भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

छोड़ता। सिंह का यह एक गुण अवश्य लेना चाहिए।।16।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के माध्यम से कहा है कि मनुष्य को चाहिए कि वह जो भी कार्य करे उसे पूरी शक्ति और लगन लगाकर करे। पूरा साहस और सामर्थ्य लगा दे। कार्य करते समय इस बात को न देखे कि कार्य बहुत छोटा है, उसे तो बस यूं ही कर लेंगे। यह अवस्था आलस्य की होती है। सिंह को हमला चाहे हाथी पर करना हो या फिर किसी मृग पर वह एक-सी आक्रामक मुद्रा अपनाकर, एक-से साहस और वीरता के साथ हमला करता है। यद्यपि हाथी और मृग पर हमलावर के उद्देश्य अलग-अलग होते हैं। हाथी को बलशाली शत्रु मानकर उसे चोट पहुंचाने के लिए हमला करता है, पर मृग को अपना शिकार समझकर आक्रमण करता है, दोनों में वह एकरसता रखता है। इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः। देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्॥ सफल व्यक्ति वही है जो बगुले के समान अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को संयम में रखकर अपना शिकार करता है। उसी के अनुसार देश, काल और अपनी सामर्थ्य को अच्छी प्रकार से समझकर अपने सभी कार्यों को करना चाहिए। बगुले से यह एक गुण ग्रहण करना चाहिए, अर्थात एकाग्रता के साथ अपना कार्य करें तो सफलता अवश्य प्राप्त होगी, अर्थात कार्य को करते वक्त अपना सारा ध्यान उसी कार्य की ओर लगाना चाहिए, तभी सफलता मिलेगी।।17।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के माध्यम से बताया है कि कार्यसिद्धि करने के लिए जहां एकाग्रचित्तता और 79

संयम की आवश्यकता है, वही उसे इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि समय पर परिस्थितियां उस कार्यसिद्धि के लिए अनुकूल हैं अथवा नहीं। फल प्राप्ति की आशा में ध्यान लगाने से पहले देख लेना चाहिए कि वहां फल की संभावना है भी अथवा नहीं। बगुला वहीं ध्यान लगाकर बैठता है जहां मछली मिलने की आशा होती है, अन्यथा उड़कर दूसरी जगह चला जाता है। सुश्रान्तोऽपि वहेद् भारं शीतोष्णं च न पश्यति। सन्तुष्टश्चरते नित्यं त्रीणि शिक्षेच्च गर्दभात्॥ अत्यंत थक जाने पर भी बोझ को ढोना, ठंडे-गर्म का विचार न करना, सदा संतोषपूर्वक विचरण करना, ये तीन बातें गधे से सीखनी चाहिए॥18॥ बुद्धिमान व्यक्ति को कभी भी अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए। उसे अपने कार्य को बोझ नहीं समझना चाहिए। ऋतुओं के प्रभाव को भी अनदेखा कर देना चाहिए और संतोष के साथ अपने कार्य को करते रहना चाहिए। ये तीन गुण गधे में पाए जाते हैं। प्रत्युत्थानं च युद्धं च संविभागं च बन्धुषु। स्वयमाक्रम्य भुक्तं च शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्॥ ब्रह्ममुहूर्त में जागना, रण में पीछे न हटना, बंधुओं में किसी वस्तु का बराबर भाग करना और स्वयं चढ़ाई करके किसी से अपने भक्ष्य को छीन लेना, ये चारों बातें मुर्गे से सीखनी चाहिए। मुर्गे में ये चारों गुण होते हैं। वह सुबह उठकर बांग देता है। दूसरे मुर्गे से लड़ते हुए पीछे नहीं हटता, वह अपने खाद्य को अपने चूजों के साथ बांटकर खाता है और अपनी मुर्गी को समागम में संतुष्ट रखता है॥19॥ 80 सम्पूर्ण चाणक्य नीति-5

