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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

दिन प्रवेश का संक्षिप्त फल : २१५

अष्टम भाव का नवांशेश अष्टम भावस्थ ग्रह से युबत या दृष्ट हो तो युद्ध में

मरण हो । यदि पाप और शुभ दोनों से युक्त या दृष्ट हो तो मिश्रफल होगा । यदि

पाप ग्रहों से युक्त हो तो सुख हो, शेष वर्ष लर्न के अनुसार समझना ।

दुसरे और बारहवें स्थान में पाप ग्रह हो तो हानि होती है। धन स्थान में शुभ

ग्रह हो तो घन लाभ, व्यय स्थान में शुभ ग्रह हो तो शुभ काम में व्यय होता है ।

यदि लग्न में पाप ग्रहों की कतंरी हो तो रोगादि दुःख हो । शुभ ग्रहों की कर्तरी हो

तो शुभ फल होता है ।

पापग्रह से युक्त दृष्ट क्षीण चन्द्रमा लग्न या अष्टम स्थान में हो तो मरण हो ।

यदि अन्य उत्तम योग हो और आयु हो तो रोग व शत्रु से शस्त्र भय या बन्धन हो।

चन्द्रमा मंगल युक्त ६ या ८ स्थान में हो तो शस्त्र से या पशु व्याघ्रादि से भय

हो । यदि चतुथं स्थान में पाप ग्रह हो तो वाहन से पतन होवे और शरीर में बहुत

पीड़ा हो ।

शुभ ग्रह सप्तम में हो तो जय जुआ में धन लाभ और सुख हो । नवम स्थान

में शुभ ग्रह हो तो धन, ऐश्वयं राज सम्मान और कीति प्राप्त हो, इसके अतिरिक्‍त

भास कुंडली फर देखने की बातें दिन प्रवेश फल में भी विचारना। `

६-०-१२ भाव के स्वामी के सम्बन्ध से भी विचारना कि ये जिस भाव में होंगे

उसकी हानि करेंगे । दिनेश का भावेश से सम्बन्ध और दिन लग्नेश की स्थिति और

दिन लग्नेश का कार्येश से सम्बन्ध पर भी विचारना ।

दिन प्रवेश काल में चन्द्र अवस्था का फल

दिन प्रवेश में चन्द्र जिस प्रकार की अवस्था में होवे उसी अवस्था के तुल्य फल

देता है।

मास प्रवेश में भी इसका विचार करना ।

चन्द्र की अवस्था जानना

चन्द्र स्पष्ट लेकर राशि को छोड़कर केवल अंशादि लेकर २ से गुणा कर ५ का

भाग देना, लब्धि अवस्था गत हुई उसके आगे की वर्तमान अवस्था हुई। उदाहरण￾चन्द्र ४ रा०-८०-५/-६” । यहाँ राशि के ४ छोड़कर शेष अंश ८९-४/-६” 2८ २=१६-

१०-११-४५ लब्धि ३ गत अवस्था हुई चोथी वर्तमान अवस्था हुई। ३०० में १२

अवस्थो तो इष्ट अंश में=१२-+ ३०=६्‌=% २-+ ५ अवस्था के नाम और फल ये हैं ।

नाम फल

(१) प्रवास प्रवास (यात्रा) (७) क्रीड़ित-सुख लाभ

(२) नाश= घन नाश (८) सुप्त-निद्रा, कलह, पीड़ा,

(३) मरण= मृत्यु भय (९) भुक्ति=भय

(४) जय= विजय (१०) ज्वराख्य-संताप

(५) हास्यः स्त्रियों से विलास (११) कंपिता=धनहानि

(६) रति= . प्रसन्नता, स्त्री संग (१२) सुस्िरता=सुख

२१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड

मेष राशि हो तो १ प्रवास से वर्तमान चन्द्रदशा तक गिनना, वृष राशि में

नाश से, मिथुन में मरण से ककं में जय से इसी प्रकार मीन में बारहवीं स्थिर दशा

से गणित से प्राप्त वर्तमान अवस्था की संख्या तक गिनने में जो अवस्था आवे उसे

लेना जैसे वृश्चिक के चन्द्र में ८ के आगे प्राप्त ४ तक गिना तो १५वीं कंपित आई ।

उपरोक्त कर्क के चन्द्र में वर्तमान चौथी अवस्था आई तो ४ जय से आगे गिना

चौथी क्रीडित अवस्था आई । अन्य मत से राशि कोई भी हो गति से जो वर्तमान

संख्या उसे प्रवास से ही गिनकर अवस्था निकालते हैं ।

अध्याय २३

पुन्या का फल विचार

जिस राशि पर मुंथा हो उस राशि का स्वामी मुंयेश कहलाता है। मुथा अपने

स्वामी (मुंथेश) से या शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो सुख होता है । यदि वह शत्रु पाप

अल्प वली ग्रह से दृष्ट हो तो भय और रोग होता है। भाव,दृष्टि और योग विचार

कर फल निर्णय करना ।

वर्ष लग्न से मुन्था ४, ७, ६, ८, १२ स्थानों में अशुभ फल देती है और ९,१०,

११ स्थानों में सुखदायक होती है और १, २, ३, ५, स्थान में उद्यम करने से धन

देती है ।

जो भाव पाप युक्त हो या जिस पर क्रूर ग्रह की शत्रु दृष्टि हो यदि उत भाव में

मुन्था हो तो वह शुभ स्थान गत भी हो तब उस स्थान का शुभ फल नहीं देती परन्तु

अशुभ फल बढ़ाती है ।

जो मुन्था शुभ ग्रह से या मुंथेश से युक्त दृष्ट हो तथा मुन्येश बलवान हो या

शुभ ग्रह या मुन्येश से इत्यशाली हो तो जिस भाव में वह मुन्या है उसके फल को

बढ़ाती है । अशुभ फल नहीं होता । इसके विपरीत हो अर्थात्‌ मुन्येश व शुभ ग्रहों से

युत दृष्ट न हो निबंल हो और पाप ग्रह से मूसरीफ योग करती हो तो उस भाव के

शुभ फल को नाश कर अशुभ फल बढ़ाती है।

जन्म लग्न से ४, ७, ६, ८, १२ स्थान में मुन्या हो पाप ग्रहों से युक्त दृष्ट भी

हो वैसी मुन्या वर्ष छग्न से जिस भाव में पड़े उस भाव के फल को नाश करती है ।

यदि शुभ ग्रह व अपने स्वामी से दृष्ट हो तो हानि नहीं होती शुभ ही' होता है ।

मुन्या जन्म लग्न से तथा वर्ष लग्न से शुभ स्थान में हो पाप युक्त या दृष्ट न

हो तो उस भाव सम्बन्धी शुभ फल बढ़ता है । जैसे जन्म लग्न से और वर्ष लग्न से

मुत्या का फल विचार : २१७

सुन्था पंचम स्थान में शुभग्रह या मुन्येश युक्त दृष्ट हो तो पुत्र वृद्धि करती है

इत्यादि । यदि जन्म तथा वर्ष लग्न से अनिष्ट स्थान में हो तथा पाप युक्त दृष्ट व

पाप से इत्थशाली हो तो उस भाव का फल अवश्य नष्ट होगा ।

जन्म लग्न से ४, ६, ८, १२ दुष्ट भाव में तथा वर्ष में भी अनिष्ट स्थानों में हो

पाप ग्रह युक्त दृष्ट स्वामी के अस्तंगत आदि से निर्बेल हो तो उस भाव को नाश

करती है और अपने स्वामी से युक्त दृष्ट व इत्यश्ाळ से शुभ फलद होती है ।

जन्म लग्न से मुन्था चतुर्थ भाव में शुभग्रह युक्त हों तो पिता को धन भूमि

राभ कराती है ऐसे ही पाप युक्त हो तो राजा से भय और आजीवन अति कष्ट

होवे । ऐसे ही जन्म लग्न से अष्टम में शुभ युक्त हो तो शुभ फल होगा पाप युक्त

होने से अनिष्ट फल देगी । ऐसे ही षष्ठादि स्थानों में भी विचारना ।

वर्ष लग्न में मुन्था स्वस्वामी या शुभग्रह युक्त दृष्ट जिस भाव में हो वह जन्म

सर्न से जो भाग में हो वह उस भाव की वृद्धि करती है। जैसे वर्ष में मुन्या चतुर्थ

में शुभ ग्रह वा स्वामी से युक्त दृष्ट है और जन्म लग्न से गिनने से यह भाव तीसरा

'होता है तो इस वर्ष में भाई के सम्बन्ध में शुभफल होगा । और पाप युक्‍त वा दृष्ट

जिस भाव में हो वह जन्म लग्न से जो भाव हो उसकी हानि होती है । परन्तु वर्षेश

ली तथा शुभ ग्रह हो तो पाप युक्त मुन्या का पूर्वोक्त फल नहीं होगा ।

मुन्थेश और वर्ष लग्नेश दोनों वक्री, नीच या अस्त हों तो उस वर्ष में घन

हानि, मानसिक चिता, सन्तान चिता आदि हो ।

जन्म लग्न से मुन्था ६-८-१२ भाव में हो और वर्ष में भी जिस भाव में हो

उस भाव की हानि होती है जैसे लाभ में हो तो लाभ भाव सम्बन्धी हानि हो ।

मुन्या, वर्ष मुन्थेश, वर्षेश, वर्ष लग्न और वर्ष लग्नेश ये सब पाप ग्रह से दृष्ट

हों तो उस वर्ष बहुत कष्ट हो ।

लग्न में वर्षेश होकर बुध मुंथा के साथ हो तो परीक्षा इण्टरभ्यु आदि में

सफलता हो ।

मुन्येश, वर्षे लग्नेश, वर्षश, और जन्म लग्नेश यदि ये ६-८-१२ में हों या पाप

युक्त या पाप दृष्ट हों तो उस वर्षे बहुत कष्ट हो ।

भाव के अनुसार वर्षे में मुन्या का फल

(१) लग्न में मुन्या--शत्रु का नाश, पुत्र लाभ, राजा की कृपा, सन्मान, प्रताप

की वृद्धि,शरीर पुष्टि, उद्योग से धन और सुख, मन में संतोष, पराक्रम ।

(२) द्वितीय भाव में मुन्या--उद्योग से धन लाभ, राजा का आश्रय, बन्धुओं से

-सन्मान, तेज वृद्धि, शरीर पुष्टि, सुन्दर भोजन, उत्साह, सुयश, तोथंगमन, सुखप्राप्ति

