सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
२८० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
५--सिह राशि या नवांश--विस्फोट ( फोड़ा ) व शस्त्र प्रहार, व ज्वर आदि
से मरण ।
६--कन्या राशि या नवांश--जठराग्नि ब गुद्यरोग व कलह या पातक आदि
से मरण ।
७--तुला राशि या नवांश--जुद्धि के दोष से व ज्वर या सन्निपात दोष से मृत्यु ।
८-र्वृश्चिक राशि या नवांश-पांडु "रोग, संग्रहणी रोग व ग्रह आदि दोष से मृत्यू ।
९--घनु राशि या नवांश--वृक्ष जल शस्त्र काष्ठ किसी से मृत्यु ।
१०-मकर राशि या नर्वांश--स्थूलान्न की अरुचि से व बुद्धि भ्रांति से मरण ।
यदि पाप युक्त हो तो व्याघ्र व सर्प आदि जीवों से मृत्यु ।
११-कुम्भ राशि या नवांश--व्याप्र से व शस्त्र व सपं आदि से,श्वास, ज्वर, क्षय,
से मृत्यु ।
१२--मीन राशि या नवांश--मार्ग में प्राप्त हुआ पुरुष, सपं आदि से या जल मध्य
में जल जीवों से व मेघ प्रकोप से पीड़ित होकर मरण ( जा० सं ) ।
लग्नेश जिस नवाँश में हो उस राशि के कोप से मृत्यु
१ मेष राशि के नवांश में--ताप ज्वर या अग्नि से।
२--वृष राशि के नवांश में-विकार या शूल रोग से ।
३--मिथुन राशि के नवांश में--सिर की पीड़ा से ।
४--कक राशि के नवांश में-वात और उन्माद से । रु
५--सिंह राशि के नवांश में--विस्फोट से । डे
६--कन्या राशि के नवांश में--जठराग्नि से 1
७--तुला राशि के नवांश में--शोक से, चतुष्पाद या ज्वर से ।
८--वृश्चिक राशि के नवांश में --पत्थर और शस्त्रादि से ।
९--घनु राशि के नवांश में--वायु से ।
१०--मकर राशि के नवांश में--व्याप्नादि से ।
११-छुभ राशि के नवांश में--व्याध्र या स्त्री से! १२-मीन राशि के नवांश में-ज्वर से, अतिसार से ( जा० पा० )। लग्न से २२ द्रेष्काण जो हो उसका स्वामी व अष्टम भावेश अपने गुणों से मरण सूचित करता है ।
अष्टम में कोई ग्रह न हो या किसी की दृष्टि न हो तो नीचे बताये अनुसार द्रेष्काण का फल बिचारना । लग्न से २२ द्रेष्काण के स्वामी के हेतु मरण कहा गया है। [१] मेष १ द्रेष्काण--शुभ ग्रह उसे न देखते हों) ताप तिल्ली रोग, विष या पाप ग्रह देखते हों | पित्त रोग से व बिच्छ सपं आदि से भरण॥ | » २ द्रेष्काण--जल जीवों से जल से व बन के वीच मृत्यु । » २ द्रेष्काण- छुँआ तालाब बावली आदि में गिरने से ।
मारक स्थान : २८१
1२] वृष का १ द्र०-गधे, घोड़े या अँटो से मृत्यु ।
० २ द्रें०--पित्त, प्रकोप, अग्नि व चोर से या भेड़, बकरी द्वारा मरण।
र ३ द्रे०--सवांरी आदि या ऊँचे से गिर कर व संग्राम में मरण । [३] मिथुन १ द्रे०--वात विकार, श्वास विकार, खाँसी व दुष्ट रोग से मरण ।
0 २ द्वे०--भैसा, बैलों के द्वारा, त्रिदोष से या गिरने से मरण ।
त ३ द्वेए-हाथी वाहन आदि से,पहाड़ से गिरने से, या जंगल में मृत्यु ।
[४] ककं १ द्रे--जो पीने लायक नहीं उसके पीने से, कांटा के लगने से,
स्वप्न के देखने से, कंठ रोग मंदाग्नि या अस्त्रशस्त्र द्वारा ।
„„ रै द्रे०--विष आदि दोष से या अतिसार से, दण्ड आदि या मुष्टि
प्रहार से।
„» दे ्रे०-वड़े श्रम स, ताप तिल्ली गुल्म रोग से, अतिसार व जीण
रोग से या प्रमेह, मूर्छा आदि रोग से।
[५] विह १ द्रे--विष से या जळ के रोग से या बहुत खाने से या पशु
आदिं से ।
„ रे द्रे०--वात रोग या जळ से, जल जीव या हृदय रोग से।
„ दे द्रे०--गुदा के रोग, विष तथा शस्त्र से ।
[६] कन्या १ द्रे०--बात रोग या सिर के रोग से, चोर अग्नि व पक्षी से | » २६०--किला कोट या पर्वत से गिरने से, सपं तथा दाढ वाले
जीव या घोड़ों से या तृष्णा से ।
» रे दे०-गधे, ऊंट, शस्त्र, या जल में गिरने से, स्त्री के निमित्त से,
शाप या स्त्री कृत अन्नपान सं मरण ।
[७] तुला १ ४०-पगिरने से, स्त्री से व पशुओं से ।
„ रे ब्रे०--पेट के रोग से मरण ।
.„ उडे ब्रे०--सपं से या जल से, तुम्बी आदि ऊपर गिरने से ।
[८] वृश्चिक १ द्रेष्काण-विष अजीणं या शस्त्र से या स्त्रीकृत अन्नपान से ।
» २०--बोझ के श्रम से, कटिया वस्ति के रोग से या कुत्ता
आदि से ।
„ रै द्रे०--जांघ की हड्डी टूटने से, लोह की कील या काष्ठ से, मूग
हाथी ऊंट आदि के प्रहार से ।
[९] धन १ द्रे०-गुदा के रोग या वात विकार से।
३ द्रे-र्दाह रोग से, विष से, बाण से, अग्नि से ।
१, रे द्रे०--जल से व जळ जीव धारियों से, या पेट के रोग से।
[१०] मकर १ द्रे०--शेर, सुअर व बेल से या राजाओं द्वारा ।
० रे द्रे०--घोड़े की लात या सपं से व जल जीवों से ।
» ३ द्वे०--चोर, अग्नि, शस्त्र व ज्वर से ।
22
EL
२५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
[११] कुम्भ १ द्रे०--स्त्री से,पुत्र से उदर व्याधि से, जळचारी जीव, स्त्री विष से
मरण हो ।
/ २ द्रे०--गुद्यरोग विष व पवत से गिरने से, गुदा के रोग से ।
रै द्रे०--मुख रोग या चोपाये से ।
[१२] मीन १ द्रे०-ंग्रहणी, प्रमेह, गुल्म रोग व स्त्री से।
, २ द्रे०--जलोदर आदि रोग से, हाथी से या ग्रह से, जल में स्नान
आदि करने से ।
„ दै द्वे०--बुरे लोगों से, जल से या अश रोग से या मूत्रकृच्छु से
मरण हो 1 मरण स्थान का योग
द्वारिका में १--अष्टमेश नवम में हो गुरु शुक्र बुध या चन्द्र इनमें से किसी से
दृष्ट हो तो उस शुद्ध बुद्धि वाले का मरण द्वरिका में हो । २--अष्टमेश व अष्टम
भाव का द्रेष्काण पति होकर बुध शुक्र नवम भाव में हो तो द्वारिका तीर्थ में मरण हो ।
प्रयाग में १--अष्टमेश व अष्टम भाव का द्रेष्काण पति होकर चन्द्र नवम भाव
में हो तो प्रयाग में मरण हो ।
काशी में १--अष्टमेश व अष्टम भाव का द्रेष्काण पति होकर चन्द्र नवम भाव
में हो तो काशी में मरण हो । २--नवमेश शुक्र होकर अष्टम में हो तो काशी में
मरण हो । ३--नवमेश शुभ ग्रह होकर अष्टम में हो और शुभ ग्रह युक्त या दुष्ट हो
तो काशी में मरण हो ।
` तीर्थं में १--अष्टमेश शुभ ग्रह हो ओर अष्टम भाव शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो तीर्थ में मरण हो । २--नवमेश नवम में हो और शुभ ग्रहों सें दृष्ट हो तो तीर्थ «में मरण
हो । ३--नवमेश नवम को देखें और लग्नेश लग्न और अष्टमेश अष्टम को देखे तो
शुभतीथं में मरण हो । ४--अष्टमेश अपनी राशि में हो या लग्नेश के साथ या गुरु या
शुक्र के साथ हो तो अच्छे तीर्थ में मरण हो । ५--अष्टमभाव शुभ ग्रह से युक्त और दृष्ट हो या अष्टमेश से युक्त हो तो अच्छे तीथं में मरण हो । ६--अष्टम भाव शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो और नवमेश शुभ ग्रह हो । ७--अष्टमेश शुभ ग्रह होकर केन्द्र में हो तो तीर्थं जावे वहाँ हरि-कीर्तन में मुक्ति होवे ।
गंगाजळ के समीप- जन्म राशि से वजित होकर ३ ग्रह एक राशि में हों तो हजा
पापों को त्याग कर गंगा जल के समीप मरण हो ।
शिवालय में--बुध व्ययभाव में हो तो शिवालय में मृत्यु हो । श्रेष्ठ भूमि मंदिर या वाटिका में-द्वादश भाव में सूर्यं मंगल दोनों हों ओर सप्तम
में राहु चंद्रमा हों, गुर केन्द्र में हो तो श्रेष्ठ भूमि व देव मंदिर या वाटिका में
मरण हो ।
शुम स्थान- तृतीय स्थान में शुभ ग्रह का योग दष्टि हो तो शभ स्थान तीर्थ आदि में मरण हो ।
मारक स्थान : २८३
मगध
अशुभ स्थान-- तृतीय स्थान में पाप ग्रहों का योग या दृष्टि हो तो अशुभ स्थान आदि में मरण हो । मध्य स्थान प
की योग या स्वगृह में--तृतीय स्थान में शुभ ओर पाप दोनों प्रकार के ग्रहों दृष्टि हो तो मध्य स्थान अर्थात् अपने ही घर में मृत्यु हो । .
