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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

वर्ष फल में भाव फल विचार : १७३

तृतीयेश--वर्ष का अधिकारी होकर यदि तृतीयेश तृतीय में हो या वर्ष लग्नेश से उससे इत्थशाल योग होता हो तो सहोदर से परस्पर सुख हो! तृतीयेश-सहजेश को पाप ग्रह से इशराफ योग होता हो और सहज भाव में हों तो कलह हो ।

तृतीयेश- सहज स्थानं यदि पाप ग्रह युक्त हो और सहजेश तथा प्रात सहमेदा'

की दृष्टि सहज पर नहीं पड़ती हो तो सहोदर को दुःख होता है ।

इसी प्रकार भ्रातु सहमेश में पाप ग्रह हो, उसपर सहजेश तथा भ्रातृ सहमेश की

दृष्टि नहीं पड़ती हो तो भी सहज को क्लेश होता है ।

तृतीयेश जिस स्थान में हो वहाँ से वर्षेश यदि सप्तम में हो, वर्ष रूग्नेश।, सहजेशः

से सप्तम में हो तो सहोदरों से विवाद हो । और जन्मकाल में सहजेश सहज भाव में: हो वर्ष में भी वेसे ही सहज में हो, शुभ दृष्टि हो तो सहोदरों से सुख हो ।

यदि वर्ष लग्न से सहजेश वर्षेश होकर अस्तंगत हो तो कलह हो ।

अथवा रवि शुक्र में से एक ग्रह सहजेश तथा वर्षश होकर अस्तंगत हो तो कलह।'

अथवा वर्षेश को सहजेश से इसराफ योग होता हो तो शारीरिक क्लेश, अपने.

परिजन और सहोदरों से झगड़ा हो ।

गुरु-हीन वल गुरु तीसरे हो तो भाइयों से विरोध हो ।

शनि-यदि १ या ८ राशि में होकर सहज में हो तो सहज को निश्‍चय रोग हो ।'

मंगरू-मंजल यदि ३ या ६ राशि में रहकर तीसरे भाव में हो तो सहज को

रोग हो ।

तृतीयेश-तृतीयेश तीसरे में वर्षश युक्त हो और लग्तेश भी हो तो भाइयों से

बहुत सुख हो ।

यदि तृतीयेश या वर्षेद की दृष्टि तृतीय पर न हो, और उसमें पाप ग्रह हो या

तृतीय पाप युक्त हो तो भाइयों से दुःख हो ।

वर्षेश मंगल केतु--वर्षश मंगल और केतु युक्त तीसरे हो तो बहुत कष्ट हो, शत्रु

का भय, वात रोग हो ।

तृतीयेश--तृतीयेश तीसरे घर में या केन्द्र त्रिकोण में हो, शुभ ग्रहों की दृष्टि

हो तो अग्नि भय हो ।

पाप ग्रह--तीसर छठ पाप ग्रह हो तो वन्धु वर्ग से सुख हो ।

तुतीयेश--तृतीयेश शत्रु गृही हो, शत्रु पति तृतीय में हो तो भ्राता से शस्त्र

द्वारा सिर मे आघात होगा ।

तृतीयेश तृतीय में हो और बुध गुरु यदि शुक्र के साथ हों तो सम्पूर्ण अरिष्ट दूर

हो, यद्यपि सप्तम भाव के हों तो भी जय करते हैं ।

शुक्र--तृतीय में शुक्र, नवम में गुरु, ल्ग्त में चन्द्र और शनि हो तो महान कीति

व धन लाभ हो, ऐश्वर्य बढ़े अरिष्ट नाश हो ।

“१७४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल' खण्ड

गुरु--गुरु तीरे घर या लग्न में हो लग्नेश व सौम्य ग्रह से युक्त हो तो धन 'संतान की वृद्धि शत्रु का नाश हो । न वर्षे लग्नेद--३-६-१० घर में बल युक्त हो तो शत्रु नाश सुख प्रसन्नता व 'धन की प्राप्ति हो अरिष्ट दूर हो ।

वर्षेश मंगल--वर्षेश्ष मंगल तीसरे स्थान में हो या उच्च का हो या केन्द्र त्रिकोण में हो तो धन लाभ हो राजा तुल्य हो । अरिष्ट नाश हो । पाप ग्रह--पापग्रह ३-६-११ घर में हो सौम्य ग्रह केन्द्र में पाप ग्रह रहित हो तो सुख, कीति, पुत्र, धन वस्त्र रत्न आदि प्राप्त हो । सृतीयेद्--तृतीयेश तृतीय में हो बुध गुरु शुक्र यदि एक स्थान में हों तो सम्पूर्ण अहों का अरिष्ट दूर होता है यदि सप्तम में हो तो विजय करते हुँ। शुभ ग्रह--तृतीय में वुध गुरु शुक्र युक्त हो तो सम्पूर्ण अरिष्ट दूर हो यदि ये सप्तम में हों तो भी जय करते हँ ।

चतुर्थ भाव फा फल

चतुर्थ में पाप ग्रह-सुख व धन का नाश हो, रोग हो, झंझट व अधिक भय हो। चतुर्थ में शुभ ग्रह--नाना प्रकार के सुख हों । चतुर्थ में पाप युक्त दृष्ट निर्वेल चन्द्र--क्लेश, रोग हो। चतुर्थ में णुभयुत दृष्ट बली चन्द्र--सुख प्रद हो । चतुर्थं में सुयं--पशुओं को पीड़ा, खेती के काम में हानि, शरीर में पीड़ा, राजा से भय, माता को कष्ट, पेट तथा छाती में पीड़ा, मित्रों से बैर, वाहन से भय देह दुर्बल हो ।

चतुर्थ में चन्द्र--राजा से जय, कृषि से लाभ, शरीर में सुख, व्यापार से लाभ, वाहन का सुख, धन प्राप्ति, शत्रु नाश, पुत्र की वृद्धि, स्त्री सुख, पशु धन से लाभ, आनन्द ।

चतुर्थ में मंगल-अग्नि भय, मस्तक में पीडा, विफलता, क्लेश, खेती में हानि, व्यापार से हानि, परदेश भ्रमण, कुटुम्ब से दुःख, पशुओं का मरण, मित्रों से विवाद, *संकट ।

चतुर्थ में बुध--सुख, धन लाभ, मित्र मिलाप, चौपाये धन का आगम, सुवर्ण "भूमि वाहन लाभ, राजा से मान, स्त्री को सुख । चतुर्थ में गुरु--वाहून सुख, व्यापार में लाभ, राजा से जय, खेती से अधिक लाभ, स्त्री पुत्र भ्रातृ सुख, विद्या की प्राप्ति, धन लाभ । चतुर्थ शुक्र--कृषि और वाहुन सुख, राजा समान सुखी हो, आरोग्यता, भूमि, सुवर्ण लाभ, मान प्राप्ति, मित्र आदि से सुख । चतुर्थ में गनि--गुप्त चिता, रोग, पशुओं को पीड़ा, मातृ पक्ष में रोग, प्रवास, धन क्षय, खेती से हानि, स्त्री चिता से दुःखित, निंदा, लोह अग्नि से भय, परदेश जाने की चिता । १

वर्ष फल में भाव फल विचार : १७४

चतुर्थ राहु--वाहन नाश, राजा से भय, कफ पीड़ा, बात रोग, विदेश भ्रमण,

चौपायों का नाश, चिता, दुःख स्वजनों से विवाद, शरीर दुर्बल ।

चतुर्थ केतु--मन में दुःख, कफ एवं वादी की पीड़ा, शरीर दुर्वल, विदेश भ्रमण,

राजा पक्ष से भय, वाहन से भय ।

चतुर्थ सूर्य--पाप युक्‍त या दृष्ट-पिता को पीडा ।

चतुर्थ चन्द्र-पाप युक्‍त या दृष्ट-माता को पीड़ा ।

चतुर्थं शनि-शनि सूर्य युक्त हो-पिता से अपमान तथा शत्रुता कलह ।

'इसी प्रकार जन्म में चन्द्र जिस राशि पर हो उस राशिमें यदि वर्ष में शनि

हों तो माता के साथ विरोध कलह । प

जन्म में चतुर्थ में जो राशि है वह चतुर्थ भाव का पद कहलाता है । वहाँ वर्ष

में शनि और मंगल ये दोनों पद में हों शुभ दृष्टि न हो तो माता पिता को क्लेश हो ।

चतुर्थ में--चन्द्र युक्त रवि हो और पाप दृष्ट हो तो पिता को दुःख ।

यदि सूर्य या चन्द्र में से किसी' एक के घर में शनि हों तो माता पिता से विवाद

ही । सूर्य के गृह में पिता से चन्द्र के गृह में माता से विवाद ।

अतुर्थेश-यदि सुख भाव में हों तो माता पिता को सुख ।

था वली चतुर्थेश लग्नेश से इत्थशाल करता हो तो माता पिता को सुख होता है।

वर्ष और जन्म में चतुर्थेश यदि वलहीन हो तो माता पिता को अनिष्ट ।

या मातृ सहम पितृ सहम पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो मुंथा से चोथे स्थान में

हो तो माता पिता का नाश होता है ।

यदि मातृ सहमेश अस्तंगत हो पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो माता पिता का

नाश होता है ।

चतुर्थ मे-पहम-मातृ सहम व पितु सहम लग्नेश से इत्थशाल करता हो तो

माता पिता को सुख ।

सातु सहम या पितु सहम चौथे घर में हो तो भी माता पिता को सुख हो!