अनिष्ट का नाश हो, शत्रु को संताप हो ।

(२) तृतीय मे--पराक्रम से धन यश सुख लाभ, सहोदर वन्धुओं से सुख, शरीर

पुष्टि, राजा से सहायता मिले, जय प्राप्त हो, देव ब्राह्मण और गो में भक्ति, मनोरथ

पुणं हो ।

२१८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

(४) चतुर्थ में-शरीर पीड़ा, रोग, शत्रु से भय, मन में संताप (अशान्ति):

उद्योग में हीनता, निदा, वन्धुओं से विरोध, भय और दुःख की वृद्धि, राजा से भय,.

प्रतिज्ञा भंग ।

(५) पंचम में--धन लाभ, श्रेष्ठ बुद्धि, पुत्र लाभ, राजा की कृपा, प्रताप की'

वृद्धि, अनक भोग विलास, देव ब्राह्मण का पूजन, शरीर सुख, मन की व्यथा दूर हो,.

शत्रु का अपमान हो ।

(६) षष्ठ में -देह दुर्बल, शत्रु की वृद्धि, रोग हो, चोर व राजा का भय, कार्ये

और धन का नाश, वुद्धि भ्रंश, काय में पछतावा, कुटुम्व से बैर ।

(७) सप्तम में--स्त्री तथा बांधव से दुःख, शत्रु से भय, धन धर्म का नाश,.

उत्साह भंग, रोग और शोक हो, मति भ्रम, विरुद्ध कार्ये की चेष्टा हो, झंझट हो

(=) अष्टम में--शत्रु व चोर का भय, धन और धम का नाश, दुव्येसन , रोगः

हो, बल नाश, विदेश गमन, कलह से व्याकुलता, असंतोष, वर्ष भर अशुभ फल रहे।.

(९) नवम में--धर्म कायों में उत्साह, स्त्री पुत्र का सुख, भाग्योदय, परम यश,.

देव ब्राह्मण की पूजा, राजा से धन लाभ, पद प्राप्ति, कुटुम्बी व मित्रों से हित हो।

(१०) दशम में--राजा की कृपा, कीति विद्या धन की वृद्धि, परोपकार, सत्‌

कर्म की सिद्धि, देव ब्राह्मण की भक्ति, मनोरथ सिद्धि, अच्छी पदवी ।

(११) लाभ में--भाग्योदय, आरोग्यता, चित्त की प्रसन्नता, राजा के आश्रय सेः

धन लाभ, सु मित्र तथा पुत्रों से अभिमत प्राप्ति, मनोंरथ सिद्धि, ऐइवयं बढ़े ।

(१२) व्यय में मुन्था--अघिक खच, शरीर कष्ट, दुष्ट संगति, देह में रोग, घन"

और धर्म की हानि, सज्जनों से भी वर, उद्योग में विफलता, देव पूजा से चित्तः

उच्चाटन, लोगों से विरोध, कुटुम्ब से दुःख ।

वषं में ग्रह अनुसार मुन्था का विशेष फल

(१) सुर्ये-मुन्था सूर्य राशि में या सूर्य युक्त हों या किसी भाव में स्थित सूर्ये

से दृष्ट हो तो राज्य लाभ हो, राजा से मिलाप, गुणों की प्राप्ति हो दुसरे अच्छे.

स्थान की प्राप्ति हो भोग विलास आदि का सुख हो, ऐश्वयं मान वढे, शत्रु से

रहित हो ।

(र) चन्द्र--मुन्था चन्द्र राशि में या चन्द्र युक्त या दुष्ट हो तो धर्म और यश

की वृद्धि, निरोगता, संतोष और बुद्धि की वृद्धि हो । यदि पाप दुष्ट हो तो अत्यन्त

क्लेश होता है ।

(३) मंगल- यदि मंगल युक्त या दुष्ट या मंगल की राशि में हो तो पित्त

प्रकोप बढ़े गरमी का प्रकोप हो, शस्त्र से चोट लगे और. रुधिर पीडा हो, बन्ध्रुओं

और मित्रों में अरुचि, घर और भोजन में सुख न मिले, कुमति बढ़े यदि वंसी मुंथा

शनि से दुष्ट हो या शनि के घर में हो तो उक्त फल विशेष रूप से होता है ।

(४) बुध--यदि बुध युक्त या दुष्ट या बुध की राशि में हो या शुक्र युक्त

दृष्ट या शुक्र की राशि में हो तो स्त्री लाभ, बुद्धि वढे, अधिक यश हो, घर्मे ओर

मुन्या का फल विचार : २१९ -

सुख की वृद्धि हो, सन्मागे द्वारा द्रव्य लाभ, बन्धु मिलन, सत्संग, सत्कथा श्रवण) .

सन्मान बढे । यदि ऐसी मुन्था पर पाप दृष्टि या पाप युक्त हो तो कष्ट होता है ।

(४) गुरु-गुरु से युक्त या दृष्ट या गुरु की राशि में मुन्या हो तो पुत्र व पुत्री `

का सुख हो सुवणं वस्त्र और रतन का लाभ, सुकृत कार्य से मन, बुद्धि और ऐश्वयं

बढ़े । यदि शुभ ग्रह से मुन्था का इत्थशाल होता हो तो राज्य का लाभ होता है ।

(६) शुक्र--शुक्र युक्त यां दृष्ट मुंथा हो तो शत्रु का पराजय, बन्धु सुख, सुन्दर |

स्त्री का सुख, पुत्र सुख, सम्मान बढे, राजा के आश्रय से धन बढ़े 1

(७) शनि--शनि युक्त या दृष्ट या शनि की राश्षि में हो तो वात रोग हो,

अपमान हो, अग्नि भय, धन की हानि हो, मन में दुष्ट विचार, कल्ह से चिन्ता, -

ऐश्वर्य वाले उन्मत्त पुरुष से विभव रहित होवे यदि गुरु से इत्यशाल हो या गुरु कीः

दृष्टि हो तो शुभ फल की प्राप्ति होती है।

(८) राहू--मुंथा राहु के मुख (भोग्यांश) में हो तो धन की प्राप्ति, यश, सुख

और धर्मे वृद्धि हो यदि गुरु या शुक्र से युक्त या दृष्ट हो तो अच्छा स्थान (पद) की `

प्राप्ति होती है, सुवर्ण रत्न तथा वस्त्रों का लाभ होता है।

यदि मुन्था राहु के पृष्ठ (मुक्तांश) में हों तो शुभ फल नहीं मिलता । मुंया राहु

से सप्तम पुच्छ में केतु के साथ हो तो शत्रु से भय और कष्ट हो पदि पाप ग्रह से `

दुष्ट हो तो घर में संचित धन या घर और सम्पत्ति का नाश होता है।

जन्म लग्न से सप्तम स्थान में राहु रहने से धन और सम्पत्ति का नाश होता `

है | सारांश यह है कि जन्म काल में मुंथा जन्म लग्न पर ही रहती है और गत वषं `

तो है ही नहीं । और राहु के सप्तम स्थान में पुच्छ है। यदि लग्न से सप्तम स्थान

में राहु रहे तो सप्तम से सप्तम स्थान लग्न ही पुच्छ होगा । जन्म में वहीं पर सुन्या :

के रहने से उपरोक्त फल होगा ।

राहु के भोग्यांश मुख है भुक्तांश पृष्ठ है । जैसे मान लो राहु स्पष्ट ३-५-१०¬

१५ कर्क राशि का राहु है तो ककं के ५-१०-१५ ये भोग्यांश मुख कहलाये क्योंकि

वक्र गति से राहु चरता है और इन बंशों को ३० में से घटाने पर शेष २४-४९- `

५४ में भुक्तांश (पृष्ठ) हुए । ककं का राहु है तो इससे सप्तम मकर हुई यही राहु.

