संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
| ४६६ | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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चित्तको ही पापात्मा पुरुष और चित्तको ही जगज्जाल समझिये। यह चित्त ही 'सर्व' — सर्वात्मा कहलाता है। महीपाल ! जैसे वृक्षका बीज वृक्ष ही होता है, उसी तरह मन ही राज्य, देह और आश्रम आदि समस्त वस्तुओंका बीज है। अतः सबके बीजभूत उस मनका परित्याग कर देनेपर सबका त्याग स्वतः ही सिद्ध हो जाता है। भूपते ! उस मनके त्याग-अत्यागपर ही सर्वत्यागका होना-न-होना निर्भर करता है। राजन् ! ये राज्य अथवा कानन आदि सभी वस्तुएँ चित्तयुक्त अर्थात् चित्तके साथ सम्बन्ध रखनेवाले पुरुषके लिये केवल दुःखरूप हैं और जिसका चित्तके साथ सम्बन्धविच्छेद हो गया है, उसके लिये ये ही परम सुखरूप हैं। जैसे बीज समय पाकर वृक्षरूपमें परिणत हो जाता है, वैसे ही यह चित्त ही जगत् एवं देहादि आकार धारण करके सबमें व्याप्त हो रहा है। जैसे वायुसे वृक्ष, भूकम्पसे पर्वत और लोहारसे धौंकनी संचालित होती है, उसी प्रकार इस शरीरका संचालक चित्त है। राजन् ! इस चित्तको आप समस्त प्राणियोंके उपभोगोंका, जरा-मरण और जन्म आदि देहधर्मोंका तथा महामुनियोंके धर्मोंका अटूट खजाना ही समझिये। चित्त ही अपने संकल्पद्वारा जगत् तथा देहादि विविध आकार धारण करके सबमें व्याप्त हो रहा है। महीपते ! इस प्रकार चित्त ही सब कुछ बनता है; अतः उसका त्याग हो जानेपर सारी आधि-व्याधियोंकी सीमाका विनाश करनेवाला सर्वत्याग अपने-आप ही सिद्ध हो जाता है। त्यागके तत्त्ववेत्ताओंमें श्रेष्ठ राजन् ! चित्तत्यागको ही सर्वत्याग कहा जाता है। महाबाहो ! उसके सिद्ध हो जानेपर विज्ञानानन्दघन सत्य वस्तुका अनुभव अपने-आप ही अवश्य हो जाता है। चित्तका अभाव हो जानेपर द्वैत अद्वैत आदि सभी भावनाओंका सर्वथा विनाश हो जाता है और एकमात्र शान्त, निर्मल, अनामय परमपद ही शेष रह जाता है।
चित्तको इस संसाररूपी धानका खेत कहा जाता है। जैसे जल ही तरङ्गरूपसे दीख पड़ता है, वैसे विचित्र चेष्टाओंवाला चित्त ही अपने संकल्पसे भाव और अभावका आकार धारण करनेवाले पदार्थोंके रूपसे परिणत होता है। भूपते ! चित्तविनाशरूपी सर्वत्यागसे सर्वदा सभी वस्तुएँ वैसे ही सुलभ हो जाती हैं, जैसे साम्राज्यकी प्राप्तिसे सांसारिक पदार्थोंका समस्त अभाव मिट जाता है। जैसे राज्यादि समस्त वस्तुओंका त्याग कर देनेपर अकेले आप अवशेष रह गये हैं, वैसे ही सर्वत्याग कर देनेपर एकमात्र विज्ञानात्मा ही अवशिष्ट रह जाता है।
राजन् ! सर्वत्यागरूपी रसका आस्वादन कर लेनेपर जरा-मरण आदि कोई भी भय पुरुषको बाधा नहीं पहुँचा सकता। निर्मल कान्तिवाले महत्त्वकी प्राप्तिका कारण भी सर्वत्याग ही है। अब आप सर्वत्याग करनेके लिये प्रस्तुत हो गये हैं, इसीसे आपको बृहत्तम बुद्धिस्थिरता प्राप्त हो रही है। नरेश्वर ! सर्वत्याग परमानन्दस्वरूप है। इसके अतिरिक्त अन्य सब अत्यन्त भीषण दुःखरूप हैं— यों विचारपूर्वक स्वीकार करके जैसा आप चाहते हों, उसीके अनुसार आचरण कीजिये। सर्वत्याग करनेवाले पुरुषके पास प्रारब्धानुसार सभी वस्तुएँ अपने-आप उपस्थित होती हैं। सर्वत्यागके अन्दर आत्मप्रसादक ज्ञान वर्तमान रहता है। महाराज ! सर्वत्याग सारी सम्पत्तियोंका आश्रयस्थान है, इसीलिये जो कुछ भी ग्रहण नहीं करता, उसे सब कुछ दिया जाता है। भूपते ! सर्वत्याग करके आप शान्त, स्वस्थ, आकाशके समान निर्मल एवं सौम्य आदि जिस रूपमें होना चाहते हैं, उस रूपमें हो जाइये। महीपाल ! पहले आप सारी वस्तुओंका परित्याग कर दीजिये ! तदनन्तर जिस मनसे उनका त्याग किया हैं, उस मनका भी लय कीजिये; फिर त्याग-अभिमानरूपी मलसे भी रहित होकर जीवन्मुक्तस्वरूप हो जाइये।
(सर्ग ९२-९३)
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * चित्तरूपी वृक्षको मूलसहित उखाड़ फेंकनेका उपाय * ४६७
चित्तरूपी वृक्षको मूलसहित उखाड़ फेंकनेका उपाय और अविद्यारूप कारणके अभावसे देह आदि कार्यके अभावका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इस प्रकार चित्तके परित्यागका उपाय कुम्भ ऋषिके बतलानेपर अपने अन्तःकरणमें बार-बार विचार करते हुए वे सौम्य राजा शिखिध्वज यह वचन बोले।
राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! जाल जैसे व्याकुल मछलीको पकड़ लेता है, वैसे ही इस चित्तको पकड़ लेना तो मैं जानता हूँ, परंतु इसका त्याग मैं नहीं जानता। भगवन् ! सबसे पहले तो आप मुझे चित्तका क्या स्वरूप है, यह ठीक-ठीक कहिये। इसके बाद प्रभो ! चित्तके परित्यागकी यथावत् विधि बतलाइये।
कुम्भ बोले—महाराज ! वासनाको ही चित्तका स्वरूप समझिये। उसका त्याग अत्यन्त सुगम और सुखसाध्य है। राज्यकी अपेक्षा उस त्यागमें अधिक आनन्द है और पुष्पकी अपेक्षा वह अधिक सुन्दर है। मूर्खके लिये तो चित्तका परित्याग करना उतना ही दुःसाध्य है, जितना कि पामरके लिये साम्राज्य प्राप्त करना।
राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! आपके वचनसे चित्तका स्वरूप वासनामय है, यह तो जानता हूँ, परंतु उसका परित्याग वज्रको निगल जानेकी अपेक्षा भी अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ। यह चित्त संसाररूपी सुगन्धित पुष्प है, दुःखरूपी दाहजनक अग्नि है तथा शरीररूपी यन्त्रका संचालक है। इसका अनायास त्याग जिस तरह होता हो, वह बतलाइये।
कुम्भ बोले—साधो ! इस चित्तका सर्वथा नाश ही संसारका भी नाश है, वही चित्तका अच्छी प्रकारसे त्याग है—ऐसा दीर्घदर्शी महात्माओंने कहा है।
राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप सिद्धिके लिये मैं चित्त-त्यागकी अपेक्षा तो चित्तका विनाश ही विशेष अच्छा समझता हूँ, परंतु सैकड़ों व्याधियोंके मूल इस चित्तका अभाव कैसे होता है ?
कुम्भ बोले—राजन् ! शाखा, फल और पल्लवोंसे युक्त चित्तरूपी वृक्षका अहंकार ही बीज है। अतः आप उस वृक्षको मूलसहित उखाड़ फेंकिये और अपना हृदय आकाशके सदृश निर्मल बना डालिये।
राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! चित्तका मूल क्या है, अङ्कुर क्या है और इसका कौन-सा खेत है, इसकी शाखाएँ और स्कन्ध कौन हैं तथा यह मूलसहित कैसे उखाड़कर फेंक दिया जाता है ?
कुम्भ बोले—महामते ! यह अहंकार ही इस चित्तरूपी वृक्षका बीज (मूल) है, इसे आप जान लीजिये। परमात्माकी माया ही इस मायामय संसारका खेत है। इसलिये इस चित्तका भी वह परमात्माकी माया ही खेत है। इस प्रथम उत्पन्न मूलसे अज्ञान-देहमें आत्मविषयक निश्चय (बुद्धि) ही इसका अङ्कुर है। जो निराकार निश्चयात्मक समझ है, वही बुद्धि कही जाती है। इस बुद्धि नामक अङ्कुरकी जो सङ्कल्परूप स्थूलता उत्पन्न होती है, उसका चित्त और मन नाम पड़ा हुआ है। ये इन्द्रियाँ ही इस चित्तरूपी वृक्षकी दूरतक फैली हुई लंबी विस्तृत शाखाएँ हैं और जन्म-मरणरूप हजारों अनर्थोंके कारण शुभ और अशुभरूप फलोंसे परिपूर्ण जो तुच्छ विषयभोग हैं, वे इसकी बड़ी-बड़ी अवान्तर शाखाएँ हैं। इस तरहके इस कठिन चित्तरूपी वृक्षकी शाखाओंका (विषयभोगोंमें आसक्तिका) वैराग्यसे प्रतिक्षण छेदन करते हुए आप इसके उदयकारण मूलको उखाड़ फेंक देनेवाले सच्चिदानन्द परमात्माके चिन्तनमें पूर्ण प्रयत्न कीजिये।
राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! विद्वान् पुरुषों
४६८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
शाखा आदिका छेदन करता हुआ मैं उसके मूलको अशेषरूपसे किस तरह उखाड़ फेंकूँ ?
कुम्भ बोले-राजन् ! फल और स्पन्दन आदिसे युक्त विविध वासनाएँ चित्तरूपी वृक्षकी शाखाएँ हैं। तीव्र विवेक-वैराग्यके द्वारा वे वासणारूपी शाखाएँ नष्ट हो जाती हैं; क्योंकि जिसका मन किसी विषयमें आसक्त नहीं है, जो मौनी और तर्क-वितर्कसे रहित है तथा जो न्यायसे प्राप्त हुए कार्यका शीघ्र सम्पादन कर लेता है, उस पुरुषका चित्त नष्ट हो जाता है। जो पुरुष अपने पुरुषार्थसे चित्तरूपी वृक्षकी शाखाओंको काटता रहता है, वह मूलका भी उच्छेद करनेमें समर्थ हो जाता है। चित्तवृक्षकी शाखाओंका छेदन करना तो गौण है और मूलका छेदन करना प्रधान है, इसलिये आप अहंकाररूप मूलका उच्छेद करनेमें तत्पर हो जाइये। महाबुद्धे ! मुख्यरूपसे इस चित्तरूपी वृक्षको मूलसहित जला डालिये। ऐसा करनेपर अचित्तता हो जायगी।
राजा शिखिध्वजने कहा-मुने ! अहंभावात्मक चित्तरूपी वृक्षके बीज (मूल) को जलानेमें कौन-सी अग्नि समर्थ होगी ?
