ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
स्थावर एवं जंगम अमृतरूप उदक घिरी हुई अग्नि को बढ़ाते हैं. देवयज्ञ में स्थित होकर देवों
को बुलाने वाले अग्नि समस्त यज्ञकर्मों को सत्यफल देते हुए आराधित हों. (७-८)
गोषु प्रशस्तिं वनेषु धिषे भरन्त विश्वे बलिं स्वर्णः.
वि त्वा नरः पुरुत्रा सपर्य्यन्पितुर्न जिब्रेर्वि वेदो भरन्त.. (९-१०)
हे अग्नि! हमारे काम आने वाले गाय आदि पशुओं को प्रशंसनीय बनाओ. समस्त
मनुष्य हमारे लिए भेंट के रूप में धन लावें. जिस प्रकार वृद्ध पिता से पुत्र धन पाता है, उसी
प्रकार यजमान अनेक देवयज्ञों के स्थलों में तुम्हारी भांति-भांति से सेवा करते एवं धनलाभ
करते हैं. (९-१०)
साधुर्न गृध्नुरस्तेव शूरो यातेव भीमस्त्वेषः समत्सु.. (११)
अग्नि साधक के समान समस्त हव्य स्वीकार करते हैं. वे धानुष्क के समान शूर, शत्रु के
समान भयंकर एवं संग्रामों में दीप्त होकर हमारी सहायता करें. (११)
सूक्त—७१ देवता—अग्नि
उप प्र जिन्वन्नुशतीरुशन्तं पतिं न नित्यं जनयः सनीळाः.
स्वसारः श्यावीमरुषीमजुषञ्चित्रमुच्छन्तीमुषसं न गावः.. (१)
कामना करने वाली एवं एक साथ निवास करने वाली उंगलियां हव्य की अभिलाषा
करने वाले अग्नि को हव्य देकर उसी प्रकार प्रसन्न करती हैं, जिस प्रकार विवाहिता नारी
अपने पति को प्रसन्न करती है. पहले कृष्णवर्ण धारण करने वाली उषा की सेवा जिस प्रकार
सूर्यकिरणें करती हैं, उसी प्रकार उंगलियां पूजनीय अग्नि की अंजलिबंधन से सेवा करती हैं.
(१)
वीळु चिद्द्दूळ्हा पितरो न उक्थैरद्रिं रुजन्नङ्गिरसो रवेण.
चक्रुर्दिवो बृहतो गातुमस्मे अहः स्वर्विदुः केतुमुस्राः.. (२)
हमारे पितर अंगिराओं ने मंत्र द्वारा अग्नि की स्तुति करके उस स्तुति शब्द द्वारा ही
बलवान् एवं दृढ़ पणि असुर को समाप्त किया था एवं हमारे लिए महान् द्युलोक का मार्ग
बनाया था. इसके पश्चात् उन्होंने सुखपूर्वक प्राप्य दिवस, संसार प्रकाशक सूर्य एवं पणियों
द्वारा चुराई गई गायों को जाना था. (२)
दधन्नृतं धनयन्नस्य धीतिमादिदर्यो दिधिष्वो३ विभृत्राः.
अतृष्यन्तीरपसो यन्त्यच्छा देवाञ्जन्म प्रयसा वर्धयन्तीः.. (३)
जिस प्रकार लोग धन धारण करते हैं, उसी प्रकार अंगिरावंशी ऋषियों ने यज्ञ की अग्नि
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को धारण किया था. जो यजमान धन के स्वामी हैं जो अन्य विषयों की तृष्णा से रहित होकर
अग्नि को धारण करते हुए यज्ञकर्म में संलग्न रहते हैं, वे हविरूप अन्न के द्वारा देवों और
मानवों की वृद्धि करते हुए अग्नि के सम्मुख जाते हैं. (३)
मथीद्यदीं विभृतो मातरिश्वा गृहेगृहे श्येतो जेन्यो भूत्.
आदीं राज्ञे न सहीयसे सचा सन्ना दूत्यं१ भृगवाणो विवाय.. (४)
व्यान रूपी वायु अग्नि को जब-जब मथते हैं, तब-तब यह शुभ्र वर्ण अग्नि समस्त
यज्ञगृह में उत्पन्न होते हैं. जिस प्रकार मित्रता का आचरण करता हुआ राजा बली राजा के
समीप अपना दूत भेजता है, उसी प्रकार भृगु ऋषि ने अग्नि को दूत के काम में लगाया. (४)
महे यत्पित्र ईं रसं दिवे करव त्सरत्पृशन्यश्चिकित्वान्.
सृजदस्ता धृषता दिद्युमस्मै स्वायां देवो दुहितरि त्विषिं धात्.. (५)
हे अग्नि! जब यजमान महान् एवं पालनकर्त्ता देवगण के लिए धरती का सारभूत रस
देता है, तब स्पर्श करने में कुशल राक्षस आदि तुम्हें हव्यवाहक जानकर पलायन कर जाते हैं.
बाण फेंकने में कुशल अग्नि अपने शत्रुनाशक धनुष से उन भागते हुए राक्षसों आदि पर
प्रकाशयुक्त बाण फेंकते हैं एवं अपनी पुत्री उषा में दीप्तिमान् अग्नि देव अपना तेज स्थापित
करते हैं. (५)
स्व आ यस्तुभ्यं दम आ विभाति नमो वा दाशादुशतो अनु द्यून्.
वर्धो अग्ने वयो अस्य द्विबर्हा यासद्राया सरथं यं जुनासि.. (६)
हे द्विबर्हा अग्नि देव! जो यजमान तुम्हें अपने यज्ञगृह में शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार
काष्ठों से चारों ओर प्रज्वलित करता है एवं कामना करने वाले तुम्हारे लिए प्रतिदिन नमस्कार
करता है, तुम उसके अन्न की वृद्धि करते हो. जो व्यक्ति रथसहित युद्धाभिलाषी पुरुष को रण
में प्रेरित करता है, वह पुरुष धन प्राप्त करता है. (६)
अग्निं विश्वा अभि पृक्षः सचन्ते समुद्रं न स्रवतः सप्त यह्वीः.
न जामिभिर्वि चिकिते वयो नो विदा देवेषु प्रमतिं चिकित्वान्.. (७)
जिस प्रकार विशाल सात सरिताएं सागर के पास पहुंचती हैं, उसी प्रकार समस्त हव्य
अन्न अग्नि को प्राप्त होते हैं. हमारे पास इतना कम अन्न है कि हमारी जाति वाले उसका भाग
नहीं पाते. इसलिए तुम देवों में मननीय धन को जानकर हमें प्राप्त कराओ. (७)
आ यदिषे नृपतिं तेज आनट् छुचि रेतो निषिक्तं द्यौरभीके.
अग्निः शर्धमनवद्यं युवानं स्वाध्यं जनयत्सूदयच्च.. (८)
अग्नि का शुद्ध एवं दीप्त तेज अन्न के लिए जठराग्नि के रूप में यजमान को व्याप्त कर
ले. उसी तेज द्वारा परिपक्व वीर्य गर्भस्थान में पहुंचकर पुत्र उत्पन्न करे तथा उसे शुभ कर्म में
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प्रेरित करे. (८)
मनो न योऽध्वनः सद्य एत्येकः सत्रा सुरो वस्व ईशे.
राजाना मित्रावरुणा सुपाणी गोषु प्रियममृतं रक्षमाणा.. (९)
आकाश मार्ग में मन के समान शीघ्र जाने वाले एकाकी सूर्य अनेक स्थानों में रखे हुए
धन को प्राप्त करते हैं. प्रकाशमान एवं सुंदर बाहुयुक्त मित्र और वरुण प्रसन्नताकारक तथा
अमृत तुल्य दूध की रक्षा करते हुए हमारी गायों में स्थित रहें. (९)
मा नो अग्ने सख्या पित्र्याणि प्र मर्षिष्ठा अभि विदुष्कविः सन्.
