ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
मैं यजमान यज्ञ के बढ़ाने वाले, विस्तृत यज्ञों में हमें सावधान करने वाले, देवपुत्रों द्वारा सेवित एवं शोभनकर्मयुक्त यजमानों वाले धरती व आकाश की विशेष रूप से स्तुति करता हूं. वे हमारे प्रति अनुग्रह बुद्धि रखते हुए उत्तम धन देते हैं. (१) उत मन्ये पितुरद्रुहो मनो मातुर्महि स्वतवस्तद्धवीमभिः. सुरेतसा पितरा भूम चक्रतुरुरु प्रजाया अमृतं वरीमभिः.. (२) मैं पुत्र के प्रति द्रोहहीन धरतीरूपी माता और आकाशरूपी पिता को आह्वान मंत्रों द्वारा अनुग्रहयुक्त मन वाला जानता हूं. ये दोनों माता-पिता अपने शोभन सामर्थ्य से यजमानों की विस्तृत रक्षा करते हुए पर्याप्त अमृत देते हैं. (२) ते सूनवः स्वपसः सुदंससो मही जज्ञुर्मातरा पूर्वचित्तये. स्थातुश्च सत्यं जगतश्च धर्मणि पुत्रस्य पाथः पदमद्वयाविनः.. (३) शोभन कर्म वाली और सुदर्शन प्रजाएं तुम्हारे द्वारा पूर्वकृत अनुग्रह को स्मरण करके तुम्हें महान् एवं माता के समान हितकारी जानती हैं. पुत्ररूप स्थावर और जंगम द्यावापृथिवी को अद्वितीय जानते हैं. तुम इनकी रक्षा का अबाध मार्ग बताओ. (३) ते मायिनो ममिरे सुप्रचेतसो जामी सयोनी मिथुना समोकसा. नव्यन्नव्यं तन्तुमा तन्वते दिवि समुद्रे अन्तः कवयः सुदीतयः.. (४) द्यावापृथ्वी सदा एक स्थान पर युगलरूप में रहने वाली ऐसी प्रजायुक्त एवं चेतनासंपन्न सगी बहिनें हैं, जिन्हें किरणें अलग-अलग करती हैं. अपने व्यापार को जानने वाली प्रकाशयुक्त रश्मियां चमकते हुए आकाश में विस्तृत होती हैं. (४) तद्राधो अद्य सवितुर्वरेण्यं वयं देवस्य प्रसवे मनामहे. अस्मभ्यं द्यावापृथिवी सुचेतुना रयिं धत्तं वसुमन्तं शतग्विनम्.. (५) हम यजमान सविता देव की अनुज्ञा से उस उत्तम धन को मांगते हैं. धरती और आकाश हमारे प्रति अनुग्रहबुद्धि के द्वारा निवास योग्य घर एवं सैकड़ों गायों के रूप में धन दें. (५) सूक्त—१६० देवता—द्यावा-पृथ्वी ते हि द्यावापृथिवी विश्वशम्भुव ऋतावरी रजसो धारयत्कवी. सुजन्मनी धिषणे अन्तरीयते देवो देवी धर्मणा सूर्यः शुचिः.. (१) शुद्ध एवं दीप्यमान सूर्य समस्त प्राणियों को सुख देने वाले, यज्ञसंपन्न, जल उत्पादन के प्रयत्नों सहित, शोभनजन्म वाले एवं अपने कार्यकुशल धरती और आकाश के बीच में अपनी विशेषताओं की रक्षा करता हुआ सदा गमन करता है. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
उरुव्यचसा महिनी असश्चता पिता माता च भुवनानि रक्षतः. सुधृष्टमे वपुष्ये३ न रोदसी पिता यत्सीमभि रूपैरवासयत्.. (२) विस्तीर्ण, महान् एवं एक-दूसरे से अलग, माता एवं पितारूप धरती-आकाश समस्त प्राणियों की रक्षा करते हैं. अत्यंत शक्तिसंपन्न धरती-आकाश शरीरधारियों के हित के लिए चेष्टा करते हैं एवं माता-पिता के समान सबको रूपनिर्माण से अनुगृहीत करते हैं. (२) स वह्निः पुत्रः पित्रोः पवित्रवान्पुनाति धीरो भुवनानि मायया. धेनुं च पृश्निं वृषभं सुरेतसं विश्वाहा शुक्रं पयो अस्य दुक्षत.. (३) पावन, रश्मियुक्त, धीर, फल धारण करने वाले एवं अपनी बुद्धि से समस्त प्राणियों को पवित्र करने वाले सूर्य माता-पिता तुल्य धरती और आकाश के पुत्र हैं. वे धरतीरूपी शुक्लवर्ण धेनु और आकाशरूपी सामर्थ्यसंपन्न बैल को प्रकाशित करते हैं एवं आकाश से उज्ज्वल दूध दुहते हैं. (३) अयं देवानांमपसामपस्तमो यो जजान रोदसी विश्वशम्भुवा. वि यो ममे रजसी सुक्रतूययाजरेभिः स्कम्भनेभिः समानृचे.. (४) वे सूर्य देवों एवं कर्मकर्त्ताओं में अत्यंत श्रेष्ठ हैं. उन्होंने प्राणियों को सभी प्रकार से सुख देने वाले धरती और आकाश को उत्पन्न एवं शोभन कर्म की इच्छा से दोनों को विभक्त करके मजबूत खूंटों द्वारा स्थिर किया है. (४) ते नो गृणाने महिनी महि श्रवः क्षत्रं द्यावापृथिवी धासथो बृहत्. येनाभि कृष्टीस्ततनाम विश्वहा पनाय्यमोजो अस्मे समिन्वताम्.. (५) हमारे द्वारा जिन धरती और आकाश की स्तुति की जाती है, वे महान् हैं एवं हमें सर्वत्र प्रसिद्ध अन्न और यश देते हैं. इन्हीं के बल पर हमने पुत्र आदि प्रजाओं का विस्तार किया है. तुम हमें प्रशंसायोग्य शक्ति प्रदान करो. (५) सूक्त—१६१ देवता—ऋभु किमु श्रेष्ठः किं यविष्ठो न आजगन्किमीयते दूत्यं१ कद्यदूचिम. न निन्दिम चमसं यो महाकुलोऽग्ने भ्रातर्द्रुण इद्भूतिमुदिम.. (१) ऋभुओं ने अग्नि को देखकर आपस में कहा—"जो हमारे सामने आया है, यह हमसे अवस्था में बड़ा है या छोटा? क्या यह देवों का दूत बनकर आया है? इसे किस प्रकार निश्चित करें?" इसके पश्चात् वे अग्नि से बोले—"भ्राता अग्नि! हम चमस की निंदा नहीं करेंगे, क्योंकि यह महाकुल में उत्पन्न हुआ है. लकड़ी के बने इस चमस की प्राप्ति का हम वर्णन करेंगे." (१) ebook converter DEMO Watermarks*
एकं चमसं चतुरः कृणोतन तद्भो देवा अब्रुवन्तद्ध आगमम्. सौधन्वना यद्येवा करिष्यथ साकं देवैर्यज्ञियासो भविष्यथ.. (२) इस पर अग्नि ने कहा—"सुधन्वा के पुत्र ऋभुओ! एक चमस के चार भाग कर लो, यह प्रेरणा देकर मुझे देवों ने तुम्हारे समीप भेजा है. मैं उनकी बात तुम्हें बताने आया हूं. यदि तुम मेरी बताई हुई बात करोगे तो तुम देवों के साथ अंश प्राप्त करोगे.” (२) अग्निं दूतं प्रति यदब्रवीतनाश्वः कत्वर्यो रथ उतेह कत्वर्यः. धेनुः कत्वर्या युवशा कत्वर्या द्वा तानि भ्रातरनु वः कृत्व्येमसि.. (३) “हे आगत अग्नि! दूत कर्म करने वाले तुमसे देवों ने जो कुछ कहा है, उसके अंतर्गत हमें अश्व एवं रथ का निर्माण करना है, चर्मरहित मृत गौ को नया बनाना है एवं जीर्ण माता- पिता को युवा करना है. हे भ्राता! हम इन सब कार्यों को करके तुम्हारे सामने आएंगे.” (३) चक्रुवांस ऋभवस्तदपृच्छत क्वेदभूद्यः स्य दूतो न आजगन्. यदावाख्यच्चमसाञ्चतुरः कृतानादित्त्वष्टा ग्नास्वन्तन्यानजे.. (४) हे ऋभुओ! यह कार्य करने के पश्चात् तुमने प्रश्न किया