यदि मातु सहम या पितु सहम पाप ग्रह से इत्थशाल करता हो तो माता पिता

को विपत्ति, यदि शत्रु से इत्थशाल योग करता हो तो भय होता है ।

चतुर्थं सूर्य-बली वेश सुर्य चतुर्थ में हो तो पूर्वजों का उपाजित स्थान या कोई

अधिकार मिले ।

गुद-चतुथ में कक का गुरु वलवान्‌ हो शुभ ग्रहों से युक्‍त या दृष्ट हो और

लग्नेश हो तो शुभ फल हो सुख हों ।

शनि-चतुर्थ में शनि दशम में मंगल हो धनेश नीच का वक्री होकर अस्त हो

गया हो तो माता पिता का क्षय हो ।

पाप ग्रह- पाप ग्रह ४-८-१२ वें हों तो आम वात कफ स्त्रांस से शरीर में

अलेश हो ।

१७६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

चतुर्थश-चतुर्थेश शुभ ग्रह युक्त वी हो और लग्नेश लाभेश से युक्त हो तो

वाहन छाभ और शरीर सुख हो ।

पाप ग्रह-वर्ष या जन्म में चौथे में पाप ग्रह हो तो पुत्रों को अरि हो । इसी

प्रकार पंचम घर चतुर्थेश युक्त हो तो वर्ण मंद फल हो ।

चतुर्थेश--चतुर्थेश केन्द्र में हो जन्म लग्नेश चौथे हो तो राजा से धन और सुख

प्राप्त हो ।

उपरोक्त ग्रह चंद्र युक्त हो तो पुत्र का भी सुख हो ।

च॒तुर्थेश--चतुर्थेश वलवान होकर चतुर्थ में बुध गुरु युक्त या दुष्ट हो तौ सुख

हो धन प्राप्त हो सव अरिष्ट दूर हो ।

चतुर्थेश-चतुर्थेश जन्म में पूर्ण वली हों या केन्द्र त्रिकोण में शुभ ग्रह हो तो

माता को सुख हो धन यश मिले शत्रु नाश हो।

चतुर्थे -चतुर्थेश यदि ६-८-१२ भाव में पाप युक्त हो अथवा अस्त होकर पाप

अह से दृष्ट हो तो उस वर्ष में माता को अनेक रोग व माता का क्षय हो ।

चंद्र--लग्न से चतुर्थ स्वक्षेत्री चंद्रमा या शुक्र हो उस वर्ष में नवीन घर वनता है!

चतुर्थश--चतुर्थेश अस्त होकर शात्रु क्षेत्री हो तो उस वर्ष घर में आग लगे ।

पत्चम भाव में ग्रह फल

शुभ ग्रह-- पुत्र सुख, धन लाभ, आनन्द । ;

पाप ग्रह-- पुत्र नाश,धन धान्य नाश, बुद्धि नाश, चोर का उपद्रव, रोग, विरोध ।

पंचम सूर्य-पुत्रो के शरीर में पीड़ा, सुबुद्धि की हानि, शोक, मोह, शरीर में

रोग, धन हानि, राजा से भय, परिजनों से विवाद, स्त्री को कप्ट, सुख हीन ।

पंचम चंद्र--अपनी वुद्धि से जय की प्राप्ति, मित्र से लाभ, संतान सुख, गौरव

स्त्री सुख, विजय, मान, धन लाभ ।

पाप दृष्ट हो तो--पुत्रों के शरीर में रोग ।

शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो-पुत्रो को सुख हो ।

पंचम मंगल--पुत्रो को पीड़ा, शत्रु से विवाद, गुप्त चिता, उदर में पीड़ा, बुद्धि

नाश, अग्निभय और शोक, पुत्र उत्पत्ति, धन लाभ, नौकरों से सुख, सुवर्ण वस्त्र अन्न

का लाभ, रत्री पुत्र और भाइयों का सुख, राजा से मनोरथ की वृद्धि, भाग्योदय यश ।

पंचम गुरु-पुत्र की वृद्धि, बुद्धि वळ से जय, शत्रु नाश, शरीर सुख, मनोवाछित

भोग, भूमि सुवर्ण वस्त्र की प्राप्ति, मंत्र विद्या आदि जनित सुख, श्रेष्ठ बुद्धि ।

पंचम शुक्र--पुत्रों की वृद्धि, भय क्लेश चिता आपत्तियों का और छात्रु का नाश,

धन युक्त, अनेक प्रकार के मंत्र और शास्त्र में अभ्यास, श्रेष्ठ बुद्धि स्त्री पुत्र आदिं

का सुख ।

पंचम शनि--पुत्र कष्ट, पेट में पीड़ा, धन क्षय, राजभय, कष्ट विकलता, खोटी

बुद्धि, स्त्री पुत्र मित्र जनों में पीड़ा ।

` वर्षे फल में भाव फल विचार : १७७

पंचम राहु--बुद्धि नाश, संतान को पीड़ा, उदर में व्यया, चिता क्लेश, पुत्र से सुख, बैर, विग्रह ।

कु: पंचम केतु- बुद्धि नाश, संतान को पीड़ा, पेट में विकार से कष्ट, चिता, भय का ।

पंचम गुरु--यदि गुरु वर्षेश होकर ५-११ घर में हो तो पुत्र सुख हो । पंचम वृध शुक्र--यदि रवि, मंगल, वुध, शुक्र भी वर्षेश होकर ५-११ घर में हों तो पृत्रसुख हो ।

यदि ५-११ घर में रह कर पाप ग्रहों से पीडित हो (युत दृष्ट या इत्यद्याली हो) तो पुत्र से ही दुःख होते हैं पुत्रसुख नहीं होता । पंचम गुरु-गुरु जन्म में जिस राशि में हो यह राशि वष में पंचम में हो और बली हो तो पुत्रसुख हो ।

जन्म से गुरु जिस राशि में हो वह राशि वषं में वर्ष लग्न हो तो पुत्र लाभ हो। पंचम वृध--यदि मंगल से युत बुध शुभ ग्रह की राशि में स्थित होकर वर्ष लग्न से ५-११ स्थान में हो तो पुत्र सुख हो। ऐसा बुध यदि निर्बल हो तो पुत्रपीड़ा करता है।

जन्म में जहाँ बुध हो यह राशि वषं लग्न हो या जन्म में जहाँ शुक्र हो वह राशि वर्ष लग्न हो तो पुत्र लाभ हो ।

पंचम शनि मंगल--ऐसे शनि व मंगल जन्म में जिस राशि में हो वह राशि वर्ष में लग्न या पंचम में हो तो निश्‍चय पुत्र कष्ट करता है।

पंचम चं शु. गु.-चन्द्र गुरु या शुक अपने-अपने उच्च में होकर यदि पंचम में हों तो पुत्रलाभ हो ।

पंचम मंगल--यदि मंगल वक्री होकर पंचम हो तो उत्पन्न पुत्र का भी नाश करता है।

पंचम शुक्र--जन्म में शुक्र पंचमेश होकर वषं में पंचम हो ओर लग्नेश से इत्थ- शाल करता हो तो पुत्र देता है।