आचार्य चाणक्य के उपरोक्त श्लोक में ठीक समय अर्थात प्रातःकाल जागने का गुण सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। अथर्ववेद में कहा गया है, जैसे उदय होता हुआ सूर्य सोते हुए आलसियों के तेज को हर लेता है उसी प्रकार एक वीर शत्रुओं के तेज और बल को खींच लेता है। सूर्योदय के पश्चात सोने वाले आलसी और निकम्मे हो जाते हैं, उनकी श्री नष्ट हो जाती है अतः सूर्योदय से पूर्व उठना चाहिए, यह मुर्गे का मुख्य गुण है। बंधुओं को उनका भाग देना चाहिए, शत्रु पर आक्रमण के लिए तैयार रहना चाहिए तथा खाने के मामले में भी आलस्य न करना चाहिए ताकि बल बना रहे। गूढ़ं च मैथुन धाष्ट्र्यं काले काले च संग्रहम्। अप्रमत्तमविश्वासं पंच शिक्षेच्च वायसात्॥ मैथुन (स्त्री संभोग) गुप्त स्थान में करना चाहिए, छिपकर चलना चाहिए, समय-समय पर सभी इच्छित वस्तुओं का संग्रह करना चाहिए, सभी कार्यों में सावधानी रखनी चाहिए और किसी का जल्दी विश्वास नहीं करना चाहिए। ये पांच बातें कौवे से सीखनी चाहिए॥20॥ कौआ सदैव एकान्त में ही रति-क्रिया करता है, चालाकी से वह भोजन एकत्र करता रहता है, वह न तो कभी आलस्य और न किसी का विश्वास करता है। बह्वाशी स्वल्पसन्तुष्टः सुनिद्रो लघुचेतनः। स्वामिभक्तश्च शूरश्च षडेते श्वानतो गुणाः॥ बहुत भोजन करने की शक्ति रखने पर भी थोड़े भोजन से ही संतुष्ट हो जाए, अच्छी नींद सोए, परंतु जरा-से खटके पर ही जाग जाए, अपने रक्षक से प्रेम करे और शूरता दिखाए, इन छः गुणों को कुत्ते से सीखना चाहिए॥21॥ 81

मनुष्य सामर्थ्य तो ज्यादा पाने की रखे, किंतु जो मिल जाए उसी पर संतोष कर लेना चाहिए। अच्छी नींद लेनी चाहिए, परंतु सतर्क और चौकन्ना भी रहना चाहिए। अपने मालिक के प्रति स्वामिभक्ति रखनी चाहिए और समय आने पर शूरवीरता दिखाने में पीछे नहीं हटना चाहिए। ये छः गुण कुत्ते में मिल जाते हैं। इसी अध्याय के दूसरे श्लोक में आचार्य चाणक्य ने कुत्ते को नीच जानवर भी कहा है। उन्होंने ऐसा क्यों कहा यह स्पष्ट नहीं है। य एतान् विंशतिगुणानाचरिष्यति मानवः। कार्याऽवस्थासु सर्वासु अजेयः स भविष्यति॥ जो मनुष्य उपरोक्त बीस गुणों को अपने जीवन में उतारकर आचरण करेगा, वह सदैव सभी कार्यों में विजय प्राप्त करेगा॥22॥ इस प्रकार, कोई भी कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे एक बार हाथ में लेने पर इन्द्रियों को पूर्ण नियन्त्रण में रखते हुए पूरा करना चाहिए। यह शिक्षा हमें सिंह और बगुले से मिलती है। हमें किसी भी कार्य को बोझ नहीं समझना चाहिए, सर्दी-गर्मी और वातावरण के विपरीत प्रभाव से नहीं घबराना चाहिए तथा सदैव संतोष रखना चाहिए। ये तीन बातें हमें गधे से सीखनी चाहिए। प्रातःकाल जल्दी उठना, प्रतिद्वन्द्वी से संघर्ष करने के लिए सदैव तत्पर रहना, पास की खाद्य वस्तु को परस्पर बांटकर खाना और रति-क्रिया में अपनी स्त्री को संतुष्ट करना, ये चार बातें मुर्गे से सीखनी चाहिए। एकान्त में मैथुन करना, चतुराई में सबसे आगे रहना, 82

आपातकाल के लिए खाद्य-सामग्री का संग्रह करना, न कभी आलस्य करना और न किसी पर विश्वास करना, ये पांच बातें कौए से सीखनी चाहिए। जो मिल जाए, उसी पर संतोष करना, गहरी नींद लेना, चौकन्ना रहना, जरा-सी आहट होने पर जाग जाना, स्वामी के प्रति भक्ति भाव रखना और समय पड़ने पर शत्रु का डटकर सामना करना, ये छः गुण मनुष्य को कुत्ते से सीखने चाहिए। इन गुणों से वह सदैव विजयी रहता है। 83