कि जो अग्नि देवों का दूत बनकर हमारे समीप आया था, वह कहां चला गया? जिस समय त्वष्टा ने चमस को चार टुकड़ों में विभक्त देखा तो स्वयं को स्त्री मानने लगा. (४) हनामैनाँ इति त्वष्टा यदब्रवीच्चमसं ये देवपानमनिन्दिषुः. अन्या नामानि कृण्वते सुते सचाँ अन्यैरेनान्कन्या३ नामभिः स्परत्.. (५) ज्यों ही त्वष्टा ने कहा कि मैं देवों के पानपात्र चमस का अपमान करने वालों का हनन करूंगा, त्यों ही सोमरस तैयार होने पर वे स्वयं को होता, अध्वर्यु आदि नामों से प्रकट करने लगे एवं उनकी माता भी उन्हें इन्हीं नामों से पुकार कर प्रसन्न होने लगी. (५) इन्द्रो हरी युयुजे अश्विना रथं बृहस्पतिर्विश्वरूपामुपाजत. ऋभुर्विभ्वा वाजो देवाँ अगच्छत स्वपसो यज्ञियं भागमैतन.. (६) इंद्र ने घोड़ों को जोड़ा, अश्विनीकुमारों ने रथ तैयार किया एवं बृहस्पति ने विश्वरूपा नाम की गौ को नवीन रथ देना स्वीकार कर लिया. इसलिए हे ऋभु, विभु एवं वाज नामक भाइयो! तुम इंद्रादि देवों के समीप जाओ. हे शोभन कर्मकर्त्ताओ! तुम लोग यज्ञभाग प्राप्त करो. (६) निश्शर्मणो गामरिणीत धीतिभिर्या जरन्ता युवशा ताकृणोतन. सौधन्वना अश्वादश्वमतक्षत युक्त्वा रथमुप देवाँ अयातन.. (७) हे सुधन्वा के पुत्रो! तुमने चर्मरहित मरी हुई गाय को अपनी बुद्धि से नया बनाया है, बूढ़े माता-पिता को युवा किया है एवं एक घोड़े से दूसरा उत्पन्न किया है, इसलिए तुम तैयारी ebook converter DEMO Watermarks*
करके इंद्रादि देवों के सामने आओ. (७) इदमूदकं पिबतेत्यब्रवीतनेदं वा घा पिबता मुञ्जनेजनम्. सौधन्वना यदि तन्नेव हर्यथ तृतीये घा सवने मादयाध्वै.. (८) हे देवो! तुमने हमसे कहा था—“हे सुधन्वा के पुत्रो! तुम इसी सोमरस रूपी जल को पिओ अथवा मूंज के तिनकों से शुद्ध किया हुआ दूसरा सोमरस पिओ. यदि तुम इन्हें पीना न चाहो तो तीसरे सवन में सोमपान से मुदित बनो.” (८) आपो भूयिष्ठा इत्येको अब्रवीदग्निर्भूयिष्ठ इत्यन्यो अब्रवीत्. वधर्यन्तीं बहुभ्यः प्रैको अब्रवीदृता वदन्तश्चमसाँ अपिंशत.. (९) तीन ऋभुओं में से एक बोला—“जल ही सर्वोत्तम है.” दूसरे ने अग्नि एवं तीसरे ने धरती को उत्तम स्वीकार किया. इस प्रकार सच्ची बात कहते हुए उन्होंने चमस के चार भाग किए. (९) श्रोणामेक उदकं गामवाजति मांसमेकः पिंशति सूनयाभृतम्. आ निम्रुचः शकृदेको अपाभरत्किं स्वित्पुत्रेभ्यः पितरा उपावतुः.. (१०) ऋभुओं में से एक लाल रंग का उदक अर्थात् रक्त धरती पर रखता है, दूसरा छुरी से काटे गए मांस को रखता है एवं तीसरा उस मांस से मलमूत्र साफ करता है. माता-पिता ऋभुओं से क्या प्राप्त करते हैं? (१०) उद्वत्स्वस्मा अकृणोतना तृणं निवत्स्वपः स्वपस्यया नरः. अगोह्यस्य यदसस्तना गृहे तदद्येदमृभवो नानु गच्छथ.. (११) हे तेजस्वी एवं नेता ऋभुओ! तुम मेरु आदि ऊंचे स्थानों पर प्राणियों के लिए जौ आदि फसलें उत्पन्न करते हो एवं शोभन कर्म की इच्छा से नीचे स्थानों में जल भरते हो. तुम आदित्य मंडल में जितने समय तक रहे, अब उतने समय तक छिपकर मत रहो. (११) सम्मील्य यद्भवना पर्यसर्पत क्व स्वित्तातत्या पितरा व आसतुः. अशपत यः करस्नं व आददे यः प्राब्रवीत्प्रो तस्मा अब्रवीतन.. (१२) हे ऋभुओ! जिस समय तुम समस्त जीवों को बादलों से ढक कर चारों ओर जाते हो, उस समय संसार के पालक सूर्य और चंद्र कहां रहते हैं? जो राक्षस आदि तुम्हारा हाथ पकड़ते हैं, उनका विनाश करो. जो बलवती वाणी से तुम्हें रोकता है, उसको अधिक मात्रा में डराओ. (१२) सुषुप्वांस ऋभवस्तदपृच्छतागोह्य क इदं नो अबूबुधत्. श्वानं बस्तो बोधयितारमब्रवीत्संवत्सर इदमद्या व्यख्यत.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*
हे ऋभुओ! तुम सूर्यमंडल में सोकर सूर्य से पूछते हो—“हे आदित्य! हमारे कर्म की प्रेरणा कौन देता है?” सूर्य इसका उत्तर देते हैं—“तुम्हें जगाने वाला वायु है. वर्ष व्यतीत होने पर तुम संसार में प्रकाश फैलाओ।” (१३) दिवा यान्ति मरुतो भूम्यामग्निरयं वातो अन्तरिक्षेण याति. अद्भिर्याति वरुणः समुद्रैर्युष्माँ इच्छन्तः शवसो नपातः.. (१४) हे बल के नाती ऋभुओ! तुम्हें देखने की अभिलाषा से मरुत् स्वर्ग से, अग्नि धरती से, वायु आकाश से एवं वरुण जल से आ रहे हैं. (१४) सूक्त—१६२ देवता—अश्व मा नो मित्रो वरुणो अर्यमायुरिन्द्र ऋभुक्षा मरुतः परि ख्यन्. यद्वाजिनो देवजातस्य सप्तेः प्रवक्ष्यामो विदथे वीर्याणि.. (१) तुच्छ मनुष्य देवजात एवं शीघ्रगतिशाली अश्व के पराक्रमों का वर्णन कर रहे हैं. ऐसे विचारक मित्र, वरुण अर्यमा, आयु, इंद्र, ऋभुक्षा एवं वायु हमारी निंदा न करें. (१) यन्निर्णिजा रेक्णसा प्रावृतस्य रातिं गृभीतां मुखतो नयन्ति. सुप्राङजो मेम्यद्विश्वरूप इन्द्रापूष्णोः प्रियमप्येति पाथः.. (२) ऋत्विज् रूपवान एवं सोने के आभूषणों से सजे हुए घोड़े के सामने भेंट करने के उद्देश्य से बकरे को ले जाते हैं. 'में, में' करता हुआ अनेक रंग का बकरा इंद्र और पूषा का प्रिय है. वह अश्व के सामने आए. (२) एष छागः पुरो अश्वेन वाजिना पूष्णो भागो नीयते विश्वदेव्यः. अभिप्रियं यत्पुरोळाशमर्वता त्वष्टेदैनं सौश्रवसाय जिन्वति.. (३) समस्त देवों के लिए उपयोगी, पर पूषा का अंश वह बकरा शीघ्र गतिशील अश्व के सामने लाया जाता है. घोड़े के साथ इस बकरे को प्रयोग करके त्वष्टा देव के लिए स्वादिष्ट भोजन रूप पुरोडाश बनाया जाए. (३) यद्धविष्यमृतुशो देवयानं त्रिर्मानुषाः पर्यश्वं नयन्ति. अत्रा पूष्णः प्रथमो भाग एति यज्ञं देवेभ्यः प्रतिवेदयन्नजः.. (४) जब ऋत्विज् हवि के योग्य एवं देवों के प्राप्त करने के पात्र अश्व को समय-समय पर तीन बार अग्नि के चारों ओर घुमाते हैं, तब पूषा का भागरूप पहला बकरा अपनी 'में, में' से देवयज्ञ का प्रचार करता हुआ जाता है. (४) होताध्वर्युरावया अग्निमिन्धो ग्रावग्राभ उत शंस्ता सुविप्रः. ebook converter DEMO Watermarks*