कुम्भ बोले-राजन् ! 'मैं कौन हूँ' इस विषयका विवेक-विचारपूर्वक यथार्थ ज्ञान ही चित्तरूपी वृक्षके मूलको जलानेकी अग्नि कही गयी है।
राजा शिखिध्वजने कहा-मुने ! इस विषयमें मैंने अनेक बार अपनी बुद्धिसे अच्छी तरह विचार कर लिया है--मैं अहंकार नहीं हूँ और न पृथ्वी और उसके अन्तर्गत वनमण्डलादिसे मण्डित जगत् ही हूँ। जड होनेके कारण पर्वतका तट, विपिन, पत्र, स्पन्दन आदि और देहादि मैं नहीं हूँ तथा मांस, हड्डी और रक्त आदि भी मैं नहीं हूँ। मैं न तो कर्मेन्द्रिय हूँ और न ज्ञानेन्द्रिय हूँ। जड होनेके कारण मन-बुद्धि भी मैं नहीं हूँ। जैसे नेत्रदोषसे आकाशमें प्रतीत होनेवाला वृक्ष आकाशसे भिन्न नहीं है; वैसे ही परमात्माके संकल्पसे उत्पन्न होनेवाले सम्पूर्ण पदार्थ परमात्मासे भिन्न नहीं हैं, परमात्माके ही स्वरूप हैं। भगवन् ! इस तरह अहंकाररूपी मलका परिमार्जन जानता हुआ भी मैं अन्तर्यामी परमात्माको नहीं जान सका हूँ। इसलिये मैं रात-दिन चिन्तासे जल रहा हूँ। इस चित्तरूपी वृक्षके बीज अहंकाररूप मलका त्याग करना मैं नहीं जानता हूँ; क्योंकि बार-बार त्याग करनेपर भी मैं उससे छुटकारा नहीं पा सका हूँ। मुने ! शरीर आदिमें अहंताभिमानरूप जो दोष है उसका कारण शरीर आदिका परिज्ञान ही है, यह मैं जानता हूँ। मुनीश्वर ! वह जिस उपायसे शान्त हो जाय, वह उपाय मुझसे कहिये। यह अहंभाव जीवात्माको विषयोंकी ओर आकृष्ट करता है, जिससे दुःख ही प्राप्त होता है। इसलिये उस दुःखकी शान्तिके लिये विषयभोगरूपी दृश्यवर्गका जिस उपायसे अभाव होता हो, वह मुझसे कहिये। मुने ! जिस पदार्थका प्रत्यक्षात्मक कोई एक स्वरूप उपलब्ध हो रहा है, वह असत्-स्वरूप कैसे है ? हाथ, पैर आदिसे संयुक्त तथा क्रिया-फलरूप विलास आदिसे समन्वित हमलोगोंसे सदा अनुभूत होनेवाला यह शरीर मिथ्या कैसे है ?
कुम्भने कहा-भूमिपाल ! इस संसारमें वास्तवमें जिस कार्यका कारण विद्यमान नहीं है, वह कार्य भी अपना अस्तित्व नहीं रखता, फिर उसका ज्ञान तो विभ्रम ही है। बिना कारणके यह शरीररूपी कार्य नहीं रह सकता। जिस द्रव्यका बीज नहीं है, उसकी उत्पत्ति कहाँ कभी होती है ? अर्थात् कभी नहीं। बिना कारणके जो कार्य सामने सत्की भाँति प्रतीत होता है उसे मृगतृष्णाजलके सदृश, देखनेवाले मनुष्यके भ्रमसे उत्पन्न (मिथ्या) समझिये। मिथ्या भ्रमसे विद्यमान शरीर आदिको आप अविद्यमान ही जानिये; क्योंकि अत्यधिक यत्नशील मनुष्यको भी यह मृगतृष्णा-जल प्राप्त नहीं होता। राजन् ! शरीर आदि अस्थिपञ्जररूपी यह कार्य
निर्वाण-प्रकरण पू०] * जगत्के अत्यन्ताभावका, राजा शिखिध्वजको परम शान्तिकी प्राप्तिका वर्णन * ९६९
बिना कारणके ही अनुभूत हो रहा है। इसलिये वास्तवमें किसीसे उत्पन्न न होनेके कारण इसे अविद्यमान ही जानिये।
राजा शिखिध्वज बोले—मुनीश्वर ! हाथ, पैर आदिसे युक्त प्रतिदिन दिखायी देनेवाले इस शरीरका भला पिता कारण कैसे नहीं है ?
कुम्भने कहा—राजन् ! कारणरूप पिताका भी अभाव होनेसे वास्तवमें पिता भी कारण नहीं है। जो पदार्थ असत्से उत्पन्न होता है, वह असत् ही है। कार्यभूत पदार्थोंका कारण बीज कहा जाता है। इसलिये जिस कार्यका कारण नहीं है, वह कार्य भी कारणरूप बीजके अभाव रहनेसे नहीं है। मनुष्यको जो उसका ज्ञान होता है वह तो बिल्कुल विभ्रम है। अवश्य ही जो वस्तु बीजरूप कारणसे रहित है, वह है ही नहीं। अतः उसका जो मनुष्यको ज्ञान होता है, वह नेत्र-दोषसे दीखनेवाले दो चन्द्रमा, मरुभूमिमें जल और गन्धर्वनगरके समान बुद्धिका भ्रम ही है—मिथ्या है।
(सर्ग ९४)
जगत्के अत्यन्ताभावका, राजा शिखिध्वजको परम शान्तिकी प्राप्तिका तथा जाननेयोग्य परमात्माके स्वरूपका प्रतिपादन
राजा शिखिध्वजने पूछा—मुने ! ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब-पर्यन्त जो कुछ यह संसार भासित होता है वह यदि भ्रमरूप ही है तो फिर वह दुःखदायी कैसे है ?
कुम्भ बोले—राजन् ! वास्तवमें पितामहकी भी सत्ता नहीं है, फिर उनके द्वारा निर्मित प्रपञ्चकी सत्ता हो ही कैसे सकती है। जो वस्तु असत् वस्तुसे सिद्ध की जाती हो, वह त्रिकालमें भी सिद्ध नहीं हो सकती। यह जो भूत-सृष्टि दिखायी पड़ती है, वह मृगतृष्णाजलके सदृश मिथ्या ही उदित हुई है, इसलिये शुक्तिसे रजत-ज्ञानके सदृश विचारसे ही उसका विलय हो जाता है। कारणका अस्तित्व न होनेसे कार्यकी सत्ता हो ही नहीं सकती। जो असत् कारणसे असत् कार्यकी उत्पत्ति प्रतीत होती है, उसका स्वरूप मिथ्याज्ञानके अतिरिक्त और कोई दूसरा हो ही नहीं सकता। मिथ्याज्ञानके कारण दिखायी पड़नेवाला पदार्थ किसी कालमें भी अस्तित्व नहीं रख सकता, क्या कहीं किसीने मृगतृष्णा-जलसे घड़े भरे हैं ?
राजा शिखिध्वजने कहा—मुनिवर ! अनन्त, अजन्मा, अव्यक्त, आकाशकी तरह निराकार, अविनाशी, शान्त, परब्रह्म परमात्मा सृष्टिके आदिरचयिता ब्रह्माका कारण क्यों नहीं हैं ?
कुम्भ बोले—राजन् ! वास्तवमें शुद्ध निर्विशेष अद्वितीय ब्रह्म न तो कार्य हैं और न कारण ही हैं; क्योंकि निर्विकार होनेसे उनमें कारणत्व और कार्यत्वका अभाव है। इसलिये वस्तुतः ब्रह्म न कर्ता हैं, न कर्म हैं और न कारण ही हैं। उनका न कोई निमित्त है और न कोई उपादान है। वह तर्कका विषय नहीं हैं, अतः वह अविज्ञेय हैं। जो अनैश्वर्य, अहिंसक, शान्त, विकार-शून्य और कल्याणरूप हैं, उनमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व किस तरह, किसका, जिनसे और किस प्रकार होंगे ? अतः यह जगत् वास्तवमें किसीसे उत्पन्न नहीं है और न इसकी सत्ता ही है। इसलिये आप न कर्ता हैं और न भोक्ता हैं; किन्तु सब कुछ शान्त, अजन्मा, कल्याणमय ब्रह्म ही है। वास्तवमें कारणकी सत्ता ही नहीं है। इसलिये यह जगत् किसीका भी कार्य नहीं है। क्योंकि कारणका स्वरूप न रहनेसे जो कार्यरूप दिखायी देता है, वह केवल भ्रमसे ही है। इसलिये इस रूपमें ही इस सृष्टिका तीनों कालोंमें अत्यन्त अभाव है। यह
४७० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जगत् जब किसी भी कारणका कार्य नहीं है, तब अनायास समस्त पदार्थोंका मिथ्यात्व सिद्ध हो जाता है। पदार्थोंका मिथ्यात्व सिद्ध हो जानेपर फिर ज्ञान किसका और जब ज्ञानका ही अभाव सिद्ध हो गया, तब अहंकारका कोई कारण ही नहीं रहता। इसलिये राजन् ! आप शुद्ध मुक्त ही हैं। फिर बन्धन और मोक्षकी बात ही क्या है !