॥ अथ सप्तम अध्याय ॥ अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च। वंचनं चाऽपमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत्॥ बुद्धिमान पुरुष धन के नाश को, मन के संताप को, गृहिणी के दोषों को, किसी धूर्त ठग के द्वारा ठगे जाने को और अपमान को किसी से नहीं कहते॥1॥ आचार्य चाणक्य ने यहां मनुष्य की सहनशक्ति की ओर इशारा करते हुए कहा है कि बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो अपने और अपने परिवार के नुकसानों और दोषों को छिपाकर सहन कर लेता है क्योंकि उनका प्रदर्शन करने से केवल जग-हंसाई ही होती है। ऐसी बातों को कभी भी अन्य व्यक्तियों के सामने उजागर नहीं करना चाहिए। धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासंग्रहणेषु च। आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्॥ धन और अन्न के लेन-देन में, विद्या ग्रहण करते समय, भोजन और अन्य व्यवहारों में संकोच न रखने वाला व्यक्ति सुखी रहता है॥2॥ 84 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

आचार्य चाणक्य का मानना है कि कई बार संकोच की प्रवृत्ति के कारण मनुष्य को हानि उठानी पड़ती है। मनुष्य के लिए यह जरूरी है कि किसी भी आर्थिक व्यवहार में उसे लिखा-पढ़ी कर लेनी चाहिए। इसमें उसे जरा भी संकोच नहीं करना चाहिए। इसके अलावा विद्या लेते समय, भोजन करते समय कभी संकोच नहीं करना चाहिए। संतोषाऽमृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्। न च तद् धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥ शान्त चित्त वाले संतोषी व्यक्ति को संतोष रूपी अमृत से जो सुख प्राप्त होता है, वह इधर-उधर भटकने वाले धन लोभियों को नहीं होता॥3॥ आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के संदर्भ में महर्षि पतंजलि के कथन को देखें तो पाते हैं, संतोष से सर्वश्रेष्ठ सुख की प्राप्ति होती है। याचक दीनता प्रकट करता है, धनी गर्व करता है तथा और अधिक की इच्छा करता है, जिसका धन नष्ट हो गया वह शोक करता है, पर जो संतोषी है, वह सुखी है। मनुष्य को चाहिए कि उसको जो प्राप्त है, जिससे उसकी आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है उस पर संतोष करे। कहा गया है, गोधन, गजधन और रतनधन सब धन धूल के समान है। जब संतोष धन इंसान के पास आ जाता है तो वह ध न सभी धन से श्रेष्ठ होता है। संतोषस्त्रिषु कर्त्तव्यः स्वदारे भोजने धने। त्रिषु चैव न कर्त्तव्योऽध्ययने तपंदानयोः॥ अपनी स्त्री, भोजन और धन, इन तीनों में संतोष रखना चाहिए और विद्या अध्ययन, तप और दान करने-कराने में कभी संतोष नहीं करना चाहिए॥4॥ 85

भाग्य से अधिक कुछ नहीं मिलता। भाग्य से ही श्रेष्ठ पत्नी, अच्छा भोजन और विपुल सम्पत्ति प्राप्त होती है। इन्हें जितना और जैसा मिले, उसी पर संतोष करना चाहिए। दूसरी ओर विद्या संग्रह की कोई सीमा नहीं होती। जप और दान करने-कराने से यश प्राप्त होता है। विप्रयोर्विप्रवह्व्योश्च दम्पत्योः स्वामिभृत्ययोः। अंतरेण न गंतव्यं हलस्य वृषभस्य च॥ दो ब्राह्मणों के बीच से, अग्नि और ब्राह्मण के बीच से, पति और पत्नी के बीच से, स्वामी और सेवक के बीच से तथा हल और बैल के बीच से नहीं गुजरना चाहिए॥5॥ जीवन में सजगता बहुत जरूरी है इसीलिए चाणक्य का कहना है कि दो ब्राह्मणों के बीच से गुजरने का अर्थ यही है कि आप उनके वाद-विवाद में विघ्न डाल रहे हैं। अतः कभी उनके बीच से होकर न निकलें। ब्राह्मण और अग्नि के बीच से गुजरने का अर्थ यही है कि आप उनके अग्निहोत्र में विघ्न डाल रहे हैं। पति-पत्नी तथा स्वामी और सेवक के बीच में जब वार्तालाप चल रहा हो, तब बीच से गुजरकर आप उनकी बातों में विघ्न डालते हैं। इसी तरह बैल और हल के बीच से निकलते वक्त चोट लग जाने का भय बना रहता है। अतः इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। पादाभ्यां न स्पृशेदाग्नि गुरुं ब्राह्मणमेव च। नैव गां न कुमारीं च न वृद्धं न शिशुं तथा॥ पैर से अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, गौ, कन्या, वृद्ध और बालक को कभी नहीं छूना चाहिए॥6॥ इन्हें पैर से स्पर्श करने पर पाप लगता है क्योंकि ये 86

