सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
षड्वंगं विचार : ७३
(३) चन्द्र होरा में सम राशि में शुभ ग्रह-मृदु स्वभाव, कीतिमान्, सुखी, सब का
च्यारा, वुद्धिमान्, मधुर वाणी, सौभाग्य युक्त ।
चन्द्र होरा सम राशि में पापग्रह-पुर्वोक्त महा उद्यम बल धन तेज से हीन ।
(४) चन्द्रहोरा विषम राशि में पाप ग्रह-पूर्वोक्त शुभ फल मध्यम ।
इनमें बहुत ग्रह होने से बहुत फल ।
इनमें थोड़ा ग्रह होने से थोड़ा फल ।
(५) चन्द्र होरा में चन्द्र -अति सुन्दर और प्रिय पुत्र हो ।
चन्द्र होरा में बुध-स्वंत्र विख्यात, स्त्री पतिव्रता, शुभाचार युक्त ।
चन्द्र होरा में गुरु-धन रहित, तेजस्वी, अनिदनीय ।
चन्द्र होरा में शुक्र-भोगने योग्य स्त्री मिले ।
चन्द्र होरा में क्षीण चन्द्र-शुक्र के समान फल ।
चन्द्र होरा में मंगल-मृतस्त्री ओर नराधम हो ।
चन्द्र होरा में सूयं-अति दुःखी, गुह्य स्थान की पीड़ा से पीड़ित ।
चन्द्र होरा में शनि-दासी का पति हो ( दासी से विवाह करे ) ।
(६) चन्द्र होरा में शुभ ग्रह हो तो-शुभ फल होता है, स्त्रियों का सनेही, स्त्रियों
को प्रसन्न रखने वाला ।
चन्द्र होरा में पाप ग्रह हो तो-शुभ फल नहीं होता ।
(७) चन्द्र होरा में विषम राशि-वाग्मी ,दाता, चारु शरीर, दयालु, लम्पट, स्त्री
अकृति वाला ।
चन्द्र होरा में सम राशि-बोलने में दक्ष, आलसी, सती स्त्री में रत ।
र द्रेष्काण फल विचारना
द्रेष्काण के विशेष नाम
१-आय॒ध द्रेष्काण-मेष का पहला, तीसरा । मिथुन का दूसरा तीसरा । सिंह का
पहिला दूसरा और तीसरा, धन का तीसरा, कुम्भ के तीनों । मीन का पहिला और
दूसरा द्रेष्काण ।
२-सपं द्रेष्काण-वृष का दूसरा । ककं का दूसरा और तीसरा, वृश्चिक का पहिला
और दूसरा, मोन का तीसरा द्रेष्काण ।
३-निगड़ ( वेड़ी ) द्रेष्काण-मकर का पहिला द्रेष्काण ।
४-पक्षी द्रेष्काण-मिथन का दसरा, सिंह का पहिला, कन्या के तीनों, तुला का
पहिला दूसरा, धन का पहिला, मकर का पहिला । ७
इनमें सिद्ध द्रेष्काण--सिह का पहिला, तुला का दूसरा, कुंभ का पहिला । प
४--चतुष्पद द्रेष्काण--मेष का पहिला दूसरा, वृष के तीनों, मिथुन का पहिला
ककं का पहिला, सिंह का पहिका ओर तीसय, तुला का तीसरा, वृश्चिक का तीसरा,
मकर के तीनों द्रेष्काण 1
७४ : सचित्र. ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
६--वराह द्रेष्काण--कर्क का पहिला ।
७--पाश (फांसी) द्रेष्काण--वृश्चिक का दूसरा ।
अग्नि द्रेष्काण--पाप ग्रह का द्रेष्काण ।
जल द्रेष्काण--शुभ ग्रह द्रेष्काण ।
मिश्र द्रेष्काण--पाप और शुभ दोनों से युक्त या दृष्ट ।
२२ वां द्रेष्काण--अष्टम स्थान में जो तत्काल द्रेष्काण हैं वही लग्न से २२ वां द्रेष्काण होता है।
द्रष्काण फल
राशिपर द्रेष्काण संज्ञा जन्म फल
५, १, ११, ८, १० --खल बुद्धि, घूमने वाला, ५, ७, ८, १२ ( ११ द्रेष्काण ) पापकर्मा, अपवादी । ४-५
४-१२ १ | ६ द्रेष्काण) --दाता भोगी, दयालु, कृषि तथा १२-६ २? जलचर वस्तु से घनवन् शील रहित ॥ २-३ ३]
१, २, ९, १०, ११ ( ११ द्रेष्काण ) --सुख, धन, पुत्र युक्त, दयालु,
७, ९, ६ रमणीक शरीर । ६, ९, ११
१, ४, १९ ३ ८ द्रेष्काण ) --कुशील, पर स्त्री में रमण, कूर २, ९ १ मिश्र दृष्टि, चंचल आत्मा। ३, ५, ७ २
इष्काण विचार--यात्रा में कहीं जाते समय या दूसरी जगह से कहीं जाना हो तब विचारना ।
१ द्रेष्काण शुभ का हो तो पुण्य युक्त या रत्न युक्त है शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो- जय हो ।
२ जिस द्रेष्काण में आयुध युक्त है उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो-हार या नाश हो ।
३ भुजंग (सपे), पाश, इन द्रेष्काणों में यात्रा करने से कैद होता है । ४ द्रेष्काण के समान चोर कहना यह स्वरूप बताने का प्रयोजन है ये स्वरूप आदि आगे बताये गये हैँ ।
५ (१), आयुध, (२), पाश, (३), निगड, (४), गृद्ध, (४), पक्षी, (६), वाराह, (७), सपे, (०), चतुष्पद, इन द्रेष्काणो में जन्म हो तो घन. रहित, कर स्वभाव, निद्य ओर दरिद्र हो
i PEIN NI 002000
षड्वगं विचार : ७५
३६ द्रेष्काण की संज्ञा
राशि द्रेष्काण स्वरूप स्वामी
क्रम
१ मेष १. नर शस्त्र युक्त मंगल
२. पशु साँच्च द्रेष्काण, घोड़े सदृश मुख, सूर्य
३. नर दुष्ट द्रेष्काण शस्त्र युक्त गुरु
२ वृष १. स्त्री रोयेंदार | शुक्र
२. नर चोपाया बुघ
३. नर चौपाया शनि
३ मिथुन १. स्त्री बुध
२. नर पक्षी द्रेष्काण-हृथियार बन्द शुक्र
३. नर हथियार बन्द शनि
४ ककं प्. तर पशु चन्द्र
२. स्त्री मंगल
३. नर मनुष्य, सपं द्रेष्काण गुरु
५ मिह १. नर पशु पक्षी सूर्य
२. नर हथियार बन्द गुरु
३. नर पशु सायुध हथियार बन्द मंगल
इकन्या १. स्त्री बुध
२. नर सायुध शनिः
३. चर शुक्र
७ तुला १. नर मनुष्य शुक्र
२. चर पक्षी शनि
३. नर बन्दर की शकल का पशु बुध
८ वृश्चिक १. स्त्री सपं मंगळ
२. स्त्री सपं गुरु
३. नर चौपाया कछुआ की शकल, सिंह की शकक चंद्र
९ धन १. नर चौपाया घोड़े का शरीर या देह गुरू
२- स्त्री | मंगळ
३. नर सायुध सूर्यं
१० मकर १. नर पशु सांक ( बेड़ी ) में जकड़ी शनि
२. स्त्री शुक्र
३. नर सायुध बुघ
११ुंभ १- नर गरुड पक्षी का स्वरूप शनि .
