान लो कि नंद जी के आँगन मे मैने एक तमाशा देखा है । जो कृष्ण संसार की रचना करने वाला है, महापुरुष है, विराट रूप धारण करने वाला है, किसी भी प्रकार के प्रभावो से परे है-प्रभावातीत है, केवल एक हैं; अर्थात् वही एक केवल सत्ताव्रत है, और सारा संसार तो उसी की सत्ता की माया है, उसे मैने मिट्टी खाते हुए देखा है । विशेष-१. इस कविता का भावपक्ष निर्बल और दार्शनिकता सबल है । २. श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' मे यह कवित्त नही है । तुलना-'शृणु सखि कौतुकमेकं नंद निकेतांगणे मया दृष्टम् । गोधूलि धूसरांगो नृत्यति वेदान्त सिद्धातः ॥' कवित्त वेई ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत हैं रैन-दिन, सदासिव सदा ही धरत ध्यान गाढे है । वेई विष्णु जाके काज मानी मूढ राजा रंक, जोगी जती ह्वै कै सीत सह्यो अग डाढे है । वेई ब्रजचंद रसखानि प्रान प्रानन के, जाके अभिलाख लाख-लाख भाँति बाढे है । जसुधा के आगे बसुधा के मान-मोचन मे, तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढे है ॥ १५ ॥ शब्दार्थ-वेई = वही कृष्ण । सदासिव = सदा भक्त वत्सल शिव । गाढ़े = गंभीर । जाके काज = जिसके लिए ! मानी = अहंकारी । मूढ = मूर्ख । रंक = निर्धन । ब्रजचंद = कृष्ण । रसखानि = आनंद के भंडार । जसुधा = यशोदा । वसुधा = पृथ्वी, पृथ्वी पर रहने वाले लोग । मान-मोचन = अहंकार को नष्ट करने वाले । तामरस-लोचन = कमलनयन । खरोचन = खुरचनी ।

१६६ रसखान-ग्रन्थावली अर्थ—प्रस्तुत कवित्त मे रसखान कृष्ण के अलौकिकत्व एवं बाल-लीला की ओर संकेत करते है कि वही कृष्ण ब्रह्म जिनकी पूजा ब्रह्मा जी रात-दिन किया करते हैं, भक्त-वत्सल शिव जिनका सदा गभीर ध्यान करते हैं; वही कृष्ण-विष्णु जिनके लिए अहकारी, मूर्ख, राजा, निर्धन, सभी प्रकार के लोग भोगी बनकर गीतादि के द्वारा अपने अगो को शिथिल बनाते हैं, वही आनन्द के भडार कृष्ण जो प्राणो के प्राण हैं और जिन्हें देखने के लिए लाखो अभिलाषायें लाखो प्रकार से बढती है, जो पृथ्वी पर रहने वाले लोगों का अहकार मिटाने वाले हैं कमल के समान सुन्दर नेत्रों वाले हैं, यशोदा के सामने खुरचनी लेने के लिए खडे हुए हैं। विशेष—१ इस कवित्त मे कृष्ण के ब्रह्म-रूप की ओर सकेत है। २ जसुधा के आगे वसुधा के मान-मोचन मे और तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढे है। मे यमक अलकार है। ३ कृष्ण का अनेक रूपो मे वर्णन होने से उल्लेख अलकार हैं। तुलना—आगे नंदरानी के तनक गम पीने काज, तीन लोक ठाकुर सो सुनुकत ठाढो है। —पद्माकर अनन्य भाव सवैया सेप सुरेस दिनेस गनेस अजैस धनेस महेस मनावौ। कोऊ भवानी भजौ मन की सब आस सबै विधि जाइ पुरावौ। कोऊ रमा भजि लेहु महा धन कोऊ कहूँ मन वांछित पावैौ। पै रसखानि वही मेरो साधन और त्रिलोक रहौ कि नसावौ ॥ १६ ॥ शब्दार्थ—सेप = शेषनाग। सुरेस = इन्द्र । दिनेस = सूर्य । अजैस = ब्रह्मा। धनेस = कुवेर। महेस = शिव। भवानी = पार्वती । पुरावौ = पूर्ण करे। रमा = लक्ष्मी। नसावौ = नष्ट हो जाये। अर्थ—अनन्य भाव की भक्ति की अभिव्यक्ति करते हुए रसखान कहते हैं कि चाहे कोई शेषनाग, इन्द्र, सूर्य, गणेश, ब्रह्मा, कुबेर और शिव की भक्ति करे। चाहे कोई पार्वती की भक्ति करके अपने मन की सभी अभिलाषाओ को सभी प्रकार पूर्ण कर ले। चाहे कोई लक्ष्मी की पूजा करके भारी धन

व्याख्या भाग १६७ प्राप्त कर ले। चाहे कोई किसी भी प्रकार अपना मनोवाञ्छित फल पाले, किन्तु मेरा तो एकमात्र साधन कृष्ण ही है। कृष्ण के अतिरिक्त तीनो लोक चाहे रहे, या नष्ट हो जाये, मुझे इसकी कोई चिन्ता नही है। विशेष—'सेप सुरेस दिनेस गनेस अजैस धनेस महेस' मे छेकानुप्रास और श्रुत्यनुप्रास अलकार है। तुलना—'मेरे तो राधिका नामक ही गति लोक दुऊ रहौ कै नसि जाओ।' —हरिश्चन्द्र सवैया द्रौपदी ग्र ˙ गनिका गज गीध अजामिल सो कियो सो न निहारो। गौतम-गेहिनी कैसी तरी, प्रहलाद को कैसे हरयौ दुख भारो। काहे कौ सोच करै रसखानि कहा करि है रविनन्द विचारो। ता खन जा खन राखियै माखन-चाखनहारो सो राखनहारो ॥१७॥ शब्दार्थ--द्रौपदी=पाडवो की स्त्री। गज=हाथी, जिसकी कृष्ण ने ग्राह से रक्षा की थी। गीध=जटायु, जो सीता की रक्षा करते समय रावण के बाणो से घायल हुआ था और अन्त मे राम ने जिसका उद्धार किया था। अजामिल=एक व्यक्ति का नाम। गौतम-गेहनी=गौतम की स्त्री अहिल्याबाई। रवि नन्द=यमराज। ताखन=उस समय। जा खन=जिस समय। माखन- चाखनहारो=श्रीकृष्ण। राखनहारो=रक्षक। अर्थ—जब कृष्ण रक्षक है तो मनुष्य को किसी भी प्रकार की चिन्ता नही करनी चाहिए, इस भाव को व्यक्त करते हुए रसखान कहते है कि कृष्ण इतने दयालु है कि अपने भक्तो की टेर सुनते ही तुरन्त उनकी रक्षा के लिए कटि- बद्ध हो जाते है। द्रौपदी, गणिका, गज, गीध और अजामिल ने अपने जीवन मे क्या कार्य किये थे, क्या उनके कार्य उनका उद्धार करने मे समर्थ थे ? इन बातो पर कृष्ण ने कोई ध्यान नही दिया और तुरन्त उनका उद्धार कर दिया। इसी प्रकार गौतम—स्त्री अहिल्याबाई को भी मुक्ति प्रदान की तथा हिरण्य- कशिपु को मारकर प्रह्लाद के भारी दुख का हरण किया। अत हे मनुष्य ! जिस समय श्रीकृष्ण तुम्हारे रक्षक है, उस समय तुम्हे कोई चिन्ता नही करनी