सभी आदरणीय हैं, पूजनीय हैं। इनको पैर से छूना इनका अपमान माना जाता है, इनकी उपेक्षा मानी जाती है। शकटं पंचहस्तेन दशहस्तेन वाजिनम्। हस्ती शतहस्तेन देशत्यागेन दुर्जनम्॥ बैलगाड़ी से पांच हाथ, घोड़े से दस हाथ, हाथी से हजार हाथ दूर बचकर रहना चाहिए और दुष्ट पुरुष (दुष्ट राजा) का देश ही छोड़ देना चाहिए॥7॥ गाड़ी में जुते हुए बैल सींग मार सकते हैं, घोड़ा दुलत्ती मार सकता है, हाथी अपनी सूंड में लपेटकर पटक सकता है और दुष्ट राजा तो जीवन ही खत्म कर सकता है। दुष्ट से सदैव बचकर रहना ही उचित है। उसके लिए अगर देश त्यागना पड़े तो वह भी करना चाहिए। जो जितना अधिक दुष्ट है, उससे उसी अनुपात में दूरी रखते हुए जीवन-यापन करना अच्छा होता है। हस्ती अंकुशहस्तेन वाजी हस्तेन ताड्यते। शृंगी लगुडहस्तेन खड्गहस्तेन दुर्जनः॥ हाथी को अंकुश से, घोड़े को चाबुक से, सींग वाले बैल को डंडे से और दुष्ट व्यक्ति को वश में करने के लिए हाथ में तलवार लेना आवश्यक है॥8॥ आचार्य चाणक्य के अनुसार दुष्ट व्यक्ति को आसानी से न तो वश में किया जा सकता है और न उसे सुधारा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति को ठीक करने के लिए कभी-कभी उसे तलवार से मर्मान्तक चोट पहुंचानी पड़ती है। कभी-कभी उसे खत्म भी करना पड़ता है। 87

तुष्यन्ति भोजने विप्रा मयूराः घनगर्जिते। साधवः परसम्पत्तौ खलः परविपत्तिषु॥ ब्राह्मण भोजन से संतुष्ट होते हैं, मोर बादलों के गर्जन से, साधु लोग दूसरों की समृद्धि देखकर और दुष्ट लोग दूसरों पर विपत्ति आई देखकर प्रसन्न होते हैं॥9॥ चाणक्य ने इस श्लोक के माध्यम से एक बार फिर दुष्ट व्यक्ति के स्वभाव की व्याख्या की है। दुष्ट का स्वभाव ऐसा बन चुका होता है कि वह दूसरों को हमेशा विपत्ति में देखकर प्रसन्न होता है। कहा गया है—जैसे सज्जन दूसरों का उपकार करने में प्रसन्न होता है वैसे ही दुर्जन अपकार करने के लिए सदा तैयार रहता है। अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्जनम्। आत्मतुल्यबलं शत्रुं विनयेन बलेन वा॥ अपने से शक्तिशाली शत्रु को विनयपूर्वक उसके अनुसार चलकर, दुर्बल शत्रु पर अपना प्रभाव डालकर और समान बल वाले शत्रु को अपनी शक्ति से या फिर विनम्रता से, जैसा अवसर हो उसी के अनुसार व्यवहार करके अपने वश में करना चाहिए॥10॥ यहां चाणक्य ने शत्रु से व्यवहार करते समय इस बात की ओर इशारा किया है कि शत्रु से व्यवहार करने से पूर्व उसकी शक्ति और सामर्थ्य का पूर्वानुमान लगा लेना चाहिए। बाहुवीर्य बल राज्ञो ब्राह्मणो ब्रह्मविद् बली। रूपयौवनमाधुर्यं स्त्रीणां बलमुत्तमम्॥ राजा की शक्ति उसके बाहुबल में, ब्राह्मण की उसके तत्त्वज्ञान में और स्त्रियों की उनके सौंदर्य तथा माधुर्य में होती है।।11।। राजा के बाहुबल और उसकी सेना के द्वारा राजा की 88 CC0. Vashishtha Tripathi Collection Digitized by eGangotri