७६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
२. स्त्री रोयेंदार बुघ
लेः नर शुक्र
१२. मीन १. नर नाव चलाना युर
२. स्त्री सुसज्जित चन्द्र
३. नर सपे मंगल
द्वेष्काण के स्वरूप
द्रेष्काण के स्वरूप आगे बताये हैं इनका प्रयोजन यह है कि इन द्रेष्काणों के रूप
का रूप और चोरे हुए द्रव्य के स्थान आदि बताने के काम आता है ।
नीचे प्रत्येक द्रेष्काण मे स्वरूप आदि दिये हैं---
(१) मेष का
पहिला द्रेष्फाण-पुरुष द्रेष्काण एवं उदित या आयुध द्रेष्काण । यह पाप ग्रह का
ज्रेष्काण है । इससे इसे अग्नि द्रेष्काण भी कहते हैं । कमर में श्वेत रङ्ग का वस्त्र बेधा
हुआ, श्याम रङ्ग, शुभ वस्त्र, लोगों के कल्याण विषय व संरक्षण विषय में समर्थ, रूप
भयंकर, लाळ नेत्र, हाथ में कुल्हाड़ी या फरसा उठा कर कन्धे पर धरा पृथ्वी पर रहता
है । यह चौपाया द्रेष्काण भी है ।
दुसरा द्रेष्काण--स्त्री रूप चौपाया द्रेष्काण है । लाल रंग का वस्त्र पहिने, भूषण
और भोजन की चिन्ताकर्ता, घड़े जैसा पेट, घोड़े जैसा मुख, प्यासी या पानी बहुत
पिये, एक पैर से खड़ी या एक पैर से लंगडी, मग्नि कोण में जाती है ।
तीसरा द्रेष्काण--आयुध द्रेष्काण है । विषम स्वभाव, अनेक प्रकार की कामना
कलाकौशल जानने वाला, लाल वस्त्र पहिने, निरन्तर उद्यमी, वर्ण पिंगल, भूरे केश,
सन्मुख हाथ से लाठी उठा कर रखता है या हाथ में डण्डा लिये, क्रोधी पुरुष, द्विपद
स्वरूप, नियम भंग करने वाला ।
(२) वृष का
पहिला द्रेष्काण--स्त्री द्रेष्काण, चतुष्पद, शुभ ग्रह का द्रेष्काण है । टेढ़े और छोटे
सिर के बाल) घड़े के समान पेट, अग्ति से जले वस्त्र पहिने, नित्य प्यासी या बहुत
पानी पीये, भोजन वहुत करे, भूषणों की इच्छा अधिक करे, भक्ति करे, भोजन बनावे
ऐसी स्त्री । र
दूसरा द्रेष्काण--चतुष्पद, सर्प द्रेष्काण, मिश्र द्रेष्काण है। खेती का काम, अन्न
` सम्हाऊने का काम, घर का काम, हल चना, गाड़ी बैल चलाना, गौ की रक्षा करने _
वाला, गीत वाद्य नाच, छिखना, चित्र बनाना आदि कर्म जानने वाला, पंडित, बैल के
समान कंध या गर्दन, बहुत भूख, बकरे जैसा मुख, मलिन वस्त्र पहिने, पुरुष, चौपाया द्रेष्काण ।
तीसरा द्रेष्काण--पुरुष द्रेष्काण चतुष्पद, पाप ग्रह का द्रेष्काण, हाथी के
सयात बड़ा स्थूल शरीर, श्वेत दांद, ऊॅट क्रे समान बड़े पेर, शरीर का रंग पिंगल
षडूवगे विचार : ७७
( पीया ), बकरे व मृगो के लोभ में व्याकुल चित्त अर्थात् इनसे प्रेम, जंगल में रहना,
चौपाया द्रेष्काण ।
(३) मिथुन का
पहिला द्रेष्काण--स्त्री और चतुष्पद द्रेष्काण है । रूपवती स्त्री सिलाई का और
कसीदे का काम जानने वाली, भूषणों से अति श्रद्धा अर्थात् भूषण पहिने, संतान रहित,
दोनों भुजा उठाये रखे, ऋतुमती या अति कामी । -
दूसरा द्रेष्काण-- पक्षी द्रेष्काण है कवच पहिने, धनुष बाण लिये, वन वगीचे में
खड़ा या रहना । शूरवीर, रणको प्यारा मानने वाला, गरुड़ सरीखा मुख) अस्त्र विद्या
यन्त्र विद्या ( जादूगरी ) जानने वाला, क्रीड़ा ( खेल ) करने वाला, पुत्र, आभूषण
और धन का चितन करने वाला पुरुष पक्षी द्रेष्काण ।
तीसरा द्रेषकाण--पुरुष अग्नि क्रिया मिश्र द्रेष्काण है । बहुत आभूषण से भूषित,
अनेक रत्नयुक्त कवच, धनुष बाण धारण कर्ता, नाचते बजाने गाने में कुशळ, कविता
काव्य आदि रचने वाला पंडित, भ्रमण करने वाला, नर द्रेष्काण ।
(४) ककं का
प्रथम द्रेण्काण--पुरुष द्रेष्काण, चतुष्पद, जल द्रेष्काण, पत्ते फूल फल इनको
धारण करना या खाना, हाथी जैसा स्थूल शरीर, ऊंट जैसे लंबे पैर, घोड़े जैसी गर्दन,
सूकर जैसा मुख, वन विहारी या जंगल का वास, ऐसा पुरुष चतुष्पद द्रेष्काण ।
दूसरा द्रेष्काण--मिश्र द्रेष्काण, स्त्री एवं सपं द्रेष्काण, स्त्री सिर में कमळ का फूल
धारण करती, सपं युक्त और बड़ी कठोर ककंशा, जवानी भरी, बचपन में पलास की
टहनी पकड़ कर खड़ी या पलास के पत्ते रखी हुई । एकान्त वासी ।
तीसरा द्रेष्काण--पुरुष द्रेष्काण, सपं द्रेण्काण, स्त्रियों के लिए आभूषण लाने को
समुद्र में नाव पर बंठा व्यापार करे, सर्प अंग में धर कर चलता, सोने के आभूषण
है, चपटा दुःख ।
(५) सिंह का
पहिला द्रेष्काण--पुरुष, उग्र, आयुध द्रेष्काण, सेमर के वृक्ष पर एक गीध और
एक स्याल (लड़ैया) वैठा एक कुत्ता एक मनुष्य मैले वस्त्र पहिने मां बाप से रहित होने
के वियोग से रो रहा है । यह नर द्रेष्काण, चौपाया और पक्षी हैं ।
दूसरा द्रेष्काण--घोड़े जैसा पुष्ट शरीर सिर में गुलाबी रंग के फूल धरे काळे
हिरन का चमं ओढे व कम्बल लिये। सिह के समान सहज में साध्य नहीं होता,
धर्नुधारी, नाक का अग्र भाग ऊँचा, पुराने कपड़े गुप्त वेश पुरुष द्रेष्काण सायुध,
चतुष्पद ।
तीसरा द्रेष्काण-रीक्ष के समान कुरूप मुख, बानर के समान चेष्टा करे । दाढी
बडी, लाठी फल मांस धारण किये या भक्षण किये ! सिर के केश मुडाये । पुरुष ओर
चतुष्पद द्रेष्काण, अग्नि द्रेष्काण है ।
७८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(६) कन्या का
पहिला द्रेष्काण-कुमारी, फूलों से भरा घड़ा सिर पर धरे, मलिन वस्त्र पहिने, वस्त्र ओर घन का संग्रह चाहती । गुरु की सेवा करती या गुरु कुछ की ओर गमन करती स्त्री द्रेष्काण, मिश्र पक्षी द्रेष्काण ।
दूसरा द्रेष्काण-श्याम रंग, हाथ में कमल की लेखनी लिये । सिर में पगड़ी बांधे आमदनी खर्च की गिन्ती करने वाला बहुत धन मिले खर्च भी करे । सर्वाङ्ग में रोम व्याप्त, बड़ा धनुष धारण किये । पुरुष द्रेष्काण, मिश्र, पक्षी द्रेष्काण । तीसरा द्रेष्काण-गोरे रंग की स्त्री, सुन्दर स्वच्छ दुपट्टा ओढे लम्बा शरीर, घड़ा और करछुली हाथ में लिये । सावधानी से मन्दिर जाने को तैयार हो रही। स्त्री द्वेष्काण, पक्षी द्रेष्काण ।
(७) तुला का