राजा शिखिध्वजने कहा—भगवन् ! मैं वास्तविक तत्त्वको जान गया। आपने बहुत ही उत्तम और युक्तियुक्त कहा है। मैं यह भी समझ गया कि कारणका अभाव होनेसे ब्रह्म भी जगत्का कर्ता नहीं है। अतः कर्ताके अभावसे जगत्का अभाव है और जगत्के अभावसे पदार्थका अभाव है। इससे उसके बीज चित्त आदिका भी अभाव है और इसीसे अहंता आदिकी भी सत्ता नहीं है। इस प्रकारकी स्थिति होनेपर मैं विशुद्ध ही हूँ, सर्वज्ञ हूँ और कल्याणस्वरूप हूँ; क्योंकि परमात्मासे भिन्न दृश्य विषय कुछ है ही नहीं, यह आपने मुझे समझा दिया। इसलिये सब पदार्थोंका स्वरूप जान लेनेपर 'अहम्' आदिसे लेकर अन्ततक जितने दृश्य पदार्थ हैं, वे सब असद्रूप ही भासते हैं; इसलिये मैं आकाशकी भाँति शान्त हुआ समभावसे नित्य स्थित हूँ। अहो ! देश, काल, कला एवं क्रियाओंमें युक्त यह जो जगत्के पदार्थोंकी नाना दृष्टि थी, वह दीर्घकालके अनन्तर शान्त हो गयी अर्थात् मुझे दृश्य जगत्के अभावका ज्ञान हो गया। अब केवल अविनाशी शान्त ब्रह्म ही स्थित है। अब मैं शान्तिमय मुक्तस्वरूप और परिपूर्ण हूँ। मैं क्रिया, उत्पत्ति और विनाशसे रहित हूँ। मैं अतिशय शुभ, कल्याणस्वरूप विशुद्ध परमात्मस्वरूप हूँ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! राजा शिखिध्वज पूर्वोक्त रीतिसे परब्रह्ममें विश्राम पाकर दो घड़ीतक वायुरहित स्थानमें दीपशिखाकी तरह निश्चल तथा शान्तचित्त हो गये। फिर जब राजा शिखिध्वज निर्विकल्प समाधिमें स्थित थे, तब अपनी सहज लीलामयी वाणीसे कुम्भने उन्हें तत्काल जगाया।
कुम्भने कहा—राजन् ! अब आप अज्ञानरूपी निद्रासे जाग गये हैं और कल्याणरूप होकर स्थित हैं। प्रिय ! जब परमात्माका एक बार स्पष्टरूपसे अनुभव हो जाता है, तब उसके लिये समस्त अनिष्टकारक पदार्थोंका अभाव हो जाता है। अतः अब आप समस्त कल्पनारूपी दोषोंसे रहित हो जीवन्मुक्त बन गये हैं।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जब मुनिश्रेष्ठ उस कुम्भने राजा शिखिध्वजको इस तरह समझाया, तब वे ज्ञानी हो गये और महामोहसे रहित हो शोभा पाने लगे।
(तब) कुम्भने कहा—महाराज ! मैंने पहले जिस आत्मतत्त्वका उपदेश दिया था, उसे ग्रहणकर अज्ञानरूपी आवरणसे मुक्त हो जानेके कारण आप देदीप्यमान होकर खूब शोभा पा रहे हैं। अब आपको जाननेके लिये जो यह कुछ बच गया है, इसे सुनिये। राजन् ! यह जो कुछ भी स्थावर, जङ्गम नानाविध आकार-प्रकारसे भरा हुआ जगत् दिखायी पड़ता है, वह सब कल्पकी समाप्तिमें विनष्ट हो जाता है। तदनन्तर जब महाकल्पकी लीला समाप्त हो जाती है, तब एकमात्र प्रसन्न, गम्भीर, सर्वव्यापक सच्चिदानन्द परमात्मा ही अवशिष्ट रह जाता है। यह परमात्मा केवल चिन्मय, विशुद्ध, शान्त, परम अनन्त, सम्पूर्ण कल्पनाओंसे रहित और परम दिव्य ज्ञानस्वरूप है। वह तर्करहित, अनिज्ञेय, समस्वरूप, कल्याणमय, निन्दारहित, ज्ञानसे परिपूर्ण एवं निर्वाण ब्रह्मस्वरूप है। इसलिये राजन् ! परमात्मासे भिन्न कोई भी दूसरी कल्पना इस संसारमें है ही नहीं। आपको जो निर्मल परमात्मतत्त्व ज्ञात हुआ है, वही परिपूर्ण और अविनाशी ब्रह्म है। सम्पूर्ण आकार-प्रकारोंसे युक्त हो प्रकट हुआ-सा वह सर्वस्वरूप होकर सदा ही स्थिर रहता है। प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * जगत्के अत्यन्ताभावका राजा शिखिध्वजको परम शान्तिकी प्राप्तिका वर्णन * ४७६
अगम्य होनेके कारण वह अनिर्वचनीय, अति उत्तम और विलक्षण पदार्थ है। वह सर्वस्वरूप परमात्मा सबका आत्मा है। वह अति सूक्ष्म, शुद्ध तथा अनुभवस्वरूप है। वह वास्तवमें न कर्ता है, न कर्म है और न कारण ही है। वह सत्-चित्-आनन्दमय परमात्मा अविनाशी, अगम्य तथा स्वयं अनुभवस्वरूप है। यह जगत् यथार्थरूपसे जान लिये जानेपर परम कल्याणकारक हो जाता है; क्योंकि यह परमात्माके संकल्पसे उत्पन्न होनेके कारण परमात्माका स्वरूप ही है। किंतु यदि जगत् यथार्थरूप-से न जाना गया तो वह भयंकर दुःख देनेवाला और अकल्याणकारक होता है। जैसे अग्नि चित्र-विचित्र रूपसे आविर्भूत हुई भी वास्तवमें वह अपने ही स्वरूपसे रहती है, वैसे ही संकल्पसे अन्यान्य रूपोंमें आविर्भूत हुई भी ब्रह्मसत्ता अपने यथार्थ ब्रह्मरूपसे ही स्थित रहती है। वास्तवमें जगत्का कोई भी कारण नहीं है; अतः इसका तीनों कालोंमें अत्यन्त अभाव है। ब्रह्म ही जगत्के रूपमें प्रतीत होता है।
कुम्भने कहा—महाराज ! अपनी ही सत्तामें स्थित ब्रह्म वास्तवमें तो न किसीका उपादान कारण है और न किसीका निमित्त कारण है। वह केवल विशुद्ध अनुभव-रूप है। अनुभवरूप उससे भिन्न दूसरा कुछ भी पदार्थ नहीं है। जो कुछ अहंता आदि जगत् प्रतीत होता है वह भी ब्रह्मका संकल्प होनेके कारण अनन्त ब्रह्मरूप ही है।
राजा शिखिध्वज बोले—मुनिवर ! मैं मानता हूँ कि कल्याणमय परमात्मामें वास्तवमें अहंतादि जगत् नहीं है; परंतु उसमें जो जगत्का ज्ञान होता है, वह किस कारणसे होता है, इसे शीघ्र मुझसे कहिये।
कुम्भने कहा—साधो ! असीम जगत्का विस्तार करनेवाला जो अनादि-अनन्त ब्रह्म है, वही अपने संकल्पसे जगत् और जगत्के ज्ञानके सदृश बनकर अवस्थित है; इसीलिये वही जगत्-रूप कहा जाता है। जिस प्रकार जलमें रस सार वस्तु है, उसी प्रकार सब पदार्थोंकी सार वस्तु परमात्मा ही है। यदि शान्त ब्रह्मरूप पद जगत्का कारण माना जाय तो फिर निष्क्रिय, अगम्य, अतर्क्य आदि शब्दोंसे जो ब्रह्मका वर्णन किया गया है, वह कैसे सिद्ध होगा? इन सब युक्तियोंसे यह निश्चित होता है कि वास्तवमें यह ब्रह्म किसी भी कार्यका न निमित्त कारण है और न उपादान कारण ही है, अतः इस सृष्टिका अस्तित्व किसी कालमें है ही नहीं। चिन्मय परमात्माके अतिरिक्त इस सृष्टिकी दूसरी कोई सत्ता है ही नहीं, जिससे कि उसका वर्णन किया जाय। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि जड़ दृश्य जगत्की सत्ता है ही नहीं। जो भी कुछ यह दीखता है, वह एक मात्र चेतनानन्द-घन ही अपने संकल्पसे स्फुरित हो रहा है। वही अहंभाव, जगत् आदि शब्द और ज्ञानार्थादिरूपोंसे युक्त-सा होकर भासता है। घट, पट आदि नामिक वस्तु चिन्मय नहीं हो सकती, क्योंकि ज्ञानिक वस्तुओंका नाश अवश्यम्भावी है। 'नाते ! यह चेतन है और यह जड़ है'—इस प्रकारका जो कल्पना-दोष है वह केवल चित्तकी चञ्चलता है, वस्तुतः कुछ भी नहीं है। संसारमें केवल चेतनानन्द ब्रह्मकी ही सत्ता है। द्वित्व और एकत्व कुछ नहीं है, केवल कल्पना-मात्र है। राजन् ! इसलिये जब दृश्य पदार्थोंकी सत्ताका अभाव होनेपर उनकी भावनाकी अत्यन्त शून्यता सिद्ध हो जाती है। सम्पूर्ण भावनाओंके शून्यता होनेपर तो आपकी अहम्भावनाका अस्तित्व कैसे सम्भव है ! अहम्भावका अभाव होनेपर फिर दूसरा क्या बचता ही है जिसे कि चित्त कहा जाय। इसलिये चित्त भी ब्रह्मरूप ही है। ब्रह्मसे भिन्न चित्त नामक पदार्थ है ही नहीं और जीव आदिके नामपर भी दृश्यका भेद भी नहीं है। अतः राजन् ! आप निष्काम मनसे युक्त और मौनी हो जाइये ।
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सच्चिदानन्दमय हो जाते हैं। शुद्ध चैतन्यदृष्टिके सम्बन्धसे जड पदार्थकी कदापि सिद्धि न होनेके कारण, जड पदार्थोंकी भावनाका भी अभाव हो जानेसे भावनाजनित जीवरूप नहीं रहता, केवल स्वयं परमात्मा ही रहता है। 'सब ब्रह्मस्वरूप ही है' इत्यादि वेदार्थभावनासे जनित ब्रह्मसाक्षात्कारद्वारा केवल चिन्मय ब्रह्मके ही प्रकाशित हो जानेपर फिर शोक कहाँ ? फिर तो, शोकका अत्यन्त अभाव हो जाता है। समस्त द्वैतका बाध हो जानेपर एक ब्रह्मरूप ही रह जाता है। वह ब्रह्म विशुद्ध, कारणशून्य, शाश्वत एवं आदि और मध्यसे रहित है।
(सर्ग ९५–९७)
चित्त और संसारके अत्यन्त अभावका तथा परमात्माके भावका निरूपण
कुम्भ कहते हैं—राजन् ! चित्त नामका पदार्थ किसी कालमें, किसी देशमें या किसी वस्तुरूपमें कहीं है ही नहीं। यह जो चित्त-सा प्रतीत हो रहा है, वह अविनाशी ब्रह्म ही है। सम्पूर्ण चित्त आदि प्रपञ्च अज्ञानात्मक है, इसलिये उसका अस्तित्व ही नहीं है; क्योंकि जो अज्ञानात्मक वस्तु रहती है, उसका ज्ञानसे बाध हो जाता है। अतः अधिष्ठान ब्रह्ममें अहम्, त्वम्, तत् इत्यादि कल्पनाएँ कैसे रह सकती हैं ? जो कुछ भी यह प्रकट जगत् है, वह कुछ है ही नहीं। सब ब्रह्म ही है; अतः कौन किसको कैसे जाने ? प्राकृत प्रलयके अनन्तर सृष्टिके आरम्भमें जो यह चित्त आदि जगत् उत्पन्न प्रतीत होता है, वह वास्तवमें है ही नहीं। मैंने 'यह चित्त-सा मालूम पड़ता है', इत्यादि रूपसे जो कहीं-कहीं निर्देश किया है, वह केवल आपके बोधके लिये ही किया है। उपादान आदि कारणरूपसे जो प्रसिद्ध हैं, उनका भी अस्तित्व नहीं है और जितने भावरूपसे प्रसिद्ध हैं, उनका भी अस्तित्व नहीं है, इसलिये इस असत् जगत्का ब्रह्म कारण नहीं है; क्योंकि अज्ञानजनित भ्रान्तिरूप ही जगत् है, इसलिये उसकी किसी कालमें सत्ता ही नहीं है। अतः यह जो दिखायी पड़ता है, वह भासनात्मक ब्रह्म ही है, दूसरा नहीं। जो देव नाम और रूपसे रहित है, उस ब्रह्मरूप देवके विषयमें यह कहना कि यह देव इस मिथ्या जगत्का निर्माण करता है, वास्तवमें न तो युक्तिसंगत है, न सत्य है और न अद्वैतवादियोंका वैसा अनुभव ही है। राजन् ! इसी प्रयोगसे चित्तका अस्तित्व नहीं है; क्योंकि जब जगत्का ही अस्तित्व नहीं है, तब जगत्के अन्तर्गत चित्तका अस्तित्व कैसे हो सकता है ? चित्त तो वासनामात्ररूप है। वासना तब होती है, जब कि वासनाका विषय रहे। परंतु वासनाका विषय जो जगत् है, वह तो स्वयं असत् है, अतः चित्तका अस्तित्व ही कहाँ है ? वास्तवमें तो कारणके अभावसे ही यह दृश्य वासनाका विषय जगत् उत्पन्न ही नहीं हुआ है; फिर चित्त आया ही कहाँसे ?
