सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
सर्वतोभद्र चक्र: १८३
(ऽ) देश -- नं० १ से २७ वाँ नक्षत्र (९) अभिषेक — _,, रष्वा, जन्म नक्षत्र का वेध इनमें से किसी में हो तो नीचे लिखा फल होगा- वेधफल
नक्षत्र या तारा जन्म तारा पापग्रह शुभ ग्रह युद्ध समय पर ग्रह वेध
नाम से संख्या वेध फल वेध फल
१ जन्मक्षं पहिला मृत्यु शुभ भय
२ कमं १० वां शोक, क्लेश शुभ असफलता
३ आधान १९ वां स्थान परिवतंन शुभ घात खून खराबी
रः बुद्धि प्रवेश ]
४ विनाश २३ वां बन्धु से कलह शुभ मृत्यु अपयश
५ सामुद्रिक १८ वां बुरा अनहोनी ;ष्ट शुभ भंग युक्त स्थिति
६ संघातिक १६ वां हानि शुभ
७ जाति २६ वां कुटुम्बनाश शुभ
८ देश २७ वां देश निकाला शुभ
९ अभिषेक २८ वां बंधन शुभ
इन नक्षत्रों में यात्रा विवाह आदि मंगल कार्य वर्जित हैं। उपग्रह में भी वेध हो
तो मृत्यु ।
बंधकारक ग्रहशुभ या अशुम हो जिस दिन वेध हो व शुभ या अशुभ समझे जायेंगे ॥
चन्द्रवेध में लगातार हो तिथि या नक्षत्र स्वर राशि और व्यंजन से किसी दिन
वेध हो तो वेधकारक ग्रह जैसा शुभ या अशुभ हो उसके अनुसार वहू दिन शुभ या
अशुभ समझा जायेगा ।
बाल युवा आदि स्वर जानता
जिस समय कोई तिथि में कोई प्रश्न हो उसका विचार करने को तिथि की भुक्त
घड़ी की संख्या को पल बनाकर ५ का भाग देवें जो शेष बचे उससे स्वर समझें ।
स्वर नाम--(१) बाळ (२) कुमार (३) युवा (४) वृद्ध (५) मृत्यु स्वर ।
फल-बाल स्वर = किंचित लाभ ) इनमें से जो स्वर जिसके पञ्चम
कुमार स्वर ८ अद्ध लाभ स्थान में हो वह स्वर मृत्यु देने वाला
युवा स्वर > सवं सिद्धि ? होता है ।
वृद्ध स्वर = हानि |
मृत्यु स्वर = क्षय ]
किसी उद्देश्य से प्रश्न पूछे तो उसके अनुसार फल कहना जैसे--
बाल स्वर युवा स्वर वृद्ध स्वर मृत्यु स्वर
लाभ विषय स्वल्प लाभ राज लाभ लाभ न हो जिस प्रयोजन का
रोग विषय चिर काल तक तत् क्षण क्लेशनाश क्लेश बढे प्रश्न हो उस कारण
रोग
२८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
गमन विषय हानि साफल्य राया न लोटे मृत्यु हो।
रण विषय नाश शत्रु मोरने वाला भंग मृत्यु तथा भंग
100
यह चक्र बहुधा गोल बनाया जाता है परन्तु सुगमता के निमित्त यहाँ चौकोर
बनाया गया है । किसी प्रकार बनाओ परन्तु इसमें कुंडली के १२ स्थान अवश्य होने
चाहिये । इसमें सबसे नीचे भीतर पहिले लग्न कुंडली रहती है उसके ऊपर चंद्र कुंडली
पूरी रहती है और सबसे ऊपर सूर्य कुंडली रहती है जैपा यहाँ बनाया है चक्र देखने से
सब समझ में'आ जायगा।
लग्न कुंडली के अनुसार को ऊपर रखकर लग्न कुडली यहाँ भर दी गई है।
चंद्र जिस राशि पर है वह राशि ऊपर रखकर बीच में पूरी चंद्र कुंडली भर दी गई
है । सबसे ऊपर सूर्यं जिस राशि में है उसे ऊपर रखकर कुंडली रख दी गई है।
यास्तव में लग्न कुण्डली ही है जो यहाँ ३ प्रकार से एकत्र रख दी गई है जिससे कि
तीनों प्रकार की कुण्डली से एक साथ किसी भाग का विचार किया जा सके ।
इसमें विशेषता यही है कि लग्न चंद्र ओर सूर्य तीनों एक भाव में अर्थात् लग्त
भाव में आ जाते हैं । इसी को इस चक्र का लग्न भाव समझकर पूरी सुदर्शन कुण्डली
का विचार ( करना ) अर्थात् लग्न के आगे धन भाव फिर सहज भाव आदि क्रमशः
मानकर उनका फल विचारना ।
यदि सूर्य और चन्द्र लग्न में ही हों तो इस सुदर्शन चक्र की कुण्डली लिखने की
आवश्यकता नहीं रहेगी। सूर्य ओर चंद्र जब पृथक्-पृथक् राशियों में लग्न से अन्य
राशि में हों तब ही इस चक्र द्वारा फल विचारने की आवश्यकता होगी ।
(१) उपरोक्त सुदर्शन चक्र की कुण्डली में लग्न भाव में सूर्य शुभ माना जाता
है अन्य भाव में पाप समझा जाता है । पाप ग्रह की उच्च या स्वराशि में हो तो अशुभ
फल नहीं देगा ।
सुदर्शन चक्र : १८४
(२) जो भाव अपने स्वामी या शुभ ग्रह से युक्त दृष्ट हो उस भाव की वृद्धि होती है
जिस भाव में पाप ग्रह का योग या दृष्टि हो उस भाव की हानि होती है ।
इस प्रकार ग्रहों का शुभत्व और अशुभत्व विचार कर भावों में ग्रहों के योग और
दृष्टि के अनुसार फल विचारना ।
(३) जिस भाव में ग्रह हो उस भाव का फल उसी ग्रह के अनुसार विचारना ।
(४) जिस भाव में ग्रह न हो उस भाव पर जिस ग्रह की दृष्टि हो उसके अनुसार
फल विचारना।
(५) जिस भाव में केवल शुभ ग्रह का योग या दृष्टि हो उस भाव का फल शुभ
जानना ।
जिस भाव में केवल पाप ग्रह का योग या दृष्टि हो उस भाव का फल अशुभ
न जानना ।
जिसमें शुभ और पाप ग्रह दोनों की दृष्टि या योग हों तो मिश्र फल होगा । इसमें
भी शुभाधिक्य से शभ फल पापाधिक्य से अशुभ फल होगा ।
शुभ और पाप ग्रह दोनों बराबर हों तो उनका वल देखकर जिसका बल अधिक
हो उसका फल कहना । इसी प्रकार दृष्टि के सम्बन्ध में भी विचार करना ।
(६) जिस भाव में कोई ग्रह न हो और न किसी ग्रह की दृष्टि हो तो उस भाव
के स्वामी के अनुसार फल विचारना ।
(७) शुभत्व अशुभत्व का विशेष विचार ।
स्वाभाविक शुभ ग्रह यदि सप्त वर्ग में पाप वर्ग में पड़े तो शुभत्व नष्ट हो जाता है ।
स्वाभाविक पाप ग्रह यदि सप्त वर्ग में शुभ वर्ग में पड़े तो शुभप्रद हो जाता है ।
(८) अपनी राशि ओर शुभ ग्रह के वर्ग शुभ होते हैं । पाप ग्रह, शत्रु और नीचराशि के वर्ग अशुभ होते हैं।
( ९) पाप ग्रह भी अधिक शुभ व में हो तो शुभ हो जाता है क्योंकि शुभ वर्ग
में आने से उसका पापत्व नष्ट हो जाता है ।
अशुभ वर्ग में शुभ ग्रह का शुभत्व नष्ट हो जाता है। इससे उसका फल कहा है ।
(१०) इस प्रकार सप्त वर्ग में ग्रहों का वर्ग निकाल कर उनके शुभत्व पर विचार
करना और भावों के भी वर्ग निकालकर उनका भी शुभत्व अशुभत्व पर विचार करना
पश्चात् सुदर्शन चक्र की स्थिति पर विचार कर फळ विचारना ।
( ११ ) सुदर्शन चक्र में राहु केतु का भी विचार होता है इससे इनका भी सप्त
बगे निकाल लेना चाहिये ।
(१२) वर्ग में ५ या अधिक वर्ग में शुभ ग्रह हो तो शुभ । ४ शुभ का वर्ग होने
से मध्यम । कम शुभ वर्ग होने से ग्रह पाप फलप्रद समझा जायेगा जैसा आगे उदा-
हरण देकर बताया है ।
१८६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
ग्रहों का एवं भावों का सप्त वर्ग का उदाहरण सुदर्शन चक्र विचार के लिये ग्रह स्पष्ट भाग
सूर्य ११- ५-४०-४५ लग्न २-२०-११-५३ सप्तम ८-२०-११-५३ चंद्र १०- २- ७-५५ धन ३-१७-१७-५० अष्टम ९-१७-१७-५९ मंगल ७-१२-२९-४४ सहज ४-१४-२४- ६ नवम १०-१४-२४- ६
बुध १०-२०-१६-५६ चतुर्थं ५-११-३०-१३ दशम ११-११-३०-१३
गुरु ९-१३-३४- ९ पंचम ६्-१४-२४- ६ लाभ ०-१४-२०- ६
शुक्र ११-१३-३३-४८ षष्ठ ७-१७-१७-५९ व्यय १-१७-१७-५९
शनि ४- ८-३९-४८
राहु २- ८- ६-३२ केतु ८- ८- ६-३२ ग्रहों का सप्त गर्ग वर्ग सूयं चंद्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु १ गृह १२ गु. ११ श. ८स्व. ११ श. १० श. १२ गु. एसू. ३ बु. ९ गु. रहोरा ४चं. शसू. ४चं. ४चं. ४चं. ४चं. ५सू. श्सू.५सू.
३ द्रेष्काण १२ गु. ११ श. १२ गु. ७ शु. र शु. ४चं. १ सू. ३ बु. ९ गु. ४ सप्तमांश ७ शु. ११ श. ४चं. २३ बु. ७ शु. ९ गु. ६ वु. ४च १०श.
५ नवमांश ५ सु. ७ शु. ७शु. १ मं. र शु. ८मं. ३ बु. ९ गु, ३ बु.
६ द्वादशाँश २ शु. ११ श. १२ गु. ७ शु. ३ वु, ५ सू. ८ मं. १ सू. ११श७ त्रिशाँश ६३ बु. १ सं. १२ गु. ३ बु. १२ गु. १२ गु. ११ श. ११ श. ११श.
शुभप्रद पाप शुभ शुभ शुभ शुभ पाप मध्यम पाप यहाँ वर्ग में चंद्र में पाप का वर्ग अधिक होने से पाप फल । इसी प्रकार शनि व केतु में भी पाप वर्ग अधिक होने से पाप फलप्रद हुआ । राहु में ४ शुभ वर्ग होने से . मध्यम इतर में शुभ वर्ग अधिक होने से शुभ हुए ।
भाग का सप्त गर्ग--(यहाँ ग्रह के स्थान में उस भाव की राशि और भावेश लिखना )
वर्गे लग्न धन तृतीय चतुर्थ पंचम षष्ठ सप्तम अष्टम नवम दशम आय व्यय
MR २ - उ... ७ SAE EN 11. ५१९२ १ गृह ३वु. ४चं. ५सूः इवु. ७शू. ममं. ९गु. १०श. ११श. १२गु. १मं. रशु. रहोरा एसू. ५सू. ४चं. डच. ५सू. ५सू. ४चं. सू. शसू. अचं. ५मू, ५सू- ३२ ७सू. पमं. ९गु. १०श. ११श. १२गु. सू, रशु. बु. ४चं. ५सू- ६बु. सप्त, शसू. रशु. ऽमं. रशु. १०श. ६बु. १मं. ८मं रसू. ८मं. ४चं. १२गुः शचव० १०सु. ९गु. शसू. १मं. ११श. ९गु. ७शु. ३बु. ११श. ७शु. ५सू. ३बु. ६द्वाद० ७ऽशु, १०श, ११श. १०श. १२गु. रेश. ५सू. ४चं. ४चं. ४चं. इवु. पम. ७त्रिशांश ९गु. १रगु. ९गु. ६बु. ९गु. १२गु. उबु. १२गु. ९गु. ६बृ. ९गु. १२गु-
सुदर्शन चक्र : १८७
सुदर्शन कुण्डली चक्र के अनुसार भाव फल विचार 2
१--लनन में ५ ग्रह सू० शु० चं० बु० ओर राहु हैं । इतमें सप्तवर्ग में शुभ वर्गंकी
अधिकता से शुभ है । शुक्र बुध भी शुभ वर्ग की अधिकता-से शुभ हैं। चंद्र पाप वर्ग
अधिक होने से पाप और राहु मध्यम है । शुभ ग्रह की अधिकता है इससे शरीर सुख
उत्तम रहेगा । शील आदि भी उत्तम रहेगा । लग्न में भी ४ शुभ वर्ग है सूर्य में भी
वर्ग के अनुसार शुभता आ जाने से २ वर्ग में शुभ हुआ केवल एक शनि पाप फलप्रद
` है। इससे लग्न में भी शुभ वर्ग की अधिकता से शुभ गुण आदि होंगे । '
२--धन भाव में केवळ सूर्य और शुक्र हैं । वर्ग के अनुसार ये दोनों ग्रह शुभप्रद
हैं इससे धनवान् होगा । घन भाव में वर्ग में ३ शुभ ग्रह हैं २ शुभप्रद ओर २ पाप फल
प्रद ग्रह हैं। शुभता अधिक होने से सन्माग से धन का संग्रह होगा । शुभ ग्रह गुरु की
दृष्टि होने से भी घन भाव सम्वन्धी शुभ फल होगा ।
३-- सहज भाव-में केवल शनि है जो पाप ग्रह भी है और पाप फलप्रद है क्योंकि
वर्ग में पाप का वर्ग अधिक है भाव में २ शुभ वर्ग २ पापप्रद, ३ शूभप्रद वर्ग हैं। भाव
में शुभता अधिक है । इसमें स्वस्थानी मंगल की दृष्टि है जो वर्ग में शुभप्रद है । इससे
इस भाव सम्बन्धी .फल मध्यम रहेगा ।
३---चतुर्थ भाव-केवल राहु मध्यम फलप्रद या उदासीन ग्रह है । इसमें ४ शुभ ग्रह
का वर्ग है। १ स्थान में शुभप्रद मंगल है। २ स्थानों में शनि पापफल प्रद है। इस
कारण साधारण सुख, मातुसुख, वाहन सुख आदि रहेगा ।
५--पंचम में-केवळ राहु मध्यम फलप्रद है । इस भाव में ३ शुभ वर्ग, १ स्यान
में शुभ सूर्य की २ स्थानों में शनि पापप्रद का वर्ग है । इससे इस भाव सम्बन्धी विद्या
सन्तान आदि का सुख साधारण रहेगा ।
५--रिपुभाव-शनि और मंगल । वर्ण में मंगल शुभप्रद है । शनि पापप्रद है। इस
भाव में ५ शुभ ग्रह के वर्ग हैं। शेष सूर्यं ओर मंगल भी शुभप्रद हैं। इसलिए शत्रु
और रोगभय नाममात्र को रहेगा । शत्रु और रोग होने पर इनपर विजय होगी ।
७--जाया भाव-इसमें केतु और शनि दोनों पापग्रह हैं ओरं वग में पाप फलप्रद
होने से स्त्रीसुख का अभाव रहेगा । भाव में ४ शुभ ग्रह का वर्ग है । २ स्थानों में सूर्य
१ में मंगळ का वर्ग है जो शुभप्रद है। इससे अल्प स्त्रीसुख भी होगा ।
८--मृत्यु भाव-में केवळ गुरु शुभ फलश्रद है। अष्टम भाव में ४ शुभ ग्रह का वगं
है १ वर्ग सूयं का शुभप्रद, १ मंगळ का शुभप्रद है और १ शनि का पापप्रद है | शुभ
की अधिकता होने से जीवन में सफलता हो आयु पूर्णायु के लगभग हो ।
९--धर्म भाव-इसमें चन्द्र बुध और मंगल ग्रह हैं । चन्द्र पाप फलप्रद है शेष बुध
और मंगल शुभप्रद हैं । इस भाव में ४ शुभ ग्रह का वर्ग है २ वर्ग शनि के पापप्रद १
` सूये का शुभप्रद है । शुभ की अधिकता होने से धर्मशील हो, यात्रा में सफलता मिले ॥:
१८८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
१०--कमे भाव-इसमें ४ ग्रह सूर्य शुक्र मंगल केतु हैँ । केवळ केतु पाप फलप्रद है
शेष ग्रह शुभप्रद हैं । भाव में भी ६ शुभ ग्रह के वर्ग हैं १ मंगळ शुभप्रद है। भाव में
शुभता अधिक है । इससे पितृसुख राजसम्मान आदि अच्छा रहेगा ।
११--लाभ भाव में-गुर ओर केतु हैं । केतु पापप्रद है । गुरु शुभप्रद है । भाव में
३ शुभ ग्रह के वर्ग हैं सूर्यं के १ मंगल का वर्ग है जो शुभप्रद हैं। इससे छाभ अधिक
और नीति पूर्वक हो ।
१२--व्यय भाव में-गुरु चन्द्र बुध हैं । यद्यपि तीनों शुभ ग्रह हैं परन्तु चंद्र पाप
फलप्रद है । भाव में ५ शुभ ग्रह का वर्ग १ सूर्य का १ मंगल का वर्ग है दोनों शुभ प्रद
हैं । इससे आय से खर्च कम ओर शुभ कार्यों में खर्चे होगा ।
सुदर्शन चक्र दशा का उदाहरण
राशिलग्न ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १
एऐं TO NO १०१ १ ५
मास ० २० ० ० ० ० ° ० ० ०
सम्वत् १९४७४८ ४९ ५० ५१ ५२ ५३ ५४ ५५ ५६ ५७ १९५८
सूर्यं राशि ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११
अंश (0 CU 05 FU Cl SI Ut ON TR
कला ४० Yo ४० ४० Yo Yo Yo Yo ४० ४० ४० ४०
१ र
१ १
० ०
प्रथम वर्ष की अन्तदेशा
राशि ३0४0 ४00 ७ ८! 7९- १० ११" १२
मास १ पे अप १ “१ १ १ १ १ १
दिन ० ० ० ° ° ० ° ० ° ०
सम्वत् १९४६ १९४७ ४७ ४७ ४७ ४७ ४७ ४७ ४७ ४७ ४७ १९४७
सूर्य राशि ० १२ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११
अश 4 ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ षु
कला Yo . ४० ४० २० ४० ४० ४० ४० ४० ४० ४० ४०
प्रथम प्ररयंतर्देशा
राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १ २
दिन २ २ २ २ र र रे २ २ २२२
घडी ३० ३० २० ३० ३० ३० ३० २० ३० ३० २० २०
सूयं राशि ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ COMO
'अ० ८ १० १३ १५ १८ २० २३ २५ २८ ० ३%
क्० १० ४० १० ४० १० ४० १० ४० १० ४० १० ४०
लग्न कुण्डली का लग्न है उसकी दशा १ वर्ष रहेगी । इसी प्रकार प्रत्येक भावकी
~ लक बार TP? नमक SIN
कोंटचक्र : १८९
दशा एक-एक वर्ष रहेमी । इसी प्रकार कुण्डली के पूरे १२ भाव में पूरे १२ वर्ष दशा
भोग करेगी इसके पश्चात् फिर लग्न आदि भाव को दशा आरम्भ हो जाती है अर्थात्
१३ वें वर्ष फिर लग्न दशा भा जाती है । यदि किसी की आयु १२० वर्ष की हो तो
इस दशा की १० आवृत्ति हो जायेंगी । १ दशा १ वर्ष रहती है इसकी अन्तर्देशा १-१
मास की होती है । १२ भाव में पूरे १ वर्ष अन्तर्दशा के हो जाते हैं और प्रत्यन्तर्दशा
केवल २॥ दिन की होती है १२ भाव में पूरे ३० दिन (१ मास ) हो जाते हैं । यहाँ
चक्र देखने से स्पष्ट समझ में आ जायगा ।
इसके पश्चात् इसी प्रकार और वर्ष मासादि जोड़कर आगे की दशा या अन्तदंशा
आदि निकाल लेनी चाहिए ।
सुदर्शन चक्र व दिशा का फल विचार
१--जिस भाव व दिशा हो उस भाव का लग्न मानकर उससे तनु घन सहज आदि
१२ भाव क्रम से विचार कर उससे सम्पूर्ण १२ भाव का फल विचारना ।
२--दंशा आरंभ कालिक लग्न से केन्द्र, कोण ओर ८ भाव में शुभ ग्रह हो तो
वह दशा शुभ समझना ।
३--जिस भाव में केवल राहु या केतु हो उस भाव की हानि। ४--जिस भाव में अधिक पाप ग्रह हों उस भाव की हानि ।
५--१२,६ भाव से दूसरे स्थानों में शुभ ग्रह हो तो उस भाव का फल शुभ ४
यदि १२,६ भाव में शुभ ग्रह हो तो उस वर्ष आदि में रोग शत्रु आदि की वृद्धि हो।
६--यदि ३-६-११ भाव में पाप ग्रह हो तो इनका फल शुभ अन्य भाव में पाप
ग्रह हो तो उस भाव की हानि होती है ।
७--इसमें अष्टकवग के अनुसार भी फल विचारना । दोनों प्रकार से शुभ या
अशुभ आवे तो पूर्ण रूप से शुभ या अशुभ फल कहना । इस प्रकार से शुभ दूसरे
प्रकार से अशुभ आवे तो उनके बल का विचार कर फल कहना जिससे फल की
अधिकता हो वह फल कहना ।
कोट चक्र-युद्ध या रोगादि फल जानने को
१९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फित खण्ड
(१) जन्म नक्षत्र का स्वामी कोटेश है । (२) कचट आदि वर्ग का स्वामी जन्म
नक्षत्र या नाम के अनुसार वर्गेश होता है । वर्गश-कोटपाल है ।
अ वर्ग का स्वामी-सुर्ये, क वर्ग का स्वामी=मंगळ, च वर्ग का स्वामी: शुक्र,
ट वर्ग का स्वामी=बुध, त वर्ग का स्वामी=गुरु, प वर्ग का स्वामी-शनि,
य रल व का स्वामी=चंद्र, श स से क्ष तकस्चन्द्र ।
जैसे किसी का नाम आकार से है तो अ वर्ग हुआ जिसका स्वामी सूर्य है इससे
कोटपाल सूर्य हुआ ।
अ कृत्तिका नक्षत्र का पहिला चरण है मेष राशि है। मेष राशि का स्वामी मंगल
है इससे कोटेश मंगल हुआ है |
पचांग में गोचर के ग्रह देखना किस-किस नक्षत्र में है । यहाँ कोट चक्र में दिये
नक्षत्रों में जो ग्रह जिस नक्षत्र में हो वहाँ स्थापित करे ।
युद्ध में कोट ( किला ) भंग होगा या रोग अच्छा होगा या नहीं आदि का
“विचार होता है ।
फल विचार--जब कोटेश कोट के मध्य में हो तथा कोटपाल बाहर हो तो कोट
को भय नहीं होता । इसके विपरीत हो तो विघ्न होता है।
दुर्ग के मध्य में सूर्यं हो--जल या शेष हो ।
दुर्गे के मध्य में चन्द्र हो=भँग सूर्यं शनि मंगल राहु केतु } दुगे भंग हो
-दुगे के मध्य में मंगल हो-दाह सब दुर्ग के मध्य में
दुगे के मध्य में बुध हो-राजा युद्ध युक्त हो गुरु वुध शुक्रचन्द्र वे | इन्द्रसे भी वह
दुर्ग के मध्य में गुरु हो=बहुत सुभिक्ष हो चारों दुगं के मध्य में } दुर्ग न गिरे
और राजा का चित्त चलायमान हो ।
दुर्गे के मध्य में शनि हो=भेद भग हो
दुर्गे के मध्य में राहु केतु=राजा विष में जल जावे ।
सूर्य कालानल चक्र
Me ia २८ २७ कृ, भर» अधिव्सी शवनी उ
जहाँ एक अश्विनी लिखा है वह त्रिशूल का दण्ड मूल है । यहाँ अश्विनी यत
सूयंकालानल चक्र : १९१
लिखना गोचर में सूर्य जिस नक्षत्र में है वह नक्षत्र यहाँ लिखना । इस प्रकार अभिजित सहित २८ नक्षत्रों के नाम आगे क्रमानुसार लिख देना यहाँ बताये हुए बाई ओर से क्रमशः लिखना। अपने नाम का नक्षत्र जहाँ हो वहाँ लिख देना इससे रोग विवाद, युद्ध, यात्रा आदि में इससे विचार होता है ।
फल
१--नीचे (त्रिशूल वाली रेखा के नीचे) के नक्षत्रों में अपना जन्म नक्षत्र पड़े तो
क्रम से १-चिन्ता २-वध ३-सव कार्यों में रकावट हो ।
२--दोनों श्व्ग में-रोग और भय ।
३--त्रिशुल में मृत्यु ।
४--शेष नक्षत्रों में-जय लाभ अभीष्ट सिद्धि हो :
४--जन्म राशि से ग्रहों के वेध का इस प्रकार फल होगा
सूर्य के वेध से-मन को ताप गुरु के वेध से-धन लाभ ।
मंगल के वेध से-द्रव्य हानि शुक्र के वेध से-रत्न लाभ ।
शनि के वेध से-रोग जन्य पीड़ा चन्द्र के वेध से-स्त्री लाभ ।
राहु केतु.के वेध से-मृत्यु बुध के वेध से-सुख ।
'डिभ चक्र या सूर्य नराकार चक्र--
सूर्य जिस नक्षत्र में हो उसे सिर पर स्थापित कर वहाँ से जन्म नक्षत्र तक गिनने
में जिस अंग पर जन्म नक्षत्र पड़े उससे निम्नलिखित फल का विचार करे ।
नक्षत्र संख्या अंग फल
३--सिर-श्रेष्ठ रत्न, सोना, सुन्दर वस्त्र, भोजन, राज्य सुख प्राप्त ।
४--मुख-मिष्ट भोजन, शैया आदि आसनों का भोगी व बोलने वाला, हंसता
मुख सदा प्रसन्न चित्त ।
१--दाहिना कंधा-व्ंश में भूषण समान, बड़े उत्सव युक्त, अति उदार, बड़ा
शूर वीर ।
१---बायाँ कंधा-अग्रणी, हाथी पर चढ़ने वाला ।
२--दाहिनी बाँह-अपने देश को त्यागे, बड़ा अभिमानी, वीरता युक्त परदेश में
रहकर ।
१--बाई' बाँह-बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त करता है, स्थान भ्रष्ट ।
१--दाहिना हाथ-उदार, श्रेष्ठ गुणरहित,व्यापार में .रत्नों की परीक्षा करनेवाला ।
पृ--बायाँ हाथ-सच और झूठ सहित चोर हो ।
५--हृदय में-स्व कुटम्ब में राजा के समान श्रेष्ठ शील वाला, शास्त्र में प्रवीण
विशाल श्रेष्ठ यज्ञस्वी व समर्थ ।
१--नाभि-दयालु, युद्ध में डरपोक, शास्त्र में प्रवीण, धर्म में वृत्ति, निरन्तर
उदार अनेक कला जानने वाला, थोड़े में संतोष ।
१--मुंह्मय-बड़ा कामी, साधु कर्मो से हीन, गीत और नृत्य में प्रेम, कलाओं को जानने
वाला, बड़ा यश वाला ।
१९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(१) जन्म नक्षत्र का स्वामी कोटेश है । (२) कचट आदि वगं का स्वामी जन्म
नक्षत्र या नाम के अनुसार वर्गेश होता है । वर्गश-कोटपाल है ।
अ वर्ग का स्वामी=सू्ये, क वगे का स्वामी=मंगल, च वर्ग का स्वामी- शुक्र,
ट वर्ग का स्वामीस्बुध, त वर्ग का स्वामी=गुरु, प वर्ग का स्वामीच्शनि,
य र र व का स्वामी=चंद्र, श स से क्ष तक-चन्द्र ।
जैसे किसी का नाम आकार से है तो अ वर्ग हुआ जिसका स्वामी सूर्य है इससे
कोटपाल सूर्य हुआ ।
अ कृत्तिका नक्षत्र का पहिला चरण है मेष राशि है। मेष राशि का स्वामी मंगल
है इससे कोटेश मंगल हुमा है ।
पचांग में गोचर के ग्रह देखना किस-किस नक्षत्र में है । यहाँ कोट चक्र में दिये
नक्षत्रों में जो ग्रह जिस नक्षत्र में हो वहाँ स्थापित करें।
युद्ध में कोट ( किला ) संग होगा या रोग अच्छा होगा या नहीं आदि का
“बिचार होता है ।
फल विचार--जव कोटेश कोट के मध्य में हो तथा कोटपाल बाहर हो तो कोट
को भय नहीं होता । इसके विपरीत हो तो विघ्न होता है।
` दुर्गे के मध्य में सूयं हो--जल या शेष हो ।
दुर्गे के मध्य में चन्द्र हो=भँग सुर्यं शनि मंगल राहु केतु] दुगं भंग हो
दुर्ग के मध्य में मंगल हो=्दाह सब दुर्ग के मध्य में }
दुगे के मध्य में बुध हो=राजा युद्ध युक्त हो गुरु वुध शुक्रचन्द्र वे ) इन्द्रसे भी वह
दुर्ग के मध्य में गुर हो=बहुत सुभिक्षहो चारों दुगं के मध्य में | दुर्ग न गिरे
और राजा का चित्त चलायमान हो ।
दुर्ग के भध्य में शनि हो=भेद भग हो
दुर्गे के मध्य में राहु केतु-राजा विष में जल जावे ।
सुर्यं कालानल चक्र
न्ट ‘Se उन्चारै
पुष्य ८ 2२ अभिः
पुन« ७ २३ ०
ET 4
बन्य ३३ शनः
3 22, < 3७ झू भरब उपिव शवसन उ
जहाँ एक अश्विती लिखा है वह त्रिशूल का दण्ड मूल है । यहाँ अश्विनी मत
डे
सुयंकालानल चक्र : १९१
'लिखना गोचर में सूयं जिस नक्षत्र में है वह नक्षत्र यहाँ लिखना । इस प्रकार अभिजित सहित २८ नक्षत्रों के नाम आगे क्रमानुसार लिख देना यहाँ बताये हुए बाई ओर से क्रमशः लिखना । अपने नाम का नक्षत्र जहाँ हो वहाँ लिख देना इससे रोग विवाद, युद्ध, यात्रा आदि में इससे विचार होता है।
फल
१--नीचे (त्रिशूल वाली रेखा के नीचे) के नक्षत्रों में अपना जन्म नक्षत्र पड़े तो क्रम से १-चिन्ता २-वध ३-सब कार्यों में रुकावट हो ।
२--दोनों श्युग में-रोग और भय ।
३--त्रिशूल में मृत्यु ।
४--शेष नक्षत्रों में-जय लाभ अभीष्ट सिद्धि हो :
५--जन्म राशि से ग्रहों के वेध का इस प्रकार फल होगा
सूर्य के वेध से-मन को ताप गुरु के वेध से-धन लाभ।
मंगल के वेध से-द्रव्य हानि शुक्र के वेध से-रत्न लाभ ।
शनि के वेध से-रोग जन्य पीड़ा चन्द्र के वेध से-स्त्री लाभ।
राहु केतु के वेध से-मृत्यु बुध के वेध से-सुख ।
'डिभ चक्र या सूर्य नराकार चक्र--
सूर्यं जिस नक्षत्र में हो उसे सिर पर स्थापित कर वहाँ से जन्म नक्षत्र तक गिनने
में जिस अंग पर जन्म नक्षत्र पड़े उससे निम्नलिखित फल का विचार करे ।
नक्षत्र संख्या अंग फल
३--सिर-श्रेष्ठ रत्न, सोना, सुन्दर वस्त्र, भोजन, राज्य सुख प्राप्त ।
४--मुख-मिष्ट भोजन, शैया आदि आसनों का भोगी व बोलने वाला, हंसता मुख सदा प्रसन्न चित्त।
1--दाहिना कंधा-त्रंश में भूषण समान, बड़े उत्सव युक्त, अति उदार, बड़ा "शर वीर ।
१--बायाँ कंधा-अग्रणी, हाथी पर चढ़ने वाळा ।
२-दाहिनी बाँह-अपने देश को त्यागे, वड़ा अभिमानी, वीरता युक्त परदेश में रहकर ।
१--बाई बाँह-बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त करता है, स्थान भ्रष्ट ।
१--दाहिना हाथ-उदार, श्रेष्ठ गुणरहित,व्यापार में रत्नों की परीक्षा करनेवाला ।
१--बायां हाथ-सच और झूठ सहित चोर हो ।
५--हृदय में-स्व कुटम्ब में राजा के समान श्रेष्ठ शील वाला, शास्त्र में प्रवीण विशाल श्रेष्ठ यज्ञस्वी व समर्थ ।
१--वाभि-दयालू, युद्ध में डरपोक, शास्त्र में प्रवीण, धमं में वृत्ति, निरन्तर
उदार अनेक कला जानने वाळा, थोड़े में संतोप ।
६--गुह्य-वडडा कामी, साधु कर्मो से हीन, गीत और नृत्य में प्रेम, फलाओं को जानने चाला, बड़ा यश वाळा ।
१९२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
२--जानु-अनेक देश में अनेक तरह का प्रचार करने वाला, कार्य में उत्साही,
चञ्चल, दुर्बल देह, धूतं, सत्यहीन, दुःखी । 9
३--दाहिना पैर-खेती की क्रिया में कुशळ, थोड़ा कमं करने वाला, शत्रु रहित ।
३--बाँयाँ पैर-सेवा का काम करने वाला, अल्पात्रु, निर्धन ।
योग २७--मतांतर-कोई जानु में ६ नक्षत्र और पैर में केवल २ ही नक्षत्र लेते
हैं । परन्तु बहुमत उपरोक्त ही है।
` » जन्म नक्षत्र अनुसार आयु विचार--
३--नक्षत्र मस्तक में-आयु१०० वर्ष । ३-नक्षत्र मुख में-आयु ८० वर्ष । २-नक्ष त्र
कंधों में-आयु ७७ वर्ष, २-नक्षत्र दोनों भु जा, २-नक्षत्र दोनों हाथ-५ नत्रक्ष हृदय में
आयु ६८ वर्ष । १-नक्षत्र नाभि-आयु ६८ । १-नक्षत्र गुह्य-आयु ६० वर्ण । २-नक्षत्र
दोनों जानु--आयु ८ वर्ष । ६--नक्षत्र दोनों पाँव--आयु ६ वर्ण । स्त्री डिभाख्य चक्र--
यह विशेषकर स्त्रियों के लिए है ।
सूयं जिस नक्षत्र पर हो उससे जन्म नक्षत्र गिनने में जहाँ पड़े उसका फल ।
नक्षत्र अंग फल
३“ मस्तक- संताप
७-- मुख “ मिष्ठान्न देने वाला
८-- स्तन ---काम का देने वाला
३-- हृदय --पति को सुख देवे ०
३--- गुह्य --कोमता सदा ही पूर्ण करे
चन्द्र कालानल चक्र
१६ १२ १४ यह गोलाकार भी बनाया जाता है । इस चक्र में सबसे ऊपर जहाँ १ लिखा है यहाँ गोचर के अनुसार वर्तमान दिन नक्षत्र अर्थात् चन्द्र नक्षत्र 'लिखे वहाँ से यहाँ बताये
ककल ७
पुरुषाकार चक्र : १९३
क्रमानुसार सब नक्षत्र इस चक्र में बताये अनुसार लिख-देखेँ। जिस नक्षत्र पर अन्य
नक्षत्र हो वहाँ लिख देवें फिर फल विचारे ।
इससे भी युद्ध के समय यात्रा आदि में फल विचारते है ।
जन्म नक्षत्र जहाँ पड़े उसका फल
यदि त्रिशूल पर जन्म नक्षत्र पड़े - मृत्यु हो ।
यदि बाहर के ८ नक्षत्रों में पड़े--मध्यम फल ।
यदि भीतर के ८ नक्षत्रों में पडे-निःसंदेह जय लाभ हो आयु बढ़े आदि शुभ फल हो। -
सूर्य कालानल चक्र में जो ग्रहों के वेध का फल बताया है उसी प्रकार चन्द्र-काला-
नल चन्द्र से भी विचारे ।
ग्रहों का पुरुषाकार चक्र .
प्रत्येक ग्रहों के पुरुषाकार चक्र से फल का विचार होता है उस ग्रह के नक्षत्र से
जन्म नक्षत्र के फल का विचार होता है।
१--चन्द्र पुरुषाकार चक्र--३ नक्षत्र मस्तक-धन प्राप्ति । ३ नक्षत्र मुख-पूणं
लक्ष्मी । ६ भुजा-कुशल । ३ हृदय-कल्याण । ३ पेट-मागं में मृत्यु । ३ गुदा-लक्षमी ॥
६ पाँव-श्रेय प्राप्त ।
( गोचर में चन्द्र जहां हो उससे गिनकर जन्म नक्षत्र जहाँ पड उसके अनुसार
क्रशमः फल ) जन्म नक्षत्र से वर्तमान चन्द्र नक्षत्र तक गिनने से जो संख्या आवे उसके:
अनुसार फल-६ नक्षत्र मुख में-हानि । ६ नक्षत्र पीठ में-धन लाभ । ६ नक्षत्र हाथ में
राजा से भय। ३ नक्षत्र गुह्य मे-राजाओं से मान । ३ नक्षत्र चरण में-स्यान से भ्रष्ट ॥
३ नक्षत्र कण्ठ में-सव सुख प्राप्त ।
२- मंगल का पुरुषाकार चक्र--गोचर में मंगल जहाँ हो उससे आरम्भ कर
जन्म नक्षत्र जहाँ पड़े उसका फल-३ नक्षत्र-मस्तक-राज्य । ३ नक्षत्र-मुख-रोग । ३
नक्षत्र-नेत्र-सुख । २ नक्षत्र-कण्ठ-रोग । ४ नक्षत्र-हाथ-रोग। ५ नक्षत्र पेट-धन ।
३ नक्षत्र-गुदा -भ्र मयुक्त । ४ नक्ष त्र-पांव-भ्रम युक्त ।
३--बुघ का पुरुषाकार चक्र (जहाँ गोचर में बुध हो उससे जन्म नक्षत्र तक
संख्या अनुसार फल) ४ नक्षत्र सिर में--राज्य । नक्षत्र मुख में-वांछित भोजन ।
४ नक्षत्र चायाँ हाथ-कष्ट। ४ नक्षत्र दाहिना-सुख। ६ नर'त्र हृदय-सुख । ४ नक्षत्र
गुदा-रोगी । २ नक्षत्र पेर-मन में भ्रम ।
४--गुह का पुरुषाकार चक्र
जिस नक्षत्र पर गुरु गोचर में हो उससे जन्म नक्ष त्र तक गिनने में जो संख्या हो .
उसका फल ।
४ नक्षत्र सिर में--राज्य । ४ नक्षत्र. कंघा में-लक्ष्मी प्राप्ति । १ नक्षत्र कठ में-
विभूति प्राप्त । श्नक्षत्र हृदयःप्रीति छाभ । धुनक्षत्र पांव-मीड़ा । ४ नक्षत्र यायां हाथमृत्यु । ३ नक्षत्र दोनों नेत्र-राजा सम सुख ।
१३
१९४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
क का पुरुषाकार चक्र *
वा नक्षत्र पर शुक्र हो उससे जन्मनक्षत्र तक गिनने से जो संख्या आये उसका
फल । ४ नक्षत्र सिर में-राज्य । ५ नक्षत्र कंठ में-धन छाभ। ५ नक्षत्र हृदय में-सुख ।
३ नक्षत्र गुदा में-शत्रुभय । ५ नक्षत्र जांघ में--मिष्ट भोजन । ३ नक्षत्र दाहिने पाँव
में-सुख । २ नक्षत्र वायां पाँव में-सुख ।
६--राहु का पुरुषाकार चक्र
जिस नक्षत्र पर राहु गोचर में हो उससे गिंनने पर जन्म नक्षत्र जहाँ पड़े उसका
फल । ७ नक्षत्र पांव में-धन हानि । ५ नक्षत्र दाहिनी भुजा में-संताप । ३ नक्षत्र सिर
में-शत्रभय । २ नक्षत्र हृदय में-दुजेन से स्नेह । १ नक्षत्र मुख में-दुजन संहार ।
५ नक्षत्र बायाँ हाथ में मृत्यु । १ नक्षत्र नाभि में-सवेनाश । २ नक्षत्र गुदा में--
प्राणनाश । ७--केतु पुरुषाकार चक्र है.
गोचर में केतु जिस नक्षत्र में हो वहां से शिनने पर जन्म नक्षत्र जहां पड़े उसका
फल | ४ नक्षत्र सिर में-जय । २ नक्षत्र मुख में>भय । ५ नक्षत्र कान में-भय ।
२ नक्षत्र हृदय में-शोक । ४ नक्षत्र हाथ-सुख । ५ नक्षत्र पांव में सुख । ४ नक्षत्र वस्ति
में भ्रम, दुःख विकार ।
स--शनि पुरुषाकार चक्र न
जिस नक्षत्र पर शनि हो उससे गिनने पर जन्म नक्षत्र जहाँ पड़े उसका फल-जेसे
श्रवण पर शनि है जन्म शतभिषा नक्षत्र का है तीसरा हुआ दक्षिण भुजा पर आया
फल जय है-१ नक्षत्र मुख में-हानि । ४ नक्षत्र दक्षिण भुज-जय । ६ नक्षत्र चरण में
भ्रम । ५ नक्षत्र हृदय में-श्रीप्राप्ति । ४ नक्षत्र वामकर में-भ य । ३ नक्षत्र शीर्ष में-
राज्य । २ नक्षत्र नेत्र मे-सोख्य । २ नक्षत्र गुह्य में-मृत्यु भय ।
जन्म नक्षत्र से शनि नक्षत्र तक गिनने में जो आवे उसका फल--१ नक्षत्र सिर
में-फल रोग । ३ नक्षत्र मुख में-छाभ । २ नक्षत्र गुह्य में-हानि । २ नक्षत्र नेत्र में--
रूाभ। ५ नक्षत्र हृदय में-सोख्य । ४ नक्षत्र वाम हस्त में-वंधन । ३ नक्षत्र वाम पद में
दुःख, पीड़ा । ३ नक्षत्र दक्षिणपद में-इष्ट यात्रा । ४ नक्षत्र दक्षिण हस्त-अथे लाभ!
चक्रो शनि का पुरुषाकार चक्र -
यदि शनि वक्री हो तो शनि जहाँ हो वहाँ से जन्म नक्षत्र तक गिनके यहां विरुद्ध
क्रम से गिनने से जो आये उत समय फन्न जानना-१ नक्षत्र सिर में-अति पीड़ा । ४
नक्षत्र दाहिने हाथ मॅ-लक्ष्मी और यश प्राप्त । ६ नक्षत्र दोनों पैरों में-निष्फलता । ४
नक्षत्र वाम हस्त मे-युद्ध में शरीर में संशय ।५ नक्षत्र पेट मे-द्रव्य । ३ नक्षत्र मस्तक
में-राज्य सौर्य । २ नक्षत्रनेत्र मे-परम सोख्य । २ नक्षत्र गुह्य में-अल् मृत्यु ।
यहाँ पहिले सिर या १ मुख, २ गुह्य, २ नेत्र, ३ मस्तक, ५ पेट, ४ बायांहाय
« ६ दोनों पर, ४ दाहिना हाथ इस प्रकार विरुद्ध क्रम से नक्षत्रों की गिनती कर जन्म
नक्षत्र जहाँ पडे उसका फल जानना ।
गजादि चक्र : १९५
अन्यमत से वक्रो शनि का पुरुषाकार चक्र
जिस नक्षत्र पर वक्री शनि हो उस नक्षत्र से जन्म तक का फल विलोम (उल्टो
क्रम से विचारना ४ नक्षत्र दाहिना हाथ फल-रोग । ६ नक्षत्र पैर-छाभ। ४ नक्षत्र
चाँया हाथ-द्रव्य लाभ । ५ नक्षत्र पैर-बन्धन । ३ नक्षत्र मस्तक-पूजा । २ नक्षत्र नेत्रजन सौख्य । ३ नक्षत्र गुदा-अल्प मृत्यु ।
गज चक्र
यात्रा और युद्ध में जय का विचार इससे होता है । अभिजित सहित २८ नक्षत्र
हाथी का चित्र बनाकर क्रमानुसार लिखना। पहिले मुख से लेकर निम्न क्रम से नक्षत्र
{लखे और उसके अनुसार फल विचारे---
२ नक्षत्र मुख में = युद्ध में विजय
२ नक्षत्र सूंड के अग्र भाग में = युद्ध में विजय
२ नक्षत्र नेत्रों में = युद्ध में विजय
२ नक्षत्र कर्णो में = वली हो तब भी मृत्यु या भंग हो
२ नक्षत्र सिर में = जीत
८ नक्षत्र पाँच में = बली हो तब भी मृत्यु या भंग
२ नक्षत्र पूँछ में = बली हो तब भी मृत्यु या भंग
४ नक्षत्र पीठ में = बली हो तब भी मृत्यु या भंग
४ नक्षात्र पेट में = युद्ध में जीत
यहाँ बताये अशुभ अङ्ग में यदि शनि हो तो युद्ध, राज्याभिषेक आदि सवथा
वर्जित है ।
अश्व चक्र
यात्रा, युद्ध, राजतिळक आदि में इसका विचार होता है ।
घोड़े का चित्र बनाकर अभिजित सहित २८ नक्षत्र उसके मुख से लेकर नीचे
बताये क्रम से लिखे फिर उसके फल का विचार करे ।
२ नक्षत्र मुख = शत्रु हार कर वश हो जावे
२ नक्षत्र नेत्र ८ शत्रु हार कर वश हो जावे
२ नक्षत्र काना = शत्रु हार कर वश हो जावे
२ नक्षत्र सिर = शत्रु हार कर वश में हो जावे
२ नक्षत्र पूंछ = विभ्रम, भंग और हानि
८ नक्षत्र पाँव = विश्वम, भंग और हानि
५ नक्षत्र पेट = विश्रग, भंग और हानि
५ नक्षत्र पीठ = विभ्रम, भंग और हानि
जिस नक्षत्र में शनि हो उसके अनुसार फळ का विचार करे ।
यमदंष्ट्रा चक्र
यह काळ चक्र सर्पाकार होता है वतमान दिन नक्षत्र से अर्थात् गोचर फे चन्द्र
१९६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
नक्षत्र से लेकर जन्म नक्षत्र तक गिन कर विचार करना । जहाँ जन्म नक्षत्र पड़े उसके
अनुसार फल विचारना ।
ज्वर आने पर, सपं आदि विष युक्त जीवों के काटने पर, विवाद, विग्रह और रण
में इस चक्र में शुभाशुभ का विचार होता है ।
इसमें ९ नक्षत्र ऊपर, ९ नक्षत्र तिरछे, ९ नक्षात्र नीचे सर्पाकार लिखना । इसमें
मध्य के अर्थात् बीच में आरम्भ के ३ नक्षत्र कालमुख हैं कोण स्थित जो चन्द्राधिष्ठित
नक्षत्र होते हैं वे दोनों द्रेष्ट्रा ( दाढ ) हैं ।
जन्म नक्षत्र मुख या द्रष्टा में पड़े तो=मृत्यु जन्म नक्षत्र के योग से ४० घड़ी
इनको छोड़ दूसरे स्थानों में पड़े तो -शुभ का वेध होता है।
यम द्रष्ट्रा चक्र ( वर्तमान चन्द्र नक्षत्र से आरम्भ करना )
आदि अश्वि० आर्द्रा" पुन० उ०फा० हस्त ज्ये० मूल० शत० पू०भा०
मध्य भरणी मृग० पुष्य प्०फा० चित्रा अनु० पृ०षा० धनि० उ०भा०
अन्त कतिका रोहि० अश्ले० मघा स्वा० वि० उ०षा० श्रवण रेवती
त्रिनाड़ी चक्र
यह भी सर्प के आकार फां होता है आर्द्रा से मृगशिर तक २७ नक्षत्र इसमें रहते
हैं। प्रथम कोष्ठ में आर्द्रा, मध्य में मूल, अन्त कोष्ठ में मुगशिर आ जाता है । इसमें
दैनिक चन्द्र नक्षत्र, सूर्य नक्षत्र और जन्म नक्षत्र लिखा जाता है | इससे विवाद, संग्राम
रोग आदि का विचार होता है ।
(१) सूर्य चन्द्र और जन्म नक्षत्र एक नाड़ी ( नक्षत्र ) में हो तो-मृत्यु होती है।
इस दिन विवाद विग्रह संग्राम आदि नहीं करना ।
(२) जन्म नक्षत्र और सूर्य नक्षत्र एक नाडी में हो तो उस नक्षत्र में सूर्य रहने तक रोगी को पीड़ा रहे ।
(३) जन्म नक्षत्र और वर्तमान चन्द्र नक्षत्र एक नाड़ी में हो तो रोगी को ८ पहर
की पीड़ा रहे ।
(४) जन्म नक्षत्र चंद्र और सूर्य भिन्न-भिन्न नाड़ी में हो तो निरोगता रहे । त्रिनाड़ी चक्र
आर्द्रा पू०्फा० उ०फा० अनु० ज्ये० घनि० शत० भरणी कृतिका . पुन० मघा हस्त विशा० मूल श्रवण पू०भा० अश्वि० रोहि० पुष्य अश्ले० चित्रा स्वा पू०षा० उ०्घा० उ०भा० रेवती मृग०
अध्याय ८
आयुर्दाय विचार
सबसे पहिले जांतक की आयु का विचार करना चाहिये पीछे लक्षण कहना चाहिये
क्योंकि आयुहीन मनुष्य के लक्षण विचारना निरथंक है ।
आयु भेद-अल्प मध्य दीर्घायु के भेद से ३ प्रकार की आयु हैं इनमें वैसे ग्रह योग
दृष्टि और उनका बल और स्थिति पर ध्यान देकर मारकेश व मारकेश की दशा
आदि पर भी विचार करते हुए आयु का निर्णय करना चाहिये ।
मनुष्य एवं जीवों की परम आयु
मनुष्य व हाथी की १२० वर्ष ५ दिन
घोड़ा ८ ३२ वर्ष काक, गीध, उल्लू = १ हजार वर्ष
गधा व ऊँट > २५ वर्ष बाज = ३०० वर्ष
गाय, भैंस - २४ वर्ष कोयल, कवृतर, मोर = २० वषं
बकरा, भेड़ = १६ वर्षे . हंस = १४ वर्ष
कुत्ता-१२ वर्ष बुलबुल आदि-७ वषं
विल्ली-१० वर्ष मुरगा-८ वर्ष
मृग-२ वर्ष सपं-१००० वर्षं
रीछ, वानर-३०० वर्ष कूर्म-१५०० वर्ष
बाघ-६४ वर्ष वृश्चिक, गोह आदि-८ वषं
वृक्ष-५०० वषं चींटी--१ वर्ष
राक्षसों की-१५० वर्ष -
इतर जीवों की परम आयु देने का प्रयोजन-जिस प्रकार गणित द्वारा लग्न
कुंडली के ग्रहों पर से मनुष्य की आयु निकाली जाती है उसी प्रकार यदि अन्य जीवों
आदि की भी कुंडली बनाई गई हो तो उनकी आयु निकालने को परम आयु का आधार
लेकर निकालना पड़ता है । गणित से जो आयु निकले उसे जीव के परम आयु से गुणा
कर १२० का भाग देने से उस जीव की स्पष्ट आयु निकल आवेगी । जैसे मनुष्य की
आयु साधन की रीति से गणित करने पर ८५ वषे ५ मास १० दिन ५४ घ० ३० प०
निकली । किसी ने अपनी गाय की कुंडली बनवाई थी जिसके ग्रह स्पष्ट लग्न आदि के
द्वारा गणित करने से उपरोक्त आयु में २४ का गुणा कर १२० वर्ष का भाग देंगे तो
गाय की स्पष्ट आयु निकल आयगी ३१८=ब३=५ यहाँ उपरोक्त आयु में ५ का भाग
दिया तो १७ वर्ष १ माह २ दिन ११ घः ६ प० आयु गाय की निकली ।
गणित द्वारा आगु निकालना गणित खंड में बता चुके है ।
१९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
आयु पर विचार-यह परमायु सत्कमं करने वाखों की है जिनकी इन्द्रियाँ काबू
में रहती हैं, लाभ जनक भोजन मिलता है, देव ब्राह्मण आदि का पूजन ईश्वर भजन
आदि सत्कार्य में जिनका मन शान्त रहता है वे पूर्ण आयु पाते हैं । मानसिक रोग
चिन्ता क्रोध कामवासनो आदि के प्रवाह से शरीर में निबंलता आ जाने से आयु क्षीण
हो जाती है।
परन्तु सदाचार से, धमं से, योगादि साधन से, एवं रसायन प्रयोग से मनुष्य गणि-
तागत आयु से भी अधिक जी सकता है | इसीप्रकार अनियमित एवं अनर्थ कर्म व्यसन
आदि अनियमित जीवन से आयु क्षीण भी हो जाती है । क
इससे मनुष्य की जो परमायु १२० वर्ष की मानी गई है उससे न्यून अधिक आय
हो सकती है । १२० वर्ष आदि के अंक केवल गणित के निमित्त एक प्रकार दृष्ट व
केन्द्र माना है ।
ग्रहों के कई ऐसे योग भी हैं जिनसे १२० वर्ष से अधिक आयु जातक की हो
सकती है । ये योग अमित आयु के आगे दिये हैं ।
यह नियम नहीं है कि १२० वर्ष की ही आयु गणित से आ सकती है परन्तु गणित
द्वारा इससे भी अधिक आयु निकल सकती है । जेसे ककं लग्न में चन्द्रमा, गुरु केन्द्र में
बुध शुक्र, पाप ग्रह ३, ६, ११ भाव में से किसी में हों तो गणित से भी अधिक
आयु आवेगी ।
आयुर्दाय के ७ भेद
आयुर्दाय ७ प्रकार की है !
(१) बालारिष्ट-८ वर्ष तक।
(२) योगारिष्ट-२० वर्ष तक-दुष्ट ग्रह के उत्पन्न प्रभाव से ।
(३) अल्पायु-३२ वर्ष तक।
(४) मध्यमायु-३२ से ६४ वर्ष तक या ४० वर्ष तक ।
(५) दीर्घायु-१२० वर्ष तक ।
(६) दिव्यायु-१००० वर्ष-देव आयु ।
(७) अमितायु-योग्याभ्यास आदि द्वारा असंख्य आयु प्राप्त होती है अन्य मत से
मध्यमायु ३२ से ७० वर्ष तक है पश्चात् दीर्घायु है।
कहा है कि २० वर्ष तक आयु का निश्चय करना कठिन है क्योंकि इस बीच में
कोई पिता के दोष से कोई माता के दोष से कोई अपने पूर्व जन्म के कमं जन्य अरिष्ट
योग से मर जाते हैं । इससे २० वर्ष के पश्चात् आयुर्दाय का गणित करना ।
इसमें भी १२ वषं के भीतर तो आयु का निश्चय करना कठिन है । तव तक जप
होम औषधि आदि से वालक की रक्षा करना !
४ वर्ष तक-माता के पाप कमं से मरता है ।
८ वर्ष तक-पिता के पाप कमं से मरता है ।
१२ वर्ष तक-वालक अपने पाप कमं से मरता है
आयुर्दाय विचार : १९९
बाल अरिष्ट अल्पायु आदि के योग आगे दिये हैं अर्थात् बालक की मृत्यु २ प्रकार
से होती है ।
(१) कोई माता पिता के दोष से मरते हैं। (२) कोई पूतना आदि मातु ग्रहों के दोष से मरते हैं।
(३) कोई अरिष्ट योग से मरते हैं। स्थूल रूप से आयु का अनुमान
(१) राशि धुवांक के अनुसार अ ८ कुंडली में जहाँ-जहाँ जिन-जिन राशियों में ग्रह हों केवल उन राशियों के ध्ुवांक
को जोड़ना तो आयु प्राप्त होगी ।
राशि मेष वृष मिथुन ककं सिंह कन्या तुला वृश्चिक धन मकर. कुम्भ मीन
शुवांक १० ६ २० ५ ८ २ २० ६ १२१४ है ४
सग्रह राशि ३ ५ ८ ९ १० ११ १२ योग र ध्रुवांक २० ८ ६१० १४ ३ ४ =६५ वष
कुण्डली में जिन-जिन राशियों में ग्रह ee 92.
हैं उनके श्रुवांक जोड़ने से स्थूळ रूप से 2 >> >
६५ वर्ष की आयु आई ।
(२) केन्द्रायु योग
कुण्डली के केन्द्र स्थानों में जो अंक
राशियों के हों उन सबका योग कर तिगुना
करना । यदि केन्द्र में राहु या शनि हो तो
उन दोनों की राशि के अंकों को जोड़ कर
तिगुना करना उसे पूर्व प्राप्त गुणन फल में से घटा देना तो स्थूल रूप से आयु प्रगट
होगी । इसमें राहु और शनि दोनों केन्द्र में हों तो दोनों के अंक घटाना यदि केवल
एक ही हो तो एक का घटाना ।
उपरोक्त कुंडली में केन्द्र में ३, ६, ९, १२ राशियाँ हैं जिनका योग ३० हुआ >
३८९० आया । केन्द्र में केवल राहु लग्न में है ३ राशि है ३ > ३-९ आया इसे ९०
में से घटा दिया तो ९०-९-८१ वर्षे की आयु स्थूल रूप से आई ।
इसमें भी बताया गया है कि केन्द्र में जो ग्रह हों उनका भी विचार करना कि वे
उच्च या नीच में हैं शत्रु या मित्र गृही हैं उन पर शुभ या पाप दृष्टि है इत्यादि बातों
को भी विचारना चाहिए । जिससे आयु गणना में अन्तर आ जाएगा ।
अन्यमत-केन्द्र के अंकों की संख्या के योग को तिगुना कर उसमें से राहु और
मंगल की संख्या घटा देने से स्थूल आयु प्रगट होती है ।
नराकार चक द्वारा स्थूल आयु विचार ॥
एक नराकार चक्र बनाकर सिर पर हस्त नक्षत्र रखना आगे क्रमानुसार सर्वे
५ शः
२०० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
जक्षात्रों की स्थापना नीचे बताये अनुसार करे! जिस भाग में जन्म नक्षत्र पड़े उसके
अनुसार फल विचारना । फल आयु वर्ष
सिर में-हस्त, चित्रा, स्वाती राजा या अधिकारी हो १००
मुख में-विशाखा, अनुराधां, ज्येष्ठा दान प्रिय, घनी द०
गदेन में-मूल, पूर्वाषाढ़ा भोग प्रिय ७०
कंधा में-उत्तराषाढ़ा, श्रवण रंज हो ६०
हाथ में-घनिष्ठा, शतभिषा अशुद्ध आचरण ३०
हृदय में-पूर्व भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद बहुत ही धनी 53.93.
रेवती, अश्विनी भरणी
पेट में-कृतिका साधारण धन हो ५०
लिग में-रोहिणी परस्त्री से व्यभिचार 007
घटना में-मृगशिर, आर्द्रा, पुनवंसु लड़ाई झगडा प्रिय २०
पुष्य, आश्लेषा, मघा
पैर में-पूर्वा फाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी अल्प जीवन १० वर्षे या १० मास
जैसे किसी का जन्म अश्विनी में हुआ तो यह नक्षत्र हृदय में पड़ता है । बहुत
घन होगा । आयु ९० वर्ष की होगी ।
केवल इसी चक्र से विचारने से कुछ नहीं होता और प्रकार से भी विचार करना
चाहिये । क्योंकि यहाँ तो अग की राशि निश्चित कर दी गईं | इससे अनेक भिन्नभिन्न रीतियों से भी विचारना ।
आयु जानने के ल्यि ग्रहों के योग और दशा जानना आवश्यक है ।
साधारण प्रकार से आयु भेद
(१) अल्पायु ३२ वर्ण तक (२) मध्यायु ७० वर्ण तक
(३) दीर्घायु ७० वर्ण के ऊपर (४) उत्तमायु १०० वर्ण के ऊपर
१ साधारण प्रकार से आयु का ज्ञान
(१) जन्म लग्नेश सूर्थ का शत्रु हो तो--अल्पायु ।
(२) जन्म लग्नेश सूर्य का सम हो तो--मध्यायु ।
(३) जन्म लग्नेश सूर्य का मित्र हो तो--दीर्घायु ।
(१) सूर्य के मित्र ग्रह चंद्र मंगल गुरु हैं लग्न ४, १, ८, ९, १२, होता-दीर्घायु
(२) सूर्य के शत्रु ग्रह शुक्र शनि हैं। लग्न २, ७, १०, ११ हो--अल्पायु । कै
(३) सूर्य म के ग्रह बुध है । लग्न ३, ६ होना--मध्यायु।
२ चर स्थिर 'के अनुसार भी आयु का विचार होता है।
आयु विचारने को ३ जोडियो का विचार करना ।
आयु प्रकार-दीर्घायु मध्यायु अल्पायु
चरमचर चर+स्थिर चर+ट्विस्वभाव
स्थिर+द्विस्वभाव स्थिर{चर स्थिर+स्थिर