शनि
विष्ठा के मध्य--दशम में क्षीण चंद्र और मंगल की राशि में सूर्य हो चंद्रमा की राशि में हो तो विष्ठा के मध्य मरण हो ।
घर में
शुभ विधि से अपने घर में--नवमेश गुरु होकर अष्टम में हो तो शुभ विधि से
अपनी
मरण हो, अष्टमेश व अष्टम भाव द्रेष्काण पति गुरु होकर नवम में हो तो भूमि में मरण हो । परदेश में मरण--अष्टमेश व अष्टम भाव का द्रेष्काण पति मंगल होकर नवम में हो तो परदेश में मरण हो
` तो कुंआं
जल के समीप मरण--चतुर्थेश लग्नेश के साथ चतुर्थ में हो दशमेश से दृष्ट हो आदि जलाशय के समीप मृत्यु हो । मरण भूमि ज्ञान
भूमि
` जन्म लग्न में जो नवांश हो उसका स्वामो जिस राशि में हो उस राशि की जो हो उस भूमि में मरण होगा । जैसे :--१-मेष-बकरी र-वृष-गाय या भेड़ों का स्थान । बैल आदि ढोरों का स्थान | ३-मिथुन-घर का स्थांन । ४-ककं- कूप आदि के समीप । ५-सिह-वन का स्थान । ६-कन्या-कुंआ के समीप । ७-तुला- बाजार
१०-मकर-जळ
या दुकान के समीप । ८-वृश्चिक-छिद्र की जगह । ९-धनु-घोड़े का स्थान । के समीप । ११-कुंभ-घर का स्थान । १२-मीन-जळ के समीप । १--जिन मरने के योगों में जलादि से मरना कहा है उनको मृत्यु जलादि में ही होगी । उनका यहाँ बताये राशि वश से मरण भूमि नहीं कहना । २- ग्रह लग्न नवांश पति की और लग्न नवांशेश जिसके नवांश में हो उसकी जो भूमि कही है उससे मृत्यु जानना । जहाँ बहुत प्रकार से भूमि का होना प्रगट हो वहाँ उनमें बलीग्रह से मरण भूमि का निर्णय करना ।
हो
३--लग्न नवांशेश जिस राशि में हो वहाँ ओर किसी ग्रह का साथ नवांशेश से उस योग करने वाले ग्र ह की योनि भेद में जो भूमि बताई गई है उस भूमि में मृत्यु हो । ४--जिस ग्रह की दो राशियाँ हों तो उसकी जो मूल त्रिकोण राशि हो, उसे लेना ओर उसके अनुसार भूमि कहना जैसे :-- सूर्य का मूल त्रिकोण--सिह राशि है जिसकी भूमि-वन है । चंद्र का मूल त्रिकोण कर्क राशि है जिसकी भूमि-जल समीप है । मंगल का मुळ त्रिकोण--मेष है भूमि-भेड़ बकरी का स्थान । बुध का मुल त्रिकोण--कन्या भूमि-कूप या जल समीप । ' उुरु का मूल त्रिकोण धनु, भूमि-घोड़े का स्थान ।
२८४ : संचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
शुक्र का मूल त्रिकोण--तुला, भूमि-दुकान आदि का स्थान ।
शनि का मूल त्रिकोण--कुंभ,,भूमि-घर का स्थान ।
अन्यमत से ऐसी परिस्थिति में ग्रहों की जो भूमि गुणधर्म में कही है वह लेना
अर्थात् मंगल-अरिन स्थान । चुध-बिहार । गुरु-भंडार स्थान । शुक्र-शयन स्थान ।
शनि-ऊषर भूमि ।
५--अष्टम भाव का नवांश ( लग्न से ६४वाँ नवांश ) जिस राशि का हो उस
राशि से भी मरण की भूमि का विचार करना ।
मरण की दिशा
दिन के जन्म में रात्रि बली राशि या रात्रि के जन्म में दिन बली राशि लग्न में
हो तो लग्न गत नवांश पति, उसमें स्थित ग्रह, और उसके देखने वाले ग्रहों में जिसका
स्थान बल अधिक हो उसकी दिशा में जातक की मृत्यु हो ( जा० पारि० ) । मृत्यु के पश्चात् शव संस्कार
अष्टम स्थान में जो तत्कालिक द्रेष्काण होता है वही लग्न से २०वाँ द्रेष्काण
होता है वह द्रेष्काण यदि :---अग्नि द्रेष्काण ( पाप द्रेष्काण ) हो--तो प्रेत का अग्नि
संस्कार ( दाह ) हो ।
जल द्रेष्काण ( शुभ द्रेष्काण ) हो-जल में बहाया जाय ।
मिश्र द्रेष्काण ( शभ और पाप दोनों ) हो कहीं ऊसर भूमि में सूखेगा ।
सपै द्रेष्काण हो तो--शरीर को कुत्ते, कोवे, चील, स्यार आदि खावें । वाद गति
न हो।
सपं द्रेष्काण--कर्क का पहिला, वृश्चिक का दूसरा, मीन का तीसरा (वु० जा०) ।
सपं द्रेष्काण भन्यमत से-कर्क का २, ३, वृश्चिक का १, २ मीन का १ (वृ. पा.) ।
यदि सौम्य द्रेष्काण हो तोमि-ट्टी में गड़ाया जावे । 1
यदि जलचर द्रेष्काण हो तो--जल में बहाया जावे ।
शव का दाह न हो--छग्नेश जल राशि के नवांश में होकर जल राशि में हो
ओर चन्द्र शुक्र से दृष्ट हो और पाप ग्रह ८,१२ घर में हो तो उस शव का दाह
संस्कार नहीं होगा ।
मरने के बाद दुर्गेति-द्वादश भाव शनि राहु या केतु से युक्त हो फिर अष्टमेश
से युक्त हो या षष्ठश से दुष्ट हो तो मरने के वाद दुर्गति हो ।
मृत्यु के पश्चात् गति
१--जिसका ६, ७, ८ भाव ग्रह रहित हो तो तत्काल में जो ६ और ८ स्थान
में जिस का द्रेष्काण हो उसमें जो वली हो उसके अनुसार पूर्व बताई हुई प्रत्येक
पश्चात् गति द्रेष्काण के अनुसार होगी। ६, ७, ८ भाव में कई ग्रह हों सभी जगह
ग्रह हों तो उनमें से जो बलवान् हो उसके अनुसार गति मिलेगी । मोक्ष
१-जगुर कके का ६,८ या केन्द्र में हो ।
मारक स्थान : २८%
२--मीन का गुरु लग्न में हो और शुभ ग्रह के अश में हो शेष ग्रह निर्बल हों ( वृ० जा० ) ।
३--१२ वें भाव मे शुभ ग्रह हो व्ययेश शुभ ग्रह से युक्त दृष्ट हो [वृ० पा०] 1 ४““गुद धनु लर्न में मेष के अंश में हो, शुक्र सप्तम हो और बली चंद्र कन्या राशि में हो [ जा० पारि ] ।
५-यय में केतु हो तो मुक्ति लाभ हो [ स० चितामणि 11 ६--दशम में मीन राशि का बुध या मंगल हो [ स० चि० ]। ७--दशम में मीन राशि हो शुभ ग्रह युक्त या मंगल युक्त हो { स० चि० ]1 ८--कहे हुए निर्वाण योग न हों उसके अष्टम भाव का द्रेष्काण पति बली होकर ६,७ या केन्द्र में हो तो मोक्ष हो [ जा० सं० ] ।
९--युरु स्वगृही ६-८ या केन्द्र में हो [ प्रा० यो० ] मोक्ष कहाँ होगा
मोक्ष द्रेष्काण पति यदि-:---
