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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मर्यो न योषामभ्येति पश्चात्.
यत्रा नरो देवयन्तो युगानि वितन्वते प्रति भद्राय भद्रम्.. (२)
सूर्य दीप्यमान उषा का अनुगमन उसी प्रकार करता है, जिस प्रकार पुरुष नारी के पीछे-
पीछे चलता है. इसी समय लोग सूर्य संबंधी यज्ञ करने की इच्छा से कार्य विस्तार करते हैं.
कल्याण पाने के लिए हम सूर्य की स्तुति करते हैं. (२)
भद्रा अश्वा हरितः सूर्यस्य चित्रा एतग्वा अनुमाद्यासः.
नमस्यन्तो दिव आ पृष्ठमस्थुः परि द्यावापृथिवी यन्ति सद्यः.. (३)
सूर्य के कल्याणकारक, विचित्र लोगों द्वारा क्रमशः स्तुत एवं हमारे द्वारा नमस्कृत हरित
नाम के घोड़े आकाश के ऊपर उपस्थित होकर शीघ्र ही धरती और आकाश का परिभ्रमण
कर लेते हैं. (३)
तत्सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्तोर्विततं सं जभार.
यदेदयुक्त हरितः सधस्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै.. (४)
यही सूर्य का ईश्वरत्व और महत्त्व है कि वह संसार के कर्म समाप्त होने से पहले ही
विश्व में फैली अपनी किरणें समेट लेते हैं. वे जब अपने रथ से हरित नामक घोड़ों को अलग
करते हैं, तभी रात्रि इस प्रकार अंधकार फैलाती है, जैसे जगत् पर परदा डाल रही हो. (४)
तन्मित्रस्य वरुणस्याभिचक्षे सूर्यो रूपं कृणुते द्योरुपस्थे.
अनन्तमन्यद्रुशदस्य पाजः कृष्णमन्यद्धरितः सं भरन्ति.. (५)
सूर्य धरती और आकाश के बीच अपना सर्वप्रकाशक तेज इसलिए फैलाते हैं, जिससे
मित्र और वरुण उन्हें सम्मुख देख सकें. सूर्य के घोड़े एक ओर अवसानरहित, जगत्प्रकाशक
बल एवं दूसरी ओर काले रंग का अंधेरा धारण करते हैं. (५)
अद्या देवा उदिता सूर्यस्य निरंहसः पिपृता निरवद्यात्.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (६)
हे सूर्यकिरणो! इस सूर्योदय के समय हमें पापों से बचाओ. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु,
पृथ्वी एवं आकाश हमारी इस प्रार्थना को स्वीकार करें. (६)
सूक्त—११६ देवता—अश्विनीकुमार
नासत्याभ्यां बर्हिरिव प्र वृञ्जे स्तोमाँ इयर्म्यभ्रियेव वातः.
यावर्भगाय विमदाय जायां सेनाजुवा न्यूहतू रथेन.. (१)
जिस प्रकार कोई यजमान यज्ञ के निमित्त कुश छेदन करता है अथवा वायु बादलों के
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जल को प्रेरित करता है, उसी प्रकार मैं अश्विनीकुमारों की पर्याप्त स्तुति करता हूं. उन्होंने
किशोर विमद को अपने रथ द्वारा शत्रुओं से पहले ही स्वयंवर में पहुंचाकर पत्नी प्राप्त कराई
थी. उनके रथ को शत्रु सेना नहीं पा सकी. (१)
वीळुपत्मभिराशुहेमभिर्वा देवानां वा जूतिभिः शाशदाना.
तद्रासभो नासत्या सहस्रमाजा यमस्य प्रधने जिगाय.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने बलपूर्वक उछलने वाले एवं शीघ्रगामी अश्वों तथा इंद्रादि
देवों की प्रेरणाओं से प्रेरित हो. तुम्हारा वाहन रासभ इंद्र को प्रसन्न करने वाले बहुधनशाली
संग्रामों में हजारों बार विजयी हुआ था. (२)
तुग्रो ह भुज्युमश्विनोदमेघे रयिं न कश्चिन्ममृवाँ अवाहाः.
तमूहथुर्नौभिरात्मन्वतीभिरन्तरिक्षप्रुद्भिरपोदकाभिः.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार कोई मरता हुआ व्यक्ति धन का त्याग करता है, उसी
प्रकार शत्रुपीड़ित तुग्र ने अपने पुत्र थुज्यु को शत्रु विजय के लिए नाव से गमन करने के
निमित्त सागर में भेजा. तुमने सागर में डूबते हुए भुज्यु को अंतरिक्ष में चलने वाली एवं
जलप्रवेशरहित अपनी नाव द्वारा तुग्र के पास पहुंचाया था. (३)
तिस्रः क्षपस्त्रिरहातिव्रजद्भिर्नासत्या भुज्युमूहथुः पतङ्गैः.
समुद्रस्य धन्वन्नार्द्रस्य पारे त्रिभी रथैः शतपद्भिः षळश्वैः.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने भुज्यु को सौ पहियों वाले, छह घोड़ों से खींचे जाते हुए, तीन
दिन एवं तीन रात से अधिक चलने वाले तीन शीघ्रगामी रथों द्वारा जलपूर्ण सागर के जलहीन
किनारे पर पहुंचाया था. (४)
अनारम्भणे तदवीरयेथामनास्थाने अग्रभणे समुद्रे.
यदश्विना ऊहथुर्भुज्युमस्तं शतारित्रां नावमातस्थिवांसम्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने सागर में डूबते हुए भुज्यु को सौ डांडों से चलने वाली नौका में
बैठाकर अपने घर पहुंचाया था. वह सागर आलंबनरहित, भू प्रदेश से भिन्न, हाथ से पकड़ने
योग्य शाखा आदि से हीन था, जिसमें तुमने यह पराक्रम किया. (५)
यमश्विना ददथुः श्वेतमश्वमघाश्वाय शश्वदित्स्वस्ति.
तद्वां दात्रं महि कीर्तेन्यं भूत्पैद्वो वाजी सदिमद्धिद्वयो अर्यः.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने अघाश्व पेदु को नित्यविजय दिलाने वाला श्वेत अश्व दिया था.
तुम्हारा वह दान महान् एवं प्रशंसनीय है एवं पेदु का उत्तम अश्व सदा हमारा आदरणीय रहेगा.
(६)
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युवं नरा स्तुवते पज्रियाय कक्षीवते अरदतं पुरन्धिम्.
कारोतराच्छफादश्वस्य वृष्णः शतं कुंभाँ असिञ्चतं सुरायाः.. (७)
हे नेताओ! तुमने स्तुति करने वाले अंगिरागोत्रीय कक्षीवान् को पर्याप्त बुद्धि दी थी.
जिस प्रकार शराब बनाने वाले कारोतर नामक पात्र से सुरा का आसवन करते हैं, उसी प्रकार
तुमने अपने सवन-समर्थ अश्व के खुर से सौ घड़े शराब निकाली. (७)
हिमेनाग्निं घ्रंसमवारयेथां पितुमतीमूर्जमस्मा अधत्तं.
ऋबीसे अत्रिमश्विनावनीतमून्निन्थ्युः सर्वगणं स्वस्ति.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने ठंडे जल से उस अग्नि को बुझाया था, जो असुरों द्वारा उन्हें
पीड़ा पहुंचाने के लिए जलाई गई थी. तुमने उन्हें अन्नसहित बलप्रद क्षीर दिया था. अत्रि
यंत्रपीड़ार्गह में नीचे को मुंह करके लटकाए गए थे, तुमने उन्हें उनके साथियों सहित छुड़ाया.
(८)
परावतं नासत्यानुदेथामुच्चाबुधं चक्रथुर्जिह्मबारम्.
क्षरन्नापो न पायनाय राये सहस्राय तृष्यते गोतमस्य.. (९)
हे अश्विनीकुमारो! तुम गौतम ऋषि के समीप कुएं को ले गए थे. उसका मूल ऊपर एवं
द्वार नीचे कर दिया था. उस में से हव्य देने वाले एवं सहनशील गौतम के पीने के निमित्त जल
निकलने लगा था. (९)
जुजुरुषो नासत्योत वव्रिं प्रामुञ्चतं द्रापिमिव च्यवानात्.