पहिला द्रेष्काण-रास्ता बाजार में दुकान खोलकर तराजू हाथ में लिए पुरुष बैठा है चाप तौल में दक्ष सुवर्ण आदि द्रव्य के पात्रादिकों को तोल कर मोल बताता नर ड्रेष्काण, जल और पक्षी द्रेष्काण भी है । रज दूसरा द्रेष्काण-गीध पक्षी जैसा मुख, घडा लेकर गिरने को तैयार हो रहा, भूख ओर प्यास से व्याकुल पुरुष शरीर मन में भी स्त्री पुरुषों को याद कर रहा अन्य मत ` से घोड़े सरीखा मुख । नर द्रेष्काण, मिश्र, पक्षी द्रेष्काण । तीसरा द्रेष्काण-पुरुष मणियो के अलंकार से भूषित । जंगल में मृगों को भय दिखाता, सोने का आभूषण धनुष, तरकस कवच लिये । फल ओर मांस धारण करता या भक्षण करता वानर सरीखा दिखने वाछा पुरुष, चतुष्पद द्रेष्काण । ५८) वृश्चिक का
पहिला द्रेष्काण-स्त्री, वस्त्र पुष्पों से रहित, बड़े समुद्र के तीर और अपने स्थान से अष्ट, पैरों में सपं लपटा, मनोहर सुरत, स्त्री व अग्नि और सर्प द्रेष्काण । दूसरा द्रेष्काण-कछुआ या घड़े के समान शरीर स्त्री अपने पति के लिए स्थान 'सुख चाहती, शरीर में सर्पाकार चिह्न या पति के लिए शरीर पर सपं धारण करे, मिश्र, स्त्री और सपं द्रेष्काण । तीसरा द्रेष्काण-बड़ा और चिपटा सा मुख कछवे के मुख के समान, कुत्ता, हरिण स्यार, सुकर इनको डरवाने वाला हाथ में चन्दन लगाया या चन्दन के उत्पत्ति स्थान का रक्षक मित्र द्रेष्काण, पुरुष चतुष्पद । (९) घत् का
पहिला द्रेष्काण-मनुष्य जैसा मुंह, घोए जैसा शरीर, अडा धनुष धारण किये, आश्रम में बैठा, यज्ञ के उपयोगी धुव आदि पात्र और यज्ञ करने वाले तपस्वियो की रक्षा करना पुरुष, मिश्र, उदित ( पक्षी ) द्रेष्काण। ` दुसरा द्रेष्काण-मन को रमण करने वाळी कांति, चम्पा के पुष्प या सुवणं सरीखी
षड्वग विचार : ७९
भद्रासन पर बैठी । अति सुन्दर भी नहीं मध्यम रूप, समुद्र के रत्न घारण करने वाली ` स्त्री । मिश्र द्रेष्काण, स्त्री व धनुष द्रेष्काण ।
तीसरा द्रेष्काण-दाढीवाला पुरुष मुछें बड़ी, सोना या चम्पा पुष्प के समान कांति, श्रेष्ठ आसन सिंहासन कुरसी आदि में बैठा हुआ । लाठी हाथ में लिये, कुसुम्बी वस्त्र पहिने मृग चर्म धारण किये । मिश्र, पुरुष व आयुध द्रेष्काण । (१०) मकर का-पहिला द्रेष्काण-सर्वांग में दोष व्याप्त, मगर सरीखे दाँत, सुअर सरीखी देह, खेती करे वल जोते, जाळ, फाँसी, वेडी आदि लिये, भयानक मुख, मिश्च, पुरुष व चतुष्पद द्रेष्काण ।
दूसरा द्रेष्काण-सम्पूणं कला जानने वाली चतुर, कमल सदृश नेत्र । श्याम रंग की अनेक वस्तु को ढूंढ़ती, भूषणों से सजी कान में लोहा का भूषण पहिनी। जल द्रेष्काण, स्त्री व चतुष्पद द्रेष्काण ।
तीसरा द्रेष्काण-किन्नर सरीखी योनि, घोड़े जैसा मुख, उनके सरीख शरीर, कम्बल धारी, कवच धनुष भाला लिये। रत्न सहित घडा कन्धे पर रखा, सायुध पुरुष द्रेष्काण, मिश्च व चतुष्पद द्रेष्काण ।
(११) कुम्भ का-पहिला द्रेष्काण-तेल व शराव पिये, जल-भोजन मिलने के लिए अन्तः करण दुःखी । कम्बल ओढे, रेशमी वस्त्र व मृग चर्म धारण करना, गीध सरीखा मुख, अग्नि द्रेऽक्ञाण, पुरुष व आयुध द्रेष्काण ।
दूसरा द्रेष्काण-स्त्री जळती गाड़ी पर गोठी, सेमर के वृक्ष के पास, लोहा लिए, वन में मैले वस्त्र पहिने, बर्तन सिरथें धरे, मिश्र, सारिनक स्त्री द्रेष्काण, आयुध द्रेष्काण । तीसरा द्रेष्काण-स्याम वणं, कानों में बाल जमे हुए, सिर में किरीट ( मुकुट ) 'घारण किए । लोहे के पात्र में वृक्ष की छाल, पत्ते गोंद तेल और फल को रखे, एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाना, पुरु ष, आयुध द्रेष्काण ।
(१२) मीन का-पहिला द्रेष्काण-त्न् वादि यज्ञ पात्र सामान मोती मणि शंख सब हाथ में लिए, भूषण पहिने स्त्री के भूषणों के निमित्त, समुद्र में नाव आदि में बैठा जा रहा । पुरुष द्रेष्काण, आयुध द्रेष्काण ।
दूसरा द्रेष्काण-अँची ध्वजा वाले जहाज में नैठकर कुटुम्ब सखी जनों को लेकर समुद्र के तीर चछ रही। चम्पा पुष्प के समान मुख की पांति, जल स्त्री व आयुध द्रेष्काण ।
तीसरा द्रेष्काण-खाई के समीप रहे, सपं देह में घरे, बिना वस्त्र के अर्थात् नंगा पुरुष वन में चोर और अग्नि के भय से मन में व्याकुल हो रहा । अग्नि द्रेष्काण, पुरुष, सपं द्रेष्काण ।
द्रेष्काण में चन्द्र का फल
जन्म में चन्द्र का फल द्रेष्काण अनुसार विचारना
(१ ) चन्द्र अपने या तात्कालिक मित्र के ३ष्काण में हो तो-रूप गुण अच्छे हों ।
चन्द्र सम द्रेष्काण में हो-गुण मध्यम ।
२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
चन्द्र शत्रु द्रेष्काण में हो-गुण रूप से हीन ।
चन्द्र सपं द्रेष्काण में हो-उग्न स्वभाव ।
चन्द्र उद्दत आयुध द्रे में हो-प्राण घात के लिए हथियार उठाये रहे ।
चन्द्र चौपाया द्रेष्काण में-गुरुजन की स्त्री गमन करना ।
चन्द्र अंडज ( पक्षी ) द्वे० में हो-फिरने वाला ।
जहाँ जहाँ अपने द्रेष्काण और सपं द्रेष्काण में भी हो तो दोनों फल हों ।
द्रेष्काण के अनुसार चन्द्र का फल
(१) मेष के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-छोगों का घातक हो । यदि मित्र द्रेष्काण
हो तो सुन्दर तेजस्वी ।
दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर, तेजस्वी, गुरुजन की पत्नी से रमण करने
वाला ।
तीसरे ब्रे० में चन्द्र हो-पहिले द्रेष्काण के अनुसार फल ।
(२) वृष के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-गुरु स्त्रियों से गमन करता, शुक्र दृष्टि हो:
तो शुभ फल।
दुसरे द्वे० में चन्द्र हो-गुरु स्त्रियों में पाप बुद्धि ।
तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-लोगों का घात करने वाला ।
(३) मिथुन के पहिले द्वे० में चन्द्र हो-पुरुष सुन्दर तेजस्वी ।
दुसरे द्रे० में चन्द्र हो-गुणहीन, परिभ्रमण करने वाला ।
तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-रूप व गुण कम हो ।
(४) ककं के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर व तेजस्वी । बूसरे ३० में चन्द्र हो-उग्न स्वभाव ।
तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर हो पर उग्र हो । (५) सिह के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-हिसा करने वाला, सुन्दर तेजस्वी । दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर हो, परस्त्री से गमन करे । तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-परस्त्रियों से गमन करे, उग्र हो । (६) कन्या के पहिले ३० में चन्द्र हो-परिभ्रमण करे । दुसरे द्रे में चन्द्र हो-परिभ्रमण करे । तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-भ्रमण करे. दुर्गति हो । (७) तुळा के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-कोमरू हो, भ्रमण करे । दुसरे ३० में चन्द्र हो-निस्तेज हो, भ्रमण करे । तीसर 8० में चन्द्र हो-सुन्दर हो, परस्त्री पर लक्ष करे । (८) वृश्चिक के पहिले ३० में चन्द्र हो-उग्र हो । दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर ग्रुणवान् हो, उम्र हो । तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर तेजस्वी हो, परस्त्री से गमन करे | (९) घन के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-तेजस्वी हो, हिसा, करने वाला हो ।
षड्वर्ग विचार : ८५५
दुसरे द्रे० में चन्द्र हो-उग्र हो ।
तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर हो हिसा करने वाला हो | '
(१०) मकर के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-गुरु पत्नी से गमन करे ।
दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-परस्त्री से समन करे ।
तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-आपस वाले को स्त्री से संग हो ।
(११) कुंभ के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-लोगों का घात करने वालो ।
दूसरे द्वे० में चन्द्र हो-छोगों का घात करने वाला 1
तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-छोगों का घात करने वाला ।
(१२) मीन के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-घात करने वाला 1
दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर हो, वात करने वाला $
तीसरे द्रे में चन्द्र हो-उग्र हो ।
द्रेष्काण का विशेष फल विचार
(१) द्रेष्काण में उच्च या स्ववर्ग के सौम्य ग्रह हों--वर देने वाली सत्य वादिनी
लक्ष्मी का भोग करवाते हैं ।
(२) स्व द्रेष्काण में सौम्य ग्रह त्रिकोण या केन्द्र में बली होकर पड़े--द्रव्य. का
संचय करने वाला, मान तथा गुण से युक्त विद्यावान्, कलाओं में चतुर ।
(३) द्रेष्काणेश शुभ ग्रह की राशि का बैठा हो या शुभ ग्रह या शुक्र से दुष्ट
हो-अनेक प्रकार का सौख्य, आरोग्य, मान, यश की वृद्धि, स्वदेश के हित के कायं
करने से संसार में विख्यात किन्तु दूसरी समस्याओं के विरुद्ध रहे ।
(४) द्रेष्काणेश चन्द्र से युत या दृष्ट या मंगल से दृष्ट या श् क्र युत या दृष्ट--
उसकी आयु के प्रमाणानुसार कर्म फलता है, धमं के निमित्त, अनेक प्रकार से धन
प्राप्त होता है ।
(५) द्रेष्काणेश उच्च में रहते केन्द्र में हो--राजा हो ।
द्वेष्काणेश स्वक्षेत्री हो पूर्ण धन युक्त ।
द्रेष्काण मित्र गृही हो--सम्मान युक्त ।
द्रेष्काणे शपणफर में मित्र क्षेत्री उच्च का-अच्छे मित्र सहित,राजा सदृश धनी।
्रेष्काणेश आपोक्लिम में मित्र गृही या स्वगृही-संतति सदाचार युक्त हो, सुबोध
हो, खेती से धन प्राप्त करे ।
(६) शत्रु या नीच धर में जितने ग्रह हों उसी तुल्य जन्म लग्न में भी हो-उसी के
अनुसार देह में प्रण या चोट छगने का योग हो ।
वह ग्रह जिस राशि में हो-उसी राशि तुल्य शरीर में चोट से व्रण होता है ।
(७) द्रेष्काणेश अपने वर्ग में हो या शुभ ग्रह युक्त हो या अपने उच्च या मित्र घर
में हो यदि उदित त्रिगांश, द्वादशांश यो होरा ( लग्न ) का स्वामी बली होकर उक्त
[] ६
'८२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
स्थान में हो तो अच्छे गुण प्राप्त हों सदा पबित्र रहे, प्रवीण, दयावान्, धनवान्, संतान
“युक्त, कीतिमान्, दीर्घायु और राजा सरीखा हो ।
(८) चन्द्र स्व या मित्र द्रेष्काण में हो-तो जातक, सतगुणी हो, देखने में सुन्दर
हो, चन्द्र उत्तम वर्ग में हो तो भाग्यवान् हो । 9
यदि कोई दूसरे स्थान में हो तो जातक को वह गुण देवे जो उस ग्रह के हों
जिसके साथ चन्द्र पैदा हो ।
(९) जो ग्रह स्व द्रेष्काण में हो तो उसका कारक ग्रह उसे सब फल देगा ।
(१०) ग्रह अपने स्व या उच्च के घर में हो उसी समय मित्र ग्रह से युक्त या दृष्ट
हो तो वह धन युक्त राजा हो ।
(११) द्विस्वभाव राशि में द्रेष्काण-क्रमानुसार अधमा, मध्यमा, उत्तमा ।
चर राशि में द्रेष्काण-उल्टा क्रम-उत्तमा, मध्यमा, अधमा ।
स्थिर राशि मैं द्रेष्काण-अच्छा बुरा मिश्रित फल होगा ।
सप्तमांश फल |
(१) सप्तमांशेश चन्द्र युक्त या दृष्ट हो या सौम्य ग्रह से दृष्ट हो-सहोदर
भाइयों से युक्त, श्रढ़ती कांति, यश, उत्तम मित्र, अति प्रगल्भ । र (२) सप्तमांशेश सूर्य रहित जितने ग्रह नीच में बैठे हो उनमें जो सवसे वली हो- उसी के अनुसार उसकी भाइयों के निमित्त से चिन्ता युक्त स्थिति होती है । (३) उप्तमांशेश उच्च में या शुभ वर्ग में हो-राजा सम पुज्य, सव कार्यों में सफ- लता पावे, धन से अति सम्पन्न हो ।
“ (४) सप्तमांश में सहज भाव में सूर्य, गुरु या मंगल हो-तो अधिक लक्ष्मी को प्राप्त, मित्र को मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र जन्मे हों । (५) युक्त स्थान में शुक्र, बुध या चन्द्र हों-कन्या का जन्म होता है । (६) स्व सप्तमांश में सभी ग्रह उच्च में हो-महा धनी हो । स्व सप्तमांश में सभी नीच क्षेत्र में हों-दरिद्री हो । (७) सप्तमांशेश-पाप ग्रह होकर पाप ग्रह के सप्तमांश में-वे क्रूर ( दुष्ट ) होते
हैं, बुरा फल देते हैं । शुभ ग्रह होकर शुभ ग्रद् के सप्तमांश में-उत्तम फल देते हैं । मित्र ग्रह हो तो -मिश्र फल देते हैं।
नवांश फल
राशियों के भिन्न भिन्त नवांश का फल झे
१-मेष लग्न में दृष्टि हो तो शुभ फल हो व परस्त्री पर (१) पहिला नवांश हो-चोरों का स्वामी, प्रेम करे ।
