भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

~

३८२ : सचि ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

दशमेश के योग

४६४--दशमेश नवम में नवमेश दशम में हो तो राजा हो अपने जनों से मान

पावे (फल०) ।

४६५--दशमेश केन्द्र त्रिकोण या धन भाव में हो तो राज सिंहासन में बैठने

वाळा विख्यात कीति हाथियों से परिपूर्ण हो (जा० स०) ।

४६६--दशमेश केन्द्र में हो शुभ ग्रहों से युक्त दृष्ट हो शुभ षष्ठ्यंश में होवे तो

वह सौम्य आज्ञां देने वाला अधिकारी हो (स० चिं०) ।

४६७- केन्द्र में दशमेश शुभ युक्त या दृष्ट हो और क्रूर षष्ठ्यांश में हो तो

कठोर आज्ञा देने वाला हो (स०'चिं०) ।

४६८--दशमेश शुभ हो शुभ युक्त या दृष्ट होकर शुभ नवांश में हो तो दूसरों

को हुक्म देने वाला हो (स० चिं०) ।

४६९--दशमेश अष्टम में उच्च स्व राशि व मित्र नवांश का या पारावतांश में

होवे तो राज योग होता है (स० चिं०) ।

४७०--दशमेश उच्च या मित्र नवांश में होकर नवम घर में हो और पाराव-

'तांश में हो तो राजाओं के बीच मुखिया हो (स. चिं.) ।

४७१--दशमेश उच्च का होकर लग्न. को देखता हो तो राज योग होता है

(वृ० पा०) । ४७२--दशमेश पाप युक्त हो ओर लग्न से-६ भाव तक क्रम से ग्रह हों तो

राजेश्वर हो (स० चि०) ।

४७३--दशमेश से पहिले ६ घर में सब ग्रह हों ये लग्न से ६ घर में हों तो

राजाओं का राजा हो ( स० चि० ) अर्थात्‌ लग्न से ६ घर के भीतर दशमेश कहीं हो

और उससे ६ घर के भीतर से ग्रह हो तब यह योग होगा । लग्न में दशमेश हो और

सब ग्रह उससे ६ घर के भीतर हों तभी यह वनता है।

लाभेश के योग

४७४ छाभेश लाभ में हो पाप ग्रह से अदृष्ट हो या आत्म कारक केवल शुभ

ग्रह से युक्त हो तो राजा से घन प्राप्त हो ( वृ० पा० ) ।

४७५ छाभेशे की दृष्टि लाभ पर हो दशम भाव में पाप ग्रह का योग दृष्टि न

हो तो राजमंत्री हो ( वृ० पा० ) ।

लग्न के योग

४७६-छग्न उत्तमांश में हो और चन्द्र को छोड़कर अन्य ४ या अधिक ग्रहों से

दृष्ट हो तो राजा हो ( वु० पा० ) ।

४७७--लग्न पर सब ग्रहों की दृष्टि हो जो सब प्रकार शुद्ध हों तो बड़े-बड़े

राजा कोश रत्नों की भेंट करे, निर्भय हो, राजाओं का मुकुटमणि हो ( मान० ) ।

४७८--छर्न को सब बली ग्रह देखते हों तो भय रहित दीर्घायु सुखी घनयुक्त

राजा हो ( वू० पा० )।

राजयोग : ३८३

४७९--जन्म लग्न, होरा लग्न और घटी लग्न इन तीनों पर किसी एक ग्रह की दुष्टि हो तो राजा हो ।

घटी लग्न---(इष्ट घटी+जन्म लग्न) -- १२८-शेष पंच ग्रह घटी लग्न है (वृ.पा.) । ४८०--इन तीनों उपरोक्त लग्न और सप्तम भाव पर, राशि, नवांश और द्रेष्काण के वश एक ग्रह की दृष्टि से भी राजयोग होता है (जैमिनि०) । उनमें एक भी न्युन हो तो राजयोग न्युन होता है । इन तीनों को लग्न की नवांश कुण्डली और द्रेष्काण कुण्डली से भी विचारना । इन तीनों लग्न को उच्च स्थित एक भी ग्रह देखें तो राजयोग होता है । इन तीनों में से किसी दो को भी उच्च स्थित ग्रह देखे तो राजयोग होता है। इन तीनों में से किसी दो को भी उच्च स्थित ग्रह देखे तो राजयोग होता है। राशि, नवांश और द्रेष्काण इन तीनों को या राशि और नवांश के वश या "राशि और द्रेष्काण को एक ग्रह देखे तो राजयोग होता है ।

४८१--जन्म लग्न, होरा लग्न, घटी लग्न इन तीनों में उच्चस्थ ग्रहहो। या "लग्न, द्रेष्काण ओर लर्न का नवांश इन तीनों में उच्चस्थ ग्रह हो तो अवश्य राजयोग होता है ( वृ० पाए ) ॥

४८२-छग्न के नवांश राशि के केन्द्र में नीच स्थित ग्रह लग्न को देखे तो भी राजयोग होता है ( वृ० पा० ) ।

४८३--लग्न के नवांश राशि के केन्द्र में शुभ ग्रह हो तो सर्वाधिकार सभ्पन्न राजा हो ( वृ० पा० ) ।

४८४--नीच नवांश को छोड़कर ३ आदि ग्रह रवनवांश में हों उनमें से एक भी लग्न में हो तो राजा हो ( जा० पारि० )। .

४५५--जन्म लग्न में ३ शुभ ग्रह हों तो नम्रता युक्त राजा हो ( जा० भ० )।

४८६--२,४,१०,११ के भावेश लग्न को देखते हों पद से सप्तम स्थान पर शुक्र की दृष्टि हो पद में शुभ ग्रह हो तो राजयोग होता है ( बु० पा० )।

४८७--छग्न के होरादि षड़वर्ग किसी एक भी ग्रह से युक्त या दृष्ट हों तो भी

राजयोग होता है । योग दृष्टि के अनुसार पूर्ण आधा या उससे कम फल का विचार

करना ( वृ पा० ) ।

४८८--लग्न या चतुर्थं भाव अपने स्वामी या अपने मित्र से दृष्ट हो तो अवश्य

सम्पत्ति वाला हो ( जैमिनि० ) ।

४८९--लगन में क्रूर ग्रह, व्यय भाव में शुभ ग्रह द्वितीय में पाप ग्रह हो तो राजा

हो ( जा० सं० ) ।

४९०--लग्न में क्रुर ग्रह व्यय में शुभ ग्रह द्वितीय में शुभ ग्रह हो तो राजयोग

होता है । इसमें राजा नहीं होता दाता और दरिद्री होता है ( छ० चं० ) । ४९१--१,२ भाव में शुभ ग्रह, ३ घर में पाप ग्रह, ४ भाव में शुभ ग्रह हो तो राजा हो या राजा के तुल्य हो ( बू० पा० ) ।

es oi a i

३८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

४९२--लग्न में शुभ ग्रह अष्टम में कूर ग्रह हो तो ध्वज योग होता है जातक श्रेष्ठ हो ( छ० चं० ) ।