शक्ति को आंका जाता है, ब्राह्मण की शक्ति को उसकी विद्वता से परखा जाता है और स्त्री को उसके सौंदर्य एवं उसके मधुर-व्यवहार से जांचा जाता है, अर्थात प्रत्येक वस्तु में अपना अलग-अलग गुण होता है, वह गुण उसी को अच्छा लगता है, दूसरे को नहीं। नाऽत्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्। छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः॥ संसार में अत्यंत सरल और सीधा होना भी ठीक नहीं है। वन में जाकर देखो कि सीधे वृक्ष ही काटे जाते हैं और टेढ़े-मेढ़े वृक्षयों ही छोड़ दिए जाते हैं।। 12 ।। आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक में जीवन की सच्चाई की ओर संकेत किया है। सीधापन आदमी की कमजोरी का परिचायक माना जाता है। उसे हर कोई सताने लगता है, परंतु टेढ़े स्वभाव के दुष्ट व्यक्तियों से कोई नहीं उलझता। सभी उनसे बचना चाहते हैं। यत्रोदकं तत्र वसन्ति हंसाः, तथैव शुष्कं परिवर्जयन्ति। न हंसतुल्येन नरेणाभाव्यम्, पुनस्त्यजन्ते पुनराश्रयन्ते॥ जिस सरोवर में जल रहता है, हंस वहीं रहते हैं और सूखे सरोवर को छोड़ देते हैं। पुरुष को ऐसे हंसों के समान नहीं होना चाहिए कि बार-बार स्थान बदलें।। 13 ।। आचार्य चाणक्य का मत है कि मनुष्य के लिए अपना स्वार्थ ही प्रमुख नहीं होना चाहिए। जिस स्थान विशेष से एक बार नाता जोड़ लिया जाए तो उसे कठिनाई आने पर छोड़ना नहीं चाहिए। 89

उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्। तड़ागोदरसंस्थानां परिस्राव इवाम्भसाम्॥ कमाए हुए धन का दान करते रहना ही उसकी रक्षा है। जैसे तालाब के पानी का बहते रहना उत्तम है।।14।। तालाब का पानी एक ही स्थान पर रुका रहेगा तो वह सड़ जाएगा। इसी प्रकार उपार्जित धन में से दान नहीं किया जाएगा तो उसका महत्त्व ही खत्म हो जाएगा। यस्याऽर्थास्तस्य मित्राणि यस्याऽर्थात्तस्य बांधवाः। यस्याऽर्थाः स पुमांल्लोके यस्याऽर्थाः स च जीवति॥ संसार में जिसके पास धन है, उसी के सब मित्र होते हैं, उसी के सब बंधु-बांधव होते हैं, वही श्रेष्ठ पुरुष गिना जाता है और वही ठाठ-बाट से जीता है।।15।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के माध्यम से बताया है कि धन के बिना कोई कार्य नहीं चलता। धन परमात्मा नहीं है, परंतु उसका छोटा भाई अवश्य है। जिसके पास धन है वही कुलीन है, विद्वान है, शास्त्रयज्ञ है, गुणी है, वक्ता है। धन कमाओ मगर ईमानदारी से कमाओ। स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके, चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे। दानप्रसंगो मधुरा च वाणी, देवाऽर्चनम् ब्राह्मणतर्पणं च॥ स्वर्ग से इस लोक में आने पर लोगों में चार लक्षण प्रकट होते हैं—दान देने की प्रवृत्ति, मधुर वाणी, देवताओं का पूजन और ब्राह्मणों को भोजन देकर संतुष्ट करना।।16।। 90

