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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

नक्षत्र गुण धर्म : २२७

२२ अश्वि.नकुल मनुअस्तसर्पमध्यलघु
२३ श्रवणवैश्यचतु.१॥मर्कट देवमेढ़ासुलो.ऊर्ध्वचर
जल. २॥
२४ धनि.वैश्य२ जल२ सिंहराक्षसमध्यगजअन्धऊर्ध्व चर
शुद्ध२ नर
२५ शत.शुद्धनरअश्वराक्षसआदिअस्तमन्दऊर्ध्व चर
२६ पू. भा.शुद्ध३ नर३ सिंहमनुष्यआदिगजमध्यऊर्ध्व उग्र
ब्रा. १जल
२७ उ. भा.ब्राह्मणजलचरगौमनुष्यमध्यव्याघ्रसुलो.ऊर्ध्व घुव
२८ रेवतीब्राह्मणजलचरगजदेवअस्तसिंहअन्धतिर्यक भुद्र

इन नक्षत्र गुण धर्म चक्र में दिये हुए वर्ण वश्य योनि गण और नाडी का विवाह आदि में विचार किया जाता है। संक्षिप्त जन्म पत्रिका (टिप्पणी) में ये सब लिखना पड़ता है। इस कारण यहाँ चक्र में दिया है।

वर्ण में कृषिका नक्षत्र में क्षत्रिय १, वश्य दिया है। इसका अर्थ यह है कि नक्षत्र में ४ चरण होते हैं, उनमें पहिला १ चरण में क्षत्रिय और अस्त में शेष ३ चरण में वैश्य वर्ण होता है। आगे भी इसी प्रकार का विचारना। जिसमें एक ही वर्ण दिया है वहाँ चारों चरण में एक ही वर्ण समझना। इसी प्रकार वश्य में भी समझना। जैसे मृगशिर में वश्य में पहिले २ चरण में चतुष्पद और अस्त के २ चरण में नर समझना।

वश्य में चतुष्पद=चौपाया, नर=द्विपद=मनुष्य। कीट=नीड़े=रेंगने वाले बिना पैर के ( अपद ) जलचर=जल में चलने वाले जीव।

योनि—छाया=वक्रा या मेढ़ा। माजार=बिल्ली। महिष=मँस। श्वा=कुत्ता, मर्कट=वन्दर, वानर। उंडुख=बूहा, मूषक। गौ=शाय। नकुल=म्योला। व्याघ्र=बाघ, शेर। अश्व=घोड़ा। गज=हाथी।

लोचन—कोई वस्तु खोई हो उसके विचार में काम आता है। सु=सुलोचन। मुख=तिर्यक=तिरछा। अघो=उलटा, अंधा। ऊर्ध्व=चित।

नक्षत्र नाम—इन नक्षत्रों के नाम के अनुसार कार्य करने में शुभ होता है।

अध्याय ४२

संक्षिप्त जन्मपत्री बनाना

किसी बालक का जन्म समय बतला कर संक्षिप्त जन्म पत्रिका बनाने को कहा जावे तो कैसे बनाना यहाँ समझाते हैं।

मान लो बालक का जन्म नरसिंहपुर में तारीख २-१०-१९३६ ई० के १० बजे दिन हुआ है। इसकी जन्म-पत्री बनानी है।

२२८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

उस सन् का पंचाङ्क देखो। कर्मवीर पंचाङ्क जबलपुर का सम्बत् १९९५ का मिला, उसे देखा। आश्विन शुक्ल ९ रविवार सम्बत् १९९५ शाका १८६०, तारीख के अनुसार मिला।

आश्विन शुक्ल पक्ष तिथि ९ रविवार ६० व. ० प., नक्षत्र पू०षा० २७-४५, शोभन योग ३-४६, उपरान्त अतिगंड योग, बालव कारण २९-१, विनमान २९-३२, मिथमान ४५-५२ का मिथकालीन सूर्य ५ रा, १५ अंश २९'-३६" दिया है। चन्द्र मकर का ४४-२१ उपरान्त होगा।

उपर्युक्त तिथि आदि जबलपुर की है। वहाँ से नरसिंह पुर का देशान्तर ४ मिनट पश्चिम=१० पल है। पश्चिम होने से उपर्युक्त मान से घटाना पड़ेगा। इसमें फल छोड़ देते हैं, क्योंकि चर संस्कार आदि का ज्ञान अभी नहीं कराया गया है। इस कारण अभी कुछ कठिनाई मालूम पड़ेगी। यह विषय गणित खण्ड में विस्तार पूर्वक उदाहरण देकर समझाया गया है। अभी काम चलाने को स्थूल रूप से ही टिप्पणी तैयार करते हैं।

इष्ट साधन

| घं० | मि० | घड़ी | पल ---|---|---|---|--- जन्म | १० | ० (दिन को) | ३ घं०=७ | २० सूर्योदय | ६ | ६ (पंचाङ्क के अनुसार) | ५४ मि०=२ | १५ शेष= | ३-५४ | =९० घ ४५ प. इष्ट। | योग= ९-४५ | इष्ट हुआ

रविवार को पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र १७-४५ है। पंचाङ्क में देखो यह नक्षत्र इसके पहिले शनिवार को कितना था। शनिवार को मूल नक्षत्र २१ घ० ३३ प० दिया है।

| घ० | पल | | घ० | प० ---|---|---|---|---|--- पूर्ण घटी | ६०-० | | शनिवार को पू. वा. | ३८-२७ | भुक्त मूलनक्षत्र | २१-३३ (शनिवार को) | + | रविवार को पू. वा. | २७-४५ | शेष | =३८-२७ | शनिवार को | | योग ६६-१२ |

यह पूर्वाषाढ़ा वचा

भभोग पूर्वाषाढ़ा का

शनिवार को पूर्वाषाढ़ा | ३८-२७ | या | पूर्ण पूर्वाषाढ़ा=६६-१२ | ---|---|---|---|--- + रविवार को इष्ट काल | ९-४५ | ∴ | १ चरण=६६-१२ = घ० | पल ∴ भुक्त पूर्वाषाढ़ा | ४८-१२=भयात | | ४ | १६ ३३

शनिवार को मूल नक्षत्र २१-३३ भुक्त होने के बाद पूर्वाषाढ़ा लगा। शनिवार को पूर्वाषाढ़ा ३८-२७ रहा और रविवार को २७-४५ तक था। सब मिलकर पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का भोगकाल ६६-१२ हो गया। इसे भभोग या सर्वशं कहते हैं। भभोग का चौथाई भाग करने पर १ चरण का भोग निकलता है। भभोग ६६-१२ में ४ का भाग देने से १ चरण का भोग १६-३३ आया। अब देखना है कि अन्य समय

संक्षिप्त जन्मपत्री बनाना : २२९

अर्थात् इष्ट काल तक पूर्वाषाढ़ा कितना सूका हुआ था। शनिवार के शेष पूर्वाषाढ़ा में इष्ट काल जोड़ने से पूर्वाषाढ़ा का भुक्त काल ४८-१२ निकला। इसे भयात या भक्तर्ष कहते हैं।