४९३--जन्म ऊषा काल का हो या अभिजित काळ या गोधूलि या महानिशा में हो तो ग्वाल पुत्र भी राजा हो ( जॅमिनि० ) ।

४९४--मध्याल्न या अढ रात्रि के वाद २॥ घड़ी शुभ समय होता है उसमें जन्म

लेने वालो राजा होता है ( वृ० पा० ) ।

४९५--पाप ग्रह लग्न में हो गुरु से दृष्ट हो तो राजा हो ( जा० भ० ) । ४९६--लग्न में चर राशि हो लग्नेश चर राशि चर नवांशक में हो. तो प्रभाव

शाली राजा हो ( स० चि० ) ।

४९७--लग्न दशम या लाभ ही के सन्मुख सम्पूर्ण ग्रह हों तो कारक योग होता है इसमें नीच कुल का भी राज्य प्राप्त करे ( ल० पं० ) ।.

अन्य भाव के योग ४९८--लग्न से ६,८ स्थान में शुभ ग्रह हो पाप ग्रहों से युक्त दृष्ट न हो तो बहु मंत्री या सेनापति या राजा होता है ( जँमिनि० ) ।

४९९--६,७,८, भाव में शुभ ग्रह हो पाप ग्रह से युक्त दुष्ट न हो तो छत्र वाला

राजा, दंड करने वाला, दीर्घायु, निर्भय, निरोग बहुत स्त्रियों का पति होता है (शंभु) ।

५००--ल्ग्न से अष्टम और व्यय में क्रूर ग्रह हो और बीच में. शुभ अशुभ ग्रह

हों तो वह राजयोग है महाराजा हो ( मान० ) ।

४० वर्ष जीता है राजयोग है (ल. चं.) ।

५०१--८,१२ भाव में कूर ग्रह हो दशम में एक क्रूर ग्रह एक शुभ ग्रह हों तो महाराजा हो (जा. स.) ।

५०२--पाप ग्रह ६,१० भाव में, शुभ प्रह ९,११ भाव में हो तो राजा हो (जा. पा.) ।

५०३--नवम भाव में सब शुभ ग्रह हों तो राज्यदाता हैं (जा. सं.) । ` ५०४-नवम में सब शुभ ग्रह हों शुभ ग्रह से दृष्ट हों तो शत्रुओं को जीतने वाला राजा हो ।

५०५--नवम भाव में बुध को छोड़कर ६,७ ग्रह हों तो राजा हो (जा. सं.) । _ ५०६--दशम स्थान में शुभ ग्रह स्वराशि में हो ओर शुभ दृष्ट हो तो अपने कुल में राजा या श्रेष्ठ अति उदार हो (शंभु) । ल , २०७--लाभ में ३ सौम्य ग्रह हों तो बड़ा राजा हो ३ पाप ग्रह हों तो दुःखी, दरिद्री शोक युक्त हो ।

,५०८--दशम और लाभ में शुभ ग्रह हो पाप ग्रह की राशि में चन्द्र हो तो राज- योग होता (जा. सं.) । ५०९--उपचय में सब. शुभ ग्रह हों पाप ग्रह लग्न या दशम में हों तो सम्पूर्ण शत्रू ओं को जीतने वाला क्रूर स्वभाव का राजा हो (जा. पारि.) । छ

राजयोग : ३८५

अन्य योग

५१०--सभी ग्रह चन्द्र के होरा में हों तो यशस्वी हो (जा. पारि.) । ५११-एक भी ग्रह स्वगृही या वर्गोत्तम हो और बलवान्‌ मित्र ग्रह से दृष्ट हो तो राजा हो (जेमिनि) ।

४१२-२,३ ग्रह दिग्बल से पूर्ण हों तो राजवंशी राजा हो और विजयी हो (फल.) । ५१३--यदि शनि को छोड़कर ४,५ ग्रह दिग्वल पूर्ण हों तो साधारण कुल में भी उत्पन्न हुआ मनुष्य राजा हो (फल.) । न ५१४--यदि ५ आदि ग्रह स्वनवांश में हों तो वित्तवान्‌ राजा हो (जा. पारि.) 7 ५१५--त्रिपुष्कर में उत्पन्न हुआ मनुष्य राजा होता है (शंभु) 1 त्रिपुष्कर योग--दिन-रविवार, मंगलवार, शनिवार, (मुहूतं चिता०) तिथि-भद्रा २,७,१२, नक्षत्र-विशाखा, कृतिका, पुनवंसु, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा, पूर्व भाद्रपद । ५१६-जन्मकाल में उत्तर में वशिष्ठ ओर पश्चिम में शुक्र, गुरु पूर्व में, अगस्त दक्षिण में हो तो ऐसे समय उत्पन्न जातक धरती का स्वामी सप्ुद्र तक राजा हो (शंभु) कारक से राजयोग विचार

५१७--कारकांश और जन्म लग्न इन दोनों से राजयोग विचारना चाहिये । एक तो आत्म कारक और पुत्र कारक से, दूसरा लग्नेश और पंचमेश से । इन दोनों के परस्पर सम्बन्ध और बल के अनुसार ही .राज योग का. आधा या चतुर्थांश आदि फल समझना ।

५१८--आत्म कारक शुभ राशिया शुभ नवांश में हो तो धनवान्‌ होता है (वृ. पा.) ।

५१९--कारकांश से केन्द्र में शुभ ग्रह हो तो राजा होता है (वृ, पा.) । ५२०--आत्म कारक से चतुर्थ में शुक्र और चन्द्र दोनों हो तो नगाड़ा आदि बाजे चामर आदि राज चिह्न होते हैं (जैमिनि) । : ५२१--आत्म कारक से २,४,५ भाव के राश्यादि तुल्य शुभ ग्रह के राश्यादि हो : तो राजा हो (जैमिनि) ।

५२२--आत्म कारक से ३,६ इन दोनों भावों के तुल्य दो पाप ग्रह के राश्यादि , हों तो राजा हो (ज॑मिनि)। |

५२३--आत्म कारक से, पद से, या लग्न से, ३,६ भाव में सब पाप ग्रह हों तो सेनापति हो (व्‌. पा.) ।

