सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
( ४२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [बौद्ध- त्पादस्य हेतूपनिबन्धः' बीजादङ्कुरोऽङ्कुरात्काण्डकाण्डान्नालो नालाद्गर्भस्ततः शूकं ततः पुष्पं ततःफलम् । न चात्र बाह्ये समुदाये कारणं बीजादि कार्य्यमङ्कुरादि वा चेतयते । अहम- ङ्कुरं निर्वर्त्तयामि अहं बीजेन निर्वर्त्तित इति । एवमाध्यात्मि- केऽपि कारणद्वयमवगन्तव्यम् । पुरःस्थिते प्रमेयाब्धौ ग्रन्थ विस्तरभीरुभिरुपरम्यते ॥५३॥ उक्त कार्यकारणभाव चेतनके बिना नहीं होसकेगा ऐसी आशङ्काम् कहते हैं ( प्रतीत्येति ) कारणकी सत्तामें उसके सम्बन्धसे उत्पत्तिमें अनुकूलता है वही धर्मता धर्ममें स्थित है किसी कार्यमें भी कोई चेतन कहीं उपलब्ध नहीं होते हैं प्रतीत्य- समुत्पादमें जो दो भेद कहे हैं उनमं हेतूपनिबन्धन यथा बीजसे अङ्कुर, अङ्कुरसे काण्ड, काण्डसे नाल, नालमे गर्भ, गर्भसे शूक, शूकस पुष्प, पुष्पसे फल यह क्रम है इस बाह्य समुदायमें बीजादि, कारण अथवा अङ्कुरादि कार्य कोई भी चेतन नहीं है मैं बीजसे उत्पन्न हुआ किंवा मैं अङ्कुरको उत्पन्न करता हूं ऐसा ज्ञान भी किसीको नहीं है । इसी प्रकार आध्यात्मिकमेंभी जानना । ग्रन्थ गौरवभयसे उस विषयको छोडदिया इति + ॥ ५३ ॥ तात्पर्य-प्रत्ययोपनिबन्धन हेतूपनिबन्धनरूप प्रतीत्य समुत्पाद है वह बाह्य और आध्या त्मिक भेदसे दो प्रकारकी है बाह्य कहचुका आध्यात्मिक हेतूपनिबन्धन इस प्रकार है "यदि द्मविद्याप्रत्यया मस्कारा यावज्जातिप्रत्यय जरामरणादीति " अविद्या यदि न होती तो सस्कार न होते इस प्रकार जाति (जन्म) भी नहीं होती यदि जाति न होती तो जरामर- णादिक भी नहीं होते उसमें अविद्या ऐसा नहीं जानती कि में सस्कारको उत्पन्न करती हूँ सस्कारको भी ऐसा ज्ञान नही कि मुझको अविद्याने उत्पन्न किया इसी प्रकार यावज्जातिको भी ऐसा ज्ञान नहीं है मैं जरामरणादिकी उत्पादन करती हूं । न जरामरणादिको ऐसा ज्ञान है कि मैं जातिसे उत्पन्न हूं । तथापि अविद्यादिक रहनेपर चेतनान्तरसे अनाधिष्ठित अचेतनमें सस्कारादि स्वयं उत्पन्न होते हैं । जिस प्रकार बीजादिमें अङ्कुरादि उत्पन्न होते हैं । केवल प्रचुरता मयोगसे अमुक उत्पन्न होता है एतावन्मात्र दृष्ट है । चेतनाधिष्ठान कहीं इसमें भी दृष्ट नहीं।प्रत्ययोपानबन्धन पृथिवी, जल, तेज,वायु, आकाश, विज्ञान, धातुओंगे समूहमे काय उत्पन्न होता है । पृथिवी शरीरको काठिन्य उत्पादन करती है जल स्नेह तेज शरीरके खाये पिये वस्तुको पचाते हैं वायु श्वासादि सञ्चालन करता है आकाश शरीरके भीतर छिद्र बना रखता है मनोविज्ञानको विज्ञान धातु उत्पादन करता है जब आध्यात्मिक पृथिव्यादि धातु अविकल होते हैं तब शरीरकी उत्पत्ति होती है । उसमें पृथिव्यादिको यह ज्ञान नहीं कि मैं शरीरका काठिन्यादि उत्पादन करता हूं न काठिन्यादिको ही यह ज्ञान है कि मुझे पृथिव्या-
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ४३ )' तदुभयनिरोधस्तदनन्तरं विमलज्ञानोदयो वा मुक्ति , तन्निरोधो- पायो मार्ग स च तत्त्वज्ञानं, तच्च प्राचीनभावनावलाद्भवतीति परमं रहस्यम् । सूत्रस्यान्तं पृच्छतां कथितं भवन्तश्च सूत्रस्या- न्तं पृष्टवन्तः सौत्रान्तिका भवन्त्विति भगवताभिहिततया सौ- त्रान्तिकसंज्ञा सञ्जातेति ॥ ५४ ॥ उक्त हेतुपनिबन्धन और प्रत्ययोपनिबन्धनरूप प्रतीत्य समुत्पाद निरोधानन्तर- निर्मल ज्ञानका उदय ही मुक्ति है निरोधका उपाय मार्ग है वह तत्त्वज्ञान है वह पूर्व- संस्कारसे होता है यही परम रहस्य है । सूत्रका अन्त पूछनेपर बुद्धने कहा आप लोगोने सूत्रका अन्त पूछा है इस लिये सौत्रान्तिक हों इससे वे सौत्रान्तिक संज्ञासे प्रसिद्ध होगये हैं ॥ ५४ ॥ केचन बौद्धा बाह्येषु गन्धादिषु आन्तरेषु रूपादिस्कन्धेषु सत्स्वपि तत्रानास्थामुत्पादयितुं सर्वं शून्यमिति, प्राथमिकान् विनेया- नचीकथत् भगवान्, द्वितीयांस्तु विज्ञानमात्रग्रहाविष्टान् विज्ञा- नमेवैकं सदिति, तृतीयानुभयं सत्यमित्यास्थितान् विज्ञेयमनु- मेयमिति, सेयं विरुद्धा भाषेति वर्णयन्तो वैभाषिकाख्यया ख्या- ता एषा हि तेषां परिभाषा समुन्मिषति । विज्ञेयानुमेयत्ववादे प्रात्याक्षिकस्य कस्यचिदप्यर्थस्याभावेन व्याप्तिसंवेदनस्थाना- भावेनानुमानप्रवृत्त्यनुपपत्ते सकललोकानुभवविरोधश्च । ततश्चा र्थो द्विविध , ग्राह्योऽध्यवसेयश्च ॥ ५५ ॥ बाह्य गन्धादिक और आन्तरिकरूपादि स्कन्धके होनेपर भी उसम अनास्था उत्पन्न होनेके लिये सब शून्य है इस प्रकार प्राथमिक शिष्य मात्रसे बुद्धने कहा विज्ञानमे दिने उत्पादन किया तथापि चेतनांतरसे अनाधिष्ठित पृथिव्यादिसे शरीर उत्पन्न होता है जैसे बीजमे अङ्कुर होता है इस दृष्ट प्रतीत्य समुत्पादको अन्यथा नहीं कहसक्ते ॥
आग्रद्दवाले दूसरे शिष्यसे विज्ञान ही सत् हे यह कहा उभयको सत्य माननेवाले तीसरे शिष्यने विज्ञेय अनुमेय हे ऐसा कहा तब चतुर्थ शिष्यने उनकी परस्पर विरुद्ध भाषा बताई इस कारण वह वैभाषिक संज्ञासे प्रसिद्ध होगया सामान्यत यह उनका सिद्धान्त हे विज्ञेयको अनुमेय मानोगे तो व्याप्तिज्ञानकी अपेक्षा होगी व्याप्ति ग्रह प्रत्यक्षदृष्टि हीमें होगा प्रत्यक्षदृष्ट वस्तु अनुमेयवादीके मतमें न होनेसे व्याप्ति ग्रहका स्थल न होनेसे अनुमानकी प्रवृत्ति न होगी अनुमान न होनेपर समस्त लोकव्यव- हार भी विरुद्ध होंगे इस लिये ग्राह्य ओर अध्यवसाय भेदसे अर्थ दो प्रकार मानने होंगे ॥ ५५ ॥ तत्र ग्रहणं निर्विकल्पकरूपं प्रमाणं कल्पनापोढत्वात् । अध्यव- साय सविकल्पकरूपोऽप्रमाणं कल्पनाज्ञानत्वात् । तदुक्तम्- "कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्षं निर्विकल्पकम् । विकल्पो वस्तुनिर्भा- सादसंवादादुपप्लव ॥" इति । "ग्राह्यं वस्तुप्रमाणं हि ग्रहणं यदि- तोऽन्यथा । न तद्वस्तु न तन्मानं शब्दलिङ्गेन्द्रियादिजम् " ॥ इति च ॥ ५६ ॥ ग्रहण ( प्रत्यक्ष ) निर्विकल्पक अर्थात् प्रकार विशेष्य ससर्ग आदि शून्य ही प्रमाण है । नाम रूप जात्यादिका नाम कल्पना है उससे रहित कल्पनापोढ है । अध्यवसाय सविकल्पकरूप है यथा अय घट इत्यादि वह अप्रमाण है उक्तार्थमें प्राचीन सम्मति कहते हैं (कल्पनेत्यादि) कल्पनारहित ओर भ्रमरहित निर्विकल्पक प्रत्यक्ष प्रमाण हे निर्विवाद जात्यादिविशिष्ट वस्तुप्रकाश उपप्लव ( भ्रम ) है यदि प्रमाणसिद्ध ग्राह्य हो तो उस वस्तुसे पृथक ग्रहण भी प्रमाण होगा । यद्वा ग्रहण ( प्रत्यक्ष ) प्रमाण हो तो ग्राह्य पदार्थ भी अवश्य होगा अन्यथा जो शब्द लिङ्ग इन्द्रियादिसे प्रतीयमान ग्राह्यातिरिक्त हो तो वह न वस्तु हे ओर न प्रमाण ही हे जो वस्तुका ग्रहण नही करसकता है ॥ ५६ ॥ ननु सविकल्पकस्याप्रामाण्ये कथं ततः प्रवृत्तस्यार्थप्राप्ति सं- वादश्चोपपद्येयातामिति चेन्न तद्भद्रं मणिप्रभाविवयमणिविकल्प- न्यायेन पारम्पर्येणार्थप्रतिलम्भसम्भवेन तदुपपत्ते । अव- शिष्टं सौत्रान्तिकप्रस्तावे प्रपञ्चितमिति नेह प्रतन्यते ॥ न च विनेयाशयानुरोधेनोपदेशभेदः साम्प्रदायिको न भवतीति भणि-
दर्शनम् [ भाषाटीकासमेत. ] ( ४६) तव्यम् । यतो भणितं बोधिचित्तविवरणे ॥ “देशना लोकनाथानां सत्त्वाशयवशानुगा । विद्यन्ते बहुधा लोके उपायैर्बहुभि किल ॥ गम्भीरोत्तानभेदेन क्वचिच्चोभयलक्षणा. । भिन्ना हि देशना- ऽभिन्ना शून्यताऽद्वयलक्षणा ॥ ” इति ॥ ५७ ॥ ( ननु इति ) सविकल्पक यदि प्रमाण ही नही तो जब घट इत्यादि सविकल्पक ज्ञानसे प्रवृत्तको वस्तु प्राप्ति और निर्विवाद व्यवहार कैसे होते हैं बहुत अच्छा प्रश्न हे इसका उत्तर सुनो मणियोंकी प्रभाको देखकर मणिभ्रमसे प्रवृत्त पुरुषको परम्प रासे जिस प्रकार मणिप्राप्त होता है तद्वत् परम्परासे वस्तुकी प्राप्ति होजाती है शेष सौत्रान्तिक सिद्धान्तके अनुसार ही है एक ही आचार्यका शिष्य भेद होनेसे भिन्न २ रूपसे उपदेश करना सम्प्रदायविरुद्ध होगा क्योंकि उपदेशभेद होनेसे सिद्धान्तभेद अवश्य हो जायगा इस आशयसे कहते है ( न च विनेयभेदेत्यादि ) ( देशनेति ) लोकनाथ जगतके स्वामी अर्थात् बुद्धदेवजीका उपदेश प्राणियोंकी बुद्धिके अनु- सार होता है, कुछ सिद्धान्तभेदसे नही अधिकारीके भेद होनेसे केवल उपायमात्रका भेद है । लोकमें भी एक ही प्राप्य वस्तुके लिये अनेक उपाय होते हैं । ( गम्भी- रोति ) गम्भीर ( उत्तम ) उत्तान ( अधम ) उभयलक्षण ( मध्यम ) भेदसे भिन्न है. यह अधिकारीके बुद्धिका तारतम्य है, परन्तु सब मतके सिद्धान्त केवल एक शून्यतत्त्वमें है ॥ ५७ ॥ द्वादशायतनपूजा श्रेयस्करीति बौद्धनये प्रसिद्धम् “अर्थानु- पार्य बहुशो द्वादशायतनानि वै । परित पूजनीयानि किम- न्यैरिह पूजितैः ॥ ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चैव तथा कर्मेन्द्रियाणि च । मनो बुद्धिरिति प्रोक्तं द्वादशायतनं बुधैः " इति ॥ ५८ ॥ बौद्धसिद्धान्तमें श्रोत्रादि द्वादशस्थानकी पूजा ही श्रेयस्कर प्रसिद्ध है, उसीको दिखाते हैं, ( अर्थानित्यादि ) प्रचुर धनको उपार्जन करके द्वादश आयतनकी भलीभाँतिसे पूजा करे संसारमें अन्यपूजन सब विफल है । श्रोत्र, चक्षु, घ्राण त्वक्, रसना यह पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पायु, पाणि, पाद, उपस्थ, वाक रूप पाच कर्मे- न्द्रिय, मन और बुद्धि इन्हीका ज्ञानी लोग द्वादशायतन कहते हैं ॥ ५८ ॥ विवेकविलासे बौद्धमतमित्थमभ्यधायि “बौद्धानां सुगतो देवो विश्वं च क्षणभङ्गुरम् । आर्य्यसत्त्वाख्यया तत्त्वचतुष्टयमिदं
( ४६ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ बौद्ध- न्धमात् ॥ दुःखमायतनं चैव ततः समुदयो मतः । मार्गश्चेत्यस्य च व्याख्या क्रमेण श्रूयतामतः ॥ दुःखं संसारिणः स्कन्धास्ते च पञ्च प्रकीर्त्तिताः । विज्ञानं वेदना संज्ञा संस्कारो रूपमेव च॥पञ्चेन्द्रियाणि शब्दाद्या विषयाः पञ्च मानसम् । धर्मायतन- मेतानि द्वादशायतनानि तु ॥ रागादीनां गणोऽयं स्यात् समु- देति नृणां हृदि । आत्मात्मीयस्वभावाख्यः स स्यात् समुदयः पुनः ॥ ५९ ॥ विवेकविलास नाम ग्रन्थमें बौद्धमत निम्नलिखित प्रकार कहा है बौद्धोंके देव सुगत ( बुद्ध ) ही हैं । संसार क्षणिक है चार्यसत्त्व अर्थात् “दुःख, समुदय, तन्निरोध, मार्गाश्चत्वारः आर्यस्य बुद्धाभिमतानि तत्त्वानि” इस सूत्रोक्त चार ही तत्त्व हैं उसीकी गणना करते हैं ( दुःखमायतनेत्यादि ) क्रमसे उसका व्याख्यान कहते हैं विज्ञान, वेदना, संज्ञा, संस्कार, रूप यही पञ्च स्कन्ध सांसारिक दुःख है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस गन्ध यही पञ्च विषय हैं पञ्च ज्ञानेन्द्रिय मन और बुद्धि यही द्वादशायतन हैं मनुष्यके हृदयमें जो रागद्वेषादि गण हैं वही समुदाय है आत्मा आत्मीय स्वभावको भी समुदाय कहते हैं ॥ ५९ ॥ *क्षणिकाः सर्वसंसारा इति या वासना स्थिरा । स मार्ग इति विज्ञेयः स च मोक्षोऽभिधीयते ॥ प्रत्यक्षमनुमानञ्च प्रमाणद्वि- तयं तथा । चतुःप्रस्थानिका बौद्धाः ख्याता वैभाषिकादयः ॥ अर्थो ज्ञानान्वितो वैभाषिकेण बहु मन्यते । सौत्रान्तिकेन प्रत्यक्षग्राह्योऽर्थो न बहिर्मतः ॥ आकारसहिता बुद्धियोंगाचारस्य सम्मता। केवलां संविदं स्वस्थां मन्यन्ते मध्यमाः पुनः ॥ रागादि- ज्ञानसन्तानवासनाच्छेदसम्भवा । चतुर्णामपि बौद्धानां मुक्तिरेषा प्रकीर्त्तिता ॥ कृत्तिः कमण्डलुर्मौण्ड्यं चीरं पूर्वाह्नभोजनम् । सङ्घो रक्ताम्बरत्वं च शिश्रिये बौद्धभिक्षुभिः ॥” इति ॥ ६०॥ इति सर्वदर्शन संग्रहे बौद्धदर्शनं समाप्तम् ॥ २ ॥ सम्पूर्ण संसार क्षणिक है ऐसी जो स्थिरवासना है उसीको मार्ग कहते हैं यही मोक्ष है । प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाण हैं । सौत्रान्तिक वैभाषिकादि भेदसे चार