१६८ रसखान-ग्रन्थावली चाहिए, क्योकि उस समय तो यमराज भी तुम्हारा कुछ भी नही बिगाड़ सकता । विशेष—१. 'चाखनहारो सो राखनहारो' मे यमक अलंकार है । २. 'विचारो' शब्द यमराज की दुर्बलता को साकार कर रहा है, अतः यह शब्द नितात औचित्यपूर्ण है । ३. अन्तिम पंक्ति मे यति-दोष है । सवैया देस विदेस के देखे नरेसन रीझ की कोऊ न बूझ करैंगौ । ताते तिन्हें तजि जानि गिर्यौ गुन सौ गुन औगुन गाँठि परैगौ । बाँसुरीवारो बडो रिझवार है स्याम जु नैसुक ढार ढरैगौ । लाडलो छैल वही तौ अहीर को पीर हमारे हिये की हरैगौ ॥ १८॥ शब्दार्थ—रीझ की = प्रेम की । गिर्यो गुन = अवगुण । रिझवार = रीझने वाला, प्रेम करने वाला । नैसुक = तनिक भी । ढार ढरैगौ = प्रीति करेगा । पीर = दुख । अर्थ—कृष्ण भक्त-वत्सल है, इसी भाव को अभिव्यक्त करते हुए रसखान कहते है कि हे मन ! तू देश-विदेश के राजाओ को परख ले, तेरे प्रेम का कोई भी सम्मान नही करेगा । उनके प्रति प्रेम करना अवगुण ही है, क्योकि चाहे तुममे कितने ही गुण सही, पर उनके साथ रहने से वे अवगुण बन जायेंगे । वह वशीधर कृष्ण बहुत ही रीझने वाला है, भक्त-वत्सल है, यदि तू उससे तनिक भी प्रेम करेगा तो वह अहीर का लाड़ला पुत्र हमारे हृदय के सारे दुख को दूर कर देगा । विशेष —१ 'देश विदेश' मे छेकानुप्रास; 'ताते तिन्हें तजि' मे वृत्यनु- प्रास और 'सौगुन औगुन गाँठि परैंगौ' मे यमक अलकार है । २ 'रिझवार' शब्द का प्रयोग अत्यन्त भावपूर्ण है । सवैया सपति सौ सकुचाइ कुवेरहि रुप सौ दीनी चिनौती अनगहि । भोग कै कै ललचाइ पुरन्दर जोग कै गगलर्ड घर मगहि । ऐसे भए तौ कहा रसखानि रसै रसना जी जु मुक्ति-तरगहि । दै चित ताके न रग रच्यौ जु रह्यौ रचि राधिका रानी के रगहि ॥१९॥

व्याख्या भाग १६६ शब्दार्थ-चिनौती = चुनौती। अनंगहि = कामदेव को। भोग = ऐश्वर्य, 'पुरन्दर = इन्द्र । मगहिं = सिर पर । मुक्ति तरंगहि मुक्ति की तरंगो मे, ज्ञान की चरम कोटि पर । रग = प्रेम । रंगहिं = प्रेम मे । अर्थ - रसखान मनुष्य को कृष्ण-प्रेम के लिए प्रेरित करते हुए कहते है कि हे मनुष्य ! चाहे तुमने इतनी सम्पत्ति प्राप्त कर ली है कि उसकी विपुलता देखकर कुवेर को भी संकोच होता है, चाहे तुम इतने रूपवान हो कि अपने सौन्दर्य से कामदेव को चुनौती दे सकते हो, चाहे तुम्हारे पास इतनी सम्पत्ति ही गई है कि जिसे देखकर इन्द्र का मन भी ललचा जाए; चाहे तुमने योग- साधना के द्वारा गंगाधर शिव-रूप को प्राप्त कर लिया, चाहे तुम्हारी जीभ मुक्ति की लहरो मे डूब गई है, अर्थात् तुम ज्ञान की चरम कोटि पर पहुँच गये हो; किन्तु यदि तुमने मन लगाकर उस कृष्ण से प्रेम नही किया जो राधा- रानी से प्रेम करते है तो तुम्हारी ये उपलब्धियाँ व्यर्थ और निस्सार है । सवैया कंचन-मन्दिर ऊँचे बनाइ कै मानिक लाइ सदा भलकैयत । प्रात ही ते सगरी नगरी नग मोतिन ही की तुलानि तुलैयत । जद्यपि दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मधवा ललचैयत । ऐसे भए तौ कहा रसखानि जौ साँवरे ग्वार सो नेह न लैयत ॥