सूर्य हो--नमंदा नदी के पुर्व तट या शोण के या यमुना के दक्षिण तट में । _ चंद्र हो--शोण के उत्तर या अयोध्या, सरस्वती व वेत्रवती में मरण हो। मंगल हो--कृष्णा, गोदावरी, नमंदा तीथ, फल्गुतीर्थ या गंगा तट में । बुध हो--गंगा, कौशिकी, गंभीरा व वासिष्ठी नदी को प्राप्त होकर मरण । गुरु हो--सिधु, मथुरापुरी, विपाशा नदी को प्राप्त होकर मरण । उच्च का केन्द्री गुरु--काशी, ऐरावती, गंगा व रामपुरी को प्राप्त होकर मरण ? मोक्ष स्थान 2
मोक्षमार्गी पति उच्च का शुक्र हो- शततद्रु, चन्द्रभागा, इरावती, गंगा व देविका । मोक्षमार्गी पति उच्च का शनि हो--प्रभास क्षेत्र, कुरुक्षेत्र, बटेश्वर, सरस्वती व दृषद्वती में मरण [ जा० सं० ]।
मृत्यु के पश्चात् प्राणी किस लोक जायगा
१--छग्न से ६,७,८ स्थान में कहीं गुर हो तो--देव लोक को जायगा । लग्न से ६,७,८ स्थान में शुक्र चंद्र हो तो--चंद्र लोक [पितृ लोक] । लग्न से ६:७,८ स्थान में सूर्य मंगल हो तो--भूलोक या तियंग्योनि [कीटादि] । लग्न से ६,७,८ स्थान में बुध शनि हो तो--अधो लोक [नरक] ` जायगा ; २--६,७,८ भाव में कोई ग्रह न हो तो ६,८ भाव के द्रेष्काण पति में जो वलवान् हो उस ग्रह के लोक में जायगा ।
३--या मरण काल के लग्न में उपरोक्त ग्रह से लोक विचारना या उनमें बली
द्रेष्काण पति से लोक विचारना ।
४--इनमें भी ग्रह की उच्च नीच या मध्यम की स्थिति के अनुसार गति की श्रेणी
का विचार होता है । जंसे--
२८६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
उक्तग्रह उच्च में हो या द्रेष्काणेश पर शुभ दृष्टि हो तो--देव लोक आदि में
श्रेष्ठ श्रेणी मिलेगी ।
उक्तग्रह नीच में हो--देवलोक आदि में नीच श्रेणी मिलेगी ।
नीच उच्च के मध्य में--देवलोक आदि में मध्यम श्रेणी मिलेगी [स० चि०]।
५ू---राशि चन्द्र के अनुसार ३ लोक का स्थान निर्णय---
१,२,३,४ ये ४ राशि भूचक्र है--ये मरण काल में हों तो--भूलोक जाता है।
५,६,७,८ ये राशि भुवश्चक्र है--ये मरण काल में हो तो--भुवलोक जाता है ।
९,१०,११,१२ ये राशि स्वश्चक्र है--ये मरण काल में हों तो--स्वगं लोक
जाता है [जा० पारि०]।
६--व्यय भाव का ग्रह, या व्ययेश या व्यय भाव के नवांश से भी विचारना
कि मृतक कौन लोक को जायगा । ये ग्रह यदि--
सुर्य चंद्र हो-कैछास में । शुक्र हो-स्वगं में । मंगल हो-पुथ्वी में । बुध हो-वेकुण्ठ
में । शनि-यम स्थान में । गुरु-भ्रह्म लोक में । राहु-दूसरे द्वीपों में । केतु-नरक में
जायगा [फल दी०] ।
७--शीर्षोदय पृष्ठोदय राशि के अनुसार विचार--शीर्षोदय राशि हो तो--स्वगं
में जावे । पृष्ठोदय राशि हो तो--नरक में जावे [फल०] ! मृत्यु के पश्चात् स्वगं नरक प्राप्ति के योग
स्वगं प्राप्ति-१-वारहवें भाव में उच्च का शुभ ग्रह हो[शुभ ग्रहों से दृष्ट हो और
देव)लोकादि अच्छेअंशक में हो तो मृत्यु के बाद स्वगं प्राप्त हो । २-यदि दशमेश देवांश
में हो या १२ वें घर पर शुभ दृष्टि हो तो स्वगं प्राप्त हो [स० चि०| ३-अन्य मतदशमेश गुरु व्यय भाव में शुभ ग्रह से दृष्ट हो [स० चि०] । ४-व्ययेश उच्च में या
मित्र गृही या शुभ के वग में हो या शुभ ग्रह युक्त हो तो मृत्यु के पश्चात् स्वगं प्राप्त
हो [फल०] । ५-शुभ ग्रह उच्च राशि का १२ वें भाव में हो उसे पाप और शुभ ग्रह
देखते हों और शुभ वर्ग में भी हो तो मृत्यु के बाद स्वर्ग मिले [जा० पारि०]। ६-
गुरु दशमेश होकर १२ वें भाव में हो शुभ ग्रहों से युक्त दृष्ट हो तो मृत्यु के पश्चात्
ऊपरपद [देवपद] प्राप्त हो [जा० पारि०] । ७-वली गुरु कर्क लग्न में धनु के नवांश
में हो ओर ३-४ ग्रह केन्द्र में हों तो मत्यु के बाद ब्रह्मपद पाता है [जा० पारि०] 1
नरक प्राप्ति--१-बारहवें घर का स्वामी पाप षष्ठयंश में हो पाप ग्रह की दृष्टि
हो । २-राहु, गुलिक और अष्टमेश से युक्त होकर यदि १२ वें भाव में हो षष्ठेश से
दृष्ट हो तो मृत्यु के बाद नरक मिले [जा० पारि०]। ३-सूर्य मंगल के साथ राहु
१२ वें भाव में हो या द्वादशेश सूयं के साथ हो [वृ० पा०] । ४-व्ययेश पाप ग्रह के
अंश में, कूर अंश में या पाप ग्रह युक्त दृष्ट हो । ५-व्यय में राहु और मांदि अष्टमेश
युक्त हो या षष्ठेश से दृष्ट हो । ६-व्यय भाव राहु और केतु या अष्टमेश से युक्त या
षष्ठेश से दृष्ट हो तो मृत्यु पश्वात् नरक में जावे [स० चि०] ।
मारक स्थान : २८७
जातक किस लोक से आया है १-खूयं चंद्र दोनों में जो बली हो वह जिस द्रेष्काण में पड़े उसका स्वामी यदि गुरु हो--देवलोक से आया है । यदि चंद्र शुक हो--पित् लोक से (चंद्र लोक से )। यदि सूर्ये मंगल हो--पशुलोक, मर्त्यं लोग या तिर्यक् लोक से । यदि शनि बुध हो--नरक से । यदि ग्रह उच्च के हों तो-पूवं बताये लोक में उच्च स्थिति रही । यदि ये ग्रह नोच के हों तो--पूर्व बताये लोक में नीच स्थिति रही । यदि ये ग्रह मध्य के हों तो--पूवं बताये लोक में साधारण स्थिति रही (वृ० पार०) ।
पूवं जन्म और भविष्य जन्म का हाल जानना पूर्व जन्म का -नवमेश से पूवं जन्म का हार प्रगट होता है। भविष्य का--पंचमेश से भविष्य का हाल प्रगट होता है। इन ग्रहों से जाति, देश, स्थान और दिशा आदि से पूर्व जन्म या भविष्य जन्म का विचार करना ।
उपरोक्त ग्रह उच्च का हो--वह देश देवताओं का होगा । उपरोक्त नीच या शत्रुगुही हो--विदेश । उपरोक्त स्वगृही, मित्र गृही या समगुही हो--वह देश भारत वर्ष होगा । ग्रह् के अनुसार देश विचार गुरु आर्यावर्त जो पूवं से पश्चिम समुद्र तक, उत्तर में हिमाळप, दक्षिण में विष्याचल ।