दर्शनम् ] भापाटीकासमेत. । ( ४७ ) सिद्धान्तवादी बौद्ध हे वैभाषिक ज्ञानसे युक्त ( बाह्य ) अर्थको नही मानते हे सौत्रा- न्तिक ज्ञानग्राह्य बाह्य अर्थको नहीं मानते योगाचारके मतमें विषयाकारयुक्त बुद्धिमात्र है माध्यमिक लोग शुद्ध संवित्को ही मानते हैं । उक्त चारोंके मतोंमें रागादि ज्ञानसन्तानकी वासनाकी उच्छेद ही मुक्तिहै कृत्तिः ( चर्म मृगछाला आदि ) १ कमण्डलु २ शिरका सशिख मुण्डन ३ चीर ४ दिनका भोजन अर्थात् रात्रिमें भोजन नहीं करना ५ सघ अर्थात् दो चारके साथ रहना ६ रक्तवस्त्र धारण करना इतने बौद्धसन्यासियोंके चिह्न हैं ॥ ६० ॥ इति सर्वदर्शनसङ्ग्रहे बौद्धदर्शन समाप्तम् । अथार्हतदर्शनम् । तदित्थ मुक्तकच्छानां मतमसहमाना विवसनाः कथञ्चित् स्था- यित्वमास्थाय क्षणिकत्वपक्षं प्रतिक्षिंपन्ति याद्यात्मा कश्चिन्ना- स्थीयेत स्थायी तदा लौकिकफलसाधनसम्पादनं विफलं भवेत् । न ह्येतत् सम्भविष्यति अन्यः करोत्यन्यो भुङ्क इति । तस्माद्योऽहं प्राक् कर्माकरवं सोऽहं सम्प्रति तत्फलं भुञ्जे इति. पूर्वापरकालानुयायिनः स्थायिनस्तस्य स्पष्टप्रमाणावसिततया पूर्वापरभागविकलकालकलावस्थितिलक्षणक्षणिकतां परीक्ष- कैरर्हद्भिर्न परिग्राह्या ॥ १ ॥ पूर्वोक्त क्षणिकत्व शून्यवादिरूप मुक्तकच्छ ( बौद्ध ) के मतको न सहनेवाले विवेसन ( नग्न ) स्थिरत्व मानकर क्षणिकत्व पक्षका निराकरण करते हैं यदि आत्मा- को स्थिर नहीं माने तो पशु अन्नादि फलसाधन समस्त लोकव्यवहार भी विफल होजायेंगे क्योंकि आत्मा क्षणिक होनेसे क्रियाके उत्तरकाल हीमें नष्ट होपायगा कालान्तरभावी फलोत्पत्तिकालमें आत्मा नहीं यह भी सम्भव नहीं कि कर्म कोई करे फल दूसरे भोगें जो मैंने पहिले कर्म किया उसका फल मै भोगता हू इस प्रकार प्रत्यभिज्ञांस पूर्वोत्तर कालसम्बन्धी स्थायी आत्मा स्पष्ट प्रतीत होता है अतः पूर्वोत्तरभागशून्य कलात्मके कालस्थितिरूप क्षणिकत्व तर्ककुशलोंके अनादर- णीय है ॥ १ ॥ १ कच्छ न लगाना बौद्ध सन्यासियोंमें नग्न रहना दिगम्बर जैन सन्यासियोंमें प्रसिद्ध है ।
(४८) सर्वदर्शनसंग्रहः । [अर्हत- अथ मन्येथाः "प्रमाणबलादायातः प्रवाहः केन वार्य्येत" इति न्यायेन यत् सत् तत् क्षणिकमित्यादिना प्रमाणेन क्षणिक- तायाः प्रमिततया तदनुसारेण समानवर्त्तिनामेव प्राचीनः प्रत्ययः कर्मकर्त्ता उत्तरः प्रत्ययः फलभोक्ता ॥ न चातिप्रसङ्गः कार्य्य- कारणभावस्य नियामकत्वात् । यथा मधुररसभावितानामाम्र- बीजानां परिकल्पितायां भूमावुप्तान्यामङ्कुरकाण्डस्कन्धशाखाप- ल्लवादिषु तद्द्वारा परम्परया फले माधुर्य्यनियमः, यथा वा ला- क्षारसावसिक्तानां कार्पासबीजादीनामङ्कुरादिपारम्पर्येण कार्पा- सादौ रक्तिमनियमः । यथोक्तम्- "यस्मिन्नेव हि सन्ताने आहिता कर्मवासना । फलं तत्रैव बध्नाति कार्पासे रक्तता यथा ॥ कुसुमे बीजपूरादेर्यल्लाक्षाद्युपसिच्यते । शक्तिराधीयते तत्र काचित्तां किं न पश्यसि॥" इति ॥ २ ॥ बौद्धमतसे पूर्वपक्ष (अथोते) नहि सिद्धेऽनुपपन्नं नामेति न्यायसे यत्सत् तत् क्ष- णिकमिति अनुमान प्रमाणसिद्ध क्षणिकत्व प्रवाहको कौन वारण करसकता है अत पूर्वक्षणवृत्ति विज्ञानात्माको कर्त्ता और उत्तरक्षणवृत्तिको फलभोक्ता मानने पड़ेगा यदि पूर्वोत्तरक्षणवृत्तित्वमात्रसे कर्तृत्वभोक्तृत्वव्यवस्था करोगे तो देवदत्तका किया हुआ कर्मका फल यज्ञदत्तको प्राप्त होने लगेंगे क्योंकि पूर्वोत्तरक्षणवृत्तित्व दोनोंमें समान ही है इस आशयसे शंका करते हैं (नचोते) अतिप्रसङ्ग अतिव्याप्ति (उत्तर) (कार्यकारणेति) पूर्वकालवृत्ति विज्ञानात्मा उत्तरविज्ञानका कारण है और उत्तरविज्ञान का कार्य है उसमें भी यद्वृत्तिवासनासे जो उत्पन्न होता है उन दोनों विज्ञानमें पर- स्पर कार्यकारण भाव है तथाच कार्यकारणभाव ही कर्तृत्व और भोक्तृत्वका नियामक होगा अर्थात् कारण विज्ञानात्मवृत्तिक्रियाजन्यफलके कार्यविज्ञानात्मा भोगेगा एवञ्च उक्त अतिप्रसंग नहीं होगा जिस प्रकार मधुर रससे भावित आम्रबीजको अच्छी जोती हुई भूमिमें रोपनेपर अङ्कुर, स्तम्भ, स्कन्ध, शाखा, पत्र और पुष्पादि परम्परासे मधुर फल उत्पन्न होता है खट्ट बीजसे उत्पन्न फल खट्टा होता है और भी लाक्षार्क रससे भिगोया हुआ कपासका बीज अङ्कुरादि परम्परासे कपासमें रक्तवर्ण उत्पन्न करता है उसी प्रकार आत्मामें भी वासनासन्तान परम्परासे फलभोग नियम होनायगा । अभियुक्तोक्ति भी कहते हैं (यथोक्तमिति) जिस आत्माके वासना (संस्कार)
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । सन्तानमें कर्मवासना सक्रान्त हो उसमें उस कर्मका फल होता है जिस प्रकार कपासमें रक्तता होती है । ( कुसुमेति ) बीजपूर अर्थात् बिजोरानीम्बूके पुष्पमें लाक्षादिके जलसे भिजानेपर रूपान्तर रसान्तर गन्धान्तरादिको उत्पन्न करनेवाली जो शक्ति होती है उसी प्रकार आत्मसन्तानमे भी होगी यही तात्पर्य है ॥ २ ॥ तदपि काशकुशावलम्बनकल्पं विकल्पासहृत्वात् ॥ जलध- रादौ दृष्टान्ते क्षणिकत्वमनेन प्रमाणेन प्रमितं प्रमाणान्तरेण वा । नाद्यः, भवदभिमतस्य क्षणिकत्वस्य क्वचिदप्यदृष्टचर- त्वेन दृष्टान्तसिद्धावस्थानुमानस्याद्युत्थानात् । न द्वितीय , तेनैव न्यायेन सर्वत्र क्षणिकत्वसिद्धौ सत्त्वानुमानवैफल्यापत्तेः, अर्थक्रियाकारित्वं सत्त्वमित्यङ्गीकारे मिथ्यासर्पदंशादेरपि अर्थक्रियाकारित्वेन सत्त्वापाताच्च । अतएवोक्तम्-उत्पाद- व्ययध्रौव्ययुक्तं सदिति ॥ ३ ॥ उक्त पूर्वपक्षका उत्तर-( तदपीति ) यह भी जलमें डूबते हुएको कुशाका अव- लम्वन करना है । क्योंकि वक्ष्यमाण विकल्पमे एक भी पक्षको स्थिर नही कर सकता । तथाहि यत् सत् तत् क्षणिक यथा जलधर इस अनुमानमें दृष्टान्तभूतजल- धरमें क्षणिकत्व इसी अनुमानसे साधना है या प्रमाणान्तरसे सिद्ध है ? प्रथमपक्षको नहीं कहसकते क्योकि दृष्टान्त वही होता है जो सिद्ध और उभयवादीसम्मत हो आपका अभिमत ( अनेकक्षणवृत्तित्वे सति कालवृत्तित्वरूप ) क्षणिकत्व कहीं भी दृष्ट नही जाता अत दृष्टान्त न होनेसे इस प्रकारका अनुमानका उत्थान ही असम्भव हे । यदि अनुमानान्तरसे कही तो उसी अनुमानसे सर्वत्र क्षणिकत्व सिद्ध होही जायगा पुन यत्सद्दिति सत्त्वानुमानान्तरकल्पनाप्रयास भी व्यर्थ है । अर्थक्रिया ( फलजनकक्रिया ) कारित्वरूप सत्त्वका लक्षण भी अयुक्त है क्योंकि मिथ्यासर्पका काटना भी तादृशज्ञान भयादिरूप अर्थक्रियाकारी होनेसे उसको भी सत्यत्वप्रसङ्ग होगा । अतएव तत्त्वार्थसूत्रमें उत्पादेत्यादि सत्त्वका लक्षण कहा है इसका अर्थ यह हे कि चेतन या अचेतन द्रव्यको सजातीय भावान्तरापत्ति उत्पाद है जैसे मृत्पिण्डका घटरूप परिणाम पूर्वावस्थाका त्याग व्यय है यथा घटोत्पत्तिमें पिण्डका नाश अनादिपरिणाम स्वभाव होनेसे स्थिरता ध्रुव है यथा मृत्पिण्ड घटाद्य वस्थामें मृत्का सम्बन्ध तयाच तादृश त्रितययुक्त द्रव्य है ॥ ३ ॥ ४
( ५० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- अथोच्येत सामर्थ्यासामर्थ्यलक्षणविरुद्धधर्माध्यासात् तत्सिद्धि- रिति तदसाधु स्यात् । स्याद्वादिनामनेकान्तानादस्यैतयोरपि विरोधासिद्धे । यदुक्तं कार्पासादिवृष्टान्त इति तदुक्तिमात्रं युक्ते- रनुक्तेः तत्रापि निरन्वयनाशस्यानङ्गीकाराच्च ॥ न च सन्तानिव्यतिरेकेण सन्तान प्रमाणपदवीमुपारोढुमर्हति । तदु- क्तम्—'सजातीया क्रमोत्पन्ना प्रत्यासन्ना परस्परम् । व्यक्त- यस्तासु सन्तानः स चैक इति गीयते ॥” इति ॥ ४ ॥ ( अथेति ) वर्तमान अर्थक्रिया सम्पादन कालमें अतीतानागत अर्थक्रियाको बीजादि नहीं करता अतः विरुद्धधर्माध्यस्त होनेसे “बीजादयः प्रतिक्षणं भिन्ना विरु- द्धधर्माध्यस्तत्वादित्यादि” अनुमानसे भी वस्तुका क्षणिकत्व सिद्ध हे यह भी कथन अयुक्त है स्याद्वादीके मतसे सर्वत्र अनेकान्त अर्थात् अस्ति नास्तीति विरुद्ध- धर्माध्यस्तत्व ही रहता है अतः उनके मतमें विरोध असिद्ध हे कर्तृत्वभोक्तृत्वादि प्रति नियमके लिये जो कार्पास दृष्टान्त दिया वह भी निर्युक्तिक होनेसे कथनमात्र है बीजादिकमे भी निरन्वय ध्वंस नहीं होता। तात्पर्य यह है कि, कार्यका ध्वंस कारणा- वस्थाप्राप्ति है । निरन्वय अर्थात् निरुपाख्य अभावरूप नहीं यथा घटका ध्वंस होकर कपालरूप होगया तब भी उसमें मृत्तिका रहती है कपाल नष्ट होकर पिण्ड या चूर्ण होनेपर भी मृत्तिकारूप व्यवहार बना रहता है अतः अवयी मृत सत्य ही रहता है यदि कहो यद्यपि घटादिके ध्वंसमे अन्वयी मृदादि बनी रहती है तथापि बीजादिमें एव तप्तलोहम छोडी हुई जलबिन्दुमे अन्वयी नही उपलब्ध होता हे यहभी नहीं वहा पर भी घटादि दृष्टान्तसे अनुमान किया जाता है अनुमानस्वरूप अङ्कुरादि अनुवर्तमान बीजादि अन्वयी रूपह्य है कार्य होनेसे घटके समान तप्त- लोहम नष्ट जल भी तेजके वेगसे मेघमण्डलमें अथवा सूर्यमण्डलमें जाता है ऐसा अनुमान करना होगा अत अन्वयीका विनाश न होनेसे निरन्वय विनाश कही नहीं होता हे । अतएव “उदाविन्दौ च सिन्धौ च तोयभावो न भिद्यते । विनष्टेऽपि ततो विन्दौवास्ति तस्यान्वयोऽम्बुधौ ॥” इत्यादि सङ्गत होता है ॥ ४ ॥ न च कार्यकारणभावनियमोऽतिप्रसङ्गं भक्तुमर्हति । तथाहि उपाध्यायबुद्धद्यनुभूतस्य शिष्यबुद्धि स्मरेत तदुपचितकर्मफ- लमनुभवेद्वा तथा च कृतप्रणाशाकृताभ्यागमप्रसङ्ग । तदुक्तं
दर्शनम् [ भाषाटीकासमेतः । ( ५१ )
सिद्धसेनवाक्यकारेण-" कृतप्रणाशाकृतकर्मभोगभवप्रमोक्ष- स्मृतिभङ्गदोषान् । उपेक्ष्य साक्षात् क्षणभङ्गमिच्छन्नहो महासाहसिकः परोऽसौ ॥" इति ॥ ५ ॥ ( नचेति ) सन्तानसे भिन्न सन्तान भी प्रमाणगम्य नहीं क्योंकि एकजातीय हो क्रमसे उत्पन्न हो परस्पर मिला हो ऐसे व्यक्तिको सन्तान कहते हैं वह एक ही कहा जाता है कार्यकारणभाव नियम भी अतिव्याप्तिको हटा नहीं सकता अन्यथा आचार्यके अनुभूत वस्तुका स्मरण शिष्यको होने लगेगा एवं आचार्यकृत कर्मका फल शिष्यको भोगना पड़ेगा । उपालम्भ करते हैं ( तदुक्तमिति ) कृतका नाश, अकृत कर्मका भोग, संसारका उच्छेद मोक्षभंग स्मरणानुपपत्त्यादि दोषोंकी उपेक्षा कर क्षणभंगको माननेवाला बौद्ध बड़ा साहसिक अर्थात् हठी है ॥ ५ ॥ किञ्च क्षणिकत्वपक्षे ज्ञानकाले ज्ञेयस्यासत्त्वेन ज्ञेयकाले ज्ञान- स्यासत्त्वेन च ग्राह्यग्राहकभावानुपपत्तौ सकललोकयात्रास्तमि- यात्। न च समसमयवर्त्तित्त्वं शङ्कनीया सव्येतरविषाणवत् कार्य्य- कारणभावासम्भवेनाग्राह्यस्यालम्बनप्रत्ययानुपपत्तेः । अथ भिन्नकालस्यापि तस्याकारार्पकत्वेन ग्राह्यत्वं, तदप्यपेशलम् क्ष- णिकस्य ज्ञानस्याकारार्पकताश्रयताया दुर्वचत्वेने साकारज्ञान- वादे प्रत्यादेशेन निराकारज्ञानवादेऽपि योग्यतावशेन प्रतिकर्म- व्यवस्थायाः स्थितत्वात् ॥ ६ ॥ दोषान्तर भी कहते हैं ( किञ्चेति ) क्षणिक पक्षमें ज्ञानकालमें ज्ञेय घटादि और ज्ञेयकी सत्ताकालमें ज्ञानको न रहनेसे ग्राह्य ( घटादि ) ग्राहक ज्ञान अनुपपन्न होगा तो तन्मूलक समस्त लोकव्यवहार भी नष्ट होगा ( नचेति ) ज्ञान और ग्राह्यको एक- कालवृत्तित्व भी नहीं कहसकते क्योंकि समकालोत्पन्न होनेसे वामदक्षिण शृङ्गके समान परस्पर कार्यकारणभाव असम्भव होगा अत ग्राह्य न होनेसे विषयालम्बन प्रत्ययत्व असम्भव होगा ( अथेति ) ज्ञानसे पूर्वकालमें ग्राह्यकी सत्ता होनेसे भी आकारार्पकत्व नहीं कहसकते क्योंकि क्षणिक ज्ञानमें आकारका आश्रयत्व ही दुर्निरूप है ज्ञानकालमें विषय और विषयकालमें ज्ञान दोनों न होनेसे ज्ञानमें विषयाकार सम- र्पकत्वके असम्भव होनेपर ज्ञानवैचित्र्य नहीं होसकेगा घटपटादि विचित्रज्ञान आकार वैलक्ष्ण्यमें ही होता है। कहा भी है "अर्थेनैव विशेषे हि निराकारतया धियामिति"