५२४--आत्म कारक अपनी राशि या उच्च में होकर केन्द्र त्रिकोण में नवमेश से युक्त या दृष्ट हो तो निश्चय राअमंत्री हो (वृ. पा.) । ; ५२५--आत्म कारक जन्म राशीश होकर शुभ प्रह के साथ लग्न में हो तो बह वृद्धावस्था में मंत्री हो (व्‌. पा.) । ) ५२६--जन्म लग्न से दशमेश यदि आत्म कारक राशीश या पंचमेश तथा आत्म कारक से युक्त हो तो राजमंत्रो हो (वृ. पा.) ।

(२५

३८६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फित खण्ड

५२७--यदि आत्म कारक, अमात्य कारक से युक्त हो तो भी राजमंत्री हो

(वृ. पा.) ।

५२८--आत्म कारक बली, शुभ ग्रह से युक्त होकर अपने गृह या उच्च में हो

तो मंत्री हो (वृ. पा.) ।

५२९ आत्म कारक यदि १,५,९ भाव में हो तो भी राजमंत्री हो (वृ. पा.) ।

३०--आत्म कारक से केन्द्र या त्रिकोण में अमात्य कारक हो तो भी राजा का

कुपा पात्र होकर सुखी होकर राजमंत्री हो (वृ. पा.) ।

५३१--आत्म कारक नवम में हो या नवम भाव का पद लग्न में हो तो वह

निश्‍चय राजा का सम्बन्धी होता है (वृ० पा०)।

५३२--आत्म कारक से चतुर्थ भाव में शुक्र ओर चन्द्र हो तो राजचिह्लों से युक्त

राजा के बराबर सुख भोगने वाला हो (वृ० पा०)।

५३३--पुत्राद कारक वश से पुत्रादि का राजयोग विचारना अर्थात्‌ पुत्रादि

कारकों में राजयोग बली हो तो पुत्रादि को भी राजयोग बली होता है ।.

५३४--कारकांश या उससे पञ्चम भाव या लग्न या लग्न पद में शुक्र हो उसपर

गुरु की या चन्द्र की योगदृष्टि हो तो राजा का सम्बन्धी हो (वृ० पा०) ।

५३५--शुभ ग्रह से युक्त कारक यदि ५,७,१० या ९ भाव में हो तो उसे राजा

के आश्रय से धन लाभ हो (वृ० पा०)।

५३६--कग्न का पद और सप्तम भाव का पद परस्पर केन्द्र में हो या ३,११ में

या ५,९ में हो तो निश्चय राजा हो सुखी हो (वृ० पा०) ।

५३७--लग्न पद या चन्द्र के साथ उच्च का ग्रह हो उसमें गुरु या शुक्र का योग

या किसी उच्चस्थ ग्रह का योग हो तो निश्‍चय राजा हो (वु० पा०) ।

५३८--या पद में चन्द्रमा हो और उससे दूसरे स्थान में गुरु हो तो भी राजयोग होता है (वृ० पा०) ।

५३९--पद में शुभ ग्रह और चन्द्रमा हो, द्वितीय स्थान में गुरु हो उनपर उच्च

अह की दृष्टि हो तो निश्चय राजा होता है (वृ० पा०) ।

४५४०--जेसे आत्मकारक से २,४,५ भाव का विचार बताया है उसी प्रकार

रूगनेश ओर सप्तमेश से भी विचारना अर्थात्‌ लग्नेश सप्तमेश से २,४,५ इन भावों के

सुल्य शुभ ग्रह हो तो राजा होता है (जेमिनि) ।

५४१- यदि लग्नेश सप्तमेश २,४,५ इन भावों में शुभ और पाप ग्रह दोनों मिले

हों तो राजा के समान हो (जैमिनि) ।

५४४२--लग्नेश ओर सप्तमेश में ३,६ भावों के तुल्य २ पाप ग्रहों के राश्या दि

हों तो राजा हो (ज॑मिनि) ।

“राजयोग के फल का विचार

ग्रहों के स्थान ओर दृष्टि का विचार कर राजयोग का फल विचारना । पहिले

जन्म काल का ग्रह स्पष्ट भाव स्पष्ट करना । इसमें शूभ और अशुभ भाव विचार कर

राजयोग : ३८७

केन्द्र कोण आदि संज्ञा का विचार कर ग्रहों के बल ओर स्थिति के अनुसार राजयोग के फल का विचार करना ।

इसके पहिले आयुर्दाय का निश्चय कर फिर फल का समय निकालना । राजयोग का कितना फल होगा ७ यह राजयोग कारक ग्रहों के बल आदि पर विचार कर निर्णय करना । यदि ये उच्च के डों तो पूर्ण फल, मूळ त्रिकोण में पौन फ़ल, स्वक्षेत्री में आधा फल, मित्र क्षेत्री में चौथाई फल होगा । शत्रु क्षेत्र में अष्टांश, शुभ फल होगा । वे ही ग्रह यदि अस्त व नीच में हों तो सम्पूर्ण अशुभ होगा। शतु क्षेत्री में पौन अशुभ, मित्र क्षेत्री में आधा, स्वक्षेत्री में चतुर्थाश, अशुभ होगा । मूल त्रिकोण में नाम मात्र को अशुभ होगा परन्तु उच्च में कोई ग्रह अशुभ फल नहीं देगा । फल समय

योग कारक ग्रहों में जो सबसे बळी हो उसकी दशा अंतर्दशा में पूवं बताये योगों के फल होंगे ।

राजयोग करने वाले ग्रहों में जो दशम या लग्न में हो उसकी अंतर्दशा में राज्य लाभ होगा ।

जब इन दोनों स्थानों में ग्रह हों तो जो उनमें से वली हो उसकी अंतर्दशा में लग्न फल होगा। और दशम में बहुत ग्रह हों तो उनमें से जो बली हो उसकी अंतर्दशा में 'फल होगा । इन दोनों भाव में जब कोई ग्रह न हो तो सब ग्रहों में जो बली हो उसकी दशा मे राजयाग होगा। या जन्म काल में जो बलवान्‌ ग्रह हो उसकी दशा में अधि- कार प्राप्त हो । छिद्रा दशा

चत ह बलवान्‌ ग्रह से होने वाले राज्य लाभ को भी छिद्रा दशा नष्ट कर

1

जन्म कालिक शत्रु व नीचगत बलवान्‌ ग्रह की अंतर्दशा छिद्रा दशा कहलाती है ।

इनमें भी राज योग कारक ग्रहों में से कोई नीच व शत्रु क्षेत्री या निबंळ ग्रह हो

'तो वह योग भंग कर देगा अन्य कुछ हानि नहीं करेगा ।

जन्म में शत्रु क्षेत्री या नीच के ग्रह अपनी दशा में यदि राजा हो तब भी राज्य भ्रष्ट कर देता है । साहुकार को भिखारी बना देता है ।