पंचम शनि--जन्म में शनि जहाँ हो बह्‌ राशि वपं में पुत्र भाव में हो और पाप

ग्रह के अधिकारी ग्रह से दुष्ट हो तो पुत्रपीड़ा हो ।

सहम - पंचम भाव बली हो या पुत्र सहम बली हो या वली पुत्र सहम पंचम में

हो तो पुत्रलाभ हो ।

यदि पुण्य सहम पंचम भाव में हो शुभ ग्रह से युत दृष्ट हो तो पुत्रलाभ हो ।

पंचमेश--यदि वली लग्नेश पंचमेश ये दोनों पंचम में हों तो पुत्रलाभ हो ।

यदि बली पंचमेश पंचम में हो तो पृत्रसुख हो ।

वर्षेश--पंचम भाव में वर्षेश शुभग्रह से दुष्ट हो तो पुत्र का अत्यन्त सुख हो ।

मं. वु--जन्म में जो गुरु की राशि हो यही राशि वर्प में पंचम हो और वहाँ

मंगल या वुध वषश होकर पड़ें तो उस वषं में अवश्य पुत्रलाभ हो ।

१२

१७८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षकछ खण्ड

पंचमेश--पाप ग्रहों से आक्रान्त या अस्त हो तो पुत्रों को महाक्लेश हो ।

शनि-- जिस राशि में जन्म का शनि हो वही राशि वर्ष में पंचम हो तथा

विषम राशिस्थ मंगल पंचम में हो तो उस वर्ष पुत्रों की चिता हो । यदि समराशि

का मंगल पंचम हो तो पुत्र को पीड़ा हो ।

मं.श. चं-मंगळ शनि या चन्द्र निर्बल हो ५ या ११ घर में हो तो पुत्र कष्ट हो ।

पंचम गुरु--वर्ष कुण्डली में पंचम या नवम घर में गुरु हो और जन्मराशि से

पंचम नवम या प्रथम गुरु हो तो उस वषे में स्त्री के गर्भ रहे पुत्र का जन्म हो ।

शनि राहु--पंचम भाव शनि राहु से युक्त या दृष्ट हो तो कमर दुखे ।

सप्तमेदा पंचम --सप्तमेश वर्ष में पंचम या लग्न में हो और जन्म राशि से ७,

९, ८, ६, ११, ५ घर में गुरु हो तो उस वर्ष निएचय विवाह हो ।

पाप ग्रह--पंचम में पाप ग्रह हो पंचमेश सूर्य के स्थान में हो तो संतान कष्ट

हो धन धान्य का नाश हो।

लग्नेश दशमेदा- लग्नेशा दशमेशा युक्त पंचम में हो तो राजाओं से प्रीत यदा

धनधान्य लाभ हो।

द्वितीयेदा-द्वितीयेश पंचम में हो दशमेश दशम में हो तो शत्रु नाश हो धन धान्य

लाभ हो अरिष्ट दूर हो ।

गुरु-जन्म में गुरु जिस राशि में हो वह राशि पंचम हो या वहाँ वर्षेश या बुध

या मंगल हो तो पुत्र की प्राप्ति हो ।

मुंथा चन्द्र पंचमेश-पंचम में मुंथा युक्त चन्द्र हो पंचमेश युक्त हो या पंचमेश

बलवान हो तो अवश्य पुत्र हो ।

शुक्र मंगल-पंचम में शुक्र हो और मंगल से युक्त या दुष्ट हो तो उस वर्ष पुत्र

की प्राप्ति हो ।

क्रूर ग्रह मंगल चन्द्र-क्र्र ग्रह युक्त मंगल या चन्द्र ५, ७ या १२ भाव में हो तो

कलत्र का वियोग हो ।

लग्नेश दशमेश-लग्नेश और दशमेश एक हो और पंचम में हो तो धन धान्य

लाभ हो, यश बढ़े राजाओं से मित्रता हो ।

संतान योग-जिस वर्षे पंचमेश अपने भाव को देखता हों और कोई शुभ ग्रह या

मित्र ग्रह की उस पर दृष्टि हो तो उस वर्ष संतान लाभ का योग होता है पंचमेदा

पुरुष ग्रह हो तो पुत्र, स्त्री ग्रह से कन्या होने का योग होता है।

जिस राहि पर दानि, राहु और सूर्य हो उन राशियों के अंक जोड़कर ३ का

भाग दो। शेष १ से पुत्र २ से कन्या । शेष ० हो तो भी पुत्र होगा ।

षष्ठ भाव फल विचार

षष्ठ में पाप ग्रह-धन लाभ, सुख लाभ ।

मंगल-अति हर्ष शत्रु नारा ।

क्षीण चन्द्र-कफ ज्वर, खांसी ।

वर्षफल में भाव फल विचार : १७९

शुभ ग्रह-भय कलह, धन नाश ।

षष्ठ सुयं-शत्रु नाश, मातृ पक्ष में पीड़ा, सुख लाभ, व्यापार से लाभ, राजा

और मित्र पक्ष से लाभ, स्त्री पुत्र का सुख ।

षष्ठ चन्द्र-शत्रु से विरोध या विवाद, नेत्र में पीडा, गुप्त चिता, निरर्थक व्यय,

स्त्री को पीड़ा राजा या चोर से भय, भाइयों से वैर, पीड़ा इलेष्म, वात व्याधि ।

षष्ठ मंगल--राजा से प्राप्ति, मित्र से लाभ, स्त्री सुख, शत्रु नाश, धन लाभ,

घोड़ों आदि का सुख आनन्द ।

षष्ठ बुध-शत्रु से विवाद, स्त्री कष्ट, वृथा खर्च, शरीर में कष्ट कफ पीड़ा आदिं

से दुःख, स्वजनों से विवाद, शत्रु पक्ष की वृद्धि ।

पष्ठ गुरुस्त्री के शारीर में पीड़ा, नेत्र रोग, ज्वर, अतिसार, शत्रु वृद्धि, घन

नाश, कुटुम्व विरोध, चिता, धन हानि ।

षष्ठ शुक्र-दात्रु से भय कष्ट, गुप्त चिता, शरीर में रोग, मस्तक और नेत्र में

पीड़ा, धन नाश, परिजनों से विवाद, घर में कष्ट ।

षष्ठ शनि-भूमि और धन लाभ, कीति की वृद्धि, दुःख का नाश, धान्य और

अस्त्र का लाभ, राजा की कृपा हो, सत्संग, रोग नाश, पराक्रम बढ़े,स्त्री पुत्र से सुख।

पष्ठ राहु-शत्रु नाश, राजा सम कीति, गौ भूमि सुवर्णं वस्त्र का लाभ, धन

प्राप्ति, दुःख नाश आरोग्य, स्त्री पुत्र से सुख ।

षष्ठ केतु-शत्रु नाश, गौ भूमि सुवर्ण वस्त्र का लाभ, धन प्राप्ति, दुःख नाश,

राजा के तुल्य हो ।

षष्ठ मंगल-जन्म से मंगल पष्ठेश होकर वर्ष में ६ भाव में हो तो रोग होता है।

अदि वैसे ही मंगल को पाप ग्रह से इत्यशाल होता हो तो महान रोग हो शुभ ग्रह

"की दृष्टि व योग से कुछ हल्का रोग होता है।

मंगल जन्म में जिस राशि में हो, वह राशि यदि वर्ष लग्न हो और क्षृत दृष्टि

(१-४--१०) से देखा जाय तो रक्त पित्त रोग होता है अग्नि भय हो या और कोई

"रोग हो । शुभ दृष्टि हो तो रोग की अल्पता होती है ।

मंगल वक्रगति होकर छठे स्थान. में पाप पीडित हो और वर्षेश भी हो तो रुधिर

विकार या पित्त रोग होवे ।

शनि-वक़ी और पापाक्रांत शनि वर्षश होकर छठे हो तो रोग, त्रिदोष जनित

रोग भथ, शूल, गुल्म रोग, नेत्र रोग, विषम जवर भय हो ।

म में जिस राशि में शनि हो, वह राशि वर्ष लग्न हो तो रूक्षता रोग, शीत

पित्त रोग हो ।

यदि जन्म कालिक शनि की राशि शनि से दृष्ट हो तो कुछ कम फल हो यदि

'पाप युक्त हो तो मृत्यु हो ।

पष्ठ सूर्य-सूर्य पाप पीडित वर्षेश होकर छठे घर में हो तो नेत्र शूल आदि नेत्र

रोग हो ।

८० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

षष्ठ गुरु-वक़ी पाप पीडित गुरु वर्षेश होकर छठे हो और चन्द्रमा से कम्बुलः

योग नहीं करता हो तो बात रोग नेत्र रोग हो ।

पाप युत गुरु अष्टम हो और मंगल लग्न में हो तो आलस्य युक्त मुर्छा रोग,

वेहोशी मृगी रोग हो ।

चन्द्र युक्त गुरु अष्टम हो या चन्द्र युक्त मंगल लग्न में हो तो भंग का नाश या

अति पीड़ा हो ।

षष्ठ शुक्र-वक़ी पाप पीड़ित शुक्र वर्षेश होकर छठे घर में हो तो पित्त रोग हो।

यदि पुरुष राशि का शुक्र पष्ठेश से दृष्ट होकर छठे हो तो इलेष्य (कफ) रोग हो ।

शुक्र जन्म में जिस राशि में हो वह राशि वर्ष लग्न से छठे स्थान में हो और

उस में सूर्य हो और रोग सहम पाप युक्त हो तो वीर्य दोष से रोग हो ।

षष्ठ चन्द्र-पाप पीडित चन्द्र वर्षश होकर छठे स्थान में हो तो कफ रोग हो ।

षष्ठ बुध-पाप पीडित वुध वर्षेश होकर छठे घर में हो तो वात से उत्पन्न रोग हो ।

षष्ठ रूम्नेश-जन्म लग्नेश पाप ग्रह हो वर्षेश से क्षुत दृष्टि (१-४-७-१०) से

दृष्ट हो तो रोग हो । यह पाप लग्नेश यदि पाप युक्त भी हो तो मृत्यु तुल्य कष्ट हो ।

जन्म लग्नेश और मुंथेश ये दोनों छठें हों पाप युक्त दुष्ट हों निर्बल हों तो ज्वर

मौर शरीर की विकलता आदि अत्यन्त कष्ट देते हैं ।

वर्षे लग्नेश, वर्षेश इन दोनों को षष्ठेश से यदि इत्यशाल योग होता हो तो उन

ग्रहों की जो धातु हो उसके विकार से रोग होता है ।

लग्नेश-वर्ष छग्नेश, मुंथा, वर्ष लग्न ये सव यदि पाप ग्रहों के बीच में हों तो

रोग उत्पन्न करते है । या षष्ठेश शुभ ग्रह हो षष्ठ में हो तो स्त्री के जरिये रोगः प्राप्त हो ।