की पुच्छ हुई । राहु से सप्तम सदा केतु रहता है इससे राहु की पुच्छ केतु ही है ।

मुन्येश फल विचार

धन नाश रोग--मुन्था का स्वामी मुंथेश होता है । यदि मुन्थेश ६-८-१२-४

स्थान में हो.या अस्त हो या पापाक्रान्त राशि (क्रूर ग्रह) से ४ या सातवां हो अर्थात्‌ `

शत्रु दृष्टि हो तो शुभ फल नहीं होता रोगोत्पत्ति और धन नाश भी करता है।

मरण कष्ट--मुन्थेश वपं लग्न से अष्टमेश युक्त हो या क्षुत दृष्टि (१-४-७-

१०) से दुष्ट हो तो शुभ फल नहीं देता यहाँ यदि दोनों योग हों अर्थात्‌ दोनों ग्रह

एक साथ ही किसी राशि में हों तो मरण फल होता है। इसमें भी विचारना कि

यदि ६-८-१२ स्थान में यह योग हो अष्टमेश पाप से युक्त हो तो अवशय मरण हो।-

“२२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

यहाँ अष्टमेश का तथा मुन्येश का जो धातु हो उसके दोष से रोग कहना । एक ही

“योग हो अर्थात्‌ क्षुत दृष्टि से अष्टमेश से मुन्येश देखा जाय तो मरण के समान कष्ट

“होता है।

शुभ अंश फल- जन्म काल में मुन्था या मुन्थेश शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो

"तो पूर्वा में शुभ फल देता है । मुत्या और मुन्थेश दोनों शुभ ग्रह युक्त व दृष्ट हों

  • तो अति शुभ फल वपं के पूर्वाद्ध में देते है तथा वर्ष काल में मुन्या या मुन्थेश शुभ

ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो वर्ष के उत्तराद्ध में शुभ फल देते हैं तथा मुन्था मुन्येश शुभ

ग्रह युक्त दुष्ट हो तो अति शुभ फल वर्ष के उत्तराद्ध में हो। ऐसे ही जन्म में मुन्या

-मुन्थेश में से एक भी पापग्रह युक्त या दृष्ट हो तो वर्ष के पूर्वाद्ध में अशुभ फल

«हो । दोनों पाप युक्त दृष्ट हों तो अति अशुभ । यदि वर्ष में मुन्या मुन्येश में से एक

ग्रह पाप युक्त दृष्ट हो तो वर्ष के उत्तराद्ध में अशुभ फल यदि दोनों में हो तो अति

अशुभ फल हो ।

भय, कष्ट, कलह--मुन्येश द्वादश और अष्टम स्थान में वलहीन हो पाप ग्रह

  • या पाप ग्रह के वर्ग में हो तो उस वर्ष कष्ट, भय, मनुष्यों से विवाद और स्वजनों के

साथ अत्यंत कलह हो ।

मित्रता, श्रेष्ठ बुद्धि-वर्ष में मुन्येश, नवम, लाभ, तृतीय या केन्द्र में हो तो

“राजाओं के साथ मित्रता हो प्रताप बड़े बुद्धि श्रेष्ठ हो ।

सुख--मुन्येश, वर्ष लग्नेश, जन्म ऊग्नेश बलवान्‌ होकर केन्द्र त्रिकोण धन या

“लाभ स्थान में हो तो धन सुवर्ण, वस्त्र आदि की प्राप्ति हो सुख हो ।

सन्मान, धन- मुन्येश या उसका मित्र शुम ग्रह हो और बली होकर मुन्था

को देखता हो तो मनोरथ पूर्ण हो, राजा से सन्मान व धन लाभ हो ।

बल अनुसार फल--शुभ-अशुभ मिश्रित मुंथा का फल मुन्थेश की दशा में

“विचारना । मुन्थेश पूर्ण बली हो तो पूर्ण फल, मध्यम वली से मध्यम और हीन बली

  • से हीन फल अनुमान करना । मुन्था जिस ग्रह से युक्त हो उस ग्रह का वल भी देख

कर फल निर्णय करना ।

कष्ट पीड़ा--मुन्थेश और लग्नेश एक साथ अष्टम में हों तो मरे हुए सदृश कर

१ देता है या कंठावरोध, रक्त विकार या गुह्य न्द्रिय पीड़ा करता है ।

रोग पीड़ा--मुन्थेश अष्टम हो दशमेश नवम पंचम घर में हो तो शरीर पीड़ा

` आतृ कष्ट या गुल्म रोग हो ।

धन सुख, लाभ--मुन्थेश बलवान हो वर्ष छग्नेश या जन्म लग्नेश केन्द्र त्रिकोण

“या धन में हो तो सुख हो धन सुवणं वस्त्र आदि का लाभ हो ।

सुख कीति--मुन्थे केन्द्र त्रिकोण लाभ या धन स्थान में हो तो राज्य सुख,

~कीति बंधु सुत आदि का सुख हो !

रोग से शरीर नष्ट-मुन्थेश अष्टम हो अष्टमेश सूर्यं मंगळ से युक्त हो तो कफ,

शपित्त रोग से शरीर नष्ट हो ।

पमपपदपपउथ रमट डक ६४८:४-५०५२५-०४-बप्फनन- कळ र्‍या रमे

मुन्या का फल विचार : २२१४

निधन--मुन्येश त्रिराशीश जन्म लग्नेश ये अस्त सप्तम में हों वर्षेश नीच का

हो तो उसका निधन हो कोई भी उसकी रक्षा नहीं कर सकता ।

अरिष्ट दूर धन प्राप्ति--मुन्येश निज भाग्य स्थान में हो तथा उच्च में होकर

आवी मित्र से दृष्ट हो तो अरिष्ट नाश होकर धन रत्न सुवर्ण आदि की प्राप्ति

पेट में रोग--ुन्थेश अस्त हो लग्नेश नीच में हो तो उस वर्ष अरिष्ट हो औरः

पेट में रोग हो ।

प्रताप सन्मान--मुन्येश ११-३-१-४-७-१० स्थान में हो तो प्रताप बढ़े राजाः

से सन्मान प्राप्त हो ।

अरिष्ट नाश--मुन्थेश नवम स्थान में हो उच्च में हो शुभ ग्रह या मित्र ग्रह से

दृष्ट हो तो धन वाहन सुवर्ण रत्न आदि प्राप्ति होकर अरिष्ट दूर हो ।

गुल्मादि रोग अरिष्ट--मुन्येश अष्टम हो मुन्या छठे घर में होतो उदर मे

गुल्म आदि रोग हो स्त्री को पीड़ा हो अरिष्ट हो ।

मृत्यु--मुन्येश और लग्नेश ६-८ घर में क्रूर ग्रहों से युक्त हों तो अपनी दशा में _

मृत्यु करते हैं यदि शुभ दृष्टि हो तो आधा फल हो ।

अरिष्ट नाश--मुन्थेश्ष सहज भाव में शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो सप्तम में सूयं

हो तो अरिष्ट नाश हो ।

लाभ--मुन्येश पंचम हो उसका स्वामी नीच का भाग्य स्थान में हो तो बहुत

लाभ हो राजा तुल्य करें। _

अरिष्ट नाश--मुन्येशा केन्द्र मै हो बलवान 'लग्नेदा केन्द्र में हो और वर्षेश सप्तम

हो तो मुंथा कृत अरिष्ट का नाशक हो 9

अरिष्ट नाश--मुन्येश तीसरे घर में जन्म लरनेषा और सौम्य ग्रह से युक्त हो

तो सम्पूर्ण अरिष्ट नाश हो ।

निरोग्यता-मुन्येश दशम में हो सौम्य ग्रह से युक्त दृष्ट हो तो निरोग्यता, अर्थ

की प्राप्ति होकर बाहुबल का प्रताप बड़े।

मास प्रवेश में माब गत सून्या फल

(१) लग्न में मास मुन्या-राजा से घन का लाभ और यश, शरीर सुख, मित्र

का लाभ, स्त्री के साथ विलास सुख, पुत्रों में हर्ष 1

(२) द्वितीय में-राजा से धन लाभ, शत्रु नाश, मित्रों से सुख, मिष्ठान्न भोजन,

०, श्रेष्ठ बुद्धि न

(३) तृतीय में-राजा से धन का लाभ, पराक्रम, बड़ी बुडि, भाई से व स्वजनो

से सुख, अनेक विलास । 9

(४) चतुर्थ में-धन की हानि, खेती की हानि, शत्रु भय, शरीर दुर्बल,

अधिक दुःख । ुँ

(५) पंचम में-पुत्रों से सुख, बुद्धि बढ़ो, कार्यों की सिद्धि, कीर्ति हो, देव ब्राह्मण

में भक्ति ।

२२२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

(६) षप्ठ में-राजा से भय, चोर से धन हानि, वलहीन, पुत्र को कष्ट, कार्य “में शत्रुता बढ़े ।

(७) सप्तम में-स्त्री को कष्ट, शरीर में पीड़ा, धन नाश, शत्रुता बढ़े, मानसिक

चिन्ता ।

(८) अष्टम में-धन हानि, रोग वृद्धि, शत्रुता बढ़े, मित्र चिन्ता, वळ और धन

` से भय।

(९) नवम में-भाग्य की वृद्धि, स्वजनों से सुख, प्रसिद्धि प्राप्त हो, पुत्र आदि की

शक्ति में वृद्धि । है

(१०) दशम में-राजा से मनोरथ सिद्धि, स्त्री का सुख, स्वजनों से सुख,

“शरीर सुन्दर । :

(१०) लाभ में-राजा से धन प्राप्ति, सुवर्ण आभुषण वस्त्र तथा धन का लाभ,

  • देव ब्राह्मण की भक्ति, स्त्री का सुख ।

(१२) व्यय में-मन में व्याकुछता, अति खर्च; राजा और शत्रु से भय, खेती -से व्यय ।

अध्याय २४ .