नभो न रूपं जरिमा मिनाति पुरा तस्या अभिशस्तेरधीहि.. (१०)
हे अग्नि! हमारे प्रति तुम्हारी जो परंपरागत मित्रता है, उसे नष्ट मत करो, क्योंकि तुम
भूत, भविष्यत् एवं वर्तमान सबके ज्ञाता हो. जिस प्रकार आकाश को सूर्य की किरणें ढक
लेती हैं, उसी प्रकार हमारा विनाश करने वाले बुढ़ापे को हमसे दूर रखने का प्रयत्न करो.
(१०)
सूक्त—७२ देवता—अग्नि
नि काव्या वेधसः शश्वतस्कर्हस्ते दधानो नर्या पुरूणि.
अग्निर्भुवद्रयिपती रयीणां सत्रा चक्राणो अमृतानि विश्वा.. (१)
मनुष्यों के लिए हितकारक धन हाथ में धारण करते हुए नित्य एवं ज्ञानसंपन्न अग्नि ब्रह्म
संबंधी मंत्रों को स्वीकार करते हैं. स्तुतिकर्त्ताओं को अमृत प्रदान करते हुए अग्नि उत्कृष्ट धन
के स्वामी होते हैं. (१)
अस्मे वत्सं परि षन्तं न विन्दन्निच्छन्तो विश्वे अमृता अमूराः.
श्रमयुवः पदव्यो धियंधास्तस्थुः पदे परमे चार्वग्नेः.. (२)
मरणरहित समस्त देवगण एवं मोहहीन मरुद्गण चाहने पर भी हमारे प्रिय एवं सब ओर
वर्तमान अग्नि को प्राप्त नहीं कर सके. अग्नि के बिना वे दुःखी हो गए एवं पैदल चलते हुए
थक कर प्रकाश को देखते हुए अग्नि के स्थान में उपस्थित हुए. (२)
तिस्रो यदग्ने शरदस्त्वामिच्छुचिं घृतेन शुचयः सपर्यान्.
नामानि चिद्दधिरे यज्ञियान्यसूदयन्त तन्व१: सुजाताः.. (३)
हे शुद्ध अग्नि! दीप्तिसंपन्न मरुतों ने तीन वर्ष तक घृत से तुम्हारी पूजा की, तब तुम
प्रकट हुए. तभी तुम्हारी अनुकंपा से उन्होंने यज्ञ में प्रयोग करने योग्य नाम एवं शरीर प्राप्त
किए. (३)
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आ रोदसी बृहती वेविदानाः प्र रुद्रिया जभ्रिरे यज्ञियासः.
विदन्मर्तो नेमधिता चिकित्त्वानग्निं पदे परमे तस्थिवांसम्.. (४)
यज्ञपात्र देवों ने विस्तृत आकाश एवं धरती के बीच रहकर अग्नि के योग्य स्तुतियां की
थीं. मरुद्गणों ने इंद्र के साथ जाना कि अग्नि उत्तम स्थान में छिपे हैं. इसके पश्चात् उन्हें प्राप्त
किया. (४)
संजानाना उप सीदन्नभिज्ञु पत्नीवन्तो नमस्यं नमस्यन्.
रिरिक्वांसस्तन्वः कृण्वत स्वाः सखा सख्युर्निमिषि रक्षमाणाः.. (५)
हे अग्नि! देवगण तुम्हें भली प्रकार जानकर बैठ गए एवं अपनी स्त्रियों के साथ तुम्हारी
पूजा करने लगे. तुम उनके सामने घुटनों के सहारे बैठे थे. देवता तुम्हारे सखा एवं तुम्हारे द्वारा
रक्षित थे. उन्होंने अपने मित्र अग्नि को देखा तो अपने शरीरों को सुखाते हुए यज्ञ करने लगे.
(५)
त्रिः सप्त यद्गुह्यानि त्वे इत्पदाविन्दन्निहिता यज्ञियासः.
तेभी रक्षन्ते अमृतं सजोषाः पशूञ्च स्थातॄञ्चरथं च पाहि.. (६)
हे अग्नि! यजमानों ने तुम्हारे भीतर छिपे हुए इक्कीस तत्त्वों को जाना. जानकर वे उन्हीं
से तुम्हारी रक्षा करते हैं. तुम यजमानों के प्रति उतना प्रेम रखते हुए उनके पशुओं एवं
स्थावर-जंगम धन की रक्षा करो. (६)
विद्वाँ अग्ने वयुनानि क्षितीनां व्यानुषक्छुरुधो जीवसे धाः.
अन्तर्विद्वाँ अध्वनो देवयानानतन्द्रो दूतो अभवो हविर्वाट्.. (७)
हे अग्नि! समस्त ज्ञातव्य बातों को जानते हुए तुम यजमानरूपी प्रजाओं के जीवन के
लिए भूख रूपी रोग को दूर करो. धरती और आकाश के मध्य देवों के जाने के मार्गों को
जानते हुए तुम आलस्य छोड़कर देवों के दूतरूप में हवि वहन करो. (७)
स्वाध्यो दिव आ सप्त यह्वी रायो दुरो व्यृतज्ञा अजानन्.
विदद्गव्यं सरमा दृळ्हमूर्वं येना नु कं मानुषी भोजते विट्.. (८)
हे अग्नि! तुमने शोभन कर्म युक्त सात महान् नदियों को आकाश से निकालकर धरती
पर बहाया है. यज्ञ को जानने वाले अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने बल नामक असुर द्वारा चुराई गई
गायों का मार्ग तुमसे जाना था. तुम्हारी ही कृपा से सरमा ने अंगिराओं से गोदुग्ध पाया था.
उसी गोदुग्ध से मानवों की रक्षा होती है. (८)
आ ये विश्वा स्वपत्यानि तस्थुः कृण्वानासो अमृतत्वाय गातुम्.
मह्ना महद्भिः पृथिवी वि तस्थे माता पुत्रैरदितिर्धायसे वेः.. (९)
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आदित्यों ने अमरण भाव की सिद्धि के लिए उपाय करते हुए पतनरहित होने के लिए
कर्म किए एवं उन महानुभावों के सहित उनकी अदीना माता पृथ्वी ने समस्त जगत् को धारण
करने के लिए विशेष महत्त्व प्राप्त किया था. हे अग्नि देव! यह सब इसी कारण हो सका कि
तुमने उस यज्ञ का हवि भक्षण किया था. (९)
अधि श्रियं नि दधुश्चारुमस्मिन्दिवो यदक्षी अमृता अकॄण्वन्.
अध क्षरन्ति सिन्धवो न सृष्टाः प्र नीचीरग्ने अरुषीरज store? -> wait: अरुषीरज store? No, अरुषीरज store is 'अरुषीरजानन्..' -> 'अरुषीरजानन्..' let's write अरुषीरजानन्.. (१०)
यजमानों ने इस अग्नि में शोभन यज्ञ संपत्ति स्थापित की एवं यज्ञ का चक्षुरूप घृत
डाला. इससे मरणरहित देव यज्ञ का समय जानकर आए. हे अग्नि! तुम्हारी प्रकाशयुक्त
ज्वालाएं सरिताओं के समान समस्त दिशाओं में फैल गईं एवं आए हुए देवों ने उन्हें जाना.
(१०)
सूक्त—७३ देवता—अग्नि
र
हे अग्नि! यजमान उपद्रवरहित गांवों में बने अपने यज्ञगृहों में निरंतर काष्ठ जलाकर
सामने बैठे तुम्हारी सेवा करते हैं एवं अनेक प्रकार का हव्य अन्न देते हैं. तुम सब अन्न के
स्वामी बनकर हमें देने के लिए धन धारण करो. (४)
वि पृक्षो अग्ने मघवानो अश्युर्वि सूरयो ददतो विश्वमायुः.