राज भंग योग

जिन योगों के होने में पूर्व बताये राजयोग भंग हो जाते हैं वे नीच दिये हैं।

शुरुका ` १--गुरु नीच तथा अस्त का हो, लग्न में कुंभ राशि हो, ३ ग्रह नीच के हों, एक ग्रह धन भाव में हो, दशम भाव में अशुभ ग्रह हो तो सैकड़ों राजयोग नष्ट करता

है ( जा० भ० )।

२-- गुरु परम नीच अंश में हो तो राजयोग में भी उत्पन्न जातक अति दरिद्रो

हो (शंभु० ) । अन्‍य क या दे करी

नी कफ 014071600 xmas शीतीलाइंआत्आाआ।5:5९६८६28

३८८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

३--गुरु अस्त हो और ३ ग्रह नीच के हो, और जन्म लग्न कुंभ हो तो राजयोग

नष्ट हो ( जा० भ० ) ||

४--गुरु अस्त हो, एक भी ग्रह उच्च में न हो, दशम में पाप ग्रह हो तो राजयोग

नष्ट हो ( शंभु० ) ।

५-- लर्न में मकर का गुरु परम नीचगत हो तो राजयोग में भी उत्पन्न दरिद्री हो ( शंभू. ) । शुक्र का

६--शुक्र नीच या सिंह के नवांश में हो तो राजयोग नष्ट हो।

७--शुक्र परम नीच अंश में हो तो राजयोग: नष्ट होकर पतन हो (जा०भ० )r

८--शुक्र अस्त हो, या नीचगत हो, सब ग्रह केन्द्र में हों और शुभ ग्रह ६,८१२

भाव में हों तो सब राजयोग भंग हों ( शंभु० ) ।

९--शुक्र नीच का होने से राजयोग नष्ट होता है ( स$ चि० ) ।

चन्द्र का

१०--चन्द्र अस्त हो ४ ग्रह नीच या शत्रु क्षत्री हों, केन्द्र ग्रह शून्य हो या उसमें

शुभ ग्रह न हों तो राजयोग नष्ट हो ( जा० सं० )।

११-चन्द्रमा परम नीच अंश का हो या चन्द्र परम -नीच हो तो राजयोग

नष्ट हो ।

१२--चन्द्रमा तुला के १० अंश पर हो तो हजारों योगों को भंग करता है।

१३--नीच का हो तो भाग्य नष्ट करता है।

१४--चन्द्रमा या लग्न को एक भी ग्रह न देखे तो राजयोग नष्ट हो (शंभु०) ४

१५--क्षीण चन्द्र को पाप ग्रह देखते हों और शुभ ग्रह नहीं देखते हों और सूर्य

स्व नवांश में हो तो पहिले राज्य प्राप्त हो पश्चात्‌ राजयोग नष्ट होकर दुःखी हो,

आशा नष्ट हो ( जा भ०-)।

१६--बलहीन चन्द्र चरराशि के अन्त भाग में, स्थिर राशि के आदि में, दविस्थभाव

राशि के मध्य में हो और कोई भी ग्रह लग्न में न हो तो राजयोग भंग हो (जा. पारि.)

इतर ग्रहों के योग

१७--मंगल सूर्यं शनि ३,६,११ स्थानों में हों, शुभः ग्रह केन्द्र में न हो या अस्तंगत

हो, या शुभ ग्रह सप्तम हो राहु लर्न में हो चन्द्र की दृष्टि उस राहु पर हो राजयोग

नष्ट हो ( जा० भ० )1 ;

मतांतर--सूर्यं मंगल शनि १,६,११ भाव में हों शेष पूर्वोक्तं ।

१८-¬सूर्यं उच्च का नीच नवांश में हो तो राजयोग नष्ट हो । इस योग में पाप

दुष्ट सूर्य लग्न में हो तो निश्चय राजभंग हो ( स० चि० ) ।

१९--सूये परम नीच का हो तो हजार राजयोग नष्ट हों ( स० चि० )। -

२०--छनम में राहु हो चन्द्र से दुष्ट हो तो राजयोग भंग हो ।

२१-५ ग्रह नीच के हों या अस्त हों तो राजयोग भंग हो ।

राजयोग: ३८९

२२--सब पाप ग्रह केन्द्र में हों नीच या शत्रु के घर के हों और सोम्य ग्रहों की उन पर दृष्टि न हो शुभ ग्रह ६,८,१२ भाव में हों तो राजयोग नष्ट हो (जा० भ०) । २३--इसी प्रकार नीच शत्रु राशि आर पाप षष्ठ्यंश वाले ग्रह राजयोग नष्ट करते हैं ( जा० पारि० )।

२४--९,१०,११ स्थानों के स्वामी नीच के हों तो सव राजयोग नष्ट हों ।

२५--उच्च के ग्रह नीचांशक में हों तो राजयोग नष्ट हो ।

२६--सब पाप ग्रह नीच के केन्द्र में हों ।

२७--सब पाप ग्रह ३,६,११ स्थानों में हों ।

२८--सौम्य ग्रह ६;८,१२ घरों में हों ।

२९--सोम्य ग्रह अस्तंगत हों या केन्द्र में न हों तो राजयोग नष्ट हो । ३०--घरों केन्द्रों में शुभ ग्रह न हों या केन्द्र में जो गृह हों वे अस्त व नीच में हों या शत्रु गृही हों ( जा० भ० ) । ३१--चारों केन्द्र शून्य हों शुभ गृह अस्त हों या नीच में हों या ४ गृह शत्रु क्षेत्री हों तो राज योग भंग हो ( जा० सं० ) ।

३२--चारों केन्द्रों में पाप ग्रह हों और द्वितीय में भी पाप ग्रह हों तो वह अति दरिद्री वंश वाले को भय प्रद है ( जा० सं० ) । ३३--राजयोग कारक ग्रह नीच शत्रुक्षेत्री या अस्त हो.या नीच या शत्रुक्षेत्री ग्रह से दृष्ट हो तो राजयोग भंग हो ( जा० पारि० ) ;

३४--दशम भाव में नीच का ग्रह हो तो राजयोग भंग हो ।

३५--शत्रु राशि में सब ग्रह हों चाहे नवांश में या वर्गोत्तम में हों तो राजयोग

नष्ट हो ( शंभु० ) ।

३६--वहुत ग्रह नीच में हों तो राजयोग नष्ट हो ( शंभु० ) । ३७--लग्न में एक भी ग्रह नीच का हो ओर दशम में पाप ग्रह हो तो राजयोग

