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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

आयुर्दाय विचार : २०१

दिस्व्थावनस्थिर दिस्वभाव+द्विस्वसाव द्विस्वमाव+चर

पहिले लग्नेश और अष्टमेश से इस प्रकार विचारना

दीर्घायु मध्यायु अल्पायु लग्नेश चर स्थिर द्विस्वभाव | चर स्थिर द्विस्वमाव [चर स्थिर द्विस्वभाव

अष्टमेश चर द्विस्वभाव स्थिर | स्थिर चर द्विस्वभाव | द्विस्व० स्थिर चर

अर्थात्‌ लग्नेश और अष्टमेश दोनों चर हों या एक स्थिर दूसरा हिस्वभाव में हों

तो दीर्घायु होगी । यदि लग्नेश और अष्टमेश एक चर दूसरा स्थिर में या दोनों द्विस्व￾भाव में हों तो मध्यायु । यदि एक चर दूसरा द्विस्वभाव में हों या दोनों स्थिर हों तो

अल्पायु होगा ।

(३) इसी प्रकार शनि चन्द्र की जोड़ी या लग्न चंद्र की जोड़ी से विचार . करना

जसा कि लग्नेश और अष्टमेश से विचार किया था । एवं जन्म लग्न और होरा लग्न

'पर से शी विचार करना ।

(१) तीनों प्रकार से एक ही आयु आवे वही आयु ग्रहण करना ।

(२) जहाँ २ प्रकार से एक सी हो एक प्रकार से भिन्न हो तो २ प्रकार से अर्थात्‌

बहुमत से जो आयु आवे उसे लेना ।

(३) पूर्वोक्त तीनों प्रकार से भिन्न २ आयु आवे तो लग्न और होरा लग्न से जो

आयु आवे उसे लेना ।

(४) यदि लग्न या सप्तम में चन्द्र हो तो चन्द्रमा और लग्न पर से द्वितीय प्रकोर

की आयु लेना ।

(५) यदि उक्त स्थान से भिन्न स्थान में चन्द्र वैठा हो तो शनि और चन्द्रमा से

आयु का विचार करना ।

यहाँ ३ प्रकार से चर आदि द्वारा विचार करने से ३ भेद हो जाते हैं ।

आयु भेद र प्रकारसे रप्रकारसे १ प्रकार से

दीर्घायु १२० वर्ष १०३ ९६

मध्यायू ८० ६२ ६४

अल्पायु ३२ ३६ ¥o

खण्ड ¥o ३६ ३२

यहाँ होरा लग्न की आवश्यकता पडती है इसलिए होरा लग्न निकालने की रीति

देते हैं--

होरा लग्न निक।लना

इष्ट के पल बनाकर ५ का साग देना ऊब्धि अंश पलादि में प्राप्त होगा । अंश

की राशि वना लो ।

जन्म लग्न विषम हो तो=उपरोक्त फल-- जन्म का सूर्य = होरा लग्न

¬ » सम „» = „ जन्म लग्न ८ होरा लग्न

च प० वि० रा० DA)

२०२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

उदाहरण-इष्ट ३७.३८-३७, लर्न ५-१४-१४४३ कन्या = सम

पल वि० ० छ र"

इष्ट पल २२५८-३७ -+ ५ = लब्धि ४५१ - ४३ ¬= २४ = लग्न सम होनेसे | =राशि-० लब्धि में लग्न जोड ? १५-१-४३- २४

J = ३-१-४३२४

+न ५ - १४-१४ - ४३ रा ४ » =होरा लग्न ८ - १९-५८ - ७

होरा लग्न = ८-१५-५८-७

लब्धि ४५१ -+ ३० अंश की रा० राशि बनाये १५-१ हुआ १२ राशि से

अधिक होने से १२ घटाकर लिया ३ राशि १ अंश रहा ।

यहाँ पर आदि के विचार से (१) लग्नेश, अष्टमेश, (२) शनि, चन्द्र और (३)

जन्म लग्न और होरा लग्न से तोक्न प्रकार से विचारना बताया है और कितने प्रकार

से एक सा आने पर क्या आयु आती है उसका विचार भी दिया है!

इसको आधार लेकर कुछ गणित कर आयु स्पष्ट करने की विधि भी है जो यहाँ

देते हैं ।

आयु स्पष्ट करना

यहाँ उपरोक्त ३ जोडियाँ दी हैं इनमें ६ योग कारक हुए तीनों प्रकार से विचारने

में जिससे अधिकता आवे वे योग कारक हुए यदि तीनों से भिन्न आवे तो जन्म लग्न

और होरा लग्न से प्राप्त आयु लेना यहाँ जन्म लग्न और होरा लग्न ही कारक होंगे ।

योग कारक के स्पष्ट में राशि को छोड़कर केवल अंश कला विदःला लेना । फिर

सबका योग करना जितने योग कारक हो उस योग में उतने का भाग देना अर्थात्‌ ४

योग कारक हों तो ४ का, २ योग कारक हो तो, २ का भाग देना । पश्चात्‌ उसमें उस

खण्ड का गुणा करना । ३ प्रकार से मिला हो तो प्रथम खंड ४० का, दो प्रकार से

मिलने पर द्वितीय खण्ड ३६ का, और एक प्रकार से मिलने पर तीसरा खंड ३२ का

गुणा करना । पश्चात्‌ ३० का भाग देने से वर्ण मास घड़ी पल आवेंगे वह गत आयु. हुई इसे खण्ड की प्राप्त आयु में घटा देना तो स्पप्ट आयु होगी 1

यहाँ ३० का भाग देने की क्रिया कुछ क्लिष्ट है इससे गुणनफल में १२ मास का गुणा करना । जो अँश आवे उसमें ३० का भाग देना तो लब्धि मास होंगे शेष दिन होंगे आगे कळा विकला को घड़ी पल जानो । उदाहरण से समझ में आ जायगा ।

आयुर्दाय विचार : २०५

पाप ग्रहों के मध्य में हो या उससे त्रिकोण स्थान पाय ग्रह से युक्त हों तो कक्षा हास