शुक्र, चंद्र--पवित्र नदियों के जल के समीप का देश । बुध--पुण्य स्थल ।
शनि--निद्य स्थान जो विदेशियों (म्लेच्छों) के कब्जे में हो । सूर्य--पहाड़ और जंगल देश ।
मंगल--विहांर देश (फल दी०) । गत जन्म में क्या था अगले जन्म में क्या होगा विचार पहिले वता चुके हैं कि नवमेश से पूवं जन्म का हाळ और पंचमेश से भविष्य जन्म का हाल जाना जा सकता है। उनसे यहाँ विचारमा कि क्या था और अब क्या होगा ।
वृक्ष लता आदि--पंचम और नवम के स्वामी स्थिर राशि या अंश में हों और पृष्ठोदय अधोमुख राशि भी हो तो वृक्ष लता आदि गत या भविष्य जन्म की योनि कहना ।
पशु जन्म--यदि ९ ओर ५ के स्वामी शोर्षोदय राशि में हों और ऊध्व॑मुख राशि में हो जिसमें चर राशि या अंश हो तो जन्म जानवरों के प्रकार का समझना ।
२८८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
मनुष्य जन्म-यदि ९ या ५ के स्वामी लर्नेश के उच्च या स्वक्षेत्री में हों 'तो
मनुष्य जन्म जानता ।
पशु योनि--यदि उपरोक्त राशि का ग्रह लग्नेश का सम हो तो पशु योनि का
जन्म समझना ।
पक्षी जन्म--यदि राशि शत्रुगृही या नीच में हो तो पक्षी का जन्म थाया
होगा । ९ या ५ भाव के स्वामी का द्रेष्काण विचार कर, द्रेष्काण के स्वरूप पर भी
विचार कर कहना (फल०) |
स्वस्थान में जन्म--यदि उपरोक्त दोनों ग्रह एक घर में हों तो अपने ही स्थान
में जन्म हुआ था या होगा ।
स्वजाति में जन्म--यदि वे बराबर बल के हों तो जन्म उसी जाति में हुआ था
या होगा ।
रंग गुण--रंग और गुण ९ या ५ भाव के स्वामियों के अनुसार विचारना संज्ञा
अध्याय में जो गुण घमं आदि कहा है उस पर पुर्ण विचार कर फल कहना (फल०) ।
पताकी अरिष्ट विचारा . मि० वृष मेष
३९ १७ १६
२० ६ १०
तुला वृश्चिक घन
यहाँ पताकी चक्र में राशि स्थिर हैं ओर यहाँ जो अंक दिये हैं वे अरिष्ट समय
सूचक हैं। इस चक्र में कुंडली के अनुसार जिस राशि पर जो ग्रह हो और जहाँ लग्न
हो लिख दिया जाता है। फिर दंडाधिपति ग्रह का निर्णय कर वैसा लिख दिया जाता
है | यदि छग्न से दंडाधिपति ग्रह का वेध हो तो पताकी अरिष्ट होता है और अरिष्ट
का समय जानने को वेध राशियों के योग से प्रकट होता है ।
वेध विचार--इस चक्र में सरल रेखा द्वारा ३ राशियों का सम्बन्ध
ओर उन्हीं ३ राशियों का वेध होता है । si
मारक स्थान: २८९.
यहाँ मेष और मिथुन राशि किसी वेध स्थान में नहीं है । इस कारण ककं का वेध
स्थान मिथुन नहीं होगा । परन्तु मिथुन का वेध स्थान कक होगा । इसी प्रकार सिंह
का वृष के साथ। कन्या का मेष के साथ । ओर तुला का मिथुन के साथ वेध नहीं
होगा । केवल नीचे बनाये चक्र के अनुसार ही राशियों का वेध होगा ।
राशि १ २ RM TIED (७. ८ 5 ९ RNS
बेघर HE YY UG VTS SP MR
राशियों ९ ५. ७ ९ दळ ७ ६. ५ (६० पः
१२ ११ १० १२ ११ १० १२११ ४ ९ ८ ७
मेष-वेध कन्या+धन+मीन योग इस प्रकार यहाँ मेष वृष मिथुन
२ १० ४ १६ १६ १७ २९
वृष-वेध वृश्चिक+सिहनकुंभ बताया है । शेष राशियों के चक्रानुसार अंक ही
६ ८ ३१७ रहेंगे अर्थात् ककं सिंह कन्या तुला
मिथुन-वेध कक+तुला+मकर ष्र ८ २ २०
५ २० १४ ३९ वृश्चिक धन मकर, कुम्भ और मीन ।
६ १० १४ ३ ४
पताकी वेध विचार के लिये पहिले यमाद्धं निकाल कर फिर दंडाधिपति निकालना
पड़ता है । जो ग्रह दंडाधिपति हो उस पर ऐसा लिख देना पड़ता है । फिर लग्न से
दंडाधिपति का वेध होता है या नहीं उपरोक्त चक्र से देखना पड़ता है । वेध होने से
पताकी अरिष्ट कहलाता है ओर वह अरिष्ट कब होगा, उनके वेध कारक राशियों. के
अंक या जोड़ करने से पता लग जाता है ।
यमाद्धं जानना
यमाद्धं रात और दिन का पृथक्-पृथक् होता है । दिन-रात में १६ यमाद्ं होते हैं
दिन में ८ और रात्रि में ८।
दिन का यमाद्धं जानने को जो दिन है उससे छटवां-छटवां आगे का ग्रह गिनते
जाने से ८ यमाद्धं निकल आते हैं जसे इतवार को यमाद्धं जानना है :--
(१) इतवार का पहिला यमाद्धे हुआ । जो दिन हो उसका पहिला यमाढ होता है
(२) इतवार से छटवां शुक्र, (३) शुक्र से छटवां बुध, (४) बुध से छटवां चन्द्र (५)
चंद्र से छटवां शनि, (६) शनि से छटवां गुरु,(७) गुरु से छटवां मङ्गल ओर (८) मंगल
से छटवां सूर्य का यमाद्धं होगा । दिनों के क्रम से यह गिनना चाहिये । इसी प्रकार
किसी भी दिन का यमाद्धं गिनकर निकाल ले
रात्रि का यमाद्धे पांक्ची होता हैं। १- जैसे शनि का पहिला यमाद्ध शनि ही
होगा २- द्रा शनि से पांचव्प-बुध, ३- बुध से पांचवां सूयं, ४- सूर्य से पांचवां गुरु
५- गुरु से पांचवां चंद्र, ६-चंदर से पांचवां शुक्र, ७-शुक्र से पांचवां मगळ, ८-मंगल से
पांचवां शनि, ये रात्रि के यमाद्े हुए ।
[1 १९
२९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
गणित से जो यमाद्ध निकले उससे दंडाधिपति जितना हो चन्द्र से देख लेना t
दिन में सूर्य, राहु, बुध चंद्र ये ४ क्रम से दंडाधिपति होते हैं रात्रि में सूर्य शुक्र चंद्र
क्रम से दंडाधिपति होते हैं । नीचे जिसका स्पष्ट चक्र दिया है :--
दिन का यमाद्धं चक्र १ रात्रि का यमाद्ध चक्र २
यमाद्ध खंड - यमाद्ध खड
दिन १ २३४५ ६७ ८ दि १ २ ३ ४ ५६ ७ ८
रवि. रवि. शु. बुः चं. श. गु, मं. र. | रवि. र. गु. चं. शु. मं. शः वु. र. सोम. च. श. गु. मं. र. शु. बु. चं. | चंद्र चं. शु. मं. श. वु. र. गु. चं. मंगळ. मं. र, शु. बु. सो. श. गु. मं. | मं. मां. श. बु' र. गु. च. शु. मां.