मंगल-जन्म में गुरु और शुक्र जिस राशि में हों उसी राशि में वर्ष में मंगल हो

अस्तंगत भी हो तो प्लीहा, शीतला आदि रोग होते हैं और शीत पित्त या सर्दी गर्मी

के रोग या गलगंड रोग होते हैं ।

चं. बु.-इसी प्रकार चन्द्र युक्त बुध जन्म कालिक गुरु शुक्र की राशि में हो तो:

कुष्ट और गंडमाला या भगन्दर रोग हो ।

पाप ग्रह-जन्म में केन्द्र में स्थित पाप ग्रह यदि वर्ष लग्न में हो तो रोग हो ।

शुक्र-विषम राशि में शुक्र पर पाप ग्रह की क्षुत दृष्टि हो तो कफ रंग हो ।

दिन का वषे प्रवेश हो-और जन्म तथा वर्ष कालिक लग्न में सूर्य या मंगल का

स्वगृह हद्दाद्रेष्काण नवांश आदि अधिकार हो तो ज्वर से कष्ट हो । जो लग्न पर शुभ

ग्रह की दृष्टि भी हो तो परिणाम में सुख होता है । रात में वर्ष प्रवेश हो और चन्द्रमा शुक्छ पक्ष का हो और वर्ष में मंगल से

इत्यशाल होता हो तो रोग नाश हो । यदि वह चन्द्रमा शनि से इत्यशाल करता हो

तो रोग बढ़ाता है। इसके विपरीत हो तो विपरीत फल जानना जैसे दिन का वर्ष

प्रवेश हो और कृष्ण पक्ष का चन्द्रमा मंगळ से मुथशिली हो तो रोग करता है यदि

वह चन्द्रमा शनि से मुथशिली हो तो रोग नाश करता है

वर्षफल में भाव फल' विचार : १८१

ऐसे ही बुध केतु युक्त सूर्यं यदि मंगल या शनि के साथ इत्थशाल करता हो तो

चूरे वषे भर रोग हो ।

या जन्म काल में अधिकार प्राप्त वुध वर्ष में केतु युक्त हो तो पूरे वर्ष भर

रोग हो ।

मुंथा-यदि मुंथा चतुर्थ या सप्तम स्थान में हो शनि से युक्त या शनि की शत्रु

दृष्टि से दृष्ट हो तो शूल पीड़ा होती है ।

यदि ४ या ७ स्थान में स्थित मुंथा पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो शूल

रोग हो ।

रोग का स्थान आदि-रोग कारक ग्रह जिस राशि में जिस नवांश में हो उस

राशि या नवांश में जो वली हो उस राशि के स्वरूप गुण धर्म से जो स्थान आदि

गट हो उस से रोग का विकार स्थान आदि जानना ।

सूर्य आदि-वूर्यं या वक्री गुरु मंगल शनि छठे हो तो वात पित्त विकार से नेत्र

रोग हो।

शुक्र-छठे हो तो इलेष्म विकार से अधिक पीड़ा हो ।

तृतीयेश-तृतीयेश छठे हो पाप ग्रह युक्त दुष्ट हो तो कलह व मित्र आत्मीय जनों से क्लेश हो भाई को कष्ट हो ।

सर्य चन्द्र-सूर्य और चन्द्र पाप ग्रह युक्त ६ या ८ भाव में हों तो गज दोष से

मृत्यु हो ।

जय उच्च शनि-शनि उच्च का ३ या ६ घर में सौम्य ग्रह से युक्त हो तो लाभ हो

सुख प्रताप बढ़े राजा से अर्थ लाभ हो ।

सूर्य-छठे सूर्य, तीसरे राहु हो तो शत्रु और. रोग नाश हो कुल की कीति बढ़े ।

मंगल चन्द्र-मंगल युक्त चन्द्र छठे हो और दशम में शुभ ग्रह युक्त गुरु हो तो

सुख हो । राजा से अइव आदि की प्राप्ति हो।

अष्टमेश्-अप्टमेश छठे घर में हो चन्द्र क्रूर ग्रह युक्त या दुष्ट हो उस पर गुरु

की दृष्टि न हो तो मृत्यु हो ।

चन्द्र-चन्द्र छठे घर में मकर का हो सिह राशि में राहु हो तो शिव भी रक्षा करें तों उस वर्ष में अरिष्ट हो मृत्यु हो ।

चन्द्र-चन्द्र ६ या ८ घर में हो ओर वर्षेश पाप और शुभ ग्रह युक्त ६-८ या १

धर में हो तो कफ विकार हो मृत्यु हो ।

अष्टमेश-अष्टमेश छटें हों लाभेदा लाभ में हो तो धन मित्र लाभ पुत्रसुख हों

अरिष्ट दूर हो ।

सप्तमभाव का ग्रह फल

` सप्तम में-पाप ग्रह युत चन्द्र-रोग भय ।

“पाप ग्रह=स्त्री नाशा (कष्ट) कलह नौकर से भय ।

` शुभ ग्रह-धन लाभ सुख यश परिवार सुख राज सम्मान ।

Fr

१८२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

सप्तम सूयं-स्त्री के शारीर में पीड़ा, अपने शरीर में पीड़ा, दिर में रोग, मार्ग

में भय,विवाह, गुदा तथा पैर में पीड़ा, पेडू ब नेत्र में पीड़ा, विचित्र वाहन प्राप्त हो।

सप्तम चन्द्र-पाप ग्रह से दुष्ट हो तो खांसी ज्वर वात पीड़ा भय, स्त्री को पीड़ा

कफ उत्पत्ति से बाधा । शुभ युक्त या दुष्ट हो तो धन लाभ, स्त्री सुख, राजा सेः

प्रतिष्ठा, ग्रामान्तर से लाभ, वाणिज्य या जल मार्ग से लाभ ।

सप्तम मंगल-मार्ग में कष्ट, स्त्री को कष्ट,चित्त में क्लेश, शत्रु से भय, विवाद,

देश का छूटना, आत्म पीड़ा, पुत्र या स्त्री को रोग ।

सप्तम बुध-स्त्री के साथ सुख विलास, प्रतिष्ठा की वृद्धि सुवर्ण वस्त्र जय प्राप्तः

हो वाणिज्य से धन प्राप्ति धर्म कार्य में मन, मार्ग से लाभ ।

सप्तम गुरु-स्त्री सुख, निर्भयता, शत्रु नाश, वाहन का सुख, राजा से धन प्राप्ति,

वाणिज्य से व्यवहार से और मार्ग से धन की प्राप्ति, सम्मान प्राप्त हो ।

सप्तम शुक्र-स्त्री का सुख, भोग विलास का सुख, शरीर सुख, शत्रु नाश, वस्त्र

ब सुवर्ण लाभ, वाणिज्य से धन प्राप्ति, मान वाहन व धन प्राप्ति ।

सप्तम शनि-स्त्री को कष्ट, मागं में भय, पशु का मरण, राज्य से भय, विकलता,

क्लेश, मिथ्या कलंक, स्थान हानि, धन नाश, रोग, भाई व मित्र को कष्ट ।

सप्तम राहु-गुप्त इन्द्रियों में पीड़ा, प्रमेह आदि रोग, विष व अग्नि से पीड़ा,

प्रवास, भय, स्त्रियों को कष्ट, चित्त चंचल, स्थानान्तर, अंग में पीड़ा ।

सप्तम केतु-विष अग्नि से पीड़ा, गुप्त इन्द्रियों में पीड़ा, स्त्री को पीड़ा या स्त्री

से भय प्रमेह वात आदि रोग ।

करनेश-जन्म लग्नेश वली होकर वर्ष में सप्तम हो तो स्त्री सुख हो।

लग्नेश सप्तमेश का इत्थश्षाल हो तो भी स्त्री सुख हो |

जन्म लग्नेश वर्ष लग्नेश सप्तम हो और उदित तथा बळवान्‌ हो तो स्त्री सुख हो ।

सप्तम शुक्र-वली वर्षेश शुक्र सप्तम हो तो स्त्री पक्ष से सुख हो और इस पर गुरु की दृष्टि भी हो तो अत्यन्त स्त्री सुख करता है।

ot शुक्र पंचाधिकारियों में होकर मङ्गल से दृष्ट हो सुख अत्यन्त तो स्त्री करता है ।

शुक्र सप्तम में निबंछ व अस्त हो तो स्त्री से कष्ट हो ।

वषश शुक्र सप्तम हों अधिकारी बुध से दृष्ट हो तो अल्प वय की स्त्री से या

वेश्या से व्यभिचार हो ।

उक्त शुक्र पर अधिकारी या अनधिकारी शनि की दृष्टि हो तो वृद्धा परस्त्री से.

व्यभिचार हो ।

उक्त शुक्र पर अधिकारी या अनधिकारी गुरु की दृष्टि हो तो विवाहिता नवीन

भार्या से संयोग हो तथा शीघ्र सन्तान प्राप्त हो ।

जन्म में शुक्र जिस राशि में हो बह वषं में सप्तम हो और शुक्र वर्षश हो तो

स्त्री छाभ हो ।

वर्ष फल में भाव फल विचार : १८३

सप्तम शुक्र-शुक्र वर्षश होकर मङ्गल से दृष्ट हो या मङ्गल वषश होकर शुक्र

से दृष्ट हो तो स्त्री लाभ हो ।

स्त्री सहम पर मङ्गल शुक्र की दृष्टि हो तो स्त्री लाभ हो या विवाद हो.।

सहमेश-स्त्री सहम पर शुक्र तथा सहमेश की दृष्टि से भी उपरोक्त फल हो।

स्त्री सहमेश और सप्तमेश अस्तंगत हो पाप युक्त दृष्ट हो तो स्त्री को कष्ट हो 1

जन्म कालिक सप्तमेश वर्ष में स्त्री सहमेश हो तो स्त्री सुख हो ।

चन्द्र-यदि जन्म के शुक्र की राशि में वर्ष में क्षीण चन्द्रमा हो तो स्त्री प्रसंग

सुख अल्प हो ।

मङ्गल-यदि जन्म के शुक्र की राशि में वली मङ्गल हो तो स्त्री सुख और

उत्सव को करता है ।

गुरु-जन्म के शुक्र की राशि में वर्ष में गुरु केन्द्र त्रिकोण में हो तो स्त्री सुख हो ।

हद्देश-जन्म के शुक्र की राशि में वर्ष में वर्ष लग्न के हुद्दा का स्वामी केन्द्र

त्रिकोण में हो तो स्त्री सुख हो ।

विवाह सहमेश-जन्म के शुक्र की राशि में वर्ष का विवाह सहमेश केन्द्र त्रिकोण

में हो तो स्त्री प्राप्ति हो ।

सप्तमेश-जन्म का सप्तमेश यदि वर्षे शुक्र से युत या दृष्ट हो तो बहुत विलास

सुख युक्त स्त्री सुख हो ।

जन्म में सप्तमेश शुक्र हो वह वषं में सप्तम हो और वली होकर लग्नेश से

इत्यशाल हो तो निश्चय स्त्री लाभ हो । *

सूर्य-सुर्य पंचाधिकारियों में हो तो स्त्री के हेतु चित्त में व्याकुलता रहे ।

शनि-शनि सप्तम हो तो कलंक कलह और भत्संना हो ।

मुन्था-मुंयेश की राशि का गुरु हो वा मुंया की राशि में गुरु हो वा मुंया राखि

को गुरु देखे तो विवाह योग होता है ।

सूर्यं मंगल युक्त मुन्था सप्तम में हो तथा स्त्री सहम पापाक्रांत हो तो स्त्री व

पुत्र से कष्ट होवे। उस पर पाप ग्रह की दृष्टि भी हो तो स्त्री पुत्रों से अधिक ही

कृष्ट होगा ।

स्वगृही या उच्च का चन्द्र मुन्था से सप्तम हो अर्थात्‌ मुन्था मकर में हो चन्द्र

ककं में हो या मुन्था वृश्चिक में हो चंद्र वृष में हो तो विदेश यात्रा होती है। पाप

दृष्टि हो तो कष्ट हो । शुभ दृष्टि से सुख पूर्वक यात्रा हो चंद्र ककं में हो तो जल

यात्रा वृष में हो तो स्थल यात्रा हो ।

सप्तम गुरु-वर्षश गुरु पंचाधिकारी होकर सप्तम में हो तो क्रय-विक्रय से घन

लाभ हो!

मुंया-मुन्था ७ या ८ स्थान में हो उसपर शनि की दृष्टि हो तो शुरू रोग हो ।

मंगल चंद्र राहु-सप्तम में मंगल और चन्द्र युक्त राहु हो तो क्लेश हो स्त्री

का धन नाद हो ।

१८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा; चतुथं वर्षफल खण्ड

  • सप्तमेश-सप्तमेश केन्द्र में शुभ ग्रहों से युक्त या दुष्ट हो तो स्त्री का सुख हो धन धान्य का लाभ हो शत्रु का नाश हो पुण्य का उदय हो । गुरु शुक्र-गुरु और शुक्र अस्त होंकर सप्तम हों लग्नेश नीच का हो तो शस्त्र या अग्नि से मृत्यु हो । र मंगल शनि-मंगळ शनि के साथ सप्तम हो सूर्यं धन में हो चन्द्र वारहवें हो तो अग्नि लगे धन धान्य नाश हो । टु राहु चंद्र-सप्तम में चंद्र युक्त राहु हो तो उस वर्ष. अधिक कष्ट हो विशेष कर स्त्रियों को कष्ट हो ।

... चंद्र-बली चंद्र सप्तम में हो क्रूर ग्रह युक्त दृष्ट न हो तो स्त्री आदि प्राप्त हो अनेक सुख हो ।

, . मंगल-मंगल् सप्तम में पाप ग्रह युक्त हो शनि मंगल के स्थान में हो तो कलत्र नाश हो धन की हानि, मागे में व्यय हो । हु लग्नेश मुन्येश-जन्म लग्नेश, वर्ष लग्नेश, मुन्येश यदि सप्तम में हो क्रूर ग्रह से दुष्ट हो तो अवश्य कष्ट हो । Es गुरु-सप्तम में.गुरु हो, चंद्रमा सिंह में हो मंगल से दुष्ट हो तो सुख और धन का नाश हो स्त्री पुत्र को कष्ट मित्र क्लेश, दाह, कष्ट इवास रोग हो। शनि-सप्तम में पाप युक्त शनि हो कन्या का शुक्र लग्न में हो तो कष्ट हो, स्त्री की मृत्यु हो ।

` सप्तमेश चतुर्थश-सप्तमेश चतुर्थेश सप्तम या लग्न में हो शुभ ग्रह युक्त दृष्ट हो तो शगार योग है स्त्री का सुख देने वाळा है अपने वर्ग से लाभ, रत्न सुवर्ण प्राप्त हो, भूमि सुख हो कर्म की प्राप्ति हो । राहु मंगळ चंद्र-सप्तम में राहु मंगळ और चंद्र से युक्‍त सप्तमेश हो तो स्त्री का निधन हो। |

राहु व वर्गेश-सप्तम में राहु से युक्त सप्तांश वर्ग का स्वामी हो तो अनिष्ट हो, स्वप्न में भी पुत्र नहीं होता कन्या ही होती हैं । ` सप्तमेश-सध्तमेश बळवानु होकर केन्द्र में हो, शुभ ग्रह से युक्त दृष्ट हो तो शत्रु का नाश हो सुख, धन-धान्य लाभ हो, पुण्य का उदय हो । गुरु मंगल-उच्च का गुरु मंगल युक्त सप्तम हो तो राजा से मान प्राप्त हो, धन-धान्य सुवर्णं आदि का लाभ हो। लग्तेश-सप्तम में लग्नेश हो और सप्तमेश लग्न में हो तो अरिष्ट दुर हो सब अर्थे की सिद्धि हो ।

पाप प्रह-सप्तम में पाप ग्रह हो अष्टम में शुक्र और चंद्र हो तो रोग से मृत्यु हो। शानि मूर्य-सप्तम सूरये शनि युक्त हो या अष्टमेश शनि युक्त हो तो सम्पूर्ण अथं का नाश करता है।.

. मंगछ-सप्तमःया अष्टम मंगल हो तो उस वर्ष में अपयश हो मूत्रेन्द्रिय और सिर में वाधा हो ।

वर्ष फल में भाव फल विचार :.१८४५

अष्टम भाव का गृह फल

अष्टम में-पाप ग्रह युक्त चन्द्र-मरण ।

पापग्रह-मरण सम कष्ट !

शुभ ग्रह-जिस ग्रह का जो धातु हो, उससे रोग, धन नाश, सम्मान नादा । यदि

शुभ ग्रह से इत्यशाल हो तो शुभ फल होगा ।

अष्टम सूर्य-वन्धुओं से दुःख, शरीर कष्ट, धन का क्षय, यश नष्ट, स्त्री कष्ट,

'पुत्र को रोग, व्रण, वात पीड़ा,राजा,अग्नि,विष व सपं से भय, नेत्र रोग,अनादर।

अष्टम चन्द्र-कष्ट, ज्वर, वमन, उदर रोग, कफ विकार, नेत्र रोग, अंग-भंग,

'जल से भय, विवाद, धन नाश, थोड़ा आनन्द मिले, वृद्धि मन्द, अनर्थ हो 1

, अष्टम मंगल-झात्रु से पीड़ा, शरीर में कष्ट, स्त्री को कष्ट, शस्त्र घात, धन नाश,

मानसिक चिता, विकलता, मित्र से विपत्ति, रक्त पित्त प्रकोप, दीनता ।

अष्टम बुध-मृत्यु तुल्य कष्ट, कफ और ज्वर का प्रकोप नेत्र में पीड़ा, भय,

'बबराहुट। अन्य मतवाले अष्टम बुध का फल अच्छा होना मानते हैं । -

अष्टम गुरु-ज्वर, वमन, कफ, पीड़ा, आँख-कान में रोग, शत्रु का भय, स्त्री .