तेन यज्ञेन स्वरङ्कृतेन स्विष्टेन वक्षणा आ पृणध्वम्.. (५) होता, अध्वर्यु, आवया, अग्निमिध, ग्रावाग्राम, शंस्ता एवं सुविप्र उस प्रसिद्ध एवं भली- भांति अलंकृत यज्ञ द्वारा नदियों को जल से भरें. (५) यूपव्रस्का उत ये यूपवाहाश्चषालं ये अश्वयूपाय तक्षति. ये चार्वते पचनं सम्भरन्त्युतो तेषामभिगूर्तिर्न इन्वतु.. (६) जो लोग यूप के लिए उपयोगी पेड़ काटने वाले हैं, जो यूप के निमित्त कटे हुए पेड़ को ढोने वाले हैं, जो अश्व बांधने वाले यूप में चषाल अर्थात् बांधने योग्य सिरा बनाते हैं अथवा जो घोड़े का मांस पकाने के लिए लकड़ी के बरतन तैयार करते हैं, इन सबमें मेरा संकल्प समा जाए. (६) उप प्रागात्सुसन्मेऽधायि मन्म देवानामाशा उप वीतपृष्ठः. अन्वेनं विप्रा ऋषयो मदन्ति देवानां पुष्टे चकृमा सुबन्धुम्.. (७) हमें उत्तम फल प्राप्त हो. सुडौल पीठ वाला घोड़ा यज्ञफल के रूप में देवों की आशापूर्ति हेतु आवे. हम उसे बांधेंगे. इसे देखकर मेधावी ऋत्विज् तुष्ट हों. (७) य द्वाजिनो दाम सन्दानमर्वतो या शीर्षण्या रशना रज्जुरस्य. यद्वा घास्य प्रभृतमास्ये३ तृणं सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु.. (८) घोड़े की गरदन में बांधी जाने वाली, पैरों में बांधी जाने वाली एवं लगाम के रूप में मुख में डाली जाने वाली रस्सी— ये सब रस्सियां एवं उसके मुंह में पड़ने वाली घास देवों को प्राप्त हो. (८) यदश्वस्य क्रविषो मक्षिकाश यद्वा स्वरौ स्वधितौ रिप्तमस्ति. यद्धस्तयोः शमितुर्यन्नखेषु सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु.. (९) घोड़े का जो कच्चा मांस मक्खियां खाती हैं, जो उसे काटते समय छुरी में लगा रह जाता है, अथवा काटने वाले के हाथों में लगा रह जाता है, वह भी देवों को प्राप्त हो. (९) यदूवध्यमुदरस्यापवाति य आमस्य क्रविषो गन्धो अस्ति. सुकृता तच्छमितारः कृण्वन्तूत मेधं शृतपाकं पचन्तु.. (१०) घोड़े के पेट में जो बिना पची हुई घास रह जाती है एवं पकाते समय जो कच्चे मांस का अंश बच रहता है, उसे मांस काटने वाले शुद्ध करें एवं यज्ञ के योग्य मांस देवों के निमित्त पकावें. (१०) यत्ते गात्रादग्निना पच्यमानादभि शूलं निहतस्यावधावति. ebook converter DEMO Watermarks*
मा तद्भून्मामा श्रिषन्मा तृणेषु देवेभ्यस्तदुशद्भ्यो रातमस्तु.. (११) हे घोड़े! आग में पकाए जाते हुए तुम्हारे गात्र से जो रस छलकता है एवं तुम्हें मारते समय जो रक्त शूल में लग जाता है, वह न धरती पर गिरे और न तिनकों में मिले. संपूर्ण की कामना करने वाले देवों को वह दिया जाए. (११) ये वाजिनं परिपश्यन्ति पक्वं य ईमाहुः सुरभिर्निर्हारेति. ये चार्वतो मांसभिक्षामुपासत उतो तेषामभिगूर्तिर्न इन्वतु.. (१२) जो लोग घोड़े के अवयवों को पकता हुआ चारों ओर से देखते हैं एवं इस प्रकार कहते हैं—“मांस बड़ा सुगंधित है, थोड़ा हमें भी दो.” जो लोग घोड़े के मांस की भीख मांगते हैं, उनकी अभिलाषाएं हमें प्राप्त हों. (१२) यन्नीक्षणं मांसपचन्या उखाया या पात्राणि यूष्ण आसेचनानि. ऊष्मण्यापिधाना चरूणामङ्काः सूनाः परि भूषन्त्यश्वम्.. (१३) मांस पकाने वाले पात्र से रस लेकर जिस पात्र द्वारा परीक्षा की जाती है, जो पात्र उबले हुए मांस का रस सुरक्षित रखते हैं, जो पात्र भाप रोकने एवं मांस से भरे पात्र को ढकने के काम में लाए जाते हैं, वे वेतस की शाखाएं, जिनसे अश्व के हृदय आदि भागों पर निशान लगाते हैं, एक छुरी जिससे चिह्नों के अनुसार मांस काटा जाता है, ये सब अश्व को सुशोभित करते हैं. (१३) निक्रमणं निषदनं विवर्तनं यच्च पड्बीशमर्वतः. यच्च पपौ यच्च घासिं जघास सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु.. (१४) अश्व के चलने. बैठने एवं लोटने के स्थान, अश्व के पैर बांधने के साधन, उसके पीने का जल और खाई हुई घास, ये सब देवों को प्राप्त हो. (१४) मा त्वाग्निर्ध्वनयीद्धूमगन्धिर्मोखा भ्राजन्त्यभि विक्त जघ्रिः. इष्टं वतिमभिगूर्तं वषट्कृतं तं देवासः प्रति गृभ्णन्त्यश्वम्.. (१५) हे अश्व! धुएं वाली अग्नि को देखकर तुम मत हिनहिनाओ. अधिक अग्नि के ताप के कारण मांस पकाने का पात्र न टूटे. यज्ञ के लिए अभीष्ट, हवन के लिए लाए हुए, सामने भेंट दिए जाने के लिए तैयार एवं वषट्कार द्वारा सुशोभित घोड़े को देवगण स्वीकार करें. (१५) यदश्वाय वास उपस्तृणन्त्यधीवासं या हिरण्यान्यस्मै. सन्दानमर्वन्तं पड्बीशं प्रिया देवेष्वा यामयन्ति.. (१६) बलि के लिए नियत अश्व को ढकने के लिए जो वस्त्र फैलाया जाता है, जिन स्वर्णाभूषणों से घोड़े को सजाया जाता है एवं जिन साधनों से घोड़े के पैर एवं गर्दन बांधी ebook converter DEMO Watermarks*
जाती है, उन सब देवप्रिय वस्तुओं को ऋत्विज् देवों को दें. (१६) यत्ते सादे महसा शूकृतस्य पार्ष्ण्या वा कशया वा तुतोद. स्रुचेव ता हविषो अध्वरेषु सर्वा ता ते ब्रह्मणा सूदयामि.. (१७) हे अश्व! आते समय तुम नाक से महान् शब्द कर रहे थे. न चलने पर तुम्हें कोड़े से मारा गया. जैसे सुच के द्वारा हव्य अग्नि में डाला जाता है, उसी प्रकार उन सब व्यथाओं की मैं मंत्र द्वारा आहुति देता हूं (१७) चतुस्त्रिंशद्वाजिनो देवबन्धोर्वङ् क्रीरश्वस्य स्वधितिः समेति. अच्छिद्रा गात्रा वयुना कृणोत परुष्परुरनुघुष्या वि शस्त.. (१८) हे घोड़े को काटने वाले! देवों के प्रिय अश्व की दोनों बगलों की चौंतीस हड्डियों को काटने के लिए छुरी भली प्रकार चलाई जाती है. ऐसी सावधानी बरतना, जिससे अश्व का कोई अंग कट न जाए. एक-एक भाग को देखकर और नाम लेकर काटो. (१८) एकस्त्वष्टुरश्वस्या विशस्ता द्वा यन्तारा भवतस्तथ ऋतुः. या ते गात्राणामृतुथा कृणोमि ताता पिण्डानां प्र जुहोम्यग्नौ.. (१९) इस दीप्त अश्व का प्रकाशकर्त्ता एकमात्र ऋतु ही है. रात एवं दिन उस ऋतु का नियंत्रण करने वाले हैं. हे अश्व! तुम्हारे