अतः केवल चिन्मय विशुद्ध विज्ञानस्वरूप परमात्मा ही अपने संकल्पसे स्फुरित हो रहा है, इसलिये उससे भिन्न जगत्की सत्ता कहाँसे आयी ? समस्त अनर्थोंको उत्पन्न करनेवाला अहम्, त्वम्, जगत् इत्यादि जो यह अनुभव होता है, वह वास्तविक नहीं है; स्वप्नके सदृश मिथ्या ही है। वासनाके विषय जगत्की असत्ता होनेसे वासनाकी सत्ता नहीं है, इसलिये फिर वासनात्मक चित्त ही कैसा, कहाँ, किससे और किस तरहसे हो सकता है ? जो परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे रहित हैं, वे अज्ञानी ही चित्त और इस दृश्य जगत्को सत्य समझते हैं। वस्तुतः चित्त असत् है, उसका
निर्वाण-प्रकरण पू०] * चित्त और संसारके अत्यन्त अभावका तथा परमात्माके भावका निरूपण * ४३१
कोई आकार नहीं है और न वह उत्पन्न ही हुआ है। क्योंकि लोक, शास्त्र और अनुभवसे दृश्य वस्तुमें अनादिता, अजता और स्थिरता सम्भव नहीं है। जिसकी बुद्धिमें लोक, शास्त्र और वेद प्रमाण नहीं है, वह अत्यन्त मूर्ख है। अतः सज्जनको उसके कथनका कभी अवलम्बन नहीं करना चाहिये। वास्तवमें शास्त्रीय बोधसे सब कुछ ब्रह्म ही ब्रह्म है। न तो कहीं जगत् आदिका ज्ञान है, न कहीं चित्तका ही भाव है और न अभाव है तथा न कहीं द्वैत है, न कहीं अद्वैत ही है। यह समस्त जगत् आश्रयरहित, परम शान्त, अजन्मा अनादि परमात्मारूप ही है। किन्तु यह जो अज्ञानियोंद्वारा देखे गये रूपसे युक्त जगत् है, वह न नाना है और न अनाना ही है। अतः आप मौन व्रत धारण करके काठके सदृश स्थित रहिये।
राजा शिखिध्वजने कहा—महामुने ! आपकी दयासे मेरा मोह नष्ट हो गया। मुझे ब्रह्मके स्वरूपकी स्मृति प्राप्त हो गयी, मेरा संदेह दूर हो गया। मेरी बुद्धि परम विश्रामको प्राप्त हो गयी, अब मैं आत्मवान् होकर स्थित हूँ। अब मैंने ज्ञेय वस्तु परमात्माके स्वरूपका अनुभव कर लिया, मैं महामौनी हो गया, मायारूपी महासमुद्रको पार कर गया; अब मैं शान्त हूँ, मैं अहंकारस्वरूप नहीं हूँ, आत्मज्ञानी बनकर सम्पूर्ण विकारोंसे रहित होकर अवस्थित हूँ। अहो ! अति चिरकालतक मैं भवसागरमें परिभ्रमण करता रहा। परंतु अब मैं क्षोभरहित अक्षय परमपदको प्राप्त हो गया हूँ। मुने ! इस तरह अवस्थित होनेपर मूर्खोंके माने हुए अहंतासहित ये भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों जगत् नहीं हैं। जो कुछ यह भासित हो रहा है, उसे ब्रह्मका संकल्प होनेके कारण मैं ब्रह्मरूप ही समझता हूँ।
कुम्भ बोले—राजन् ! आपका कथन सत्य है। जिस चिन्मय परमात्मामें वस्तुतः यह जगत् ही नहीं है, वहाँ आकाशमें बिना हुए प्रतीत होनेवाले गन्धर्वनगरके समान उस तरहका 'अहं, त्वम्' आदि अनुभव कैसा, कहाँ, किस निमित्तसे और किस प्रकार हो सकता है ? जैसे कड़ा, कुण्डल आदि भावनाके शान्त हो जानेपर सुवर्णमात्र अवशिष्ट रह जाता है, वैसे ही जगदादि भावनाओंके शान्त हो जानेपर एकमात्र ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है। 'देह आदि मैं हूँ' इस प्रकारकी भावना अत्यन्त विनाशकारक बन्धनके लिये होती है तथा 'देहादिरूप मैं नहीं हूँ' इस तरहकी भावना विशुद्ध मोक्षके लिये होती है। अहंकार-ज्ञानका अभाव मोक्ष है तथा अहंकार-ज्ञान ही बन्धन है। इसलिये राजन् ! 'मैं वह साक्षात् ब्रह्म ही हूँ, अहंकार मैं नहीं हूँ' इस प्रकारके शुद्ध कैवल्यात्मक बोधसे युक्त होकर आप आत्मवान् हो जाइये। जिस तरह समुद्रमें तरङ्ग आदि वास्तवमें जलमात्र ही हैं, उसी तरह ब्रह्ममें संसार और संसारके पदार्थ परमात्म-का यथार्थ ज्ञान होनेपर एकमात्र परमात्मस्वरूप ही हैं। यह सृष्टि ही सृष्टि शब्दके अर्थसे रहित परब्रह्म है और परब्रह्म ही सृष्टि है; क्योंकि यही शाश्वत परब्रह्म 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इस श्रुति-वाक्यका अर्थ है। समस्त शब्द और उनके अर्थकी भावनाका जहाँ अभाव है, वह शुद्ध, नित्य, चेतन, अनन्त परमात्मा ही ब्रह्म शब्दसे कहा जाता है; क्योंकि परमात्माका यथार्थ अनुभव हो जानेपर जब शब्द और उनके अर्थरूप जगत्का ज्ञान नहीं रहता, तब वह अजर, शान्त ब्रह्म ही अवशिष्ट रहता है। उसमें वाणीकी भी गति नहीं है।
४७४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
ब्रह्मसे जगत्की पृथक् सत्ताका निषेध तथा जन्म आदि विकारोंसे रहित ब्रह्मकी स्वतः सत्ताका विधान
कुम्भने कहा—राजन् ! जिसमें कारणता है, उसका वह कार्य सिद्ध हो सकता है । वास्तवमे जो निर्विशेष ब्रह्म है वह तो किसीका कारण ही नहीं, फिर उससे कार्य होगा ही कैसे ? जो कार्य कारणसे उत्पन्न होता है, वह कारणके सदृश होता है । जो यहाँ उत्पन्न ही नहीं होता, उसमें भला सादृश्य आयेगा ही कहाँसे ? भला आप बतलाइये तो सही, जिसका कोई बीज ही नहीं है, वह उत्पन्न कैसे होगा ? जो वस्तु अतर्क्य, अगम्य और निर्विशेष है, उसमें बीजता ही कहाँ ठहरेगी ? देश और कालके वशसे सभी पदार्थ कारणसे युक्त और प्रमाणसे गम्य होते हैं । किंतु अकर्ता होनेसे ब्रह्म निमित्त और उपादान कारणोंका प्रमाण कैसे सिद्ध हो सकता है ? क्योकि कर्ता, कर्म और कारणशून्य कल्याणमय परमात्मामें कारणता नहीं है, इसलिये जगत् शब्दार्थ ज्ञानका वह कारण नहीं हो सकता । अतएव राजन् ! जो सत्स्वरूप निर्विशेष ब्रह्म है, वह 'मैं ही हूँ' इस प्रकार आप निश्चय कीजिये । यह प्रतीति होनेवाला जगत् अज्ञानियोंकी दृष्टिमें ही सत् है; क्योंकि वह एक अद्वितीय चिन्मय अजर और शान्त निर्विशेष ब्रह्म ही वास्तवमें प्रमाणित है । किंतु अलातचक्रके सदृश भ्रमाकृति जो यहाँ जगत्, चित्त आदि दिखायी देता है, वह मृगतृष्णा-जल, दृष्टिदोषसे दो चन्द्रमा आदिकी भ्रान्ति तथा बालकल्पित प्रेत आदिकी भाँति है । जो जगत् सर्वथा भ्रमात्मक है, वह भला सत्य नामसे कैसे कहा जा सकता है ? अज्ञानजनित भ्रान्ति ही अन्तःकरण और चित्तादि शब्दोंसे कही जाती है ।
जैसे मरुमरीचिकामें प्रतीत होनेवाले जलका ज्ञान 'यह जल नहीं है,' इस यथार्थ ज्ञानसे नष्ट हो जाता है, वैसे ही यह चित्त है । इस रूपसे हृदयमें दृढ़ हुआ जो अज्ञानात्मक विकार है, वह 'यह चित्त नहीं है' इस यथार्थ ज्ञानसे समूल विनष्ट हो जाता है । जैसे अज्ञान-भ्रमसे उत्पन्न हुई रज्जुमें सर्परूपता 'यह सर्प नहीं है' इस तरहके हृदयमें दृढ़ हुए यथार्थ ज्ञानसे नष्ट हो जाती है, वैसे ही आत्मामें अज्ञान-भ्रमसे उत्पन्न हुआ मनोरूप चित्त 'यह चित्त नहीं है' इस तरहके हृदयमें दृढ़ हुए यथार्थ विज्ञानसे विनष्ट हो जाता है । मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि सारे पदार्थ हृदयमें अज्ञानसे उत्पन्न हुए हैं । वस्तुतः इस जगत्में चित्त नहीं है और इसी तरह अहकारादिसे संयुक्त देहादि कुछ भी नहीं है, किंतु एकान्त निर्मल एक आत्मा ही है । अज्ञानी जीवोंके द्वारा ही अज्ञानसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकारकी रचना की गयी है । किंतु आज आपने संकल्पके अभावके द्वारा उन सबका परित्याग कर दिया है; क्योकि जो पदार्थ सकल्पसे आता है, उसका संकल्पका अभाव होते ही विनाश हो जाता है । जैसे जलसे समुद्र परिपूर्ण है, वैसे ही सच्चिदानन्दघन परमात्म-तत्त्वसे यह सारा संसार परिपूर्ण है । न मैं हूँ, न आप हैं, न अन्य हैं, न ये सब पदार्थ हैं। न चित्त है, न इन्द्रियाँ हैं और न आकाश ही है । केवल एक विज्ञानानन्दघन विशुद्ध परमात्मा ही है । घट-पटादि दृश्य-जगत्के आकाशरूपसे एक वह परमात्मा ही दिखायी देता है । 'यह चित्त है, यह मैं हूँ' इत्यादि तो असत्य कल्पनाएँ है । महीपते ! वास्तवमें तो इस त्रैलोक्यमें न कोई जन्म लेता है और न कोई मरता ही है । सत् और असत् भावनारूप यह केवल चेतनका संकल्पमात्र है । जब वास्तवमें एक सर्वात्मक व्यापक ब्रह्म परमात्मा ही प्रकट है, तब द्वित्व और एकत्व कैसे रह सकता है और कैसे संशय तथा भ्रम ही रह सकता है ? मित्र ! केवल निर्मल अनन्त परमात्म-स्वरूप आपका न तो कुछ विनष्ट हो सकता है और न कुछ बढ़ ही सकता है; क्योंकि जो अजन्मा, अजर, अनादि, अद्वितीय, विशुद्ध, सदा एकरूप, चिन्मय, संकल्परहित, सत्स्वरूप वस्तु है, वही परमात्म-तत्त्व है । (सर्ग १००)
[ निर्वाण-प्रकरण पू० ] * राजा शिखिध्वजकी ज्ञानमें दृढ़ स्थिति * ९३५
राजा शिखिध्वजकी ज्ञानमें दृढ़ स्थिति तथा जीवन्मुक्तिमें चित्तराहित्य एवं तत्त्वस्थितिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! इस प्रकार कुम्भके स्वाभाविक वचनोंपर विचार करके राजा शिखिध्वज उसी क्षण स्वयमेव आत्मपदमें स्थित हो गये। फिर तो उनके मन और नेत्रोंका व्यापार बंद हो गया, वाणी शान्त हो गयी तथा वे ध्यानस्थ होकर मनन करने लगे, उस समय उनके शरीरके सभी अवयव ऐसे निश्चल हो गये, मानो शिलातलपर खुदी हुई कोई मूर्ति हो। महाबाहो ! तदनन्तर दो ही घड़ीके बाद जब उनकी ध्यानमुद्रा भंग हुई और वे विकसित नेत्रोंसे कुम्भकी ओर देखने लगे, तब कुम्भरूपिणी चूडालाने राजासे प्रश्न करना आरम्भ किया।
कुम्भने पूछा—राजन् ! जो अत्यन्त प्रकाशमान, शुद्ध, विस्तृत एवं निर्मल है तथा जो निर्विकल्प-समाधिमें स्थित रहनेवाले योगियोंके लिये सुन्दर शय्याके समान है, उस आत्मपदमें आपको आनन्दपूर्वक विश्रान्ति प्राप्त हो चुकी न ? आपका अन्तःकरण प्रबुद्ध हो गया न ? आपने भ्रान्तिका परित्याग कर दिया न ? ज्ञातव्यका ज्ञान प्राप्त कर लिया और द्रष्टव्य वस्तु देख ली न ?