सहमेश का बल विचार .

जिस स्थान में सहम हो उस राशि का स्वामी सहमेश कहलाता है ।

सहमेश अपने उच्चादि शुभ स्थानों में होकर लग्न को या अपने सहम को देखे *तों सहम बलवान होता है । जो लर्न को न देखे और बल में निर्वल हो वह निर्बल होता है। १ जन्म कालिक सूर्य राशीश, २ जन्म कालिक चन्द्र राशीश, ३ जन्म मास की पूर्ण मासी जिस लग्न में अन्त हो उसका स्वामी, ४ जन्म मास की अमावस्या जिस लग्न में अन्त हो उसका स्वामी इन का बल भी विचारना । जो ग्रह पंचवर्गी बल में ५ से कम बली हो तथा हर्ष स्थान में न हो लग्न को न देखे वह निर्बल होता है। जो त्रैराशिक (द्रेष्काण) मुसल्लह (नवांश) लघु स्थान में भी हो और लग्न को देखे तो भी बली होता है। स्वगृहोच्च-महाअधिकार है । स्व हृद्य मध्यम और स्वद्रेष्काण, स्व नवांश स्वल्प अधिकार हैं । सहम--जो सहम अपने स्वामी जो चाहे शुभ या पाप ग्रह युक्त दृष्ट हो तथा" शुभ ग्रह युक्त व दृष्ट हो तथा सहमेश पूर्वोक्त प्रकार से बली हो तो उस सहम की वृद्धि होती है।

जो सहम शुभ ग्रह तथा अपने स्वामी से युक्त दृष्ट न हो वह सहम निर्वल होता -है। फल देने में उस की सामं नहीं रहती ।

PPPS सय आ. क

सहमेश का बल विचार : २२३

जो सहम वपं लग्न से या अपने स्थान से अष्टमेश से युक्त वा दृष्ट हो और याप ग्रह से युक्त वा दृष्ट हो या पूर्वोक्त अष्टमेश से वा पाप ग्रह से सहमेश इत्यद्षाली' हो तो पूर्वोक्त शुभ फल प्रद लक्षण युक्त भी हो तो भी निवळ समझा जायगा । फल -देने की सामर्थ उसमें नहीं होती । जन्म में प्रथम इसी बल को देख लेना ।

जन्म में सहमों का वलाबल विचार कर वर्ष में भी वल देखना जिसका बल 'अंधिक हो फल देने में समर्थ हो उन्हें ही वर्ष में स्थापना करना । जो फल देने में “समर्थ न हो उसे छोड़ देना ।

सहम फल विचार

(१) पुण्य सहम--पुण्य सहम वलवान हो शुभ ग्रह व स्वस्वामी से युक्त दृष्ट 'हो तो धर्म प्राप्ति और धन का लाभ होता है। इसके विपरीत हो अर्थात्‌ बल रहित हो और पाप युक्त दृष्ट हो तो विपरीत फल हो अर्थात्‌ धन और धमं की हानि होगी ।

पुण्य सहम वर्ष लग्न से ६-८-१२ स्थानों में हो तो धमं भाग्य और यश का “हरण हो । और शुभ ग्रह स्वस्वामी से युक्त दृष्ट हो तो वर्ष के अन्त में सुख धर्म आदि संभव होता है. |

जो पाप आदि युक्त दृष्ट से अशुभ फळ कहा है वह वर्ष के पूर्वाद्ध में होता है । :स्वस्वामी का शुभ युक्त दुष्ट सहम वर्ष के उत्तराद्धं में अर्थात्‌ प्रवेश से ६ मास पश्चात्‌ सोख्य आदि फल देता है । पुण्य आदि सहम पाप युक्त और . शुभ दृष्ट हो तो वर्ष के पूर्वाद्धं में अशुभ उत्तराद्धं में शुभ फल देते हैं। जो शुभ युक्त और पाप दृष्ट हो तो पूर्वाद्धं में शुभ फल उत्तराद्धे में अशुभ फल देते हँ । जो पाप युक्‍त और पाप दृष्ट भी हों तो पूरे वर्ष अशुभ फल होता है । जो शुभ युक्‍त और शुभ दृष्ट भी

'हो तो पूरे वर्ष शुभ ही फल होगा । कर Tn

जिस वर्ष में पुण्य सहम पूर्वोक्त विधि से शुभ हो तो वह समस्त ही शुभ होता “है और सहम अनिष्ट भी हो तो अनिष्ट फल सहसा नहीं दे सकते । जिसमें पुण्य

सहम अशुभ है वह वर्ष अशुभ ही व्यतीत होता है। और सहम शुभ भी हों तो शुभ

"फल नहीं देते । इस कारण जन्म और वर्ष में पुण्य सहम का अवश्य विचार करना ।

जन्म में पुण्य सहम लग्न से ६-८-१२ वाँ हो और वर्ष में पाप युक्त हो और

'सहमेश अस्तगत हो तो धन-धर्म और सुख का नाश करता है।

उक्त प्रकार से सम्पूर्णं सहम जन्म और वर्षे में विचारना चाहिए ।

रोग, शत्रु, काल, मृत्यु सहम पुण्य सहम बलवान होने से धन आदि का लाभ

होता है, परन्तु, रोग, शत्रु, कलि और मृत्यु सहमों का फल विपरीत होता है। ये

अनिष्ट सहम हैं। इनके बलवान होने से अनिष्ट फल अधिक होता है। ये सहम

'निर्बेल हों तो अनिष्ट फल कम होगा तब वर्ष आदि में शुभ फल हो।

कार्यं सिद्धि सहम--शुभ ग्रहों से युक्त दृष्ट हो या शुभ ग्रह से मुन्थशिळकारी

हो तो संग्राम में जय हो शुभ युत दृष्ट और शुभ मुंथशिली भी हो तो विशेषकर जय

२२४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

देता है । यदि शुभ और पाप ग्रहों से युक्त दृष्ट व मुंथशिली हो तो संग्राम में क्लेश से जय देता है । किसी भी कायं सिद्धि का इससे विचारना । ऐसा ही विचार विवाह: आदि सहमों में करना ।

कलि (कलह) सहम-पाप शुभ दोनों से युक्त दृष्ट हो और पाप ग्रह से मुंथेशिलीः हो तो कलह (लड़ाई) में मरण होवे । यदि शुभ ग्रह युक्त दृष्ट हो तो अल्प कलह में ही जय होवे । जब पाप और शुभ ग्रहों की दृष्टि तुल्य हो या दोनों से ही युक्‍त हो तो कलह या व्यथा परिश्रम मात्र ही होती है । परिणाम में जय पराजय कुछ. नहीं होता ।

विवाह सहम--स्वस्वामी या शुभ ग्रह युक्त दृष्ट हो और शुभ ग्रह के साथ इत्थशाल करे तो विवाह संभव होता है । यदि शुभ और पाप ग्रहों से युक्त दृष्ट हो मिश्र ग्रह के साथ इत्थश्षाली हो तो अधिक प्रयास या कष्ट से विवाह संमव होगाः यदि पाप युक्त दृष्ट और मुंथसिली हो तो विवाह नहीं होता । यश सहम--यश सहमेश अष्टम स्थान में हो और पाप युक्त दृष्ट हो तो प्राप्त उत्तम यश का नाश हो ओर स्वतः के किये किसी पातक कर्म में अपयश हो । यश सहमेद्य यदि अष्टम और पाप युक्त या पाप दृष्ट होकर अस्तंगत हो तो अपने वंश की सम्पूर्ण कीति का नाश होता है ।

यश सहमेश शुभ युक्त दृष्ट हो या शुभ ग्रह से मुथणिली हो तो यश की वृद्धि होती है। धर्म वृद्धि, घन लाभ, संग्राम में जय, वाहन और शस्त्र का लाभ हो। यदि यदा सहमेश पापग्रह से मुंथशिली या नष्ट बली हो तो अपयश की वृद्धि और धन का नाश होता है ।

आशा सहम--आशा सहम और उसका स्वामी लग्न से ६-८-१२ घर में नः हो तथा दोनों शुद्ध ग्रह से युक्त या दुष्ट हों तो इच्छानुकूल धन, वस्त्र, वाहुन आदि राभ होता है ओर शस्त्र से भुमि लाभ होता है । दोनों सहम और सहमेश ६-८-१२ स्थान में हों तथा पाप ग्रह युक्त या दृष्ट हों तो अति दुःख हो और वांछित अर्थ का नाश हो ।

रोग सहम--रोग सहमेश्च पाप ग्रह हो और पाप ग्रहों से युक्त दृष्ट हो तो रोग करता है ।

यदि रोग सहमेश अष्टमेश से इत्यशाल करता हो तो मृत्यु हों । इसमें भी हीन बळ हो तो मृत्यु अति कष्ट से होगी । बलवान होने से अल्प कष्ट से मृत्यु हो । माँद्य सहम--रोग सहम यदि अपने स्वामी व शुभ ग्रहों से : युक्त दृष्ट हो ६-८-१२ स्थान में न हो तो रोंग नहीं होता सुखी रहेगा। यदि शुभ और पाप दोनों ग्रहों से युक्त दृष्ट हो तो अल्प रोग भय होगा । सहमेश बली होकर शुभ ग्रह से मुंधशिलकारी हो तो रोग होने का योग होता है परन्तु रोग सहम में उल्टा होता है अर्थात्‌ पूरे तौर से रोग होगा । अर्थ सहंम-अपने स्वामी या शुभ ग्रह से युक्त दुष्ट हो तो द्रव्य की प्राप्ति

क SE iEPO

  • : सहमेश का बल विचार : २२४

होकर सुख देता. है । यदि पापग्रहों से युक्त दृष्ट हो तो द्रव्य का नाश करता! है । यदि शत्रु ग्रह से युत दृष्ट हों तो शत्रु सम्बन्धी कमे से धन नाथ होता है। यदि पाप युक्त भौर शुभ दृष्ट हो और शुभ ग्रह के साथ इत्थदाली भी हो तो पूर्वं संचित धन का नाश करके पुनः अपने पुरुषार्थ से सुख पूर्वक' द्रव्य संचित करता है। केवल पाप युक्त दृष्टि से सवंथा घन नाश करता है । पुत्र सहम---यदि पुत्र सहम अपने स्वामी से या शुभ ग्रह से युक्त दृष्ट हो तो “पुत्र उत्पत्ति और उत्पन्न पुत्रों का सुख होता है । ऐसा ही फल शुभ ग्रह से मुयशिली होने से होता है । पुत्र सहम पाप युक्त और शुभ ग्रह से इत्यशाली हो तो प्रथम पुत्र सम्बन्धी दु ख और पश्चातु पुत्र सुख देता है। पहिले योग फल पीछे दृष्टि फल होता है। पुत्र सहम पाप युक्त दृष्ट हो और पाप ग्रह से इसराफ योग करता हो तथा पुत्र सहमेश निर्बछ अस्तंगत हो तो पुत्र का नाश होता है। ' i जो जन्म लग्न से पंचमेश है, - वह वर्ष में भी पंचमेश या पुत्र. सहमेश हो और शुभ ग्रह, स्वस्वामी, स्वमित्र से युक्त दृष्ट हो तो पुत्र प्राप्ति हो । र पितृ सहम--पितृ सहम शुभ ग्रह वा स्वस्वामी' युक्त दृष्ट और शुभ ग्रह से इत्थशाली हो तो पितृ सम्बन्धी धन वस्त्र मान सुख देता है । नर . यदि पितृ सहमेश अस्त हो निर्बल हो लग्न से अष्टम स्थान में हो, चर राशि में हो पापग्रह से मुशरिफ योग करता हो तो परदेश में जाकर पिता का नादा होता है । स्थिर राशि हो तो स्वदेश में पिता मरे । द : पितृ सहम स्वस्वामी से व शुभ ग्रह से इत्थशाली हो और पाप ग्रह से युक्त भी हो तो वर्ष के पूर्वाद्ध में रोग वृद्धि हो उत्तराद्ध में सुख हो । कल जव पितृ सहमेश पूर्ण बली १५ विश्वा से अधिक बल पाकर शुभ स्थान में ह्‌ तो राजा से मान तथा वंश की वृद्धि हो । र मातृ सहम में भी ऐसा ही: फल विचारना

बन्धन सहम--बन्धन सहम यदि अपने स्वामी का. शुभ ग्रह युक्त दृष्ट हो तो 'बन्धन (कारागार) आदि का भय नहीं होता । यदि बन्धन सहम या उसका स्वामी पाप युक्त दुष्ट हो या पाप ग्रह से इत्यशाल करता हो तो बन्धन होता है। यह फल भी विपरीत जानना ऐसा मतांतर है।

गौरव सहम--गौरव सहम स्वस्वामी या शुभ ग्रह युक्त दुष्ट हो तो सुख मिलता

हैं । राजा से सम्मान यश वस्त्र की प्राप्ति होती हैं। शुभ ग्रह से इत्यशाली भी हो

तो धन, वाहन यश और सुख मिलता है। यदि पाप ग्रह से युक्त दुष्ट या इत्यशाली हो तो पद (अधिकार) तथा घन और सुख नाश करता है ।

जो गौरव सहम शुभ पाप दोनों प्रकार के ग्रहों से युक्त या दुष्ट हो और पाप

ग्रह से इत्यशाली हो तो पूर्वाद्ध में धन तथा मान का नाश करता है.उत्तराद्ध में शुभ

फल देता है । सुख वाहन शस्त्र आदि लाभ हो । जो शुभ पाप ग्रह से युक्त होकर

शुभ ग्रह से इत्थश्चाली हो तो वर्ष के पूर्वाद्ध में शुभ, उत्त राद्धं में अशुभ फल देता है ।

सब ही प्रकार मिश्र हो तो सम्पूर्ण वर्ष में मिश्र फल देता है।

१५

४२६ : सवित्रे ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षे फल खण्ड

"कर्मे सहम--कर्म भाव, कर्म भावेश, कर्म सहम और कमं सहमेश ये चारों स्व

स्वामी, शुभ ग्रह युक्त दुष्ट तथा शुम ग्रह से इत्यशाली हों तो सुवर्ण वाहन भूमि

इन का लाभ देते हैं। १ ॥ ६

यदि पाप युक्त दृष्ट या पापंग्रह से इत्यशाली हों तो उपरोक्त फल का नाश

कर अशुभ फल देते हैं । है ! कहि है

पूर्वोक्त कर्मेभाव कर्मसहमेश पाप युक्त वा दृष्ट या पाप ग्रह से इत्यशाली हो

तो कर्म में. विकलता अर्थात्‌ नष्ट करता है.। यदि शनि से युक्त या दृष्ट हो तो

विशेष करके कर्म का नाश करता है । इसी प्रकार इनके अस्तंगत तथा वक्री होने में

भी ये अशुभ फल देते .हैं।

राज्य सहमेश, कर्म भावेश, राज्य भावेश, कर्म सहमेश यदि पाप ग्रह से

मुंयश्िली .हो क्रूर युक्त दृष्ट हो तो राज्य नाश हो । पाप ग्रह से मुशरीफ हो तो भी

उपरोक्त फल हो सुवर्ण द्रव्य आदि का नाश हो. । ठ :

शुभ पाप के तुल्य़ योग दृष्टि वा मुशरीफ योग हो तो बलाबल विचार कर फल

कहना इसी प्रकार माता आदि सहम का विचार करना ।

सहम फल-सम्पूर्ण सहम शुभ योग या शुभ दृष्टि से सहमेश के बल के अनुसार

शुभ फल देते हैं । 0

दरिद्र, मृत्यु, मांद्य (रोग), कलह या शत्रु सहम ये ४ सहम विपरीत फल देते

हैं अर्थात्‌ ये शुभ युक्त दृष्ट स्वामी बलवान हो तो विशेष अनिष्ट फल देते हैँ । तथा

ये पाप योग दृष्टि तथा सहमेश निर्वेल होने से नाम गुण के विपरीत शुभ फल देते

हैं । अनिष्ट बहुत थोड़ा होता है । इसलिए इन सहमों का उल्टा फल कहा है

जन्म, वर्ष और प्रश्‍न में सहम--जन्मपत्री हो तो जन्म और वर्ष का सहम

विचारंना । जन्मपत्री न हो तो.प्ररन छग्न से सहम का विचार करना । प्रश्न कर्ता

अनेक प्रश्‍न पूछते हैं इसलिए प्रश्‍न काल में भी अभीष्ट सहम का विचार कर फल

. का निर्णय करना । $

सहम के फल का समय जानना

(सहम स्पष्ट-पहमेश स्पष्ट)=राशि के अंस बना लेना (अंश कलादि > सहम

' राशि का स्वोदय)--३००दिन घटी पल प्राप्त दिनादि+ ३० मासादि फल ।

वर्ष प्रवेश सूर्य ‡- मासादि=इतने सूर्य होने पर फळ होगा ।

पुण्य सहम ८-१५०-२४'-२७' '=पुण्य सहम धन राशि पर

सहमेश गुरु ५-२-१८-३० है जिसका स्वोदय ३४० है

शेष=३-१३-५-५७

2८३० सटाणा ९० ।-१३--१०३०-५:-१७'

„° क

॥ 4

« वर्षे में अरिष्ट विचार : २२७

, १०३-५-५७ शेष न - , > ३४७ स्वोदय ६०)१९३८०(३२३ १०२० १७०० २३६० १८० ४ हे ३४०० १७०० १३८ ६०)२०२३(३३ ३५०२० १७०० १९३८०--६७ १२० ` __पृ८० ३३ ३२३ ५० पृ रर २०२३ १०० १८० - ४३ ० ४३

दिन-घ०-प्‌ ० मा०-दि०-घ०-प० ३५०५३-४३-०-- ३००-११६--५०--४४ -:. ३०=९-२६-५०-४४ मान छो वर्ष प्रवेश १०रा-२६०-५३-५९” सूर्यं यहाँ १०4 ९राशि=२०योग अप्राप्त मास द्रिन ९ -२६--५०-४४ +१ १ योग ८ -१३-४४-४३ इसे १२ से अधिक होने से - १२ से घटा कर ८ लिया सूर्य स्पष्ट «रा-१३०-४४-४३ होने पर फल होगा । यदि सहम और सहमेश वरावर हो तो सहमेश की दशा में फल होगा। . ` सहम से फल समय के सम्बन्ध में सर्व सम्मति है कि हीनांश्च पत्यांश क्रम से जब 'सहमेश की दशा हो तव सहम का फल होगा । हे इन दोनों मतों में यह निश्‍चय है कि पूर्वोक्त प्रकार से जो दिन मिले हैं उसके "भीतर यदि सहमेश की दशा हो तो उस दशा में ही. फल हो जायेगा । यदि उन दिनों के वाद दशा हो तो दशा प्रारम्भ दिन से उतने दिनों में फल होगा। : यह्‌ भी कुछ का मत है कि जिस भाव सम्बन्धी सहुम का फल चाहना है उसके 'वूर्वे भाव से उसका अन्तर कर दशाप्रवेश समय का सूयं स्पष्ट जोड़ देने से उसके 'जितने अंश हों उतने दिनों में फल होगा ।

अध्याये २५.