सनेमं वाजं समिथेष्वर्यो भागं देवेषु श्रवसे दधानाः.. (५)
हे अग्नि! हविरूप धन से युक्त यजमान अन्न प्राप्त करें एवं तुम्हारी स्तुति करने वाले
तथा हवि देने वाले विद्वान् संपूर्ण जीवन प्राप्त करें. हम संग्राम में शत्रु के अन्न पर अधिकार
करने के पश्चात् यश के लिए देवों को हवि का भाग दें. (५)
ऋतस्य हि धेनवो वावशानाः स्मदूध्नीः पीपयन्त द्युभक्ताः.
परावतः सुमतिं भिक्षमाणा वि सिन्धवः समया सस्रुरद्रिम्.. (६)
अग्नि की बार-बार अभिलाषा करती हुईं नित्य दुग्धशालिनी एवं तेजस्विनी गाएं यज्ञ
देश में प्राप्त अग्नि को दूध पिलाती हैं. बहती हुई सरिताएं अग्नि से अनुग्रह की याचना करती
हुईं पर्वत के समीप से दूर देश को बहती हैं. (६)
त्वे अग्ने सुमतिं भिक्षमाणा दिवि श्रवो दधिरे यज्ञियासः.
नक्ता च चक्रुरुषसा विरूपे कृष्णं च वर्णमरुणं च सं धुः.. (७)
हे द्योतमान अग्नि! यज्ञ के स्वामी देवों ने तुम्हारे अनुग्रह की याचना करते हुए तुम में
हवि स्थापित किया. इसके पश्चात् इस अनुष्ठान के निमित्त उषा और रात्रि को भिन्न-भिन्न
रूपवाला बनाया अर्थात् निशा को काला और उषा को अरुण बनाया. (७)
यान्नाये मर्त़ान्त्सुषूदो अग्ने ते स्याम मघवानो वयं च.
छायेव विश्वं भुवनं सिसक्ष्यापप्रिवान्रोदसी अन्तरिक्षम्.. (८)
हे अग्नि! तुम जिन लोगों को धन प्राप्त करने के लिए यज्ञकर्म के प्रति प्रेरित करते हो,
वे और हम यज्ञ प्राप्त करें. तुमने आकाश, धरती और अंतरिक्ष को अपने तेज से भर दिया है
तथा तुम छाया के समान सारे संसार की रक्षा करते हो. (८)
अर्वद्भिदग्ने अर्वतो नृभिर्नॄन्वीरैर्वीरान्वनुयामा त्वोताः.
ईशानासः पितृवित्तस्य रायो वि सूरयः शतहिमा नो अश्युः.. (९)
हे अग्नि! तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर हम अपने अश्वों से शत्रु के अश्वों का, अपने भटों
द्वारा शत्रु के भटों का एवं अपने पुत्रों की सहायता से शत्रु के पुत्रों का वध करेंगे. परंपरा से
प्राप्त धन के स्वामी एवं विद्वान् हमारे पुत्र सौ वर्ष जीवित रहकर सुख भोगें. (९)
एता ते अग्न उचथानि वेधो जुष्टानि सन्तु मनसे हृदे च.
सूक्त—७४ देवता—अग्नि
शकेम रायः सुधरो यमं तेऽधि श्रवो देवभक्तं दधानाः.. (१०)
हे अग्नि! हमारे समस्त स्तोत्र तुम्हारे मन और अंतःकरण को प्रिय हों. हम देवों के भोग
करने योग्य धन तुम में स्थापित करके तुम्हारे उस धन की रक्षा करना चाहते हैं जो हमारी
दरिद्रता मिटा सके. (१०)
सूक्त—७४ देवता—अग्नि
उपप्रयन्तो अध्वरं मन्त्रं वोचेमाग्नये. आरे अस्मे च शृण्वते.. (१)
दूर रहकर भी हमारी स्तुतियां सुनने वाले एवं यज्ञ में शीघ्रता से उपस्थित होने वाले
अग्नि की हम स्तुति करते हैं. (१)
यः स्नीहितीषु पूर्व्यः संजग्मानासु कृष्टिषु. अरक्षद्दाशुषे गयम्.. (२)
शत्रु भाव से पूर्ण एवं हत्या करने में प्रवृत्त प्रजाओं के मध्य स्थित हवि देने वाले यजमान
के धन के रक्षक अग्नि की हम स्तुति करते हैं. (२)
उत ब्रुवन्तु जन्तव उदग्निर्वृत्रहाजनि. धनञ्जयो रणेरणे.. (३)
शत्रुनाशक एवं संग्राम में शत्रु के धन पर अधिकार करने वाले अग्नि के उत्पन्न होते ही
सब लोग उनकी स्तुति करें. (३)
यस्य दूतो असि क्षये वेषि हव्यानि वीतये. दस्मत्कृणोष्यध्वरम्.. (४)
हे अग्नि! जिस यजमान के यज्ञगृह में तुम देवदूत बनकर आते हो एवं उन देवों के भोग
के लिए हवि ग्रहण करके यज्ञ की शोभा बढ़ाते हो. (४)
तमित्सुहव्यमङ्गिरः सुदेवं सहसो यहो. जना आहुः सुबर्हिषम्.. (५)
हे बलपुत्र अग्नि! उसी यजमान को सब लोग शोभन हविसंपन्न, सुंदर देवों वाला एवं
उत्तम यज्ञयुक्त कहते हैं. (५)
आ च वहासि ताँ इह देवाँ उप प्रशस्तये. हव्या सुश्चन्द्र वीतये.. (६)
हे शोभन एवं आह्लादक अग्नि! हमारी स्तुति स्वीकार करने के लिए इस यज्ञ में देवों को
हमारे समीप ले आओ एवं उनके भक्षण के लिए हव्य प्रदान करो. (६)
न योरुपब्दिरश्व्यः शृण्वे रथस्य कच्चन. यदग्ने यासि दूत्यम्.. (७)
हे अग्नि! जब तुम देवों के दूत बनकर जाते हो तो शीघ्र चलने के कारण तुम्हारे रथ का
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शब्द नहीं सुनाई पड़ता. (७)
त्वोतो वाज्यह्रयोऽभि पूर्वस्मादपरः. प्र दाश्वाँ अग्ने अस्थात्.. (८)
हे अग्नि! निकृष्ट पुरुष भी तुम्हें हव्यदान करके तुम्हारे द्वारा रक्षित अन्न का स्वामी एवं
ऐश्वर्यशाली बन जाता है. (८)
उत द्युमत्सुवीर्यं बृहदग्ने विवाससि. देवेभ्यो देव दाशुषे.. (९)
हे प्रकाशमान अग्नि! देवों को हव्य देने वाले यजमान को प्रौढ़, दीप्त एवं शक्तिसंपन्न
धन दो. (९)
सूक्त—७५ देवता—अग्नि
जुषस्व सप्रथस्तमं वचो देवप्सरस्तमम्. हव्या जुह्वान आसनि.. (१)
हे अग्नि देव! अपने मुख में हव्य ग्रहण करते हुए देवों को भली प्रकार प्रसन्न करो एवं
हमारी विस्तीर्ण स्तुतियां स्वीकार करो. (१)
अथा ते अङ्गिरस्तमाग्ने वेधस्तम प्रियम्. वोचेम ब्रह्म सानसि.. (२)
हे अंगिरागोत्रीय ऋषियों एवं मेधावियों में श्रेष्ठ अग्नि! हम तुम्हारे ग्रहण करने योग्य एवं
प्रसन्नतादायक स्तोत्र का उच्चारण करते हैं. (२)
कस्ते जामिर्जनानामग्ने को दाश्वध्वरः. को ह कस्मिन्नसि श्रितः.. (३)
हे अग्नि! मनुष्यों के बीच में तुम्हारा बंधु कौन है? कौन तुम्हारा यज्ञ करने में समर्थ है?