अब देखना है पूर्वाषाढ़ा के कौन चरण का जन्म है। भयात में १ चरण घटाया तो शेष ३१-३९ बचे। दूसरा चरण घटाया तो शेष १५-६ बचे, अब तीसरा चरण नहीं घटाया तो तीसरे चरण का जन्म समझो।

| ष० | प० ---|---|--- भयात | ४८ | १२ १ चरण | १६ | ३३ शेष | ३१ | ३९ दूसरा चरण | १६ | ३३ घटाया शेष | १५ | ६

तीसरा चरण १६ ३१ नहीं घटता, इससे तीसरे चरण का जन्म हुआ।

पूर्वाषाढ़ा के तीसरे चरण में होड़ाचक्र के अनुसार नामाक्षर "फा" निकला। धनु राशि हुई। फा अक्षर पर से फतेहसिंह नाम रखा।

अब नक्षत्र गुण धर्म चक्र देखा।

पूर्वाषाढ़ा के तीसरे चरण में जन्म होने से—क्षत्रिय वर्ण, चतुष्पद वश्य, सर्कट योनि, मनुष्य गण, मध्य नाड़ी हुई। धन राशि है जिसका स्वामी गुरु हुआ।

अब लग्न कुण्डली बनाने के लिए पहिले लग्न निकालना है। लग्न निकालने को लग्नसारिणी देखी। सूर्य ५ रा १५° है अर्थात् कन्या के १५° पर है। सारिणी में कन्या के १५° के नीचे ३१-२५-१ दिया है। इसमें सारिणी अंक ३१-२५-१ इष्ट ९—४५ जोड़ा तो योग ४१—१०—१ हुआ। इसे सारिणी + इष्ट ९-४५-० में खोजा ४१-६-१२ तक वृश्चिक के ७° होते हैं और योग ४१-१०-१ ४१-१७-३२ तक ८° होते हैं अपना इष्ट युक्त सारिणी अंक दोनों के बीच में हैं। इस कारण लगभग ७।° वृश्चिक लग्न के आते हैं। वृश्चिक लग्न निकाली। अब वृश्चिक लग्न को बीच में रख कर कुंडली तैयार की। इस प्रकार कुंडली चक्र बन कर तैयार हुआ।

अब इसमें ग्रह भरने के लिए पंचाङ्ग देखा। पंचाङ्ग में अष्टमी का मिथमान ४५-५४ का ग्रह इस प्रकार दिया है। जन्म नवमी का है। इस कारण उसके समीप की पंक्ति (पंचाङ्ग के ग्रह) यही हैं।

२३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

पंक्ति सूर्य मंगल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु ५-१४° ४-२१° ५-८° १०-५° ६-२३° १११४° ७-०°-२५' १-०°-२६'

अब पंचाङ्क में देखो कि पंक्ति से इष्ट काल तक कोई ग्रहों में परिवर्तन हुआ है क्या? अष्टमी के आगे नवमी के इष्ट काल तक पंचाङ्क में इन ग्रहों में कोई परिवर्तन नहीं दिया, इस कारण इसीके अनुसार अपनी कुण्डली में ग्रह स्थापित करेंगे।

सूर्य ५-४° है अर्थात् कन्या का है, मंगल-सिंह का, बुध-कन्या का, गुरु कुम्भ का, शुक्र तुला का शनि मीन का राहु वृश्चिक का, केतु वृष का है। इसी प्रकार कुण्डली में जहाँ इन राशियों के अंक हैं वहाँ ये ग्रह स्थापित करेंगे।

लग्नकुंडली

चन्द्रकुंडली

राशि पहिले ही जान चुके हैं धन राशि है अर्थात् धन राशि का चन्द्र है, इस कारण चन्द्र को धन राशि पर रखा। लग्न को बीच में लग्न स्थान पर रखकर जो कुण्डली बनाई जाती है वह लग्न कुण्डली है और चन्द्र राशि को बीच में (लग्न स्थान पर) रख कर जो कुंडली बनाई जाती है वह चन्द्र कुंडली है।

संक्षिप्त जन्मपत्री बनाना : २३१

अब इसी को लिखने की रीति आगे बताई गई है। पहिले मंगलाचरण में गणेश, ईश्वर आदि की बन्दना लिखने के उपरान्त ये सब बातें क्रमानुसार लिख दी जाती हैं।

श्री गणेशाय नमः

स जयति सिन्धुरवदना देवो, यत्पादपंकजस्मरणम् । वासरमणिरिव तमसां राशिं नाशयति विघ्नानाम् ॥ ब्रह्मा करोतु दीर्घायुः, विष्णुः कुर्यान्च संपदाम् । हरो रक्षतु गात्राणि, यत्स्थैषा जन्मपत्रिका ॥

अथास्मिन् शुभे विक्रमार्क सम्बत् १९९५, शालिवाहन शाके १८६०, सायन दक्षिणायने गते, शान्त्यगोले शरद्वती महामांगल्यप्रदे वासिवनमासे शुभे शुक्लपक्षे, तिथौ ९ घट्टचादिकम् ६०।० रविवासरे । पूर्वाषाढानक्षत्रे घटषः २०।४५, शोभननाम योगे घट्टचादिकं ३।४६ तनुपुत्र अतिगंडनामयोगे । बाल्यकरणे घटषः २९।१ एवं पंचाङ्गं शुद्धिः । तथ दिवप्रमाणं घटषः २९।३२ रात्रिप्रमाणं घटषः ३०।२८ श्रीसूर्योदयादिवत्स-घट्टचादिकं ९।४५ कन्याकं गतांशाः १५ । वृश्चिकलने गतांशाः ७ । एवम् शुभग्रहा-वलोकिन्यां कल्याणवतीवैलायां श्रीमतो नाभूरामसिंहस्य ठाकुरगृहे भार्या सौभाग्यवती अस्वा कुक्षेः पुत्ररत्नमजीजनत् ॥ तस्याभिधानं शतपदचक्रानुसारेण पूर्वाषाढावृत्योत्तरेण “क” काराक्षरे अकारस्वरे फतहसिंह इति प्रतिष्ठितम् । अस्य राशिः धनुः । स्वामी गृहः । क्षत्रिय वर्णः । चतुष्पद वश्यः, मर्कट योनिः मनुष्य गणः । मध्य नाडी । इत्यादि विवाहदो विचारणीयम् । अयं च कुलदेव्याः प्रसादात् दीर्घायुर्भूयात् ।

लमकुंडली

चन्द्रकुंडली

दूसरा प्रकार टिप्पणी (जन्म पत्री) लिखने का

श्रीगणेशाय नमः

श्रीसरस्वत्यै नमः

स जयति सिंधुरवदना देवो, यत्पादपंकजस्मरणम् । वासरमणिरिव तमसां, राशिं नाशयति विघ्नानाम् ॥