बुध, वु. चं. श. गु. मं: र. शु. बु. | बुध. बु. र. गु. च. शु. मं. श. वु.
गुरु. गु मं. र. शु. बु. चं. श. गु. | गुरु. गु. च. शु. मं. श. वु. र. गु. शुक्र, शु. बु. चं. श, गु. मं. र. शु. शुक्र शु. मं. श. बु. र. गु. चं. शु. शनि. श. गु. मं. र. शु. बु चं. श. | शनि. श. बु. र. गु. चं. शु. मं. श.
दिन का दंड स्वामी चक्र ३ रात्रि का दंड स्वामी चक्र ४
दंडपति रवि चं. मं. बु. गु. शु. शनि. दंडपति रवि चं. मं. बु. गु. शु. शनि.
दंड दंड
१ रविचं.मां. बु. गु. शु. शा. १ रविचं. मं. बु. गु. शु. श. २ रा. र. र. चं. चं. मं. मं. २ शु. श, र. च. सं. वु. गु. ३ बु. रा. रा. र. र. रा. रा. ३ बुः गु. शु. शे. र. च. मं. ४ चं.बु. बु. रा. रा. रा. रा. : ४ च. मं. बु. गु. शु. शा. र.
यमाद्ध और दंडपति जानना :
रात्रि का जन्म हो तो रात्रिमान को, दिन का जन्म है तो दिनमान को ८ भाग दो तो एक यमाद्धं का समय निकलेगा । फिर जन्म दृष्ट में देखो कितने यमाद्धं गत हो गये ओर कौन-सा वर्तमान है । जन्म दिन से इतने यमाद्धं गिनकर इष्ट काल में कोत यमाद्ध होगा चक्र नं० १ से देख लो ।
यदि रात्रि का जन्म है तो इष्ट से दिन मान घटाकर शेष रात्रि के इष्ट में रात्रि का कौन-सा यमाद्धे है निकालो यहाँ रात्रिमान के अष्टमांश का एक यमाद्ध होगा । दंडपति निकालना- एक यमारद्ध को घटीपल ४ का भाग देना तो एक दंड का समय निकलेगा । उससे देखो अंतिम यमाद्ध में कौन-सा दंडपति आता है । उदाहरण--जन्मवार मंगलवार दिनमान ३३-४०। इष्ट २४-५६-६५ दिन का जन्म दिनमान ३३ ¬ ४० -- ८-४ घ ० १२॥ प० । अब इष्ट २०-५६-५५ में एक एक यमाद्धं का समय ४-१२॥ घटाओ कितने बार घटता है ५ बार घटकर छरे यमार्द्ध का शेष २-५४-३६ बचा । मंगळवार छठा यमाद्ध शनि आया अब दंडपति निकालना है १ यमाद्धं ४-१२॥--४८-१ घ० ३ प० ७॥ दि०। शेष छरे यमाद्ध का २-३४- ३६ का उसमें १-३-७॥ कई बार घटाया तो केवल २ बार घटा त॑,सरे का शेष ०-४८- ११ बचा । इससे प्रगट हुआ कि छठे यमाद्धे शनि का तीसरा दंडपति राहु आया ।
मारक स्थान : २९१
यदि रात्रि का जन्म है मान लो इष्ट ४५-१५ है ।
(६०-०)-दिनमान ३३-४०रात्रिमान=३६-२० = ८-३ घं० पृछा। प० रात्रि
यमाद्धं इष्ट ४५-१५ | शेष रात्रि ११-३५ में एक रात्रि यमार्ध कई बार घटाया ती
-दिनमान ३३-४० | केवल ३ वार घटा शेष १-४२। बचा वह चौथेयमाद्ध का है
शेष रात्रि-११-३४ | इससे प्रगट हुआ कि मंगलवार के चौथे यमाद्ध रात्रि यमाद्ध के
अनुसार रात्रि को सूर्य के यमाद्ध में जन्म हुआ ।
दंडपति निकालने को रात्रि का १ यमाद्ध ३घ.-१७॥ .प. + ४=०घ.-४३प.-२२॥
वि. का एक दंड हुआ । अंब छठवां शेष १-४२॥ यमाद्ध में कितने दंड हुए निकालना
है । १-४२॥ में एक दंड = ०-४९-२२॥ कई बार घटाया तो केवळ २ बार घटा तो
पूरे दंड का-० घ० ३-प० ४५ वि० केवल बचा इससे सूर्य का रात्रि का तीसरा दंडपति चक्र के अनुसार वुध आया ।
लग्न कुंडली
जन्म मंगलवार इष्ट २४ घ०-५६
प०-५६ वि० दिन मान ३३-४० मंगल
के दिन में शनि के यमाद्ध में जन्म
हुआ । जिसका तीसरा दंडाधिपति
राहुं है ।
जहाँ कुण्डली के अनुसार देखा
लग्न का वेध दंड पति से नहीं होतो ।
परन्तु १२ राशि में स्थित चन्द्र से
-७ & ९
रा.ग, दंडपति डान रॉ.
२९२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
जहाँ मंगल भी है पाप युक्त चन्द्र से दंडपति का वेध होता है । दंडपति राहु पाप ग्रह शुभ युक्त है । ७-६-१२ का वेध है । यहाँ २० --४-२४ मास में ( वेध कारक
२०करकोर
ग्रह युक्त राशियों का योग हुआ ) २४ मास में इसकी मृत्यु हुई।
मान लो दंडाधिपति सिह राशि में है तो ८लग्न का ८-५-११ राशि से वेध होता है । वृश्चिक+सिंह+कुंभ योग तो १७ वर्ष माह या दिन में ग्रह परिस्थिति के
६ के ८ + ३८१७ अनुसार अरिष्ट योग या ६५ ८ ८१४ या ६-- ३-९ इस प्रकार ९, १४ या १७ वर्ष मास या दिन में अरिष्ट होगा। यह अरिष्ट इतने दिनों, मास, या १ वर्ष में होगा
इसका विचार आगे दिया है ।
सबल पात ग्रह अरिष्ट कारी होने से उपयुक्त अंक दिन की संख्या बताता है। मध्यम होने से मास और दुर्बल होने से वर्ष की संख्या बताता है ।
परन्तु शुभ ग्रह अनिष्ट कारी होने से ठीक इसके विपरीत होता है । अर्थात शुभ ग्रह बली और अनिष्टकारी हो तो वह संख्या वपं की होगी । मध्यम बली मास और क्षीण बर्छी में हो तो उतने दिन में अरिष्ट जानना । लग्न पाप ग्रह युक्त या दृष्ट हो या लरन में शत्रु गृही पाप ग्रह हो तो उतने दिन में अरिष्ट होगा । यदि लग्न शुभ ग्रह युक्त या दुष्ट या लग्न से दृष्ट हो तो उतने वर्ष में अरिष्ट समझना । यहाँ स्पष्ट समझ में आ जायगा कि उपरोक्त अरिष्ट सचक संख्या वर्ष मास या दिन की है]
वर्ष : भास दिन
निर्बेल पाप ग्रह हो मध्यम बली बली पाप ग्रह निर्बेळ शुभ ग्रह हो पाप या शुभ ग्रह निर्बल शुभ ग्रह लग्न शुभ ग्रह लग्न पाप ग्रह युक्त लग्न शुभ युक्त अपने लग्न पाप ग्रह दृष्ट ___स्वामी से दृष्ट 5झेल लग्न से भनु गुही पाए ग्रह ग्रह
इन बातों पर भी ध्यान देना :-- ( १ ) यदिं शुभ ग्रह के दंड में जन्म हो और पताका वेध हो और लग्न यदि लग्न से किसी पाप ग्रह का वेध हो तो अरिष्ट नहीं होगा । ( २ ) अन्यमत-अशुभ ग्रह के दंड में किसी का जन्म हो और पताकी वेध हो और शुभ ग्रह का वेध न हो तो मृत्यु हो। ऐसी परिस्थिति में शुभ ग्रह का वेध होने से विशेष कर लग्न के स्थान में गुरु या शुक्र के रहने से देवानुष्ठान प्रयोग द्वारा रक्षा हो सकेगी । नुष्ठान तथा उत्तम ओषधि.