अर्थात् कोई नहीं. तुम कौन हो और कहां रहते हो? (३)
त्वं जामिर्जनानामग्ने मित्रो असि प्रियः. सखा सखिभ्य ईड्यः.. (४)
हे अग्नि! तुम सबके बंधु एवं प्रिय मित्र हो. तुम मित्रों के स्तुति योग्य मित्र हो. (४)
यजा नो मित्रावरुणा यजा देवाँ ऋतं बृहत्. अग्ने यक्षि स्वं दमम्.. (५)
हे अग्नि! हमारे निमित्त मित्र, वरुण एवं अन्य देवों को लक्ष्य करके यजन करो. तुम
विशाल एवं यथार्थ फल वाले यज्ञ को पूरा करने के लिए अपने यज्ञगृह में जाओ. (५)
सूक्त—७६ देवता—अग्नि
का त उपेतिर्मनसो वराय भुवदग्ने शंतमा का मनीषा.
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को वा यज्ञैः परि दक्षं त आप केन वा ते मनसा दाशेम.. (१)
हे अग्नि! हमारे प्रति तुम्हारा मन प्रसन्न होने का क्या उपाय है? तुम्हें सुख देने वाली
स्तुति कैसी होगी? तुम्हारी क्षमता के अनुकूल यज्ञ कौन यजमान कर सकता है? हम किस
मन से तुम्हें हव्य प्रदान करें? (१)
एह्यग्न इह होता नि षीदादब्धः सु पुरएता भवा नः.
अवतां त्वा रोदसी विश्वमिन्वे यजा महे सौमनसाय देवान्.. (२)
हे अग्नि! इस यज्ञ में आओ और देवों के आह्वानकर्त्ता बनकर बैठो. राक्षसादि तुम्हारी
हिंसा नहीं कर सकते, इसलिए तुम हमारे अग्रगामी नेता बनो. तुम समस्त आकाश एवं धरती
द्वारा रक्षित होकर देवों को परम प्रसन्न करने के लिए हवि द्वारा उनकी पूजा करो. (२)
प्र सु विश्वान्रक्षसो धक्ष्यग्ने भवा यज्ञानामभिशस्तिपावा.
अथा वह सोमपतिं हरिभ्यामातिथ्यमस्मै चकृमा सुदाव्ने.. (३)
हे अग्नि! समस्त राक्षसों को भली प्रकार नष्ट करके हिंसा से यज्ञ की रक्षा करो. संपूर्ण
सोमरसों के पालनकर्त्ता इंद्र को उसके हरि नामक अश्वों सहित इस यज्ञ में लाओ, क्योंकि हम
शोभन फलदाता इंद्र का अतिथि सत्कार करेंगे. (३)
प्रजावता वचसा वह्निरासा च हुवे नि च सत्सीह देवैः.
वेषि होत्रमुत पोत्रं यजत्र बोधि प्रयन्तर्जनितर्वसूनाम्.. (४)
मैं मुख द्वारा हव्य ग्रहण करने वाले अग्नि का आह्वान ऐसे स्तोत्रों द्वारा करता हूं जो
संतान आदि फल देने में समर्थ हैं. हे यज्ञकर्म योग्य अग्नि! तुम अन्य देवों के साथ बैठो एवं
होता तथा पोता द्वारा किए जाने वाले कर्म करो. तुम धन के स्वामी एवं सबके जन्मदाता
बनकर हमें जगाओ. (४)
यथा विप्रस्य मनुषो हविर्भिर्देवाँ अयजः कविभिः कविः सन्.
एवा होतः सत्यतर त्वमद्याग्ने मन्द्रया जुह्वा यजस्व.. (५)
हे अग्नि! तुमने क्रांतदर्शी बनकर मेधावी ऋत्विजों के साथ जिस प्रकार मेधावी मनु के
यज्ञ में हव्य द्वारा देवों की पूजा की थी, हे यज्ञ संपन्नकर्त्ता साधु अग्नि! इसी प्रकार तुम इस
यज्ञ में देवों की पूजा आनंददायक जुहू नामक स्रुक् द्वारा करो. (५)
सूक्त—७७ देवता—अग्नि
कथा दाशेमाग्नये कास्मै देवजुष्टोच्यते भामिने गीः.
यो मर्त्येष्वमृत ऋतावा होता यजिष्ठ इत्कृणोति देवान्.. (१)
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मरणरहित, सत्ययुक्त, देवों का आह्वान करने वाले, यज्ञ पूर्ण कराने वाले एवं मनुष्यों के
बीच निवास करके भी देवों को हवियुक्त करने वाले अग्नि के अनुरूप हव्य हम कैसे दे
सकेंगे? हम तेजस्वी अग्नि के प्रति देवोचित स्तुति किस प्रकार करेंगे. (१)
यो अध्वरेषु शंतम ऋतावा होता तमू नमोभिरा कृणुध्वम्.
अग्निर्यद्देर्मर्त्ताय देवान्त्स चा बोधाति मनसा यजाति.. (२)
हे यजमानो! जो अग्नि यज्ञों में अतिशय सुखकारी, यथार्थदर्शी और देवों का आह्वान
करने वाले हैं, उन्हें स्तुतियों द्वारा हमारे अभिमुख करो. जिस समय अग्नि यजमान के निमित्त
देवों के समीप जाते हैं, उस समय वे देवों को यज्ञपात्र जानकर मन से उनकी पूजा करते हैं.
(२)
स हि क्रतुः स मर्यः स साधुर्मित्रो न भूदद्भुतस्य रथीः.
तं मेधेषु प्रथमं देवयन्तीर्विश उप ब्रुवते दस्ममारीः.. (३)
देवों की अभिलाषा करने वाली प्रजाएं यज्ञकर्त्ता, विश्वसंहारक, उत्पादनकर्त्ता, मित्र के
समान अप्राप्त धन के प्राप्त कराने वाले एवं दर्शनीय अग्नि के समीप जाकर उन्हें यज्ञ का
प्रधान देव मानतीं एवं उनकी स्तुति करती हैं. (३)
स नो नॄणां नृतमो रिशादा अग्निर्गिरोऽवसा वेतु धीतिम्.
तना च ये मघवानः शविष्ठा वाजप्रसूता इषयन्त मन्म.. (४)
यज्ञ के नेताओं के मध्य अतिशय नेता एवं शत्रुओं के भक्षणकर्त्ता अग्नि हमारी स्तुतियों
एवं हव्य से युक्त यज्ञ की कामना करें. जो धनी और शक्तिशाली यजमान हव्य प्रदान करके
अग्नि के मननीय स्तोत्र को करना चाहते हैं, अग्नि भी उनकी स्तुति की कामना करें. (४)
एवाग्निर्गोतमेभिर्ऋतावा विप्रेभिरस्तोष्ट जातवेदाः.
स एषु द्युम्नं पीपयत्स वाजं स पुष्टिं याति जोषमा चिकित्वान्.. (५)
यज्ञ के स्वामी एवं सर्वज्ञाता अग्नि की गौतम आदि ऋषियों ने इसी प्रकार स्तुति की थी.