२३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

आदित्याद्या ग्रहाः सर्वे सनसत्राः सराशयः ।

आयुः कुर्वन्तु ते सर्वे यस्याषा जन्मपत्रिका ॥

अथास्मिन् श्रीमन्सूत्रपतिक्रमादित्यराज्योदयात् गत्वाब्दाः श्री सम्बत् १९९५ शाके १८६० ॥ श्री सूर्ये दक्षिणायने ॥ शरद् ऋतौ ॥ मासानामुत्तमे आश्विनमासे ॥ शुभे शुक्लरक्षे ॥ त्रितीयं नवम्यां ॥ रविवारसरे ॥ षट्घादि ६०० ॥ पूर्वषाद्धानक्षत्रे षट्घादि २७।४५ ॥ योगननामयोगे षट्घादि ३।४६ ॥ तदनन्तरम् अतिपंडनामयोगे ॥ बालवकरणे २६।११ ॥ एवं पंचांगगुह्यावद्यदिने श्रीसूर्योदयादिष्टषट्घादि ९।४५ ॥ तत्समये वृश्चिकलग्नोदये श्रीठाकुरनाथूरामसिंहजी तस्य गृहे सौभाग्यवत्या भार्यायाः कुषी पुत्ररत्नमजीजनत् ॥ पूर्वषाद्धानक्षत्रस्य शुक्लक्षंषट्घादि ४।८१२ ॥ शोभ्यक्षंषट्घादि १८।० ॥ सर्वक्षंषट्घादि ६६।१२ ॥ अतः पूर्वषाद्धानक्षत्रस्य तृतीयचरणे जातत्वात् अवकहङ्गचक्रानुसारेण चि० फतेहसिंह नाम प्रतिष्ठितम् ॥ सच देवद्विज-प्रसादाद् दीर्घायुर्भवतु ॥ धन-राशिः ॥ क्षत्रिय-वर्णः ॥ चतुष्पद वश्यः ॥ मकट-योगिः ॥ मनुष्य गणः ॥ मध्य नाडी ॥ एतद्विवाहादौ विचारणीयम् ॥ वृश्चिकलग्नगतांशाः ७ ॥ कन्याकैर्गतांशाः १५ ॥ इयं जन्मपत्रिका जबलपुरस्य कर्मवीरपंचाङ्गानुसारेण निर्मिता ॥ आंगमतानुसारेण जन्मसमय १० वादने दिने ॥ दिनांक २।१०।१९३८ ईसवी ॥ शुभमस्तु ॥

अथ जन्मांगचक्रभिदम्

चन्द्रांगवक्रम्

कुण्डली के प्रकार

कुण्डली कई प्रकार की बनाई जाती हैं। उनके बनाने की भिन्न २ रीतियां आगे बताई जाती हैं।

संक्षिप्त जन्मपत्री बनाना : २३३

भिन्न-भिन्न प्रकार की कुण्डलियाँ।

कुण्डली क्रम ( १ )

कुण्डली क्रम ( २ )

कुण्डली क्रम ( ३ )

कुण्डली क्रम ( ४ )

कुण्डली क्रम ( ५ )

कुण्डली क्रम ( ६ )

३३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

कुण्डली क्रम ( ७ )

ये जितनी कुण्डलियाँ बनाई गई हैं, सब एक ही प्रकार की हैं, परन्तु उनके आकार भिन्न-भिन्न प्रकार के बनाये गये हैं। ज्योतिषी लोग शोभा के लिए इसी प्रकार की अनेक रूप की सुन्दर कुंडलियाँ जन्मपत्री में बनाते हैं। उनमें रंग भी भर देते हैं।

इन सब कुंडलियों में क्रम एक ही प्रकार का है। अर्थात् ऊपर लगने से आरम्भ कर बाईं ओर से क्रमानुसार राशियाँ स्थापित की जाती हैं। परन्तु इस प्रकार की कुंडली में इनके भाव स्थिर हैं केवल राशियाँ चलायमान हैं। देखो लग्नकुण्डली क्रम १ से ७ तक।

परन्तु भारतवर्ष में इन कुण्डलियों के आकार के अतिरिक्त भिन्न-भिन्न प्रकार से कुण्डलियाँ कई स्थानों में बनाई जाती हैं और उनके बनाने की पद्धति भी भिन्न-भिन्न हैं। इस कारण उनका वर्णन कर देना यहाँ आवश्यक है जिससे इस प्रकार की कोई कुण्डली मिलने पर तवीन विद्यार्थी को समझने में कोई अडचन न हो।

राशि कुण्डली क्रम ( ८ )

ग्रह कुण्डली क्रम ( ९ )

संक्षिप्त जन्मपत्रो बनाना : १३५

लग्न कुण्डली क्रम ( १ )

केशव दैवज्ञ की जातकपद्धति (केशव जातक) में राशि को स्थिर मानकर कुंडली बनाई गई है और उसमें भाव चलित बताये गये हैं।

यहाँ जिस प्रकार राशि कुण्डली न बनाई गई है, उसी के अनुसार राशियाँ सदा स्थिर मानी गई हैं। जैसे दशम स्थान में सदा दशवीं मकर राशि और लग्न में सदा पहिली भेष राशि रहती है, ऐसा मानकर कुण्डली बनाई जाती है। इसमें राशियों के अंक नहीं लिखे जाते केवल ग्रह जिस राशि में हो उस राशि के स्थान में लिख दिये जाते हैं, और जहाँ लग्न होती है लग्न लिख दी जाती है जैसे ग्रह कुण्डली क्रम (९) में पूर्व लिखित लग्न कुण्डली क्रम (१) के अनुसार ग्रह भर दिये गये हैं। इसमें राशि के अंक लिखने की आवश्यकता नहीं रहती। लग्न कुण्डली क्रम (१) और कुंडली क्रम (९) से मिलान करो। उसमें कितना अन्तर दिखाई देता है और नवीन विद्यार्थी को कुण्डली क्रम (९) अटपटी जान पड़ेगी।

दक्षिण में कुण्डली बनाने की भिन्न पद्धति है। उसमें राशि को स्थिर तो माना है परन्तु उसका क्रम उलटा है। जैसे उपर्युक्त कुण्डली में अंक ऊपर से लिखना आरम्भ होकर बाईं ओर से क्रमानुसार लिखे गये हैं, परन्तु यहाँ विपद क्रम से अर्थात् दाहिनी ओर से क्रमानुसार राशि के अंक स्थापित किये जाते हैं। इसमें राशियाँ स्थिर और भाव चलित माने गये हैं। और जहाँ लग्न हो वहाँ लग्न लिख दिया जाता है। यहाँ नीचे दी हुई कुण्डली देखने से सब समझ में आ जायगा।

२३६ : सच्चिद्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

स्थिर राशि कुण्डली

क्रम १०

ग्रह कुण्डली

क्रम ११

ग्रह कुण्डली

क्रम १२

मीन | मेव | वृष | मि. | १२ श. | १ | २ के. | ३ | श. | | के | ---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|--- कुम्भ | राशि कुंडली | कर्क | ११ गु. | जन्म कुण्डली | ४ | सू. | जन्म कुण्डली | मकर | सिंह. | १० | ५ मं. | | मं. धन | वृश्चि | तुला | कन्या | ९ चं. | ८ रा. लग्न | ७ शु. | ६ सू. बु. | चं. | रा. लग्न | शु. | सू. बु.

इसमें जहाँ लग्न लिखा है उसके आगे भाव गिना जाता है। जैसे लग्न में वृश्चिक का राहु है, धन भाव में धन राशि का चन्द्र है इत्यादि प्रकार से कुण्डली क्रम ११ में भाव समझना। परन्तु जो कुण्डली (११) में समझाने के लिए राशि के अंक दिये हैं वे नहीं रहते। केवल कुण्डली क्रम (१२) के अनुसार लग्न-कुण्डली में ग्रह बता दिये जाते हैं।

पाश्चात्य पद्धति से कुण्डली इस प्रकार बनती है कि कुण्डली में दशम भाव ऊपर रहता है, चतुर्थ भाव नीचे रहता है, बाईं ओर लग्न का स्थान (पूर्व) और दाहिनी ओर अस्त (पश्चिम) स्थान रहता है। इसमें भाव स्थिर और राशियों चलायमान बतलाते हैं।

पाश्चात्य पद्धति से कुण्डली क्रम (१३)

कुण्डली क्रम (१४)

भाव स्थिर है इस कारण भाव में जिन-जिन राशियों के जितने २ अंश होते हैं भाव स्थान में लिख दिये जाते हैं और जो ग्रह जितने अंश पर होता है उसके नीचे लिख दिया जाता है। बीच में जन्म समय स्थान आदि लिखा रहता है। देखो कुंडली क्रम १३।

संक्षिप्त जन्मपत्री बनाना : २३७

इसी कुण्डली को कुण्डली क्रम ( १ ) सरीखा भी बताते हैं, जिसमें कि लगन के स्थान में दशम स्थान ऊपर रखते हैं जैसा कि कुण्डली क्रम १४ में बताया गया है। देखो कुण्डली क्रम (१४)।

जन्म पत्रिका

यहाँ विद्यार्थियों को केवल टिप्पणी (संक्षिप्त जन्मकुण्डली) बनाना बताया गया है। पूरी जन्मपत्रिका बनाने में बहुत गणित करना पड़ता है।

जन्मपत्रिका बनाने के लिये जन्म के स्टेन्डर्ड टाइम (चड़ी के समय) को स्थानिक समय बनाकर, काल समीकरण के अनुसार उसका संस्कार कर शुद्ध इष्ट काल बनाया जाता है। जिस पर से जन्म पत्रिका का सम्पूर्ण गणित होता है, इस पर से प्रत्येक ग्रहों की गति के अनुसार चालन बनाकर ग्रह स्पष्ट किया जाता है। फिर अपने स्थान का अक्षांश निकाल कर उससे पलभा बनाकर चरखण्ड निकाल, लंकोदय में उसका संस्कार कर स्वोदय बनाया जाता है। अयनांश निकाल कर सूर्य स्पष्ट से सायन सूर्य बनाकर लंकोदय पर से दशम भाव निकाल कर, फिर सब भाव संघियां निकाल कर सम्पूर्ण भाव स्पष्ट किया जाता है। फिर भाव का रूपात्मक भाव वल विश्वावल चय क्षय फल निकाला जाता है। फिर भावकुण्डली बनाई जाती है और तात्कालिक एवं नैसर्गिक मैत्री पर से पंचधा मैत्री चक्र बनाया जाता है। होरा त्रेष्काण आदि कई प्रकार की वर्ग-कुण्डलियाँ बनाई जाती हैं। दशवर्ग चक्र बना कर उत्तर पारिजातक आदि संज्ञावर्गक चक्र बनाया जाता है। ग्रह पर ग्रहदृष्टि चक्र; भाव पर ग्रहदृष्टि चक्र, शुभ अशुभ दृष्टि चक्र बनाया जाता है। ग्रह का और भाव का पृथक २ वल निकाल कर षडवल चक्र बनाया जाता है। इष्ट कष्ट, इष्ट वल, कष्ट वल, इष्ट दृष्टि, कष्ट दृष्टि, शुभ अशुभ चक्र, शुभ अशुभ पंक्ति आदि के कई चक्र बनाये जाते हैं। अष्टक वर्ग शुभ रेखा चक्र बना कर राशि पिंड ग्रह पिंड बना कर, अष्टक वर्ग आयु साधन, व उसकी दशा अन्तर्दशा साधन का साधन किया जाता है और अंशायु, पिंडायु, जीवशयोक्त आयु, मिश्रायु, आदि आवश्यक आयु, निकाल कर उसकी दशा अन्तर्दशा आदि भी निकाली जाती है और विंशोत्तरी, अष्टोत्तरी, योगिनी आदि दशा निकाल कर उनकी अन्तर्दशा विदशा आदि निकाल कर उनका समय निकाला जाता है। इस प्रकार जन्मपत्रिका में अनेक चक्र बनाये जाते हैं।

इन सब विषयों को पृथक रूप से गणित खण्ड में प्रत्येक का उदाहरण देकर पूरी गणित किया देकर पूर्ण रूप से समझाया गया है। जिसमें गणित करने की सम्पूर्ण रीतियाँ भी दी हैं और लगनसारिणी, दशमसारिणी, दिनमानसारिणी आदि भिन्न सारिणियाँ भी बनाकर उनके बनाने की रीति समझाई गई है, जिसके द्वारा बिना किसी सहायता के विद्यार्थी स्वयं जन्मपत्रिका बना सकेगा।

२३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

जब पंचाङ्क न हो तो अर्द्धांग निकाल कर मध्यम ग्रह बनाकर ग्रह स्पष्ट करने की सारिणियाँ और रीति भी उदाहरण सहित दे दी गई हैं, जिससे पत्रिका बनाने का कोई विषय शेष नहीं रह् जाता। पूरी जन्मपत्रिका बनाकर फिर उसका फल निकाला जाता है।

अध्याय ४३

फलित सम्बन्धी स्थूल विचार

ज्योतिष सम्बन्धी नियमों को समझाने के पश्चात् पंचाङ्क का ज्ञान, कुण्डली का निर्माण इत्यादि विषय समझाया जा चुका है। कुण्डली निर्माण के उपरान्त प्रत्येक विद्यार्थी को यह उत्सुकता हृदय में होती है कि अब इसका फल जाने। गणित विषय जितना कठिन व सूक्ष्म है उतना ही कठिन व सूक्ष्म फलित विषय है।