( ३ ) लग्नेश तथा दंडाधिपति एक ही ग्रह हो तो पता की अरिष्ट नहीं होता ।
नीरोगता ४ २९३
( ४) बुध का दंड हो और लग्न बुध से'वेध करे तो अरिष्ट अव । हो यहाँ जो वर्षे मास या दिन सूचक अंक है इसके समीप ही अर्थात् कुछ आगे या” कु बाद ग्रह
परिस्थिति के अनुसार मृत्यु हो सकती है ।
अध्याय १०
नीरोगता
१--लग्नेश या षष्ठेश गुरु युक्त होवे तो निरोग हो ( स० चि० ) । २--अष्टम
में शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो स्वास्थ्य ठीक रहे ( स० चि० ) । ३--लग्न में सब शुभ
ग्रह हों तो निरोग हो ( ल० चं० ) । ४--सूर्यं पर गुरु या चन्द्र की शुभ दृष्टि हो
( वाल वो० )। ५--षष्ठ स्थान में गुरु का कोई सम्बन्ध हो तो रोग से शीघ्र छुटकारा हो । ६--३,६,११ भाव में शनि, मङ्गल, राहु एक साथ या पृथक् र हो तो
छुटकारा हो । ७ --लग्नेश केन्द्र त्रिकोण में हो तो देह सुख कारक हो ( वु० पा० ) ।
८--दुर्बल लग्नेश केन्द्र त्रिकोण में हो तो व्याधि रहित हो ( जा० पारि० ) । परन्तु
कुछ रोग भी रहे । परन्तु लग्नेश दुर्बळ होने से क्रोधी हो ( जा० पारि० ) । ९--
षष्ठेश या षष्ठस्थ ( षष्ठ स्थान में ) षष्ठदर्शी ( षष्ठ को देखने वाले ) कोई-कोई ग्रह
शुभ ग्रहों और केन्द्र कोण या लाभ में कहीं भी वल्युक्त हों तो छोटे-छोटे रोगों का
नाश करता है ( जा० पारि० ) । १०--पष्ठेश से युक्त शुक्र, गुरु युक्त हो तो विख्यात
और स्वस्थ देह वाला हो परन्तु शत्रु का भय वना रहे ( जा० सं० ) । ११--सूर्य
चतुर्थ स्थान में पाप दृष्ट हो तो शरीर गरम रहे तथा श्रेष्ठ लोग पित्त धातु पृथक्
रहने से निरोग और सुखी भी हों । १२-छग्नेश व अष्टमेश इनका शुभ योग हो तो
आरोग्यता हो ( प्रा० यो० ) ।
रोगी
१---द्वितीय स्थान में पाप ग्रह हो तो रोगी हो ( जा० सं० ) १ २--रूग्नेश
दुष्ट स्थान ( त्रिक या मारक ) के स्वामी से युक्त हो या दुष्ट स्थानेश लग्न में हो
तो शीघ्र रोगी हो । २-" लग्नेश बलहीन हो तो उपरोक्त फल ( स० थि० ) ४--
अष्टमेश ६,८,१२ भाव में हो । ५ - सूर्य चन्द्र तीसरे भाव में गा क्रूर ग्रहों से दुष्ट
हो तो वह रोग युक्त रहे ( स० चि० )। ६-- लग्न में पाप ग्रह हो लग्नेश निर्बेल
हो तो नाना प्रकार से रोगी होकर चिता युक्त रहें ( प्राण यो० ) ( जा० पारि० )।
७--छटे स्थान में सौम्य ग्रह हों तो बड़ा रोगी हो ( मान० ) । ८--शनि ५,९ भाव
२९४ ४ सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
में पाप दृष्ट हो तो अनेक रोग से पीड़ित रहे ( शंभु० ) । ९--कूर ग्रह से युक्त या दृष्ट शनि ५,९,१२, भाव में हो तो रोगी हो ( जा० ल॑० )। १०--४ ग्रह नीच शत्रगृहो या कूरांश में हों तो रोगो रहे ( स० चि० ) । ११--निर्वक्त लग्नेश केन्द्र या त्रिकोण में हो तो शरीर कुछ रोगी रहे ( जा० पारि० ) । १२--लग्न से छटे स्थान में क्र ग्रह युक्त चन्द्र हो तो रोगी हो। १३--क्ूर ग्रहों के योग या दृष्टि सै पीडित
चन्द्र लग्न में हो तो रोगी हो। १४--कूर ग्रह केळ में हो और शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो तो रोगी हो । १५-केन्द्र में स्थित ऋर ग्रह शुक्र गृही हो परन्तु गुरु, शुक्र, बाद इन ग्रहों की दृष्टि न हो तो रोगी हो ( जा० छं० )। १६--अष्टम भाव में पाप ग्रह हो तो बहुत रोग हो ( जा० पारि० )। १७--लग्नेश व अष्टमेश का पाप योग
हो तो बहुत दुःख हो ( प्रा० यो० ) । १८--छठे भाव में मंगल से युक्त शनि हो जिस पर सूर्य और राहु की दृष्टि हो लग्नेश निबंल हो तो दीघं रोगी हो ( स० चि० )। १९--छम्न में शनि राहु हो बुध से भी दृष्ट हो तो निश्चय रोगी रहे ( शंभु ) । २०--क्षीण चन्द्र बारहवें हो पाप ग्रह से दृष्ट हो तो दुःख हो । आठवे में शनि भी बड़ा क्लेश देता है ( ७० चं० )। २१--सूर्य चन्द्रमा अन्योन्य राशि नवांशकों में हों तो शरीर क्लेश रहे | २२--छठे घर में शुक्र का कोई सम्बन्ध हो तो आहार विहार की असावधानी से रोग उत्पन्न हो । २३- -लग्नेश पाप युक्त ६,८,१२ में हो तो क्लेश कारक है ( वु० पा० )। २४--लग्नेश अस्त, शत्रु गृही या नीच हो तो रोग कारक है ( वृ० पा० )। २४५--धनभाव में मंगल और शनि हो तो सब रोगों को उत्पन्न करे ( जा० पारि० ) । २६--३ या ६ स्थान में शुक्र हो तो रोग शोक और भयदायक है ( जा० पारि० ) । यदि वही शुक्र सूर्य के आगे हो तो शुभ है ( जा० पारि० )। २७--लग्नेश षष्ठेश के साथ दुष्ट स्थान में हो या लग्न में हो । २८--षष्ठ भाव और षष्ठेश दोनों पाप युक्त होवे और शनि राहु से युक्त हो तो आजन्म रोगी रहे ( वु० पा० ) । २९--रवि व शनि षष्ठ भाव में एकत्र हों या एक ६ में दूसरा १२ घर में हो या दोनों का केन्द्र योग हो तो शरीर प्रकृति का बहुत हानिकारक है। ३०--सूर्य १,६ या ५ स्थान में हो तो हानिकारक है। ३१--सूर्य में शनि से पीड़ित होकर ५,९,६,७,८, ४ इन स्थानों में हो तो दीर्घकाल तक रोग रहे ( बा० बो० )। ३२--छग्नेश और अष्टमेश बलवान् होकर केन्द्र त्रिकोण में होत उक्त ग्रह की दशा में रोग ओर अपवाद हो ( जा० पारि० ) 1 ३३ -- अष्टमेश अष्टमं हो तो उसकी दशा अन्तर्देशा में रोग हो ( जा० परि० ) । ३४--अष्टम भाव में पाप ग्रह हो तो रोग हो वह मृत्यु को प्राप्त हो यदि बन्धन प्राप्त हुआ हो तो वन्धन से छट जाय ( जा० सं०) । ३५--चतुर्थेश सूर्य मङ्गल युक्त होकर क्रूर अंश में हो शुभ दृष्टि नहो भोर यदि आरोह को छोड़कर और कोई हो अर्थात् अवरोह हो तो सदा रोगी रहें ( स० चि०)। ३६--चतुथे में पाप युक्त मंगल या सूर्य नीच या शत्रु अंश में हो तो बहुत रोगी रहते हुए यात्रा करता रहे ( स० चि० ) ३७--लग्नेश मंगल और बुध ये ४ या १२ भाव में हो तो कई प्रकार,के रोग हों ( स० चि०)। ३८-६, ८
नीरोगता ! २९%