होता है ।

३--पाप ग्रह होकर कारक नीच स्थान में या उच्च नीच स्थान से भिन्न स्थान

में होकर पाप ग्रह युक्त हो तो भी कक्षा हास होगा ।

४-- इसके विपरीत होने पर कक्षा वृद्धि होती है अर्थात्‌ लग्न और उससे सप्तम

तथा कारक ओर उससे सप्तम शुभ ग्रहों के मध्यवर्ती हों या उससे त्रिकोण स्थान शुभ

ग्रह से युक्त हो, या शुभ ग्रह कारक होकर उच्च में या उच्च नीच से इतर स्थान में

होकर शुभ ग्रह से युक्त हो तो कक्षा वृद्धि होती है ।

५--इसी प्रकार गुरु से भी कक्षा वृद्धि का विचार करना । जसे गुरु पाप ग्रह के

मध्य हो या उससे त्रिकोण स्थान पाप ग्रह से युक्त हो तो कक्षा हास होता है।

६--शुभ ग्रह्‌ के मध्य में हो या उसके त्रिकोण स्थान में शुभ ग्रह हो या उच्च

स्थान में हो या उच्च नीच से भिन्न स्थान में स्थित होकर शुभ ग्रह से युक्त हो तो

कक्षा वृद्धि होती है ।

७-_पूर्वं बताये कक्षा योग में पूर्व चन्द्र और शुक्र का योग हो तो वहाँ पर दशा

में एक राशि की वृद्धि होती है किन्तु कक्षा वृद्धि नहीं होती ।

८-_पूर्वोकत कक्षा ह्लास योग में शनि का योग हो तो दशा में एक राशि का

ह्रास होता है ।

(४) आयु विचारने को नीचे बताई तीन जोडियो पर भी विचार करो

(१) चन्द्र की ओर लग्न की द्रेष्काण की राशियाँ ।

(२) लग्नेश और चन्द्र राशिं पर की नवांश राशि।

(३) लग्नेश और अष्टमेश की द्वादशांश राशि ।

ऊपर बताई चर स्थिर आदि के अनुसार दीघं मध्य अल्पायु का विचार करना ।

(५) शुभ ग्रह और लग्नेश की केन्द्र आदि स्थिति के अनुसार

(१) शुभ ग्रह और लग्नेश केन्द्र में हो--दीर्घायु

(२) ४ ४7 र ¬ पणफर में हो-मध्यायु

(३ ) sn 7 i Fe आपोक्लिम में हो---अल्पायु

यहाँ लग्नेश अष्टमेश में जो वली हो उससे विचारना

अष्टमेश और पाप ग्रह इसी प्रकार हों तो इससे विरुद्ध फल जानो ।

(६) नीचे बताई जोड़ियों में मैत्री निकालो

१. चन्द्र राशि का स्वामी और चन्द्र से अष्टम राशि का स्वामी ।

२. लग्न से लग्नेश अष्टमेश । ३. लग्नेश और सूर्य

ये मित्र हों तो-दीघं आयु । ये सम हों तो-मध्यायु । ये शत्रु हों तो-अल्पायु ।

(७)लग्नेश या लग्न नवांशेश वली हो और उस स्थान से गिनने पर-- १

१. अच्छे स्थान में हों या अष्टमेश से गिनने पर अच्छे स्थान में हो जैसी स्थिति

हो तो जातक दीघंजीवी होगा ।

२०६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

चन्द्र राशि का स्वामी या चन्द्र का नवांशेश के सम्बन्ध से भी उपरोक्त फल

होगा । यदि ऐसा न हो तो विरुद्ध फल होगा । न

२. लग्नेश की अपेक्षा अष्टमेश अति बली हो केन्द्र में हो और यदि पाप ग्रह

अष्टम और द्वादश भाव में हों तो अल्पायु होगी ।

३, लग्न से अष्टम स्थान का स्वामी और सप्तम स्थान से अष्टम स्थान का स्वामी

इन दोनों में जो वळी हो वह केन्द्र में हो तो दीर्घायु । पणफर में हो तो मध्यायु ।

आपोक्लिम में हो तो अल्पायु होगी ।

४. इसी प्रकार आत्म कारक का स्वामी और उससे सप्तम स्थान से अष्टम स्थान

का स्वामी इन दोनों में जो बली हो वह आत्म कारक से केन्द्र में होतो दीर्घायु, पणफर

सें मध्याय, आपोक्लिम में अल्पायु होगी । लग्न विषम हो तो क्रम से, सम हो तो

उत्क्रम से ( उल्टी गिनती से ) अष्टमेश जानना ।

यदि लग्न तृतीय में कारक हो तो केन्द्र आदि में स्थित अष्टमेश के वश विपरीत

आयुर्दाय जानना । जैसे केन्द्र में अष्टमेश हो तो अल्पायु, पणफर में मध्यायु, आपोक्लिम

में दीर्घायु होती है।

(८) लग्नेश अष्टमेश आदि का चर स्थिर आदि के अनुसार ऊपर दीर्घ मध्य अल्प

आयु का निर्णय बताया है । इसीप्रकार यहाँ धर्मादि स्थान स्थिति के वश दीर्घादि आयु

का निर्णय करना ।

(१) एक पंचम में दूसरा लाभ में -दीर्घायु।

(२) एक तृतीय में दूसरा लाभ में-मध्यायु ।

(३) एक नवम में दूसरा लाभ में--अल्पायु ।

(४) दोनों लाभ में--हीनायु ।

इसी प्रकार लग्न होरा लग्नआदि के वश आयु विचारना ।

आयु दीर्घायु मध्यायु अल्पायु हीनायु

लग्नेश ११ भाव में ११ में ११ में ११ में

अष्टमेश में ३ में ९ में ११ में

(९) अष्टमेश आदि योग कारक ग्रह र

१. लग्न से त्रिकोण ( १-५-९ ) में होने से ३ प्रकार को अल्पायु होती है । २.

लग्नेश से त्रिकोण में होने से ३ प्रकार की अल्पायु और ३. लग्नेश आश्रित राशि से ३

प्रकार की दीर्घायु होती हे प्रत्येक का प्रमाण १२ वर्ष का होता है जैसा यहाँ दिया है- रग्न से लग्नेश से लग्नेश आश्रित राशिसे

त्रिकोण १ ५ ९ 24 “९ १ 4 ९ आयु १२ २४ ३६ उडद ६० ७२ ८४ ९६ १०८ वर्ण अल्पायु मध्यायु दीर्घायु जैसे लग्न से अष्टमेश आदि कोई योग कारक ग्रद्द लग्न में न हो तो अल्पाय १२ वर्ष की, पंचम में हो तो १४ वर्ण की, नवम में हो तो ३५ वर्ण की होगी । बह जगे से

उदाहरण

लग्नेश |भष्टमेश | शनि ॥ लग्न |होरा लग्न

बुध द मंगल मिष कन्या धरन

मकर में मिष

चर [चर चर [चर द्वि ०ट्विस्वभाव

“अ

दीर्घायु | दीर्घायु | मध्यायु

  1. बी : यहाँ २ प्रकार से दीर्घायु आई १०८ वर्ण | दो प्रकार से आने का गुणक ३६

है। यहाँ योग कारक लग्नेश, अष्टमेश शनि

आयुर्दाय विचार ; २०३

और चन्द्र ४ हैं । इनका योग कर ४ का भाग देना होगा । ता.“ लग्नेश बुध स्पष्ट ९-२१-२७-३१

अष्टमेश मंगल ,, ०-१९-. ८-२२

शनि

२१-२७-३१ यहाँ इनकी राशि

१९- ८-२२ छोड़कर केवल

४. ०¬२५-१३-३१ २५- १- १ अंशादि ल्या है

चन्द्र ॥ ६०२५-५९-२७ २८-५९-२७ रीति पहली योग ९४-३८-९८ = ४ २२-३९-४२ % ३६ = २२-३६-४२ ( रीति दूसरी ) = ५५१९-४९-१२ गुणन फल यहाँ गुण नफल ८५१:४९-१२ में i २८१२ यदि ३० का भाग देना है तो :---

१०२२१-५०-२४ ३०)८५१-४९-१२(२८ वर्ण

मास मास ६०

३०)१०२२१०(३४० १२)३४०(२ वर्ण 00

0 ४ पपन मम

7 > ११-४९-१२ १२२ १०० >१२

ER १४१-५०-२४ २१ दिन ४ मास ३०)१४१-५०-२४(४ माह = वर्ण - मास - दिन - घ० - पल

२८-४ - २१ - ५० - २४गतायु

इस प्रकार से पूर्णायु १०८ वर्ष आती है

व० मा० दि० घ० प०

पूर्णायु १०८-०-०-०-०

गतायु २८ - ४ -२१- ५०-२४

शेष आयु ७३ - ७ - ८- ९ -३६

आयु वर्ण माह दि० घ० प० आदि

७९- ७-० ८- ९ - ३६

१२०

२१-५०-२४ SRG

३०)६५५-१२-०(२१

२०४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

वर्ष मास दिन घण्टा पल

= २८ ४ २१ १० २४

` इस प्रकार ३० का भाग देने में असुविधा

होती है इससे पहिली बताई रीति सरल है

यदि तीनों भिन्न २ प्रकार से आयु आवे, तो लग्न और होरा लग्न से आई आयु .

लेनी पड़ेगी । एक प्रकार से आने का तीसरा गुणक ३२ का गुणा कर ३० का उपरोक्त

प्रकार से भाग देने पर गतायु प्राप्त होगी । एक प्रकार से जो आयु आवे उससे घटा

देने से स्पष्ट आयु प्राप्त होगी । यदि रन्न और होरा लग्न से दीर्घायु आवें तो ९६ वर्ष

लेना मध्यायु आवे तो ६५ वर्ण, अल्पायु आवे तो ४० वर्ण लेकर उसमें से गतायु घटा

देना तव स्पष्ट आयु प्राप्त होगी ।

परन्तु उपरोक्त प्रकार से प्राप्त आयु में भी घट बड़ होती है जिसे कक्षाह्मास या

कक्षा में वृद्धि कहते हैं, जिसका नियम आगे दिया है :--

पूर्ण प्राप्त आयु में कक्षा ह्वास-वृद्धि करने के नियम

(१) कक्षा हास---

यदि शति योग कारक हो तो कक्षा ह्लास होता है अथात्‌ दीर्घायु हो तो उसे मध्यायु

मध्यायु हो तो अल्पायु जानो यदि अल्पायु हो तो उससे भी अल्पहीनायु जानना ।

जंमिनी सूत्र में आयुर्दाय के सम्बन्ध में ३२-३६-४० ये तीन कक्षाये हैं । नियमा-

नुसार ४० की प्रप्ति हो तो ३६, ३६ की प्राप्तिःहो तो ३२ समझो, यदि ३२ की

प्राप्ति हो तो शनि जिस राशि में बैठा हो उस राशि की दशा का आधा ३२ से घट￾कर जो शेष वचे वह उसकी अल्पायु हुई ।

इससे द्विगुण मध्यायु ओर त्रिगुणित दीर्घायु मानकर पुंवत्‌ स्पष्ट आयु के मान

का अनुमान करना ।

शनि अपनी राशि या उच्च में हो तो कक्षा ह्लास नहीं होता ।

(२) कक्षा वृद्धि यदि लग्न या सप्तम में गुरु हो तो कक्षा वृद्धि होती है अर्थात्‌ अल्पायु आवे तो