२०॥ शब्दार्थ-कंचन मन्दिर = सोने के महल । मानिक = मोती । नग = हीरा । मधवा = इन्द्र । सावरे ग्वार सो = कृष्ण से । नेह = स्नेह, प्रेम । अर्थ - कृष्ण के प्रति प्रेम ही मनुष्य की सर्वाधिक मूल्यवान सम्पत्ति है । जिसे कृष्ण से प्रेम नही, उसके सभी प्रकार के वैभव निरर्थक है । इसी भाव को प्रस्तुत सवैया मे प्रकट करते हुए रसखान कहते है कि माना तुमने सोने के ऊँचे-ऊँचे महल बनाकर उन्हे मोतियो से सदैव भलका रक्खा है। तुम्हारे पास इतने हीरे और मोती है कि प्रात काल से ही सारी नगरी उन्हे तराजूओ मे तोलने लगती है और फिर भी वे तुल नही पाते । तुम इतने वैभवपूर्ण राजा बन गए हो कि तुम्हारा वैभव देखकर इन्द्र का मन भी ललचाता है, अर्थात् तुम्हारे वैभव की तुलना मे वह अपने वैभव को अत्यन्त तुच्छ मानकर स्वय को दीन-हीन अनुभव करता है और चाहता है कि तुम्हारा जैसा वैभव उसके पास भी हो । यदि तुमने कृष्ण से प्रीति नही की है तो तुम्हारा यह सब अपार

१७० रसखान-ग्रन्थावली वैभव व्यर्थ है। कहने का भाव यह है कि कृष्ण की प्रीति ही सबसे विशाल वैभव है। सारे सांसारिक वैभव उसके सामने तुच्छ और नगण्य है। विशेष—कृष्ण की प्रीति का अत्युक्तिपूर्ण वर्णन होने से इस सवैया मे अत्युक्ति अलंकार है। पाठान्तर—तीसरी पंक्ति का यह रूप भी मिलता है— 'पालैं प्रजानि प्रजापति सो अरु सम्पति सो मघवाहि लजैयत।' तुलना—'ऐसे भये तो कहा तुलसी जु पै जानकीनाथ के रंग न राते।' —तुलसी कवित्त कहा रसखानि सुखसम्पत्ति सुमार कहा, कहा तन जोगी ह्वै लगाए अंग छार को। कहा साधे पंचानल, कहा सोए बीच नल, कहा जीति लाए राज सिंधु आर-पार को। जप वार-वार तप संजम बयार-व्रत, तीरथ हजार अरे बूझत लवार को। कीन्हौ नही प्यार नही सेयौ दरवार, चित, चाह्यौ न निहार्यौ जौ पै नंद के कुमार को॥२१॥ शब्दार्थ—रसखानि = आनन्द देने वाले भंडार। सुमार = गणना। छार = धूल, भस्म। पंचानल = पाँच प्रकार की अग्नियों से तप करना; चारो ओर से जलने वाली चार अग्नियाँ तथा ऊपर से सूर्य की प्रखर गर्मी। नल = जल बयार-व्रत = बिल्कुल भूखा रहकर तप करना। लवार = मूर्ख। नन्द के कुमार को = कृष्ण को। अर्थ—कृष्ण की भक्ति के बिना और सभी तप तथा योग साधनाएँ व्यर्थ है, इस भाव को प्रकट करते हुए रसखान कहते है कि हे मनुष्य ! यदि तुमने कृष्ण से प्रेम नही किया, उसकी शरण मे नही गए, भावपूर्ण मन से उसे नही चाहा और प्रेममयी दृष्टि से उसे नही देखा तो तुम्हारे आनन्द देने वाले सारे भंडार व्यर्थ है, तुम्हारी सुख देने वाली सम्पत्ति की कोई गणना नही है, अर्थात् वे भी नगण्य है। शरीर पर भस्म लगाकर योगी बनने से कोई लाभ नही