अग्नि ने प्रसन्न होकर उन ऋषियों का तेजस्वी सोम पिया था एवं अन्न भक्षण किया था. वे
अग्नि हमारे द्वारा दिए हव्य को जानकर पुष्ट होते हैं. (५)
सूक्त—७८ देवता—अग्नि
अभि त्वा गोतमा गिरा जातवेदो विचर्षणे. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (१)
हे जातवेद एवं सर्वदर्शक अग्नि! गौतम ऋषि ने तुम्हारी स्तुति की थी. हम भी तुम्हारे
गुणप्रकाशक मंत्रों से बार-बार तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१)
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तमु त्वा गोतमो गिरा रायस्कामो दुवस्यति. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (२)
धन की इच्छा वाले गौतम ऋषि जिस अग्नि की स्तोत्र द्वारा सेवा करते हैं, हम भी
गुणप्रकाशक स्तोत्र द्वारा उसी अग्नि की बार-बार स्तुति करते हैं. (२)
तमु त्वा वाजसातममङ्गिरस्वद्धवामहे. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (३)
हे अग्नि! हम अंगिरा ऋषि के समान सर्वाधिक अन्न देने वाले तुम्हें बुलाते हैं एवं तुम्हारे
गुणप्रकाशक मंत्रों से बार-बार स्तुति करते हैं. (३)
तमु त्वा वृत्रहन्तमं यो दस्यूंरवधूनुषे. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (४)
हे अग्नि! तुम दस्युओं एवं अनार्यों को स्थानच्युत करो. हम सर्वापेक्षा शत्रुहंता तुम्हारी
स्तुति तुम्हारे गुण प्रकाशक मंत्रों से बार-बार करते हैं. (४)
अवोचाम रहूगणा अग्नये मधुमद्वचः. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (५)
मैं रहूगणवंशीय गौतम अग्नि के प्रति मधुरवचनों का प्रयोग करता हुआ गुणप्रकाशक
स्तोत्र द्वारा उनकी बार-बार स्तुति करता हूं. (५)
सूक्त—७९ देवता—अग्नि
हिरण्यकेशो रजसो विसारेऽहिर्धुनिर्वात इव ध्रजीमान्.
शुचिभ्राजा उषसो नवेदा यशस्वतीरपस्युवो न सत्याः.. (१)
हिरण्यकेश विद्युतरूप अग्नि मेघों को कंपित करने वाले, वायु के समान शीघ्रगतियुक्त
एवं शोभनदीप्ति वाले बनकर मेघ से जल बरसाना जानते हैं, अन्नयुक्त, अपने काम में लगी
हुई एवं सीधीसादी प्रजाओं के समान उषा यह कार्य नहीं जानती. (१)
आ ते सुपर्णा अमिनन्तँ एवैः कृष्णो नोनाव वृषभो यदीदम्.
शिवाभिर्न स्मयमानाभिरागात्पतन्ति मिहः स्तनयन्त्यभ्रा.. (२)
हे अग्नि! तुम्हारी शोभन पतनशील किरणें मरुतों के साथ मिलकर वर्षा के उद्देश्य से
मेघों को ताड़ित करती हैं. तभी कृष्ण वर्ण एवं वर्षाकारी मेघ गरजता है और सुखकारिणी
तथा हंसती हुई सी श्वेत बूंदों के साथ आता है, फिर पानी गिरता है और बादल गरजता है.
(२)
यदीमृतस्य पयसा पियानो नयन्नृतस्य पथिभी रजिष्ठैः.
अर्यमा मित्रो वरुणः परिज्मा त्वचं पृञ्चन्त्युपरस्य योनौ.. (३)
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जब ये अग्नि उदक के रस से संसार को भिगोते हैं एवं स्नान, पान आदि के रूप में जल
के उपयोग का सरल उपाय बताते हैं, उस समय अर्यमा, मित्र, वरुण एवं चारों ओर गतिशील
मरुद्गण मेघ के जलोत्पत्ति स्थान के आच्छादन को नष्ट करते हैं. (३)
अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो.
अस्मे धेहि जातवेदो महि श्रवः.. (४)
हे शक्तिपुत्र अग्नि! तुम बहुसंख्यक गायों से युक्त अन्न के स्वामी हो. हे जातवेद! हमें
पर्याप्त अन्न दो. (४)
स इधानो वसुष्कविरग्निरीळेन्यो गिरा. रेवदस्मभ्यं पुर्वणीक दीदिहि.. (५)
हे दीपनशील, सबको निवास देने वाले, क्रांतदर्शी, स्तोत्र द्वारा प्रशंसनीय एवं अनेक
ज्वाला युक्त अग्नि! तुम इस प्रकार दीप्त बनो, जिस प्रकार हमारे पास धनयुक्त अन्न हो सके.
(५)
क्षपो राजन्नुत त्मनाग्ने वस्तोरुतोषसः. स तिग्मजम्भ रक्षसो दह प्रति.. (६)
हे तेजस्वी अग्नि! दिवस अथवा रात्रि में अपने आप या अपने पुरुषों द्वारा राक्षस आदि
को बाधित करो. हे तीक्ष्णमुख! प्रत्येक राक्षस को जलाओ. (६)
अवा नो अग्न ऊतिभिर्गायत्रस्य प्रभर्मणि. विश्वासु धीषु वन्द्य.. (७)
हे समस्त यज्ञकर्मों में वंदनीय अग्नि! हमारे गायत्री छंद वाले सूक्त के संपादन के कारण
प्रसन्न होकर हमारी रक्षा करो. (७)
आ नो अग्ने रयिं भर सत्रासाहं वरेण्यं. विश्वासु पृत्सु दुष्टरम्.. (८)
हे अग्नि! हमें दारिद्र्य का अविलंब विनाश करने वाला, वरणीय एवं समस्त संग्रामों में
शत्रुओं द्वारा दुस्तर धन दो. (८)
आ नो अग्ने सुचेतुना रयिं विश्वायुपोषसम्. मार्डीकं धेहि जीवसे.. (९)
हे अग्नि! हमारे जीवन के लिए शोभन ज्ञानयुक्त, सुखहेतु, संपूर्ण आयु पर्यंत देह आदि
का पोषक धन प्रदान करो. (९)
प्र पूतास्तिग्मशोचिषे वाचो गोतमाग्नये. भरस्व सुम्नयुर्गिरः.. (१०)
हे शोभन धन के अभिलाषी गौतम! विशुद्ध वचनों से तीक्ष्ण ज्वालाओं वाले अग्नि की
स्तुति करो. (१०)
यो नो अग्नेऽभिदासत्यन्ति दूरे पदीष्ट सः. अस्माकमिद्वृधे भव.. (११)
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हे अग्नि! जो शत्रु हमारे समीप या दूर रहकर हमें हानि पहुंचाता है, उसे नष्ट करके
हमारी वृद्धि करो. (११)
सहस्राक्षो विचर्षणििरग्नी रक्षांसि सेधति. होता गृणीत उक्थ्यः.. (१२)
असंख्य ज्वालाओं वाले एवं सबको विशेष रूप से देखने वाले अग्नि राक्षसों को
यज्ञभूमि से भगाते हैं, वे हमारे द्वारा स्तोत्रों की सहायता से स्तुत होकर देवों को बुलाते एवं
उनकी स्तुति करते हैं. (१२)
सूक्त-८० देवता—इंद्र
इत्था हि सोम इन्मदे ब्रह्मा चकार वर्धनम्.
शविष्ठ वज्रिन्नोजसा पृथिव्या निः शशा अहिार्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१)
हे अतिशय शक्तिशाली एवं वज्रधारी इंद्र! जब तुमने प्रसन्नतादायक सोमरस पी लिया
तो स्तोता ने तुम्हारी वृद्धि करने वाली स्तुतियां कीं इसीलिए तुमने अपनी शक्ति से धरती पर
खड़े होकर अहि नामक राक्षस को पीटते हुए अपना अधिकार प्रकट किया था. (१)
स त्वामदद्वृषा मदः सोमः श्येनाभृतः सुतः.
येना वृत्रं निरद्भ्यो जघन्थ वज्रिन्नोजसार्चन्ननु स्वराज्यम्.. (२)
हे इंद्र! गीले करने वाले मादक श्येन पक्षी का रूप धारण करने वाली गायत्री द्वारा लाए
गए एवं निचोड़े हुए सोमरस ने तुम्हें प्रसन्न किया था. हे वज्री! तुमने अपना अधिकार प्रकट
करते हुए अपनी शक्ति से आकाश में वृत्र राक्षस को मारा था. (२)
प्रेह्यभीहि धृष्णुहि न ते वज्रो नि यंसते.