नष्ट हो ।

३८--यदि ४,५ या ६ ग्रह एक स्थान में हों तो राजयोग नष्ट हो पर भिक्षुक हो।

३९--जितने राजयोग नाशक योग हैं, जितने रेका (दरिद्र) योग हैं, जितने प्रेष्य

( दूसरे की नौकरी ) योग और केमद्रुम योग हैं ये चारों प्रकार के योग शुभ नाशक हैं

{ जा० पारि० ) ।

४०--जन्म में उल्कापात हो या व्यतीपात योग हो या धरती कम्पायमोन हो, फट जावे या जन्म समय पूछल तारा का उदय हो तो राजयोग में भी उत्पन्न हुआ

दरिद्री होता है ( शंभु० ) 1

अध्याय १२

नाभस आदि योग

योग--जन्म कुंडली में जो ग्रह हैं उनका अधिकार एक-एक दूसरे ग्रह से दृष्टि

आदि द्वारा सम्बन्ध एवं ग्रहों की स्थिति के अनुसार ग्रहों का जो विशेष योग बनता हैः

यहाँ उनके नाम दिये हैं ओर उनका फल बताया है। नाभस आदि अनेक इस प्रकार

के योग आगे दिये हैं ।

थोग के फल का समय

इन योगों का फल उस ग्रह की दशा में होता है । दशा आरम्भ काल में ग्रह स्पष्ट

के अनुसार यवनाचार्य ने ऐसे १५०० भेद कहे हैं कोई आचार्य पृथक असंख्य भेद

बतलाते हैं ।

१ आकृति योग के २० भेद

१. गदायोग--केन्द्र के पास मिले किसी दो भाव में सव ग्रह हों तो गदायोग

होता है । इसक्रे ४ भेद हैं ।

(१) लग्न और चतुर्थं में सब ग्रह, (२) चतुर्थं और सप्तम में सव ग्रह, (३)सप्तम

और दशम में सब ग्रह, (४) दशम और लग्न में सब ग्रह । यवनमत से इन चारों भेदो

के पृथक-पुथक नाम भी दिये हैं ।

(१) लग्न और चतुर्थ में सब ग्रह-गदा । (२) चतुर्थ और सप्तम में सव ग्रह-शंखः

(३) सप्तम और दशम में सब ग्रह-बच्चुक । (४) दशम और लग्न में सब ग्रह=ध्वज ।

नाभस आदि योगः ३९१

२. शकट योग- केन्द्र

३, विहंग योग--चतुथं और दशम में ४. श्युगाटक योग--लग्न, पञ्चम सब ग्रह हों । ओर नवम में सब ग्रह हों ।

५. हुल योग--लग्न छोड़कर परस्पर त्रिकोण में सब ग्रह हों।

इसके ३ भेद हैं (१) २, ६, १० स्थान में सब ग्रह ।

(२) ३, ७, ११ स्थान में सब ग्रह ।

(३) ४, ८, १२ स्थान में सब ग्रह ।

३९२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

आरु गाटक के १, ५, ९ स्थान छोड़कर अन्य त्रिकोण में सब ग्रह ।

हल योग के उदाहरण:--

६. बज्न योग--सव शुभ ग्रह लग्न और सप्तम में हों या सब पाप ग्रह चतुर्थ

और दशम में हों ।

नाभस आदि योग; ३९३

मतांतर

कुछ विद्वानों का कहना है कि १,७ आव में शुभ ग्रह और ४,१० भाव में पाप ग्रह हों तो वच्ञ योग होता है। परन्तु सूर्य से चौथे स्थान अन्तर पर चुघ शुक्र आना असभव है । सब ग्रह केन्द्र में होने

से तो कमल योग होता है। यहाँ पाप और शुभ ग्रह का पृथक कारण हो गया है । चारों केन्द्र में इस प्रकार पाप-शुभ ग्रह के अनुसार ग्रह आना असंभव है इससे उपरोक्त हल योग पृथक-पृथक दो प्रकार से चताये हैं ।

७. यव योग--वह वज्र योग का उल्टा है अर्थात सब पाप ग्रह लग्न और सप्तम में हों या सब शुभ ग्रह चतुर्थ ओर दशम में हों ।

सतांतर--

यहाँ भी विद्वानों का कहना है कि १,७ भाव में पापग्रह और ४,१० भाव

में शुभ ग्रह हों तो वस्न योग होता है ।

यहाँ भी उपरोक्त विचार होता है कि सूर्य

से शुक्र बुध चौथेभाव में नहीं जा सकते

इस प्रकार तो कमल योग होता है । परन्तु 2

शुभ ओर पापग्रहों के विचार से यहाँ भी दो उपरोक्त प्रकार से योग बताये हुँ ।

८. कमल योग--चारों केन्द्र में शुभ-पाप ९. वापी योग--यह कमल योग का सभी ग्रह हों और पणफर आपोक्लिम उल्टा है । अर्यात. सभी ग्रह केन्द्र के में ग्रह न हों अर्थात्‌ सब केन्द्र में ही हों बाहर हों। केन्द्र मे कोई ग्रह न हो केन्द्र के बाहर ग्रह न हों इसमें शुम-पाप के इसके भी २ भेद हैं ! क्रम का कोई विचार नहीं है, जैसा यहां (१)सब ग्रह २,५,८,११(पणफर) में ।

बताया है 1 (२)सब ग्रह ३,६,९,१२(अपो क्लिम) में।

यक त क्क pe ह

३९४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

११. शर (इणु या इषु) योग-चतुर्थ

१०. यूप (यूपक) योग- लग्न से चतुर्थ से सप्तम तक सब ग्रह हों जैसा यहाँ

तक सब्‌ ग्रह हों अर्थात्‌, १, २, ३ और बताया है अर्थात्‌ लग्न से ४,५,६,७ भाव

४ भावों में सबग्रह हों । में सब ग्रह होना । ८

१२. शक्ति योग--सप्तम से दशम भाव १३. दंड योग--दशम भाव से लग्न

तक सब ग्रह हों अर्थात्‌ लग्न से ७,८,९, तक सब ग्रह हों अर्थात लग्न से १०,११,

१० भाव में सब ग्रह हों । १२ और ९ स्थान में सब ग्रह हाँ ।

१४. नौका योग- लग्न से सप्तम तक १५ कूट योग--चतुर्थ भाव से दशम

प्रत्येक भाव में एक-एक गृह हो ७ भाव भाव तक प्रत्येक भाव में एक-एक करके ७

हक ७ गृह हों || गृह ७ स्थानों में हो ।

oo =

नाभस आदि योग : ३९%

१६--छत्र योग-सप्तम से लग्न तक १७--चाप (धमुष-कामुंक) योग-दश सब ग्रह हों । प्रत्येक भाव में गृह हों। भाव से चतुर्थं भाव तक सब गृह हों एक एक करके ७ गूह ७ स्थानों में हों ।