मुखिया अधिकारी हो । इस पर मंगळ की (२) नवांश हो-उपभोग करने वाळा
षड्वर्ग विचार : ८३
(३) नवांश हो-पंडित हो । - (७) नवांश-पापी हो । (४) नवांश हो-मुख्य मालिक हो। (५) नवांश-घातकी हिंसक (४) नवांश हो-राजा हो। (९) नवांश-ढीट धीर । (६) नवांश हो-नपुंसक हो । ४-सिंह लग्न का नवांश फल (७) नवांश हो-शूर हो । (१) नवांश-चोर । (८) नवांश हो-हम्माल आदि हो। (२) नवांश-भोक्ता । (९) नवांश हो-चाकर हो। (३) नवांश-पंडित ।
२-वृष लग्न में (४) नवाश-स्वामी । (१) नवांश-नाना प्रकार का पाप करे। (५) नवांश-राजा । (२) नवांश-हिसा करे । (६) नवांश-नपुंसक । (३) नवांश-ढीठ व निर्भय । (७) नवांश-शूर । (४)-नवांश-चोर हो । (८) नवांश-हम्माल । (५) नवांश-भाइयों में प्रसिद्ध । (९) नवांश-चाकर ।
(६) नवांश-पंडित हो । ६-कन्या लग्न के नवांश का फल (७) नवांश-घर में स्वामी हो । (१) नवांश-पापी । (८) नवांश-राजा प्रमाण हो । (२) नवांश-त्रातकी । (९) नवांश-नपुंसक हो । : (३) नवांश-ढीठ।
३-मिथुन में (४) नवांश-चोर । (१) नवांश मे-शरवीर हो । (५) नवांश--भोक्ता ।
(२) नवांश में-हेम्माल हो । (६) नवांश--पंडित ।
(३) नवांश में-चाकर हो'1 (७) नवांश-मारिक । (४) नवांश में-पाप करने वाळा । (=) नवांश--राजा । (५) नवांश में-घातकी । (९) नवांश--नपुंसक । (६) नवांश में-ढीट । ७--तुला लग्न के नवांश का फल '७) नवांश मॅ-चोर । (१) नवांश-शूर । ८) नवांश में-उपभोग कर्ता । (२) नवांश--मजदुर । ९) नवांश में-पंडित । ` (३) नवांश--चाकर । ४-ककं लग्न का नवांश फल (४) नवांश--पापी ।
॥) नवांश-मालिक हो. (५) नवांश--घातकी । () नवांश-राजा हो 1 (६) नवांश--ढीठ । () नवांश-नपुंसक हो । - ` (७) नवांश--चोर | () नवांश-शूर हो । (८) नवांश--भोक्ता ।
($ नवांश-हस्माल हो । (९) नवांश--पंडित ।
,(६नवांश-चाकर हो ।
८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
८--वृश्चिक लग्न के नवांश का फक (५) नवांश--भोक्ता ।
(१) नवांश--मालिक ।
(२) नवांश---राजा ।
(३) नवांश--नपुंसक ।
(४) नवांश--शूर ।
(५) नवांश---मजदूर ।
(६) नवांश--चाकर ।
(७) नवांश--पापी ।
(८) नवांश--घातकी ।
(९) नवांश--धै्येवान् ।
९--धन लग्न के नवांश का फल
(१) नवांश--चोर ।
(२) नवांश--भोक्ता ।
(३) नवांश--पंडित ।
(४) नवांश--स्वामी ।
(५) नवांश--राजा ।
(६) नवांश- नपुँसक ।
(७) नवांश--शूर ।
(८) नवांश--हम्माल ।
(९) नवांश--चाकर ।
१०--मकर के नवांश का फल
(१) नवांश--पापी ।
(२) नवांश--घातकी ।
(३) नवांश--धर्यवान् ।
(४) नवांश--चोर ।
(६) नवांश--पंडित ।
(७) नवांश--मालिक ।
(८) नवांश--राजा ।
(९) नवांश--नपुंसक ।
११--क्रुभ के नवांश का फल
(१) नवांश--शूर ।
(२) नवांश--मजदूर ।
(३) नवांश--चाकर ।
(४) नवांश--पापी ।
(५) नवाश--घातकी ।
(६) नवांश--धैयंवान् ।
(७) नवांश--चोर ।
(८) नवांश--भोक्ता ।
(९) नवांश--पंडित ।
१२--मीन लग्न के नवांश का फल
(१) नवांश--स्वामी ।
(२) नवांश--राजा । .
(३) नवांश--नपुंसक ।
(४) नवांश--शूर ।
(५) नवांश--मजदूर ।
(६) नवांश--चाकर ।
(७) नवांश--पापी ।
(८) नवांश--घातकी ।
(९) नवांश--धैयंवान् ।
टिप्पणी--कुम्भ लग्न का कुम्भ नवांश या द्वादशांश हो तो-विशेष बुरा फल
होता है ।
चंद्र का नवाश फल
(१) मेष लग्न-में चन्द्र यहाँ बताये (४) गुरु की दृष्टि हो-राज्य का कार्य कारी ।
नवांश में किसी नवांश में हो परन्तु निम्न (५) शुक्र की दृष्टि हो-जिमीदार ।
ग्रहों की दृष्टि हो तो उसका फल-
(१) सूर्य की दृष्टि हो-नगर का रक्षक ।
(२) मंगल की दृष्टि हो-घातक ।
(३) बुध को दृष्टि हो-कलहकारी ।
(६) शनि की दृष्टि हो-कलहकारी 1
(२) वृष लग्त-क्ते किसी नवांश प
चंद्र हो तो ग्रहों की दृष्टि का फल- , ` (१) सूर्य को दृष्टि हो-मुर्ख ।
२ बुध को दृष्टि हो-काव्य करे । ३ शुक्र की दृष्टि हो-सुखी । ४ गुरु की दृष्टि हो-शास्त्र पढ़े । ५ मंगळ की दृष्टि हो-पर स्त्री रत । ६ शनि-पर स्त्री रत ।
(२) मिथुन लग्न-के किसी नवांश में चंद्र हो उस पर ग्रह दृष्टि का फल- १ सूर्य को दृष्टि हो-कुश्ती खेले। २ मंगल की दृष्टि हो-चोरी करे । ३ बुध की दृष्टि हो-कविता करे । ४ गुरु की दृष्टि हो-कार्य भारी हो । ५ शुक्र की दष्टि हो-गायन करे । ६ शनि की दृष्टि हो-वढई हो शिल्पी ।
(४) ककं लग्न-में किसी नवांश पर चंद्र हो तो उस पर ग्रह दृष्टि फल-- १ सूर्यं की दृष्टि हो-दुवला । २ बुध की दृष्टि हो-तपस्वी । ३ मंगल की दृष्टि हो-कृपण । ४ गुरु की दृष्टि हो-मंती । ५ शुक्र की दृष्टि हो-स्त्री पालन करे। (६) शनि की दृष्टि हो-कार्य साधे । (५) सिंह लग्न-के किसी नवांश पर चंद्र हो उस पर ग्रह दृष्टि का फल । १ सूर्यं से दृष्ट-क्रोधी । २ मंगल से दृष्टि-राजा को प्रिय । हे बुध से दृष्ट-गड़ा द्रव्य लाभ । ४ गुरु से दृष्ट-सव पर हुकूमत करे । ५ शुक्र से दृष्ट-पुत्र न हो । ६ शनि से दृष्ट-घातकी । (६) कन्या लग्न-में किसी नवांश में चंद्र हो उस पर ग्रह दृष्टि फल--
१ सूर्य से दृष्ट-कुश्ती खेले । २ मंगळ से दुष्ट-चोरी करे। ३ बुध से दृप्ट-कविता करे।
षड्वर्ग तिचार : ८५
४ गुरु से दृष्ट-प्रधान हो । ५ शुक्र से दुष्ट-गायन करे । ६ शनि से दुष्ट-बढ़ई का काम करे। (७) तुला लग्न-के किसी नवांश में चन्द्र हो उस पर ग्रह दृष्टि का फल--
१ सूर्यं से दृष्ट-मूखं । २ मंगल से दुष्ट-पर स्त्री प्रेम । ३ बुध से दृष्ट-काव्य करे । ४ गुरु से दुष्ट-शास्त्र पढे । ५ शुक्र से दुष्ट-सुखी । ६ शनि से दृष्ट-दूसरी स्त्री तक जावे (८) वृश्चिक लग्न-के किसी नवांश में चंद्र हो उस पर ग्रह दृष्टि का फल१ सूर्य से दृष्ट-नगर रक्षक। २ मंगल से दृष्ट-घातकी । ३ बुध से दृष्ट-कलह करे। ` ४ गुरु से दृष्ट-राजा हो । ५ शुक्र से दृष्ट-जिमीदार हो। ६ शनि से दुष्ट-क्रलहकारी । (९) घन लग्न-के किसी नवाँश में
चन्द्र हो उस पर इन ग्रहों को दृष्टि का
फल
१ सूर्य से दृष्ट-वरूबान् । २ मंगल से दृष्ट-युद्ध सिखावे । ३ बुध से दृष्ट-ठट्ठा करे । ४ गुरु से दृष्ट-मंत्री