भाव या केन्द्र में वक्री शनि हो उस पर मंगल की दृष्टि हो तो ३ वर्ष में रोग हो ( जा० भ० ) । ३९ छठे भाव में गुरु हो तो दीघंव्याधि हो ( जा० स० )। ४०-- लग्नेश मंगल या वुध हो किसी स्थान में हो उसपर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो तो रोग हो ( प्र० यो० ) । ४१--नवम भाव पाप युक्त हो तो रोग से पीडित ब्रण सहित वाम पाद हो । यदि शुभ ग्रह भी हो तो कूर फल नहीं होता ( शंभु० )। ४२--६,८ या १२ स्थान में जो ग्रह या छठे भाव का स्वामी और वह ग्रह जो इनसे यक्त हो इनसे पृथक्-पृथक् विचारना जहाँ २,३ या अधिक रोग होने के योग हों तब विशेष रोग कहना (फल०) । रोग उत्पन्न होने का योग--४३--लग्न या चन्द्र से २,४,८,१२ घरं में शनि राहु सूर्य मंगल ये पाप ग्रह क्रमानुसार हों । ४४- लग्न या चन्द्र के सप्तम में, अष्टम में या व्यय स्थान में सब पाप ग्रह हों। या ४५--लग्न या चन्द्र पाप ग्रह युक्त हो और शेष पाप ग्रह उक्त स्थानों में हों । ४६--३ या ११ स्थान में कोई पाप ग्रह हो शेष ८ या १२ स्थान में हों । ४७- चन्द्र के पास कुछ पाप ग्रह हों शेष पाप ग्रह लग्न में हों । ४८--चन्द्र के ८,१२ स्थान और लग्न के ८,१२ स्थान में सब पाप, ग्रह हों । ४९--लान, व्यय, धन इन तीनों स्थानों में या ६ ,७,८ इन स्थानों में सब पाप ग्रह हों यह लग्न और चन्द्र दोनों प्रकार से विचार कर देखना । ५०--लग्न या चन्द्र के १० स्थान से लग्न तक या चन्द्र तक सब पाप ग्रह हों । ५१--लग्न या चन्द्र के चतुर्थ स्थान में एक या कई पाप ग्रह हों । ५२--सप्तम में मंगल और शनि हो तो अपने २ धातु जन्य रोग उत्पन्न करते हैं ।
किस ग्रह के दोष से रोग होगा--१--लग्न, लग्नेश और लग्न का नवांश इन
तीनों में जो वली हो उस ग्रह की पीड़ा होगी ( प्रा० यो० ) ।
२--रोग कारक ग्रहों में जो बली हो उसकी धातु वात पित्त कफ आदि से
रोग हो ।
३--कौन ग्रह क्या रोग प्रगट करते हैं यह संज्ञा अध्याय में दिया है उससे भी
विचारना ।
रोग कहां होगा--१--अष्टम में जो राशि कालांग में कही है उस अङ्ग में वात
पित्त आदि ग्रहजनित विकार से रोग होगा ।
२--बहुत ग्रह वलवान् होकर अष्टम को देखते हों तो सभी ग्रहों को धातु से
बहुत रोग एक साथ हो ( बु० जा० ) ।
` ३--छठे भावस्थ राशि के कालांग में रोग होगा ।
राशि-मेष | २ |३ | ४ | ४५ | द |
अङ्ग-शिर | मुख | कंठ | कान | नाक, ) गुप्तांग | हाथ
राशि | ९[१०| ११| १२ | (सं० चि० ) अङ्ग ।नेत्र | पैर | घुटने | पर कुक्षि
कौन ग्रह कहाँ पर क्या रोग करता है
१--सूये--शरीर के हृदय का भाग, मस्तक या मुख के पास दुःख, रक्त का
७ ८
| वाल (बाजू |
२९६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
बहाव, नेत्र पीडा, दृष्टि दोष, जीवन शक्ति की स्थिति, हृदय रोग, उष्ण वात, ज्वर,
पित्त, मूर्छा चक्कर पीठ या पैरों में दर्द या व्यंग ।
२--चन्द्र--सर्व साधारण शरीर का व्यापार अच्छी प्रकार न चलने वाला और
उससे उत्पन्न विकार दर्शाता है ।
पेट में विकार, जलोदर, सर्दी या ज्वर, हृदय का विकार, स्त्रियों के रोग, प्रदर,
आतंव दोष, अपस्मार सहनशक्ति ।
३--मंगल--दाह जन्य विकार, क्षत, व्रण, शस्त्र प्रयोग, इनसे उत्पन्न होने वाला
विकार या दुःख ।
रक्त की क्षीणता, माता का रोग, खाज, सुजन, ज्वर, प्लेग, नेत्र के रोग, गुह्य
रोग, घाव; चौर फाड़ आदि ।
४--बुध--सव प्रकार का मानसिक विकार, मज्जा तन्तु का विकार, मस्तिष्क सम्बन्धी विकार, ग्रीवा या गले का रोग, गंड माला, मज्जा तन्तु की गड़बड़ी, वाणी का दोष, सिर का धूमना, मानसिक व्यथा आदि ।
५--गुर--मोटे होने, बाढ़, रक्त संचार इनमें विकार उत्पन्न करता है यक्ृत् का रोग, शरीर में रक्त संचय, दंत रोग, प्रति बंधक रोगं, फोड़े आदि । ६--शुक्र--नाक, मूत्रेन्द्रिय में, विष से उतपन्न रोग, गर्मी, वाघी, वीर्य दोष, प्रमेह, मधुप्रमेह आदि रोग ।
७-शनि--इन्द्रियों के व्यापार में जरा भी गड़बड़ी हुई तो रोग उत्पन्न करता है, अर्धाग वायु.खाँसी, क्षय रोग, शीत, दमा, संधिवात, वात रोग, बद्ध कोष्ठ, अपच, दाढ़ की पीड़ा आदि दीघ कालीन रोग ।
शरीर की नीरोगता--जानने को लग्न में बहुत अंश से उदय होने वाली राशि और कुंडली में चन्द्र व सूर्ये की स्थिति पर अवलंबित है। जोवन शक्ति प्रद राशियाँ-जीवन शक्ति देने वाली राशियाँ । उत्तम जीवन शक्ति प्रद-१, ५, ७, ९ ये लग्न, इन लग्नो में जन्म हों तो । साधारण शक्ति प्रद-२, ३, ६, ८, ११
अल्प शक्ति प्रद-४, १०, १२
आनुवंशिक रोग न हों शरीर अच्छा हो-कुंडळी में सूर्य बलवान् हो, पाप ग्रह से पीड़ित न हो ।
. आनुवंशिक रोग--यदि सूर्य निर्वळ या पाप ग्रहों से पीडित हो तो शरीर में आनुवंशिक रोग रहता है। राशि अनुसार सूर्यं पीड़ित हो तो प्रभाव १चर राशि भें रवि पीडित हो तो--अशुभ योग घटाता है--मस्तक विकार मूत्रपिंड का विकार, त्वचा के रोग हों । (२) स्थिर राशि में रवि पीडित हो तो- हृदय विकार, रक्ताभिसरण सम्बन्धी, रोग, कंठ विकार ।
- नीरोगता : २९७
( ३ ) द्विस्वमाव राशि में रवि पीडित और अशुभ दृष्टि योग पड़े तो--
फुफ्फुस सम्बन्धी रोग मज्जा तंतु का विकार हो ।
ग्रह प्रभाव से विविध रोग
ज्वर गंड रोग--लग्न में षष्ठेश और अष्टमेश दोनों--सूर्य के साथ ।
गठिया या शस्त्राघात--लग्न में षष्ठेश और अष्टमेश दोनों--मंगल के साथ ।
पित्त रोग--छरन में षष्ठेश और अष्टमेश दोनों--वुध के साथ ।
रोग नाश--लग्न में षष्ठेश और अष्टमेश दोनों--गुरु के साथ ।
स्त्री द्वारा रोग--लग्न में षष्ठेश और अष्टमेश दोनों--शनि के साथ ।
वायु कोप--लग्न में षष्ठेश और अष्टमेश दोनों--शनि के साथ ।
हिंसक जीव से अपघात--लग्न में पष्ठेश और अष्टमेश दोनों--राह के साथ ।
नाभि में त्रण--लग्न में षष्ठेश और अष्टमेश दोनों--केतु के साथ ।
जलज गंड या वक़--हूग्न में षष्ठेश .और अष्टमेश दोनो--चंद्र के साथ ।