शिखिध्वज बोले—भगवन् ! आपकी कृपासे मुझे उस महती पदवीका साक्षात्कार हो गया, जो निरतिशयानन्दकी भूमिका और समस्त उत्कर्षोंकी पराकाष्ठा है। अहो ! जानने योग्य वस्तुओंके ज्ञानसे सम्पन्न संत-महात्माओंका सङ्ग अपूर्व एवं सर्वोत्तम अमृतमय होता है, अतः सर्वोत्कृष्ट फल प्रदान करनेवाला है । प्रभो ! जिस महामृतकी उपलब्धि मुझे सारे जन्ममें भी नहीं हुई, वही आज आपके समागमसे अनायास ही सुलभ हो गयी। परन्तु कमललोचन ! इस अनन्त, आद्य एवं अमृतरूप आत्मपदकी प्राप्ति मुझे पहले ही क्यों नहीं हो गयी ?
कुम्भने कहा—राजन् ! जब भोगेच्छाओंका परित्याग कर देनेसे मन पूर्णतः शान्त हो जाता है और सम्पूर्ण इन्द्रियगणोंके भोगरूप दोषोंकी निवृत्ति हो जाती है, तब चित्तमें उपदेशककी विमल उक्तियाँ उसी प्रकार निमग्न हो जाती हैं, जैसे शुद्ध स्वच्छ वस्त्रपर कुंकुममिश्रित जलके छींटे। कमलनेयन ! आपके अपने वासनात्मक उत्पन्न दोषोंका, जो अनेक जन्मोंके शरीरोंद्वारा संगृहीत किये हुए थे, परिपाक आज प्रकट हुआ है। साधुशिरोमणे ! कालद्वारा परिपक्व होकर सम्पूर्ण दोष शरीरसे निकल जाते हैं। सखे ! शरीरसे वासनात्मक दोषोंके निकल जानेपर गुरुदेव जो कुछ निर्मल उपदेश देते हैं, वह शीघ्र ही अन्तःकरणमें प्रविष्ट हो जाता है। महामते ! दोषोंका परिपाक सम्पन्न हो जानेपर आज मैंने आपको उद्बुद्ध किया है। इसी कारण आज ही आपके अज्ञानका विनाश हो गया। आज आपके सभी दोष परिपक्व होकर नष्ट हो गये। आज ही आपने सम्यक्रूपसे ज्ञानोपदेश धारण किया है। आज ही आप उपदेशसम्पन्न हुए हैं और आज ही आप प्रबोधवान् भी हुए हैं। गन्धर्वके न्यायसे आज आपके समस्त शुभ-अशुभ कर्मोंका समूह विनाश हो गया। महीपते ! जबतक इस चित्तका दुर्भाग्य दीन रहा था, तबतक आपके चित्तमें 'यह मैं हूँ, यह मेरा है' ऐसा अज्ञान वर्तमान था; परन्तु भूपते ! इस समय मेरा वचनोपदेश श्रवण करके आपने अपने हृदयसे उस अज्ञानको निकाल फेंका है, जिससे आपके चित्तका विनाश हो गया है; अतः अब आप भलीभाँति प्रबुद्ध हो गये हैं। राजन् ! जबतक हृदयमें मनका अस्तित्व वर्तमान रहता है, तबतक अज्ञान रहता है, किन्तु ज्यों ही अविद्या-रूपसे चित्तका विनाश हुआ, त्यों ही ज्ञानका अभ्युदय हो जाता है। द्वैत और अद्वैतकी दृष्टि ही चित्त है और वही अज्ञान भी कहा जाता है; इन दोनोंकी दृष्टिका नष्ट होना विनाश है, यही ज्ञान और इसी पदका नाम मुक्ति है। नरेश ! जो प्रतीत होनेके कारण सत् और जन्मने न होनेके कारण असत् है तथा जो मिथ्या जगतरूपी वासना...
| ४७६ | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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स्थान है, उस चित्तका तो आपने विनाश कर ही दिया। इससे अब आपका ज्ञान जाग उठा है और आप विमुक्त हो गये हैं। अतः अब आप शोकशून्य, आयासरहित निःसङ्ग, अनन्य, आत्मज्ञानसम्पन्न, महान् अभ्युदयसे युक्त, मौनी एवं मुनि होकर अपने निर्मलरूपमें स्थित रहिये।
शिखिध्वज बोले—भगवन् ! यों आपके कथनानुसार जो मूर्ख जीवके लिये ही चित्त है, ज्ञानीके लिये नहीं; किंतु प्रभो ! यदि आत्मज्ञानीके लिये चित्त है ही नहीं तो ये आप-जैसे जीवन्मुक्त मनुष्य मनसे रहित होकर जगत्में कैसे विचरण करते हैं ? यह बतलानेकी कृपा कीजिये।
कुम्भने कहा—तत्त्वज्ञ ! आप जैसा कह रहे हैं यह ठीक वैसा ही है; इसमें थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं है। जैसे पत्थरमे अङ्कुर नहीं निकलता, उसी प्रकार जीवन्मुक्तोंका चित्त व्यापारशून्य हो जाता है; क्योंकि पुनर्जन्म लेनेमें सहायक जो घनीभूत वासना होती है, वही चित्त शब्दसे कही जाती है और वह आत्मज्ञानीमें रहती नहीं। आत्मज्ञानसम्पन्न पुरुष जिस वासनाद्वारा सांसारिक कर्मोंका व्यवहार करते हैं, उसे आप 'सत्त्व' मात्रवाली समझिये। वह वासना पुनर्जन्मसे रहित होती है। जो सत्त्वमें स्थित हैं तथा जिनकी इन्द्रियाँ सम्यक्-प्रकारसे वशमें हैं, ऐसे जीवन्मुक्त महात्मा आसक्तिरहित होकर विचरते हैं; परंतु चित्तस्थ पुरुष वैसा कभी नहीं कर सकते। राजन्! अज्ञानसे आच्छादित चित्तको 'चित्त' कहते हैं और प्रबुद्ध चित्त 'सत्त्व' कहा जाता है। जो अज्ञानी हैं वे 'चित्त' में स्थित रहते हैं और महाबुद्धिमान् ज्ञानी लोग 'सत्त्व'में स्थित रहते हैं। भूपते ! चित्त बारंबार उत्पन्न होता है; किंतु सत्त्व पुनः नहीं पैदा होता; इसीलिये अज्ञानी बन्धनमें पड़ता है, ज्ञानी नहीं पडता। राजन् ! मुझे यह ठीक-ठीक पता है कि आज आपने पूर्णरूपसे अपने चित्तका विनाश कर दिया है जिससे आप सत्त्वसम्पन्न हो गये हैं और महात्यागी बनकर स्थित हैं। आज आपकी सारी वासनाएँ नष्ट हो गयी हैं, जिससे आपकी विशेष शोभा हो रही है।
मुने ! मैं यह भी मानता हूँ कि आपका मन आकाशकी तरह निर्मल हो गया है। आप परम शान्तिको प्राप्त हो गये हैं और सिद्ध होकर सर्वोत्कृष्ट समस्थितिमें पहुँच गये हैं। राजन् ! यह वही महात्याग है, जिसमें आपने अपने सर्वस्व-रूप चित्तका परित्याग कर दिया है। भला, तप आपके कितने दुःखोंका विनाश करनेमें समर्थ होता। यह जो उपनिरूप परम सुख है, यही अक्षय सुख है। यही वास्तवमें सत्य है। स्वर्गादिका जो थोड़ा-बहुत सुख है, वह सत्य नहीं है; क्योंकि वह विनाशशील है तथा उत्पत्ति एवं विनाशयुक्त होनेके कारण वर्तमानकालमें ही प्रतीत होता है।
राजेन्द्र ! जैसे आकाशसे भी अत्यन्त निर्मल सच्चिदानन्द परमात्मासे सभी पदार्थ समुद्भूत होकर दृष्टिगोचर होते हैं, वैसे ही वे उसी परमात्मामें विलीन भी हो जाते हैं। सङ्कल्पसे ही जिनकी उत्पत्ति हुई है, ऐसे पदार्थोंको आत्मज्ञानी महात्मा लोग जलमें प्रतिबिम्बित सूर्योंकी तरह समझकर ग्रहण नहीं करते। सज्जनशिरोमणे ! जगत्में जिसका चित्त स्पन्दनरहित हो गया है, उसके समीप संसार आ ही नहीं सकता; क्योंकि महीपाल ! इस त्रिलोकीमें जो जो दुःख जीवको प्राप्त होते हैं, वे सभी चित्तकी चपलतासे ही उत्पन्न हुए रहते हैं। इसलिये जिसका चित्त स्थिर, शान्त, स्पन्दनशून्य और चञ्चलतारहित हो गया है, वही मनुष्य सदा परमानन्दमें निमग्न रहता है और वही साम्राज्य—परमात्म-साक्षात्कारका पात्र होता है।
शिखिध्वज बोले—सम्पूर्ण संशयोंका उच्छेद करनेवाले विभो ! स्पन्द और अस्पन्द—ये दोनो किस प्रकार एकताको प्राप्त होते हैं, वह विधि मुझे शीघ्र बतलानेकी कृपा कीजिये।
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * कुम्भके अन्तर्हित हो जानेपर राजा शिखिध्वजका कुछ कालतक विचार * ९७७