जिन अंगों को मैं अनुकूल समय पर काटता हूं, उन्हें पिंड बनाकर मैं अग्नि में हवन करूंगा. (१९) मा त्वा तपत्प्रिय आत्मापियन्तं मा स्वधितिस्तन्व१ आ तिष्ठिपत्ते. मा ते गृध्नुरविशस्तातिहाय छिद्रा गात्राण्यसिना मिथू कः.. (२०) हे अश्व! तुम्हारे देवों के समीप जाते समय तुम्हारा प्रिय शरीर तुम्हें दुःखी न करे. छुरी तेरे अंगों पर रुके नहीं. मांस ग्रहण करने का इच्छुक एवं अंगच्छेदन में अकुशल काटने वाला भिन्न-भिन्न अंगों के अतिरिक्त छुरी से शरीर को तिरछा न काटे. (२०) न वा उ एतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँ इदेषि पथिभिः सुगेभिः. हरी ते युञ्जा पृषती अभूतामुपास्थाद्वाजी धुरि रासभस्य.. (२१) हे अश्व! इस प्रकार बलि दिए जाने पर न तो तुम मरते हो और न लोगों द्वारा हिंसित होते हो. तुम उत्तम मार्गों द्वारा देवों के समीप जाते हो. इंद्र के हरि नामक घोड़े, मरुत् की वाहन हिरणियां एवं अश्विनीकुमारों के रथ में जुतने वाले गधे तुम्हारे रथ में जोते जाएंगे. (२१) सुगव्यं नो वाजी स्वश्वयं पुंसः पुत्राँ उत विश्वापुषं रयिम्. अनागास्त्वं नो अदितिः कृणोतु क्षत्रं नो अश्वो वनतां हविष्मान्.. (२२)
सूक्त—१६३ देवता—अश्व
बलि किया जाता हुआ अश्व हमें गायों एवं अश्वों से संपन्न एवं पुत्र, पौत्र पत्नी आदि की रक्षा करने वाला धन दे तथा संतान प्रदान करे. हे तेजस्वी अश्व! हमें पापरहित बनाओ तथा क्षत्रियोचित तेज एवं बल दो. (२२) सूक्त—१६३ देवता—अश्व यदक्रन्दः प्रथमं जायमान उद्यन्त्समुद्रादुत वा पुरीषात्. श्येनस्य पक्षा हरिणस्य बाहु उपस्तुत्यं महि जातं ते अर्वन्.. (१) हे अश्व! तुम्हारा जन्म इस योग्य है कि सब लोग मिलकर तुम्हारी स्तुति करें, क्योंकि तुम सर्वप्रथम जल से उत्पन्न हुए थे एवं यजमान पर अनुकंपा करने के लिए तुम महान् शब्द करते हो. तुम्हारे पंख बाज के एवं पैर हरिण के समान हैं. (१) यमेन दत्तं त्रित एनमायुनगिन्द्र एणं प्रथमो अध्यतिष्ठत्. गन्धर्वो अस्य रशनामगृभ्णात्सूरदश्वं वसवो निरतष्ट.. (२) नियामक अग्नि के दिए हुए अश्व को पृथ्वी आदि तीन स्थानों में वर्तमान वायु ने रथ में जोड़ा. इस रथ पर सबसे पहले इंद्र सवार हुए एवं गंधर्वों ने उसकी लगाम को पकड़ा. वसुओं ने सूर्य से अश्व को प्राप्त किया. (२) असि यमो अस्यादित्यो अर्वन्नसि त्रितो गुह्येन व्रतेन. असि सोमेन समया विपृक्त आहुस्ते त्रीणि दिवि बन्धनानि.. (३) हे अश्व! तुम यम, आदित्य एवं तीन स्थानों में व्याप्त गोपनीय व्रतधारी वायु हो. तुम सोम से मिले हो. पुराविद् कहते हैं कि स्वर्ग में तुम्हारे तीन उत्पत्ति स्थान हैं. (३) त्रीणि त आहुर्दिवि बन्धनानि त्रीण्यप्सु त्रीण्यन्तः समुद्रे. उतेव मे वरुणश्छन्त्स्यर्वन्यत्रा त आहुः परमं जनित्रम्.. (४) हे अश्व! स्वर्ग, जल एवं समुद्र में तुम्हारे तीन-तीन बंधन स्थान हैं. तुम वरुण हो. पुराविद् तुम्हारे जो जन्मस्थान निश्चित कर चुके हैं, उन्हें मैं बताता हूं. (४) इमा ते वाजिन्नवमार्जनानीमा शफानां सनितुर्निधाना. अत्रा ते भद्रा रशना अपश्यमृतस्य या अभिरक्षन्ति गोपाः.. (५) हे अश्व! मैंने जिन स्वर्ग आदि का वर्णन किया है, वे तुम्हारे जन्मस्थान एवं संचरण स्थल हैं. यज्ञ की रक्षा करने वाली तुम्हारी कल्याणकारी लगाम को भी मैंने वहीं देखा है. (५) आत्मानं ते मनसारादजानामवो दिवा पतयन्तं पतङ्गम्. शिरो अपश्यं पथिभिः सुगेभिररेणुभिर्जेहमानं पतत्रि.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अश्व! मैं तुम्हारे दूरस्थित शरीर को अपने मन की कल्पना से जानता हूं. तुम धरती से अंतरिक्षस्थित सूर्य में जाते हो. धूलिरहित सुखप्रद मार्ग से शीघ्रतापूर्वक उठते हुए तुम्हारे सिर को भी मैंने देखा है. (६) अत्रा ते रूपमुत्तममपश्यं जिगीषमाणमिष आ पदे गो:. यदा ते मर्तो अनु भोगमानळादिद्ग्रसिष्ठ ओषधीरजीग:.. (७) हे अश्व! मैंने धरती पर चारों ओर अन्नग्रहण के निमित्त आते हुए तुम्हारे रूप को देखा है. जिस समय मनुष्य तुम्हारे खाने की वस्तुएं लेकर जाते हैं, उस समय तुम कृपा करके घास आदि तिनकों को खाते हो. (७) अनु त्वा रथो अनु मर्यो अर्वन्ननु गावोऽनु भग: कनीनाम्. अनु व्रातासस्तव सख्यमीयुरनु देवा ममिरे वीर्यं ते.. (८) हे अश्व! रथ, मनुष्य, गाएं एवं नारियों के सौभाग्य तुम्हारे पीछे चलते हैं, अन्य अश्व तुम्हारे पीछे चलकर तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर चुके हैं. ऋत्विज् तुम्हारे शौर्यकर्मों की स्तुति करके प्रसन्न होते हैं. (८) हिरण्यशृङ्गोऽयो अस्य पादा मनोजवा अवर इन्द्र आसीत्. देवा इदस्य हविरद्यमायन्यो अर्वन्तं प्रथमो अध्यतिष्ठत्.. (९) घोड़े का शीश सोने का एवं पैर लोहे के हैं. मन के समान वेग वाले इंद्र भी इससे भिन्न हैं. घोड़े रूपी हव्य को खाने के लिए देव आते हैं. इंद्र वहां सबसे पहले आकर बैठे हैं. (९) ईर्मान्तास: सिलिकमध्यमास: सं शूरणासो दिव्यासो अत्या:. हंसाइव श्रेणिशो यतन्ते यदाक्षिषुर्दिव्यमज्ममश्वा:.. (१०) यज्ञसंबंधी अश्व जिस समय स्वर्ग के मार्ग से जाता है, उस समय घनी जांघों वाले, पतली कमर वाले एवं विक्रमशील घोड़ों के समूह दिव्य अश्व के साथ इस प्रकार चलते हैं, जिस प्रकार सितारे इस आकाश में पंक्तिबद्ध होकर चलते हैं. (१०) तव शरीरं पतयिष्ण्वर्वन्तव चित्तं वातइव ध्रजीमान्. तव शृङ्गाणि विष्ठिता पुरुत्रारण्येषु जर्भुराणा चरन्ति.. (११) हे घोड़े! तुम्हारा शरीर व्याप्त एवं मन वायु के समान शीघ्र चलने वाला है. तुम्हारे शिर से निकले हुए सींगों के स्थानीय बाल इधर-उधर बिखरे हुए हैं एवं अनेक प्रकार से सुशोभित हुए वनों में उड़ते हैं. (११) उप प्रागाच्छसनं वाज्यर्वा देवद्रीचा मनसा दीध्यान:. अज: पुरो नीयते नाभिरस्यानु पश्चात्कवयो यन्ति रेभा:.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*