'कष्ट, ब्रण से पीड़ा, परदेश गमन, वियोग, धन खर्च; वुद्धि भ्रष्ट हो ।

अष्टम शुक्र-मृत्यु तुल्य कष्ट, ज्वर आदि की पीड़ा, भय, नेत्र रोग, शत्रु से

"विवाद, स्त्री पुत्र को पीड़ा, चिता, प्रवास, धर्म नाश ।

अष्टम शनि-मृत्यु, ज्वर पीड़ा, कफ रोग, अपवाद, राज भय, धन हानि, शत्रु से

-भय,- संताप, वादी की पीड़ा, व्यसन, स्त्री पुत्र को क्लेश ।

अष्टम राहु-मृत्यु तुल्य कष्ट, राजभय. ज्वर, अतिसार, कफ वृद्धि विसूचिका,

चात रोग, प्रवास स्त्री को कष्ट, वन्धुओं से विवाद, प्राप्त धन का क्षय।

अष्टम केतु-मृत्यु तुल्य कष्ट, राजा से भय, ज्वर, अतिसार कफ, विशूचिका, बात रोग का भय।

अष्टम सूर्य-जन्म में यदि सूये शुक्र से मुशरिफ करे और वर्ष में-पंचाधिकारियों

में होकर केन्द्र में हो तो राज भय या राज रोग से भय ।

अष्टम सू. मं. श.-सूयं मंगल शनि यदि ८ या १० घर में होतो सव,री से गिरने का भय ।

अष्टम चन्द्र-यदि चन्द्रमा पुण्य सहम में लग्न में हो सप्तम में पाप ग्रह हो तो

मृत्यु, यदि दो पाप ग्रह २-१२ घर में हों तो भी मृत्यु हो। और जन्म लग्नेश वर्ष

“लग्नेश अष्टम में हो तो मरण ।

जन्म और वर्ष में अधिकार पाया हुआ चन्द्रे यदि जन्म की बुध आश्रित राशि में

हो, पाप पीड़ित हो तो परदेश गमन हो, लोगों से विवाद और वैमनस्य होता है ।

जम्म में जहाँ मङ्गल हो उस राशि में वर्ष में चन्द्र अधिकारी होकर रहे तो रोग झो, गुप्त राज भय हो । >

कि क a००.“

१८६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड

अष्टम म ङ्गल-मङ्गल वर्ष में अष्टम हो तो अग्नि शस्त्र या राजा से भय हो ।

मङ्गल यदि दशम हो तो चतुष्पद से पतन और रक्त विकार से रोग ।

वर्ष लग्नेश यदि मङ्गल से पीड़ित हो तो शत्रु या अपने वंशजों से कलह तथा

लड़ाई का भय हो ।

मङ्गल यदि १,५,९,२ राशि में होकर वर्ष में अष्टम हो तो मृत्यु देता है । जन्म में मङ्गल जिस राशि में हो वही यदि वर्ष लग्न हो जाय बुध यदि वर्षेवा'

हो तो वह वर्ष अच्छा नहीं होता ।

मङ्गल युक्त चन्द्र ६-८-१२ घर में हो तो मृत्यु ।

मङ्गल-मङ्गर युक्त वषश अष्टम हो तो मृत्यु हो।

दिन के वषं प्रवेश में वर्षेश मङ्गल सूर्य युक्त हो तो राज भय-हो ।

मङ्गल वर्षा होकर निर्वळ और पाप युक्त दृष्ट हो तो लोहे की चोट से घाव हो ।.

यदि वही मंगल अग्नि तत्त्व की राशि में हो तो आग से जलने का भय हो ।

यदि द्विपद राशि में (३-६-७-९ पूर्वार्ध राशि में) हो तो क्रूर नर से मरण ।

निवंल मङ्गल वर्षेश होकर दशम हो तो राजा से, मन्त्री से, शत्र, से, मित्र से,

गुरु से भय हो ।

बुध- जन्म के मङ्गल की राशि में बुध वर्ष में अधिकारी हो तो रोग हो । , वेसा बुध मङ्गल की क्रूर दृष्टि से दृष्ट हो तो रक्त विकार आदि रोग हो। वसा वुध अस्तंगत हो पाप पीड़ित हो तो विदेश से बन्धन मरण। पाप ग्रह से पीडित बुध यदि क्रूर दृष्टि से मङ्गल से इत्थशाल करता हो तो मरण ॥

बुध मङ्गल की दशा में हो पाप दुष्ट हो तो धन नादा उपरोक्त दोनों योगों में यदि शुभ ग्रहं की दृष्टि हो तो शुभ होता है। गुरु-वर्ष लग्न से २-८ घर में गुरु वषश हो पाप दुष्ट हो तो धन नादा हो । जन्म में ग्रह अष्टम हो यदि वर्ष में पंचाधिकारियों में न हो तो भारी झगड़ा हो । जन्म में गुरु अष्टम हों यदि वर्ष में अधिकार रहित हो उस पर शुक्र की' दृष्टि हो तो विवाद में प्रत्युत्तर देने से जय हो । जन्म और वर्ष में अधिकारी गुरु जन्म के मङ्गल की राशि में हो पाप पीड़ित हो तो लोगों से विवाद होता है । ः

गुरु पाप युक्त अष्टम में हो और चन्द्र युक्त मङ्गल लर्न में हो तो मूर्छा और तंद्रा रोग हो ।

अष्टम शनि-हानि अष्टम हो अष्टमेद से इत्यशाल करता हो तो मृत्यु हो। शुभ ग्रह से इत्यशाल होने से अशुभ योग अनिष्टकर नहीं होता । जन्म से अष्टमेश शनि वर्ष में भी अष्टमेश होकर लग्नेश से क्रूर दृष्टि से इत्यशाल: करता हो तो तत्काळ मृत्युदायक होता है । ` जन्म और वर्षे का अधिकार पाया हुआ पाप पीड़ित चन्द्र यदि शनि के पढ (राशि) में हो तो स्पष्ट रूप से विवाद होता है । £

वर्षे फल में भाव फल विचार : १८७-

लग्नेश-लरनेश मुंथेश वर्षेश यदि अष्टमेश हो या अष्टमेश से इत्थशाळ करता:

हो तो मरण प्रद हो जन्म कालिक दुर्ग्रह मारक ग्रहों की दशा या अन्तदं्षा में उक्तः

फल होगा ।

वर्ष लग्नेश निर्वल या अस्तंगत या पाप युक्त हो तो स्त्रियों से विवाद हो ।

जन्म छू्नेश पाप से पीड़ित होकर अष्टम हो तो रोग व कलह हो ।

पाप युक्त जन्म लग्नेश यदि वर्ष में अष्टम हो तो मृत्यु हो।

जन्म लग्नेश वर्ष लग्नेश अष्टम हो तो मरण हो ।

मुन्या-शनि के साथ मुन्या कहीं हो उस पर मंगल की शत्रु दृष्टि हो तोः

आत्मघात ( अपने हाथ से मृत्यु ) हो ।

सहमेश-मुत्यु सहमेश उदित हो (अस्त न हो ) निबंल हो तो जीवन में मृत्यु,

समान कष्ट हो।

पुण्य सहमेक्ष यदि पुण्य सहम से अष्टम हो पाप ग्रहों से युक्त दुष्ट हो तो मरण हो ।-

या जन्म लग्न से अष्टमेश पृण्य सहम में हो पाप युक्त दृष्ट हो तो मरण हो ।

जन्म लग्न से अष्टम राशि यदि वर्ष में पुण्य सहम हो पुण्य सहमेश से युक्त हो:

तो मृत्यु हो । सहमेश-या वर्ष लग्न से अष्टम राशि में पुण्य सहम और पुण्य सहमेदा भी होः

तो मृत्यु हो । पुण्य सहमेश पाप से युक्त हो और अष्टमेश ६-८-१२ घर में हो तो मृत्यु हो ।-

या मुन्था या वर्षेश पाप युक्त हो ६-८-१२ घर में हो तों मृत्यु हो ।

गुरु-अष्टम, नवम या द्वादश गुरु हो उस वपं में तीर्थ यात्रा होती है ।

लग्नेश अष्टमेश-लग्नेश और अष्टमेश एक होकर अष्टम में हो तो रुधिर विकार:

व शरीर कष्ट हो |

मंगल चंद्र-अष्टम में मंगळ और चंद्र हो लग्नेश ६-८ घर में हो तो विष याः

व्याघ्र से मृत्यु का भय हों ।

दशमेश्-अष्टम में दशमेश अस्तंगत हो छठे घर में शनि, चंद्र हो तो राजा या:

रोग से मृत्यु हो या ऊपर से गिरे। शनि चंद्र-अष्टम में शनि युक्त चंद्रमा हो लग्नेश से युक्त या दूष हो तो उस