कुम्भने कहा—राजन् ! जैसे सागर जलरूपसे एक है, उसी तरह यह सारा जगत् चिन्मात्रस्वरूप होनेके कारण एक ही वस्तु है; अतः जैसे तरङ्ग शुद्ध जलको ही उछालती हैं, वैसे ही बुद्धिवृत्तियाँ उसी चिन्मात्रको स्पन्दित करती हैं । तात ! श्रुतियाँ जिसका ब्रह्म, चिन्मात्र, अमल और सत्त्व आदि नामोंद्वारा गान करती हैं, उसीको मूढ लोग जगद्रूपसे देखते हैं । इस संसारका स्वरूप तो चेतन परमात्माका स्पन्दनमात्र है, इसलिये यथार्थ दृष्टिवालोंके लिये तो इसका विनाश ही हो जाता है; परंतु जिन्हें यथार्थदृष्टिकी प्राप्ति नहीं हुई है, ऐसे पुरुषोंको रज्जुमें सर्पभ्रान्तिकी भाँति यह जगद्रूपमें ही प्रतीत होता । जैसे चक्षुरिन्द्रियके दोषरहित होनेपर एक ही चन्द्रमा दृष्टिगोचर होता है, उसी तरह निष्काम शास्त्रोंके अभ्यास और सत्पुरुषोंके सङ्गसे जब समय पाकर चित्त शुद्ध हो जाता है, तब एकमात्र चेतन परमात्माके स्वरूपका अनुभव होता है। तातो ! आप आदि पदमें स्थित स्व-स्वरूपको प्राप्त हो चुके हैं । देहादि पदोंमें आपका भेद भाव नहीं रह गया है, आप महान् चेतनस्वरूप हो गये हैं और आपका शोक नष्ट हो गया है, अतः अब आप अपने उसी पदमें प्रविष्ट हुए स्थिर रहिये । (सर्ग १०१)
कुम्भके अन्तर्हित हो जानेपर राजा शिखिध्वजका कुछ कालतक विचार करनेके पश्चात् समाधिस्थ होना, चूडालाका घर जाकर तीन दिनके बाद पुनः लौटना, राजाके शरीरमें प्रवेश करके उन्हें जगाना और राजाके साथ उसका वार्तालाप
कुम्भने कहा—महाराज शिखिध्वज ! जिस प्रकार यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न होता है और जैसे विलीन हो जाता है, वह सारा-का-सारा वृत्तान्त मैंने आपसे वर्णन कर दिया । इसे सुनकर, समझकर तथा मनन करके स्पष्टरूपसे प्रत्यक्ष प्राप्त परमपदमें आप स्वेच्छानुसार स्थित रहिये । संकल्पपरम्परासे तथा किसी भी वस्तुकी अभिलाषासे रहित आपको सदा आत्मदृष्टिमें ही स्थित रहना चाहिये; क्योंकि यही दृष्टि परम पावन है ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! कुम्भके यों कहनेपर राजा शिखिध्वज हाथमें फल लेकर कुम्भको प्रणाम करनेके लिये प्रतिवचन बोलना चाहते थे कि तबतक कुम्भ अन्तर्धान हो गये । इस प्रकार कुम्भके अन्तर्हित हो जानेपर राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ । वे उसी विस्मयोत्पादक घटनाका विचार करते हुए चित्रलिखित-से अवाक् रह गये । फिर वे यों सोचने लगे—'अहो ! ब्रह्माकी लीला बड़ी विचित्र है, जो कुम्भके व्याजसे मुझे सदा अभ्युदयस्वरूप ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त हुआ । अहो ! उन देवकुमारने मुझको अत्यन्त ही सुन्दर एवं युक्तियुक्त उपदेश दिया, जिसके प्रभावसे चिन्मात्रके ही साक्षात्कारमें लगा पड़ा हुआ मैं प्रबुद्ध हो गया हूँ । अभी तक मैं इस कर्मजालरूपी दलदलमें, जो नाना प्रकारके कष्टोंसे भरे
४८० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
हुआ हूँ; क्योंकि मेरी तो ऐसी धारणा है कि इस जगत्में आपके समान मेरा बन्धु; आप्त, सुहृद्, मित्र, सखा, विश्वासपात्र व्यक्ति अथवा अनुयायी दूसरा कोई नहीं है।
शिखिध्वज बोले—अहो ! देवपुत्र ! असङ्ग होते हुए भी जो आप मेरे समागमकी इच्छा रखते हैं, इससे प्रतीत होता है कि आज निश्चय ही मेरे पुण्य सफल हो गये।
कुम्भने कहा—राजन् ! आपको महानन्दस्वरूप परमपदमें विश्रामकी प्राप्ति हो गयी न ? आप इस भेदमय दुःखसे सर्वथा रहित हो गये हैं न ? भोगकी नीरसताका विचार करके आपात रमणीय संकल्पोंसे आपका प्रेम एकदम निर्मूल हो गया है न ? आपका मन हेय और उपादेयकी अवस्थाको अतिक्रान्त कर गया है न ? वह शान्त, शम-सम्पन्न होनेसे समतायुक्त और प्रारब्धानुसार प्राप्त पदार्थोंमें उद्वेगशून्य होकर ही स्थित रहता है न ?
शिखिध्वज बोले—भगवन् ! चिरकालके पश्चात् थोड़े ही समयमें मैं निर्विकार होकर पूर्ण विश्रामको प्राप्त हो गया हूँ। मुझे सम्पूर्ण ज्ञातव्य पदार्थ उपलब्ध हो चुके हैं। अब मैं पूर्णतया तृप्त हो गया हूँ। जिस ब्रह्मका मुझे न तो ज्ञान ही था और न जिसकी प्राप्ति ही हुई थी, उसे मैंने जान लिया और प्राप्त भी कर लिया तथा छोड़ देने योग्य संसारका त्याग भी कर दिया। अब मेरा मन वासनारहित हो गया है और मैंने परमात्मस्वरूप परम तत्त्वका आश्रय भी ले लिया है। अब मेरे लिये कुछ भी शेष नहीं रह गया है। अब तो मैं सांसारिक वासनाओंसे शून्य मोह और भयसे रहित, वीतराग, नित्य ज्ञानस्वरूप, सर्वत्र समतापूर्ण, सर्वथा सौम्य, सर्वात्मक, सारी कल्पनाओंसे मुक्त, आकाशमण्डलके समान निर्मल तथा एकरूप होकर स्थित हूँ।
(सर्ग १०२-१०३)
कुम्भ और शिखिध्वजका परस्पर सौहार्द, चूडालाका राजासे आज्ञा लेकर अपने नगरमें आना और उदास-मन होकर पुनः राजाके पास लौटना, राजाके द्वारा उदासीका कारण पूछनेपर चूडालाद्वारा दुर्वासाके शापका कथन और चूडालाका दिनमें कुम्भरूपसे और रातमें स्त्रीरूपसे राजा शिखिध्वजके साथ विचरण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! वे दोनों कुम्भ और शिखिध्वज तत्त्वज्ञानी तो थे ही, अतः वे परस्पर इस प्रकारकी अध्यात्मविषयकी विचित्र कथाएँ कहते हुए तीन मुहूर्त-छः घड़ीतक उस वनमें बैठे रहे। तत्पश्चात् वे वहाँसे उठकर किसी दूसरे शिखरपर जाकर वहाँके सरोवरपर तथा आनन्ददायक वनमें विचरण करने लगे। इस प्रकार उस महावनकी उन वनवीथियोंमें वैसा आचरण करते हुए तथा परस्पर वैसी कथाओंको कहते-सुनते हुए उन दोनोंके आठ दिन बीत गये। तब कुम्भने राजासे कहा—'राजन् ! आओ अब हमलोग इस पर्वतपर किसी दूसरे वनमें चलें।' राजाने कुम्भकी बात मानकर स्वीकार कर लिया। फिर तो वे दोनों वहाँसे चल पड़े और अनेक तरहके वनो, जंगलों, जलाशयोंके तटों, सरोवरों, कुञ्जों, भीषण शिखरों, नदी प्रदेशों, ग्रामों, नगरों, उपवनों, पर्वतीय गोष्ठो, कुञ्जों तीर्थस्थानों और आश्रमोंमें घूमते रहे। वे पूर्णतया शान्त तो थे ही, अतः एक ही साथ रहते थे। उनमें स्नेह, सत्त्व और उत्साह एक-सा था। राघव ! वे देवताओं और पितरोंकी पूजा भी एक ही साथ करते थे और उनका भोजन भी एक साथ ही होता था। श्रीराम ! 'यह अपना घर है और यह नहीं है' ऐसी वैकल्पिक धारणा उन दोनोंके मनका कभी अपहरण नहीं कर पायी थी। वे कभी अपने शरीरपर धूल लपेट लेते, कभी चन्दनका लेपन कर लेते, कभी भस्म रमा लेते, कभी दिव्य वस्त्र धारण कर लेते, कभी
कल्याण
भगवान्के द्वारा प्रह्लादका अभिषेक (उपशम-प्रकरण...)