इन्द्र नृम्णं हि ते शवो हनो वृत्रं जया अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (३)
हे इंद्र! जाओ और शत्रुओं के सामने पहुंचकर उन्हें हराओ कोई भी न तो तुम्हारे वज्र
का नियमन कर सकता है और न तुम्हारी शक्ति को अभिभूत करने में समर्थ है, इसलिए तुम
वृत्र राक्षस का वध करके उसके द्वारा रोके हुए जल को प्राप्त करो एवं अपने प्रभुत्व का
प्रदर्शन करो. (३)
निरिन्द्र भूम्या अधिं वृत्रं जघन्थ निर्दिवः.
सृजा मरुत्वतीरव जीवधन्या इमा अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (४)
हे इंद्र! तुमने धरती और आकाश के ऊपर वृत्र का वध किया था तथा अपना प्रभुत्व
स्पष्ट करते हुए मरुद्गणों से युक्त एवं जीवों को तृप्त करने वाला जल बरसाया था. (४)
इन्द्रो वृत्रस्य दोधतः सानुं वज्रेण हीळितः.
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अधि सानौ नि जिघ्नते वज्रेण शतपर्वणा.
अभिक्रम्याव जिघ्नतेऽपः सर्माय चोदयन्नर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (५)
क्रोध में भरे इंद्र वृत्र असुर के सामने जाकर उसे कंपाते हैं, उसकी उठी हुई ठोड़ी पर
वज्र का प्रहार करते हैं एवं अपने अधिकार का प्रदर्शन करते हुए वर्षा के जल को बहाते हैं.
(५)
अधि सानौ नि जिघ्नते वज्रेण शतपर्वणा.
मन्दान इन्द्रो अन्धसः सखिभ्यो गातुमिच्छत्यर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (६)
इंद्र शतधाराओं वाले वज्र से वृत्र असुर के उठे हुए कपोल पर आघात करते हैं एवं
अपना प्रभुत्व दिखाते हुए प्रसन्न होकर स्तोताओं के प्रति अन्न प्राप्ति के उपाय की इच्छा
करते हैं. (६)
इन्द्र तुभ्यमिदद्रिवोऽनुत्तं वज्रिन्वीर्यम्.
यद्ध त्यं मायिनं मृगं तमु त्वं माययावधीरर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (७)
हे मेघवाहन व वज्रधारी इंद्र! तुम्हारी ही सामर्थ्य शत्रुओं द्वारा अतिरस्कृत है, क्योंकि
तुमने अपना प्रभुत्व दिखाते हुए मृग रूपधारी वृत्र का माया द्वारा वध किया था. (७)
वि ते वज्रासो अस्थिरन्नवतिं नाव्या३ अनु.
महत्त इन्द्र वीर्यं बाह्वोस्ते बलं हितमर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (८)
हे इंद्र! तुम्हारा वज्र नब्बे नदियों के ऊपर व्यवस्थित हुआ था. तुम अपने पर्याप्त वीर्य
एवं बलशालिनी भुजाओं से अपना प्रभुत्व प्रदर्शित करो. (८)
सहस्रं साकमर्चत परि ष्टोभत विंशतिः.
शतैनमन्वनोनवुरिन्द्राय ब्रह्मोद्यतमर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (९)
हजार मनुष्यों ने एक साथ इंद्र की पूजा एवं बीस ने स्तुति की थी. सौ ऋषियों ने इंद्र की
बार-बार स्तुति की थी. इंद्र के निमित्त हव्य अन्न सबसे ऊपर रखा गया था, इसीलिए इंद्र ने
अपना अधिकार प्रदर्शित किया. (९)
इन्द्रो वृत्रस्य तविषीं निरहन्सहसा सहः.
महत्तदस्य पौंस्यं वृत्रं जघन्वाँ असृजदर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१०)
इंद्र ने वृत्र राक्षस का बल अपने बल से नष्ट किया एवं अभिभव के साधन आयुधों से
वृत्र के आयुध समाप्त किए. इंद्र का बल अति प्रौढ़ है, क्योंकि उन्होंने वृत्र को मारकर उसके
द्वारा रोका हुआ जल बहाया एवं अपने प्रभुत्व का प्रदर्शन किया. (१०)
इमे चित्तव मन्यवे वेपेते भियसा मही.
यदिन्द्र वज्रिन्नोजसा वृत्रं मरुत्वाँ अवधीरर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (११)
हे वज्रधारी इंद्र! तुम्हारे क्रोध से ये विशाल धरती-आकाश भयभीत होकर कांपते हैं,
क्योंकि तुमने मरुतों के साथ मिलकर अपनी शक्ति से वृत्र का वध किया एवं अपना अधिकार
प्रदर्शित किया. (११)
न वेपसा न तन्यतेन्द्रं वृत्रो वि बीभयत्.
अभ्येनं वज्र आयसः सहस्रभृष्टिरायतार्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१२)
वृत्र अपने कंपन से इंद्र को नहीं डरा पाया. इंद्र द्वारा छोड़ा हुआ लौह निर्मित एवं हजार
धारों वाला वज्र वृत्र को मारने के लिए उसकी ओर गया. इस प्रकार इंद्र ने अपना प्रभुत्व
प्रदर्शित किया. (१२)
यदवृत्रं तव चाशनिं वज्रेण समयोधयः.
अहिमिन्द्र जिघांसतो दिवि ते बद्धे शवोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१३)
हे इंद्र! जब वृत्र ने तुम्हें मारने के लिए अशनि छोड़ी और तुमने उसे अपने वज्र से नष्ट
कर दिया, उस समय तुमने अहि अर्थात् वृत्र के नाश के लिए संकल्प किया और तुम्हारा बल
आकाश में व्याप्त हो गया. इस प्रकार तुमने अपना प्रभुत्व प्रदर्शित किया. (१३)
अभिष्टने ते अद्रिवो यत्स्था जगच्च रेजते.
त्वष्टा चित्तव मन्यव इन्द्र वेविज्यते भियार्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१४)
हे वज्रधारी इंद्र! जब तुम सिंहनाद करते हो तो स्थावर और जंगम सभी कांप उठते हैं
तथा वज्रनिर्माता त्वष्टा भी तुम्हारे कोप से भयभीत हो उठते हैं. इस प्रकार तुम अपना
अधिकार दिखाते हो. (१४)
नहि नु यादथीमसीन्द्रं को वीर्या परः.
तस्मिन्नृम्णमुत क्रतुं देवा ओजांसि सं दधुरर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१५)
सर्वत्र व्यापक इंद्र को हम नहीं जान सकते, क्योंकि अत्यंत दूर अवस्थित इंद्र की
सामर्थ्य को कौन जान सकता है? देवों ने इंद्र में अपना धन, क्रतु एवं बल स्थापित किया था,
इसलिए इंद्र ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया. (१५)
यामथर्वा मनुष्पिता दध्यङ्धियमत्नत.
तस्मिन्ब्रह्माणि पूर्वथेन्द्र उक्था समग्मतार्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१६)
अथर्वा ऋषि, समस्त प्रजाओं के पिता तुल्य मनु एवं अथर्वा के पुत्र दध्यंग ऋषि ने
जितने भी यज्ञकर्म किए, उन में प्रयुक्त हवि रूप अन्न एवं स्तोत्र प्राचीन ऋषियों के यज्ञों के
समान इंद्र को ही मिले. इसलिए इंद्र ने अपने अधिकार का प्रदर्शन किया. (१६)
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सूक्त—८१ देवता—इंद्र
इन्द्रो मदाय वावृधे शवसे वृत्रहा नृभिः.
तमिन्महत्स्वाजिषूतेमर्भे हवामहे स वाजेषु प्र नोऽविषत्.. (१)
वृत्रहंता इंद्र ऋत्विजों की स्तुति द्वारा बल और हर्ष पाने के लिए बढ़ें. हम उन्हें बड़े और
छोटे युद्धों में बुलाते हैं. वे युद्ध में हमारी रक्षा करें. (१)
असि हि वीर सेन्योऽसि भूरि पराददिः.