इन चार गुणों द्वारा उनकी दिव्यता का पता चलता है। अपने गुणों से वे पृथ्वी पर स्वर्ग के सभी सुखों का अहसास करा देते हैं। अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी, दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्। नीचप्रसंगः कुलहीनसेवा, चिह्नानि देहे नरकास्थितानाम्॥ अत्यन्त क्रोध करना, कड़वी वाणी बोलना, दरिद्रता और अपने सगे-सम्बन्धियों से वैर-विरोध करना, नीच पुरुषों का संग करना, छोटे कुल के व्यक्ति की नौकरी अथवा सेवा करना—ये छः दुर्गुण ऐसे हैं जिनसे युक्त मनुष्य को पृथ्वीलोक में ही नरक के दुःखों का आभास हो जाता है॥17॥ इस श्लोक का अर्थ यह है कि क्रोध, कड़वी बात, द्वेष, कुसंग, दरिद्रता और नीच व्यक्ति की सेवा दुष्ट लोगों के लक्षण हैं। इन दुर्गुणों के कारण वे यहीं पर नरक के समान यातना भोगते रहते हैं। गम्यते यदि मृगेन्द्र-मंदिरं, लभ्यते करिकपोल मौक्तिकम्। जम्बुकाऽऽलयगते च प्राप्यते, वत्स-पुच्छ-खर-चर्म खंडनम्॥ मनुष्य यदि सिंह की मांद के निकट जाता है तो गजमोती पाता है और सियार की मांद के पास से तो बछड़े की पूंछ और गधे के चमड़े का टुकड़ा ही पाता है॥18॥ भाव यह है कि बड़े लोगों के पास जाने से धन-सम्पत्ति और ऐश्वर्य प्राप्त होता है और छोटे तथा नीच लोगों की संगति करने से सिवाय दुःख के और कुछ भी प्राप्त नहीं होता। शुनः पुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना। न गुह्यगोपने शक्तं न च दंशनिवारणे॥ जिस प्रकार कुत्ते की पूंछ गुप्त स्थानों को ढांप सकने में 91

व्यर्थ है और मच्छरों को काटने से भी नहीं रोक पाती, उसी प्रकार बिना विद्या के मनुष्य जीवन व्यर्थ है।। 19।। जिस प्रकार कुत्ते की पूंछ से न तो उसके गुप्त अंग छिपते हैं और न वह मच्छरों को काटने से रोक सकती है, उसी प्रकार विद्या-विहीन पुरुष मूर्खता के कारण अपनी रक्षा करने में असमर्थ होता है। वह अपना भरण-पोषण भी ठीक से नहीं कर पाता। वाचः शौचं च मनसः शौचमिन्द्रयनिग्रहः। सर्वभूते दया शौचं एतच्छौचं पराऽर्थिनाम्॥ बोलचाल अथवा वाणी में पवित्रता, मन की स्वच्छता और यहां तक कि इन्द्रियों को वश में रखकर पवित्र रहने का भी कोई महत्त्व नहीं, जब तक कि मनुष्य के मन में जीवनमात्र के लिए दया की भावना उत्पन्न नहीं होती। सच्चाई यह है कि परोपकार ही सच्ची पवित्रता है। बिना परोपकार की भावना के मन, वाणी और इन्द्रियां पवित्र नहीं हो सकतीं। व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने मन में दया और परोपकार की भावना को बढ़ाए॥20॥ आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के द्वारा अनेक पवित्रताओं की बात की है। ब्रह्मचर्य, तप, क्षमा, शराब और मांस का त्याग, मर्यादा के भीतर रहना और मन को वश में करना, ये सारी बातें शौच पवित्रता के लक्षण हैं। पुष्पे गंध तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्। इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽऽत्मानं विवेकतः॥ जिस प्रकार फूल में गंध, तिलों में तेल, लकड़ी में आग, दूध में घी, गन्ने में मिठास आदि दिखाई न देने पर भी विद्यमान रहते 92 CC0. Vasistha Tripathi Collection Digitized by eGangotri

हैं, उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में दिखाई न देने वाली आत्मा निवास करती है। यह रहस्य ऐसा है कि इसे विवेक से ही समझा जा सकता है॥21॥ मनुष्य को चाहिए कि वह इस रहस्य को समझने का प्रयास करे कि वह शरीर न होकर आत्मा है। आत्मारूपी तत्त्व इस देह में उसी प्रकार विद्यमान रहता है, जिस प्रकार फूलों में गंध, तिलों में तेल और लकड़ी में अग्नि तथा गन्ने में मिठास और दूध में घी विद्यमान होने पर भी दिखाई नहीं देते। 93