वर्षे धन, स्त्री, कुटुम्ब में कष्ट हो अरिष्ट हो ।

मङ्गल-मङ्गल ८, १ या १० घर में हो तो चौपाये से चोट लगे । क

लग्नेश-छग्नेश अष्टम हो, गुरु, शुक्र युक्त मङ्गल सप्तम हो अष्टम में चंद्रमाः

हो तो शीतला आदि का रोग हो अरिष्ट हो।

व्ययेश-व्ययेश अष्टमं हो अष्ठमेश धनभाव में हो लग्नेश निबेळ हो तो सपं केः

काटने से मृत्यु हो ।

` मङ्गल चंद्र-अष्टम में मङ्गल युक्त चन्द्र हो तो गुप्त दुःख हो ।

सूर्य शुक्र शनि-शुक्र अष्टम में हो वा लग्नेश पांप ग्रह से दृष्ट हो तो भय पलेष्माः

“१८८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

:आदि रोग हो, सूयं अष्टम में हो तो नेत्र रोग, शनि हो तो जल से भय, अष्टमेश को

“पाप ग्रह देखता हो तो मृत्यु हो ।

लग्नेश-लग्नेश अष्टम में अस्तंगत हो, दशमेश छठे और धनेश बारहवें हो तो

“दरिद्र करता है ।

लग्नेश अष्टम, शनि दशम, चन्द्र पंचम, पापयुक्त मंगल दशम में हो तो विष से

“मृत्यु हो । `

सूये-सूर्यं अष्टम हो, अष्टमेश चंद्र युक्त हो, लग्नेश छठे हो, शनि दशम हो तों

: छाठी की चोट से अरिष्ट हो ।

गुरू_गुरु अष्टम में पापयुक्त हों, शनि युक्त चंद्र बारहवें हो तो राजा से अनेक

-कष्ट दण्ड से धन हानि हो ।

दश्मेश-नीच का दशमेश अष्टम हो, पापग्रह दशम में हो तो उस वर्ष में सुख न

"हो उसका राज्य हरण हो जायगा । :

दशमेश अष्टम हो, अध्टमेश् दशम में हो अष्टम क्रूर ग्रह युक्त हो तो अर्थ नाश

:हो । राजा से भय हो !

लग्नेश-लग्नेश अष्टम में हो अष्ठमेश केन्द्र में हो शनि और चंद्रमा छठे हो तों

“अनेक कष्ट हों ।

लग्नेश चम्द्र-चन्द्र युक्त लग्नेश अष्टम हो लग्न में पाप युक्त अष्टमेश हो तो

-रोग शोक आदि से शरीर क्षय हो ।

लग्नेश शुक्र-ऊग्नेश शुक्र अष्टम में पाप ग्रह युक्त व दृष्ट हो लग्न में मंगल हों

«तो तृषा आदि से कष्ट हो ।

गुरु चन्द्र-गुर चन युक्त अष्टम में हो मंगळ सप्तम हो, यह खल्छासर योग कष्ट

“देने वाला है।

चन्द्र युक्त गुरु अष्टम हो और शनि के साथ मुन्था हो तो मृत्यु हो

केतु चन्द्र-केतु युक्त चन्द्र अष्टम होया अष्टम पर दृष्टि हो तो स्त्री का वियोग

-या मनुष्य का मरण हो ।

चन्द्र-केतु युक्त चन्द्र अष्टम हो, अष्ठमेश केन्द्र में हो लग्नेश ६ या १२वाँ हो

"तो निर्धन हो । !

पाप युक्त चन्द्र अष्टम हो नीच का लग्नेश सप्तम हो तो भय, चिता दुःख

~निरुद्यम करे |

चन्द्र सूर्य मंगछ-चन्द्रमा या सूर्य से युक्त मंगल अष्टम हो शनि ७ या ९ स्थान

"में हो तो उस वर्ष ९वें महीने में अरिष्ट हो ।

चन्द्र मंगछ-चन्द्र युक्त मंगळ अष्टम हो तो अग्नि आदि से भय इवास कास रोग

“घात पात आदि का कष्ट हो ।

__ अष्टमेश-अष्ठमेश केन्द्र या त्रिकोण में हो तो विष बन्धन आदि से कष्ट, श्वास

मूळ दाह तन्द्रां आदि रोग हो ।

वर्षे फल में भाव फल विचार : १८९:

शनि चन्द्र-शनि और चन्द्र अष्टम हों तो शूल घात धातु क्षय शीतला आदि

अनेक रोग हो ।

लग्नेश शनि-लग्नेश शनि युक्त अष्टम हो चतुर्थ में वक्री पाप ग्रह हो, पाप'

ग्रह को दृष्टि हो तो अनेक प्रकार के दुष्टों से कष्ट हों ।

अष्टमेश-अष्टमेश अष्टम हो बलवान्‌ हो लग्नेश सप्तम हो तो शूल दस्त दाह:

तन्द्रा आदि रोग से कष्ट हो ।

मंगल-मंगल अष्टम हो चन्द्र छठे हो तो शत्रु का उदय घात पात आदि हो ।

चन्द्र-अष्टम चन्द्र हो या मङ्गल शनि युक्त चन्द्र के वर्ग में हो तो बात कफ सेः

शरीर क्षय शस्त्र से ज्वर पीड़ा आदि हो ।

नीच कं ग्रह-जो ग्रह जन्म में नीच का हो वही ग्रह वर्ष में अष्टम भाव में हो

तो सुख घन आदि प्राप्त हो ।

५ ग्रह-अष्टम में ५ ग्रह हों या ६ से अधिक नीच युक्त हों तो वज्ञ से हत होने

का कष्ट हो ।

वर्षेश बुध-वर्षे् और बुध अष्टम हों शनि मङ्गल पाप युक्त सप्तम में हों चन्द्रः

की दृष्टि हो तो कण्ठादि रोग या मरण हो ।

पाप ग्रह-अष्टम क्रूर ग्रह युक्त दृष्ट हो सप्तमेश ४या५ भाव में हो तो मुत्यु हो।'

लग्नेश-लग्नेश अष्टम हो शनि चन्द्र के स्थान में हो चन्द्रमा पाप युक्त मकर

राशि में हो तो कष्ट हो जलोदर रोग हो ।

लग्नेश मज़्ल-लग्नेश और मङ्गल अष्टम हो अष्टमेश ६ या १२ भाव में होः

तो भृत्यादि का घात शत्रु विवाद अरिष्ट हो ।

लाभेश-अष्टम में लाभेश हो गुरु चतुर्थं हो चतुर्थश नीच का सप्तम हो तो ४

महिना में अरिष्ट हो ।

तृतीयेश-तृतीयेश् अष्टम में क्रूर ग्रह से दुष्ट हो तो शरीर पीड़ा हो भाई काः

वियोग हो ।

व्ययेश-व्ययेश अष्टम हो धनेश व्यय में हो तो स्व जाति में अधिक व्यय होः

ईश्वर की पूजा करे ।

पाप ग्रह-अष्टम में एक भी पाप ग्रह शत्रुग्रही हो पाप ग्रह से दुष्ट हो तोः

बालक नष्ट हो ।

नवम भाव का ग्रह फल

नवम में पाप ग्रह-सहोदर को भय, पशुओं को पीड़ा ।

सुर्य-अति हृषं प्रद ।

शुभ ग्रह-धन व धर्म की वृद्धि ।

अन्य मत है कि नवम में पाप ग्रह भी शुभ हैं ।

नवम सूर्य-धमे राज्य व यश को बढ़ावे, बन्धुओं को पीड़ा कारक, स्त्री पुत्र से:

विवाद क्लेश, मति मन्द ।

-१९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वषंफल खण्ड

नवम चन्द्र-भाग्योदय, धन का लाभ, घर में सौख्य, शत्रु नाश, व्यापार में

“सुख, पुण्य का उदय, यात्रा में सुख, यश की वृद्धि, चित में संतोष,राजा से सम्मान ।

नवम मङ्गल-पुण्य का उदय, धन का लाभ, प्रतिष्ठा एवं पाप में प्रीति, उद्वेग,

अपने जनों से कलह, धन व ऐडवर्य की हानि भी करे ।

नवम बुध-धर्म में बुद्धि, राजा से जय, भाग्योदय, कीर्ति की वृद्धि, शत्रुनाश,

“कार्य सिद्धि में विघ्न, उद्वेग और स्त्री को पीड़ा भी करता है।

नवम गुरु-अधिक धर्मे, सुख प्राप्ति, भाग्योदय, धन लाभ, तीर्थाटन, पुण्य कार्ये

“में बुद्धि, स्त्री विलास, मन प्रसन्न, राज सुख ।

नवम शुक्र-धर्म की बृद्धि, राजा तुल्य हो, वाहुन सुख, गौ भूमि भूषण वस्त्र का

मलाभ, आरोग्यता, स्त्री, पुत्र मित्र से सन्तोष, निर्बल बुद्धि, उन्नति ।

नवम शनि-जाया पुत्र मित्र को कष्ट, धन नादा, पाप बुद्धि, भाइयों से भय

:और पीड़ा एवं भाग्य का उदय, राजा से लाभ, कीति, शत्रु नादा ।

नवम राहु-शरीर पीड़ा, स्त्री से विरोध, धर्मे काम में विलम्ब, पशु व वन्धुओं

“को पीड़ा एवं अन्य मत से राजा से जय, भाग्योदय, रात्रुनाश ।

नवम केतु-धर्म नाह, पशु और भाइयों को पीड़ा, दातु नारा, भाग्यो दय, राजा

मसे जय ।

नवम सूर्य-तर्षेश सूर्ये अधिकार युक्त हो और चन्द्रमा से कम्बूली भी हो तथा

  • स्वगृह उच्चादि में होवे तो अपनी इच्छा से मार्ग चलना पड़े मार्ग में सुख भी होवे ।