असि दभ्रस्य चिद्वृधो यजमानाय शिक्षसि सुन्वते भूरि ते वसु.. (२)
हे वीर इंद्र! तुम अकेले होने पर भी सेना के समान हो. तुम शत्रुओं के विपुल धन को
छीन लेते हो एवं अपने अल्प स्तुतिकर्त्ता को भी बढ़ाते हो. तुम यज्ञ करने वाले सोमरसदाता
को अपेक्षित धन देते हो, क्योंकि तुम्हारे पास बहुत धन है. (२)
यदुदीरत आजयो धृष्णवे धीयते धना.
युक्ष्वा मदच्युता हरी कं हनः कं वसो दधोऽस्माँ इन्द्र वसौ दधः.. (३)
युद्ध आरंभ होने पर विजेता अपने हारे हुए शत्रुओं का धन प्राप्त करता है. हे इंद्र!
अपने रथ में शत्रुओं का गर्व मिटाने वाले घोड़े जोड़ो. तुम अपनी सेवा से विमुख राजा को
मारते तथा सेवापरायण को दान देते हो, इसलिए हमें धन दो. (३)
क्रत्वा महाँ अनुष्वधं भीम आ वावृधे शवः.
श्रिय ऋष्व उपाकयोर्नि शिप्री हरिवान्दधे हस्तयोर्वज्रमायसम्.. (४)
यज्ञकर्म द्वारा महान् एवं शत्रुओं को भयंकर, सोमरूपी अन्न का भक्षण करके अपना
बल बढ़ाने वाले, दर्शनीय नासिका तथा हरि नाम के अश्वों से युक्त इंद्र हमें संपत्ति देने के लिए
अपने समीपवर्ती बाहुओं में लौहनिर्मित वज्र धारण करते हैं. (४)
आ पप्रौ पार्थिवं रजो बद्धे रोचना दिवि.
न त्वावाँ इन्द्र कश्चन न जातो न जनिष्यतेऽति विश्वं ववक्षिथ.. (५)
इंद्र ने अपने तेज से धरती एवं आकाश को व्याप्त किया है तथा आकाश में चमकीले
नक्षत्र स्थापित किए हैं. हे इंद्र! तुम्हारी समानता करने वाला न कोई उत्पन्न हुआ है और न
भविष्य में होगा. तुम संपूर्ण जगत् को धारण करने के इच्छुक हो. (५)
यो अर्यो मर्तभोजनं पराददाति दाशुषे.
इन्द्रो अस्मभ्यं शिक्षतु वि भजा भूरि ते वसु भक्षीय तव राधसः.. (६)
पालनकर्त्ता एवं यजमान को मानव भोगोचित अन्न देने वाले इंद्र हमें भी उसी प्रकार का
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अन्न दें. हे इंद्र! हमें देने के लिए धन का बंटवारा कर दो, क्योंकि तुम्हारे पास असंख्य धन है.
हम तुम्हारे धन का एक अंश प्राप्त करें. (६)
मदेमदे हि नो ददिर्यूथा गवामृजुकतुः.
सं गृभाय पुरू शतोभयाहस्त्या वसु शिशीहि राय आ भर.. (७)
हे सोमपान द्वारा हर्षित होकर हमें गोसमूह देने वाले इंद्र! हमें देने के लिए अपने दोनों
हाथों में अपरिमित धन ग्रहण करो. हमें तीक्ष्ण बुद्धियुक्त करो और धन प्रदान करो. (७)
मादयस्व सुते सचा शवसे शूर राधसे.
विद्वा हि त्वा पुरूवसुमप कामान्तसृज्महेऽथा नोऽविता भव.. (८)
हे शौर्यसंपन्न इंद्र! सोम के निचुड़ जाने पर आकर हमें धन एवं बल देने के निमित्त
सोमरस पीकर तृप्त बनो. हम तुम्हें विपुल धनसंपन्न जानते हैं तथा अपनी अभिलाषा तुम्हें
बताते हैं. तुम हमारे रक्षक बनो. (८)
एते त इन्द्र जन्तवो विश्वं पुष्यन्ति वार्यम्.
अन्तर्हि ख्यो जनानामर्यो वेदो अदाशुषां तेषां नो वेद आ भर.. (९)
हे इंद्र! तुम्हारे यजमान सबके उपभोग योग्य हवि को बढ़ाते हैं. हे समस्त जंतुओं के
स्वामी! तुम हव्य न देने वालों का धन जानते हो. उनका धन हमें प्रदान करो. (९)
सूक्त—८२ देवता—इंद्र
उपो षु शृणुही गिरो मघवन्मातथा इव.
यदा नः सूनूतावतः कर आदर्थयास इद्योजा न्विन्द्र ते हरी.. (१)
हे धनपति इंद्र! हमारे समीप आकर ही हमारी स्तुतियां सुनो. तुम पहले से भिन्न मत हो
जाना. तुम जब हमें सत्य, प्रिया एवं स्तुतिरूपी वाणी से युक्त करते हो तभी हम तुम्हारी
प्रार्थना करते हैं. इस कारण अपने हरि नामक दोनों घोड़ों को रथ में जोड़ो. (१)
अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत.
अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी.. (२)
हे इंद्र! तुम्हारा दिया हुआ अन्न खाकर यजमान तृप्त हुए हैं एवं प्रसन्नता व्याप्त करने के
लिए उन्होंने अपना शरीर कंपित किया है. दीप्तिसंपन्न मेधावी विप्रों ने नवीन स्तोत्रों द्वारा
तुम्हारी स्तुति की है, इसलिए अपने हरि नाम के घोड़ों को रथ में जोड़ो. (२)
सुसंदृशं त्वा वयं मघवन्वन्दिषीमहि.
प्र नूनं पूर्णवन्धुरः स्तुतो याहि वशाँ अनु योजा न्विन्द्र ते हरी.. (३)
हे धनपति इंद्र! सबको अनुग्रहपूर्ण दृष्टि से देखने वाले तुम्हारी हम स्तुति करते हैं.
हमारी स्तुति सुनकर तुम स्तोताओं को देने योग्य धन से रथ पूरित करके कामना करने वाले
यजमानों के समीप आओ एवं इसके लिए अपने हरि नामक घोड़ों को रथ में जोड़ो. (३)
स घा तं वृषणं रथमधि तिष्ठाति गोविन्दम्.
यः पात्रं हारियोजनं पूर्णमिन्द्र चिकेतति योजा न्विन्द्र ते हरी.. (४)
हे इंद्र! आप अन्न, सोम सहित गायों को देने में समर्थ हैं तथा दृढ़ रथ को भली प्रकार
जानते हैं और उसी पर आरूढ़ होते हैं. अतः इंद्र देव अपने घोड़ों को रथ में जोड़ो. (४)
युक्तस्ते अस्तु दक्षिण उत सव्यः शतक्रतो.
तेन जायामुप प्रियां मन्दानो याह्यन्धसो योजा न्विन्द्र ते हरी.. (५)
हे शतक्रतु! तुम्हारे रथ की दाईं एवं बाईं ओर घोड़े जुड़े हों. सोमरूप अन्न के उपभोग से
मस्त होकर तुम उसी रथ द्वारा अपनी प्रेयसी के समीप जाओ. (५)
युनज्मि ते ब्रह्मणा केशिना हरी उप प्र याहि दधिषे गभस्त्योः.
उच्त्वा सुतासो रभसा अमन्दिषुः पूषण्वान्वज्रिन्त्समु पत्न्यामदः.. (६)
हे वज्रधारी इंद्र! तुम्हारे शिखा वाले घोड़े को मैं स्तोत्र रूपी मंत्र की सहायता से तुम्हारे
रथ में जोड़ता हूं. दोनों बाहुओं में घोड़ों की रास पकड़कर अपने घर जाओ. तुम निचोड़े हुए
तीखे सोम से मतवाले होकर अपनी प्रेयसी के साथ मोद प्राप्त करो. (६)
सूक्त—८३ देवता—इंद्र
अश्वावति प्रथमो गोषु गच्छति सुप्रावीरिन्द्र मर्त्यस्तवोतिभिः.