यह युद्ध में कुशल घोड़ा मन से देवों का चिंतन करता हुआ बंधन के स्थान को ले जाया जा रहा है. घोड़े का मित्र बकरा उसके आगे-आगे चल रहा है. मंत्र को बोलते हुए ऋत्विज् पीछे-पीछे चलते हैं. (१२) उप प्रागात्परमं यत्सधस्थमर्वां अच्छा पितरं मातरं च. अद्या देवाञ्जुष्टतमो हि गम्या अथा शास्ते दाशुषे वार्याणि.. (१३) चलने में कुशल घोड़ा अपनी माता और पिता के समीप पहुंचने के लिए ऐसे स्वर्गीय स्थान पर जाता है, जहां सब लोग एक साथ रह सकें. हे अश्व! आज तुम परम प्रसन्न होकर देवों के समीप आओ, तुम्हारे जाने से हव्यदाता यजमान उत्तम धन प्राप्त करेगा. (१३) सूक्त—१६४ देवता—विश्वेदेव आदि अस्य वामस्य पलितस्य होतुस्तस्य भ्राता मध्यमो अस्त्यश्न:. तृतीयो भ्राता घृतपृष्ठो अस्यात्रापश्यं विश्र्पतिं सप्तपुत्रम्.. (१) आरोग्य प्राप्ति के लिए सबके द्वारा सेवनीय व जगत्पालक सूर्य के बीच वाले भाई वायु हैं. इसके तीसरे भाई आहुति स्वीकार करने वाले अग्नि हैं. इन भाइयों के बीच में किरणरूपी सात पुत्रों सहित विश्वपति दिखाई देते हैं. (१) सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा. त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वा भुवनाधि तस्थु:.. (२) सूर्य के एक पहिए वाले रथ में जुते हुए सात घोड़े ही उसको खींचते हैं. सात नामों वाला एक ही घोड़ा रथ को खींचता है. दृढ़ और नित्य नवीन तीन नाभियां उस पहिए में हैं. उस में सारा विश्व स्थित है. (२) इमं रथमधि ये सप्त तस्थुः सप्तचक्रं सप्त वहन्त्यश्वाः. सप्त स्वसारो अभि सं नवन्ते यत्र गवां निहिता सप्त नाम.. (३) सात पहियों वाले रथ में जुते हुए सात घोड़े ही उसको खींचते हैं. सात किरण रूपी बहिनें इसके सामने चलती हैं एवं सात गाएं इस रथ में बैठी हैं. (३) को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति. भूम्या असुरसृगात्मा क्व स्वित्को विद्वांसमुप ग्रात्प्रष्टुमेतत्.. (४) जब अस्थिहीन प्रकृति ने अस्थि वाले संसार को धारण किया था, तब प्रथम उत्पन्न होने वाले को कौन देख सका था? प्राण और रक्त ने तो पृथ्वी से जन्म लिया, पर आत्मा कहां से आई? यह प्रश्न किसी जानकार से पूछने कौन जाएगा. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
पाकः पृच्छामि मनसाविजानन्देवानामेना निहिता पदानि. वत्से बष्कयेऽधि सप्त तन्तून्वि तत्निरे कवय ओतवा उ.. (५) मैं अपरिपक्व बुद्धि वाला मन से न जानने के कारण यह सब पूछ रहा हूं. ये संदेहास्पद बातें देवों के लिए भी गूढ़ हैं. एक वर्ष के बछड़े को लपेटने के लिए मेधावियों ने जो सात धागे बताए हैं, वे क्या हैं? (५) अचिकित्वाञ्चिकितुषश्चिदत्र कवीन्पृच्छामि विद्मने न विद्वान्. वि यस्तस्तम्भ षळिमा रजांस्यजस्य रूपे किमपि स्विदेकम्.. (६) मैं अज्ञानी हूं, पर जानने की इच्छा रखता हूं, इसीलिए तत्त्वज्ञानी क्रांतदर्शियों से पूछ रहा हूं. जिसने इन छः लोकों को स्थिर किया है, जो जन्मरहित होकर रहते हैं, वे क्या एक हैं? (६) इह ब्रवीतु य ईमङ्ग वेदास्य वामस्य निहितं पदं वे:. शीर्ष्णः क्षीरं दुहते गावो अस्य वव्रिं वसाना उदकं पदापुः.. (७) जो यह सब भली प्रकार जानता है, वह बतावे. इस सुंदर सूर्य का स्वरूप अत्यंत गूढ़ है. शिर के समान सबसे ऊंचे सूर्य की किरणों रूपी गाएं दूध के समान जल बरसाती हैं. वे ही किरणें विशाल तेज से तप्त होने पर जल निर्माण की तरह ही पी लेती हैं. (७) माता पितरमृत आ बभाज धीत्यग्रे मनसा सं हि जग्मे. सा बीभत्सुर्गर्भरसा निविद्धा नमस्वन्त इदुपवाकमीयुः.. (८) पृथ्वीरूपी माता जलवर्षा के निमित्त आकाश स्थित सूर्यरूपी पिता की यज्ञरूपी कर्म द्वारा पूजा करती है. इससे पहले ही पिता अभिप्राय वाले मन से धरती से संगत हुए हैं. इसके बाद गर्भ धारण करने की इच्छा वाली माता गर्भ की उत्पत्ति के हेतु जल से बिंध गई है. उन्होंने अनेक प्रकार की फसलें-गेहूं, जौ आदि उत्पन्न करने के लिए आपस में बातचीत की है. (८) युक्ता मातासीद्धुरि दक्षिणाया अतिष्ठद्गर्भो वृजनीष्वन्तः. अमीमेदद्वत्सो अनु गामपश्यद्विश्वरूप्यं त्रिषु योजनेषु.. (९) आकाश इच्छा पूर्ण करने वाली धरती के ऊपर वर्षा करने में समर्थ था. गर्भ रूपी जल मेघों के बीच था. इसके बाद बछड़े रूपी जल ने शब्द किया. इसके बाद मेघ, वायु और सूर्यकिरण इन तीनों के सहयोग से विश्वरूपा धरती फसलों वाली बनी. (९) तिस्रो मातृस्त्रीन्पितॄन्बिभ्रदेक ऊर्ध्वस्तस्थौ नेमव ग्लापयन्ति. मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वविदं वाचमविश्वमिन्वाम्.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
आदित्य रूपी एकमात्र पुत्र की तीन माताएं और तीन पिता हैं. आदित्य थकते नहीं. आकाश के ऊपर स्थित देव सूर्य के विषय में ऐसी बातें करते हैं, जो सबसे संबंधित होती हैं, पर उन्हें कोई नहीं समझता. (१०) द्वादशारं नहि तज्जराय वर्वर्ति चक्रं परि द्यामृतस्य. आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानि विंशतिश्च तस्थुः.. (११) सत्यरूपी सूर्य का बारह अरों वाला पहिया स्वर्ग के चारों ओर बार-बार चलता है और कभी पुराना नहीं होता, हे आदित्यरूप अग्नि! तीन सौ साठ दिन एवं रातों के रूप में तुममें सात सौ बीस पुत्रपुत्रियां रहती हैं. (११) पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम्. अथेमे अन्य उपरे विचक्षणं सप्तचक्रे षळर आहुरर्पितम्.. (१२) ऋतुओं रूपी पांच चरणों और मासों रूपी बारह आकृतियों वाले आदित्य आकाश के परवर्ती अर्द्धभाग में रहते हैं. कुछ लोग उन्हें जलदाता भी कहते हैं. छः अरों और सात चक्रों (ऋतुओं एवं किरणों) वाले रथ पर बैठे हुए तेजस्वी आदित्य को कुछ लोग अर्पित भी कहते हैं. ये अर्पित आकाश के दूसरे भाग में रहते हैं. (१२) पञ्चारे चक्रे परिवर्तमाने तस्मिन्ना तस्थुर्भुवनानि विश्वा. तस्य नाक्षस्तप्यते