व्याख्या भाग १७१ है, पाँच अग्नियो के मध्य बैठकर तप करना अथवा जल मे समाधि लगाना भी निरर्थक है। समुद्र के आर-पार तक का राज्य जीत लेने से भी कोई लाभ नही है। हे मूर्ख ! कृष्ण के प्रेम के बिना वार-वार जप करने को, निरा- हार रहकर तप और सयम करने को तथा हजारो तीर्थो की यात्रा करने को कौन बूझता है ? अर्थात् ये सब बेकार है। विशेष—१. ‘कीन्हो नही प्यार, नही सेयौ दरबार, चित चाह्यौ, न निहारयौ जो मै नन्द के कुमार को’ मे कोमल वर्णो से युक्त वृत्यनुप्रास है। २ कृष्ण भक्तो की यह प्रमुख विशेषता है कि वे कृष्ण को छोडकर अन्य प्रकार की साधनाओ को निरर्थक और आडम्बरपूर्ण मानते है। रसखान के प्रस्तुत कवित्त मे यही विशेषता परिलक्षित होती है। पाठान्तर— कहा तन जोगी ह्वै’ और ‘कहा सोए बीच नल’ के स्थान पर ‘कहा महा जोगी ह्व ’ और ‘कहा सोए बीच जल’ पाठ भी मिलते है। कवित्त कचन के मन्दिरनि दीठि ठहराति नाहिं, सदा दीपमाल लाल-मानिक-उजारे सो। और प्रभुताई अब कहाँ लौ बखानौ, प्रति, टारन की भीर भूप टरत न द्वारे सो। गगाजी मे न्हाइ मुक्ताहलहू लुटाइ, वेद, बीस बार गाइ, ध्यान कीजत सवारे सो। ऐसे ही भए तौ नर कहा रसखानि जो पै, चित्त दै न कीनी प्रीति पीतपटवारे सो ॥२२॥ शब्दार्थ—कचन के मन्दिरनि = सोने के महलो पर । दीठि = दृष्टि । लाल मानिक = लाल मोती । प्रतिहारन की भीर = द्वारपालो की भीड । मुक्ताहलहू = मोतियो को । सवारे सो = शीघ्रता से, प्रात काल मे । पीतपट- वारे सो = कृष्ण से । अर्थ—कृष्ण की प्रीति के अभाव मे दुनिया के सारे वैभव और सारी साधनाएँ निरर्थक है, इस भाव को व्यक्त करते हुए रसखान कहते है कि हे

३७२ रसखान-ग्रन्थावली मनुष्य ! यदि तुमने चित्त लगाकर कृष्ण से प्रीति नही की है तो तुम्हारे सोने के वे महल बेकार है जो सदा लाल मोतियो की दीपमालाओ से प्रकाशित रहते हैं और जिन्हे देखते ही दृष्टि चौंधिया जाती है। तुम्हारी अधिक प्रभुता का तो क्या वर्णन करूँ, यदि तुम इतने प्रभुत्व सम्पन्न हो गए हो कि अनेक राजा तुम्हारे प्रतिहार बने हुए है और उनकी भीड कभी भी तुम्हारे द्वार से नही हटती तो कृष्ण के प्रेम के अभाव मे यह प्रभुता व्यर्थ है। चाहे तुम—गगाजी मे स्नान करके मुक्त हस्त से मोतियो का दान करो, अनेक बार वेदो का पाठ करो और प्रात काल ध्यानावस्थित हो, किन्तु जब तक तुम कृष्ण से प्रीति नही करोगे, तब तक तुम्हारी ये साधनाएँ निष्फल ही रहेगी। कहने का भाव यह है कि कृष्ण की भक्ति ही सर्वोपरि और सर्वोच्च भक्ति है। विशेष—१. ‘दीठि ठहराति नाहिं’ मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग है। २. इस कवित्त मे ‘प्रतिहारन’ शब्द खडित है, अतः यहाँ पद-भग दोष है। सवैया एक सु तीरथ डोलत है इक वार हजार पुरान बके हैं। एक लगे जप मे तप मे इक सिद्ध समाधिन मे अटके है। चेत जु देखत हौ रसखान सु मूढ महा सिगरे भटके है। साँचहि वे जिन आपुनपौ यह स्याम गुपाल पै वारि दके है ॥