तमित्पृणक्षि वसुना भवीयसा सिन्धुमापो यथाभितो विचेतसः.. (१)
हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा रक्षित मनुष्य बहुत से घोड़ों वाले घर में रहता हुआ सबसे पहले
गाएं प्राप्त करता है. जिस प्रकार विचरणशील सरिताएं सभी दिशाओं में समुद्र को भरती हैं,
उसी प्रकार तुम भी अपने द्वारा रक्षित मनुष्य को विविध प्रकार के धन से युक्त करते हो. (१)
आपो न देवीरुप यन्ति होत्रियमवः पश्यन्ति विततं यथा रजः.
प्राचैर्देवासः प्र णयन्ति देवयुं ब्रह्मप्रियं जोषयन्ते वरा इव.. (२)
जिस समय चमकता हुआ जल चमस नामक यज्ञपात्र में आता है, उसी समय ऊपर
रहने वाले देवों की सूर्यकिरण के समान विस्तृत दृष्टि यज्ञपात्र चमस पर पड़ती है. जैसे बहुत
से वर एक ही कन्या से विवाह करना चाहते हैं, उसी प्रकार देवगण वेदी की उत्तर दिशा में
रखे हुए इस सोमपूर्ण एवं देवप्रिय पात्र की अभिलाषा करते हैं. (२)
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अधि द्वयोरदधा उक्थ्यं१ वचो यतस्रुचा मिथुना या सपर्यतः.
असंयत्तो व्रते ते क्षेति पुष्यति भद्रा शक्तिर्यजमानाय सुन्वते.. (३)
हे इंद्र! अपने प्रति समर्पित यज्ञपात्र में तुमने मंत्ररूपी वचनों को मिला दिया है. ऐसे
यज्ञपात्र वाला यजमान युद्धस्थल में न जाकर तुम्हारी पूजा में लीन रहकर पुष्ट होता है,
क्योंकि तुम्हें निचुड़ा हुआ सोम देने वाला अवश्य शक्ति प्राप्त करता है. (३)
आदङ्गिराः प्रथमं दधिरे वय इद्धाग्नयः शम्या ये सुकृत्यया.
सर्वं पणेः समविन्दन्त भोजनमश्वावन्तं गोमन्तमा पशुं नरः.. (४)
पहले पणियों द्वारा गाएं चुराने पर अंगिरा ऋषि ने इंद्र के लिए हवि प्रस्तुत किया था.
इस कारण यज्ञ नेता अंगिरावंशियों ने गाय, अश्व एवं अन्य पशुओं से युक्त धन पाया था. (४)
यज्ञैरथर्वा प्रथमः पथस्तते ततः सूर्यो व्रतपा वेन आजनि.
आ गा आजदुशना काव्यः सचा यमस्य जातममृतं यजामहे.. (५)
अथर्वा नामक ऋषि ने इंद्र संबंधी यज्ञ करके पणि द्वारा चुराई हुई गायों का मार्ग सबसे
पहले जान लिया था. इसके पश्चात् यज्ञरक्षक एवं तेजस्वी सूर्यरूपी इंद्र प्रकट हुए एवं अथर्वा
ने गाएं प्राप्त कीं. कवि के पुत्र उशना ने जिसकी सहायता की एवं जो असुरों को भगाने के
लिए उत्पन्न हुए थे, ऐसे मरणरहित इंद्र की हम हवि द्वारा पूजा करते हैं. (५)
बर्हिर्वा यत्स्वपत्याय वृज्यतेऽर्को वा श्लोकमाघोषते दिवि.
ग्रावा यत्र वदति कारुरुक्थ्य१स्तस्येदिन्द्रो अभिपित्वेषु रण्यति.. (६)
शोभन फल वाले यज्ञ निमित्त जब-जब कुश काटे जाते हैं, तब-तब स्तोत्र बनाने वाला
होता प्रकाशयुक्त यज्ञ में स्तोत्र बोलता है. जिस समय सोम कुचलने के काम आने वाला
पत्थर स्तुतिकारी स्तोता के समान शब्द करता है, उस समय इंद्र प्रसन्न होते हैं. (६)
सूक्त—८४ देवता—इंद्र
असावि सोम इन्द्र ते शविष्ठ धृष्णवा गहि.
आ त्वा पृणक्त्विन्द्रियं रजः सूर्यो न रश्मिभिः.. (१)
हे इंद्र! तुम्हारे निमित्त सोम निचोड़ लिया गया है, अतएव हे बलशाली एवं शत्रुघर्षक!
यज्ञस्थल में आओ. जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों द्वारा आकाश को भर देते हैं, उसी प्रकार
सोमपान से उत्पन्न शक्ति तुम्हें पूर्ण करे. (१)
इन्द्रमिद्धरी वहतोऽप्रतिधृष्टशवसम्.
ऋषीणां च स्तुतीरुप यज्ञं च मानुषाणाम्.. (२)
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हरि नामक दोनों घोड़े अप्रधर्षित बल वाले इंद्र को वसिष्ठ आदि ऋषियों तथा अन्य
मनुष्यों की स्तुति एवं यज्ञ के समीप पहुंचावें. (२)
आ तिष्ठ वृत्रहन्नथं युक्ता ते ब्रह्मणा हरी.
अर्वाचीनं सु ते मनो ग्रावा कृणोतु वग्नुना.. (३)
हे शत्रुविध्वंसकारी इंद्र! तुम्हारे दोनों घोड़ों को हमने मंत्र द्वारा रथ में जोड़ दिया है,
इसलिए रथ पर चढ़ो. सोम कूटने के लिए प्रयुक्त पत्थर का शब्द तुम्हारा मन हमारी ओर फेरे.
(३)
इममिन्द्र सुतं पिब ज्येष्ठममर्त्यं मदम्.
शुक्रस्य त्वाभ्यक्षरन्धारा ऋतस्य सादने.. (४)
हे इंद्र! अतिशय प्रशंसनीय, अमारक एवं मादक सोम को पिओ. यज्ञ संबंधी घर में
वर्तमान तेजस्वी सोम की धाराएं तुम्हारी ओर बहती हैं. (४)
इन्द्राय नूनमर्चतोक्थानि च ब्रवीतन.
सुता अमत्सुरिन्दवो ज्येष्ठं नमस्यता सहः.. (५)
हे ऋत्विजो! इंद्र का शीघ्र पूजन करो. इंद्र को लक्ष्य करके स्तुतियां करो. निचोड़ा हुआ
सोम इंद्र को प्रसन्न करे. इसके पश्चात् परम प्रशंसनीय एवं शक्तिशाली इंद्र को प्रणाम करो.
(५)
नकिष्ट्वद्रथीत्तरो हरी यदिन्द्र यच्छसे.
नकिष्ट्वानु मज्मना नकिः स्वश्व आनशे.. (६)
हे इंद्र! जब तुम अपने हरि नामक अश्वों को रथ में जोड़ देते हो, उस समय तुमसे श्रेष्ठ
रथी कोई नहीं होता. तुम्हारे समान बली एवं सुंदर अश्वों का स्वामी भी कोई नहीं है. (६)
य एक इद्धिदयते वसु मर्ताय दाशुषे.
ईशानो अप्रतिष्कुत इन्द्रो अङ्ग.. (७)
हव्य देने वाले यजमान को धन देने वाले इंद्र, शीघ्र ही समस्त जगत् के ईश बन जाते हैं.
(७)
कदा मर्तमराधसं पदा क्षुम्पमिव स्फुरत्.
कदा नः शुश्रवद्गिर इन्द्रो अङ्ग.. (८)
जैसे बरसात में उगी छतरियों को सहज ही पैर से कुचल दिया जाता है, उसी प्रकार इंद्र
यज्ञ न करने वालों का हनन करेंगे. इंद्र हमारी प्रार्थनाएं न जाने कब सुनेंगे? (८)
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