प्रातिरतं जहितस्यायुर्देसादित्पतिमकृणुतं कनीनाम्.. (१०)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने जीर्ण च्यवन ऋषि को व्याप्त करने वाले बुढ़ापे को कवच के
समान दूर कर दिया था. हे दर्शनीयो! तुमने पुत्रों द्वारा परित्यक्त च्यवन का जीवन बढ़ाया एवं
उन्हें कन्याओं का पति बनाया. (१०)
तद्वां नरा शंस्यं राध्यं चाभिष्टिमन्नासत्या वरूथम्.
यदिद्धांसा निधिमिवापगूळ्हमुद्दर्शतादूपथुर्वन्दनाय.. (११)
हे नेता रूप अश्विनीकुमारो! तुमने गुप्त धन के समान कुएं में छिपे वंदन ऋषि को
जानकर वहां से निकाला. तुम्हारा यह कर्म चाहने योग्य, वरणीय एवं प्रशंसनीय है. (११)
तद्वां नरा सनये दंस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम्.
दध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य शीर्ष्णा प्र यदीमुवाच.. (१२)
हे नेताओ! अथर्वा के पुत्र दध्यंग ऋषि ने तुम्हारे सामर्थ्य से अश्व की ग्रीवा धारण करके
मधुर वचन बोले थे. यह तुम्हारे उग्र कर्म को उसी प्रकार प्रकट करता है, जिस प्रकार बादल
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का गर्जन बादल के भीतर जल को बताता है. (१२)
अजोहवीन्नासत्या करा वां महे यामन्पुरुभुजा पुरन्धिः.
श्रुतं तच्छासुरिव वध्रिमत्या हिरण्यहस्तमश्विनावदत्तम्.. (१३)
हे लंबे हाथों वाले अश्विनीकुमारो! परम बुद्धिमती ऋषिपत्नी वध्रिमती ने अपने पूजनीय
स्तोत्र में तुम अभिमत फलदाताओं को बार-बार बुलाया था. तुमने शिष्य के समान उसकी
पुकार सुनी एवं उसे हिरण्यहस्त नाम का पुत्र दिया. (१३)
आस्नो वृकस्य वर्तिकामभीके युवं नरा नासत्यामुक्तम्.
उतो कविं पुरुभुजा युवं ह कृपमाणमकृणुतं विचक्षे.. (१४)
हे नेताओ! तुमने वृक और वर्तिका के संग्राम में वृक के मुख से वर्तिका को छुड़ाया था.
तुमने स्तुतिकर्त्ता विद्वान् को देखने की शक्ति दी थी. (१४)
चरित्रं हि वेरिवाच्छेदि पर्णमाजा खेलस्य परितक्म्यायाम्.
सद्यो जङ्घामायसीं विश्पलायै धने हिते सर्तवे प्रत्यधत्तम्.. (१५)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार पक्षी का पंख अलग हो जाता है, उसी प्रकार खेल राजा
की पत्नी विश्पला का पैर युद्ध में कट गया था. तुमने शत्रुओं द्वारा छिपाया हुआ धन प्राप्त
करने के निमित्त चलने के लिए विश्पला के लिए रात भर में लोहे का पैर बनाकर दिया था.
(१५)
शतं मेषान्वृक्ये चक्षदानमृज्राश्वं तं पितान्धं चकार.
तस्मा अक्षी नासत्या विचक्ष आधत्तं दस्रा भिषजावनर्वन्.. (१६)
हे अश्विनीकुमारो! ऋज्राश्व ऋषि ने अपनी वृकी के भोजन के लिए सौ भेड़ों को काट
दिया था. इससे उनके पिता ने उन्हें अंधा कर दिया था. हे देवों के वैद्यो! तुमने ऋज्राश्व की
देखने में असमर्थ दोनों आंखों को देखने में समर्थ बना दिया था. (१६)
आ वां रथं दुहिता सूर्यस्य कार्ष्मेवातिष्ठदर्वता जयन्ती.
विश्वे देवा अन्वमन्यन्त हृद्भिः समु श्रिया नासत्या सचेथे.. (१७)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार दौड़ने वाले घोड़ों में सबसे आगे वाला निश्चित स्थान पर
गड़ी लकड़ी तक पहले पहुंचता है, उसी प्रकार अवधि पर शीघ्र पहुंचने वाले घोड़ों के कारण
सूर्यपुत्री सूर्या तुम्हारे रथ पर बैठ गई. सारे देवों ने सहर्ष यह बात मान ली और तुमने कांति
प्राप्त की. (१७)
यदयातं दिवोदासाय वर्तिर्भरद्वाजायश्विना हयन्ता.
रेवदुवाह सचनो रथो वां वृषभश्च शिंशुमारश्च युक्ता.. (१८)
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हे अश्विनीकुमारो! दिवोदास ने अन्न हव्य रूप में देकर तुम्हारी स्तुति की तो तुम उसके
घर गए. उस समय तुम्हारी सेवा करने वाला रथ अन्न ले गया था. उस में घोड़े और मगर जुड़े
थे. (१८)
रयिं सुक्षत्रं स्वपत्यमायुः सुवीर्यं नासत्या वहन्ता.
आ जाह्नावीं समनसोप वाजैस्त्रिरह्नो भागं दधतीमयातम्.. (१९)
हे अश्विनीकुमारो! समान मन वाले तुम दोनों शोभन बल, धन, संतान एवं सुंदर
शक्तियुक्त अन्न लेकर जह्नु ऋषि की प्रजाओं के पास गए थे. उन्होंने हव्य अन्नों के साथ
दैनिक यज्ञ के तीनों भाग तुम्हें अर्पित किए थे. (१९)
परिविष्टं जाहुषं विश्वतः सीं सुगेभिर्नक्तमूहथू रजोभिः.
विभिन्दुना नासत्या रथेन वि पर्वताँ अजरयू अयातम्.. (२०)
हे अश्विनीकुमारो! जरारहित तुम दोनों ने शत्रुओं द्वारा चारों ओर से घेरे हुए जाहुष राजा
को अपने सर्वभेदक लौह-निर्मित रथ द्वारा रात में सरल मार्ग से बाहर निकाला एवं ऐसे पर्वतों
पर गए, जहां शत्रु न चढ़ सकें. (२०)
एकस्या वस्तोरवतं रणाय वशमश्विना सनये सहस्रा.
निरहतं दुच्छुना इन्द्रवन्ता पृथुश्रवसो वृषणावरातीः.. (२१)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने वश ऋषि की इसलिए रक्षा की थी कि वे एक दिन में हजार
धन प्राप्त कर सकें. हे कामवर्षको! तुमने इंद्र के साथ मिलकर पृथुश्रवा को कष्ट देने वाले
शत्रुओं को मारा था. (२१)
शरस्य चिदार्त्तकस्यावतादा नीचादुच्चा चक्रथुः पातवे वाः.
शयवे चिन्नासत्या शचीभिर्जसुरये स्तर्यं पिप्यथुर्गाम्.. (२२)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने कुएं के नीचे से जल को इसलिए ऊपर उठाया था, जिससे कि
तुम्हारा स्तोता, ऋचत्क पुत्र शर जल पी सके. थके हुए शंयु की प्रसवरहित गाय को तुमने
अपने कर्मों द्वारा दुग्धपूर्ण बनाया था. (२२)
अवस्यते स्तुवते कृष्णियाय ऋजूयते नासत्या शचीभिः.
पशुं न नष्टमिव दर्शनाय विष्णाप्वं ददथुर्विश्वकाय.. (२३)
हे अश्विनीकुमारो! कृष्ण के पुत्र सीधे-सादे विश्वकाय ऋषि ने अपनी रक्षा की इच्छा से
तुम्हारी प्रार्थना की. जिस प्रकार कोई खोया हुआ पशु उसके स्वामी को दिखा दे, उसी प्रकार
तुमने उसके खोए हुए पुत्र विष्णापु को दिखा दिया था. (२३)
दश रात्रीरशिवेना नव द्यूनवनद्धं श्रथितमप्स्व१न्तः.
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विप्रुतं रेभमुदनि प्रवृक्तमुन्निन्धथुः सोममिव स्रुवेण.. (२४)
असुर शत्रुओं ने रेभ ऋषि को पीटा और दुःखद रस्सियों से बांधकर कुएं में डाल दिया.
व्यथित एवं जल से भीगे रेभ दस रात और नौ दिन तक वहीं पड़े रहे. जिस प्रकार अध्वर्यु
सुच की सहायता से सोमरस निकालता है, उसी प्रकार तुमने उन्हें कुएं से निकाला. (२४)
प्र वां दंसांस्यश्विनाववोचमस्य पतिः स्यां सुगवः सुवीरः.
उत पश्यन्नश्रुवन्दीर्घमायुरस्तमिवेज्जरिमाणं जगम्याम्.. (२५)
हे अश्विनीकुमारो! मैंने तुम्हारे पुराकृत कर्मों का वर्णन किया है. मैं सुंदर गायों एवं वीरों
का स्वामी होने के साथ-साथ राष्ट्र का स्वामी बनूं. जिस प्रकार घर का मालिक घर में बिना
बाधा के घुसता है, उसी प्रकार मैं भी आंखों से देखता हुआ दीर्घ आयु भोग कर बुढ़ापे में
प्रवेश करूं. (२५)
सूक्त—११७ देवता—अश्विनीकुमार
मध्वः सोमस्याश्विना मदाय प्रत्नो होता विवासते वाम्.
बर्हिष्मती रातिर्विश्रिता गीरिषा यातं नासत्योप वाजैः.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा पुराना होता तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मधुर सोमरस से
तुम्हारी सेवा करता है. ऋत्विजों द्वारा स्तुति के साथ ही कुशों पर हव्य रखा गया है. हमारे
लिए देवबल और अन्न के साथ हमारे यहां आओ. (१)
यो वामश्विना मनसो जवीयान्रथः स्वश्वो विश आजिगाति.
येन गच्छथः सुकृतो दुरोणं तेन नरा वर्तिरस्मभ्यं यातम्.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! मन से भी अधिक तीव्रगामी एवं सुंदर घोड़ों वाला तुम्हारा जो रथ
प्रजाओं की ओर जाता है तथा जिससे तुम सुंदर यज्ञ करने वाले लोगों के घर जाते हो, हे
नेताओ! तुम उसी रथ द्वारा हमारे समीप आओ. (२)
ऋर्षिं नरावंहसः पाञ्चजन्यमृबीसादत्रिं मुञ्चथो गणेन.
मिनन्ता दस्योरशिवस्य माया अनुपूर्वं वृष्णा चोदयन्ता.. (३)
हे नेता एवं कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुमने पांच जनों द्वारा पूजित अत्रि को शतद्वार
यंत्रगृह की पाप रूप तुषानल से पुत्र-पौत्रों सहित छुड़ाया था. इसके लिए तुमने शत्रुओं की
हिंसा एवं दस्युओं की दुःखदायिनी माया का क्रमशः विनाश किया. (३)
अश्वं न गूळ्हमश्विना दुरैवैर्ऋर्षिं नरा वृषणा रेभमप्सु.
सं तं रिणीथो विप्रुतं दंसोभिर्न वां जूर्यन्ति पूर्व्या कृतानि.. (४)
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हे नेता एवं कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुमने दुर्दांत दस्युओं द्वारा कुएं के जल में डुबाए
गए रेभ ऋषि को बाहर निकालकर उनका विकलांग शरीर घोड़े के समान अपनी दवाओं से
ठीक किया था. तुम्हारे पूर्वकृत कार्य अभी पुराने नहीं हुए हैं. (४)
सुषुप्व़ांसं न निर्ऋतेरुपस्थे सूर्यं न दस्रा तमसि क्षियन्तम्.
शुभे रुक्मं न दर्शतं निखातमुदूपथुरश्विना वन्दनाय.. (५)
हे दर्शनीयो! तुमने धरती के ऊपर सोए हुए मनुष्य के समान पड़े हुए, कुएं में पड़ने वाले
सूर्यबिंब के समान तेजस्वी एवं शोभन स्वर्ण निर्मित अलंकार के समान दर्शनीय कूपपतित
वंदन ऋषि को बाहर निकाला था. (५)
तद्वां नरा शंस्यं पज्रियेण कक्षीवता नासत्या परिज्मन्.
शफादश्वस्य वाजिनो जनाय शतं कुम्भाँ असिञ्चतं मधूनाम्.. (६)
हे नेता रूप नासत्यो! अभीष्ट प्राप्ति के कारण कहे जाने वाले अनुष्ठान के समान ही मैं
अंगिरावंशी कक्षीवान् तुम्हारे यज्ञ की प्रतिज्ञा करता हूं. तुमने वेगवान् घोड़ों के खुरों से निकले
हुए मधु से अपेक्षित लोगों के लिए सैकड़ों घड़े भर दिए थे. (६)
युवं नरा स्तुवते कृष्णियाय विष्णाप्वं ददथुर्विश्वकाय.
घोषायै चित्पितृषदे दुरोणे पतिं जूर्यन्त्या अश्विनावदत्तम्.. (७)
हे नेताओ! कृष्ण के पुत्र विश्वकाय ने तुम लोगों की स्तुति की तो तुमने उसके खोए हुए
पुत्र विष्णायु को लाकर दे दिया. हे अश्विनीकुमारो! कुष्ठ रोग के कारण पति को प्राप्त न
करके अपने पिता के घर बैठी हुई एवं वृद्धावस्था को प्राप्त घोषा को तुमने पति प्रदान किया.
(७)
युवं श्यावाय रुशतीमदत्तं महः क्षोणस्याश्विना कण्व़ाय.
प्रवाच्यं तद्वृषणा कृतं वां यन्नार्षदाय श्रवो अध्यधत्तम्.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने कोढ़ी श्याव ऋषि को उज्ज्वल त्वचा वाली स्त्री प्रदान की एवं
दृष्टिरहित होने के कारण चलने में अशक्त कण्व को तेजपूर्ण नेत्र दिए. हे कामवर्षको! तुमने
नृषद के बहरे पुत्र को कान प्रदान किए. तुम्हारे ये कार्य प्रशंसा के योग्य हैं. (८)
पुरू वर्पांस्याश्विना दधाना नि पेदव ऊहथुराशुमश्वम्.
सहस्रसां वाजिनमप्रतीतमहिहनं श्रवस्यं1 तरुत्रम्.. (९)
हे बहुरूपधारी अश्विनीकुमारो! तुमने पेदु ऋषि को शीघ्रगामी सहस्र संख्या वाले धन
का दाता, बलवान्, शत्रुओं द्वारा जीतने में अशक्य, शत्रुहंता, स्तुतिपात्र एवं रक्षक अश्व दिया
था. (९)
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एतानि वां श्रवस्या सुदानू ब्रह्माङ्गूषं सदनं रोदस्योः.
यद्द्वां पज्रासो अश्विना हवन्ते यातमिशा च विदुषे च वाजम्.. (१०)
हे शोभनदानशील अश्विनीकुमारो! तुम्हारे वीर-कार्य सबके जानने योग्य हैं. धरती और
आकाश के रूप में वर्तमान तुम दोनों की स्तुति प्रसन्नतादायक एवं घोषणा करने योग्य है.
अंगिरागोत्रीय यजमान तुम्हें जब-जब बुलावें, तब-तब देने योग्य अन्न लेकर आओ एवं तुम्हारी
स्तुति जानने वाले मुझको बल प्रदान करो. (१०)
सूनोर्मनेनाश्विना गृणाना वाजं विप्राय भुरणा रदन्ता.
अगस्त्ये ब्रह्मणा वावृधाना सं विस्पलां नासत्यारिणीतम्.. (११)
हे पोषणकर्त्ता एवं सत्य स्वभाव वाले अश्विनीकुमारो! तुमने कुंभ से उत्पन्न अगस्त्य
ऋषि की स्तुतियों का विषय बनकर मेधावी भरद्वाज ऋषि को अन्न दिया एवं मंत्रों से वृद्धि
पाकर तुमने विष्पला की जंघा को तोड़ा. (११)
कुह यान्ता सुष्टुतिं काव्यस्य दिवो नपाता वृषणा शयुत्रा.
हिरण्यस्येव कलशं निखातमूदूथुर्दशमे अश्विनाहन्.. (१२)
हे सूर्यपुत्र एवं कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुम किस निवासस्थान में वर्तमान काव्य की
शोभन स्तुति सुनने जाते हो? जिस प्रकार सोने से भरे एवं धरती में गड़े कलश को कोई
जानकार ही निकालता है, उसी प्रकार तुमने कुएं में पड़े रेभ ऋषि को दसवें दिन बाहर
निकाला था. (१२)
युवं च्यवानमश्विना जरन्तं पुनर्युवानं चक्रथुः शचीभिः.
युवो रथं दुहिता सूर्यस्य सह श्रिया नासत्यावृणीत.. (१३)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने अपने ओषधि दान के कार्य द्वारा वृद्ध च्यवन ऋषि को युवा
बनाया. हे सत्य स्वभावो! सूर्य की पुत्री संपत्ति के साथ तुम्हारे रथ पर चढ़ी थी. (१३)
युवं तुग्राय पूर्व्येभिरेवैः पुनर्मन्यावभवतं युवाना.
युवं भुज्युमर्णसो निः समुद्राद्विभिरूहथुऋञ्जेभिरश्वैः.. (१४)
हे दुःखनिवारको! तुम जिस प्रकार प्राचीन समय में तुग्र के स्तुतिपात्र थे, उसी प्रकार
बाद में भी स्तुतिपात्र रहे. तुम सेना के साथ डूबे हुए भुज्यु को अधिक जलयुक्त सागर में
गमनशील नौकाओं एवं शीघ्रगति वाले अश्वों द्वारा ले आए थे. (१४)
अजोहवीदश्विना तौग्र्यो वां प्रोळ्हः समुद्रमव्यथिर्जगन्वान्.
निष्टमूहथुः सुयुजा रथेन मनोजवसा वृषणा स्वस्ति.. (१५)
हे अश्विनीकुमारो! तुग्र द्वारा समुद्र में भेजे गए एवं जल में डूबे हुए भुज्यु ने
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सरलतापूर्वक सागर के पार जाकर तुम्हारी स्तुति की थी. हे मनोवेगयुक्तो एवं कामवर्षको!
तुम शोभन अश्वों वाले रथ द्वारा क्षेमपूर्वक भुज्यु को लाए थे. (१५)
अजोहवीदश्विना वर्तिका वामास्नो यत्सीममुञ्चतं वृकस्य.
वि जयुषा ययथुः सान्वद्रेर्जातं विष्वाचो अहतं विषेण.. (१६)
हे अश्विनीकुमारो! वर्तिका ने उस समय तुम दोनों का आह्वान किया था, जिस समय
तुमने वृक के मुख से उसे बचाया था. तुम अपने जयशील रथ द्वारा जाहुष को लेकर पर्वत
की चोटियों पर चले गए थे एवं विष्वाच राक्षस के पुत्र को तुमने विष से मारा था. (१६)
शतं मेषान्वृक्ये मामहानं तमः प्रणीतमशिवेन पित्रा.
आक्षी ऋज्राश्वे अश्विनावधत्तं ज्योतिरन्धाय चक्रथुर्विचक्षे.. (१७)
हे अश्विनीकुमारो! वृकों के निमित्त सौ मेषों को समर्पित करने वाले एवं दुःखदायी पिता
द्वारा अंधे बनाए गए ऋजाश्व को तुमने नेत्र दिए एवं उस अंधे को संसार देखने योग्य बनाया.
(१७)
शुनमन्धाय भरमह्वयत्सा वृकीरश्विना वृषणा नरेति.
जारः कनीन इव चक्षदान ऋज्राश्वः शतमेकं च मेषान्.. (१८)
हे नेताओ एवं कामवर्षी अश्विनीकुमारो! दृष्टिहीन को पोषण का कारणभूत सुख देने की
इच्छा से वृकी ने तुम्हें बुलाया था, क्योंकि ऋजाश्व ने उसी प्रकार एक सौ एक मेष के टुकड़े
करके मुझे दिए हैं, जिस प्रकार यौवन प्राप्त कामुक किसी परस्त्री को बहुत सा धन देता है.
(१८)
मही वामूतिरश्विना मयोभूरूत स्रामं धिष्ण्या सं रिणीथः.
अथा युवामिदह्वयत्पुरन्धिरागच्छतं सीं वृषणाववोभिः.. (१९)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा महान् रक्षाकार्य सुख का कारण है. हे स्तुतिपात्रो! तुमने
व्याधित पुरुषों को स्वस्थ शरीर वाला बनाया था. बहुबुद्धिसंपन्ना घोषा ने रोग नाश के निमित्त
तुम्हीं को बुलाया था. हे कामवर्षको! अपने रक्षणकार्य सहित यहां आओ. (१९)
अधेनुं दस्रा स्तर्य१ं विषक्तामपिन्वतं शयवे अश्विना गाम्.
युवं शचीभिर्विमदाय जायां न्यूहथुः पुरुमित्रस्य योषाम्.. (२०)
हे दर्शनीयो! तुमने विशेषरूप से कृश अंगों वाली, निवृत्तप्रसवा एवं दुग्धहीना गाय को
शंयु के निमित्त दुधारू बनाया था. तुमने अपने कर्मों द्वारा पुरुमित्र की कन्या को विमद ऋषि
की पत्नी बनाया था. (२०)
यवं वृकेणाश्विना वपन्तेषं दुहन्ता मनुषाय दस्रा.
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अभि दस्युं बकुरेणा धमन्तोरु ज्योतिश्चक्रथुरायर्याय.. (२१)
हे दर्शनीय अश्विनीकुमारो! तुमने विद्वान् मनु के लिए हल द्वारा जुते हुए खेत में जौ
बोए, अन्न की हेतुभूत वर्षा की एवं भासमान वज्र द्वारा दस्युओं का नाश करके अपना
माहात्म्य विस्तृत किया. (२१)
आथर्वणायाश्विना दधीचेऽश्व्यं शिरः प्रत्यैरयतम्.
स वां मधु प्र वोचदृतायन्त्वाष्ट्रं यदस्रावपिकक्ष्यं वाम्.. (२२)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने अथर्वा के पुत्र दधीचि के धड़ पर घोड़े का सिर लगाया था.
उसने पूर्वकृत प्रतिज्ञा को सत्य बनाते हुए त्वष्टा से प्राप्त मधुविद्या तुम्हें बताई थी. हे
दर्शनीयो! वही तुम लोगों से संबंधित प्रवर्ग्य नामक विद्या बनी. (२२)
सदा कवी सुमतिमा चके वां विश्वा धियो अश्विना प्रावतं मे.
अस्मे रयिं नासत्या बृहन्तमपत्यसाचं श्रुत्यं रराथाम्.. (२३)
हे क्रांतदर्शी अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हारी कल्याणकारिणी अनुग्रह बुद्धि की सदा प्रार्थना
करता हूं. तुम मेरे सभी कर्मों की रक्षा करो. हे दर्शनीयो! हमें महान्, संतानयुक्त एवं
प्रशंसनीय धन दो. (२३)
हिरण्यहस्तमश्विना रराणा पुत्रं नरा वधिमत्या अदत्तम्.
त्रिधा ह श्यावमश्विना विकस्तमुज्जीवस ऐरयतं सुदानू... (२४)
हे दाता एवं नेता अश्विनीकुमारो! तुमने तीन भागों में विच्छिन्न श्याव को जीवन दिया है.
(२४)
एतानि वामश्विना वीर्याणि प्र पूर्व्याण्यायवोऽवोचन्.
ब्रह्म कृण्वन्तो वृषणा युवभ्यां सुवीरासो विदथमा वदेम.. (२५)
हे अश्विनीकुमारो! मेरे द्वारा कहे गए तुम्हारे इन वीर-कर्मों को प्राचीन लोगों ने कहा है.
हे कामवर्षको! तुम्हारी स्तुति करते हुए हम शोभन वीरों से युक्त होकर यज्ञ के अभिमुख हों.
(२५)
सूक्त—११८ देवता—अश्विनीकुमार
आ वां रथो अश्विना श्येनपत्वा सुमृळीकः स्ववाँ यात्वर्वाङ्.
यो मर्त्यस्य मनसो जवीयान्त्रिवन्धुरो वृषणा वातरंहाः.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा घोड़ों से चलने वाला सुखयुक्त एवं धनयुक्त रथ हमारे सामने
आए. हे कामवर्षको! वह मानव मन के समान वेगवान् त्रिबंधुर एवं वायु के समान तीव्रगामी
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है. (१)
त्रिवन्धुरेण त्रिवृता रथेन त्रिचक्रेण सुवृता यातमर्वाक्.