( ५२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- अतः ज्ञानवैचित्र्यके लिये क्षणिकत्व पक्षमें भी कथञ्चित् विषयाकार समर्पकत्व स्वीकार करना चाहिये इस आशङ्कासे कहते हैं (निराकारज्ञान वादऽपीति) तात्पर्य साकार- ज्ञानवादमें विषय नष्ट होनेपर भी घटपाटादिरूप नियत आकारको ग्रहण करता है अर्थात् घटज्ञान घटकेही आकारका ग्रहण करता है पट आकारको नही ग्रहण करता यह व्यवस्था जिस प्रकार होती है उसी प्रकार निराकार ज्ञानवादमें भी नियम हो जायगा अत साकारत्व मानना भी व्यर्थ हे ॥ ६ ॥ तथा हि-प्रत्यक्षेण विषयाकाररहितमेव ज्ञानं प्रतिपुरुषमहमित्या- क्या घटादिज्ञानमनुभूयते न तु दर्पणादिवत् प्रतिबिम्बक्रान्तम् । विषयाकारधारित्वे ज्ञानस्यार्थे दूरनिकटादिव्यवहाराय जला- ञ्जलिर्वितर्येत । न चेदमिष्टापादनमेष्टव्यं दवीयान् महीधरो नेदीयान् दीर्घो बहुरिति व्यवहारस्य निराबाधं जागरूकत्वात् । न चाकाराधायकस्य तस्य दवीयस्त्वादिशालितया तथा व्य- वहार इति कथनीयं दर्पणादौ नथानुप्लम्भात् ॥ ७ ॥ उसीको उपपादन करते है ( तथाहीति ) प्रत्यक्षसे जो ज्ञान होता है वह घटा दिविषयाकार रहित ही अहङ्काररूपसे घटादिज्ञान अनुभूत होता है दर्पणादिमें मुख जिस प्रकार प्रतिबिम्बित होता है उसी प्रकार विषयाकारप्रतिबिम्बित होकर ज्ञान नही प्रतीत होता । दूषणान्तर ( विषयाकारेति ) यदि ज्ञानमे विषयाकारार्पण मानो तो ज्ञान आत्मामें रहता है उसी ज्ञानमें विषयाकार भी अर्पित होनेसे विषयमें दूरत्व समीपत्वादि व्यवहार गगनकुसुम समान होगा । यदि कहो यह दोष क्या देते हो क्षणिकवादीके मतमें इष्टापत्ति है ऐसा भी नहीं कहसकते क्योंकि शिंशपावृक्ष दूर है अमुक वट वृक्ष बहुत ऊंचा है इत्यादि बडे २ बुद्धिमानोंसे लेकर पामरपर्यन्तको प्रतीति होती है । यह शुक्ति रजतादिकी समान बाधित भी नहीं आकारसमर्पक वृक्षादिक दूर होनेसे ऐसा प्रतीत होता है सो भी नहीं कहसकते क्योंकि दृष्टान्तभूत दर्पणादिमें मुखादिक दूर होनेपर भी दर्पणादिसन्निहितही प्रतीत होता है ॥ ७ ॥ किञ्चार्थादुपजायमानं ज्ञानं यथा तस्य नीलाकारतामनुकरोति तथा यदि जडतामपि तर्ह्यर्थवत् तदपि जडं स्यात् । तथा च वृद्धिमिष्टवतो मूलमपि ते नष्टं स्यादिति महतकष्टमापन्नम् ॥८॥
दर्शनम् ]। भाषाटीकासमेत। ( ५३ ) दूषणान्तर ( किञ्चेति ) अर्थ ( घटादि ) से उत्पन्न ज्ञान जिस प्रकार नीलादि ( घटादि ) आकारका अनुकरण करेगा । अर्थात् जिस प्रकार विषयाकार ज्ञानमें अर्पित होता है । उसी प्रकार घटादि विषय वृत्ति जडताका भी अनुकरण करेगा तो विषयके समान ज्ञानभी जड होने लगेगा, इष्टापत्ति कह नहीं सकते क्योंकि ज्ञानका प्रकाशरूपत्व सर्वसम्मत है जड होगा तो घटादिवत् ज्ञान भी स्वयं प्रकाश नहीं रहेगा । तब तो सूदके लालचसे दीवालियाके पास रुपये जमा करनेसे जिस प्रकार मूलका भी नाश हो जाता है उसी प्रकार विषयका अनुकरण करने ज्ञानका स्वयंप्रकाशरूप स्वरूपभी नष्ट होजायगा ॥ ८ ॥ अथैतद्दोषपरिजिहीर्षया ज्ञानं जडतां नानुकरोतीति ब्रूषे हन्त तर्हि तस्याग्रहणं न स्यादित्येकमनुसन्धित्सतोऽपरं प्रच्यवत इति न्यायापातः । ननु माभूत् जडताया ग्रहणं कि न छिन्नं तद्ग्रहणेऽपि नीलाकारग्रहणे तयोर्भेदा नैकान्तो वा भवेत् । नीलाकारग्रहणे चागृहिता जडता कथं तस्यानुरूपं स्यात् अपरथा गृहीतस्य स्तम्भस्यागृहीत त्रैलोक्यमपि रूपं भवेत् । तदेतत् प्रमेयजात प्रतापचन्द्रप्रभृतिभिरर्हन्मतानुसारिभि प्रमे- यकमलमार्त्तण्डादौ प्रबन्धे प्रपञ्चितमिति ग्रन्थभूयस्त्वभयात्रो- पन्यस्तम् ॥ ९ ॥ ( अथेति ) इस दोषसे छूटनेके लिये यदि कहो ज्ञान जडताका अनुकरण नहीं करेगा वि तो जडताका ग्रहण भी नहीं होगा अर्थात् 'घटो जड' ऐसा ज्ञान होता रहा सो अब नहीं होगा इस प्रकार एककी रक्षा करनेपर दूसरा नष्ट होजायगा अर्थात् ज्ञान जडाकारताका अनुकरण करे तो स्वयंप्रकाशक नष्ट होगा यदि न अनुकरण करे तो विषयकी जडत्व प्रतीति न होगी । ( ननु इति ) जडताका ग्रहण न होनेपर भी घटका ग्रहण होनेसे घटाकार ओर जडताका अत्यन्त अभेद अर्थात् व्यभिचार न होनेसे जडताका भी ग्रहण हो जायगा यह कहना भी असंगत हे क्योंकि नीला- कारके ग्रहणसे अगृहीत जडताका ग्रहण कैसा होसकेगा, यदि ग्रहण होता हो तो घट जड हे ऐसा कहनेपर घटसे जन्य जड है ऐसी प्रतीति होने लगेगी क्योकि घटा- कार गृहीत होनेसे ज्ञानरूप होगा, जटाकार अगृहीत होनेमे उससे भिन्न होगा ( अपरथेति ) अगृहीत भी गृहीतका स्वरूप होगा तो जब स्तम्भ इत्यादि खमका
३. आर्हत / जैन दर्शन (स्याद्वाद व सप्तभङ्गी नय)
( ५४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- ग्रहण होनेपर समस्त संसार उसका रूप होनेसे समस्त संसारका ज्ञान होनेलगेगा यह विषय प्रमेयकमलमार्तण्डादिमें विस्तृत रूपसे निरूपित होनेसे यहां संक्षेप करके छोड देता हू ॥ ९ ॥ तस्मात् पुरुषार्थाभिलाषुकैः पुरुषैः सौगती गतिर्मानुगन्तव्या अपित्वार्हंत्येवार्हणीया । अर्हत्स्वरूपञ्च चन्द्रसूरिभिराप्तनिश्च- यालङ्कारे निरटङ्कि—“सर्वज्ञो जितरागादिदोषस्त्रैलोक्यपूजितः। यथास्थितार्थवादी च देवोऽर्हन् परमेश्वरः ”॥ इति । ननु न कश्चित् पुरुषविशेष सर्वज्ञपदवेदनीय प्रमाणपद्धतिम- ध्यास्ते सद्भावग्राहकस्य प्रमाणपञ्चकस्य तत्रानुपलम्भात् । तथा चोक्तं तौतातितैः । “सर्वज्ञो दृश्यते तावन्नेदानीमस्मदादिभिः । दृष्टो न चैकदेशोऽस्ति लिङ्गं वा योऽनुमापयेत् ॥ १० ॥ अर्हन्के स्वरूपका वर्णन सर्वज्ञ इत्यादि समस्त वस्तुको साक्षात्कार करनेमें समर्थ रागद्वेषादि शून्य सम्पूर्ण संसारमें पूजित, यथार्थ वक्ता, परमेश्वर जो देव है वही अर्हन् हे ( ननु इति ) सर्वज्ञ इत्यादि जो विशेषण दिया सो असंगत है क्योंकि प्रत्यक्षादि पांच प्रमाणोंमेंसे एक भी प्रमाण तादृश पुरुषविशेषके प्रतिपादक न होनेके कारण सर्वज्ञपदवाच्य पुरुषका मानना प्रमाण विरुद्ध है । ( तोतातीतै ) बौद्धधर्मप्रचारक प्रमाणभावका उपपादन करते हैं तत्र पूर्वार्धसे अस्मदादिके दृष्टि- गोचर न होनेसे प्रत्यक्षप्रमाणोद्भव कहा ( दृष्टो नचेकेति ) उत्तरार्धसे अनुमान- गम्यका भी अभाव कहा पूर्ववत् शेषवत् सामान्य तो दृष्टभेदसे अनुमानके तीन भेद सांख्योंने माने यथा है समुद्रजलकी एक बूंद पानकरके अवशिष्टको क्षारजल्त्वका अनुमान करते हैं यह शेषवत् अनुमान है मेघगर्जना सुनकर वृष्टिका अनुमान होता हे यह पूर्ववत् हे धूमध्वजका एकदेशधूमाको देखकर जो अग्निका अनुमान है वह समान्यतो दृष्ट है सर्वज्ञ विषयम ऐसा कोई दृष्टलिङ्ग नहीं है जिससे अनु- मान होसके ॥ १० ॥ न चागमस्त्विति कश्चिन्नित्यसर्वज्ञबोधक_ । न च तत्रार्थवादाना तात्पर्य्यमपि कल्पते॥न चान्यार्थप्रधानेस्तैस्तदस्तित्वं विधीयते । न चानुवदितुं शक्यं पूर्वमन्यैरबोधित ॥ अनादेरागमस्यार्थो न च सर्वज्ञ आदिमान् । कृत्रिमेण त्वसत्येन स कथं प्रतिपाद्यते ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ५५ ) अथ तद्वचनेनैव सर्वज्ञोऽन्यैः प्रतीयते । प्रकल्प्येत कथं सिद्धि- रन्योन्याश्रययोस्तयोः ॥ सर्वज्ञोक्ततया वाक्यं सत्यं तेन तद्- स्तिता । कथं तदुभयं सिद्ध्येत्सिद्धमूलान्तराहते ॥ असर्वज्ञप्र- णीतात्तु वचनान्मूलवर्जितात् । सर्वज्ञमवगच्छन्तस्तद्वाक्योक्तं न जानते ॥ ११ ॥ अब छह श्लोकोंसे शब्दप्रमाणका भी अविषय कहते हैं । नित्य सर्वज्ञ बोधक कोई आगम विधिवाक्य नहीं अर्थवाद भी ऐसा कोई नहीं जिसका सर्वज्ञमें तात्पर्य हो अर्थवादका स्वतःप्रामाण्य नहीं किन्तु ( विध्युपष्टम्भकत्व ) अर्थात् विधिनिषेधका प्राशस्त्य निन्दाबोधन द्वारा प्रामाण्य है अतः अयथार्थप्रधान होनेसे सर्वज्ञकी सत्ताका बोधन नहीं करसकता अनुवाद भी उक्तार्थका होता है अतः पूर्व किसी वाक्या- न्तरसे उक्त न होनेसे अनुवादवाक्य भी तादृश नहीं अनादि अपौरुषेय आगमका अर्थ सादि सर्वज्ञ हो भी नहीं सकता । तात्पर्य अर्थबोधनके लिये शब्दका प्रयोग होता है आगम ( वेद ) अनादि है उस कालमें आपका सर्वज्ञ नहीं है तब किस प्रकार बोधन करसकेगा । यदि कोई कृत्रिम आधुनिक वाक्य प्रमाण कहो तो उस वाक्यका सत्यत्वमे विश्वास न होनेमे वह कैसे बोधन करसकेगा । यदि कहो अर्हन्का बनाये आगमसे ही अस्मदादिका सर्वज्ञका ज्ञान होगा अर्थात् उन्हींके वचनसे ही सर्वज्ञ सिद्ध होगा यह भी अन्योन्याश्रयग्रस्त होनेसे असिद्ध है । अन्यो- न्याश्रयको दिखाते हैं ( सर्वज्ञोक्तेत्यादि ) सर्वज्ञके उक्ति होनेसे वचनकी सत्यता है वचनहीसे सर्वज्ञका अस्तित्व है अतः सर्वज्ञोक्तिसे अतिरिक्त प्रमाणान्तरके बिना दोनों सिद्ध नहीं होसकते असर्वज्ञप्रणीत निर्मूल वाक्यसे सर्वज्ञकी सिद्धि मानने- वाले स्ववचनविरोध भी नहीं जानते हैं ॥ ११ ॥ सर्वज्ञसदृशं किञ्चिद्यदि पश्येम सम्प्रति । उपमानेन सर्वज्ञं जानी- याम ततो वयम् ॥ उपदेशोऽपि बुद्धस्य धर्माधर्मादिगोचर अन्यथा नोपपद्येत सार्वज्ञ्यं यदि नाभवत्॥"इत्यादि । अत्र प्रतिविधीयते यदभ्य सर्वज्ञके सदृश कोई दृष्ट हो तो उपमानसे सर्वज्ञकी प्रतीति होती सोभी नहीं ( उप- देशोपीत्यादि ) श्लोकद्वयमे अर्थापत्तिका भी अविषय कहते हैं । यदि कोई सर्वज्ञ न हो तो बुद्धका धर्माधर्मादि विषयक उपदेश भी अनुपपन्न होगा अतः सर्वज्ञ मानना
( ५६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- चाहिये यह भी नही उपदशके सत्यत्वमें कोई प्रमाण नहीं हे अत केवल व्योमोहही से उपदेश किया है ॥ १२ ॥ धायि सद्भावग्राहकस्य प्रमाणपञ्चकस्य तत्रानुपसन्नादिति तद्- युक्तं तत्सद्भावादेकस्यानादे सद्भावात् । तथाहि, कश्चिदात्मा सकलपदार्थसाक्षात्कारी तद्ग्रहणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्रति- बन्धप्रत्ययत्वाद् यद्यद्ग्रहणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्रतिबन्ध- प्रत्ययं तत्तत्साक्षात्कारी । यथा अपगततिमिरादिप्रतिबन्धं लोच- नविज्ञानं रूपसाक्षात्कारी । तद्ग्रहणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्र- तिबन्धप्रत्ययश्च कश्चिदात्मा । तस्मात् सकलपदार्थसाक्षात्का- रीत्ति न तावदशेषार्थग्रहणस्वभावत्वमात्मनोऽसिद्धं चोदनाबाला त्रिसिलार्थज्ञानात् ॥ १३ ॥ सर्वज्ञ सद्भाव समर्थक उत्तर ( अत्र प्रतिविधीयत इत्यादि ) क्षुद्रोपद्रवा विद्राव्या- इत्यन्त । प्रत्यक्षादि प्रमाण पञ्चकमेंसे एक भी सर्वज्ञ सद्भाव प्रयोजक नहीं है यह कहना अयुक्त है क्योंकि अनुमान ओर आगम दोनों सर्वज्ञमें प्रमाण हो सकते हैं प्रथम अनुमान दिखाते हैं ( तथा हीत्यादि ) कश्चिदात्मा ( कोई जीव ) यह पक्ष है सकल पदार्थ साक्षात्कारी ( समस्तवस्तुओंको जाननेवाले ) यह साध्य है । तद्ग- ह्णेत्यादि प्रतिबन्धप्रत्ययत्वात् यह हेतु है । समस्त वस्तु ग्रहण स्वभाव होते हुए प्रतिबन्धक सकल दुरित क्षीण होनेसे, जो जिस वस्तुका साक्षात्कार करनेमें समर्थ होकर प्रतिबन्धकज्ञानशून्य हो तब वह उसको प्रत्यक्ष करते हैं जिस प्रकार तिमिर अन्धकारादि प्रतिबन्धक न रहनेपर नेत्र रूपको प्रत्यक्ष करता है यह दृष्टान्त है एवम्भूत कोई आत्मा है यह उपनय है अतः सकलपदार्थको प्रत्यक्ष करनेवाले ( सर्वज्ञ ) हैं यह निगमन है । हेतुमें तद्ग्रहणस्वभावत्वरूप विशेषणासिद्धिकी आशङ्का करके परिहार करते हैं । ( न तावदित्यादि चोदनेति ) चोदनाविधि तथा च विविधास्रसे आत्माको अशेषार्थ ग्रहणस्वभावत्व सिद्ध है ॥ १३ ॥ नान्यथानुपपत्त्या सर्वमनेकान्तात्मक, सत्त्वादिति व्याप्तिज्ञा- नोत्पत्तेश्च । चोदना हि भूतं भवन्तं भविष्यन्तं सूक्ष्मं व्यवहितं १ बुद्धादयो ह्यवेदाज्ञा स्तेषां वेदायसम्भवात् । उपदेश कृतोऽन्येभ्यो मोहादेव केवलम् ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । (५७)