वर्षे में अरिष्ट विचार -

(१) सस्त्राधात विपत्ति मृत्यु--वर्ष लग्नेदा अष्टम हो अष्टमेश लग्न में हो नमंगल' की दृष्टि हो और गुरु, बुध अस्तंगत हों तो किसी शस्त्र के लगने से विपत्ति और मृत्यु हो । मतांतर से इसमें पृथक-पृथक तीन योग हैं ।

(१) वर्ष लग्नेश अष्टम हो मंगल से दृष्ट हो । '

(२) अष्टमेश छूरन में हो मंगल से दृष्ट हो।

७ री

:९२६८::-सचित्रे ज्योतिषः दिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

(३) बुध गुरु अस्तंगत हों तो उपरोक्त तीनों फल हों । ये फल निवंलता के

क्रम से हैं. जैसे प्रथम साधारण बलं में शस्त्राघात, हीन बल में विपत्ति और अति

हीन बल में मृत्यु । ? ;

(२) मृत्यु--वर्ष लग्नेश और अष्टमेश ये दोनों ४, 5, १२ स्थान में हों और:

मुन्था युक्त हों तो अपने धातु के कोप से मृत्यु करते हैं ।

(३) छुष्ठ खोज आदि या मृत्यु--जन्म लग्नेश जन्म तथा वर्ष में निवंछ हो और

वर्षे में अष्टमेदा सप्तम स्थान में हो सूर्य से दृष्ट हो तो मृत्यु व कुष्ठ, खुजली रोग

और आपत्ति देता है ।

मतान्तर-वर्ष में लग्नेश निर्वल हो अष्टमेश लग्न में हो ओर सूर्यं से दृष्ट हो

तो उपरोक्त फल होता है ।

(४) विपत्ति या मृत्यु--वर्षेश के साथ क्रूर ग्रह का मूसरीफ हो और जन्म

लग्नेश क्रूर ग्रह हो (क्षीण चन्द्र को व पाप युक्त बुध को भी क्रूर गिनना) और

चन्द्रमा आदि शुभ ग्रह कम्बूल योग भी करे तो विपत्ति या मृत्यू होवे ।

ऐसे ही जन्म लग्नेश वर्ष लग्नेश मुन्थेश आदि पंचाधिकारियों से भी यही योग

होता है जैसे वर्षेश के अनुसार. मुन्येश आदि क्रूर मूशरफी और सभी शुभ ग्रहों काः

कंबूल योग' होने पर विचारना ।

  • ग) मुत्यु तुल्य कष्ट सवना मानसिक चिता--मुन्येश और लग्नेश अस्तंगतः

हो इन पर शनि की दृष्टि हो तो स्त्री पुत्रादि सवेनाश या मृत्यु तुल्य कष्ट मानसिक

चिता और शरीर पीड़ा आदि से भय होवे ।

मतान्तर--मुन्थेश या वर्षे लग्नेदा अस्त हो शनि से कुत दृष्टि से दृष्ट हो तो

उपरोक्त फल हो । ल

(६) व्यथा, रोग कलह धन हानि-क्रूर ग्रह बलवान होकर ३-६-१ १ स्थानों

में हों और शुभ ग्रह निर्बल होकर ६-५-१२ स्थानों में हों तो मानसिक व्यथा रोंग

भय कलह धन हानि और विपत्ति होवे ।

मतान्तर- क्रूर ग्रह अधिक वळी और शुम ग्रह वलहीन होकर ६-३-१२ भाव

में हों तो उपरोक्त फळ हो ।

(७) सुख नहीं--शुक्र नीच में हो और गुरु शत्रु के नवांश में हो तो उस वर्ष में

बिलकुल सुख न मिले । न ।

(=) मृत्यु- वर्ष लग्नेश अष्टम हो. अष्टमेश लग्न में हो तो मृत्यु हो।

मतान्तर--वर्ष लग्नेश अंष्टंम हो या अष्टम लग्न में हो तों उपरोक्त फल हो ।

(९) धन नष्ट—वर्ष में ९ और २ भाव का स्वामी निर्वेल हो और पाप ग्रह

लग्न में हो तो बहुत दिनों का संचित धन नष्ट हो जावे ।

(१०) वियोग, व्यथा, रोग, मृत्यु--चन्द्र नीच का हो और शुभ ग्रह अस्तंगत हों

स्वजनों से वियोग शरीर पीड़ा वा मृत्यु या मानसी व्यथा व रोग का भय शीघ्र हो ।

(११) कष्ट महारोग--जन्म लग्न या जन्म राशि से वर्ष लग्न अष्टम हो तोः

SR

वर्ष में अरिष्ट विचार : २२९:

महारोग आदि का भय होवे। ऐसे ही अष्टम लग्न पर पाप ग्रह का योग या दृष्टि

हो तो मृत्यु होव । डा

(१२) व्यथा मृत्यु--जन्म में जो ग्रह अष्टम है वही वर्ष में लग्न का हो तो रोग

और मानसी व्यथा हो । यदि चन्द्र और लग्नेश दोनों नष्ट बल हों तो मृत्यु हो ।

(१३) व्यथा मृत्यु--जन्म लग्नेश और वपं लग्नेश भी पाप युक्त होकर अष्टम

स्थान में हो तो रोग और मानसी व्यथा हो और अस्तंगत तथा शुभ दृष्टि रहित भी

हो तो मृत्यु हो ।

(१४) मृत्यु कष्ट--लग्नेश वर्षेश और मुन्था तीनों ४, ६, ८, १२ स्थानों में से

कहीं साथ हो तो मृत्यु तुल्य कष्ट हो यदि इन पर पाप ग्रहों की भुत दृष्टि भी हो

तो अवश्य मृत्यु हो ।

(१५) धन नाश विकलता--शनि के साथ चन्द्र बारहवाँ हो और शुक्र छटा हो

'तो घन नाश हो और शनि शुक्र के साथ किसी पाप ग्रह का ईशराफ योग हो तो

चित्त विकल रहे । इन पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो धननाश और विकलता दोनों

फल हों ।

(१६) त्रिदोप रोग, निरोग--चन्द्रमा अस्तंगत होकर ४, ६, ७, १२ स्थान में

हो तो त्रिदोष विकार से सन्निपात आदि रोग होवें । जो इस पर शनि की दृष्टि हो

तो वह निरोग हो जायगा ।

(१७) मरण सुख--पाप ग्रह से युक्त वर्ष लग्न का हुद्देश और वर्ष लग्नेश ये

यदि ७, ८, १२ घर में हों तो अपनी दशा में मृत्यु देते हँ । इन पर शुभ ग्रह की

दृष्टि हो तो रोग भोग कर परिणाम में सुख होता है ।

(१८) रोग वन्धन--वर्ष लग्न से मार्गी ग्रह बारहवाँ हो ओर वक्री ग्रह द्वितीय

स्थान में हो तो इस कर्तरी नामक योग से रोग होता है।

ऐसे ही जन्म लग्नेश या वर्ष लग्नेश या वर्षेश से कर्तेरी योग हो तो बन्धन हो ।

सप्तम स्थान पर भी कर्तरी योग होने से रोग व दुष्ट उपद्रवों से बन्धन होता है ।

(१९) कार्य नाश--लग्न का त्रिराशि पति नीच राशि में पाप दुष्ट हो तो

इच्छित कार्य का नाश होता है।

(२०) रोग विपत्ति--मुन्थेश तथा वर्षेश छठवाँ या अष्टम हो अस्तंगत हो तो

रोगों से विपत्ति होवे।

(२१) मृत्यु जय-चन्द्रमा वर्ष लग्न से १, ७, ६, ८, १२ वें स्थान में पाप दुष्ट

हो और शुभ दुप्ट न हो तो अरिष्ट या मृत्यु हो । दृष्टि वश से यह फल होगा--

उक्त चन्द्र पर मंगल की दुष्टि--अग्नि या शस्त्र भय। शनि, राहु, केतु से दृष्ट

झो तो शत्रु भय, वात रोग । सूर्य से दृष्ट--दरिद्रता । यदि शुभ ग्रह की विशेष कर

शुरु की दृष्टि भी हो तो उक्त पीड़ा दूर होकर कल्याण देता है ।

(२२) मनोदुःख, मरण--मुन्था पाप ग्रह युक्त हो उस पर शनि की दृष्टि होकर

४, ६, ८, १२ स्थान में हो तो मानसी व्यथा तथा शरीर में रोग हो यही मुन्था जन्म

२२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा; चतुर्थ वर्षफल खण्ड

लर्न से ४, ७, ६, ८, १२ स्थान में हो तथा वर्ष में अष्टम हो या पाप ग्रह से युक्तः

या दुष्ट भी हो तो मृत्यु हो । र

-(२३) त्रिदोंष--चन्द्रमा सूयं के साथ ६-८-१२ भाव में होतो त्रिदोष से अरिष्ट हो ।

(२४) अरिष्ट--बुध ककं में या लग्न से छठे आठवें या चौथे चन्द्रमा से युक्‍त

हो तो आरम्भ से अरिष्ट करता है । ;