फलित विषय को उत्तमता तथा पूर्ण रूप से जानने के लिए ज्योतिष सम्बन्धी सम्पूर्ण गणित, ग्रहों का समावेश, स्थिति तथा देशकाल आदि सब ही बातों का जानना आवश्यक है। किन्तु जिस प्रकार इस ज्ञान खण्ड में स्थूल मान से ज्योतिष के प्रारम्भिक ज्ञान का प्रदर्शन किया गया है उसी प्रकार से स्थूल मान से फलादेश जानने के कुछ नियमों का उल्लेख आवश्यक समझ कर आगे बताया जायगा। साथ ही साथ गोचर ग्रह, अर्द्धा शनि, साढ़े साती शनि, आगुद्वय का स्थूल रूप से विचार, मारकेश विचार, विक्षोत्तरी दशा साधन आदि भी संक्षेप में बताया जायगा, जिससे विद्यार्थी इस ओर रुचि बढ़ा कर उसका अभ्यास कर अनुमान प्राप्त करें।

इन सब का उदाहरण देकर समझाने से पुस्तक का आकार बहुत बढ़ जाता, इस कारण यह सब संक्षिप्त में ही दिया है, क्योंकि इन सब विषयों का पृथक वर्णन फलित खंड में विस्तारपूर्वक होगा।

बहुत लोग शंका करते हैं कि सूर्य की गरमी का प्रभाव एक ही स्थान पर एक ही समय एक सा ही पड़ना चाहिए, परन्तु फलादेश में भिन्न रूप से कैसे कहा जाता है।

इसके समझाने को मध्याह्न के समय भिन्न २ प्रकार की धातुओं के बर्तन में बराबर २ पानी भर कर किसी निश्चित स्थान में निश्चित समय तक रखी। उपरांत देखने से प्रगट होगा कि किसी बर्तन के पानी में गरमी (टेंपरेचर) अधिक होगी, किसी में कम। मान लो तांबा, लोहा कांसा और पीतल ऐसे ४ प्रकार के भिन्न २ धातुओं के बर्तन में पानी रखा था। देखने से ज्ञात हुआ कि तांबे के बर्तन का पानी अधिक उष्ण होगा, फिर लोहे का, पीतल का और सबसे अल्प उष्णता का प्रभाव

फलित सम्बन्धी स्थूल विचार : २३९

कासे के बर्तन पर पड़ा । यह भिन्न भिन्न प्रकार की धातुओं के कारण हुआ । जिसमें दाहक शक्ति अधिक होगी उसमें गरमी का प्रभाव शीघ्र पड़ेगा और जिसमें अल्प होगी उसमें अल्प प्रभाव पड़ेगा ।

ठीक उसी प्रकार संसार के समस्त जड़ और चैतन्य पदार्थ मनुष्य आदि सब ही पर सब ग्रहों का प्रभाव भिन्न २ रूप से पड़ता रहता है । जिस वस्तु पर प्रभाव पड़ रहा है उसकी स्थिति पात्र के समान समझनी चाहिए ।

इस प्रकार जो जिस लघु और गृह स्थिति में और जिस स्थान में उत्पन्न हुआ है उसीके अनुसार उसकी प्रकृति बन जाती है और उसी प्रकृति के अनुसार भिन्न २ मनुष्यों पर भिन्न २ प्रभाव ग्रहों का पड़ता रहता है ।

फलादेश कहते समय आगे बताई हुई बातों का विचार करना चाहिए और अपनी कल्पना शक्ति का उपयोग कर भिन्न २ फलों को तोल कर और विचार कर फल कहना चाहिए । और उसका अन्वेषण करते-करते अनुभव बढ़ाना चाहिए, क्योंकि अनुभव से ही ज्ञान बढ़ता है ।

फलित का स्थूल ज्ञान होने की सामग्री आगे दी है ।

फलित का विचार इन रीतियों से किया जाता है :—

१ गोचर से—केवल जन्म राशि पर से पंचाङ्ग में दिये हुए ग्रहों की स्थिति पर से प्रत्येक मास या पक्ष आदि का फल जाना जाता है ।

१ जन्म कुण्डली से—जन्म कुण्डली देख कर ग्रहों की स्थिति के अनुसार, ग्रह फल, भाव फल, दृष्टि फल, योग फल आदि का पूर्ण विचार कर फल कहा जाता है ।

३ वर्णफल—जन्म कुंडली पर से प्रत्येक वर्ष की, वर्ष कुण्डली बनाकर और उस के भीतर प्रत्येक मास की या यदि आवश्यकता हुई तो प्रत्येक दिन की भी कुण्डली बनाकर वर्ष, मास या प्रतिदिन का फल जाना जा सकता है ।

४ प्रश्नकुण्डली—किसी भी समय जब कोई प्रश्नकर्ता किसी विषय पर प्रश्न करता है और उसका उत्तर चाहता है तो उस समय जो लघु होगी, उस पर से प्रश्न कुण्डली बनाकर उस कुण्डली पर से उस विषय का पूरा निर्णय किया जाता है ।

फल का समय—किसी विशेष फल का समय जानने को भिन्न प्रकार की दशाओं का साधन किया जाता है और उस ग्रह की दशा अन्तर्दशा या विदशा किस समय तक रहेगी गणित से निकाला जाता है । जिससे ठीक तिथि फल की जानी जा सकती है ।

किसी ग्रह की दशा का जो समय है उसके विभाग करने से अन्तर्दशा का समय निकलता है और अन्तर्दशा के समय का विभाग करने से विदशा का समय निकलता है । इस प्रकार फल का सूक्ष्म समय निकाला जा सकता है ।

फज कहने के लिये इन बातों का जानना आवश्यक है

( १ ) शुद्ध इष्ट काल परसे बनाई हुई कुण्डली ।

( २ ) यह देखना कि कुण्डली में कौन ग्रह किस किस स्थान में हैं ।

२४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

( ३ ) भाव में जो राशि है उसका स्वामी कौन ग्रह है। अर्थात् ग्रहों का स्वस्थान सबसे पहिले जानना चाहिए।

( ४ ) ग्रहों के उच्च नीच स्थान, मूल त्रिकोण स्थानों का विचार कर देखना कि कोई ग्रह इन अधिकारों में है क्या ?

( ५ ) ग्रहों की नैसर्गिक तात्कालिक और पंचधा मैत्री का विचार कर ग्रहों का परस्पर मैत्री सम्बन्ध देखना।

( ६ ) ग्रह की दृष्टि प्रत्येक ग्रह और भाव पर विचार कर उसका दृष्टि द्वारा सम्बन्ध का विचार करना।

( ७ ) ग्रह गुण धर्म, राशि गुण धर्म और नक्षत्र गुणधर्म पर विचार करना।

( ८ ) ग्रहों के अस्त वक्त्री मार्गी पर विचार।

( ९ ) भिन्न-भिन्न भाव के पृथक नाम और सामूहिक रूप से उनका नाम जो हो, उनमें ग्रहों का विचार।

( १० ) प्रत्येक भाव से क्या क्या विचार किया जा सकता है, इसको जान कर विचारणीय विषय का भाव खोजना।

( ११ ) विचारणीय भाव का स्वामी कौन ग्रह है और किस स्थान में है ? जहाँ भाव स्वामी है उसके भाव से मैत्री सम्बन्ध का विचार करना।

( १२ ) विचारणीय भावपर भावेश या और किन ग्रहों की दृष्टि है। इन बातों के विचारने का प्रारम्भिक ज्ञान करा दिया गया है, परन्तु इसके अतिरिक्त फल विचारने के लिए और अनेक बातों को जानने की आवश्यकता है जिनको जानने पर फल कह सकते हैं।

( १ ) ग्रहों की भिन्न-भिन्न प्रकार की अवस्थाएँ और उनका फल।

( २ ) ग्रहों के भिन्न-भिन्न राशियों में रहने का फल।

( ३ ) भाव में भिन्न-भिन्न राशियों के रहने का फल।

( ४ ) प्रत्येक भाव के अनुसार प्रत्येक ग्रह का फल।

( ५ ) भाव स्वामी के भिन्न-भिन्न स्थानों में रहने का फल।

( ६ ) ग्रहों की मैत्री के अनुसार फल।

( ७ ) ग्रहों की ग्रहों पर दृष्टि के अनुसार फल।

( ८ ) प्रत्येक भाव पर पृथक पृथक ग्रहों की दृष्टि का फल।

( ९ ) भाव में एक से अधिक ग्रह रहने का पृथक पृथक फल।

( १० ) कारक ग्रह, भास्कर ग्रह, अरिष्ट योग, अरिष्ट भंग योग आदि का ज्ञान।

( ११ ) ग्रहों के विशेष योग—जैसे अल्पायु योग, दीर्घायु योग, मृत्यु योग, राज योग, राजसंग योग, राज बंद योग, धन योग, दारिद्र्य योग, अन्ध्या काना लंगड़ा आदि होने के विशेष योग और नामभ आदि अनेक योगों का विचार कर देखना कि कुण्डली में कौन कौन योग पड़े हैं और उनका क्या फल होता है।

फलित सम्बन्धी स्थूल विचार : २४१

( १२ ) ग्रह की विशेष परिस्थिति के अनुसार फल का विचार ।

( १३ ) जन्म समय का सम्बत, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, दिन आदि अनेक बातों के विचार से भिन्न-भिन्न फल ।

( १४ ) चन्द्र की राशि, नक्षत्र, चरण आदि के विचार के विशेष फल जानना ।

( १५ ) लून और लगनेश के विचार से विशेष फल जानना ।

( १६ ) आयुर्दाय का ज्ञान ।

इत्यादि अनेक बातों का विचार कर ग्रह और भाव के बलावल और परिस्थिति विचार कर देश, काल, आयु, प्रथा आदि पर विचार करते हुए फल कहना पड़ता है । फिर उनकी दशा निकाल कर वह फल होने का समय निश्चित किया जाता है ।

फल कहने के लिए विचार—

जिस सम्बन्ध का फल विचार करना है उसके लिये देखो वह फल किस भाव से सम्बन्ध रखता है । जैसे सन्तान का विचार करना है तो पंचम भाव से उसका विचार होगा क्योंकि पंचम भाव का नाम सुत भाव है । संतान विचारने के लिए मुख्य भाव तो पंचम है । परन्तु और भी भाव हैं जिनसे संतान का विचार होता है । इस प्रकार देखना कि उस भाव का विचार और कौन कौन भाव से सम्बन्ध रखता है ।

जिस भाव के सम्बन्ध से विचार करना है उस भाव के सम्बन्ध से इन बातों का विचार करना पड़ता है—

( १ ) भाव का कितना बल है ?

( २ ) भाव में कोई ग्रह है या नहीं ।

( ३ ) भाव में शुभ या अशुभ ग्रह है ।

( ४ ) भाव में लगनेश है क्या ?

( ५ ) भाव में कोई ग्रह हो तो उस भाव का बलावल उच्च-नीच आदि अधिकार का विचार ।

( ६ ) भावस्थ ग्रह, त्रिकोण, केन्द्र, त्रिक, आदि स्थानों के स्वामी होने का विचार ।

( ७ ) भाव में कौन २ ग्रहों की दृष्टि है और द्रष्टा ग्रह कैसा है ।

( ८ ) भाव में अनेक ग्रहों का योग पर विचार ।

( ९ ) भाव भावेश युक्त या दृष्ट है ?

( १० ) भावस्थ ग्रह और भावेश के योग दृष्टि में भी अदि सम्बन्ध का विचार ।

( ११ ) भाग, भावस्थ ग्रह और भावेश के सम्बन्ध से विशेष परिस्थिति और विशेष योगों पर विचार ।

( १२ ) भावेशों का परिवर्तन योग ( भावेश का परस्पर एक दूसरे के स्थान में होना ) ।

१६

२४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

( १३ ) भाव के कारण ग्रह की स्थिति और योग दृष्टि मैत्री आदि से भाव से सम्बन्ध होने का विचार ।

( १४ ) आयुर्दाय का विचार कर भास्केष का विचार ।

इन सब के विचार करने के प्रथम भावस्थ ग्रह या भावेष की पूरी स्थिति इस प्रकार विचार कर लेनी चाहिए ।

( १ ) भावेष पाप या शुभ या मिथ ग्रह है ।

( २ ) भावेष वक्की मार्गी अस्त आदि विचार से क्या है ?

( ३ ) भावेष के बलावल का विचार ।

( ४ ) भावेष का उच्च, मूल त्रिकोण स्वगृही आदि अच्छे अधिकार पर विचार ।

( ५ ) भावेष का नीच शत्रु-गृही अस्त आदि बुरे अधिकार पर विचार ।

( ६ ) भावेष की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं पर विचार ।

( ७ ) भावेष किसी ग्रह के साथ है या अकेला है ।

( ८ ) भावेष का शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट होने से अच्छी स्थिति पर विचार ।

( ९ ) भावेष का अशुभ ग्रह युक्त या दृष्ट होने से बुरी स्थिति पर विचार ।

( १० ) भावेष का मित्र ग्रह युक्त या दृष्ट होने से बल प्राप्त करने पर विचार ।

( ११ ) भावेष का शत्रु ग्रह युक्त या दृष्ट होने से निर्बलता आने पर विचार ।

( १२ ) भावेष केन्द्र कोण आदि शुभ स्थानों में होने से अच्छी स्थिति पर विचार ।

( १३ ) भावेष त्रिक ( ६-८-१२ ) स्थानों में होने या इनके स्वामी होने आदि की बुरी स्थिति पर विचार ।

( १४ ) भावेष का केन्द्र त्रिकोण स्वामियों के साथ रहने से अच्छी स्थिति पर विचार ।

( १५ ) भावेष का त्रिकेश के साथ रहने से बुरी स्थिति पर विचार ।

( १६ ) भावेष के वर्ग के अनुसार शुभ या अशुभ वर्ग में होने का विचार ।

( १७ ) भावेष का नवांश में उच्च-नीच आदि स्थिति में होने पर विचार ।

( १८ ) भावेष शुभ या अशुभ स्थान है ।

इत्यादि बातों का विचार कर ग्रहों की और भाव की पूरी स्थिति और सम्बन्ध आदि का विचार कर फल कहना पड़ता है ।

फलित विचार करने के लिए संक्षेप में कुछ साधारण विचार : २४३

अध्याय ४४

फलित विचार करने के लिये संक्षेप में कुछ साधारण नियम

( १ ) नीच का ग्रह अशुभ होता है जैसे मकर का गुरु ।

( २ ) उच्च का ग्रह (जैसे मेष का सूर्य)-शुभ फल देता है, फल में वृद्धि करता है ।

( ३ ) परमोच्च ग्रह (जैसे गुरु कर्क के ५° पर हो तो)-भाव फल उत्तम देता है ।

( ४ ) मूल त्रिकोण में ग्रह (जैसे शुक्र १२° पर)-यह उच्च से अधिकार में कुछ कम है, परन्तु उच्च के सद्गुण ही शुभ फल देता है ।

( ५ ) स्वक्षेत्री ग्रह (जैसे मिथुन का बुध)-फल की वृद्धि करता है । शुभ सद्गुण फल देता है । इसका फल मूल त्रिकोण से कुछ हल्का है ।

( ६ ) मित्र क्षेत्री ग्रह (जैसे मेष का सूर्य)-फल वृद्धि करता है, अशुभ फल कम देता है ।

( ७ ) अधिमित्र गृही ग्रह-शुभ फल दायक होता है ( पंचधा मैत्री के अनुसार अधि मित्र लेना ) ।

( ८ ) उच्च या मित्र, या बलवान ग्रह से युक्त या दृष्ट ग्रह-शुभ होता है । जैसे मीन का शुक्र उच्च का होता है, यह बुध के साथ चतुर्थ भाव में हो तो बुध अच्छा फल देगा । या बुध चतुर्थ में हो उस पर दसम भाव से उसका मित्र शुक्र पूर्ण दृष्टि से देखता हो तो शुभ है ।

( ९ ) सप्त क्षेत्री ग्रह (जैसे शनि की राशि मकर में बैठा मंगल)-सप्त फल देता है

( १० ) शत्रु क्षेत्री ग्रह-(जैसे बुध चंद्र के स्थान कर्क में हो)-अशुभ और हानि कारक होता है ।

( ११ ) ग्रह नीच का होकर शत्रु क्षेत्री भी हो-तो उस भाव का फल नाश करता है । जैसे तुला का नीच सूर्य अपने शत्रु शनि की राशि ११ में बैठा हो ।

( १२ ) मित्र राशि या उच्च राशि में स्थित पाप ग्रह भी-शुभ हो जाता है । जैसे मकर का मंगल जो उच्च का है या सिंह का मंगल अपने मित्र सूर्य के घर का ।

( १३ ) शुभ ग्रह यदि नीच या शत्रु गृही या अस्त हो तो बुरा फल देता है । जैसे नीच मकर का गुरु या शत्रु स्थानी मिथुन का गुरु या अस्त सूर्य के साथ गुरु ।

( १४ ) पाप ग्रह नीच का सब फल नाश करता है जैसे कर्क का मंगल ।

( १५ ) अस्त ग्रह ( जो सूर्य के साथ रहने से अस्त हो )-अशुभ है बुरा फल देता है ।

२४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

( १६ ) शुभ ग्रह उदय हो (अस्त न हो) और वक्त्री हो और निर्मल कांति हो अर्थात् देखने में प्रकाशवान दिखे तो अच्छा फल देता है ।

( १७ ) पाप ग्रह वक्त्री हो तो अशुभ है !

( १८ ) पाप ग्रह युक्त या भाव स्वामी के शत्रु से युक्त या दृष्ट ग्रह अनिष्ट फल देता है । जैसे चतुर्थ में वृश्चिक का बुध पाप ग्रह राहु से युक्त हो तो पाप युक्त होने से बुध बुरा हुआ । यदि दशम स्थान में वृष का राहु है जो चतुर्थम मंगल का शत्रु है तो बुध पर राहु की दृष्टि पड़ने से बुरा फल देगा ।

( १९ ) शुभ ग्रह जैसे शुभ या अशुभ स्थान में हो उसके शुभ या अशुभ फल को बढ़ाते हैं ।

पाप ग्रह अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के फलों को घटाते हैं । इसलिए शुभ ग्रह शुभ स्थान में अति शुभ और अशुभ ग्रह अशुभ स्थान में हो तो उसके अशुभ फल को कम करने के कारण अच्छे होते हैं और अशुभ ग्रह शुभ घर में बैठ कर उसके शुभ प्रभाव को घटाने के कारण हानिकारक होते हैं ।

( २० ) शुभ स्थान=१, ४, १०, ५, ९, ११ भाव । सदा अशुभ स्थान=६, ८, १२ अशुभ स्थान=२ और ७ घर मारक स्थान हैं । इनमें अशुभ ग्रह हों तो ये अशुभ होते हैं । परन्तु इनमें शुभ ग्रह हो तो समान भाव हो जाता है ।

सम स्थान=३ भाव ( यह न शुभ है और न अशुभ है ) ।

( २१ ) ग्रह जिस स्थान को देखता है उसके बल को बढ़ाता है । यदि भाव स्वामी होकर उस भाव को देखे तो अच्छा फल देता है । जैसे लाभ स्थान में मिथुन का गुरु पंचम भाव अपने स्वस्थान ( धन राशि ) को पूर्ण दृष्टि से देखता है तो पंचम भाव का फल अच्छा होगा ।

( २२ ) बुरे भी ग्रह हों परन्तु अच्छे घर में हों जैसे त्रिकोण, केन्द्र या लाभ में तो अच्छा फल देते हैं । जैसे सूर्य पाप ग्रह है परन्तु दशम ( केन्द्र ) स्थान में अच्छा होता है ।

( २३ ) शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तो अच्छा फल देते हैं ।

( २४ ) ग्रह जो ३, ६, ११ या, २, ७, ८ भाव के स्वामी न हों तो शुभ फल देते हैं ।

( २५ ) ग्रह जो एक दूसरे से १-१२ भाव में या ६-८ घर में हों तो बुरा प्रभाव करते हैं ।

अर्थात् एक ग्रह दूसरे भाव में हो और दूसरा उससे बारहवें भाव में हो तो उसका सम्बन्ध बुरा है । या एक छठे दूसरा वहाँ से आठवें स्थान में हो तो उनका सम्बन्ध बुरा होता है । जैसे लून में मंगल है और छठे स्थान में शनि है तो ये एक दूसरे से ६-८ स्थान में हुए । मंगल पूर्ण दृष्टि से शनि को देखता है तो दृष्टि द्वारा सम्बन्ध हो गया यह बुरा है ।