सं० यो० व० अं० १७—
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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * कुम्भ और शिखिध्वजका परस्पर सौहार्द * ४८१
उसे पल्लवोंसे आच्छादित कर लेते और कभी पुष्पोंसे सजा लेते। इस प्रकार वे दोनों मित्र साथ-साथ विचरण करते थे।
कुछ ही दिनोंके बाद समचित्तता तथा सत्त्वकी उत्कृष्टताके कारण राजा शिखिध्वज भी कुम्भके ही समान शोभा पाने लगे। तब मानिनी चूडालाने राजा शिखिध्वजको देवकुमारके सदृश उत्तम शोभासे सम्पन्न देखकर विचार किया कि 'अब मैं इस काननमें अपनी बुद्धिसे सोचकर कुछ ऐसे प्रपञ्चकी रचना करूँ जिससे दूसरोंको मान देनेवाले ये मेरे स्वामी राजा शिखिध्वज मुझमें रति-सुखके इच्छुक हो जायँ।' यों सोच-विचारकर कानन-कुञ्जमें बैठी हुई कुम्भवेषधारिणी चूडाला अपने पतिसे बोली—
कुम्भने कहा—'राजन् ! मैं स्वर्ग जा रहा हूँ और सायंकाल होते-होते वहाँसे निश्चय ही लौट आऊँगा; क्योंकि आपका सङ्ग मुझे स्वर्गसे भी बढ़कर सुखप्रद है।' 'अच्छा, आप शीघ्र ही लौटियेगा।' राजाके ऐसा कहनेपर कुम्भ उस वनप्रान्तसे उड़कर शरत्कालीन मेघके सदृश आकाशमें जा पहुँचे। वहाँ आकाशमार्गसे जाते हुए कुम्भने राजाके ऊपर पुष्पाञ्जलि छोड़ दी। राजा शिखिध्वज भी जाते हुए कुम्भकी ओर तबतक टकटकी लगाये देखते ही रहे, जबतक वे उनकी आँखोंसे ओझल नहीं हो गये।
उधर आकाशमें राजा शिखिध्वजकी आँखोंसे ओझल होते ही सुन्दरी चूडालाने कुम्भ-शरीरका परित्याग कर दिया और वह पुनः अपने पूर्वरूपमें आ गयी। फिर आकाश-मार्गसे चलकर वह स्वर्गके समान रमणीय अपने नगरमें जा पहुँची और अदृश्यरूपसे अपने अन्तःपुरमें जो सुन्दरी स्त्रियोंसे खचाखच भरा था, प्रवेश कर गयी। वहाँ झटपट सारा राज्यकार्य सँभालकर वह पुनः राजा शिखिध्वजके समक्ष आ गयी। पर आज उसके चेहरेपर उदासी आयी थी। यों उदास-मन कुम्भको सामने देखकर राजा शिखिध्वज उठकर खड़े हो गये। उनका भी चित्त उदास हो गया, फिर वे आदरपूर्वक यों कहने लगे—
'देवपुत्र ! आपको नमस्कार है। आप तो उदास-से दीख पड़ते हैं। आप कुम्भ तो हैं न ! इस उदासीको छोड़िये और इस आसनपर विराजिये। मित्रवर ! जिन्हें वेद्य वस्तुका ज्ञान प्राप्त हो चुका है तथा जो अपने स्वरूपमें स्थित हो गये हैं, ऐसे संत महात्मालोग हर्ष-विषादजनित स्थितिका उसी प्रकार आश्रय नहीं ग्रहण करते, जैसे कमलपत्र जलका।'
तब कुम्भने कहा—'राजन् ! जैसे जबतक तिल हैं, तबतक तेल रहता है, उसी तरह जबतक देह है, तबतक उसकी अच्छी-बुरी दशा भी होती है। परन्तु भोगमें चित्त-की जो समता होती है, वही देहकी अच्छी-बुरी दशाओं-द्वारा प्राप्त दुःखसे रहित होना है। तत्त्वज्ञानी लोग भी, जबतक प्राप्त हुए अन्तिम देहका पतन नहीं हो जाता, बुद्धि आदिकी समता तथा हाथ-पैर आदिके चलानेमें तबतक ईश्वरीय विधानके अनुसार समय बिताते रहते हैं।'
शिखिध्वज बोले—महाभाग ! आप तो तत्त्वज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हैं। देवता होते हुए भी आपको ऐसी उदासी किस कारणसे प्राप्त हुई—यह बतलानेकी कृपा कीजिये।
तब कुम्भने कहा—भद्र ! जब मैं यहाँसे गया, तब आपको पुष्पाञ्जलि समर्पण करके आकाशमें उड़ता हुआ स्वर्गमें जा पहुँचा। वहाँ पिताजीके साथ इन्द्रके सभाभवनमें क्रमानुसार बैठा था। जब सभा-विसर्जनका समय आया और पिताजीने मुझे जानेकी आज्ञा दी, तब मैं उठकर यहाँ आनेके लिये स्वर्गसे चल पड़ा और नभोमण्डलमें आ पहुँचा। आगे बढ़नेपर मैंने देखा कि मलय-उपत्यकाके मध्यसे होकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा बड़े वेगसे इधर ही आ रहे हैं। वे भूतलपर स्थित मन्दाकिनीकी ओर सूर्य-दिशाकी ओर जा रहे थे। तब मैंने भी आकाशमार्गमें ही जाते हुए उन मुनिश्रेष्ठको अभिवादन किया और कहा—'मुने ! नील मेघके सदृश वस्त्र धारण करनेके कारण आप अभिसारिका नारीकी तरह लग रहे हैं।' दुर्वासोजी यह देखकर महाराज ! यह सुनकर दुर्वासाजी मुझे शाप देते हुए
४८२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
बोले—'जाओ, इस दुर्वचनके कारण आजसे तुम प्रत्येक रात्रिमें स्तन और केश आदि स्त्री-चिह्नोंसे युक्त होकर हाव-भाव आदि विलासोंवाली कमनीया रमणीके रूपमें बदल जाया करोगे।' वृद्ध ब्राह्मण दुर्वासाके मुखसे निकले हुए उस अशुभ वचनको सुनकर, जबतक मैं कुछ थोड़ा विचार करने लगा, तबतक वे मुनि अन्तर्धान हो गये। इसी कारणसे मेरा मन उदास हो गया है और मैं सीधे आकाश-तलसे यहाँ चला आया हूँ। सज्जनशिरोमणे ! इस प्रकार मैंने अपना सारा वृत्तान्त आपको सुना दिया। अब मैं रात्रिमें स्त्री हो जाऊँगा। भला, रात्रिमें मैं इस स्त्रीत्वका निर्वाह कैसे कर सकूँगा ? अहो ! संसारमें होनहारकी बड़ी विलक्षण गति है। हाय ! रातमें जब मेरा स्त्रीरूप हो जायगा, उस समय मैं लज्जापरवश होकर गुरुजनों, देवताओं और ब्राह्मणोंके सामने निर्वाधरूपसे कैसे रह सकूँगा ?
शिखिध्वज बोले—देवपुत्र ! जगत्में जो कुछ भी दुःख अथवा सुख प्राप्त होते हैं, वे सभी प्रारब्धानुसार शरीरके लिये ही होते हैं। उनमेंसे किसीका भी आत्मापर प्रभाव नहीं पड़ता। मुने ! आप तो शास्त्रको भूषणकी तरह धारण करनेवाले हैं, इसलिये किसी भी कार्यफलके विषयमें विचार करना आपके लिये उचित नहीं है। फिर, यदि आप-जैसे विवेकी पुरुष भी यों विचार करने लगेंगे तो अन्य अविवेकी जनोंके खेद-नाशका क्या उपाय होगा ? मैं तो ऐसा समझता हूँ कि खेदका विषय उपस्थित होनेपर कुछ खेदोचित वचन कहना चाहिये—इसी अभिप्रायसे आपने ऐसा कहा है।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! तदनन्तर जब चन्द्रोदयका समय आया, तब उन दोनों मित्रोंने उठकर संध्या-वन्दन किया और फिर जप-कर्म समाप्त करके वे लताओंके एक समूहमें जा बैठे। वहाँ जब कुम्भ धीरे-धीरे स्त्रीरूपमें परिवर्तित होने लगे, तब वे सामने बैठे हुए राजा शिखिध्वजसे गद्गद वाणीमें बोले—'राजन् ! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि आपके सामने मैं लज्जाके साथ-ही-साथ स्त्रीभावको प्राप्त होता जा रहा हूँ !'
दो घड़ीतक विचार करनेके पश्चात् राजा शिखिध्वज इस प्रकार कहने लगे—'अहो ! दुःखकी बात है; ये कुम्भमुनि, जो महान् सत्त्वसम्पन्न थे, वे ही अब सुन्दरी स्त्री बन गये। साधुशिरोमणे ! आप तो तत्त्वज्ञानी हैं। दैवकी गति भी आपसे छिपी नहीं है; अतः इस अवश्यम्भावी घटनाके विषयमें विचार मत कीजिये। ये जो अवश्यम्भाविनी सुख-दुःखात्मक दशाएँ हैं सभी तत्त्वज्ञानियोंके केवल शरीरपर ही प्रभाव डाल पाती हैं, उनके अन्तःकरणपर नहीं; परंतु ये ही अविवेकियोंके केवल शरीरपर ही नहीं, अन्तःकरणतक पहुँच जाती हैं।'
कुम्भने कहा—राजन् ! ठीक है, ऐसा ही हो। अब मैं रात्रिके समय अपने स्त्री-भावको स्वीकार कर लेता हूँ और इसके लिये चिन्ता भी नहीं करूँगा; भला, दैव-का उल्लङ्घन कौन कर सकता है।
तदनन्तर जब प्रातःकाल हुआ, तब कुम्भने उस युवती स्त्रीके स्वरूपका परित्याग कर दिया और अपना वही कुम्भरूप धारण कर लिया। इस प्रकार वह राजरानी सुन्दरी चूडाला अपने पतिके पास पहले कुम्भरूपसे उपस्थित हुई, तत्पश्चात् स्त्रीरूप धारण करके आयी। वह रात्रिमें कुमारी-धर्मसे युक्त होकर और दिनमें कुम्भरूप धारण करके अपने मित्र एवं स्वामी शिखिध्वजके साथ वनप्रान्तोंमें विचरण करती थी। योगबलसे उसका गमनागमन कहीं रुकता नहीं था। इस प्रकार वह नारी चूडाला पुष्पमालाओं एवं हारोंसे विभूषित होकर अपने मित्र एवं प्रियतम पति-के साथ कैलास, मन्दर, महेन्द्र, सुमेरु और सह्याद्रिके शिखरोंपर स्वेच्छानुकूल विचरण करती थी।
(सर्ग १०४-१०५)
निर्वाण-प्रकरण पू०] * महेन्द्र पर्वतपर अग्निके साक्ष्यमें मदनिका (चूड़ाला)-शिखिध्वजका विवाह * ४८३
महेन्द्र पर्वतपर अग्निके साक्ष्यमें मदनिका (चूड़ाला) और शिखिध्वजका विवाह, एक सुन्दर कन्दरामें पुष्प-शय्यापर दोनोंका समागम, शिखिध्वजकी परीक्षाके लिये चूड़ालाद्वारा मायाके बलसे इन्द्रका प्राकट्य, इन्द्रका राजासे स्वर्ग चलनेका अनुरोध, राजाके अस्वीकार करनेपर परिवारसहित इन्द्रका अन्तर्धान होना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! तदनन्तर कुछ ही दिनोंके बीतनेके बाद कुम्भरूपधारिणी सती चूड़ाला अपने स्वामी राजा शिखिध्वजसे इस प्रकार बोली—'कमलपत्रसदृश नेत्रोंवाले महाराज ! मेरी यह बात सुनिये। मैं प्रतिदिन रात्रिके समय स्त्री ही बनकर रहता हूँ, इसलिये मैं अपने इस प्रकारके स्त्री-धर्मको सफल बनाना चाहती हूँ। इसके लिये विवाहद्वारा अपनेको किसी योग्य पतिके हाथों सौंप देनेका मेरा विचार है। इस विषयमें त्रिलोकीमें केवल आप ही मुझे पतिरूपसे पसंद आ रहे हैं, अतः विवाह-विधिसे आप सर्वदा रात्रिके समय पत्नी-रूपमें मुझे स्वीकार कीजिये। राजन् ! चारों ओरसे सारी वस्तुओंमें इच्छा, अनिच्छा तथा तज्जनित फलका त्याग करके हमलोग इच्छा-अनिच्छासे रहित हो गये हैं अतः इस अभीष्ट कार्यको आप अवश्य सम्पन्न करें।