१८--अद्धंचंद्र योग-पूर्वोक्त नौका, कूट, छत्र और चाप में जो योग बताये हैं उनको छोड़ कर उनके विरुद्ध शेप किसी स्थान से लगातार सव गूह एक-एक करके

७ स्थानों में हों इसके ८ भेद हो जाते हैं।

[१] २ भाव से ८ भाव तक लगातार ७ घरों में १,१ गृह ।

[२] ३ भाव से ९ भाव तक लगातार ७ घरों में १,१ गृह ।

[३] ५ भाव से ११ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह ।

[४] ६ भाव से १२ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह ।

[५] ८ भाव से २ भाव तक लगातार ७ घरों में १-५ गृह ।

[६] ९ भाव से ३ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह ।

[७] ११ भाव से ५ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह ।

[८] १२ भाव से ६ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह 1

३९६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

नाभस आदि योग : ३९७

१९--समुद्र ( जलधि ) योग-द्वितीय २०--चक्र योग--लग्न से एकादशं भाव तक १-१ घर छोड़कर सभी गूह अर्थात्‌ १,३,५,७,९,११ इन भावों में गृह हों यह समुद्र का उल्टा है ।

(६) वजू, (७) यव, (८) कमल, (९) वापी योग पर बिचार प्राचीन ग्रंथों के अनुसार वस्न आदि योग लिखे गये हैं परन्तु सूर्य से चौथे घर में बुध तथा शुक्र कंसे हो सकते हैं सूर्य से बुध या शुक्र २८ अंश और ४८ अंश से अधिक दूरी पर नहीं हो सकते अर्थात्‌ सूर्य से बुध शुक्र दूसरे या तीसरे भाव से अधिक द्र नहीं हो सकते । भारतवषं में इन योगों का होना असंभव जान पड़ता है । कुछ विद्वानों का कहना है कि सूर्य से बुध शुक्र चौथे स्थान पर इस प्रकार हो सकते हँ कि सूर्य अंतिम २९ अंश के अंत में एक भाव में हो ओर २ राशि छोड़कर चौथे ठिकाने थोड़े अंश से बुध या शुक्र हो । २ संख्या योग--इसके ७ भेद हैं । पूर्वोक्त योगों में से कोई योग न हो तब इन योगों का विचार करना । १-वीणा (वल्ली-वल्लकी) योग यदि ७ स्थानों में सव ग्रह हों । २-दाम ( दमनिका-दामनी-रज्जू ) योग-केवल ६ स्थानों में सब ग्रह हों। ३- पाश योग = केवल ५ स्थानों में सब ग्रह हों । ४-केदार योग = केवल ४ स्थानों में संव ग्रह हों । ५-शूल योग = केवल ३ स्थानों में सब ग्रह हों । ६-युग योग = केवल २ स्यान में ही सव ग्रह हों ७-गोल (गोलक) योग-केवछ १ स्थान में ही सब ग्रह हों। विचार-संख्या योद की प्राप्ति में आकृति योग हो तो संख्या योग का फल नहीं दोगा आकृति योग का ही फल होगा । संख्या योग के भेद १. एक-एक ग्रह पृथक रहने से-७ भेद । २. २ ग्रह साथ रहने से -२३ भेद । ३. ३ ग्रह साथ रहने से -३५ भेद। ४. ४ ग्रह पाथ रहने से -३५ भेद । ५. ५ ग्रह साथ रहने से -२१ भेद । ६. ६ ग्रह साथ रहने से - ७ वंद । ७. ७ ग्रह साथ रहने से - १ भेद ।

योग १२७

३९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

इनके भेदों के उदाहरण

१. एक ग्रह एक ही स्थान में होने से ७ होते हैं अर्थात्‌ पृथक एक ही ग्रह रहने

सब ७ योग ७ ग्रहों के होते हैं (वीणा योग) ।

२. दामनी योग > २ ग्रह एक साथ होने से २१ भेद होते हैं--

१ सूर्यं चंद्र ८ चंद्र बुघ १५ मंगल शनि

२ सूर्यं मंगल १ चंद्र गुरु १६ बुध गुरु

३ सूर्य बुध १० चंद्र शुक्र १७ बुध शुक्र

४ सूर्य गुरु ११ चंद्र शनि १८ बुध शनि

५ सूर्य शुक्र १२ मंगल बुघ १९ गुरु शुक्र

६ सूर्य शनि १३ मंगल गुरु २० गुरु शनि

७ चंद्र मंगल १४ मंगल शुक्र २१ शुक्र शनि

३. ३ ग्रह एक साथ होने से ३५ भेद हो जाते हैं ( पाश योग के )

१ सूः च. मं. ८ सूः मं. शु. १५ सू. शु. श. २२चं. बु. शः २९ मं. गु. शु.

२ सू. चं. बु.

३ सू. चं. गु.

४सू. चं. शु.

५ सू. चं.श.

६ सू. मं. बु.

७ सू. मं. गु.

९ सू.मं. शः १६ चं. मं. बु. २२चं.गु.शु. ३० मं. गु. श,

१०सू. बु. गु. १७चं. मं. गु. २४ चे, गु. शः ३१ मं. शु. श.

११सू. बु. शु. १८ चं. मं. शु. २५चं.शु.श. २२ वु. गुः शु,

१२सू. बु. श. १९ चं. मं. शः २६ मं. वु. गु. ३३ वु. गु. शः

१३सू. गु. शु. २० चं. बु. गु. २७ मं. बु. शु. ३४ बु. शु, श.

१४.सू. गु. श. २१ चं. वु. शु. २८ मं. वु. श. ३५ गु. शु. श.

४, केदार योग--४ ग्रह एक साथ रहने से ३५ भेद हो जाते हैं सूर्यं सहित २०

-भेद, चंद्र सहित १० भेद, मंगल सहित ४ भेद, बुध सहित एक भेद सब ३५ भेद

१ सू. चं. मं, बु.

२ सू. चं. मं. गु.

३ सू. चं. मं. शु.

४ सूः चं. मं. श

५ सू. चं. बु. गु.

६सु. चं. बु. शु.

७ पू. चं. बु. श.

८ सू, चं. गु. श.

९ सू. चं. गु. श.

१० सू. चं. शु. श.

११ सू, मं. बु. गु.

१२ सू. मं. बु. शु.

१३ सू. मं. बु. श.

१४ सू. मं. गु. शु.

१४ सू. मं. गु. श.