पिन्वतं गा जिन्वत मर्वतो नो वर्धयतमश्विना वीरमस्मे.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने त्रिबंधुर, तीन पहियों वाले, तीन लोकों में चलने वाले एवं
शोभन गति वाले रथ द्वारा हमारे समीप आओ. हमारी गायों को दुधारू, हमारे घोड़ों को
प्रसन्न एवं हमारे पुत्रादि को वृद्धियुक्त करो. (२)
प्रवद्यामना सुवृता रथेन दस्राविमं शृणुतं श्लोकमद्रेः.
किमङ्ग वां प्रत्यवर्तिं गमिष्ठाहुर्विप्रासो अश्विना पुराजाः.. (३)
हे दर्शनीय अश्विनीकुमारो! अपने शीघ्रगामी एवं शोभन आकृति वाले रथ द्वारा आकर
आदर करने वाले स्तोता की वाणी सुनो. क्या भूतकाल में उत्पन्न मेधावियों ने तुम्हें स्तोताओं
की दरिद्रता मिटाने के लिए जाने वाला नहीं कहा था. (३)
आ वां श्येनासो अश्विना वहन्तु रथे युक्तास आशवः पतङ्गाः.
ये अप्तुरो दिव्यासो न गृध्रा अभि प्रयो नासत्या वहन्ति.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! रथ में जुड़े हुए सर्वत्र गतिशील, उछलने में समर्थ एवं प्रशंसनीय
गमन वाले घोड़े तुम्हें लावें. हे सत्यस्वरूपो! जल के समान अथवा आकाशचारी गृध्र पक्षी के
समान शीघ्र गति वाले घोड़े तुम्हें हव्य अन्न के सामने लाते हैं. (४)
आ वां रथं युवतिस्तिष्ठदत्र जुष्ट्वी नरा दुहिता सूर्यस्य.
परि वामश्वा वपुषः पतङ्गा वयो वहन्त्वरुषा अभीके.. (५)
हे नेताओ! सूर्य की युवती कन्या प्रसन्न होकर तुम्हारे रथ पर चढ़ी थी. तुम्हारे सुंदर,
उछलने में समर्थ, गतिशील एवं तेजस्वी घोड़े तुम्हें तुम्हारे घर के पास ले जावें. (५)
उद्वन्दनमैरतं दंसनाभिरुद्रेभं दस्रा वृषणा शचीभिः.
निष्टौग्र्यं पारयथः समुद्रात्पुनश्च्यवानं चक्रथुर्युवानम्.. (६)
हे दर्शनीय एवं कामवर्षको! तुमने वंदन ऋषि को कुएं से निकाला था. तुग्र के पुत्र भुज्यु
को सागर से पार किया तथा च्यवन ऋषि को दोबारा युवक बनाया. (६)
युवमत्रयेऽवनीताय तप्तमूर्जमोमानमश्विनावधत्तम्.
युवं कणवायापिरिप्ताय चक्षुः प्रत्यधत्तं सुष्टुतिं जुजुषाणा.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने शतद्वार पीड़ागृह में बंद अत्रि को बचाने के लिए अग्नि को
बुझाया एवं उन्हें सुखकारी अन्न दिया. तुमने शोभन स्तुति स्वीकार करके अंधेरे में पड़े कण्व
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ऋषि को नेत्र दिए. (७)
युवं धेनुं शयवे नाधितायापिन्वतमश्विना पूर्व्याय.
अमुञ्चतं वर्तिकामंहसो निः प्रति जङ्घां विशपलाया अधत्तम्.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने अपने प्राचीन याचक शंयु ऋषि के लिए गाय को दुधारू किया
था. तुमने वर्तिका को पाप से बचाया एवं विशपला को दूसरी जंघा लगाई थी. (८)
युवं श्वेतं पेदव इन्द्रजूतमहिहनमश्विनादत्तमश्वम्.
जोहूत्रमर्यो अभिभूतिमुग्रं सहस्रसां वृषणं वीळ्वङ्गम्.. (९)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने राजा पेदु को श्वेत-वर्ण, इंद्रप्रदत्त, शत्रुहंता एवं संग्राम में शत्रुओं
को ललकारने वाला, शत्रुपराभवकारी, उग्र, हजारों धन देने वाला, सेचन समर्थ एवं दृढांग
घोड़ा दिया था. (९)
ता वां नरा स्ववसे सुजाता हवामहे अश्विना नाधमानाः.
आ न उप वसुमता रथेन गिरो जुषाणा सुविताय यातम्.. (१०)
हे नेता एवं शोभनजन्म वाले अश्विनीकुमारो! धन की याचना करते हुए हम तुम्हें रक्षा के
लिए बुलाते हैं. तुम हमारी स्तुतियों को स्वीकार करके हमें सुख देने के लिए अपने धनयुक्त
रथ द्वारा हमारे सामने आओ. (१०)
आ श्येनस्य जवसा नूतनेनास्मे यातं नासत्या सजोषाः.
हवे हि वामश्विना रातहव्यः शश्वत्तमाया उषसो व्युष्टौ.. (११)
हे सत्यस्वरूप अश्विनीकुमारो! तुम समान प्रीतयुक्त एवं प्रशंसनीय गति वाले घोड़े के
नए वेग से युक्त होकर हमारे समीप आओ. हम तुम्हें देने योग्य हवि लेकर नित्य उषा के उदय
काल में बुलाते हैं. (११)
सूक्त—११९ देवता—अश्विनीकुमार
आ वां रथं पुरुमायं मनोजुवं जीराश्वं यज्ञियं जीवसे हुवे.
सहस्रकेतुं वनिनं शतद्वसुं श्रुष्टीवानं वरिवोधामभि प्रयः.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! मैं जीवन एवं अन्न प्राप्ति के लिए तुम्हारे आश्चर्यपूर्ण, मन के समान
शीघ्र चलने वाले, वेगशील अश्वों से युक्त, यज्ञों में बुलाने योग्य हजार झंडों वाले, उदकपूर्ण,
सौ धनों सहित, शीघ्रगामी एवं धन देने वाले रथ का आह्वान करता हूं. (१)
ऊर्ध्वा धीतिः प्रत्यस्य प्रयामन्धायि शस्मन्त्सम्यन्त आ दिशः.
स्वदामि घर्मं प्रति यन्त्यूतय आ वामूर्जानी रथमश्विनारुहत्.. (२)
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उस रथ के चलते ही अश्विनीकुमारों की स्तुति में हमारी बुद्धि ऊर्ध्वमुखी हो जाती है.
हमारी स्तुतियां उनके पास पहुंचती हैं. हम हव्य को स्वादपूर्ण बनाते हैं. रक्षक आते हैं. हे
अश्विनीकुमारो! ऊर्जांनी नाम की सूर्यपुत्री तुम्हारे रथ पर चढ़ी थी. (२)
सं यन्मिथः पस्पृधानासो अग्मन् शुभे मखा अमिता जायवो रणे.
युवोरह प्रवणे चेकिते रथो यदश्विना वहथः सूरिमा वरम्.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! यज्ञ करने वाले अगणित जयशील मनुष्य संग्राम में शोभन धनप्राप्ति
के लिए स्पर्धा करते हुए जब मिलते हैं, तभी उत्तम धरती पर तुम्हारा रथ दिखाई देता है. तुम
उसी रथ पर स्तोता के लिए धन लाते हो. (३)
युवं भुज्युं भुरमाणं विभिर्गतं स्वयुक्तिभिर्निर्वहन्ता पितृभ्य आ.
यासिष्टं वर्तिर्वृषणा विजेन्यं१ दिवोदासाय महि चेति वामवः.. (४)
हे कामवर्षको! तुमने घोड़ों द्वारा लाए हुए एवं सागर में डूबे हुए भुज्यु को अपने स्वयं
युक्त घोड़ों द्वारा लाकर उनके पिता के समीप, दूरस्थ घर में पहुंचा दिया था. तुमने दिवोदास
की जो महती रक्षा की थी, उसे हम जानते हैं. (४)
युवोरश्विना वपुषे युवायुजं रथं वाणी येमतुरस्य शर्ध्यम्.
आ वां पतित्वं सख्याय जग्मुषी योषावृणीत जेन्य युवां पती.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे प्रशंसनीय अश्व तुम्हारे जुड़े हुए रथ को दौड़ की सीमा, सूर्य
तक सबसे पहले ले गए थे. जीती हुई कुमारी ने मित्रता के लिए आकर कहा था कि मैं तुम्हारी
पत्नी हूं और तुम्हें अपना पति बना लिया. (५)
युवं रेभं परिषूतेरुरुष्यथो हिमेन घर्मं परितप्तमत्रये.