(२५) अरिष्ट--लग्नेश और मुन्थेश अष्टम में हो तो अरिष्ट होता है ।

लग्नेश व मुन्येश चन्द्र व लग्न से अष्टम स्थान का स्वामी हो यदि वह

६-८-१२ में हो तो अरिष्ट हो। -

(२६) शस्त्र पीड़ा-छग्नेश ८ स्थान में हो और मंगल से दृष्ट हो और उसके

भाव में स्थित या अस्तंगत बुध व शुक्र हो तो अनेक आपत्ति या शस्त्र से पीड़ा हो ।

कष्ट हों ।

(२५) मृत्यु तुल्य कष्ट-जन्म लग्न से वषं लग्न अष्टम हो और पापयुक्त या' दृष्ट हो तो उस वर्ष में मृत्यु तुल्य कष्ट हो ।

(२९) भय कष्ट-वर्षेद ६-८ स्थान में हो तो महाभय और कष्ट हो ।

(३०) अरिष्ट-पाप ग्रह २-६-८-१२ घर में हो तो अरिष्ट हो । ;

` (३१) युद्ध में अरिष्ट--लग्नेश ६-१२ में हो और चन्द्र सप्तम हो तो युद्ध में

अरिष्ट हो । :

(३२) अकस्मात्‌ कष्ट--मुन्थेश अस्त हो और शत्रुक्षेत्री हो तो अकस्मातुः कष्ट हो ।

(३३) वियोग, कष्ट--चन्द्र नीच का हो बुध शुक्र अस्त हो तो वियोग, कष्ट,-

शरीर में महापीड़ा हो ।

(३४) रोग, शत्रुता--क्रूर ग्रह वक्री हो, अस्त हो या क्रूर ग्रह के वर्ग में लग्नेशः

हो तो रोग हो और शत्रुता हो। अरिष्ट भंग योग 2 (१) अरिष्ट नाश, सुख, धन-वर्ष लग्नेश बलबान हो शुभ ग्रह से युक्त दृष्ट हों तथा केन्द्र और कोण में हो तो अरिष्ट नाश कर सुख और धन देता है।

(२) अरिष्ट, नाश सुख--गुरु केन्द्र या त्रिकोण में शुभ ग्रह से दृष्ट हो पाप ग्रह

की दृष्टि इस पर न हो तो लग्न, चन्द्रमा और मुन्था जन्य अरिष्ट का नाश कर सुख,

देता है। _

` (३) सुख यक्ष धन--चतुथं भाव चतुर्थश्च से युक्त हो और शुभ ग्रह से युक्त : दुष्ट हो तो यश और धन देता है । गुरु छर्न या तृतीय में और जन्म लग्नेश चतुर्थे : में. हो तो सुख पूवंक घन देता है ।

. (४) यश धन-गुरु युक्त सप्तमेदा लग्न में हो शुभ ग्रह या मित्र से युक्त दृष्ट हो”

(२७) हानि कष्ट-छऱ्नेश पापग्रह युक्त हो तो धन की हानि, मरण तुल्य

mine

वर्षे में अरिष्ट विचार : २३१:

पाप दृष्टि न हो तो अरिष्ट नाश धन यद्य सुख देता है और अपनी दशा में राजा की कृपा भी' प्रदान करेगा ।

(५) यश धन--नवमेश और धन भावेश बलवान होकर लग्न में हों पाप ग्रह चे गी हों तो अरिष्ट नाश कर वाहन वस्त्र रत्न से पुर्ण राज्य मिलता है यहां ता है। `

(६) अरिष्ट नाश सुख-पाप ग्रह २-६-११ में हो शुभ ग्रह केन्द्र त्रिकोण में हों तो रत्न वस्त्र सुवणं यश और सुख मिले अरिष्ट नाश होकर शरीर पुष्ट हो । (७) अरिष्ट नाश सुख-मुन्थेश या लग्नेश या अन्म लग्नेदा पुर्ण बली होकर केन्द्र त्रिकोण या ११ या २ स्थानों में कहीं हो तो सुख, धन सुवणं वस्त्र देते हैं। यदि

तीनों ऐसे हों तो विशेष करके उक्त छाभ देते हैं। :

(८) धन छाभ-उच्चका शनि या शुक्र या गुरु हों शुम ग्रह से इत्थशाली हों तो श्रेष्ठ यवन से धन लाभ हो। यवन से ग्रह अनुसार जाति का विचार करना । शनि और शुक्र कृत योग हो तो स्त्री से, गुरु कृत योग हो तो ब्राह्मण से । यदि तीनों उक्त ग्रह उच्च में होकर शुभ इत्थशाली हों तो यवन राजा से बहुत धन मिले गर दूसरों से थोड़ा मिले ।

बलवान मंगल घन स्थान में हो तो यश धन और नेत्र मिले अचानक सुख भी मिले । > ब ३

(९) कल्याण, मंगल-सुर्य गुरु शुक्र परस्पर इत्थशाल करें.तो राज्य यश सुख

और घन मिले तथा सूर्यं वा मंगल मुन्था से उपचय में हों तो अति कल्याण और

मंगल देते हैं। ५

(१०) सुख कीति-बुध शुक्र चंद्र अपनी हुदा में हों और पाप ग्रह ३-११ स्थान

में हों तो वह अपने बाहुबल से सुवणं सुख और कीति देता है।

(११) राज्य यश आदि-बुघ शुक्र का मुशरिफ योग हो और गुरु तृतीय स्थान में हो तो राज्य यश सुवणं रत्न आदि मिळे ।

(१२) वाहन भूमि सुख-मंगल वर्षेश होकर मित्र स्थानी हो और ऐसे ग्रह से

मुत्थशिली हो जो स्वगृही आदि अधिकार पाया हो तथा चन्द्र से कम्बूली भी हो तो

वाहन सुवणं वस्त्र भूमि का लाभ और अधिक सुख होता है । :

विचार-जन्म और वर्षं में योग करने वाले ग्रहों का बलाबल विचार कर योग

या योगभंग का विचार करना अर्थात्‌ योगकर्ता ग्रह पूणं बली हो और उच्च आदिं

पद पाया हो तो शुभ फल प्राप्त होगा नि्वेळ आदि होने से हानि होगी ।

वर्षे में मुन्थेश आदि ग्रह पाप युक्त दृष्ट अस्तंगत नीच गत आदि हो तथा शुभ

ग्रह वल रहित हो तो राज योग होने पर भी योग भंग होगा और हानि होगी ।

` मुन्थेश केन्द्र में हो लग्नेश दशम में बलवान हो दशमेश सप्तम में हो तो मुन्या का किया सम्पूर्ण अरिष्ट दूर हो ।

लग्नेश लग्न में या केन्द्र त्रिकोणं में हो मुन्येश बली हो ओर तो अरिष्ट दुर

होकर सुख, अथं लाभ हो ।

२३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वषं फल खण्ड

: लग्नेश या. वर्षेश केन्द्र त्रिकोण में हो, मुन्थेश बली हो तो अरिष्ट नाश होकर

सुख और अथं लाभ हो ।

लाभेश लग्न में हो. वर्षेश शुभ ग्रह युक्त लाभ में हो या दोनों दक्षम भाव में हों

तो अरिष्ट दूर हो। :

लग्नेश गुर लर्न में हो बलवान लाभेश से दुष्ट हो तो सब अरिष्ट दूर हो ।

` वर्ष में पाप ग्रह लग्न में न हों वा चन्द्र चतुर्थ व लाभ में सोम्य ग्रह युक्त हो

या बली चन्द्र शुभ ग्रह युक्त लग्न या केन्द्र में हो या गुरु या शुक्र सौम्य ग्रह युक्त