१६ सू. मं शु. श.

१८ सू. बु. गु. शु.

१८ सू. बु. गु. श.

१९ सू. बु. शुः श.

१० सू. गु. शु. श.

२१ चं. मं. बु. गु.

२२ चं. मं. बु. शु.

२३ चं. मं. बु. श,

२४ चं. मं. गु. शु.

२५ चं. मं. गु. शः

२६ चं. मं. शुः श.

२७ चं. बु. गु. शु.

२८ चं. वु. गु. श.

२९ चं. वु. शुः शः

३० चं. गु. शु. शः

३१ म॑. बु. गुः शुः

३२ सं. बु. गु. शः

३३ मं. बु. शु. शः

३४ मं. गु. शु. श.

३५ बु. गु. शु. शः

५, शूल योग के भेद--५ ग्रह एक साथ होने ये २१ विकल्प होते है ।

नाभस आदि योग : ३९९

. वु. गु २ सू. चं. मं. वु. ८ सू. चं. वुः गु. श, १५ सू. वु. गु, शु. श,

३ सू. चं. शु ९ सू. चं. बु. शु. श. १६ च. मं. बु. गू. शु.

डे सू. च॑,

मं. बु. श १० सू. चं. गु. शु. श. १७ चं. मं. बु. गु. श,

५ सू.

मं. गु. शु ११ सू. मं, वु. गु. शु. १८ चं. मं. बु. शु, शे.

६ सः चं.

चं. मं. गु. श १२ सू. मं. बु. मु, श १९ चं. मं. गु. शु. श.

७ सू. मं. शु. श. १३ सू. मं. बु. शु. श २० चं. बु. गु. शु. श. चं. बु. गु. शु. १४ सू. मं. गु. शु. श. मं बु. गु. शु, शः ५ ° २१ ६. युग योग में ६ ग्रह एक साथ होने से ७ भेद हो गये हैं । १ सूर्य चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु शुक्र ५ सुयं, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, शनि २ सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शनि ६ सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि है सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, शुक्र, शनि ७ चन्द्र, मंगल: बुध, }

७.

४ सूर्य, चन्द्र, मंगल, गुरु, त शनि RST गोल योग--७ ग्रह एक स्थान में होने से १ ही भेद होता है। १. सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि । ३. आश्रय योग--चर-स्थिर-द्विस्वभाव में उत्पन्न इन तीन प्रकार की राशियों के आश्रय होने के कारण “आश्रय योग” कहे जाते हैं । १--रज्जू योग-सभी ग्रह चर राशियों में हों। २~~मूसल योग-सभी ग्रह स्थिर राशियों में हों। ३--नल योग-सभी ग्रह॒ द्विस्वभाव राशियों में हों । ४. दल योग-इसके २ भेद हैं । १--माला (सरग) योग-सव शुभ ग्रह केन्द्र में हों पाप ग्रह केन्द्र में न हों । २--सपं योग-सब पाप ग्रह केन्द्र में हों शुभ ग्रह केन्द्र में न हों । यहाँ तीनों केन्द्रों में सब शुभ ग्रह हों और पाप ग्रह केन्द्र के बाहर हों तो माला योग होता है । इसके ५, विरुद्ध सपं योग है जिसमें तीनों केन्द्रों में पाप ग्रह हों और शुभ- ग्रह केन्द्र के बाहर हों ।

इन योगों के फल पर विचार

१--संख्या योग की प्राप्ति में आकृति योग भी हो तो आकृति योग फल देगा । संख्या योग का फल नहीं होगा । - २--आश्रय योग में आकृति योग हो जावे तो आकृति योग ही फल देगा । रै--दल योग में संख्या योग की प्राप्ति हो तो दछ योग ही फल देगा । ४--दल योग और आश्रय योग मिल्वां हो तो उपरोक्त दल योग सरीखा साधारण फल होगा ।

५---संख्या योग में पूर्वोक्त आश्रय योग भी हो तो आश्रय योग ही फल देगा । संख्या योग का फल नहीं होगा । आश्रय योग न हो तब संख्या योग फल देगा ।

६--आश्रय योग में-शुभ ग्रह शुभ फल देते हैं पाप ग्रह पाप फल देते हैं आश्रय योग में उत्पन्न प्राणी कुछ विख्यात होता है ।

४०० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१. आकृति योग के फल

१--गदा-सदा धनोद्योगी, यज्ञ करने वाला, शास्त्र और संगीत में निपुण, स्वर्णे

रत्न आदि धनों से युक्त (वृ० पा०) । शस्त्र योग में प्रवीण, शीघ्र कहे हुए शब्द के

अर्थ में तत्पर, यज्ञ करने वाला, धनी और सम्पन्न (ल० चं०) । अनेक शास्त्र और

अनेक मंत्रों में तत्पर, गाने बजाने में चतुर, यज्ञ करने वाला, उग्र वेर करने वाला

शत्रुओं से युक्त, भूषण सहित, स्त्रियों वाळा (जा० भ०) ।

२--शकट~गाड़ी, रथ, छकड़े आदि के काम आजीवन करे, नित्य रोगी, उसकी

स्त्री निंदा योग्य हो (वृ० जा०) । दीन हीन, मित्र और वैभव युक्त कृश खोटी स्त्री

को प्राप्त, त्याग करने वाला (जा० भ०) । निधि के काम में निपुण, स्थिर द्र व्य, सुखी,

प्रसन्न मुख, और नेत्रों वाला, सदा ही तप्त, मूर्ख, कुभार्या वाला, रोगों से व्याकुळ

कष्ट युक्त जीविका, दरिद्री, भाइयों से हीन [छ० चं०]। रोगी, कुनखी मूखं, गाड़ी से

जीविका, निर्धन, मित्र आदि जन से रहित [वु० पा०] ।

३--विहग [पक्षी]-पराये भोजन से पर कायं को जाने-आने वाला और भ्रमण

करने वाला, कलह करने वाला [त्रु जा०] । भोगों सहित, त्यागों से उत्पन्न सोख्य

वाला, यात्रा में प्रीति, नित्य ही परदेश जाने वाला, बहुत बोलने वाला [जा० भ०]।

घूमने में अत्यन्त रुचि, प्रसन्न, सुरत से जीविका प्राप्त होने वाला, निकृष्ट और लड़ाई

प्रिय वाळा [ल० चं०]। भ्रमण शीळ, परतंत्र, दूत, सुरत से जीविका करने वाला,

ढीठ, झगड़ालू [वृ० पा०] ।

४--श्यगाटक-वुढ़ापे तक सुखी [वृ० जा०]। उत्कृष्ट राजा, साहंसी, युद्ध का

इच्छुक, सौख्य युक्त, बडा बुद्धिमान्‌, पहली स्त्री से बेर करने वाला [जा० भ०] ।

हंसने में सुखी, सुन्दर स्त्री वाला, राजा से डरने वाला, लड़ाई में प्रसन्न, धनवान्‌, स्त्री