विप्रकृष्टमित्येवंजातीयकमर्थमवगमयतीत्येवंजातीयकैरध्वरमी- मांसागुरुभिर्विधिप्रतिषेधविचारणानिबन्धनं सकलार्थविषय- ज्ञानं प्रतिपद्यमानैः सकलार्थग्रहणस्वभावकत्वमात्मनोऽ- भ्युपगतम्। न चाखिलार्थप्रतिबन्धकावरणप्रक्षयानुपपत्तिः स- म्यग्दर्शनादित्रयलक्षणस्यावरणप्रक्षयहेतुभूतस्य सामग्रीविशे- षस्य प्रतीतत्वात् अनया मुद्रयापि क्षुद्रोपद्रवा विद्राव्याः ॥१४॥ यथा 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि विधिवाक्योंसे भूत भविष्यत् वर्तमान, एव सूक्ष्म, व्यवहित, दूर, निकटादि वस्तुज्ञान पूर्वमीमांसकोंने माना हे तैसे आर्हंत सिद्धान्तमें भी विधिप्रतिषेधात्मक आगमबलसे अतीतानागत सूक्ष्म व्यवहितादि निखिलार्थ ग्रहण सम्भव होगा किञ्च अर्हन्मुनिने स्याद्वाद ( अनेकान्तपक्ष ) अर्थात् अनि- श्चित पक्ष माना हे उसमें व्याप्तिज्ञानकी अपेक्षा होती हे अतः व्याप्तिज्ञान वस्तुप्र- त्यक्षके बिना अनुपपन्न है इससे भी सर्वज्ञ सिद्ध हो सकता है । विशेष्यासिद्धि- माशक्य परिहार ( नचाखिलार्थेत्यादि ) समस्तवस्तुसाक्षात्काका प्रतिबन्धक जो दुरित है उसका विनाश अनुपपन्न है यह नहीं कहसकते क्योंकि सम्यकदर्शन ज्ञानचारित्रादिसे प्रतिबन्धक आवरणविनाश सम्भव है ॥ १४ ॥ नन्वावरणप्रक्षयवशादशेषविषयं विज्ञानं विशदं मुख्यप्रत्यक्षं प्रभवतीत्युक्तम्। तदयुक्तम्, तस्य सर्वज्ञस्यानादिमुक्तत्वेनावर- णस्यैवासम्भवादिति चेत्तन्न, अनादिमुक्तत्वस्यैवासिद्धेन सर्वज्ञोऽनादिमुक्त मुक्तत्वादितरमुक्तवत् बद्धापेक्षया च मुक्त- व्यपदेश• तद्रहिते चास्याप्यभावः स्यादाकाशवत् ॥ १५ ॥ ( नन्विति ) आवरणक्षय होनेपर निखिलविषयक स्फुटावभासरूप प्रत्यक्ष होता है, यह कहना अयुक्त है कारण सर्वज्ञ जब अनादि और मुक्त है तब आवरण ही अस- म्भव है । निराकरण ( नेति ) अनादित्व और मुक्तत्व दोनों परस्पर बाधित हैं जैसे घटध्वंस अनादि नहीं होता किन्तु घट फूटनेपर होता हे तैसे ही मोक्ष भी बन्धनि- वृत्ति है न की सामान्यतः बन्धाभावमात्र अत. यदि मुक्त है तो अनादि नहीं हो सकता इसमे अनुमान भी दिखाते हैं सर्वज्ञ यह पक्ष है अनादि मुक्त नहीं यह साध्य है मुक्त होनेसे यह हेतु है अन्यमुक्तवत् दृष्टान्त है । उक्तार्थका उपपादनभी करते हैं बद्धके अपेक्षा मुक्त होता है यदि बद्ध न होता तो आकाशादिवत् कभी भी मुक्त नहीं हो सकता ॥ १५ ॥
( ५८ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ आर्हत- नन्वनादे क्षित्यादिकार्यपरम्परायाः कर्तृत्वेन तत्सिद्धिः । तथाहि क्षित्यादिकं सकर्तृकं कार्य्यत्वाद् घटवदिति, तदप्यस- मीचीनं कार्य्यत्वस्यैवासिद्धे । न च सावयवत्वेन तत्साधनमि- त्यभिधातव्यं यस्मादिदं विकल्पजालमवतरति ॥ १६ ॥ नैयायिकादिकाके अभिमत नित्य सर्वज्ञ ईश्वर साधक अनुमानको पूर्व पक्ष करके दूषित करते हैं (नन्वनादेरित्यादि) यह नियम है कि जो जो कार्य है वह सब सकर्तृक होते हैं तथाच पृथिव्यादि सभी घटादिवत् कार्य होनेसे सकर्तृक होगा. कर्ता वही होसकता है जो स्वकार्यके उपयुक्त उपादान सम्प्रदानादि निखिलवस्तु- ओके साक्षात्कारमें समर्थ हों अतः पृथिव्यादि समस्त कार्यके तादृश कर्ता सर्वज्ञ ही होसक्ते हैं उक्तानुमानको प्रयोजक हेतुको स्वरूपासिद्धि दोषसे दूषित करते हैं (तदप्यसमीचीनमिति) कार्यत्व ही असिद्ध है हेतुको स्वरूपासिद्धत्व परिहारके लिये अनुमानान्तरसे कार्यत्वसाधन शंका करते हैं (नचेति) जहां जहां सावयवत्व है वहा वहा कार्यत्व रहता है ऐसी व्याप्ति है तथा च पृथिव्यादिक पक्ष है, कार्यत्व साध्य है सावयवत्व हेतु है, घटवत् दृष्टान्त है इसको भी स्वरूपासिद्धिसे दूषित करते हैं (यस्मादित्यादि) ॥ १६ ॥ सावयवत्वे किमवयवसंयोगित्वम्, अवयवसमवायित्वम्, अव- यवजन्यत्वम्, समवेतद्रव्यत्वम्, सावयवबुद्धिविषयत्वं वा । न प्रथम आकाशादावनैकान्त्यात् । न द्वितीय सामान्यादौ व्यभिचारात्। न तृतीय साध्याविशिष्टत्वात् । न चतुर्थः विक- ल्पयुगलार्गल्यहगलत्वात्। समवायसम्बन्धमात्रवद्द्रव्यत्वं समवे- तद्रव्यत्वम् अन्यत्र समवेतद्रव्यत्वं वा विवक्षितं हेतु क्रियते । आद्ये गगनादौ व्यभिचार , तस्यापि गुणादिसमवायत्वद्रव्य- त्वयो संभवात् । द्वितीये साध्याविशिष्टता अन्यशब्दाथेषु सम- वायकारणभूतेष्ववयवेषु समवायस्य साधनीयत्वात् । अभ्युपग- म्येतदभाणि वस्तुतस्तु समवाय एव न समस्ति प्रमाणाभावात्। नापि पञ्चमः आत्मादिनानैकान्त्यात् तस्य सावयवबुद्धिविषय-
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( ५९ ) त्वेऽपि कार्य्यत्वाभावात् । न च निरवयवत्वेऽप्यस्य सावयवार्थ सम्बन्धेन, सावयवत्वबुद्धिविषयत्वमौपचारिकमित्यप्यन्य निरव- यवत्वे व्यापत्वाविरोधात् परमाणुवत् ॥ १७ ॥ विकल्पोंको दिखाते हैं ( सावयवत्वेति ) सावयवत्वंसं आपको क्या विवक्षित है अवयवोंका जिसमें संयोग हो वह विवक्षित है १ या अवयवका जिसमें समवाय हो वह विवक्षित है २ अथवा अवयवसे उत्पन्नत्व विवक्षित है ३ किंवा समवेत द्रव्यत्व विवक्षित है ४ यद्वा सावयवबुद्धि विषयत्व विवक्षित है ५ ? एक- एकको क्रमशः दूषित करते हैं ( न प्रथमेत्यादि ) आकाशको जितने अवयव हैं वह सब आकाशहीमे संयुक्त है परन्तु नैयायिकोंके मतमें आकाशमें कार्यत्व न होनेसे सावयवत्वरूप हेतु साध्याभावमें वर्तमान होनेके कारण अनैकान्त्य अर्थात् व्यभि- चारी होगया आकाशमें सावयवत्व नहीं है ऐसा तो नहीं कहसकते क्योंकि यदि सावयव नहीं होता तो परमाणुवत् व्यापक भी नहीं होसकता अथवा घटाकाशका जिस प्रकार संयोग है उस प्रकार घटावयव कपालादिकेसाथ भी संयोग होनेसे अव- यवसंयोगित्वरूप सावयवत्व आकाशमें गया कार्यत्व नहीं गया ( नाद्वितीयेोति ) पूर्ववत् घटत्वद्रव्यत्वादि सामान्य जिस प्रकार घटमें समवेत हैं तिस प्रकार घटावय- वमें भी समवेत है क्योंकि घटत्वादिक घटादिके सब अवयवोंमें व्याप्त है अत. अव- यवसमवायित्व सामान्यादिमें गया किन्तु कार्यत्व नहीं गया अतः यहभीसामान्यमें व्यभिचारी होगया ( न तृतीयेोति ) साध्यसे अविशिष्ट है । तात्पर्य-अवयव समुदाय ही घटादि कार्य है वस्त्वन्तर नहीं ऐसे