युवं शयोरवसं पिप्यथुर्गवि प्र दीर्घेण वन्दनस्तार्यायुषा.. (६)
तुमने रथ को चारों ओर के उपद्रव से बचाया, अत्रि ऋषि को जलाने के लिए असुरों
द्वारा लगाई हुई आग शीतल जल से बुझाई, शंयु की गाय को दुधारू बनाया एवं वंदन ऋषि
को दीर्घ आयु दी. (६)
युवं वन्दनं निर्ऋतं जरण्यया रथं न दस्रा करणा समिन्वथः.
क्षेत्रादा विप्रं जनथो विपन्यया प्र वामत्र विधते दंसना भुवत्.. (७)
हे कुशल अश्विनीकुमारो! जैसे शिल्पी पुराने रथ को नया कर देता है, उसी प्रकार तुमने
बुढ़ापे से ग्रस्त वंदन ऋषि को दोबारा युवा बना दिया था. गर्भस्थ कामदेव की स्तुति से प्रसन्न
होकर तुमने उस मेधावी को माता के उदर से बाहर निकाला. तुम्हारा वही रक्षाकर्म सेवा करने
वाले यजमान को प्राप्त हो. (७)
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अगच्छतं कृपमाणं परावति पितुः स्वस्य त्यजसा निबाधितम्.
स्वर्वतीरित ऊतीर्युवोरह चित्रा अभीके अभवन्नभीष्टयः.. (८)
तुम दूर देश में अपने पिता द्वारा त्यक्त होकर दुःख उठाते एवं प्रार्थना करते हुए भुज्यु के
पास गए. तुम्हारी शोभन गति एवं विचित्र रक्षा को सब लोग समीप पाना चाहते हैं. (८)
उत स्या वां मधुमन्मक्षिकारपन्मदे. सोमस्यौशिजो हुवन्त्यति.
युवं दधीचो मन आ विवासथोऽथा शिरः प्रति वामश्व्यं वदत्.. (९)
मधुमक्षिका ने तुम्हारी मधुयुक्त स्तुति की. मैं उशिज का पुत्र कक्षीवान् तुम्हें सोमरसपान
से आनंदित होने के लिए बुलाता हूं. तुमने दधीचि का मन सेवा से प्रसन्न किया था. उसके
अश्वशिर ने तुम्हें मधुविद्या का उपदेश किया. (९)
युवं पेदवे पुरुवारमश्विना स्पृधां श्वेतं तरुतारं दुवस्यथः.
शर्येरभिद्युं पृतनासु दुष्टरं चर्कृत्यमिन्द्रमिव चर्षणीसहम्.. (१०)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने पेदु को अनेक जनों द्वारा वांछित युद्ध में शत्रुओं को जीतने
वाला, दीप्तिसंपन्न, समस्त कामों में बार-बार लगाने योग्य एवं इंद्र के समान शत्रुपराभवकारी
सफेद घोड़ा दिया था. (१०)
सूक्त—१२० देवता—अश्विनीकुमार
का राधद्धोत्राश्विना वां को वां जोष उभयोः. कथा विधात्यप्रचेताः.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! कौन सी स्तुति तुम्हें प्रसन्न बना सकती है? तुम्हें प्रसन्न करने में कौन
सा होता समर्थ है? तुम्हारे महत्त्व को न जानने वाला तुम्हारी सेवा कैसे कर सकता है. (१)
विद्वांसाविद्दुरः पृच्छेद्विद्वानित्थापरो अचेताः. नू चिन्नु मर्ते अक्रौ.. (२)
अज्ञ स्तोता इसी प्रकार तुम सर्वज्ञों की सेवा रूपी मार्ग को जानना चाहता है. उनके
अतिरिक्त सब ज्ञानहीन हैं. शत्रु द्वारा आक्रमणरहित वे शीघ्र ही स्तोता पर अनुग्रह करते हैं.
(२)
ता विद्वांसा हवामहे वां ता नो विद्वांसा मन्म वोचेतमद्य.
प्रार्छद्यमानो युवाकुः.. (३)
तुम सर्वज्ञों को हम बुलाते हैं. हे अभिज्ञो! तुम आज हमें ज्ञातव्य स्तोत्र बताओ. तुम्हारी
कामना करता हुआ मैं तुमको हव्य देकर भली-भांति स्तुति करता हूं. (३)
वि पृच्छामि पाक्या३ न देवान्वषट्कृतस्याद्भुतस्य दस्रा.

पातं च सह्यसो युवं च रभ्यसो नः.. (४)
हे दर्शनीयो! मैं तुम्हीं से पूछना चाहता हूं, अन्य पक्व-बुद्धि देवों से नहीं. तुम वषट्कार
के साथ अग्नि में डाले गए सोमरस को पिओ एवं प्रौढ़ बनाओ. (४)
प्र या घोषे भृगवाणे न शोभे यया वाचा यजति पज्रियो वाम्.
प्रैष्युर्न विद्वान्.. (५)
घोषापुत्र सुहस्त्य एवं ऋषि जिस स्तुति से सुशोभित हुए थे, अन्न की इच्छा करता हुआ
पज्रिवंशी मैं कक्षीवान् उसी स्तुति से तुम्हारी प्रशंसा करके सफल बनूं. (५)
श्रुतं गायत्रं तकवानस्याहं चिद्धि रिरेभाश्विना वाम्.
आक्षी शुभस्पति दन्.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! अटक-अटक कर चलते हुए अंधे ऋषि ऋजाश्व की स्तुति सुनो. हे
शोभन पालको! उसने भी मेरे ही समान स्तुति करके आंखें पाई थीं. (६)
युवं ह्यस्तं महो रन्युवं वा यन्न्निरतंतसतम्.
ता नो वसू सुगोपा स्यातं पातं नो वृकादघायोः.. (७)
हे गृहदाताओ! महान् धन के दाता एवं नाशक तुम हमारे रक्षक बनो एवं हमें पापी वृक
से बचाओ. (७)
मा कस्मै धातमभ्यमित्रिणो नो माकुत्रा नो गृहेभ्यो धेनवो गुः.
स्तनाभुजो अशिश्वीः.. (८)
हमें किसी शत्रु के सामने उपस्थित मत करो. हमारे घरों की दुधारू गाएं बछड़ों से
बिछड़ कर किसी अगम्य स्थान में न जाएं. (८)
दुहीयन्मित्रधितये युवाकु राये च नो मिमीतं वाजवत्यै.
इषे च नो मिमीतं धेनुमत्यै.. (९)
तुम्हारी कामना से स्तुति करने वाला बंधुओं का पोषण करने के लिए धन पाता है. हमें
बलयुक्त एवं गायों सहित अन्न दो. (९)
अश्विनोरसनं रथमनश्वं वाजिनीवतोः. तेनाहं भूरि चाकन.. (१०)
मैंने अन्नदाता अश्विनीकुमारों का अश्वरहित रथ पाया है. मैं उससे विपुल धन की
कामना करता हूं. (१०)
अयं समह मा तनूह्याते जनाँ अनु. सोमपेयं सुखो रथः.. (११)
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सूक्त—१२१ देवता—इंद्र

हे धन सहित रथ! मेरा वंश विस्तार करो. अश्विनीकुमार उस सुखकारी रथ को
स्तोताओं के सोमपान वाले स्थान पर ले जाते हैं. (११)
अध स्वप्रस्य निर्विदेऽभुञ्जतश्च रेवतः. उभा ता बस्नि नश्यतः.. (१२)
मैं प्रातःकाल के स्वप्न एवं दूसरों को रक्षा न करने वाले धनी से घृणा करता हूं. ये दोनों
शीघ्र नष्ट हो जाते हैं. (१२)
सूक्त—१२१ देवता—इंद्र
कदित्था नूँः पात्रं देवयतां श्रवद्गिरो अङ्गिरसां तुरण्यन्.