५ शुक्र से दृष्ट-नपुंसक । ६ शनि से दृष्ट-धम बुद्धि हो । (१०) मकर लग्न-के किसी नवांश में चन्द्र हो उस पर ग्रह दृष्टि का फल-- १ सूये से दृष्ट-थोडी संतति । २ मंगल से दुष्ट-दुःखित । ३ बुध से दृष्ट-गविष्ठ।
४ गुरु से दृष्ट-स्वकुल प्रमाण ।
८६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
५ शुक्र से दृष्ट-बुरी स्त्री का संगं । ६ शनि से दृष्ट-कूपण हां 24
७ शनि से दृष्ट-कृपण हो । (१२)मीन लग्न-के किसी नवांश में
(११) कुम्म लग्न-के किसी नवांश चन्द्र हो उस पर ग्रह दृष्टि का फल
में चन्द्र हो उस पर ग्रह दृष्टि काफल- १ सूर्य से दृष्ट-वलवान् ।
१ सूर्य से दृष्ट-संतति थोड़ी । २ मंगल से दृष्ट-युद्ध सिखावे ।
२ मंगल'से दृष्ट-दुखित । ३ वुध से दृष्ट-ठट्ठा करे ।
३ बुध से दृष्ट-गविष्ठ । ४ गुरु से दृष्ट-मंत्री हो ।
गुरु से दृष्ट-स्वकुल प्रमाण , १ शुक्र से दुष्ट-नपुंसक द्दो ।
५ शुक्र से दृष्ट-बुरी स्त्री का संग । ६ शनि से दृष्ट-धामिक हो ।
लग्न के किसी भी नवांश में चन्द्र हो उस चन्द्र पर सूर्य आदि ग्रहों की दृष्टि का
फल दे चुके हैं उसी के अनुसार यदि चन्द्र किसी भी ग्रह को देखता हो तो वह ग्रह
उस लग्न के नवांश में जो हो उसका फल वही होगा जो उस नवांश में चन्द्र होने
पर चन्द्र की दृष्टि का फल बताया है ।
नवांश की राशि अनुसार फल
१ जन्म मेष नवांश में हो-चोर हो । ७ तुला नवांश में जन्म-शूरमा।
२ जन्म वृष नवांश में हो-भोगवान् । ८ वृश्चिक नवांश में जन्म-विना पैर
भार ढोवे ३
३ जन्म मिथुन नवांश में हो-पंडित । ९ धन नवांश में जन्म-दास ।
४ जन्म ककं नवांश में हो-धनवान् । १० मकर नवांश में हो-पापी ।
५ जन्म सिंह नवांश में हो-राजा । ११ कुंभ नवांश में जन्म-क्रूर स्वभाव ।
६ जन्म कन्या नवांश में हो-नपुंसक । १२ मीन नवांश में जन्म-निर्भय ।
उपरोक्त फल केवल नवांश का है ।
इन योगों में वर्गोत्तम हो तो उपरोक्त का राजा होता है ।
जैसे मेष लग्न में मेष नवांश हो तो वर्गोत्तम होने से-चोरों कां राजा होगा ।
जैसे वृष लग्न में वृष नवांश हो तो वर्गोत्तम होने से-योगियों का राजा इत्यादि ।
ग्रह के नवांश में जन्म का फल
५--सूर्य के नवांश में-दुष्टात्मा, बलवान्, पुत्रवान्, धनवान्, कामी, पीतनेत्र ।
२--चन्द्र के नथांश में-भोग करने में दक्ष, परस्त्री विलास, गो त्रंश और धन
से पूर्ण, पंडित ।
` ३--मंगल के नवांश में-क्र्रकर्मी, चञ्चलबृद्धि, घूमनेवाला, पित्तरोगी, लोभी ।
४--बुध के नवांश में-त्यागी, रोगी, ललित शरीर, नामी विद्वान्, यशस्वी ।
५--गुरु के नवांश में-सुवर्ण के सदृश बाल, शरीर श्रेष्ठ, रूपवान्, मंत्री ।
६८ शुक्र के नवांश में-परस्त्री गामी, त्यागी, सुखी, पंडित ।
७--शनि के नवांश में-पाप बुद्धि, दरिद्र, स्थूल दाँत, रोगवान् ।
षड्वर्ग विचार : ८७
गुरु स्वनवांश में हो-उत्तम मित्रस्थरीघन से सुखी, श्रेष्ठ प्रतिष्ठ,सुख सम्पत्ति पूर्ण । गुरु नवांश में चन्द्र-अनेक धन सम्पन्न, पुत्रों से युक्त, पुण्य धन से युक्त, अतिथि प्रिय, सवको आनन्द देने वाला । "गुरु नीच नवांश में हो सेवा वृत्ति से अपनी आजीविका चलाने वाला । नवांश का और भी फल विचार १ लग्न और नवांश आरम्भ में पूर्ण फल देते हैं।
मध्य में मध्यम ,, ४)
अन्त में अशुभ, ,, २ सौम्य ग्रह या मित्र ग्रह के अंश--शुभ होते हैं ।
पाव गा गा शत्रु [1 | 31 "अशुभ गा ३ सूर्य शनि मंगल के नवांश सब शुभ कर्मो में वजित है । शुभ ग्रहों के रवांश शुभ हैं शेष कु नवांश हैं ।
४ भावेश ग्रह नीच नवांश में-मीच स्त्री वाला ।
is उच्च , --राजा
» स्वनवांश में--कुल समूह का स्वामी हो ।
„ मित्र नवांश में-सेनापति तथा भोग और गुणों से सम्पन्न ।
» शत्रू, ,, दुःखित और अति मलिन ।
५ अपने उच्च या स्वार्थ में होकर उच्च आदि वाहनों में कुशल ।
ग्रह अन्त नवांश में हो-शूरवीर, बन्धु रहित ।
६ पंचम में मंगल और चतुर्थ में गुरुतो १, ३ या ५ पुत्र हों । नवांश कुण्डली में पंचम भाव में बुध शुक्र शनि हों-२, ४, ६ या ७ पुत्र हों ॥ ७ लग्न से तीसरे घर में सिंह राशि हो पंचम में गुरु केतु हो ] इन योगों में लग्न से छठे घर में शनि, सप्तम में सूयं, केन्द्र मे राहु और ? संतानहीन हा । दशम में मंगल हो । है। (=) व्ययेश ग्रह कूर हो वह ९, ६, ३ या १२ घर में हो या ५ घर में केतु
हो=पुत्र हो होकर मरे ।
(९) जितने पुरुष ग्रह बली होकर लग्न से पंचम में हों या पंचम को देखें-उतने पुत्र हों ।
(१०) चन्द्र, शुक्र और बुध से युक्त या दृष्ट पंचम घर में हो=कन्या होती है ।
(११) पंचम ग्रह पूर्ण वली शनि से युक्त या दृष्ट हो-गर्भपात हो ।
ये सब नवांश कुण्डली से विचारना ।
मतांतर--उक्त बातें चन्द्र के नवांश से विचारना ।
नवांश के अनुसार धातु मूल जीव संज्ञा
विषम राशि में प्रथम नवांश से आरम्भ होकर धातु मूळ जीव से ३ आवृत्ति होती है।
सम ग २ 11 शा जीव मूल घातु से | 22
८८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
परमोच्च तवांश--उच्च नवांश को ही परमोच्च नवांश समझो । क्योंकि कोई ग्रह
उच्च में हो उसे परमोच्च नवांश में लाने को उसका उच्च स्थान ही बदल जाता है।
दोदशांश का फल दया
किसी राशि के द्वादशांश का कोई क्रम हो उससे द्वादशांश में जो राशि आवे उस
राशि के फल के समान सभी राशियों के द्वादशांश के फल होंगे जसे यहाँ बताया गया है ।
मेष लग्न में प्रत्येक द्वादशांश का फल
(१) पहिला द्वादशांश ( मेष )--नेत्र लाळ, गोल, भोजन में उष्ण पदार्थ प्रिय,
अल्प भोजन जल्दी खाये, प्रसन्न कीति, अल्प यथुन, बहुत धन न हो, शूरवीर, स्त्रियों
का प्रिय, नौकरी करे, खुशामदी, मस्तक में फोड़ा, गविष्ठ, सबसे श्रेष्ठ, अति चपल, जल से भय करे, हाथ में चिह्न ।
(२) .दूसरा द्वादशांश ( वृष )--सुन्दर, विलास कर गमन करे, जांघ के ऊपरी
भाग, मुँह, पीठ का भाग व छाती के दोनों वाजू मोटे हों, दयालु, क्लेश सहन करने
वाला, मुख्य अधिकारी, अधिक #न्या हों, कफ प्रकृति, लोकप्रिय, क्षमाशील, बहुत खाने