कहनेवालोके मतमे कार्यत्ववत् अवयवजन्य- त्वरूप सावयवत्व भी साध्यनीय होनेसे साध्योपेक्षा कुछ भी विशेष नहीं हुआ । ( नचतुर्थोति ) विकल्पद्वयसे निरुत्तरित है तथाहि समवेत द्रव्यत्वसे क्या समवाय- सम्बन्धवान् होकर द्रव्यत्ववान् हो यही विवक्षित है, या अन्यत्र समवेत होकर द्रव्यत्ववान् हो यह विवक्षित है । प्रथम पक्ष आकाशमें व्यभिचारित है क्योकि आकाशमे भी गुणादिका समवायत्व और द्रव्यत्व दोनों हैं। यदि अन्यत्र समवेत- त्वादि द्वितीय पक्ष कहो सो भी ठीक नही कारण पटसे अन्यत्वेन अभिमत पटावयव-, तन्तुमें समवेत ( समवायसम्बन्धसे विद्यमान ) होनेके कारण पटादिको अन्यत्र समवेतत्व कहोगे परन्तु पटके कारणीभूत पटावयवत्वसे विवक्षित तन्तु पटसे अन्य है इसमें प्रमाण न होनेके कारण यह भी अनुमानान्तरसे साधन करना होगा, अतः कार्यत्ववत् अन्यत्र समवेतत्वरूप सावयवत्व भी साध्यनीय होनेसे साध्यसे विशेष कुछभी नहीं हुआ अर्थात् हेतुका स्वरूप ही असिद्ध है । " तुष्यतु दुर्जन "
( ६० ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ आर्हत- इस न्यायसे अनभिमतको भी मानकर इतना प्रपञ्च बढाया वस्तुत समवायसत्तामें कोई प्रमाण ही नही । पञ्चमका खण्डन करते हैं ( आत्मादिनेति ) सावयवबुद्धि- विषयत्व आत्मा सावयव है ऐसा ज्ञानवेद्यत्व आत्मामें है परन्तु कार्यत्व नहीं इस लिये हेतु व्यभिचारी होगा । आत्माके निरवयवत्वका खण्डन करते है ( नचेत्यादि ) आत्मा वस्तुत' निरवयव है तथापि सावयव घटादि अर्थके साथ सम्बन्ध होनेसे सावयवबुद्धिबोध्यत्व आरोपित है ऐसा भी नहीं कहसकते क्योंकि निरवयवपदार्थ व्यापक नहीं होसकता अन्यथा परमाणु भी व्यापक होनेलगेगा ॥ १७ ॥ किञ्च किमेक कर्त्ता साध्यते कि वा स्वतन्त्र । प्रथमे प्रासा- दादौ व्यभिचार स्थपत्यादीनां बहूनां पुरुषाणां तत्र कर्तृत्वो- पलम्भात् । न द्वितीय लाघवादेनेनैव सकलजगज्जनननोत्प- त्तावितरवैयर्थ्यापातात् ॥ १८ ॥ उक्तानुमानको प्रकारान्तरसे भी दूषित करते हैं ( किञ्चेत्यादि ) क्या कार्यत्व हेतुसे एक कर्ता सिद्ध करते हो १ या स्वतन्त्र कर्ता २ विशाल गृह प्रासादादि कार्य एकसे किया हुआ कहीं दृष्ट नहीं आता किन्तु तक्षकादि अनेक शिल्पियोंसे निर्मित ही दृष्ट हे अत एककर्तृकत्वरूप साध्य गृहादिकमें व्यभिचरित है यदि स्वतन्त्र कर्ता मानो तो घटपटादि समस्त कार्य उसीसे उत्पन्न हो जाते पुन' कुलालादि कर्ताकी आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिये ॥ १८ ॥ तदुक्त वीतरागस्तुतौ-“कर्त्तास्ति नित्यो जगत स चैक स सर्वग सन् स्ववश स सत्य । इमा कुहेवा कुविडम्बना स्यु- स्तेषां न येषामनुशासकस्त्वम् ॥ " इति ॥ अन्यत्रापि-कर्त्ता न तावदिह कोऽपि यथेच्छया वा दृष्टोऽन्यथा कटकृतामपि तत्प्रसङ्ग । कार्ये किमत्र भवतापि च तक्षकाद्यैराहत्य च त्रिभुवन पुरुष करोति ॥ " इति । तस्मात् प्रागुक्तकारणत्रि- तयमलादावरणक्षये सार्बज्ञ्यं युक्तम् ॥ १९ ॥ इसमें प्राचीन सम्मति भी कहते हैं ( तदुक्तमिति ) समस्त संसारका एक कर्ता है वह व्यापक सत् और स्वतन्त्र है । इत्यादि दुराग्रह और विडम्बना उन्हीं लोगोंकी है जिनके शिक्षक अर्हत न थे ( अन्यत्रापीति ) स्वेच्छासे इस संसारको बनानेवाला कोई नहीं दृष्टि आता है यदि सम्पूर्ण संसारका कर्ता अन्य किसीको मानो तो
घटपटादि कार्य भी उन्हीसे होजाता । बढई लोहार कुम्हार तन्तुवाय प्रभृतिसे आपको प्रयोजन ही क्या है यह ईश्वरकारणवादी ऊपर उपालम्भ है। उपसंहार (तस्मादिति ) पूर्वोक्त सम्यक्ज्ञान सम्यग्दर्शन सम्यक्चरित्ररूप कारणत्रयसे आवरण ( अविद्या ) निवृत्ति होनेसे सर्वज्ञत्व उपपन्न होता है यह सिद्ध हुआ ॥ १९ ॥ न चास्योपदेष्ट्रन्तराभावात् सम्यग्दर्शनादित्रितयानुपपत्ति- रिति भणनीयम् पूर्वसर्वज्ञप्रणीतागमप्रभवत्वादमुष्या शेषार्थ- ज्ञानस्य । न चान्योन्याश्रयतादिदोष आगमसर्वज्ञपरम्पराया बीजाङ्कुरवदनादित्वाङ्गीकारादित्यलम् ॥ २० ॥ यदि कहो अर्हन्को उपदेष्टा न होनेसे सम्यग्दर्शनादिका सम्भव नहीं सो भी नहीं पूर्वपूर्व सर्वज्ञप्रणीत आगमसे इनको भी सर्वज्ञत्व होसकता है यदि कहो आगमसे सर्वज्ञत्व होगा सर्वज्ञ होनेपर आगमप्रणयन और उसका प्रामाण्य पूर्वकारिकोक्त प्रकार अन्यो- न्याश्रयग्रहग्रस्त है सो भी नहीं जिस प्रकार बीजके बिना अङ्कुर और अङ्कुरके बिना बीज न होसकनेपर भी बीजाङ्कुर दोनों अनादि होनेसे अन्योन्याश्रय नहीं माने जाते हैं तिसी प्रकार सर्वज्ञ और तत्प्रणीत आगमपरम्परा दोनों अनादि होनेसे अन्योन्याश्रय दोष नहीं होता हे ॥ २० ॥ रत्नत्रयपदवेदनीयतया प्रसिद्धं सम्यग्दर्शनादित्रितयमर्हत्प्रवचन- संग्रहपरे परमागमसारे प्ररूपितं ‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग 'इति। विवृतञ्च योगदेवेन येन रूपेण जीवाद्यर्थो व्यव- स्थितस्तेन रूपेणार्हता प्रतिपादिते तत्त्वार्थे विपरीताभिनिवेश- रहितत्वाद्यपरपर्यायं श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् । तथा च तत्त्वार्थ- सूत्रं “तत्त्वार्थे श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्” इति ॥ २१ ॥ सम्यग्दर्शनादि त्रितय मोक्षमार्गत्वेनाभिमत रत्नत्रयवाच्यं प्राचीनसम्मति कहते हैं ( परमागमसारे निरूपितमिति-विवृतचेति ) जो वस्तु जिस रूपसे वर्तमान हो उसी प्रकार जिनदेवप्रतिपादित तत्त्वार्थमें विपरीत अभिनिवेश छोडकर श्रद्धा सम्पादन करनेका नाम सम्यग्दर्शन हे सूत्रकारने भी कहा है “तत्त्वार्थश्रद्धान सम्यग्दर्शनम्” इति । तत्त्वसे निश्चित किया जाय वह तत्त्वार्थ है अथवा तत्त्वरूप अर्थ तत्त्वार्थ हे तच्च “जीवाजीवास्त्रवसंवरवन्धनिर्जरामोक्षास्तत्वम् ” इत्यादि सूत्रोक्त हे । यदि अर्थश्र- द्धा इतनाही कहते तो यावत् घटादि अर्थ श्रद्धाको भी मोक्षमार्गत्वप्रसङ्ग होगा इस के १ ध्वानस्त्यादिदोष । इति वा ।