प्र यदानड्दिश आ हर्म्यस्योरु क्रंसते अध्वरे यजत्रः.. (१)
स्तोताओं के पालक एवं गोरूप धन के देने वाले इंद्र अपने भक्त अंगिरा की स्तुति कब
सुनेंगे? वे जब गृहस्वामी यजमान के ऋत्विजों को सामने देखते हैं, तभी यज्ञपात्र बनकर यज्ञ
में स्वयं आ जाते हैं. (१)
स्तम्भीद्ध द्यां स धरुणं पुषायद्भुर्वजाय द्रविणं नरो गोः.
अनु स्वजां महिषश्चक्षत व्रां मेनामश्वस्य परि मातरं गोः.. (२)
उसने आकाश को धारण किया, असुरों द्वारा चुराई गई गायों को निकाला एवं परम
भासमान होकर प्राणियों द्वारा सेवित एवं अन्न का कारण वर्षाजल बिखेरा. वह महान् अपनी
पुत्री उषा के पश्चात् उदय होता है. उसने घोड़ी को गाय की माता बनाया. (२)
नक्षद्धवमरुणीः पूर्व्यं राट् तुरो विशामङ्गिरसामनु द्यून्.
तक्षद्वज्रं नियुतं तस्तम्भद् द्यां चतुष्पदे नर्य्याय द्विपादे.. (३)
अरुण वर्ण की उषा को रंजित करने वाले वे पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा निर्मित स्तोत्र सुनें. वे
अंगिरागोत्रीय ऋषियों को प्रतिदिन धनदाता, वज्र को तीखा करने वाले एवं मानवों के हितार्थ
द्विपाद एवं चतुष्पाद की रक्षा करते तथा आकाश को धारण करते हैं. (३)
अस्य मदे स्वर्यं दा ऋतायापीवृतमुस्रियाणामनीकम्.
यद्ध प्रसर्गे त्रिककुम्निवर्तदप दृहो मानुषस्य दुरो वः.. (४)
तुमने सोमपान से प्रसन्न होकर पणियों द्वारा चुराई हुई गायों का यज्ञ के लिए प्रशंसनीय
दान दिया था. तीनों लोकों में उत्तम इंद्र जब युद्ध में संलग्न थे, तब वे मानवद्रोही असुरों का
द्वार गायों के निकलने के लिए खोल देते थे. (४)
तुभ्यं पयो यत्पितरावनीतां राधः सुरेतस्तुरणे भुरण्यू.
शुचि यत्ते रेक्ण आयजन्त सबर्दुघायाः पय उस्रियायाः.. (५)
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हे क्षिप्रकारी इंद्र! तुम्हारे लिए जगत् के माता-पिता, धरती और आकाश ने बलवर्धक,
वीर्यसंपन्न एवं धनयुक्त दुधारू गायों का दूध जिस समय अग्नि में अर्पित किया, तभी तुमने
पणियों का द्वार खोल दिया था. (५)
अध प्र जज्ञे तरणिर्ममत्तु प्र रोच्यस्या उषसो न सूरः.
इन्दुर्यैभिर्राष्ट स्वेदुहव्यैः सुवेण सिञ्चञ्जजरणाभि धाम.. (६)
उषा के समीपवर्ती सूर्य के समान चमकते हुए शत्रुविजयी इंद्र इस समय प्रकट हुए हैं. वे
हमें प्रसन्न बनावें. हम भी स्तुतिपात्र सोमरस को स्रुच से यज्ञस्थल में छिड़कते हुए पीते हैं.
(६)
स्विध्मा यद्धनधितिरपस्यात्सूरो अध्वरे परि रोधना गोः.
यद्ध प्रभासि कृत्व्याँ अनु द्यूननर्विशे पश्विषे तुराय.. (७)
प्रकाशयुक्त मेघमाला जिस समय अपना कर्म करने को तत्पर होती है, उस समय प्रेरक
इंद्र यज्ञ के निमित्त वर्षा का आवरण दूर करते हैं. हे इंद्र! तुम जब कार्य योग्य दिवसों को
प्रकाशित करते हो, तब गाड़ी वाले एवं चरवाहे अपने काम में शीघ्र सफल होते हैं. (७)
अष्टा महो दिव आदो हरी इह द्युम्नासाहमभि योधन उत्सम्.
हरिं यत्ते मन्दिनं दुक्षन्व्धे गोरभसमद्रिभिर्वाताप्यम्.. (८)
जब ऋत्विज् तुम्हारी बुद्धि के लिए मनोहर, मादक, बलकारी, एवं उपभोग योग्य
सोमरस को पत्थरों की सहायता से निचोड़ें, तब तुम अपने हर्षदाता एवं सोमरस का भोग
करने वाले दोनों घोड़ों को इस यज्ञ में सोम पिलाओ एवं हमारे धन का अपहरण करने वाले
शत्रुओं को हराओ. (८)
त्वमायसं प्रति वर्तयो गोर्दिवो अश्मानमुपनीतमृभ्वा.
कुत्साय यत्र पुरुहूत वन्वञ्छुष्णमनन्तैः परियासि वधैः.. (९)
हे इंद्र! तुमने आकाश से ऋभु द्वारा लाए गए, शत्रु के प्रति शीघ्र जाने वाले लौहमय वज्र
को गमनशील शुष्ण असुर की ओर फेंका था. हे पुरुहूत! उस समय तुमने कुत्स ऋषि के
कल्याण के लिए शुष्ण को अनेकविध हनन साधनों से हिंसा करते हुए छेड़ा था. (९)
पुरा यत्सूरस्तमसो अपीतेस्तमद्रिवः फलिगं हेतिमस्य.
शुष्णस्य चित्परिहितं यदोजो दिवस्परि सुग्रथितं तदादः.. (१०)
हे वज्रधारक! प्राचीन काल में जब सूर्य अंधकार के साथ हुए संग्राम से निवृत्त हुए, उस
समय तुमने मेघ का विनाश किया. सूर्य को आच्छादित करने एवं सूर्य में संलग्न होने वाले
शुष्ण के बल को तुमने समाप्त कर दिया था. (१०)
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अनु त्वा मही पाजसी अचक्रे द्यावाक्षामा मदतामिन्द्र कर्मन्.
त्वं वृत्रमाशयानं सिरासु महो वज्रेण सिष्वपो वराहम्.. (११)
हे इंद्र! विशाल शक्तिसंपन्न एवं सर्वत्र व्यापक धरती और आकाश ने तुम्हें वृत्रवध के
पश्चात् प्रसन्न किया था. इसके बाद तुमने सर्वत्र वर्तमान एवं शोभन आहार वाले वृत्र असुर को
महान् वज्र से मारकर पानी में गिरा दिया. (११)
त्वमिन्द्र नर्यो याँ अवो नॄन्तिष्ठा वातस्य सुयुजो वहिष्ठान्.
यं ते काव्य उशना मन्दिनं दाद्वृत्रहणं पार्यं ततक्ष वज्रम्.. (१२)
हे मानव हितकारी इंद्र! तुम जिन अश्वों की रक्षा करते हो, उन वायु तुल्य शीघ्रगामी एवं
शोभन रथ में जुते हुए अश्वों पर आरोहण करो. कविपुत्र उशना द्वारा प्रदत्त मदकारक वज्र को
तुमने वृत्रघातक एवं शत्रु अतिक्रमणकारी के रूप में तेज किया है. (१२)
त्वं सूरो हरितो रामयो नॄन्भरच्चक्रमेतशो नायमिन्द्र.
प्रास्य पारं नवतिं नाव्यानामपि कर्तमवर्तयोऽयज्यून्.. (१३)
हे इंद्र! सूर्य रूप में अपने हरि नामक घोड़ों को रोको. एतश नाम का घोड़ा तुम्हारे रथ
का पहिया आगे चलाता है. तुम नाव द्वारा पार होने योग्य नब्बे नदियों के पार जाकर
यज्ञविहीन असुरों के पास पहुंचो एवं उन्हें कर्त्तव्य में लगाओ. (१३)
त्वं नो अस्या इन्द्र दुर्हणायाः पाहि वज्रिवो दुरितादभीके.
प्र नो वाजान्रथ्यो३ अश्वबुध्यानिषे यन्धि श्रवसे सूनृतायै.. (१४)
हे वज्रधारणकर्त्ता! इस शक्तिशाली दरिद्रता से हमारी रक्षा करो, समीपवर्ती संग्राम में
हमें पाप से बचाओ तथा कीर्ति एवं सत्यभाषण के निमित्त रथ एवं अश्वयुक्त धन प्रदान करो.
(१४)
मा सा ते अस्मत्सुमतिर्वि दसद्वाजप्रमहः समिषो वरन्त.
आ नो भज मघवन्गोष्त्वर्यो मंहिष्ठास्ते सधमादः स्याम.. (१५)
हे संपत्तियों के कारण पूजनीय इंद्र! तुम्हारी अनुग्रह बुद्धि हमसे अलग न हो. हे मघवन्!
तुम धन के स्वामी हो, हमें गाय प्राप्त कराओ. तुम्हारी विशाल स्तुतियों से वृद्धि प्राप्त करने
वाले पुत्र-पौत्रादि के साथ आनंदित हों. (१५)
सूक्त—१२२ देवता—विश्वेदेव
प्र वः पान्तं रघुमन्यवोऽन्धो यज्ञं रुद्राय मीळहुषे भरध्वम्.
दिवो अस्तोष्यसुरस्य वीरैरिषुध्येव मरुतो रोदस्योः.. (१)
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हे क्रोधहीन ऋत्विजो! तुम कर्मों का फल देने वाले रुद्र को पालक एवं यज्ञसाधन अन्न
अधिक मात्रा में दो. मैं स्वर्ग के देव रुद्र तथा उनके अनुचरों एवं आकाश और धरती के बीच
निवास करने वाले मरुद्गण की स्तुति करता हूं. रुद्र अपने वीरों अर्थात् मरुतों की सहायता
से शत्रुओं को उसी प्रकार भगा देते हैं, जैसे तूणीर में रहने वाले बाणों द्वारा शत्रु को भगाया
जाता है. (१)
पत्नीव पूर्वहूतिं वावृधध्या उषासानक्ता पुरुधा विदाने.
स्तरीनार्कं व्युतं वसाना सूर्यस्य श्रिया सुदृशी हिरण्यैः.. (२)
जिस प्रकार पत्नी पति की पहली पुकार सुनकर शीघ्र दौड़ती आती है, उसी प्रकार
दिवस एवं रात्रि नामक देवता अनेक प्रकार की स्तुतियों से ज्ञायमान होकर हमारे पहले
आह्वान पर शीघ्र आवें. उषादेवी शत्रुनाशक सूर्य के समान सुनहरी किरणों से युक्त होकर एवं
महान् रूप धारण करके आवें. उषा सूर्य की शोभा को धारण करे. (२)
ममत्तु नः परिज्मा वसर्हा ममत्तु वातो अपां वृषण्वान्.
शिशीतमन्द्रापर्वता युवं नस्तन्नो विश्वे वरिवस्यन्तु देवाः.. (३)
निवास के योग्य एवं सर्वत्र गतिशील सूर्य हमें प्रसन्न करें. जल बरसाने वाला वायु हमें
प्रमुदित करे. इंद्र एवं मेघ हमारी वृद्धि करें. इस प्रकार विश्वेदेव हमें पर्याप्त अन्न प्रदान करें.
(३)
उत त्या मे यशसा श्वेतनायै व्यन्ता पान्तौशिजो हुवध्यै.
प्र वो नपातमपां कृणुध्वं प्र मातरा रास्पिनस्यायोः.. (४)
हे ऋत्विजो! उषिज के पुत्र मुझ कक्षीवान् के कल्याण के लिए यज्ञीय अन्न के भक्षक,
सोमपानकर्ता एवं स्तुति के योग्य अश्विनीकुमारों को विश्वप्रकाशक उषाकाल में बुलाओ. तुम
जल के नाती अग्नि की स्तुति करो. मुझ जैसे व्यक्तियों की मातृतुल्य अहोरात्र देवताओं की
भी स्तुति करो. (४)
आ वो रुवण्युमौशिजो हुवध्यै घोषेव शंसमर्जुनस्य नंशे.
प्र वः पूष्णे दावन आँ अच्छा वोचेय वसुतातिमग्नेः.. (५)
हे देवगण! उषिज का पुत्र मैं कक्षीवान् आपको बुलाने के लिए आपके अनुकूल स्तोत्र
का पाठ करता हूं. हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार ब्रह्मवादिनी महिला घोषा ने अपने श्वेत कुष्ठ
रोग के विनाश के लिए तुम्हारी स्तुति की थी, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारी स्तुति करता हूं. मैं
फल देने वाले पूषा एवं धन देने वाले अग्नि की स्तुति करता हूं. (५)
श्रुतं मे मित्रावरुणा हवेमोत श्रुतं सदने विश्वतः सीम्.
श्रोतु नः श्रोतुरातिः सुश्रोतुः सुक्षेत्रा सिन्धुरद्भिः.. (६)
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हे मित्र और वरुण! मेरे आह्वान के साथ-साथ यज्ञमंडप में वर्तमान अन्य लोगों का भी
आह्वान सुनो. हमारे आह्वान को भली प्रकार सुनने वाले जलदेवता सिंधु हमारे फसलों वाले
खेतों को जल से सींचते हुए हमारी स्तुति सुनें. (६)
स्तुषे सा वां वरुण मित्र रातिर्गवां शता पृक्षयामेषु पज्रे.
श्रुतरथे प्रियरथे दधानाः सद्यः पुष्टिं निरुन्धानासो अग्मन्.. (७)
हे मित्र और वरुण! मैं अन्न का नियमन करने वाले स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी स्तुति करता हूं.
इसलिए मुझ कक्षीवान् को तुम अनगिनत गाएं दो. तुम लोग प्रसिद्ध एवं सुंदर रथ पर बैठकर
एवं मुझ कक्षीवान् के प्रति प्रसन्न होकर आओ एवं मेरी पुष्टि को स्थायी करो. (७)
अस्य स्तुषे महिमघस्य राधः सचा सनेम नहुषः सुवीराः.
जनो यः पज्रेभ्यो वाजिनीवानश्वावतो रथिनो मह्यं सूरिः.. (८)
मैं पवित्र धन वाले देवसमूह के धन की स्तुति करता हूं. वे कक्षीवान् के प्रिय व्यक्ति हैं.
हम पुत्र-पौत्रादि के साथ मिलकर प्रेम से इस धन का उपभोग करें, मैं अंगिरा गोत्र वाले
कक्षीवान् को प्रसन्नतापूर्वक अन्न, घोड़े और रथ देने वाले देवसमूह की स्तुति करता हूं. (८)
जनो यो मित्रावरुणावभिध्रुगपो न वां सुनोत्यक्षणयाध्रुक्.
स्वयं स यक्ष्मं हृदये नि धत्त आप यदीं होत्राभिर्ऋतावा.. (९)
हे मित्र और वरुण! जो व्यक्ति तुम्हारा यज्ञ न करके द्रोह करता है अथवा तुम्हारे निमित्त
सोमरस न निचोड़कर तुमसे शत्रुता बढ़ाता है, वह मूर्ख मनुष्य अपने आप ही अपने हृदय में
यक्ष्मा रोग को धारण करता है. जो व्यक्ति यज्ञ करने वाला है एवं स्तुतिपाठ करता हुआ
सोमरस निचोड़ता है, वह कुशल अश्व प्राप्त करता है. (९)
स व्राधतो नहुषो दंसुजूतः शर्धस्तरो नरां गूर्तश्रवाः.
विसृष्टरातिर्याति बाळ्हसृत्वा विश्वासु पृत्सु सदमिच्छूरः.. (१०)
वह कुशल अश्व प्राप्त करता है, मनुष्यों को हराने वाला तथा अपने समान लोगों में अन्न
के लिए प्रसिद्ध होता है. अतिथियों का धन से स्वागत करने वाला ऐसा व्यक्ति हिंसक शत्रुओं
से सदा निडर होकर सभी प्रकार के युद्धों में जाता है. (१०)
अध ग्मन्ता नहुषो हवं सुरेः श्रोता राजानो अमृतस्य मन्द्राः.
नभोजुवो यन्निरवस्य राधः प्रशस्तये महिना रथवते.. (११)
हे सर्वेश्वर एवं आनंददाता देवगण! मुझ स्तुतिकर्त्ता एवं मरणशील व्यक्ति की स्तुति सुनो
और इस यज्ञ में पधारो. हे आकाशव्यापी देवो! तुम ऐसे यजमान को महान् बनाने वाले हव्य
की प्रशंसा करना चाहते हो, जिसका रक्षक तुम्हारे अतिरिक्त कोई न हो. (११)
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