॥ अथ अष्टम अध्याय ॥ अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः। उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्॥ निकृष्ट लोग धन की कामना करते हैं, मध्यम लोग धन और यश दोनों चाहते हैं और उत्तम लोग केवल यश ही चाहते हैं क्योंकि मान-सम्मान सभी प्रकार के धनों में श्रेष्ठ है।। 1 ।। जिस जीवन में मनुष्य को मान-सम्मान नहीं मिलता, वह जीवन धन से भरपूर होने पर भी व्यर्थ है। धन नष्ट हो जाता है, परंतु आदमी का यश उसके मरने के बाद भी अमर रहता है। इक्षुरापः पयो मूलं ताम्बूलं फलमौषधम्। भक्षयित्वापि कर्तव्याः स्नानदानाऽऽदिका क्रियाः॥ ईख, जल, दूध, मूल (कन्द), पान, फल और दवा आदि का सेवन करके भी, स्नान-दान आदि क्रियाएं की जा सकती हैं।।2।। भाव यह है कि यदि रोगी व्यक्ति औषधि, जल, दूध, फल आदि लेने के उपरान्त कर्मकांड करता है तो वह पाप कर्म का भागी नहीं होता। 94 CC0. Vasistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

दीपो भक्ष्यते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते। यदन्नं भक्ष्यते नित्यं जायते तादृशी प्रजा॥ जैसे दीपक का प्रकाश अंधकार को खा जाता है और कालिख को पैदा करता है, उसी तरह मनुष्य सदैव जैसा अन्न खाता है, वैसी ही उसकी संतान होती है॥3॥ यदि मनुष्य गलत तरीकों से कमाए धन का अन्न खाता है तो उसकी संतान भी उसी तरह के गलत कार्यों में लग जाएगी और यदि आदमी ईमानदारी से कमाए अन्न को खाता है तो उसकी संतान भी ईमानदार होगी इसलिए परिश्रम और ईमानदारी से प्राप्त अन्न खाना ही श्रेष्ठ है। वित्तं देहि गुणान्वितेषु मतिमन्नान्यत्र देहि क्वचित्, प्राप्तं वारिनिधेर्जलं घनमुखे माधुर्ययुक्तं सदा। जीवान् स्थावरजंगमांश्च सकलान् संजीव्य भूमण्डलम्, भूयः पश्य तदेव कोटिगुणितं गच्छन्तमम्भोनिधिम्॥ हे बुद्धिमान पुरुष! धन गुणवानों को दे, अन्य को नहीं। देखो, समुद्र का जल मेघों के मुंह में जाकर सदैव मीठा हो जाता है और पृथ्वी के चर-अचर जीवों को जीवनदान देकर कई करोड़ गुना होकर फिर से समुद्र में चला जाता है॥4॥ दान की महिमा अपरम्पार है, परंतु दान उसे ही देना चाहिए जो सुपात्र हो। सुपात्र के पास जाने से दान दी गई वस्तु अथवा धन का समुचित उपयोग होता है। दुष्ट के पास जाकर दान की गई वस्तु का उपयोग स्वार्थ से प्रेरित होकर ही हो पाता है। मेघों के पास जाकर समुद्र का खारा पानी मीठा हो जाता है और करोड़ों जीवों की प्यास बुझाकर फिर से सागर में जा मिलता है। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि उचित व्यक्ति को दिया गया दान ही अच्छा होता है। 95

चाण्डालानां सहस्रे च सूरिभिस्तत्त्वदर्शिभिः। एको हि यवनः प्रोक्तो न नीचो यवनात्परः॥ तत्त्वदर्शी मुनियों ने कहा है कि हजारों चांडालों के बराबर एक यवन (म्लेच्छ) होता है। यवन से बढ़कर कोई नीच नहीं है॥5॥ यहां तात्कालिक यवन आक्रमणकारियों से त्रस्त भारत-भूमि की दारुण दशा देखकर ही आचार्य चाणक्य ने यवनों को चांडाल कहा है। यहां यवनों को आप अधर्मी भी कह सकते हैं, जिनकी हिन्दू धर्म में आस्था नहीं है। तैलाभ्यंगे चिताधूमे मैथुने क्षौरकर्मणि। तावद्भवति चांडालो यावत् स्नानं न चाऽऽचरेत॥ (शरीर में) तेल लगाने पर, चिता का धुआं लगने पर, स्त्री-संभोग करने पर, बाल कटवाने पर, मनुष्य तब तक चांडाल, अर्थात अशुद्ध ही रहता है, जब तक वह स्नान नहीं कर लेता॥6॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से सांसारिक रीति-नीति की जानकारी दी है। श्मशान भूमि से चिता का धुआं लगने पर तथा संभोग करने के बाद स्नान की बात तो सभी की जानकारी में है पर तेल मालिश या हजामत बनवाने के बाद स्नान करने का कार्य इतना महत्त्वपूर्ण है यह कम लोग ही जानते हैं। अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम्। भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषं प्रदम्॥ अपच होने पर पानी दवा है, पचने पर बल देने वाला है, भोजन के समय थोड़ा-थोड़ा जल अमृत के समान है और भोजन के अंत में जहर के समान फल देता है॥7॥ 96 सम्पूर्ण चाणक्य नीति—6