पितृ स्थान ( दशम ) आदि से भी ग्रहों की स्थिति से पिता आदि के भी इसी
प्रकार रोग विचारना ( वृ० पा० ) ।
लग्नेश भिन्न ग्रह युक्त चिह्न में होने से रोग:--
(१ ) लग्नेश सूर्य युक्त चिह्न में--ताप गंड रोग ।
(२ ) लग्नेश चंद्र युक्त चिह्न में--जल विकार से उत्पन्न गंड रोग ।
( ३ ) लग्नेश मंगल युक्त चिह्न में--हथियार का घाव जिसके पुराने पड़ने से
गांठ पड़ जाती है। -
( ४ ) लग्नेश बुघ युक्त चिह्न में“-पित्त से उत्पन्न रोग ।
(५ ) लग्नेश गुरु युक्त चिह्न में--आम के विकार से उत्पन्न रोग ।
(६ ) लग्नेश शुक्र युक्त चिह्न में--क्षय .रोग हो ।
(७ ) लग्नेश शनि युक्त चिह्न में--चोर या किसी नीच जाति से किया हुआ रोग ।
( = ) लग्नेश राहु केतु युक्त चिह्न में--चोर या किप्ती नीच जाति से किया हुओ
रोग ( जा० ल॑० ) ।
विचार यहाँ बताये अरिष्ट या दुःख का प्रमाण कम या अधिक होगा या नहीं
होगा जन्मस्थ ग्रह के भाव राशि ग्रह दृष्टि या युति के शुभाशुभ स्थिति का विचार एवं
गोचर ग्रह उनके शुभाशुभ युति दृष्टि पर अवलंबित है। शुभ योग दृष्टि से दुःख या रोग
हो अपने बल एवं स्थिति के अनुसार घटा देता है या नहीं होनेदेता । पाप योग दृष्टि
से रोग या दुःख बढ़ जाता है । गोचर में उसके शुभ या पाप योग दृष्टि से घटने बढ़ने
के समय का अनुमान होता है ।
इसी प्रकार लग्नेश षष्ठेश भिन्न-भिन्न ग्रहों से युक्त होने का फल है ।
( १) लग्नेश षष्ठेश-सूर्य युवत--ज्वर का भय ।
( २ ) लग्नेश पष्ठेश--चंद्र युकत--जल में डूबने का भय ।
. (३ ) लग्नेश षष्ठेश--मंगछ युक्त--युद्ध या स्फोटक समूह से भय ।
२९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
( ४ ) लग्नेश षष्ठेश--बुध गुक्त--पित्त के प्रमाद से भय ।
( ५ ) लग्नेश षष्ठेश--गुरुयुक्त--व्याधि रहित । ८
( ६ ) लग्नेश षष्ठेश--शुक्र युक्त--स्त्री मरण हो ।
(७ ) लग्नेश षष्ठेश- शनि युक्त-*अधो वायु का रोग ।
( ८ ) लग्नेश पष्ठेश--राहु केतु युक्त--सर्प की पीड़ा या चोर आदि का भय ।
( ९ ) लग्नेश षष्ठेश--त्रिकोण में राहु केतु युक्त--निगल रोग ( जा० पारि० )।
द्वादश भाव के अनुसार शरीर की पीड़ा का स्थान
प्रथम भाव--मुख, दांत, दाढ, गला, जीव, मस्तक ।
द्वितीय भाव--दाहिना नेत्र ।
तृतीय भाव--दाहिना कान, गर्दन, हाथ ।
चतुर्थ भाव--पेट कंधा ।
पंचम भाव--कमर के ऊपर का भाग, जंघा ।
षष्ठ भाव--गुप्तस्थान, दाहिना पाँव ।
सप्तम भाव-- पेट का मध्य भाग, नाभि ।
अष्टम भाव--गुप्त स्थान, बांया पाँव ।
नवम भाव--कमर के ऊपर का भाग ।
दशम भाव--कमर के ऊपर का भाग ।
लाभ भाव--वायाँ हाथ, कान, गर्दन ।
व्यय भांव--बांई आँख, पैर का तलवा ।
(१ ) इन भावों में यदि पाप ग्रह हो या पाप ग्रह की युति प्रतियुति योग और दृष्टि हो तो शरीर के उन्हीं भागों में अपनी कुण्डली के अनुसार रोग या पीड़ा होगी ।
( २ ) गोचर में पाप ग्रह २, ६, ८, १२ घर में हों या ग्रहों का इन स्थानों से
योगदृष्टि के द्वारा सम्बन्ध हो तो उनग्रहों की दशा या अन्तर्दशा में रोग निश्चय होगा । ( ३ ) कुण्डली में चंद्र ४७-१२ या ४,८-१२ में गोचर में हो तो रोगी को लाभ: होने की आशा नहीं रहती ।
( ४ ) कुंडली में लग्न-वैद्य । चतुर्थ भाव-औषधि । षष्ट भाव-रोग । दशम भाव जरोग साध्य होगा या असाध्य इसका ज्ञान होता है । ( ५ ) जब कुंडली में अनिष्ट कारक योग हो वह ग्रह जितने अंश में हो उतने अंश का हो ओर जब गोचर के पाप ग्रह से दृष्टि या दोष द्वारा सम्बन्ध स्थापित करे तब रोग होना सम्भव है ।
नक्षत्र अनुसार रोग की पीड़ा"
इन नक्षत्रों में रोग हो तो कितने दिनतक उस रोग की पीड़ा रहेगी यहाँ
4 अश्विनी में रोग हो--१, ९ या २५ दिन पीड़ा । ९ भरणी में रोग हो--११ या २१ दिन या १ मास या मृत्यु ।
नीरोगता : २९९.
३ कृतिका में रोग हो--९, १० या २१ दिन ।
४ रोहिणी में रोग हो--३,७,९ या १० दिन 1 ५ मृग० में रोग हो--३,५ या ९ दिन ।
६ आद्वा० में रोग हो--१० दिन या १ मास या मृत्यु ।
७ पुनवंसु में रोग हो--७ या ९ दिन या मृत्यु ।
८ पुष्य में रोग हो--७ दिन या मृत्यु ।
९ आश्लेषा में रोग हो--९, २० या ३० दिन या मृत्यु ।
१० मघा में रोग हो--२०,३० या ४५ दिन या मृत्यु ।
११ पूर्वा फा० में रोग हो--०,१५ या ३० दिन या १ वषं या मृत्यु ।
१२ उत्त० फा० में रोग हो--७, १५ या २७ दिन ।
१३ हस्त में रोग हो--७,८,९ या १५ दिन या मृत्यु ।
१४ चित्रा में रोग हो--८,११ या १५ दिन ।
१% स्वाती में रोग हो--१,२,३,४,५ या १० मास या मृत्यु ।
१६ विशाखा में रोग हो--८,१५,२० या ३० दिन ।
१७ अनुराधा में रोग हो--१० या २८ दिन ।
१८ ज्येष्ठा में रोग हो--१५,२१ या ३० दिन या मृत्यु ।
१९ मूल में रोग हो--९,१५ या २० दिन।
२० प्० षा० में रोग हो--१५,२० दिन या २,३,६ मास या मृत्यु ।
२१ ३० षा० में रोग हो--२० रात्रि, १ या १॥ मास ।
२२ श्रवण में रोग हो--१०,११,२५ या ६ दिन ।
२३ धनिष्ठा में रोग हो--१३ रात्रि या १० रात्रि, पक्ष या मास ।
२४ शत० में रोग हो--१० या १२ दिन।
२५ पूर्व भा० में रोग हो--१० रात्रि, २ या ३ मास या मृत्यु ।
२६ उ० भाद्र में रोग हो--७ या १० दिन १॥ मास या पक्ष।
२७ रेवती में रोग हो--१० या २८ दिन ।
ये नीचे बताये योग हों तो रोग बढ़ेगा ।
वार नक्षत्र दिन नक्षत्र तिथि
इतवार अनुराधा भरणी इतवार मघा १२
सोमवार आर्द्रा, उ० षा० सोम० विशाखा ११
मंगल० मघा, शत० मंगल आर्द्रा ण
बुध अश्विनी, विशाखा | बुध उ० षाढ़ा० ३
गुरु मृग०, ज्येष्ठा गुरु शत्त० ६
शुक्र आएशलेषा, श्रवण शुक्र अश्विनी ८
शनिवार हस्त, पूवं भाद्र । शनिवार पू पाढ़ा ९
इस प्रकार वार नक्षत्र और तिथि का योग हो । या यहाँ बताये दिन को उक्त
नक्षत्र पड़े ऐसे योग में रोग उत्पन्न हो तो अच्छे लक्षण नहीं हैं रोग अवश्य बढ़ेगा ।