२३॥ शब्दार्थ—बके है = कहे है, कथाएँ सुनाई है। चेत = सावधान। सिगरे = सारे। आपुनपौ = अपनापन, स्वय को। छके है = मस्त है। अर्थ—तीर्थादि वाह्याडम्बरो का खडन और कृष्ण-प्रेम का मडन करतेहुए रसखान कहते है कि कोई मनुष्य तो तीर्थों की यात्रा करता हुआ घूमता है, कोई हजारो बार पुराणों की कथाओ को सुनाता है, अर्थात् पुराणो का पाठ करता है। कोई जप-तप मे लगा हुआ है, कोई सिद्ध बनकर समाधि मे अटका हुआ है। रसखान कहते है कि यदि सावधान होकर इन्हे देखा जाता है तो यही निष्कर्ष निकलता है कि ये सब महामूर्ख बनकर भटक रहे हैं। सही तो वे मनुष्य है जो स्वय को कृष्ण के लिए अर्पित करके उस समर्पण की मस्ती से

व्याख्या भाग १७३

मस्त बने हुए हैं । विशेष १ अनन्यभाव का प्रेम अभिव्यजित है । २. 'वक' शब्द का प्रयोग कवि के मन की अतिशय घृणा का सूचक है । ३. श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रथावली' में यह सवैया नही है । सवैया सुनियै सब की कहिये न कछू रहियै इमि या भव-वागर मै । करियै व्रत-नेम सच्चाई लिये जिन ते तरियै मन-सागर मै । मिलियै सब सो दुरभाव बिना रहिये सतसंग उजागर मै । रसखानि गुविन्दहि यौ भजियै जिमि नागरि को चित गागर मै ॥२४॥ शब्दार्थ—इमि = इस प्रकार । भव-बागर मै = असत्य ससार मे । उजा- गर = प्रकाश । नागरि = स्त्री । गागर = पानी का बर्तन । अर्थ—रसखान सासारिक मनुष्य को उपदेश देते हुए कहते है कि हे मनुष्य ! तुम इस असत्य ससार मे इस प्रकार रहो कि सबकी सुनो, पर अपनी बात किसी से भी मत कहो । जो भी व्रत और नियम ग्रहण करो वे सत्य हो । सत्य व्रत और नियमो से ही मन का सागर पार किया जा सकता है, अर्थात् मन को अपने वश मे किया जा सकता है; सबसे अच्छी भावना लेकर मिलो और सदैव सत्सग के प्रकाश मे रहो, अर्थात् अच्छी सगति मे ही उठो-बैठो और एकाग्रमन से कृष्ण की भक्ति करो तुम्हारा मन कृष्ण की भक्ति मे उसी प्रकार एकाग्रता से लगना चाहिए जिस प्रकार स्त्री का मन अपने पानी के बर्तन मे लगा होता है । (स्त्रियाँ अपने सिर पर जब पानी का बर्तन लेकर चलती हैं तो उसके हाथ नही लगाती । वह गिर न जाये, इसलिए उसका सन्तुलन बनाये रखने के लिए वह उसकी ओर एकाग्र मन लगाये रहती है) । विशेष—१ 'भव-बागर' और 'मन-सागर' मे रूपक अलकार; 'मिलियै सब सो दुरभाव बिना' मे विनोक्ति अलकार, 'रसखानि गुविन्दहि यौ भजियै जिमि नागरि को चित गागर मैं' मे उपमा अलकार है । २. 'जिमि नागरि को चित गागर मे' इस पदाश का एक अर्थ यह भी हो सकता है—