-यदि सूर्य स्वगृह आदि अधिकार युक्त न हो तो दूसरे की प्रेरणा से गमन होवे, मागं

-में सुख भी न हो ।

नवम चन्द्र-यदि चन्द्र या गुरु जन्म के शनि की राशि में वर्ष में नवम भाव में

“पाप युक्त हो तो बिना प्रयोजन दीर्घ मार्ग चलना पड़े ।

चन्द्रमा बलवान होकर नवम में हो और, मुन्था सप्तम हो तो विदेश सम्बन्धी

“मार्ग चलना पड़े ।

नवम मङ्गल-वर्षे्च मङ्गल ३ या ९ स्थान में बलवान हो पाप युक्त न हो तो

यात्रा गुणदायक होवे चर कायं भी स्थिर हो जावे अर्थात्‌ कोई भी कार्यं अधिक

समय तक स्थिर रहता है । जड

जन्म में गुर जिस राशि में हो उती में वर्ष का मङ्गल नवम हो नौकर और

  • धर्म की प्राप्ति होने वाली यात्रा होती है । टु

जन्म का बुध जिस राशि में हो उसी में वर्ष का मङ्गल हो और धनेश की दृष्टि

  • उस पर हो तो यात्रा सुख देने वाली होगी । र

जन्म का मंगल स्व राशि में हो वर्ष में भी स्वराशि का नवम स्थान में हो और

लग्न को देखता हो तो शुभ कार्ये सम्बन्धी यात्रा हो और यात्रा में प्रसन्नता हो।

यदि गुरु से नवम स्थान में बली मङ्गल हो तो यात्रा शुभ होती है।

वर्षे फल में भाव फल विचार : १९१

नवम मंगल-जन्म के शनि की राहि ऐ वर्ष में मंगल ३-९ घर में वलहीन

अस्तंगत पाप युक्‍त दृष्ट हो तो पाप को वृद्धि हो ।

नवम मङ्गल-मङ्गल वषश होकर निर्व अधिकार रहित होकर नवम में हो तो

“उसे अपने सम्यन्धियों को छोड़कर दूर देश जाना पड़े।

नवम म० बु० गु०-मङ्गल और वुध बली होकर गुरु से युक्‍त हो अस्त न हों

-तो शत्रु सेना पर आक्रमण के लिए जाना पड़े और यश सुख देने वाला जय हो ।

नवम बुध-वर्षश बुध वली हो और पाप रहित होकर वक्री हो और ३-९ स्थान

में हो तो तीर्थ या देव सम्वन्धी यात्रा होवे ।

वैसा बुध वर्षे होकर पाप पीड़ित हो (क्रूर दृष्टि हो) नतो बुरी यात्रा हो ।

नवम वुध-बुध जन्म अधिकारी (छग्नेश) होकर वर्ष में उस राशि में हो जि

"में जन्म का शनि है और पाप युक्त हो तो शत्रु से कलह सम्वन्धीमार्ग चलना हो ।

नवम गुरु-बली वर्पेश गुरु पाप युक्त या दुष्ट रहित ३-९ घर में हो तो धमं

सम्बन्धी यात्रा होती है ।

यदि गुर निर्वेल होकर वर्षेश हो और पाप पीड़ित होकर ३-९ स्थान में हो तो

'कुयात्रा हो ।

अधिकार रहित गुरु नवम में हो तो दूर देश की यात्रा होती है वहाँ राजा से

"मिलन उससे लाभ प्रतिष्ठा होती है '

नवम शुक्र-वर्षेश शुक्र ३-९ घर में पाप रहित हो बलवान हो तो मागे में

सुख हो। यदि शुक्र अस्तंगत, व वक्री होकर ३-९ घर में -हो तो मार्ग गमन ठीक नहीं

होता इच्छा के विरुद्ध गमन हो ।

नवम शनि-यदि अधिकार रहित शनि नवम हो तो अशुभ यात्रा हो ।

शनि पंचाधिकारियों में होकर वषश होकर ३-९ घर में हो तो धर्म की वृद्धि

हो । पाप नाश हो।

शनि-वर्षेश शनि अस्त हो निर्बेल पाप युक्त हो तो पाप करने वाला नास्तिक हो

यदि ऐसा शनि ३ या ९ घर में हो ।

लग्नेश-लग्तेश यदि नवमेश को अपना तेज देता हो अर्थात्‌ लग्नेश शीघ्र गति

चाला अल्प अंश में हो और नवमेश मन्द गतिवाला अधिक अंश में हो और दोनों

दीप्रांश के भीतर हों तो पूर्व निश्चित यात्रा होवे ।

यदि लग्नेश वर्षेश का इत्यश्ञाल होता हो या वषं लग्नेश और मुन्थेश का

इत्यशाल हो तो भी उपरोक्त फल हो ।

सब योगों में लग्नेश और नवमेश का इत्थशाळ होता हो तो अकस्मात्‌ गमन

हो जहाँ संभावना न हो वहाँ जाता पड़े ।

वर्षेश-कोई बली ग्रह वर्षेश पंच अधिकारियों में कोई अधिकार प्राप्त होकर

१९२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

केन्द्र में हो पाप युक्त दृष्ट नं हो अधिकार मिलने से परदेश में गमन होवे या सेनाः अध्यक्ष के पद पर होकर जाना पड़े।'

मुन्था-मुन्था यदि ३-९ घर में हो शुभ में आश्रय से पुण्य का आगम होता है और पाप के आश्रय से पाप का आगम होता है। सूर्य-सूर्य वर्षेश होकर क्षीण बळ पाप युक्त या दुष्ट होकर ३-९ घर में होतो पापकर्ता और धर्म का निन्दक हो ।

गुरु गुरु वर्षेश होकर अधिकारी हो ३-९ स्थान में हो तो अस्त वलहीन हो तो न्याय से धन पाता है ।

गुरु नवम में सौम्य ग्रहों से दृष्ट हो तो अरिष्ट का नाश करता है । ददाम साच में ग्रहों का फल -

दशम में शनि-पशु धन नाशक ।

दशम में सूय मंगल-व्यापार उद्योग को करते है । दशम में शुभ ग्रह-राजसमागम सुख धन व पुत्र का सुख । दशम सूयं-राजा से लाभ, धन की प्राप्ति, सुवर्ण गौ भुमि.वस्त्र का लाभ, कायं सिद्ध हो, मान बढ़े, पशुओं के अंग में रोग वृद्धि । ॥ दशम चन्द्रमा-शत्रु का नाश, प्रतिष्ठा कीति वृद्धि, पुत्र और वस्त्र का लाभ, व्यापार में सुख, रोग नाश, मित्र व स्त्री का सुख, राजा से धन प्राप्ति । दशम मंगल” भाग्य का उदय, धन लाभ, प्रतिष्ठा, मान सुख, राजा की कृपा, व्यापार में लाभ, आरोग्यता, पशुओं की वृद्धि दशम बुध-वाहन का सुख पुत्र वृद्धि, धन लाभ, राजा से जय, भाइयों से सुख, भोग विलास, सत्कार, देह सुख बल कांति वृद्धि । दशम गुरु-राजा की प्रसन्नता, शत्रु नाश, .भूमि गौधन का लाभ, कीति, मान वृद्धि, चित्त में आनन्द, घर में महोत्सव, सुहृद का सुख, कमं का उदय । दशम शुक्र-राजा से मान, सववत्र जय गौ धन धान्य लाभ, खेती तथा वाहन से सुख, शत्रु नाश, कार्य सिद्धि, भाइयों से सुख, व्यापार में लाभ । दशम शनि-खेती से हानि, पशु का भय, अपने जनों में उदरपीड़ा, राजा से भय, स्थान हानि, व्यापार से लाभ, प्रवास, दुःख व्याकुलता, धने हानि । दशम राहु-वाहन नाश, भुमि खेती आदि का नाश, व्यापार से लाभ, अन्यः मत- मंगल कार्य हो, धन लाभ, स्वजनों से वैर । दशम केतु--च्यापार में लाभ, राजा से जय, वाहन की हानि, मंगल कार्यं हो । दशम सूर्य-वर्षेश सुर्यं नीच राशि का पाप युक्त ददाम में हो तो राजा से मृत्यु या बन्धन हो, जिसका जन्म कातिक में हो उसे यह योग हो सकता है। जन्म का सूर्य सिंह राशि में हो और वर्ष में बलवान होकर दशम में हो तो नवीन स्थान प्राप्ति ओर राजा का आश्रय भी होवे । जन्म में सुयं दशमेरा हो (जन्म लग्न वुर्चिक हो) और वषं में दशाम हो और लग्नेश