वाला, स्त्री प्रिय, बहुत मित्र हों, वालपन में दु:खी, तरुणपन और वृद्धावस्था में सुखी, बंधु, धन, कुटुम्ब नहीं रहे ।
(३) तीसरा द्वा० ( मियन )--स्त्रियों का अभिलाष करे, कोक शास्त्र में
प्रवीण, लाळ नेत्र, कुञ्चित केश, चतुर, शास्त्र जानने वाला, नौकरी करे, बुद्धिमान्,
लोगों का इशारा जाने, जुआडी, सुन्दर शरीर मधुर भाषण, अधिक भोजन करे, गीत नृत्य प्रिय, नपुंसक की संगति, नाक ऊँची और लम्बी ।
(४) चौथा द्वा० ( कर्क ) - कुटिल, जल्दी चलने वाला, स्त्रियों के कहुने में रहे,
उत्तम, सित्र, ज्योतिष का ज्ञान हो, बहुत घर फिरने वाला, भ्रमण, द्रव्य नाश, ठिगना,
गला बड़ा, मीठी वोली से वश में करने वाला, मित्रों का प्रिय, जलाशय या बगीचे में फिरे । कूल्हा बड़ा ।
(५) पञ्च हा० (सिंह) --अधाभि 5, क्रोधी, ठुड्डी गाल व मुँह बडा, पिग नेत्र,
अल्प संतति, स्त्री का द्वेषी, मांस, वन और पर्वत का प्रेमी, नौकरों की वात पर
क्रोध करे, असामयिक भूख व तृष्णा के कारण पेट दाँत को पीड़ा होवे, दाता व परा- क्रभी, स्थिर बुद्ध, यविष्ठ, मातृभक्त माता के कहने में रहे ।
(६) षष्ट द्वा० ( कन्या )--उत्तम शरीर, गम्भीर, लज्जालु, शीतल दृष्टि, सुखी,
प्रिय बोलने वाला, सत्य वक्ता, धार्मिक, परमार्थ सम्बन्धी वात करे, सूक्ष्म देह, नृत्य,
गीत, वाद्य व चित्रकारी में कुशल, पंडित, वुद्धिमान्, काम साधने में तत्पर, परदेश भ्रमण, दूसरों से द्रव्य मिले, बहुत कन्या, पुत्र अल्प ।
(७) सप्तम द्वा० ( तुला )--देव ब्राह्मण साधु सन्त को मान देवे, गई बात
स्मरण करे, बुद्धिमान्, विचारशील, लोगों के धन की इच्छा करे, शुद्ध, अग्निहोत्र करे,
स्त्री वश, अधिक ऊँचा, नाक ऊँची, दुबला, चञ्चल स्वभाव, अति भ्रमण, धन युक्त,
अङ्गहीन हो, क्रय-विक्रय करने में कुशल, बड़ी पदवी पावे, सभ्य, रोगी, कुटुम्ब पर उपकार करे, बांधवों से निद्य, बन्धुजनों को त्याग दे ।
षड्वगे वित्रार : ८९
(ऽ) अष्टम द्वा० (वृश्चिक) नेत्र व छाती बड़ी, गोल जाँघ, माँ बाप गुरु इनकी शिक्षा में रहे, संतान से दुःखी, राज दरबार में मान व महत्त्व, पिंगट वर्ग, बुरा स्वभाव, गुप्त पापी, मछली या पक्षी द्वारा कहीं भी चिह्न हो । (९) नवम ढ्वादशांश (धन)--मुँह व गर्दैन लम्बी, बाप का बहुत धन हो, दयालु, कवि, अच्छा बोलने वाळा, दाँत, कान व नाक बड़े, कार्य साधन में उद्योगी, कुबड़ा, लम्बे नख, लिखने पड़ने का ज्ञान हो, पुस्तक बाँधने व चित्रकारी का ज्ञान हो, प्रौढ़, धार्मिक प्रिय वोली बोले, वन्धुओं का दष करे । (१०) दशम द्वा० (मकर)--स्त्री पुत्र पर बहुत प्रेम, दांभिक, अन्ध, कृश, कमर के पास दुबल, छोटी कमर नेत्र उत्तम, सबकी सुनने वाला, सबका प्रिय, आळसी, शीत सहन करे, परिभ्रमण करे, बलिष्ठ, काव्य का करने वाला, विद्वान्, लोभी, जहाँ न जाना हो वहाँ जावे, निळंज्ज, निर्दय । (११) एकादश द्वा० (कुम्भ)--चूहे सरीखी गर्दन, अङ्गो पर बहुत नसे, कड़े केश, ऊँचा शरीर, पैर, जाँघ, जाँघ के ऊपर का भाग और पीठ का भाग लम्बा हो, मुँह, कमर व बस्ती मोटी, पर स्त्री में आसक्त, परद्रव्य लेने की वुद्धि, पापी, नाशक, मिलनसार, पुष्प चन्दन प्रिय, चलने वाला मित्रों को प्रिय । (१२) द्वादश ह्वा० (मीन)--जल में होते वाले पदार्थों का भोक्ता, मोती व शाक-भाजी वेचने वाळा, स्त्री में आसक्त, शरीर उत्तम, नाक ऊँची, बड़ा मस्तक, शत्रु का पराभव करने वाला, स्त्री के वश, नेत्र कांति उत्तम, धनवान्, गड़ाधन प्राप्त हो। मेष लग्न में पहिला द्वा० मेष राशि से आरम्भ होकर क्रमानुसार बारहवाँ मीन का होता है
(२) वृष के द्वादशांश का फल
६--पहिला द्वा० वृष का है--मेष में दुसरा द्वादर्शांश जो वृष राशि का है उसी अनुसार फल होगा अर्थात् सुन्दर विकास कर गमन करे आदि जो फल कहा हैः क्यों कि जो राशि होती है द्वादशांश में पहिले उसी राशि का द्वादशांश होता है । इससे जिस राशि का द्वादशांश हो उसी के अनुसार फल विचारना । २--वृष में दूसरा द्वा० मिथुन का है इससे मेष छूग्न के तीसरे द्वा० में मिथुन है उसके समान फल होगा ।
३--तीसरा द्वा० ककं का है-मेष के चौथे द्वा० में ककं है उस समान फल होगा । ४ चौथा द्वा० सिंह का है-मेष के पांचवे द्वा० में सिंह है उस समान फल होगा । ५--'पांचवा द्वा० कन्या का है-मेष के छठे द्वा० में कन्या है उस समान फल होगा ।
६--छठा द्वा० तुळा का है-मेष के सातवें द्वा० में तुला है उस समान फल होगा। ७--सातवां द्वा० चुश्चिक को है-मेष के आठवें द्वा० में वृश्चिक है उस समान फल होगा ।
८--आठवां द्वा० घन का है-मेष के नवमें द्वा० में धन है उस समान फल होगा । ९--नवां द्वा० मकर का है-मेष के दशम द्वा० में मकर है उस समान फ्रल होगा !
९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
१०--दशवां द्वा० कुंभ का है-मेष के ग्यारहवें द्वो० में कुम्भ है उस समान
फल होगा ।
११--यारहवां द्वा० मीन काँ है- भेष के बारहवें द्वा० में मीन है उस समान
फल होगा ।
१२-बारहवां द्वा० मेष का है-मेष के पहिले द्वा० में मेष है उस समान फळ होगा ।
इस प्रकार किसी भी राशि के द्वादशांश का फल जान सकते हैं उस द्वाशांश में जो
राशि है उस राशि का फल मेष के द्वादशांश में जहाँ मिले उसके अनुसार फल जानना।
जैसे कुम्भ लग्न के दूसरे द्वादशांश का फल जानना है । कुम्भ में पहिला द्वादशांश
कुम्भ का होता है । दूसरा मीन का हुआ । मेष लग्न के द्वादशांश के फल वर्णन में
मीन राशि का फल मेष लग्न के अंतिम द्वादशांश में दिया है वही लेना अर्थात् जल में
होने वाले पदार्थों का भोक्ता मोती व शाक भाजी बेचने वाला स्त्री में आसक्त आदि ।
द्वादशांश का संक्षिप्त जन्म फल
मेष द्वा७ में जन्म--खलात्मा, चोर, पाप आचरण ।
वृष द्वा० में जन्म--स्त्री के धन से धनी, रोगवान् ।
मिथुन द्वा० में जन्म--जुआड़ी, सुशील ।
ककं द्वा० में जन्म--दुष्ट आचरण और तपस्वी ।
सिंह द्वा० में जन्म-सुशीळ, रःजकार्यं परायण ।
कन्या द्वा० में जन्म--जुआड़ी, स्त्री में लीन !