मध्यायु समझो, मध्यायु में दीर्घायु और दीर्घायु में उससे भी अधिक दीघंआयु होती है ।

अर्थात्‌ ३२-३६-४० इन तीनों कक्षाओं में ३२ की प्राप्ति हो तो ३६ लेना, ३६

की प्राप्ति में ४० ओर ४० की प्राप्ति हो तो गुरु जिस राशि में बैठा हो उस राशि को

चार दशा का आधा ४० में जोड़कर उसके तुल्य लेना । अल्पायु से द्विगुणित मध्यायु

और त्रिगुणित दीर्घायु मानकर आयु स्पष्ट साधन करना ।

(३) कक्षा ह्लास वृद्धि के नियम

१--लग्न और सप्तम पाप ग्रह के मध्यवर्ती हो या उसके त्रिकोण (५-९ स्थान)

पाप ग्रह से युक्त हो तो कक्षा ह्लास होता है ।

२--इसी प्रकार अन्य कारक से भी विचारना जैसे कारक और उसके सप्तम

आयुर्दाय विचार : २०९

में मंगल हो तो बूढ़ा भी युवा के तुल्य समझा जावे ( शंभु० ) । लग्न में मंगल हो तो जातक वृद्ध होकर भी युवा के समान रहता है ( जा० सं० ) । युवा होकर बालक समान- -लग्न में बुध हो तो युवा भी बालक समझा जाता है। न अति बूढ़ा न अति युवा--लूग्न में चन्द्र शनि हो तो न अति वृद्ध न अति युवा मालूम पड़े ( शंभु० ) । लग्न में चन्द्र शुक्र हो तो न अति वृद्ध और न अति युवा

के समान रहे ( जा० सं० )।

स्वभाव से वृद्ध-जिसके २ वळवान्‌ वृद्ध ग्रह छन्न में हों तो वह स्वभाव से ही

वृद्ध रहता है और सव जनों में मान पाने योग्य रहता है ( जा० सं० ) । दीर्घायु योग ( ७० वषं के ऊपर आयु )

दीर्घायु १--षष्ठेश ६ या १२ भाव में हो, व्ययेश १२,१ या ८ भाव में हो ।

दीर्घायु २--लग्नेश या अष्टमेश स्वगृही होकर अपने नवांश में या अधिमित्र के

नवांश में न बेठ कर मित्र के नवांश में हो । ( जैमिनी )

दीर्घायु ३--शुभ ग्रहों से युक्त अष्टमेश उच्च का केन्द्र या त्रिकोण में हो ।

चिरायु ४--अष्टमेश अष्टम में और लग्नेश लग्न में हो । ( जैमिनी )

चिरायु ५--शुभग्नह शुभ राशि में अष्टम में होकर शुभग्रह से दृष्ट हो । (जेमिनी)

दीर्घायु ६--अष्टमेश अपने गृह में हो । ( जैमिनी )

दीर्घायु ७--लग्नेश और अष्टमेश ६ या १२ भाव में शुक्र ग्रह युक्त हो। (जैमिनी)

दीर्घायु द--दशमेश लग्नेश और अष्टमेश केन्द्र त्रिकोण या लाभ में हो।

( जेमिनी ) ४

दीर्घायु ९--अष्टमेश केन्द्र में हो ( वृ०्पा० )

दीर्घायु १०--षष्ठेश या द्वादशेश ६-१२-१ या ८ भाव में हो (वृ० पा० )

दीर्घायु १९--पंचमेश लग्नेश और अष्टमेश यदि स्वराशि या स्वनवोश में या मित्र गृही हो ( बृ०पा० ) ।

दीर्घायु १२-लग्नेश, अष्टमेश, दशमेश और शनि ये केन्द्र त्रिकोण में हो । ( इन

चारों में जो बलवान्‌ हो उसकी स्थिति से आयु निर्णय करना ) 1

दीर्घायु १३-लग्नेश उच्च में, चन्द्र ११ वें घर में, गुरु अष्टम भाव में हो (वृ.पा.)

दीर्घायु धनी १४-बली लग्नेश, केन्द्र स्थित शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो घन और सब

गुणों से युक्त दीर्घायु हो ( वृ०्पा० ) ।

दीर्घायु धनी १५-लग्नेश, बुध, गुरु, या शुक्र यदि केन्द्र त्रिकोण में हों तो धनी,

बुद्धिमान्‌, राजा का प्रिय और दीर्घायु हो ( वृ० पा० ) ।

दीर्घायु धनी १६-उदय राशि का स्वामी ( लग्नेश ) अति बली हो पाप ग्रह से

दृष्ट न हो शुभ ग्रह से दृष्ट होकर केन्द्र में हो तो मृत्यु को भी भगा देता है दीर्घायु

धनवान्‌ और बहुगुणी राजलक्ष्मी युक्त करता है ( फल० ) ।

दीघंजीवी सुखी १७-कुंडली में १, ४, ५, ७, ८, ९, १० घर में कोई पाप ग्रह

(] १४

२१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

न हो। लग्नेश और गुरु केन्द्र में हो तो अच्छे काम करने वाला, सव प्रकार का सुख

भोगे और रोग रहित १०० वर्ष जीवे ( फल० ) दीर्घायु १८--लग्न से पहिले ६ घर में या बाद के ६ घर में सब ग्रह हे

अर्थात्‌ राहु केतु को छोड़कर सब शुभ और पाप ग्रह लग्न से षष्ठ भाव तक हो एक

योग हुआ या सप्तम से व्यय भाव तक सव शुभ और पाप ग्रह हों यह दूसरा योग

हुआ ( सर्वार्थ चिन्तामणि ) ।

दीर्घायु धनी १९-छग्न विषम राशि में हो उसमें पूर्ण चन्द्र हो और सब ग्रह भी

विषम राशि में हों तो दीर्घायु ओर धनी हो । यह सब सम राशि में हों तो यह योग

नहीं होगा ( स० चि०)।

दीर्घायु, विद्या और मानयुक्त २०--गुरु लग्न में, शुक्र चतुर्थ में चन्द्र शनि युक्त

हो, दशम में कोई पाप ग्रह का योग न हो तो दीर्घायु हो, ऊँची विद्या और अच्छा

मान प्राप्त हो ( स० चि० ) । दीर्घायु २ १--छग्न मकर के उत्तराद्ध में हो उसमें चन्द्र हो और मंगल पूर्वाद्ध में

हो, गुरु केन्द्र में हो तो दीर्घायु हो ॥

लग्न के २ भाग करने से प्रत्येक को होरा कहते हैं। लग्न और चन्द्र मकर के

दूसरे होरा में हो और मंगळ पहिले होरो में हो जहाँ वह साधारणतः उच्च का होगा।

गुरु मेष, कर्के या तुला में हो तब केन्द्र में होगा ।

दीर्घायु २२--यदि गुरु धनु के पूर्वाद्धं में हो और लग्न उसके उत्तराद्ध में हो और

शुक्र व चन्द्र दोनों शनि से केन्द्रमे हों तो दीर्घायु होगा ( स० चि० ) [

यदि गुरु धन के पहिले होरा में हो धन उसका स्वगृह और मूल त्रिकोण है । लग्न

दूसरे होरा में हो शनि से केन्द्र में चन्द्र और शुक्र चाहे जहाँ हों ।

दीर्घायु २२--बुध कन्या के पुर्वाद्ध में हो और लग्न उत्तराद्ध॑ में हो और ३-४

ग्रह उच्च के हों तो दीर्घायु ( स० चि० ) बुध कन्या के १५! में परमोच्च है यह पहिले

होरा में हो और लग्न दूसरे होरा में हो और ३-४ ग्रह उच्च के हों । वहाँ बुध कन्या में है तो शुक्र ओर सूर्य उच्च के नहीं हो सकते इस कारण दूसरे ४ ग्रह शनि गुरु

मंगल और चन्द्र हैं जो उच्च के हो सकते हैं ।

दीर्घायु २४--लग्न से ३-४-८ इन्हीं स्थानों में सव ग्रह हों ( जा० लंका० ) ।

दीर्घायु २५--पापग्रह ३-६-११ भाव में हो चन्द्र ६-८ भाव में हो गुरु केन्द्र में हो तो दीर्घायु और नगर का स्वामी हो या ३००० ग्राम का स्वामी हो ( स० चि० )