भूरिभारः सनादेव न शीर्यते सनाभिः.. (१३) पांच ऋतुरूपी अरों वाला सूर्य का संवत्सररूपी चक्र घूमता है. समस्त प्राणी उसी में रहते हैं. उसका भारी अक्ष कभी नहीं थकता. उसकी नाभि सदा एक सी रहती है, कभी टूटती नहीं. (१३) सनेमि चक्रमजरं वि वावृत उत्तानायां दश युक्ता वहन्ति. सूर्यस्य चक्षू रजसैत्यावृतं तस्मिन्नार्पिता भुवनानि विश्वा.. (१४) सदा एक सी नाभि वाला जरारहित संवत्सररूपी पहिया बार-बार घूमता है. पांच लोकपाल और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, निषाद पांच वर्ण, ये दस मिलकर विस्तृत धरती को धारण करते हैं. नेत्ररूपी सूर्यमंडल वर्षा के जल से पूर्ण बादलों से घिर जाता है. समस्त प्राणी उसी में छिप जाते हैं. (१४) साकञ्जानां सप्तथमाहुरेकजं षळिद्यमा ऋषयो देवजा इति. तेषामिष्टानि विहितानि धामशः स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः.. (१५) चैत्र आदि दो मासों की छः एवं अधिक मास की सातवीं, इस प्रकार एक ही सूर्य से जो सात ऋतुएं उत्पन्न हुई हैं, उन में सातवीं अकेली है. शेष छः जोड़े वाली, जल्दी आने वाली और देवों से उत्पन्न हैं. ये ऋतुएं सबकी प्यारी, अलग-अलग स्थित और भिन्न रूपों वाली हैं. ebook converter DEMO Watermarks*
ये अपने निर्माता के लिए सदा घूमती रहती हैं. (१५) स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे पुंस आहुः पश्यदक्षण्वान्न वि चेतकन्धः. कविर्यः पुत्रः स ईमा चिकेत यस्ता विजानात्स पितुष्पितासत्.. (१६) किरणें स्त्रियां होती हुई भी पुरुष हैं. उन्हें केवल आंखों वाला ही देख सकता है, अंधा नहीं. जो क्रांतदर्शी हैं, वे ही यह बात जानते हैं. उन किरणों को जानने वाला पिता का भी पिता है. (१६) अवः परेण पर एनावरेण पदा वत्सं बिभ्रती गौरुदस्थात्. सा कद्रीची कं स्विदर्धं परागात्क्व स्वित्सूते नहि यूथे अन्तः.. (१७) गोरूप आहुति बछड़े रूपी अग्नि का पिछला भाग अपने सामने वाले पैरों से और अगला भाग अपने पिछले पैरों से पकड़कर ऊपर की ओर जाती है. वह कहां जाती है और किसके लिए बीच से ही लौट आती है? वह कहां पर बछड़े को जन्म देती है? वह अन्य गायों के समूह में तो बछड़ा पैदा करती नहीं है. (१७) अवः परेण पितरं यो अस्यानुवेद पर एनावरेण. कवीयमानः क इह प्र वोचद्देवं मनः कृतो अधि प्रजातम्.. (१८) जो आदित्यरूपी ऊपर स्थित लोकपालक की उपासना नीचे स्थित अग्नि रूपी लोकपालक के साथ तथा नीचे वाले की उपासना ऊपर वाले के साथ करते हैं, कौन लोग इस संसार में अपने को क्रांतदर्शी प्रसिद्ध करते हुए यह बात करते हैं? दिव्यमन किस से उत्पन्न होता है? (१८) ये अर्वाञ्चस्ताँ उ पराच आहुर्ये पराञ्चस्ताँ उ अर्वाच आहुः. इन्द्रश्च या चक्रथुः सोम तानि धुरा न युक्ता रजसो वहन्ति.. (१९) काल को जानने वाले अधोमुख को ऊर्ध्वमुख और ऊर्ध्वमुख को अधोमुख कहते हैं. हे सोम! इंद्र को साथ लेकर तुमने जो घूमने के गोल बनाए हैं, वे उसी प्रकार संसार का बोझा ढोते हैं, जिस प्रकार जुए में जुता हुआ घोड़ा. (१९) द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते. तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति.. (२०) जीवात्मा और परमात्मारूपी दो पक्षी मित्र बनकर साथ-साथ संसार रूपी वृक्ष पर रहते हैं. उन में से एक (जीवात्मा) पीपल के स्वादिष्ट फलों को खाता है. दूसरा (परमात्मा) फल न खाता हुआ केवल देखता है. (२०) यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भागमनिमेषं विदथाभिसंवरन्ति. eBook converter DEMO Watermarks*
इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा धीरः पाकमत्रा विवेश.. (२१) सुंदर गति वाली किरणें अपना कर्त्तव्य जानकर सदा जल का अंश ले जाती हैं और जिस आदित्य मंडल में पहुंचती हैं एवं सारे संसार की धीर भाव से रक्षा करती हैं, उसी सूर्य ने मुझ अपरिपक्व बुद्धि वाले को धारण किया है. (२१) यस्मिन्वृक्षे मध्वदः सुपर्णा निविशन्ते सुवते चाधि विश्वे. तस्येदाहुः पिप्पलं स्वाद्वग्रे तन्नोन्नशद्यः पितरं न वेद.. (२२) जिस आदित्य रूपी वृक्ष पर जल भक्षण करने वाली किरणें रात को पक्षियों के समान बैठती हैं एवं प्रातः उदय काल में विश्व को प्रकाश देती हैं, विद्वान् लोग उस पालक सूर्य का फल रस वाला बताते हैं. जो पालक सूर्य को नहीं जानता, वह इस फल को नहीं पा सकता. (२२) यदगायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभाद्वा त्रैष्टुभं निरतक्षत. यद्वा जगज्जगत्याहितं पदं य इत्तद्विदुस्ते अमृतत्वमानशुः.. (२३) जो धरती पर अग्नि का स्थान जानते हैं, जो देवों द्वारा अंतरिक्ष से वायु की उत्पत्ति से परिचित हैं अथवा जो यह समझते हैं कि उस पर सूर्य का स्थान है, वे ही मरणरहित पद को पाते हैं. (२३) गायत्रेण प्रति मिमीते अर्कमर्केण साम त्रैष्टुभेन वाकम्. वाकेन वाकं द्विपदा चतुष्पदाक्षरेण मिमते सप्त वाणीः.. (२४) गायत्री छंद द्वारा उन्होंने पूजन संबंधी मंत्र बनाए, अर्चना मंत्रों की सहायता से साम, त्रिष्टुप् छंद द्वारा वाक्, द्विपद, चतुष्पाद वचनों द्वारा अनुवाक् और अक्षरों को मिलाकर सातों छंदरूप वाणी की रचना की. (२४) जगता सिन्धुं दिव्यस्तभायद्रथन्तरे सूर्य पर्यपश्यत्. गायत्रस्य समिधस्तिस्र आहुस्ततो मह्ना प्र रिरिचे महित्वा.. (२५) उन लोगों ने जगती छंद द्वारा वर्षा को आकाश में रोक दिया तथा रथंतर साम मंत्रों में सूर्य के दर्शन किए. कहा जाता है कि गायत्री छंद के तीन चरण हैं, इसीलिए वह महत्त्व में बड़ों से भी आगे बढ़ जाती है. (२५) उप ह्वये सुदुघां धेनुमेतां सुहस्तो गोधुगुत दोहदेनाम्. श्रेष्ठं सवं सविता साविषन्नोऽभीद्धो घर्मस्तदु षु प्र वोचम्.. (२६) मैं इस दुधारू गाय को बुलाता हूं. दोहनकुशल ग्वाला उसे दुहता है. हमारे सोमरस के उत्तम भाग को सूर्य स्वीकार करें. उससे उनका तेज बढ़ेगा. इसी हेतु मैं उन्हें बुलाता हूं. (२६) ebook converter DEMO Watermarks*
हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसाभ्यागात्. दुहामश्विभ्यां पयो अघ्न्येयं सा वर्धतां महते सौभगाय.. (२७) घी, दूध आदि से सदा पालन करने वाली गाय बछड़े के लिए मन में इच्छा करती हुई रंभाती हुई आती है. वह गाय अश्विनीकुमारों को दूध दे और उनके सौभाग्य को बढ़ावें. (२७) गौरमीमेदनु वत्सं मिषन्तं मूर्धानं हिङ्ङकृणोन्मातवा उ. सृक्वाणं घर्ममभि वावशाना मिमाति मायुं पयते पयोभि:... (२८) गाय आंखें बंद किए बछड़े को देखकर रंभाती है, उसका मस्तक चाट कर शूद्ध करने के लिए रंभाती है, बछड़े के होंठों पर फेन देखकर रंभाती है तथा दूध पिलाकर उसे तृप्त करती है. (२८) अयं स शिङ्क्ते येन गौरभीवृता मिमाति मायुं ध्वसनावधि श्रिता. सा चित्तिभिर्नि हि चकार मर्त्यं विद्युद्भवन्ती प्रति वव्रिमौहत.. (२९) बछड़ा अव्यक्त शब्द करता है, जिसे सुनकर गौ आकर उससे चारों ओर से लिपट जाती है और गायों के चरने वाली धरती पर रंभाती है. गाय पशु होकर भी अपने ज्ञान से मनुष्य को हरा देती है और अत्यंत दुधारू बनकर अपना रूप दिखाती है. (२९) अनच्छये तुरगातु जीवमेजद् ध्रुवं मध्य आ पस्त्यानाम्. जीवो मृतस्य चरति स्वधाभिरमर्त्यो मर्त्येना सयोनिः.. (३०) अपने कार्यों के लिए शीघ्रगति वाला जीव सांस लेता हुआ सोता है और अपने घररूपी शरीर में निश्चिंत रूप से रहता है. मरणशील शरीर के साथ उत्पन्न शरीर का मरणरहित स्वधा के द्वारा विचरण करता है. (३०) अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्. स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः.. (३१) सबके रक्षक एवं कभी दुःखी न होने वाले सूर्य को मैं अंतरिक्ष में आते-जाते देखता हूं. वह सूर्य अपने साथ जाने वाली एवं पीछे हटने वाली किरणों को लपेटे हुए भुवनों के मध्य बार-बार आते-जाते हैं. (३१) य ईं चकार न सो अस्य वेद य ईं ददर्श हिरुगिन्नु तस्मात्. स मातुर्योना परिवीतो अन्तर्बहुप्रजा निर्ऋतिमा विवेश.. (३२) जो पुरुष संतान उत्पत्ति के निमित्त गर्भाधान करता है, वह भी इसका रहस्य नहीं जानता. जो माता के बढ़े हुए पेट से गर्भ को अनुमान द्वारा देखता है, वह उससे भी छिपा रहता है. वह माता की योनि के बीच स्थित रहता है और अनेक प्रजाओं का कारण बनकर ebook converter DEMO Watermarks*
दुःख का अनुभव करता है. (३२) द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम्. उत्तानयोश्चम्वो३ योनिरन्तरत्रा पिता दुहितुर्गर्भमाधात्.. (३३) आकाश मेरा पालनकर्त्ता और जन्मदाता है, पृथ्वी की नाभि मेरे लिए मित्र है और यह विशाल धरती मेरी माता है. दोनों ऊपर उठे हुए पात्रों के बीच अंतरिक्ष रूपी योनि है, जहां आकाश रूपी पिता दूर स्थित धरती रूपी माता के गर्भ का आधान करता है. (३३) पृच्छामि त्वा परमन्तं पृथिव्याः पृच्छामि यत्र भुवनस्य नाभिः. पृच्छामि त्वा वृष्णो अश्वस्य रेतः पृच्छामि वाचः परमं व्योम.. (३४) मैं तुमसे पृथ्वी की समाप्ति का स्थान एवं समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का स्थान पूछता हूं. मैं तुमसे वर्षा करने वाले घोड़े के वीर्य एवं समस्त वाणियों के कारण उस स्थान के विषय में पूछता हूं. (३४) इयं वेदिः परो अन्तः पृथिव्या अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः. अयं सोमो वृष्णो अश्वस्य रेतो ब्रह्मायं वाचः परमं व्योम.. (३५) यह वेदी ही पृथ्वी की समाप्ति है एवं यह यज्ञ संसार की उत्पत्ति का स्थान है. यह सोमरस वर्षा करने वाले घोड़े का वीर्य है एवं यह ब्रह्मा वाणियों का अंतिम स्थान है. (३५) सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि. ते धीतिभिर्मनसा ते विपश्चितः परिभुवः परि भवन्ति विश्वतः.. (३६) सात किरणें आधे वर्ष तक जलरूप गर्भ को धारण करती हुई जगत् का वीर्य बनकर विष्णु के जगद्धारणरूप कार्य में स्थित होती हैं. ज्ञानयुक्त एवं सब ओर जाने वाली वे किरणें जगत् का उपकार करने की बुद्धि से चारों ओर से संसार को घेरे हैं. (३६) न वि जानामि यदिवेदमस्मि निण्यः संनद्धो मनसा चरामि. यदा मागन्प्रथमजा ऋतस्यादिद्वाचो अश्नुवे भागमस्याः.. (३७) समस्त विश्व मैं ही हूं, इस बात को मैं नहीं जान पाया, क्योंकि मैं मूढ़चित्त एवं अविद्या के कर्मों से बंधा हुआ हूं तथा बहिर्मुख मन से संसार में दुःखों का अनुभव करता हूं. मुझे जब ज्ञान का पहली बार अनुभव होता है, तभी मैं शब्द का अर्थ समझ पाता हूं. (३७) अपाङ्प्राङेति स्वधया गृभीतोऽमर्त्यो मर्त्येना सयोनिः. ता शश्वन्ता विषूचीना वियन्ता न्य१न्यं चिक्युर्न नि चिक्युरन्यम्.. (३८) मरणरहित आत्मा मरणधर्मा शरीर के साथ रहती है एवं अन्नादि भोगों के कारण ebook converter DEMO Watermarks*
अधोगति और ऊर्ध्वगति को प्राप्त होता है. वे दोनों सदा एक साथ रहते हैं और संसार में सभी जगह साथ-साथ जाते हैं. लोग इनमें से अनित्य शरीर को जानते हैं, नित्य आत्मा को नहीं. (३८) ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः. यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते.. (३९) मंत्रों के अक्षर आकाश के समान विस्तृत हैं. इनमें सभी देव अधिष्ठित हैं. जो इस बात को नहीं जानता, वह मंत्र जानकर क्या लाभ उठाएगा? इस बात को जानने वाला सुख से रहता है. (३९) सूयवसाद्भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम. अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती.. (४०) हे हनन के अयोग्य गौ! तुम जौ के सुंदर तिनकों को खाती हुई अधिक दुग्ध रूपी धन से संपन्न बनो. इस प्रकार हम संपत्तिशाली बन जाएंगे. नित्य घास के तिनके चरो और सब जगह स्वच्छंदता से घूमो तथा साफ पानी