का दास [ल० चं०] । कलह कारक, योद्धा, सुखी राजा का प्रिय, सुन्दरी पत्नी, धनी,

स्त्री का द्वेषी [वृ० पा०]।

५--हरू-कृषि कर्म या पशु पालन आदि करे [वृ० जा०] । दूत, साध ओर

मित्रों से रहित, खेती से आजीविका, अत्यन्त दुःखों का भोगी, क्लेशो को प्राप्त, धन

हीन [जा० भ०] । बहुत भोजन करने दारी, ८रिद्री, कृषि कर्म से वजित, उद्देग युक्‍त,

दुःखित और दास [७० चं०] । वहु भक्षी, दरिद्र, कृषक, दुःखी, भाई वन्धुओं से युक्त [वृ० पाश] । ६. वच्च--वालक वृद्ध और प्रथम अवस्था में सुखी, युवावस्था में दुःखी, सब का

प्यारा, अति शूर [वृ० जा०] । पहिली अवस्था में जीविका को प्राप्त, अंत में सौख्य

को प्राप्त, भाग्यवान्‌, जवानी में भाग्यहीन, काम-क्रोध युक्त [जा० भ०]। सुखी

सौभाग्यवान्‌, शूर मध्य अवस्था में भाग्यहीन, स्नेह रहित विष्द्ध करने वाला, दुष्ट

[छं० चं०] वाल्य और वार्धक्य में सुखी, शूर, सुन्दर, निस्पृह, भाग्यहीन, खल और

लोगों का विरोधी [वृ० पा०[ 1

७. यव--पराक्रमी, वाल वृद्ध अवस्था में दुःखी, तरुण अवस्था में सुखी [वृ०जा०]

इन सब योगों के पूर्ण फल आगे दिये हैं ! ठ

~

नामस आदि योग : ४०१

जवानी में धमं काम अर्थ सम्पत्ति सहित, नम्रता सहित, सदा उत्साही, श्रेष्ट बत्ति वाला शांत चित्त क्रोध रहित [जा० भ०] । दाता, स्थिर चित्त, प्रतापी, नियमों से यक्त, मध्य अवस्था में सुख, और पुत्रों से युवत [ल० च॑०]। योग में वृत नियम सुकमं में तत्पर, मध्यावस्था में सुखी, धन पुत्र से युक्त, दाता, स्थिर बुद्धि [वृ० पा०] । ८. पद्य [कमल]-सवंत्र निदित, कीति और अगणित सुख, ग्‌ ण, विद्या एवं पराक्रम वाला ( वृ० जा० ) । सदा बड़े हर्ष वाला, बलवान्‌, सुन्दर कांति, यशवान, राजा के वंश में उत्पन्न बड़ी आयु वाला ( जा० ० )। स्थिर आयु वाला, बड़ी कीति युक्त, मनोहर शुभ पुत्रों से युक्त, गुण और मद से भी युक्त ( छ० च० ) । धनी, गुणी, दीर्घायु, विख्यात यश, शुद्ध, सैकड़ों सु कमं करने वाला राजा ( वृ० पा० )।

९. वापी--वहुत काल तक थोड़े सुख वाला, भूमि में घन गाड़ने वाला, कृपण ( वृ० जा० ) । बड़ी आयु, अपने वंश में प्रतापी, सौख्य युक्त, अत्यन्त धीर, पंडित, सुन्दर वाणो, श्रेष्ठ मन, फूलों की वाटिका करने वाला, थोड़ा सुख ( जा० भ० ) धन संग्रह में चतुर, स्थिर धन, स्थिर सुख, पुत्रवान्‌, नृत्य नाटक आदि से सुखी राजा होता है ( वृ० पा० ) । बहुत काल तक थोड़ा सुख वाला, धन बढ़ाने वाला, कृपण ( जा० पारि० ) ।

१०. यूप--दानी, प्रमाद न करने वाळा, उत्तम यज्ञ करने वाला ( वु० जा० } धैर्यवान्‌ उदार, यज्ञ कमं में तत्पर, अनेक विद्या और श्रेष्ठ विचार करने वाला लक्ष्मी युक्त ( जा० भ० ) आत्म रक्षा में रत; त्यागी, सुखी, सत्य और कृतों से युक्त विशिष्ट ओर मंत्रवादी ( छ० च० ) आत्मज्ञानी, यज्ञ कर्ता, स्त्री से सुखी, बलवान्‌, ब्रत नियम

को पालन करने वाला, विशिष्ट पुरुष होला है ( वृ० पा० ) ।

११. शर (वाण)--जीव घाती, कंद खाने का मालिक, बाण, बन्दूक, गोली आदि

का बनाने वाला ( वृ० जा० )। अति हिंसा करने वाला, शिल्प का जानने वाला,

दुःखों से सन्ताप को प्राप्त, शिल्प के कार्य से दुःखी ( जा. भ, ) वाणों का वमाने'

वाळा, चोरों की सेवा करने वाळा, माँस खाने वाळा, मृगों को वाँधने वाला, हिंसक,

कारीगरियों को जानने वाला (ल॑. चं.) । शर बनाने वाला, जेल का मालिक, शिकार

से धन वाला, मांस भक्षी, हिंसक, कुशिल्पकार ( वृ. पा. ) ।

१२. शक्ति--नीच कमं करने वाला आलसी, योग और धन से वर्जित (व्‌. जा.) ।

नीच ॐच मनुष्यों से प्रीति करने वाला, आलसी, सौख्य और धन से रहित, बिवाद

और युद्ध में उसकी विशाल बुद्धि का सौख्य थोड़ा होता है ( जा. भ: ) । अति आयु

वाला, युद्ध में निपुण, सौभाग्यवान्‌, नीच, दुःखी दरिद्री ( ल. चं. )। घन हीन, निष्फल जीवन, दुःखी, नीच, आलसी दीर्घायु, युद्ध में निपुण, सुन्दर रूप ( वृ. पा. ) ।

१३. दंड--पुत्रादि से रहित, दास कमं करने वाला (वृ. जा.) | दीन हीन उन्मत्तों

से मित्रता को प्राप्त हुए सुख वाला, सेवकों से बेर करने वाला, अपने कुटुम्वियो से

बैर करने वाला, स्त्रो, पुत्र, धन, मित्रों से हीन, बुद्धि रहित (जा. भ.) । दरिद्री, नष्ट

1 २६