हो तो सव अरिष्ट दुर हो ।

: वर्ष में लग्न और दशम का स्वामी एक हो तो सब अरिष्ट दूर हो सुख अर्थ

लाभ वा राजा और मित्रों से यश मिले ।

: लग्न में गुरु मीन का हो पाप युक्त दुष्ट न हो तो सब अरिष्ट दूर हो ।

  • गुरु चन्द्रमा से सप्तम में हो या उससे युक्त हो तो अरिष्ट नाश हो सुख और

अर्थं लाभहो। `

गुरु से नवम चन्द्र हो चन्द्र से पंचम गुरु हो. तो शत्रु और रोग का नाश हो सब

अरिष्ट दूर हो ।

मुन्था से सूर्य या मंगल पंचम स्थान में हो तो आरोग्य हो अरिष्ट नाश हो ।

बुध, गुरु, शुक्र इनमें से कोई एक ग्रह भी केन्द्र में शुभ ग्रह से युक्त हो नीच का

न हो भौर न शत्रु ग्रह के साथ हो तो सब अरिष्ट दूर हो ।

राहु शुभ युक्त या दृष्ट तीसरे या ११ वें स्थान में हो तो लग्न या मुन्था के

अरिष्ट को नाश करता है ।

मुन्था के साथ सूर्य या मंगल हो तो आरोग्यता देता है अरिष्ट नाश करता है ।

. जन्म लग्न स्वामी गुरु युक्त केन्द्र में हो और लाभेश से युक्त या दृष्ट हो तो

सब अरिष्ट नाश हो ।

वर्ष लग्नेश्च बली होकर केन्द्र में हो या.वर्ष और ठग्न का स्वामी उच्च में हो

सोम्य ग्रह केन्द्र या लाभ में हो तो सुख हो सव अरिष्ट दूर हों ।

मंगल युक्‍त चन्द्र उच्च का केन्द्र त्रिकोण या तीसरे घर में हो तो धन लाभ हो

अरिष्ट नाश हो ।

लग्नेश और लाभेश स्वगरही हों या केन्द्र त्रिकोण या लाभ में बलिष्ट हों तो

संब अरिष्ट दूर हों ।

एक ही गुरु, बुध, चन्द्र, शुक्र केन्द्र में शुभ ग्रह युक्त हो नीच का या अस्त न हो

तो सम्पूर्ण अरिष्ट दूर करता है।

अरिष्टं नाश-जिस वर्ष में लरनेश दशमेश एक हो तो सब अरिष्ट दूर हों राज्य

से लाभ और मित्रों से यश प्राप्त हो ।

बलवान गुरु केन्द्र में हो उस पर सौम्य ग्रह की दृष्टि हो तो धन धान्य का लाभ

हो ग्न का किया अरिष्ट दूर हो। _

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वषं में अरिष्ट विचार : २३३

(१) लग्नेश स्वग्रुही होकर लग्न में हो उसका जों उच्च स्थान हो उसका स्वामी

अपने उच्च में बैठकर देखता हो तो राज्य लाभ हो ।

(२) शुभ ग्रह अपने उच्च का हो और लग्न में हो और सव शुभ ग्रहं बलवान

'होकर लाभ या त्रिकोण में हों तो अचानक राज्य लाभ हो यदि ये ग्रह स्वग्रही आदि

हों तो थोड़ी उन्नति होती है ।

(३) लग्नेश स्वगृही लग्न में हो या मंगल उच्च का हो तो राज्य लाभ हो ।

(४) मंगल वलवान धन स्थान में हो तो अचानक अधिक शोयं बढ़े ।

(५) जव मुन्येश लग्नेश या जन्म लग्नेश वली होकर केन्द्र त्रिकोण लाभ या धन

"स्थान में हो तो वस्त्र सुवर्ण और सुख का लाभ हो ।

(६) नवमेश वलवान हो और धनेद शुभ ग्रहों से युक्त हो पाप ग्रहों की दृष्टि न

'हो तो सुवणे और सुख का लाभ हो धमे में रुचि हो धन धारण से युक्त लोगों से प्रीत

'हो लक्ष्मी का भोग करे ।

(७) यदि गुरु केन्द्र लाभ या ३-४-९ स्थान में हो या जन्म लग्नेश स्वगृही हो "तो राज्य लाभ हो ।

(८) जब चन्द्र बुध गुरु शुक्र उच्च में या स्वगृही हों लग्न से केन्द्र लाभ या

तृतीय में हों अपने मित्र से युक्त या दृष्ट हों और वलवान हों तो शत्रु का नाश हो

वाहन रत्न वस्त्र देश का लाभ स्त्री पुत्र से अनेक प्रकार से सुख मिले ।

(९) जब चतुर्थेश थे स्थान में वलवान हो या बलवान शुभ ग्रहों से युक्त या

'दृष्ट हो तो राज्य लाभ दो ।

(१०) केन्द्र में सब शुभ ग्रह हों पाप ग्रह २-६-११ घर में हों और बलवान हों

मतो राज्य लाभ हो ।

(११) जव वृष लग्न में शुक्र, बुध और चन्द्र हों तथा गुर केन्द्र में हो तो राज्य

ऱहाभ हो ।

(१२) मीन लग्न में गुरु या शुक्र हो लाभ में मंगल हो तो राज्य लाभ हो ।

(१३) केन्द्र में बलवान चन्द्र शुभ ग्रहों से युक्त पाप ग्रह से रहित हो अथवा

अकेला हो तो राज्य लाभ हो। परन्तु यदि नीच का अथवा बलहीन चन्द्र हो तो

“राज्य लाभ नहीं होगा ।

(१४) जब चन्द्रमा और लग्नेश दशम घर में हों शुभ ग्रहों से दुष्ट हों तथा शुभ

ग्रह अपने उच्च आदि स्थानों में हों तो निश्‍चय राज्य लाभ हो।

(१५) लग्नेश शुभ ग्रह हो चन्द्र तथा लग्नेश दञ्चम हों ओर बलवान हों ओर

श्शुभ ग्रह से दृष्ट हों तो राज्य लाभ हो ।

(१६) ककं लग्न में गुरु हो दशम में चन्द्र हो इनका इत्यशाल योग हो सूर्ये स्व-

'शुही हो तो राजयोग होता है ।

(१७) दशम में उच्च का सूर्ये हो कर्क लग्न में गुरु हो धन में चन्द्र हो तो राज

योग हो ।

२३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड

(१८) गुर अपना उच्च का हो त्रिराशि पति स्वगृही हो तथा दोनों में परस्पर दृष्टि संबंध हो तो लक्ष्मी तथा पुत्र की प्राप्ति हो।

(१९) मंगल स्वग्रही या उच्च का हो शुभ ग्रह या मित्र से दुष्ट हो तो वाहनः रत्न सुवर्ण आदि से युक्त लक्ष्मी प्राप्त हो । (२०) जब भाग्येश बलवानु हो उच्च का हो गुरु चन्द्र सूर्य से दृष्ट हो तोः भाग्योदय होता है राजा की प्रसन्नता हो, धन-धान्य का लाभ हो । १ (२१) सप्तमेश बलवान होकर लग्न में ही गुरु से युक्‍त या दृष्ट हो तो राज- योग हो । र

(२२) दशमेश शुभ ग्रह हो हर्षवळ पाया हो या अंपने उच्च आदि में हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो, उदित हो, धन त्रिकोण या केन्द्र में हो तथा लग्न में शुभ ग्रह हो तो" राज्य लाभ हो.

(२३) जब शनि बलवान्‌ हो या अपने उंच्च का हो या शुक्र बलवान्‌ हो तो” म्लेच्छ जन के द्वारा राज्य तथा लक्ष्मी प्राप्त हो। (२४) जव निराशीश मंगल स्वगृही या अपने उच्च का होकर लग्न त्रिकोण याः लाभ में हो तो अति सुख प्राप्त होता है । gr (२५) शनि वर्षेश होकर लाभ में हो सूर्य दशम हो चन्द्र से इत्यशाल करे तोः राज योग होता है ।

(२६) राजवंश में उत्पन्न लोगों को उपरोक्त योगों में राज्य लाभ हो सकता है: अन्य को प्रतिष्ठा और धन प्राप्त होगा ।

(२७) जन्म में जिनके स्वगृही या उच्च के उदयी ग्रह हों शत्रु स्थान छोड्करः अन्य स्थान में हों यदि वर्ष में भी वैसे ही पढेँ तो सव मनोरथ सिद्ध हों.! राजयोग भंग

(१) जब नीच के पाप ग्रह हों या अस्तंगत हों तो राजयोग भंग हो । ; (२) जिस वर्ष में ग्रह नीच के हों या शत्रु गृही हों पाप युक्त हों उस वर्षे में राज्य अर्थात्‌ कर्म जीविका की हानि होती है अल्प सुख भी नहीं मिळता । (३) पाप ग्रह अशुभ षड़वगं में हों और शुभ ग्रह बलहीन हों तो कष्ट हो और: राज्य की हानि हो । भाड़ (४) जन्म समय में नीच अस्त आदि जैसा ग्रह हो वैसा ही वर्ष में पड़े तो शुभ फल का नाश होता है । ड्या

(४) दितीयेश बलहीन होकर लग्न में हो उसपर शुभ गुरु की दृष्टि न हो पाप ग्रह से युक्त हो तो संचित द्रव्य का नाश हो । 55 5४ यूह (६) वषेश मुन्येद आदि ग्रह पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हों, अस्तंगत या नीच￾गत हों सौम्य प्रह बलहीन हों तो राजयोग भंग हो धन और सुख का नाश हो । (७) दादक्ष स्थान में चन्द्र हो या चन्द्र के साथ शनि हो शुक्र छठे घर में हो तोः अचानक चित्त में विकलता हो धन आदि सब पदार्थों की हानि हो । प