पिओ. (४०) गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी. अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन्.. (४१) मध्यमा वाणी वर्षा के जल का निर्माण करती हुई शब्द करती है. वह समय-समय पर एकपदी, द्विपदी, चतुष्पदी, अष्टपदी अथवा नवपदी हो जाती है. वह कभी हजार अक्षरों वाली बनकर विशाल आकाश में पहुंचती है. (४१) तस्याः समुद्रा अधि वि क्षरन्ति तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः. ततः क्षरत्यक्षरं तद्विश्वमुप जीवति.. (४२) उसी वाणी के प्रभाव से सारे बादल जल बरसाते हैं और चारों दिशाओं के जीव प्राण धारण करते हैं. उसीसे सारे प्राणियों को जन्म देने वाला जल उत्पन्न होता है. (४२) शकमयं धूममारादपश्यं विषूवता पर एनावरेण. उक्षाणं पृश्निमपचन्त वीरास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्.. (४३) मैंने अपने समीप ही सूखे गोबर से उत्पन्न धुएं को देखा. चारों ओर फैले हुए धुएं के बाद मैंने उसके कारणभूत अग्नि को देखा. ऋत्विज् श्वेत रंग वाले सोमरस को तैयार करते हैं. आदि काल से उनका यही कर्म रहा है. (४३) त्रयः केशिन ऋतुथा वि चक्षते संवत्सरे वपत एक एषाम्. विश्वमेको अभि चष्टे शचीभिर्ध्राजिरेकस्य ददृशे न रूपम्.. (४४) ebook converter DEMO Watermarks*
केश तुल्य किरणों वाले तीन व्यक्ति—अग्नि, आदित्य और वायु वर्ष में समय-समय पर धरती को देखते रहते हैं. इनमें से पहला नाई के समान कूड़ा समाप्त करता है, दूसरा अपने प्रकाशकर्म द्वारा देखता है एवं तीसरे को केवल गति का ज्ञान होता है, वह दिखाई नहीं देता. (४४) चत्वारि वाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः. गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति.. (४५) वाणी के चार निश्चित पद होते हैं. क्रांतदर्शी ब्राह्मण उन्हें जानते हैं. उन में से तीन गुहा में छिपे होने से दृष्टिगोचर नहीं होते, चौथे पद वाली वाणी को मनुष्य बोलते हैं. (४५) इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्. एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः.. (४६) बुद्धिमान् लोग इस आदित्य को ही इंद्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं. वह सुंदर पंखों और शोभन गति वाला है. एक होने पर भी ये विद्वानों द्वारा अग्नि, यम, मातरिश्वा आदि अनेक नामों से पुकारे जाते हैं. (४६) कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति. त आववृत्रन्त्सदनादृतस्यादिद् घृतेन पृथिवी व्युद्यते.. (४७) सुंदर गति वाली और जल सोखने वाली सूर्य की किरणें काले रंग वाले एवं नियम से गमन करने वाले बादल को पानी से भरती हुई आकाश में जाती हैं. वे जल लेकर नीचे आती हैं व धरती को पूरी तरह भिगो देती हैं. (४७) द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत. तस्मिन्त्साकं त्रिशता न शङ्कवोऽर्पिताः षष्टिर्न चलाचलासः.. (४८) बारह परिधियां, एक चक्र और तीन नाभियां हैं. इस बात को कौन जानता है? एक चक्र में तीन सौ साठ चंचल अरे लगे हुए हैं. (४८) यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि. यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः सरस्वति तमिह धातवे कः.. (४९) हे सरस्वती! तुम्हारे शरीर में वर्तमान जो स्तन रस का आह्वान करने वालों को सुख देता है, जिससे तुम मनोरम धनों की रक्षा करती हो, जो रत्नों का आधार धन प्राप्त करने वाला एवं शोभनदानयुक्त है, उसे हमारे पीने के लिए प्रकट करो. (४९) यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्. ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः.. (५०) ebook converter DEMO Watermarks*
यजमानों ने अग्नि के द्वारा यज्ञपूर्ण किया है. यही सर्वप्रथम कर्त्तव्यकर्म था. महत्त्वपूर्ण यजमान स्वर्ग में एकत्र हैं. वहां पूर्ववर्ती यज्ञकर्त्ता भी दिव्य रूप में रहते हैं. (५०) समानमेतदुदकमुच्चैत्यव चाहभिः. भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः.. (५१) एक ही प्रकार का जल है. वह गरमी के दिनों में ऊपर जाता है एवं वर्षा के दिनों में नीचे आता है. बादल धरती को प्रसन्न करते हैं एवं अग्नि द्युलोक को संतुष्ट करती है. (५१) दिव्यं सुपर्णं वायसं बृहन्तमपां गर्भं दर्शतमोषधीनाम्. अभीपतो वृष्टिभिस्तर्पयन्तं सरस्वन्तमवसे जोहवीमि.. (५२) मैं दिव्य, शोभनगति वाले, गमनशील, विशाल, गर्भ के समान वर्षा का जल उत्पन्न करने वाले, ओषधियों के दर्शन एवं वर्षा के जल द्वारा सरोवरों को पूर्ण एवं सरिताओं का पालन करने वाले सूर्य का अपनी रक्षा के लिए आह्वान करता हूं. (५२) सूक्त—१६५ देवता—इंद्र कया शुभा सवयसः सनीळाः समान्या मरुतः सं मिमिक्षुः. कया मती कुत एतास एतेऽर्चन्ति शुष्मं वृषणो वसूया.. (१) इंद्र ने कहा—"समान अवस्था वाले और एक स्थान के निवासी मरुद्गण ऐसी महान् शोभा वाले हैं, जिसे सब लोगों को जानना कठिन है. वे धरती को सींचते हैं. मन में क्या विचार रखते हैं और कहां से आए हैं? आकर जल बरसाने वाले बादल क्या धन की इच्छा से शक्ति की उपासना करते हैं? (१) कस्य ब्रह्माणि जुजुषुर्युवानः को अध्वरे मरुत आ ववर्त. श्येनाँ इव ध्रजती अन्तरिक्षे केन महा मनसा रीरमाम.. (२) नित्य तरुण मरुद्गण किसका हवि स्वीकार करते हैं? यज्ञ में आए हुए उन्हें कौन हटा सकता है? वे बाज पक्षी के समान आकाश में उड़ते हैं. हम उन्हें किस महान् स्तोत्र द्वारा प्रसन्न करें? (२) कुतस्त्वमिन्द्र माहिनः सन्नेको यासि सत्पते किं त इत्था. सं पृच्छसे समराणः शुभानैर्वोचेस्तन्नो हरिवो यत्ते अस्मे.. (३) मरुद्गणों ने कहा— “हे सज्जनों के पालक एवं पूजनीय इंद्र! तुम अकेले कहां जा रहे हो? क्या तुम इसी प्रकार के हो? तुम हमसे मिलकर जो पूछ रहे हो, यह उचित है. हे घोड़ों के स्वामी! हमसे जो कहना हो, वह हमसे शोभन वचनों द्वारा कहो." (३) ebook converter DEMO Watermarks*