तुला द्वा० में जन्म-व्यापारी या धनी ।
वृश्चिक द्वा० में जन्म--धूते, चोरों का स्वामी, मारने की इच्छा वाला ।
घन द्वा० में जन्म--पिता तथा देव ब्राह्मण भक्त ।
मकर द्वा० में जन्म -शस्यादि युक्त और दूत वाळा ।
कुम्भ द्वा० में जन्म--खल ।
मीन द्वा० में जन्म--धनी और पंडित । र
ग्रह मित्र के या उच्च द्वा० में हो--अनेक स्त्रियों का अधिकारी और अनेक ऋद्धि
सिद्धि युक्त । द्वादशांश से आयु और मृत्यु विचार मेष आदि १२ राशियों के द्वादशांश के अनुसार आयु इस प्रकार है ।
राशि १ र ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ पश्चात्
आयु ८० ८४ ८५६ ८७ ८५ ६० ५६ ७० ९० ६६ ५६ १०० मृत्यु ।
पूर्वोक्त आयु के बीच में भी मृत्यु का भय होता है ।
१--प्रथम द्वा० वाला-१८ वर्ष में जल से भय ।
२--ढितीय द्वा० वाला-९ वर्ष में सपं से भय ।
३--तृतीय द्वा० वाला-१० वषं में घोर ज्वर से भय ।
४--चतुर्थ द्वा० वाला-३२ वर्ष में राजयक्ष्मा से भय ।
षड्वर्गः गिचार : ९१
५-- पंचम द्वा० वाला-२० वर्ष में रक्त विकार से भय ।
६--षष्ठ द्वा० वाला-२२ वर्ष में अग्नि से भय ।
७--सप्तम द्वा० वाला-२८ वर्ष में जलोदर से भय ।
=--अष्टम द्वा० वाला-३० वर्ष में व्याघ्र से भय ।
९--नवम द्वा० वाला-३२ वर्ष में वाण के पारेका से भय ।
१०-दशम द्वा० वाला-३० वर्ष में जल में डूवने या वायु विकार का भय ।
११-एकादश द्वा० वाळा-३१ वर्ष में भार्या तथा कन्या की मृत्यु के कारण तथ
जल से भय ।
१९--दडादश द्वा० वाला-२९ वर्षे में गाड़ी के पहिये से दबने का भय ।
इन सब अल्प मृत्युयों से बचने पर पूर्ण आयु भोगे ।
त्रिशांश फल
१ मंगल स्व त्रिशांश मॅ-स्त्री सहित हो, तेजस्वी, बल, पराक्रम, आभूषण युक्त,
साहस का काम करनेवाला ।
२ शनि स्व त्रिशांश मे--उसकी स्त्री शीघ्र मरे या भाग जावे या विवाह ही न
हो, परस्त्री से आसक्त, दुःखो, घर वस्त्र और परिवार से युक्त हो, मलिन रहे, क्रूर या क्रोधी स्वभाव का हो, रोगी रहें । ३ गुरु स्व त्रि० में-धन, कीति, सौख्य बुद्धि इनसे युक्त, तेजस्वी सब लोगों में
मान्य उद्योगी, भाग्यवान् ।
४ वध स्व त्रिं० में-वृद्धिमान, गीत नाच, वाद्य पुस्तक चित्र इनका ज्ञाता, कपटी,
कविता करे, बोलने में चतुर, साहसी, शास्त्रार्थ को जानने वाला, उत्तम आचार, लोक
में मान्य, वढ़ई आदि कला का काम जानने वाला ।
५ शुक्र स्व त्रि० मे--बहुत संतति, निरोग बहुत सुख, ऐश्वयंवान, धनवान्,
रूपवान्, स्त्री सुख हो, क्र स्वभाव, कोमल अंग, बहुत स्त्री वादी ।
त्रिं० में सूर्ष और चन्द्र का त्रिं० नहीं होता इससे सूर्य चन्द्र जिसके त्रि० में हो
उनके फल का प्रथम विचार होता है।
१ मंगल के त्रि० में सूयं हो--शूरवीर हो
मंगर के त्रि० में चन्द्र हो--शिथिल हो ( देर से काम करे। )
२ शनि के त्रि० में सूयं हो--विषम या क्रूर स्वभाव ।
शनि के त्रि० में चन्द्र हो--हिंसक ( जीवघाती ) ।
३ गुर के त्रि० में सूय हो--उत्तम गुणवान् ।
गुरु के त्रि में चन्द्र हो--धनवान्, शान्त स्वभाव ।
४ बुध के त्रि० में सूर्य हो--सुखी ।
बुध के नि० में चन्द्र हो- पंडित हो ।
५ शुक्र के वि० में सूर्य हो--उत्तम शोभागुक्त शरीर ।
शुक्र के त्रि० सें चन्द्र हो-संवें लोक प्रिय ।
९२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
'साधारण त्रिशांश फल
१ मंगळ के त्रि० में जन्म--चपल, कठिन वचन बोलने वाला, क्रूर बुद्धि।
२ शनि के त्रि० में जन्म--घूमने वाला, मलिन बुद्धि ।
३ गुरु के त्रि० में जन्म--धनवान् ।
४ बुध के त्रि० में जन्ग--गुरु, देव, भक्ति में निरत, साधु प्रिय, बंधुमान् ।
५ शुक्र के त्रि० में जन्म--कामी सुंदंर शरीर सुखी । त्रिशांश विशेष फल ।
१ त्रि० कुंडली में भिन्नगही या उच्च के ग्रह हों--तो सब कायं करने में उत्साह रखने वाला, धर्मात्मा, सज्जनों से पूज्य । २ त्रि० कुण्डली में ग्रहों के सत रज तम गुण विचार कर इनमें जो अधिक बली
अकाशवान् हो--उसी ग्रह के अनुसार फल का विचार कर फल कहना ।
पे चन्द्र गुरु-सतगुणी । 3 बुध--रजोगुणी ।
शनि मंगल--तमोगुणी ।
सात्विक ग्रह बली हो दयालु स्थिरता युक्त, सत्यवक्ता, विनीत, देव ब्राह्मण का भक्त ।
रजोगुण ग्रह बली हो--काव्य करने वाला, शूरवीर, कुछ स्त्रियों में पूर्ण तन मन रखने वाला ।
तमोगुणी ग्रह बली हो तो दूसरों को ठगने वाला, मुखं, आलसी, क्रोधी, अति निद्रालु । इन के मेळ से फलों के भी कई भेद हो जाते हैं ।
अध्याय-५.
अष्टक वर्ग
फल कहने की विधि जन्म लग्न, चन्द्र लग्न, नवांश लग्न, द्वारा बताई ही जाती है परन्तु गोचर का अष्टक वर्ग द्वारा सूक्ष्म फळ भी निकाला जाता है । टर्न शरीर है जिससे शरीर का विचार होता है और चन्द्र मन है जिससे मान- सिक ऐहिक पारलौकिक आदि सभी कार्यों कां विचार होता है ये सब जन्म कुंडली से विचार होता है । जन्म चन्द्र की राशि को आदि लेकर गोचर के वर्तमान ग्र हों की स्थिति पर राशि अनुसार फल कुछ स्थूल हो जाता है जिससे उसमें सूक्ष्मता लाने को अष्टक द्वारा फल का विचार होता है जिसमें प्रत्येक ग्रह और लग्न को भी आदि मानकर उनके शुझ स्थानों की गणना कर अष्टक वर्ग चक्र बनाया जाता है जिससे सब द में इसके द्वारा फल का अच्छा या बुरा प्रभाव स्पष्ट रूप से प्राप्त हो जाता है ।
'अष्टक वर्ग से ४ प्रकार से फल का विचार होता है । (१) आयु साधन. करना, (२) भिन्न भिन्त वर्गों मे रेखाओं और बिन्दुओ के द्वारा अनेक प्रकार के शुभाशुभ फल बनाया जाता है । (३) ऊपर वर्ग के रेखा और