तब शिखिध्वज बोले—सखे ! इस विवाहकार्यके करनेसे मुझे शुभ अथवा अशुभ—किसी प्रकारके फल-की सम्भावना नहीं दीख रही है, अतः आपको जैसा रुचे, वैसा ही कीजिये।
कुम्भने कहा—महीपाल ! यदि ऐसी बात है तो आज यह श्रावणमासकी पूर्णिमा है, अतः आज ही शुभ लग्न है; क्योंकि कल ही मैंने विवाहसम्बन्धी सारी गणना कर ली थी। महाबाहो ! आज रातमें सम्पूर्ण कलाओंसे परिपूर्ण निर्मल चन्द्रमाके उदय होनेपर हम दोनोंका विवाह होगा। राजन् ! उठिये और हम दोनों वनके भीतरसे अपने विवाहके लिये चन्दन और पुष्प आदि सामग्री एकत्र करें।
यों कहकर कुम्भ उठे और राजा शिखिध्वजके साथ-साथ पुष्पोंको चुनने तथा सामग्रियोंके सङ्ग्रह करनेमें जुट गये। इस प्रकार एक सुन्दर गुफामें सारी विवाह-सामग्री जुटाकर वे दोनों प्रेमी मित्र मन्दाकिनी नदीमें स्नान करनेके लिये गये। वहाँ नहा-धोकर उन दोनोंने देवताओं, पितरों और ऋषियोंका पूजन किया; क्योंकि जैसे उन्हें क्रियाजनित फलकी इच्छा नहीं थी, उसी प्रकार शास्त्रविहित क्रियाका त्याग भी उन्हें पसंद नहीं था। तदनन्तर कल्पवृक्षके उज्ज्वल दर्पणके समान वल्कल पहनकर तथा फल खाकर वे दोनों क्रमशः विवाह-स्थानमें आये। फिर सूर्यास्त होनेपर उन्होंने संध्या-वन्दनकी विधि पूरी की और मन्त्र-जप तथा अघमर्षण आदि भी किया। इतने-में ही कुम्भ स्त्रीरूपमें परिणत हो गये। तब वे सोचने लगे कि 'यह वधू तो मैं बन गया। अब मुझे अपना शरीर वरको दे देना चाहिये; क्योंकि समयोचित रूपका पालन अवश्य करना चाहिये। यह मैं वधू हूँ और आप मेरे मनोनीत वर सामने उपस्थित हैं। यह अपने पाणिग्रहणका समय है, अतः आइये और मुझे ग्रहण कीजिये।' यों विचारकर वह वरके समीप, जो सामने अगोष्ठीके निकट स्थित तथा उगते हुए सूर्यके समान तेजस्वी थे, गयी और यों बोली—'मानद ! मैं आपकी भार्या हूँ। मेरा नाम मदनिका है। मैं आपके चरणोंमें दण्डवत्-प्रणाम करती हूँ। नाथ ! अब आप शास्त्रोक्त विधिके अनुसार अग्नि प्रज्वलित करके मेरा पाणिग्रहण कीजिये।'
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर उन दोनोंने वेदीके समीप खड़े हुए स्तम्भोंको पुष्पसे लदी हुई लताओंसे सजाया। फिर उस वेदीके मध्यभागमें अग्निकी स्थापना करके उसे चन्दनकी लकड़ियोंसे प्रज्वलित किया। जब लपटें निकलने लगीं, तब दक्षिण-क्रमसे उस अग्नि-
४८४ * अविच्छिन्नविदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
की प्रदक्षिणा की। तत्पश्चात् उस अग्निके सामने पल्लवके आसनपर वे पूर्वाभिमुख हो दोनों आसीन हो गये। उस समय उन दोनों वर-वधूकी अद्भुत शोभा हो रही थी। फिर शिखिध्वजने उठकर स्वयं ही उस कान्ता मदनिकाका पाणिग्रहण किया। उस समय उस वनमें उन दोनोंकी परस्पर शिव-पार्वतीके समान शोभा हो रही थी। फिर उस मङ्गलस्वरूप दम्पतीने उस अग्निकी प्रदक्षिणा की। उन दोनोंने परस्पर एक दूसरेको अपना हृदय, जो प्रेमके लिये लोलुप तथा सर्वोत्तम ज्ञानसे पूर्ण था, समर्पित कर दिया। उन्होंने अग्निकी तीन बार
प्रदक्षिणा की और उसमें लाजाहोम किया। इस प्रकार समान रूपसे संतुष्ट हुए वर-वधूने एक दूसरेद्वारा पकड़े गये अपने हाथको छुड़ा लिया। तदनन्तर उन दोनों प्रेमियोंने वहाँसे उठकर एक सुन्दर कन्दरामें, जिसका उन्होंने पहलेसे ही स्वयं निर्माण कर रखा था और जिसमें चमकीले दीपक जल रहे थे, प्रवेश किया। और वे दोनों पुष्पशय्यापर बैठ गये। फिर तो, परस्पर प्रेमभरे तरह-तरहके मनोहर वाग्विलासोंसे, समयोचित आलिङ्गन आदि कृत्योंसे, प्रेमयुक्त व्यवहारोंसे तथा नये-नये सुखोपभोगसे उस उत्तम दम्पतीकी वह लंबी रात एक मुहूर्त्तके समान बीत गयी।
रघुकुलभूषण राम ! इस प्रकार वे दोनों कुम्भ और शिखिध्वज उस महेन्द्राचलकी गुफामें स्वयं विवाहित होकर देवतुल्य परम प्रेमी दम्पती बन गये। दिनमें तो वे परम प्रेमी मित्र बन जाते थे और रातमें प्रिय पति-पत्नी हो जाते थे। प्रभा और दीपककी तरह वे परस्पर घुले-मिले रहते थे, अलग तो कभी होते ही नहीं थे। इस प्रकार जब धीरे-धीरे कुछ मास व्यतीत हो गये, तब देवपुत्रका स्वरूप धारण करनेवाली चूडालाने विचार किया कि अब मैं नाना प्रकारके उत्तम-उत्तम उपभोगोंद्वारा राजा शिखिध्वजकी परीक्षा करूँगी, जिससे इनका चित्त कभी भी भोगोंमें अनुरक्त नहीं होगा। ऐसा सोचकर चूडालाने अपनी मायाके बलसे उस वनस्थलीमें देवगणों तथा अप्सराओंके साथ पधारे हुए इन्द्रको दिखलाया। परिवारसहित इन्द्रको अपने निकट आया हुआ देखकर वनवासी राजा शिखिध्वज उनकी विधिवत् पूजा करके पूछने लगे।
[निर्वाण-प्रकरण पू० ] * राजा शिखिध्वजके क्रोधकी परीक्षा * ४८५
शिखिध्वज बोले—देवराज ! आपने इतनी दूरसे यहाँ आनेका कष्ट क्यों उठाया ? आप जिस प्रयोजनसे यहाँ पधारे हैं, उसे बतलानेकी कृपा कीजिये ।
इन्द्रने कहा—राजन् ! आपके गुणाधिक्यरूपी सूत्रने हमारे हृदयको बाँध रखा है, जिससे खिंचकर हम आकाश-से यहाँ आ गये हैं । महाराज ! अब उठिये और स्वर्ग चलिये; क्योंकि वहाँ यूथ-के-यूथ देवता तथा देवाङ्गनाएँ आपके गुणोंको सुनकर विस्मय-विमुग्ध हो रहे हैं और वे सब-के-सब आपके शुभागमनकी प्रतीक्षा में बैठे हैं । इसलिये आप पादुका, गुटिका, खड्ग और पारद आदि रसोंको भी लेकर सिद्धमार्गसे स्वर्गलोकमें चलना स्वीकार कीजिये । राजर्षे ! आप जीवन्मुक्त तो हैं ही, अतः देवलोकमें पधारकर आप अनेक प्रकारके भोगोंका उपभोग करें, इसी कारण मैं आपके पास आया हूँ । साधो ! आपके समान जो संत-महात्मा हैं, वे न तो प्राप्त हुई लक्ष्मीका तिरस्कारद्वारा अपमान करते हैं और न अप्राप्त-की कामना ही करते हैं । महात्मन् ! जैसे भगवान् नारायणके शुभागमनसे त्रिलोकी पवित्र हो जाती है, वैसे ही आप बिना किसी विघ्न-बाधाके स्वर्ग पधारें और वहाँ सुखपूर्वक विहार करें, जिससे वह स्वर्ग पवित्र हो जाय ।
शिखिध्वज बोले—देवेन्द्र ! मैं तो सभी देशोंको स्वर्ग-सा ही मानता हूँ; क्योंकि मैं जिस परमात्माको स्वर्ग मानता हूँ, उसकी सत्ता सदा सर्वत्र वर्तमान है; अतः मेरे लिये कहींपर भी एकदेशी स्वर्ग नहीं है । प्रभो ! मैं सभी जगह संतुष्ट रहता हूँ और सभी स्थानोंमें विचरण करता हूँ । मेरे मनमें किसी प्रकारकी इच्छा तो है नहीं, अतः मैं सर्वत्र आनन्दसे परिपूर्ण रहता हूँ । इन्द्र ! इन्हीं सब कारणोंसे एक स्थानमें स्थित रहनेवाले किसी ऐसे एकदेशी स्वर्गमें जानेकी तो मैं इच्छा ही नहीं करता । इसलिये मैं आपकी आज्ञाका पालन नहीं कर सकूँगा ।
इन्द्रने कहा—साधुशिरोमणे ! जिन्हें ज्ञातव्य वस्तुका ज्ञान प्राप्त हो गया है तथा जिनकी बुद्धि परिपूर्ण हो गयी है, उनके लिये भोगोंका उपभोग करना और न करना बराबर है; अतः आपके लिये भोगोंका सेवन करना उचित है । देवराज इन्द्रके यों कहनेपर भी जब राजा मौन ही रहे, तब इन्द्रने पुनः कहा—'राजन् ! जब आपकी ऐसी ही धारणा है, तब मैं ही यहाँसे चला जाता हूँ ।' यों कहकर 'राजन् ! आपका कल्याण हो' यह आशीर्वाद देते हुए इन्द्र वहीं अन्तर्धान हो गये । देवराजके अदृश्य होते ही उनके साथका देवसमूह भी क्षणभरमें अदृश्य हो गया ।
( सर्ग १०६-१०७ )
राजा शिखिध्वजके क्रोधकी परीक्षा करनेके लिये चूड़ालाका मायाद्वारा राजाको जार-समागम दिखाना और अन्तमें राजाके विकारयुक्त न होनेपर अपना असली रूप प्रकट करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इन्द्र-दर्शनकी मायाका उपसंहार करके चूड़ाला मन-ही-मन विचार करने लगी—'बड़े सौभाग्यकी बात है, जो विषय-भोगोंकी लालसा इन नरेशके मनको आकृष्ट करनेमें समर्थ न हो सकी । इन्द्रके आनेपर भी ये निर्विकार शान्त ही रहे । इनके शरीरके अवयवोंकी स्थिति पूर्ववत् समान रही तथा बिना किसी प्रकारके क्षोभ एवं अवहेलनाके इन्होंने इन्द्रके साथ उचित व्यवहार भी किया । अतः अब मैं पुनः एक ऐसे मायाप्रपञ्चकी रचना करूँगी, जिसमें राग-द्वेषकी प्रधानता रहेगी और जो बुद्धिका अपहरण करनेवाला होगा । फिर उसके द्वारा आदर-पूर्वक इनकी परीक्षा करूँगी।' ऐसा निश्चय करके रात्रिमें चन्द्रोदय होनेपर उसने उस वनमें सुन्दरी मदनिकाका रूप धारण कर लिया । उस समय जब राजा शिखिध्वज