यहाँ ६-८ भाव में चन्द्र बुरा है परन्तु केन्द्र में गुरु होने से शुभ हो जाता है । दीर्घायु २६--छम्न से केन्द्र में एक भी प्रकाश करने वाला वली शुभ ग्रह हो तो सब रोग नाश कर दीर्घायु करता है । ( ल० चं० ) | दीर्घायु २७--पंचम में चन्द्र या ५-९ भाव में या दशम में गुरु हो ( ल०चन्द्रि० )

दीर्घायु २८- वृष राशि में राहु ३ ग्रह से दृष्ट हो चौथा केतु से भी दष्ट हो, गुर शुक्र से भी दृष्ट हो ( ल० चं० ) | डु

आयुर्दाय विचार : २०७

प्रथम स्थान में योगकारक हो तो मध्यायु ४८ वर्ष की, वहाँ से पंचम में हो तो

६० वर्ष की नवम में हो तो ७२ वर्ष की होगी। लग्नेश स्थित राशि से प्रथम स्थान

में योग कारक हो तो दीर्घायु ८४ वर्ष की, पंचम में हो तो ९६ वर्ष की, नवम में हो

तो १०८ वर्ण की आगु होगी । (१०) अन्य रीति से अल्प दीर्घ आयु विचार

(१) लग्न स्पष्ट % ५+ स्पष्ट गुछिक=स्पष्ट 'प्राण' ( जीव ) ।

(२) चन्द्र स्पष्ट > ८ --गुलिकऱ्स्पष्ट देह्‌ ।

(३) स्पष्ट गुलिक % ७--सूर्य स्पण्ट=स्पष्ट मृत्यु ।

जव जीव और देह का योग मृत्यु से वड़ा हो तो--दीर्घायु ।

जव जीव और देह का योग मृत्यु से कम हो तो--अल्पायु ।

जीव + मृत्यु + देह = इनके योग से जो राशि आवे उसमें शनि पहुँचे तब धन

का नाश हो । या योग राशि से ५, ९ भाव में या उस योग राशि में जिस राशि का

नवांश हो उस राशि पर शनि जावे तव मरण होगा । भाव से त्रिकोण में शनि हो तो

उस भाव का नाश हो या भावेश के कोण में गुरु के पहुचने पर मृत्यु हो ।

आयु के किस भाग में क्या होगा इसका चमत्कारिक योग

जन्म नक्षत्र, जन्म राशि और अपनी आयु लेना इस संख्याओं का योग करना ।

इस योग को ३ स्थान में रखकर क्रमशः ७, ८ और ६ से भाग देना जो शेष बचे

उससे फल विचारना ।

आदि अंत में ० शेष--दुःख उदाहरण नाम गुमाळ

वीच में ० शेष--धनक्षय धनिष्ठा नक्षत्र संख्या २३

तींनों में ० शेष--मृत्यु राशि कुम्भ संख्या ११

तीनों में शेष अंक वचे तो--जय आयु ७२ वर्ण ७२

योग १०६

(१) योग १०६--७=१५३मशेष १ यहाँ तीनों में शेष अंक बचा--जय

(२) योग १०६-- ८=१२३=शेष २ यदि (१) और (३) में ° बचता तो दुख

(३) योग १०८-+ ६=१७६मशेष ४ केवल (२) में ० बचता तो--धनक्षाय

ह (१) (२) (३) तीनों में ० बचता तो-मृत्यु आयु खंड़ पर से दुःख सुख विचार

जीवन को ३ खंड में बांटा है इससे प्रत्येक ४ भाव का १ खंड हुआ ।

पहिला खंड--१२, १, २, ३ भाव ।

दूसरा खंड--४, ५, ६, ७ भाव ।

तीसरा खंड--८, ९. १०, ११ भाव ।

जिस खंड में शुभ ग्रह अधिक हों उस खंड में सुख होगा । जिस खंड में पाप ग्रह

` अधिक हो उस खंड में दुख होगा । जहाँ मिश्रित हों वहाँ दुख सुख मिश्रित फल होगा ।

यहाँ गणित से या पूव रीति से प्राप्त आयु के ४ भाग करना और उसके अनुसार

२०८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

उस खंड में ग्रहों के अनुसार सुख दुःख का अनुमान करना । जैसे किसी की आयु ८५

वर्ण की प्रकट हुई इसके ३ भाग किये २५ वर्ण प्रत्येक खंड के आए । अब कुण्डली

में उपरोक्त प्रकार से बताये तीनों खंडों के शुभाशुभ ग्रहों का विचार करो जिस खंड

में शुभग्रह अधिक होंगे सुख होगा । पाप ग्रह अधिक होंगे तो दुःख होगा । यहाँ प्रथम

खंड में २५ वर्ष पश्चात्‌ द्वितीय खंड में २५ वर्ण पश्चात्‌ तृतीय खंड मे २५ वर्ण के

हिसाव से आय खंड के अनुसार सुख दुख का विचार करना ।

इसमे जिस खंड में बहुत पोप ग्रह या नीचांशक या अस्तंगत ग्रह हो उस खंड में

दुःख पदच्युत आदि होता है जिसमें शुभ ग्रह अधिक उच्चांशक आदि होते हैं उस खंड

में सुख ऐश्वर्य आदि प्राप्त होता है ।

पूर्वाद्ध उत्तराद्ध ज्योतिष चक्र के अनुसार शक्ति प्राप्ति

लग्न से ६ भाव तक पूवाद्ध हैं, ७ से १२ भाव तक पश्चिमाद्ध है ।

ज्योतिष चक्र के पूर्वाद्ध में उच्च के तथा बलवान्‌ ग्रह हों तो राजा के समान

शवित और धन. जीवन के पूर्व भाग में प्राप्त हों ।

यदि पश्‍चिमाद्ध में उच्च और बलवान्‌ ग्रह हों तो जीवन के अन्तिम भाग में

शक्ति और सफलता रेते हैं ।

जो पूर्वाद्ध और पश्चिमाद्धं दोनों में उच्च के और बलवान्‌ ग्रह हों तो उसे जीवन

भर शक्ति और उन्नति प्राप्त हो ।

मृत्यु समय

कुण्डली में शनि. गुरु, सूर्य ओर चन्द्र का स्पष्ट जोड़ने से जो प्राप्त हो उस स्पष्ट पर जब शनि पहिले चक्कर में पहुँचे तो उस समय अल्पायु योग वाले की मृत्यु होगी । जब दुसरा चक्कर शनि लगाकर उसी स्पष्ट पर पहुंचे तव माध्ययु वाले की मृत्यु होगी । जव तीसरी वार चक्कर लगाकर शनि उक्त स्थान पर पहुंचे तो दीर्घायु वाले की मृत्यु संभव है।

ग्रहों की दशा अंतर्दशा पर से कष्टकर या मृत्यु संभव समय का अनुमान कर लेना चाहिये ,

अरिष्ट समय

(१) जिन अरिष्टों में फल का समय नहीं दिया उनमें योग करने वाले ग्रहों में से जो वलवान्‌ हो उसकी राशि पर जब गोचर में चन्द्रमा हो उस समय अरिष्ट होगा ।

(२) अथवा अपनी राशि में या लग्न राशि में चन्द्रमा गोचर में जब जाय या वल युक्त हो तो १ वर्ष के भीतर मृत्य हो ।

अवस्था के कुछ योग

ग्रह आयु--मंगळ बुध सूर्य गुरु शनि राहु चन्द्र शुक्र युवा बालक वृद्ध अधेड़ (मध्यम) वृद्ध युवासम हो-ळग्नेश लग्न में हो यो वलवान्‌ ग्रह लग्न में हो और लाभ स्थान

आयुर्दाय विचार : २१३

दीर्घायु ६१--अष्टमेश लग्न से लाभ में शुभ ग्रह युक्त हो ( जा० ल॑० ) |

६२--अष्टम में शनि हो ( जा० लं० )।

६३--अष्टमेश शुभ ग्रह होकर शुभ ग्रह युक्त अष्टम भाव में हो ( जा० लं० )। ६४--लग्न अष्टम व लाभ इनके स्वामी क्रमानुसार लाभ केन्द्र व त्रिकोण में

हों वे पाप ग्रह हों चाहे शुभ ग्रह हों तो भी दीर्घायु हो ( प्रा०्यो० ) ।

६५-अष्टमेश शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो दीर्घा० ( प्रा० यो० ) ।

६६--अष्टमेश अष्टम में हो और शनि अकेला हो ( स० चिता० ) ।

६७--शनि स्वगृही मित्र गृही या उच्च का हो ( सर्वे० चि० ) ।

६८--१, ८ और १० भाव के स्वामी स्वगृही हों ( स० चि० ) 1 पुर्णायु ६९--कोई अरिष्ट न हो तो.जो आयु साधन करने से प्राप्त हुई हो वह आयू

दीर्घायु ७०--बलवान्‌ लग्नेश शुभ ग्रह युक्त

भोगे ( ज० भ०) ।

या दृष्ट हो पाप दृष्टि रहित

हो तो सदा भाग्यवान्‌ और

दीर्घायु हो ( जा० पारि० ) |

७१--उच्च का कोई भी ग्रह शनि व

अष्टमेश युक्त हो (जा०पा०) ।

७२--पाप ग्रह ६-१२ भाव में हों,

लग्नेश केन्द्र में हो (जा०पा०)।

७३--अष्टम में पाप ग्रह हो और दशमेश उच्च का हो ( जा० पारि० ) । ७४--अष्टमेश जिस भाव में हो उस भाव का स्वामी जिस राशि में हो उस राशि का स्वामी और लग्नेश केन्द्र में हो ( जा० पारि० )। ५--हिस्वभाव लग्न में जन्म हो और लग्नेश से केन्द्र में २ पाप ग्रह हों ( जा० पारि० ) ।

७६-द्विस्वभाव लग्न में जन्म हो लग्नेश केन्द्र में हो या उच्च या मूल त्रिकोण का हो तो चिरायु और भाग्यशाली होने ( जा० पारि० )1 ७--शनि सूर्य मंगल चर राशि के नवांश में हो, गुर और क्र स्थिर राशि के नवांश में हो, शेष अर्थात्‌ चन्द्र बुध राहु केतु दिस्वभाव रोशि में हों तो १०० वर्ष की आग हो ( जा० पारि० )।

७८--उच्च का अष्टमेश शुभ ग्रह युक्त केन्द्र त्रिकोण में हो तो दीर्घाय ( जा० पा० ).।

चिरायु ७६--लग्नेश अष्टमेश ओर दशमेश वक्री हो,शनि का योग न हो तो चिरायु

हो ( जा० पारि० ) 1

२१४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

चिरायु ५०--अष्टमेश अष्टम में लग्नेश लग्न में हो ( जा० पारि० )1 ८१--लग्न से द्वादशेश अपनी राशि में बलवान्‌ हो तो चिरायु और सुखी हो

( जा० पारि० )।

» ८२--हग्तेश, अष्टमेश केन्द्र में बलवान्‌ हो ( जा० पा० )। आय॒ष्मान्‌ निरोग ८३-गर्भाधान की लग्न राशि के अष्टम घर में दशवीं राशि हो या

र जन्म लग्न, बुध गुरु शुक्र से युक्त या दृष्ट हो तो आयुष्मान्‌ और निरोग

रहे ( जा० पा०)।

दीर्घायु ८४--अष्टमेश मित्र गृही हो तो दीर्घायु ।

१, ८५-अष्टमेश्ष शनि युक्त हो।

„ ८६--चन्द्र की दृष्टि सूर्य पर और बुध की दृष्टि चन्द्र पर हो तो सुखी और

चिरायु हो ।

„ ८७--लग्त सूर्य चन्द्र बली होकर शुभ ग्रह युक्त हों ।

9 ५८५८-गुर शुक्र केन्द्र में चन्द्रमा लाभ में हो ।

मध्यायु ( ३२ वर्ष से ७० वर्ष तक आयु ) योग

मध्यायु १--लग्नेश निर्बल हो, गुरु केन्द्र या त्रिकोण में हो, पाप ग्रह ६, ८, १२

भाव में हो ( जेमिनी० ) ।

१, २--ैन्द्र त्रिकोण में शुभ ग्रह हो, पाप ग्रह ६, ८ में हो शनि बली हो या

लग्न केन्द्र या त्रिकोण में पाप ग्रह हो ( जैमिनी० ) ।

श कन्न से ओर कारक से बलवान्‌ अष्टमेश कारक ही हो तो अल्पायु दीर्घायु

होते हुए भी मध्यायु होती है ( जैमिनी ) ।

» टॅ--पाप ग्रह २, ३,४, ५, ८, ११ इन स्थानों में हो तो मध्याथु (प्राण्यो०) । ० ५ ऊग्नेश साधारण प्रकार से सूर्य के साथ हो तो मध्यायु ( स० चि ) । # रै जानि बलवान्‌ हो शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हो पाप ग्रह ५ या ८ घर में हो ( सवं चि० ) । पाप युक्त होने पर भी बल के अनुसार कुछ अन्तर

पड़ जायगा जैसे मंगल शनि युक्त मकर में हो या शनि लग्नेश शुक्र के

साथ तुला में हो तो उसकी अशुभता अवश्य कम हो जायेगी । जब लग्नेश शक्ति हीन हो गुरु केन्द्रमें हो या त्रिकोण में हो और पाप ग्रह दुष्ट स्थान में होने से मध्यायु हो जाती है यहाँ अच्छे बुरे का मिश्रण है। बलहीन लग्नेश अल्पायु देता है । गुरु केन्द्र त्रिकोण में दीर्घायु देता है और पाप अह दुष्ट स्थान में मिश्रित फल देते हैं । पाप ग्रह ६ भाव में दीर्घायु देते हैं परन्तु ८ या १२ घर में हों तो आयु घटा देते हैं । » ७-जीवन का कारक शनि है वह बलहीन केन्द्र या त्रिकोण में हो ओर शुभ युक्त हो पाप ग्रह ६ या ८ ग्रह में हो तो मृध्यायु । पापग्रह लग्न केन्द्र या त्रिकोण में मध्य जीवन देते हैं परन्तु तुला लग्न में शनि हो तो उसकी पुर्णायु होगी ( स० चिन्ता? ) ।

आयुर्दाय विचार : २११

दीर्घायु २९--अपने ही स्थान में स्थित ग्रह बुध और शनि हो ( छ० चं० ) । दीर्घायु ३०--सप्तम में शुक्र शुभ राशि का शुभ ग्रहों से दृष्ट व युत हो तो दीर्घायु और भाग्यशाली हो ( जा० सं० ) ।

दीर्घायु जितेन्द्रिय ३१--लग्न से ५, ९, ८, १, ४, ७, १० भाव में से किसी में

३, ४, या ५ ग्रह हों तो स्त्री पा कर भी जितेन्द्रिय तथा दीर्घायु हो । कोई आचार्य

इसे राजयोग कहते हैं । ( स० चिता० ) ।

दीर्घायु सुखी३२--पूर्ण चंद्र या चंद्र

जो शुभ राशि या अंश में हो और बलवान

गुरु से दृष्ट हो तो सव भय दूर कर उसे

दीर्घं जीवन और सुख देगा (स० चि०) ।

दोर्घायु निर्भय वली ३३- जन्म में

सम्पूर्ण ग्रह लग्न को देखते हों तो हास्य

विलास युक्त बलवान्‌ निभंय, शत्रु कुछ ८०5२ च्चः न 04 गुः नाशक, राज कुल में उत्पन्न ओर दीर्घायु Mr न] हो (जा० भ०)।

दीर्घायु, रोग रहित मंत्री आदि ३४--छग्न से ७, ६, ८ घर में शुभ ग्रह हों पाप

ग्रह से युक्त दृष्ट न हों तो वह दीर्घायु, राजा का मंत्री, सेना का स्वामी, भूमि का

स्वामी, बहुत स्त्रियों का पति, रोग रहित, भय हीन, सुन्दरता और भिन्नता युक्त

श्रेष्ठ शील वाला सदा प्रसन्न होता है । ( जा० भ० )

दीर्घायु सुखी धनी ३५--लग्नेश शुभ ग्रह यृक्त, उच्च राशि का केन्द्र त्रिकोण में

शुभ ग्रहों से दृष्ट हो या दशमेश से युक्त हो या, अपनी राशि में हो तो दीर्घायु हो,

उत्तम ऐश्वर्य, उत्तम कीति धन अन्न युक्त हो ( स० चि० ) ।

१०० वर्षे आयु निरोग सुखी ३६--छग्नेश तथा गुरु केन्द्र में हो, केन्द्र त्रिकोण

और अष्टम स्थान में पाप ग्रह न हो तो १०० वर्ष जीवे, पुण्य कर्मी, निरोग और सुखी

होवे ( स० चि० ) ।

युगांत आयु लक्ष्मी युन ३७--शनि के अंशक में सूर्य मंगल गुरु नवम या दशम

घर में हो बलवान्‌ भी हो और लग्न में चंद्र राशि के अन्त्य नवोश का हो तो लक्ष्मी

युत युगांत आयु पावे ( स० चिता० ) ।

२ हजार वषं आयु ३८--नवम स्थान में बुध शुक्र शनि एक ही अंशक में होवें

या एक अंशक ही में छगन मे होवे ६ या ८ मे चंद्र हो तो २ हजार वर्ष की आयु

हो ( स० चिता० ) |

दीर्घायु २९--शुभ ग्रह युक्त लग्नेश लग्न में हो या सप्तम में शुभ ग्रह हो तो

दीर्घाय हो ( शंभु हो० ) । - दीर्घायु सुखी ४०--लग्नेश शुभ ग्रह हो या शुभ ग्रह लग्न में हो तो बड़ी आयु

वाला क्लेश रहित और सुखी हो ( जा० सं० )।

र्यी: १. ०

२१२ ; सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

दीर्घायु ४१--लग्नेश गुरु शुक्र युक्त केन्द्र में हो व गुरु शुक्र से दृष्ट हो तो दीर्घायु हो

( स० चिता० ) ।

४२--लग्नेश शुभ ग्रह युक्त गुरु से दृष्ट हो केन्द्रों में शुभ ग्रह हो (स० चि०)

४३--लूग्नेश वली हो पाप ग्रह ३-६०११ में द्दो शुभ ग्रह केन्द्र में हो

(स० चि० )।

४४--३-६-११ भाव में पाप ग्रह हो ६, ७, ८ भाव में शुभ ग्रह हो तो दीर्घायु

हो । ( स० चि० ) ( जा० पारि० ) ।

४५- सप्तम भाव में ग्रह स्वगृही, मित्र गृही या उच्च का हो तो ग्रह की

स्थिति के अनुसार दीर्घायु हो (स० चि० ) ।

४६--लग्नेश अष्टमेश युक्त ६-१२ भाव में हो षष्ठश १२ भाव में हो उस पर

शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो दीर्घायु ( स० चि० ) ।

४७--दशमेश स्वगृही, मित्र गृही या उच्च काहोतो उसकी स्थिति के

अनुसार दीर्घायु हो ( स० चिं० )।

४८--दशमेश, लग्नेश और अष्टमेश केन्द्र में हो ( स० चि० )।

४९-उक्त ग्रह दशम में हो या उपरोक्त तीनों शनि युक्‍त अन्य केन्द्र में हो

( स० चि०)।

५०-लग्न में अष्टमेश गुरु शुक्र युक्त या दृष्ट हो या लग्नेश केन्द्र में हो

(स० चि० )। |

५१--तोन ग्रह उच्च के हों, अष्टमेश लग्न में हो । अष्टम में कोई पाप ग्रह

न हो ( स० चि० )।

५२--तीनग्रह उच्च के हों, लग्नेश और अष्टमेश युक्त हों अष्टम में पाप ग्रह

न हो ( जा० पारि० )।

५३--अष्टम भाव में ३ ग्रह उच्च के या स्वगृही नित्रगृही हों और लग्नेश

बलवान्‌ हो ( जा० पारि० ) ।

५४--सम्पूर्णं पाप तथा शुभ ग्रह पारावतादि अंशको में केन्द्र त्रिकोण गत हों

( स० चि० ) ||

५६-- लग्नेश सूर्य का मित्र हो तो दीर्घायु हो (.स० चि० ) !

५७--एक भी शूभ ग्रह पूणं बली होकर केन्द्र में हो तो सव दोषों का क्षय

और पुर्णायु करता है ( मान० ) ।

५८--लग्नेश वली होकर ११ या ३ भाव या केन्द्र में हो तो अरिष्ट दूर

होकर निरोगी दीघं आयु वाला हो ( मान० ) ।

५९--आधान लग्न में शुभ ग्रह हो तो दीर्घायु धनी सुखी हो ( फल० दी० ) ।

६०--तीसरे भाव मे राहु हो तो चिरायु हो और उसे लक्ष धन का स्वामी

और कष्टहीन करता है, परन्तु अंगहीन करता है या मामा का नाश

करता है ( जा० छकार ) 1

आयुर्दाय विचार : २१७

अल्पायु ३३-शनि ३ पाप ग्रहों से युक्त हो और शुक्र गुरु के योग से रहित हो तो आयु

और पुण्य क्षीण हो ( जा० सं० )।

३४-अष्टमेश पाप ग्रह होकर लाभ स्थान में हो ( जा० लं० )।

३५-अष्टमेश पाप ग्रह होकर अष्टम में हो ( जा० लं० ) ।

३६-कुंडली में लग्न, लग्नेश, सूर्य व चन्द्र निर्वेल हो पाप ग्रह से पीडित हो तो

आयु क्षीण होती है ( वाल बोध ज्यो० ) ।

३७-अष्टमेश लग्न से सप्तम में हो ।

३८-लग्नेश व्यय में हो, तृतीय भाव, तृतीयेश, अष्टम भाव या अष्टमेश पाप ग्रह

से दुष्ट हो ।

३९-लग्न से चन्द्र ६-८-१२ भाव में हो पाप ग्रह ८-१२ घर में हो ।

४०-६-८-१२ भाव में गुरु युक्त चन्द्र हो ।

४१-पफ्रेन्द्र त्रिकोण में पाप ग्रह वलवान्‌ हो लग्नेश बलहीन हो ।

४२-पाप ग्रह युक्त चतुर्थेश और पंचमेश दशम में हो ।

४३-अष्टमेश केतु युक्त लग्न में हो ।

४४-अष्टमेश सप्तमेश युक्त पंचम घर में हो राहु से दृष्ट हो ।

४५-कुंडली में किसी की पूर्णायु या मध्यायु योग हो तो अल्पायु योग नष्ट हो

जाता है ( ज्यो० रहस्य ) ।

४६-शुक्र गुरु दोनों धन स्थान में, पंचम में मंगल और शनि हो चन्द्रमा वल

हीन हो तो अल्पायु हो। मतांतर--गुरु शुक्र लग्न में, पापग्रह युक्त

मंगल पंचम में हो ।

४७-लगन में लग्नेश और सूयं चन्द्र हो किसी शुभाशुभ गूह से युक्त या दुष्ट हो।

४८-लग्न में पाप ग्रह हो किसी राशि का चन्द्र पाप युक्त सप्तम में शुभ ग्रह

की दृष्टि रहित हो ।

४९-लग्न से व्यय भाव में क्षीण चन्द्र हो, लग्न पापग्रह युक्त हो, लग्न व

अष्टम स्थान में कोई शुभ ग्रह न हो ।

५०-लग्न से चन्द्र ६-८ घर में पाप ग्रह से दृष्ट, शुभ ग्रह से अदुष्ट हो ।

५१-लग्न में क्षीण चन्द्र हो अष्टम घर व केन्र में पाप ग्रह हो ।

५२-चन्द्र ४, ७, ८ स्थान में कहीं हो पाप ग्रह उसके आगे पीछे हो ।

५३-चंद्र कोई राशि में कहीं हो पर अंत नवांश में हो शुभ ग्रह की दृष्टि न

हो, पाप ग्रह नवम पंचम स्थान में हो ।

५४-ऊग्न में चंद्र व सप्तम में पाप ग्रह हो ।

५५-लग्न रों सूर्यं और चंद्र हो पाप ग्रह ९-५ या ८ घर में हो शुभ ग्रह की

उस पर दृष्टि न हो ।

५६-रूग्न से बारहवें घर में शनि, चवम में सूर्य, लग्न में चन्द्र, अष्टम में

मंगल बलवान्‌ हो उस पर गुरु की दृष्टि न हो ।

२१८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

अल्पायु ५७-क्षीण चंद्र णाप ग्रह युक्त हो १, ५, ७, ८, ९ में से किसी स्थान में शुभ

ग्रह भी न हो और न शुभ ग्रह की दृष्टि हो ।

» १प-चंद्र जिस राशि में हो उस राशि में कोई बलवान्‌ अरिष्ट कारक ग्रह हो।

» ५९-प्रातः व संध्या को किसी का जन्म हो उस समय जो लग्न हो उस लग्न में

चंद्र हो या पाप ग्रह उस लग्न के अन्तिम नवांश में हो ( प्रा० योग )

बाल अरिष्ट--जिस ग्रह की दशा में अर्थात्‌ जन्मकाल में जो शेष दशा किसी

ग्रह की हो उसके भीतर या अंत में मरे तो वह बाल अरिष्ट है ।

१. मंगल की राशि में गुरु अष्टम में हो सब पाप ग्रहों से दृष्ट हो शुभ ग्रहों की

दृष्टि न हो तो अरिष्ट हो ( जा० सं० )।

२. षष्ठ स्थान में चन्द्र हो तो अरिष्ट करता है ।

३. सूर्य ग्रहण हो, सूर्य लर्न में हो तो शस्त्र लगकर अरिष्ट हो ।

४. पाप ग्रह शत्रु या नीच राशि में हो तो अरिष्ट करता है । धन रहित, सुख

रहित बन्धन से संतप्त मरण करता है ( स० चि० ) ।

५. जन्म लग्न ककं या वृश्चिक हो इसमें पाप ग्रह लग्न से सातवें भाव तक हों

शुभ ग्रह सातवें घर से लग्न तक होवें तो अरिष्ट कारक है यह वज्मुक्ति योग

है ( जा० भ० ) ।

६. पाप ग्रह युक्त चन्द्र १, ७, ८, १२ घर में हो, केन्द्र शुभ ग्रह युक्त न हो, चन्द्र

पर शुभ दृष्टि न हो तो बालारिष्ट होता है ( जा० पारि० )।

७. १२ वें भाव में सव ग्रह अरिष्ट कारक होते हैं सूर्य शुक्र चन्द्र और राहु ये विशेष

नेष्ट होते हैं । परन्तु इन चारों की दृष्टि अरिष्ट भंग करने वाली होती है (वृ. पा.) ।

८. किसी भी राशि में एक अंश में शनि मंगल, चन्द्रमा से केन्द्र में हो तोऽवह

२ माता या दाई से पालित होने पर भी नहीं जीता ( वृ० पा. ) ।

९. चन्द्र को शनि विशेष तीसरी दृष्टि से देखें तो भयानक वाल अरिष्ट होता है

( ज्यो० रहस्य० ) ।

१०. लग्नेश चन्द्र राशीश और लग्न-नवांशेश तीनों सूर्य के साथ हों ।

११. पाप ग्रह लग्न और अष्टम स्थान में हो, नीच या शत्रु गृही चन्द्र हो, गुरु

केन्द्र में न हो।

१२. मंगल लग्न में हो, सूर्य शनि एक दूसरे के साथ लग्न से सप्तम में हों ।

१३. लगन से अष्टम में चन्द्र और सप्तम में मंगल हो, राहु नवम हो, शनि लग्न

में हो तो भयानक बालारिष्ट हो । द

१४. लग्न, चन्द्र ओर लग्न से अष्टम स्थान पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो ( ज्यो० रह० ) गुरु या शुक्र केन्द्र में हो, मंगल सूर्य शनि की दृष्टि हो तो बाल अरिष्ट नष्ट हो

जाता है । ( ज्यो० रह० ) ।

१५. संध्या में जन्म हो, चक्र का होरा हो और राशि नवांश से अन्य भाग में

जन्म हो ( ज्यो० शा० ) ।

आयुर्दाय विचार : २१५

मध्यायु ८--लग्नेश अष्टमेश और दशमेश इनमें २ बली हों शनि का योगन हो तो

श्र

५ £]

श्र

४७

11

मध्यायु ( जा० परि० )

९---मुरु केन्द्र त्रिकोण में हो और वह बलहीन लग्नेश के साथ हो ।

१०-छग्न से तीसरे और छठे घर का स्वामी केन्द्र में हो ।

११--गुर या शुक्र केन्द्र में हो।

१२--जो पुनवंसु नक्षत्र में उत्पन्न हो वह साधारण प्रकार से मध्यायु होता है ।

जवकि कोई वालारिष्ट या अल्पायू योग न हो ।

१३--जत्र कोई वालारिष्ट अल्पायु योग पूर्ण आयु योग न हो तो मध्यायु योग

समझना ।

अल्पायु योग

अल्पायु १--मेष वृश्चिक राशि का गुरु अष्टम में हो, सूर्य मंगल शनि चन्द्रगा से दृष्ट हो और शुक्र न देखता. हो तो अल्पायु हो (जा० भ० )

२--ग्रुर ओर शुक्र दोनों लग्न में

हों पाप ग्रह पंचम में हो

( जा० छं० ) ।

३-लग्नेश सूर्य युक्त होकर लग्न

में कूर ग्रहों से युक्त या दुष्ट

हो (जा० लं० ) ॥|

४--सातवें घर में मंगळ, आठवें

शुक्र, नवम सूर्य हो (छ. चं)

अल्पायु पर धनी हो ( मान० ) ।

५--वारहवे में चन्द्र,छठे में पापग्रह हो तो अल्पायु और रोगी हो (ल० च०) | ६--पांप ग्रह या लग्नेश से युक्त अष्टमेत्र अष्टम हो ( वृ० पा० ) जैसे अष्टमेश की स्थिति से आयु का विचार होता है उसी प्रकार दशमेश से भी विचारना ( वृ० पा० ) ।

७--पाप ग्रहों के साथ अष्टमेश कहीं हो ओर लग्नेश अष्टम स्थान में हो ( जैमि० ) इसी प्रकार शनि और दशमेश से भी विचारना ( जैमि० )। ८-लग्नेश नीच में हो, अष्टम स्थान पाप ग्रह से युक्त हो, लग्नेश निर्वल हो ( ज॑मि० ) ।

९-लग्न से पंचम स्थान, अष्टमेश ओर अष्टम स्थान पप ग्रह युक्त हो (जैमि०)। १०-अष्टमेश पाप गृही होकर ६-८-१२ भाव में पाप ग्रह युक्त हो (जैमि०) । ११-अष्टमेश पाप ग्रह युक्त ६ या १२ भाव में हो (जैमि०) । १२-अष्टमेश लग्नेश युक्त ६ या वारह भाव में हो और निर्वल हो ।

२१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

अल्पायु १३-दशमेश, लग्नेश अष्टमेश केन्द्र त्रिकोण या लाभ में हों तो दीर्घायु योग होता

श्र

है परन्तु उक्त ग्रह शनि के साथ हो तो अल्पायु योग हो जाता है (जैमि०) ।

१४-६-८-१२ भाव भें पाप ग्रह हो लग्नेश निर्वल हो शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट न

हा तो अल्पायु और संतान हीन हो ( जा० पारि० ) ।

१५-अष्टमेश या शनि क्रूर षष्ठ्यंश में हो पाप ग्रह युक्त हो ( जा० पारि० )।

१६-पाप ग्रह २-१२ भाव में क्रूर षष्ठ्यंश में हो शुभ दृष्ट न हो (जा.पारि.) ।

१७-लग्नेश नीच राशि नीच नवांशक में हो, पापग्रह छठे आठवें होवें,माँदि लग्न

में हो शुभ दृष्ट न हो तो अल्पायु हो अपने कुछ का नाशक हो (स० चि०) । १८-शनि लग्न मों हो किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो अल्पायु हो और

कुटुम्व का नाशक हो ( स० चि० )।

१९-अष्टमेश नीच में हो अष्टम भाव में पाप ग्रह हो, लग्नेश निर्बल हो (वु? पा० )। २०-तृतीयेश और मंगल ये दोनों या अष्टमेश और शनि ये दोनों अस्त हों या पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हों ( वृ० पा० ) ।

२१-छम्नेश पाप ग्रह युक्त ६, 5, १२ भाव में हो तो अल्पायु या संतान हीन हो ( वृ० पा० ) । २२-केन्द्र में पाप ग्रह हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो ओर लग्नेश निर्वल

हो ( वृ० .पा० )।

-२३-२, १२ भाव में पाप ग्रह हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो

(वृ० पा० ) 1

२४-छग्नेश और अष्टमेश दोनों अस्त नीचादि स्थिति में हों और निर्वल हों ( बूर पा० ) । २५-दशमेश, अष्टमेश, लग्नेश इन तीनों में कोई एक वली हो तो अल्पायु हो (जार पारि० ) । इन तीनों में कोई बली न हो तो गतायु समझो । २६-छग्नेश अष्टम में हो या अष्टमेश पापग्रह युक्त या दृष्ट होकर अस्तंगत या शत्रु गृही हो तो आयु रहित हो ( जा० पारि० ) । २७-अस्तंगत व बलवान्‌ पापग्रहों में दुःखी व अल्पायु जातक व उसको स्त्री हो (शंभु० ) । २८-छग्नेश पापग्रह होकर निवल हो, पाप ग्रह लग्न में हो ( जा० संग्र० ) । २९-नवम में सूर्य चन्द्रमा हो ( शंभु० ) । ३०-छम्नेश सूर्ये का शत्रु हो ( स० चिं० ) ।

३१-अष्टम घर में क्रूर षष्ठ चन्द्र हो और अष्टमेश या शनि पाप युक्त या दुष्ट हो ( स० चिंता० )।

३२-छणनेश बलहीन हो पाप ग्रह दृष्ट स्थान में हो ओर गुरु केन्द्र या त्रिकोण में हो (स० चिं० ) ।

आयुर्दाय विचार : २१९

१६. केन्द्र में चन्द्र हो और पाप ग्रह एक-एक कर के स्थित हों शुभ ग्रहों की

दृष्टि न हो। न १७. लर्न के उभय पाशवं ( २-१२ भाव में ) ओर सप्तम के उभय पाश्वं ( ६-८

भाव में ) यदि कूर ग्रह हो [ ज्यो शा० ]।

१८. १, ४, ७, ८, १० घर में कूर ग्रह हों, क्षीण चन्द्र लग्न में हो या चन्द्र

४, ७, ८ घर में हो और इसके पाशवं राशियों में क्रूर ग्रह हो [ ज्यो० शा० ]।

१९. क्षीण चन्द्र १, ५, ७, ८, ९. १२, स्थान में कहीं हो शुभ ग्रहों की दृष्टि न

हो, लग्न में चन्द्र, ८ घर में मंगळ, नवम में सूर्य, व्यय भाव में शनि हो और इनमें से किसी पर गुरु की दृष्टि न हो [ ज्यो० शा० ]। बाल मृत्यु

[१] लग्नेश तथा चंद्र २ पाप ग्रहों से युक्त हो [ स० चि० ]। [२] जन्म समय

चंद्रमा पर ग्रहण या परिवेष [ मंडल ] होवे तथा पाप दृष्टि हो | [ ३ ] पाप ग्रह से

दृष्ट मंगल सप्तम या अष्टम स्थान में होवे। [ ४ ] पाप ग्रह ३-६ घर में शुभ ग्रह

१२ वें घर में हो या चंद्रमा पाप युक्त ४-८ भाव में हो | [५] लग्न में सूर्य चंद्र व्यय

स्थान में पाप ग्रह हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो [स० चि० ]। [ ६] ६-८-१२

भाव में चंद्र हो, सूर्य के अतिरिक्त पाप ग्रह भंगल. शनि, राहु केतु से दुष्ट हो तो

लग्न में गुरु के रहने पर भी वालक मर जाता है [ जा०पारि० ] । [७] गण्डान्त

नक्षत्र में चंद्रमा हो पाप ग्रह युक्त या दुष्ट हो मृत्यु भाग में पाप दृष्ट हो । [ जा०

पारि० ]। मृत्यु भाग -मेषादि क्रम में चंद्रमा के अंश इस प्रकार मृत्यु सूचक है।

राशि १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १ ११ १२

चंद्र अंश ८ २५ २२ २२ २१ १ ४ २३ १८ २० २४ १० यहाँ अंश मृत्यु सूचक वर्ष भी बताते है जेसे मेष राशि का चंद्र ८° पर हो तो ८

वषं में मृत्यु सूचक है [ जा० पारि० ]।

मतान्तर

नीचे बताये राशि के अंश में जन्म हो तो अशुभ है इनमें जन्मे बालक की

मृत्यु हो जाती है । [जा.भ.]

राशि १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२

अंश ८ २९ २३ २२ ५ १ ४ २३ १८ २० २१ १०

[5] क्षीण चंद्र लग्न में हो पाप ग्रह केन्द्र या अष्टम में हो [जा०पारि०] । [९]

लग्नेश नीच राशि में हो या लग्न से अष्टम हो और शनि भी नीच में हो या सप्तम

हो [ जा० पारि० ]। [१०] शनि सूर्य मंगल १२-८-९ भाव में हों उन पर शुभ ग्रह

की दृष्टि न हो [ वृ० पा० ] 1 [११] क्षीण चंद्र लग्न में हो जिसके द्रेष्काण या सप्तम

भाव में पाप ग्रह न हो [ वृ० पार ] 1 [१२] सम्पूर्ण ग्रह अष्टम में हों तो मृत्युप्रद हैं

यदि चंद्रमा हो तो विशेष कर मृत्युप्रद है [ मान० ]। [१३] यदि सूर्य चंद्र शनि त॑नों

पाप ग्रह युक्‍त हों तो मृत्यु हो । [ जा०सं० ]। [१४] सब केन्द्र भाव पाप ग्रह और

२२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

चंद्रमा से युक्‍त हों [जा० सं० ]। [१५] सप्तम और लग्न में पाप ग्रह हों चंद्रमा भी

पाप युक्त हो और शुभ दृष्टि न हो [जाण्सं०] । [१६] सप्तम और लग्न दोनों में

ग्रहों का कतंरी योग हो [जा० सं०] । [१७] पाप युक्त चंद्र १, ६, ८, १२, भाव में कहीं हो शुभ ग्रह की दष्टि न हो और केन्द्र में शुभ ग्रह हो । [ जा० सं० ]। [१८]

लर्न में चंद्र, अष्टम में मंगल, नवम में सूर्य, व्यय में शनि हों ओर गुरु की दृष्टि न

हो [ जा० सं० ] । [१९] पाप युक्‍त क्षीण चंद्र शुभ ग्रह की दृष्टि से हीन १, ५, ७,

=, ९, १२ भाव में कहीं हो [ जा० सं० ]। [२०] लग्न में सूर्य और चंद्र हो शुभ

ग्रह की दृष्टि न हो या बलवान्‌ ग्रह त्रिकोण और अष्टम में हो [ जा० सं० ]। [२१] जो राशिसंधि में उत्पन्न हुए हों वे शीघ्र मरते हैं जबकि पाप ग्रह उनको देखते हों ।

राशि के ३०० होते हैं किसी एक के मान लो ३° है और आगे की राशि के आरंभ

के २, मिलाकर संधि हो जाती है । इनमें अंतिम नवांश और पहला नवांश मृत्यु ओर

भय करते हैं जब पाप ग्रह युक्त हो दृष्ट हो या तो मृत्यु करते हैं । यदि अपने अच्छे कर्म

से या माता पिता के शुभ कर्मों से वच जावें तो धन वाहन युक्त राजा होगा ( स० चि० )। [ २२ ] लग्न में शनि, अष्टम में चंद्र, तृतीय में गुरु हो [ वृ० पारा ]। [ २३ ] षष्ठ में पाप गृही पाप ग्रह युक्त चंद्र हो [ जा० सं० ]। [ २४ ]लग्न में सब पाप ग्रह, व्यय भाव में गुरु, छठे घर में बुध हो । [२५] पाप ग्रह अष्टम भाव में

शुभ ग्रह के नवांश में हो पाप ग्रह से दृष्ट हो [ ल० चं० ]। [ २७ ] अष्टम में राहु केन्द्र में चंद्र हो. [ छ० चं० ]। [ २८ ] लगन में कूर ग्रह और मंगल के घर में गुरु हो | छ० चं० ] । [ २९ ] सप्तम में या चतुर्थ में २ पाप ग्रहों के वीच चंद्रमा हो

[ लं० चं० ]। [ ३० ] अष्टम में पाप ग्रहों से दुष्ट शनि हो [ छ० चं०]1[ ३१] छर्न में सूर्य, पंचम में चंद्र, अष्टम में पाप ग्रह हो [ ल० चं० ]। [ ३२ ] त्रिकोण

केन्द्र मे पाप ग्रह ६-८-१२ घर में शुभ ग्रह हो तो सूर्योदय में जन्मा वालक प्राण त्यागे

[ छ० चं० ]। [ ३३] १,६, ७, ८, भाव में शनि युक्त मंगल हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो [ छ० चं० ]।

[ ३४ ] व्यय में पाप ग्रह हो जो लग्न में आने को हो और षष्ठ में पाप ग्रह हो वह सप्तम में जाने को हो । [ वू० जा० ] [ ३५ | दूसरे आठवें भाव में पाप ग्रह वक्री हो । [ वृ० जा० ] [ ३६ ] क्षीण चन्द्र व्यय में हो, लग्न और अष्टम में पाप

ग्रह हो किसी केन्द्र मै शुभ ग्रह न हो। [ वृ० जा० ] [३७] पाप युक्त क्षीण चन्द्र 1, ७, ८ १२ भाव में हो चन्द्र पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो और केन्द्र में शुभ ग्रह न हों । [ वृ० जा० ] [ ३८ ] लनन में क्षीण चन्द्रमा हो अष्टम और केन्द्र में पाप ग्रह ' हो [ बृ० जा० ] [ ३९ | पाप ग्रहों के वीच चन्द्र ४, ७ या ८ स्थान में हो । [४०] छर्न में सूर्य चन्द्र, त्रिकोण में पाप ग्रह हो वा बलवान शुभ ग्रह से युक्त या दुष्ट न हो [ वृ० जा ] [ ४1 ] भावसंधि, तिथिसंधि और राशि संधि इनमें एक दो या तीन एक साथ पड़ जाने उस समय जन्म हो [ स० चि० ] परन्तु शुक्रवार का दिन हो तो मृत्यु नहीं होती ऐसा चन्दीश्वर का मत है। [ ४२ ] राशि संधि में