फलित विचार करने के लिए संक्षेप में कुछ साधारण नियम : २४५

( २६ ) भाव में पाप ग्रह हों या उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो उस भाव की वृद्धि होती है । जैसे पंचम भाव में शुक्र शुभ ग्रह हो या उसकी दृष्टि हो तो अच्छा है ।

( २७ ) भाव में पाप ग्रह हो या उस पर पाप दृष्टि हो तो बुरा फल देता है । जैसे चतुर्थ में शनि हो उसकी दृष्टि हो तो बुरा है ।

( २८ ) यदि भाव में शुभ और अशुभ ग्रह दोनों हों तो मिश्रित फल होगा । या भाव पर शुभ और अशुभ दोनों की दृष्टि हो तो मिश्रित फल होगा ।

( २९ ) जिस भाव में नीच या शत्रुक्षेत्री ग्रह हों उस भाव की हानि करते हैं । यदि स्वक्षेत्री; मूलत्रिकोण, उच्च के या मित्रक्षेत्री ग्रह हों तो वह भाव शुभ फल देता है ।

( ३० ) भाव, शुभ ग्रह या भावेश युक्त या दृष्ट हो और पापयुक्त या दृष्ट न हो तो शुभ फल होता है ।

यदि पाप युक्त या दृष्ट होने से शुभ फल देने वाले भी बुरे हो जाते हैं । और शुभ युक्त या दृष्ट होने से अशुभ फल देने वाले भी अच्छे हो जाते हैं ।

( ३१ ) भाव में, भाव स्वामी के अतिरिक्त यदि शुभ ग्रह अस्त, नीच या शत्रु स्थानी हो तो अच्छा फल नहीं देता ।

यदि पाप ग्रह अस्त नीच या शत्रुस्थानी हो तो भाव फल को पूर्ण नाश कर देता है ।

( ३२ ) भाव में शुभ स्थान का स्वामी हो या उसकी दृष्टि हो और वह भाव दुष्ट ग्रह या दुष्ट भावेश के साथ न हो या इनकी दृष्टि न हो तो अच्छा फल देता है ।

( ३३ ) बुरे या भले भाव किसी ग्रह से युक्त या दृष्ट न हों तो मध्यम फल देते हैं ।

( ३४ ) जिस भाव में लग्नेश हो उस भाव की उत्पत्ति होती है ।

( ३५ ) भावेश-मित्र गृही, स्वगृही, मूलत्रिकोण या उच्च का हो तो अच्छा फल देता है ।

यदि अष्टम में या अस्त या शत्रु या नीच राशि में हो और शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट न हो तो भाव फल नाश हो जाता है ।

( ३६ ) भावेश, पाप ग्रह भी हो परन्तु नीच, अस्त या शत्रुगृही न हो तो ऐसे भावेश से युक्त या दृष्ट भाव बुरा नहीं होता ।

( ३७ ) भावेश अपनी राशि में उच्च का हो परन्तु नवांश में नीच का हो तो अच्छा फल नहीं देता ।

इसी प्रकार अपनी नीच राशि में होकर अपने नवांश में उच्च राशि का हो जावे तो अच्छा फल देता है ।

२४६ : सचित्र ज्यो.तेष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

जैसे मीन का शुक्ल राशि में उच्च का है और अपने नवांश में कन्या राशि का अर्थात् नीच का हो जावे तो अच्छा फल नहीं देगा। यदि राशि में कन्या ( नीच ) राशि का शुक्ल हो परन्तु नवांश में मीन ( उच्च ) का हो जावे तो अच्छा फल देगा : (नवांश निकालना अन्त में बताया है)।

(३८) भावेष अस्तंतगत या नीच का हो तो केन्द्र या त्रिकोण में रहने पर भी शुभ फल विशेष रूप से नहीं देता, अङ्गचन और कष्ट के उपरान्त फल देता है।

( ३९ ) किसी भाव का फल, पहिले भावेष से विचारना, क्योंकि भावेष, उस भाव का स्वामी है और भावस्थित ग्रह उस भाव रूपी घर का किरायेदार ठहरा। भाव में बैठे शुभ ग्रह उस भाव को बाहरी चमक-दमक अवश्य देता है, परन्तु भावेष के बारे होने पर भाव से उत्पन्न फल की प्राप्ति में अङ्गचन होती है। इस कारण भावस्थ ग्रह से भावेष प्रबल है।

( ४० ) भावेष, लग्न से केन्द्र या त्रिकोण या लाभ में हो तो वह भाव फल की वृद्धि करता है।

( ४१ ) ३, ६, ८ या ११ भाव के स्वामी जिस भाव में हों, बारे होते हैं। ५ और ९ भाव के स्वामी अच्छे होते हैं।

केन्द्र स्थानों के स्वामी यदि शुभ ग्रह हों तो बारे फल देते हैं।

केन्द्र स्थानों के स्वामी यदि पाप ग्रह हो तो अच्छे फल देते हैं।

( ४२ ) लगनेश जिस भावेष के साथ हो उस भाव के फल की वृद्धि करता है, परन्तु लगनेश यदि अष्टमेश के साथ हो तो उस भाव की हानि करता है। लगनेश जिस भाव में हो या जिस भाव स्वामी के साथ हो उस भाव का वह फल देगा, परन्तु भाव स्वामी बली हो तब अच्छा फल देगा. यदि बलहीन हो तो दुःख देगा।

( ४३ ) लगनेश यदि अष्टशे मे भी हो जाय तो शुभ समझा जाता है।

( ४४ ) लगनेश ६, ८, १२ भाव के स्वामियों के साथ हो तो बुरा है। लगनेश जहाँ है उस भाव का स्वामी ६, ८, १२ भाव में हो तो बुरा है।

( ४५ ) लगनेश अष्टम में हो परन्तु शुभ दृष्टि हो तो बुरा फल नहीं देता।

( ४६ ) लगनेश जिस ग्रह से युक्त या दृष्ट है उस ग्रह का स्वस्थान क्या है मालूम करो, लगनेश के प्रभाव से उसी स्थान के फल में वृद्धि होगी, जैसे नवम स्थान में लगनेश बुध कुम्भ राशि का है वह चन्द्र से युक्त है, चन्द्र का स्वस्थान कर्क है, जो धन भाव में है तो बुध लगनेश के प्रभाव से नस स्थान की वृद्धि होगी।

( ४७ ) जिस भाव या भावेष या ग्रह के एक ओर पाप ग्रह हो और दूसरी ओर शुभ ग्रह हो तो मिश्रित फल देगा। यदि दोनों ओर शुभ ग्रह हैं तो शुभ फल देगा। यदि दोनों ओर पाप ग्रह हैं तो पाप ग्रहों से धिरा रहने के कारण बुरा फल देगा। जैसे तीसरा भाव लो, इसके एक ओर दूसरे भाव में मंगल हो और चौथे भाव में शनि हो तो यह भाव दोनों ओर पाप ग्रहों से धिरा जाने के कारण बुरा