आचार्य चाणक्य ने आयुर्वेदिक चिकित्सा का भी जगह-जगह अच्छा वर्णन किया है। इससे पता चलता है कि उन्हें आयुर्वेद का अच्छा ज्ञान था। हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः। हतं निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः॥ बिना क्रिया के ज्ञान व्यर्थ है, ज्ञानहीन मनुष्य मृतक के समान है, सेनापति के बिना सेना नष्ट हो जाती है और पति के बिना स्त्रियां पतित हो जाती हैं, अर्थात पति के बिना उनका जीवन व्यर्थ है॥8॥ यदि पढ़ा-लिखा व्यक्ति विद्या को व्यवहार में नहीं लाता तो उसका विद्या प्राप्त करना व्यर्थ है। इसी तरह अज्ञानी व्यक्ति के जीवन को भी व्यर्थ कहा गया है। भले-बुरे की समझ तो समझदार अर्थात ज्ञानी व्यक्ति को ही हो सकती है परंतु मूर्ख व्यक्ति को जब इसका ज्ञान ही नहीं तो वह भला किसका हित कर सकता है। सेनापति के अभाव में सेना दिग्भ्रमित होकर नष्ट हो जाती है और जिस स्त्री के सिर पर पति का साया न हो, उसकी रक्षा भला कौन करता है। सभी उसे पतन की ओर धकेलते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि आचरण के बिना ज्ञान व्यर्थ है तथा पति के बिना स्त्री का कोई अस्तित्व नहीं होता। वृद्धकाले मृता भार्या बंधुहस्ते गतं धनम्। भोजनं च पराधीनं तिस्रः पुंसां विडम्बना॥ बुढ़ापे में स्त्री का मर जाना, बंधु के हाथों में धन का चला जाना और दूसरे के आसरे पर भोजन का प्राप्त होना, ये तीनों ही स्थितियां पुरुषों के लिए दुःखदायी हैं॥9॥ वृद्धावस्था में पत्नी ही सबसे बड़ा सहारा होती है और बचाकर रखा हुआ धन ही काम आता है। इससे आदमी भोजन के 97

लिए पराधीन नहीं होता। अतः पत्नी भी यदि साथ छोड़ जाए तो बुढ़ापे के लिए थोड़ा धन बचाकर जरूर रखना चाहिए। नाग्निहोत्रं विना वेदा न च दानं विना क्रिया। न भावेन विना सिद्धिस्तस्माद् भावो हि कारणम्॥ यज्ञ न करने वाले का वेद पढ़ना व्यर्थ है। बिना दान के यज्ञ करना व्यर्थ है। बिना भाव के सिद्धि नहीं होती इसलिए भाव अर्थात प्रेम ही सब में प्रधान है॥10॥ भाव के बिना कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं होता। अतः सभी कार्यों में आस्था जरूरी है। काष्ठपाषाणधातूनां कृत्वा भावेन सेवनम्। श्रद्धया च तयां सिद्धिस्तस्य विष्णोः प्रसीदति॥ लकड़ी, पत्थर और धातु-सोना, चांदी, तांबा, पीतल आदि की बनी देवमूर्ति में देव-भावना अर्थात देवता को साक्षात रूप से विद्यमान समझकर ही श्रद्धासहित उसकी पूजा-अर्चना करनी चाहिए। जो मनुष्य जिस भाव से मूर्ति का पूजन करता है, श्री विष्णुनारायण की कृपा से उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है॥11॥ सच्ची श्रद्धा ही सच्ची पूजा-अर्चना है। मूर्ति चाहे जिस धातु की भी हो, जो मनुष्य जिस भाव से मूर्ति का पूजन करता है, उस पर ईश्वर उतना ही प्रसन्न होता है। शान्तितुल्यं तपो नास्ति न संतोषात् परंसुखम्। न तृष्णायाः परा व्याधिर्न च धर्मो दयापरः॥ शान्ति के बराबर दूसरा तप नहीं है, संतोष से बढ़कर कोई सुख नहीं है, लालच से बड़ा कोई रोग नहीं है और दया से बड़ा कोई धर्म नहीं है॥12॥ 98 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri