सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
५६२ सात्वतसंहिता स्तनाभ्यां त्रिकलौ पार्श्वौ त्रियवं स्तनमण्डलम् । यवोन्नतं तथा चाग्राद् विस्तृतं तेन चूचुकम् ॥ १३४ ॥ पार्श्व भाग स्तन से दूर दो कला का बनावे । स्तनमण्डल तीन यव का बनावे । स्तन का चुचुक आगे की ओर बढाते हुए एक-एक यव ऊँचा बनावे ॥ १३४ ॥ लोचनं त्रियवं सार्धं कक्षमानमुदाहृतम् । स्कन्धमानविनिर्मुक्तं पृष्ठमंसावधेः समम् ॥ १३५ ॥ कक्ष (काँख) का मान साढे तीन यव युक्त लोचन निर्माण करे । उसे स्कन्ध के मान से अलग रखे । पीठ एवं कन्धे तक उसे समान रूप में निर्माण करना चाहिए ॥ १३५ ॥ द्रोणीनिकाशसदृशं मध्यराशेः समांसलम् । कक्षान्तर्वेष्टनं विद्धि पञ्चतालं सुलोचनम् ॥ १३६ ॥ वह द्रोणी (दोना) के समान हो । मध्यराशि से मांसल युक्त हो । कक्षान्तर का वेष्टन पञ्चताल मान का होना चाहिए ॥ १३६ ॥ विनाङ्गुलद्वयेनैव द्वे ताले द्विगुणीकृते । यवत्रयसमायुक्ते विद्धि तत्कुक्षिवेष्टनम् ॥ १३७ ॥ त्रियवोनं कलामानं विज्ञेयं नाभिमण्डलम् । तन्मानं त्रियवोनं तु तन्निम्नत्वं विधीयते ॥ १३८ ॥ उस कुक्षि का वेष्टन दो अङ्गुल कम दो ताल का दुगुना करे । उसमें तीन यव और मिला देवे तब कुक्षि का वेष्टन बन जाता है । तीन यव से कम कला मान का नाभिमण्डल निर्माण करे । उसकी गहराई तीन यव से कुछ कम करे ॥ १३७-१३८ ॥ परिधिर्नाभिमध्ये तु त्रितालः सत्रिलोचनः । षड्गोलकं च तन्मानपरिध्यर्थं कटेः स्मृतम् ॥ १३९ ॥ नाभि के मध्य की परिधि सत्रिलोचन तीन ताल की बनावे । कटि पर्यन्त परिधि के लिये उसका मान छः गोलक करे ॥ १३९ ॥ करिकुम्भोपमौ पीनौ परितः पञ्चगोलकौ । स्फिजौ कौपीनराजी च द्व्यङ्गुला मूलतः स्मृता ॥ १४० ॥ हाथी के कुम्भ के समान मोटा, चारों ओर पाँच गोलक का परिमाण वाला स्फिक् (नितम्ब) करे कौपीन राजी मूल से दो अङ्गुल की बनावे ॥ १४० ॥ परितोऽङ्गुलमाना सा मेढ्रं तु त्रिकलं स्मृतम् ।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५६३ चतुर्यवं च तत्कोशं वेष्टनं तु षडङ्गुलम् ॥ १४१ ॥ द्व्यङ्गुलौ वृषणौ दैर्घ्यान्मूलान्तसमविस्तृतौ । परितो द्व्यङ्गुलं विद्धि वायुरन्ध्रं सुवर्तुलम् ॥ १४२ ॥ वह चारों ओर एक अङ्गुल प्रमाण में होनी चाहिये । मेढ्र (लिंग) तीन कला का होना चाहिये और उसका कोश चार यव का होना चाहिये । उसकी गोलाई छः अङ्गुल होनी चाहिये । अण्डकोश लम्बाई चौड़ाई में समान दो अङ्गुल का तथा वायु का रन्ध्र (गुदा) चारों ओर से गोला दो अङ्गुल का बनावे ॥ १४१-१४२ ॥ ऊरुमानं परिज्ञेयं मध्यभूमेर्नवाङ्गुलम् । षट्कलं मूलदेशाच्च अग्रान्तं त्रिकलं स्मृतम् ॥ १४३ ॥ मध्य भूमि से नव अङ्गुल के मान का ऊरु होना चाहिये । मूल देश से छः कला का तथा अग्रान्त तीन कला का होना चाहिये ॥ १४३ ॥ हीनमेकाङ्गुलेनैव द्विकलं जानुमण्डलम् । विस्तारेणोन्नतत्वेन चतुर्यवसमं तु तत् ॥ १४४ ॥ एक अङ्गुल से कम दो कला मान का जानु मण्डल होना चाहिये । विस्तार और उन्नति में उसे ४ यव का बनाना चाहिये ॥ १४४ ॥ जङ्घामूले परिज्ञेयं वेष्टनं नवगोलकम् । द्विसप्ताङ्गुलकं मध्ये सार्धपञ्चाङ्गुलं ततः ॥ १४५ ॥ जङ्घा, मूल में वेष्टन का मान नव गोलक होना चाहिये । मध्य में चौदह अङ्गुल और उसके बाद साढ़े पाँच अङ्गुल होना चाहिये ॥ १४५ ॥ अत्रापि वेष्टनाद् विद्धि तृतीयांशेन विस्तृतम् । मध्यमूलावसानेभ्यो विस्तारमनुगुण्य तु ॥ १४६ ॥ यहाँ पर भी वेष्टन से मध्य, मूल तथा अन्त तक का विस्तार तृतीयांश से विस्तृत करे ॥ १४६ ॥ भुजाभ्यां मध्यदेशस्य तथाङ्गुलिगणस्य च । ऊरुयुग्मस्य जङ्घाभ्यामापाद्या द्विपहस्तता ॥ १४७ ॥ दोनों भुजाओं के मध्य देश अङ्गुलिगणों को, दोनों ऊरुओं को, दोनों जाङ्घों को हाथी के हाथ के समान उतार चढ़ाव युक्त निर्माण करे ॥ १४७ ॥ सतालभागमानं च दैर्घ्यं वै चारणं स्मृतम् । पार्ष्णी द्विगोलकतते तन्मध्ये साङ्गुले कले ॥ १४८ ॥
५६४ सात्वतसंहिता चरण की दीर्घता ताल के भाग के मान के अनुसार होनी चाहिये। पाष्र्णी दो गोलक विस्तृत होना चाहिये। उन दोनों का मध्य एक अङ्गुलि सहित दो कला होना चाहिये ॥ १४८ ॥ त्रिकलं चायताञ्चैव बाहुल्येन कलासमम्। पादमङ्गुष्ठनिकटात् त्रियवोनं प्रकीर्तितम् ॥ १४९ ॥ बाहुल्यं च कलामानं गुल्फदेशाच्च साङ्गुलम्। कनीयोऽङ्गुलिमूलाच्च गुल्फान्तं पिण्डिकाङ्गुलम् ॥ १५० ॥ आगे से तीन कला बाहुल्य होना चाहिए और एक कला के समान अङ्गुष्ठ के निकट से पाद का मान तीन यव कम कहा गया है। गुल्फ प्रदेश से कला मान अङ्गुलि सहित एक कला रखे। कनिष्ठ अङ्गुलि के मूल से लेकर गुल्फ पर्यन्त पिण्डिका एक अङ्गुल निर्माण करनी चाहिए ॥ १४९-१५० ॥ जङ्घावसानदेशाच्च वेष्टनं सप्तलोचनम्। कलाहीनं तदैवाग्रात् परिणाहो विधीयते ॥ १५१ ॥ जङ्घा के अन्त तक वेष्टन (= गोलाई १) सात लोचन रखे। उसके आगे से परिणाह कलाहीन निर्माण करे ॥ १५१ ॥ चरणं विधिनानेन कूर्मपृष्ठं समाप्य च। त्र्यङ्गुलेन च तद्धैर्ध्यादङ्गुष्ठस्य च दीर्घता ॥ १५२ ॥ इस प्रकार कूर्मपृष्ठ के समान चरण का निर्माण समाप्त कर उसकी लम्बाई से तीन अङ्गुल के परिमाण में अङ्गुष्ठ का लम्ब निर्माण करे ॥ १५२ ॥ पञ्चाङ्गुलः परिज्ञेयः परिधिस्तस्य लाङ्गलिन्। यवद्वयाधिका कार्या तद्धैर्ध्यात् तु प्रदेशिनी ॥ १५३ ॥ हे लाङ्गलिन्! उसकी परिधि पाँच अङ्गुल निर्माण करे और प्रदेशिनी अङ्गुलि अङ्गुष्ठ की लम्बाई की अपेक्षा दो यव अधिक निर्माण करे ॥ १५३ ॥ अङ्गुष्ठायामतुल्याऽथ कार्या वै पादमध्यमा। मध्याङ्गुलेर्द्विरष्टांशहीना तदनु या स्थिता ॥ १५४ ॥ अङ्गुष्ठ के आयाम के तुल्य पैर की मध्यमा अङ्गुलि का निर्माण करे। मध्यमा अङ्गुलि के बाद जो (अनामिका) अङ्गुलि स्थित है उसका निर्माण मध्यमा की अपेक्षा १६ अंश कम में करे ॥ १५४ ॥ तद्वत् तदनुगा या च त्रिपर्वास्तास्तु पूर्ववत्। संयुक्ता नखजालेन कूर्मपृष्ठोपमेन च ॥ १५५ ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५६५ उसी प्रकार उसके बाद वाली अङ्गुली जिसमें तीन ही पर्व (गाँठ) है वह उस कनिष्ठा का निर्माण करे। सभी अङ्गुलियाँ नखजाल से संयुक्त तथा कूर्मपृष्ठ के समान निर्माण करे ॥ १५५ ॥ द्विकलं तु कलाधोनं पादतर्जनिवेष्टनम्। चतुश्चतुर्यवोनं च तच्छेषाणां प्रकीर्तितम् ॥ १५६ ॥ पैर की तर्जनी का वेष्टन आधा कला कम कर दो कला का निर्माण करे। शेष अङ्गुलियों का वेष्टन क्रमशः ४-४ यव निर्माण करे ॥ १५६ ॥ त्र्यंशेन वेष्टनाद् विद्धि सर्वासां चैव विस्तृतिम्। सर्वा समांसलाः सौम्याः समास्त्ववयवाः शुभाः ॥ १५७ ॥ सभी अङ्गुलियों का विस्तार वेष्टन (गोलाई) की अपेक्षा तृतीयांश कम रखे। वे सभी अङ्गुलियाँ मांसल युक्त सौम्य तथा समान अवयव वाली हों तो शुभकारक कही गई है ॥ १५७ ॥ दर्शनावलिबाह्यस्थे दंष्ट्रे सप्तयवोन्नते। यवद्वयोन्नतं मानं मध्यदन्तचतुष्टये ॥ १५८ ॥ दर्शनावलि के बाहर वाले दो दाँत सात यव ऊँचे बनावे। शेष मध्य का चार दाँत दो यव उन्नत बनावे ॥ १५८ ॥ तत्पक्षाणां सर्वेषां मानं विद्धि चतुर्यवम्। त्रियवं द्विजविस्तारमग्रान्मूलाद् यवद्वयम् ॥ १५९ ॥ उसके पक्ष में रहने वाले सभी दाँतों का मान चार यव बनाना चाहिये। उनका विस्तार दो यव और उसके आगे का तथा मूल का विस्तार भी दो यव निर्माण करे ॥ १५९ ॥ तत्सार्धं मध्यदेशाच्च सर्वे दन्ता निरन्तराः। लोम प्रदक्षिणावर्तमयुग्जन्मोत्थितं शुभम् ॥ १६० ॥ मध्यदेश के साथ-साथ सभी दाँत अन्तररहित निर्माण करे। लोम प्रदक्षिणा- वर्त्त करे तथा उसमें विषय लोभ उत्पन्न हों तो वे शुभावह कहे गये हैं ॥ १६० ॥ सुनिश्चितं हितं चैतन्मानमव्यभिचारि यत्। मनोहारित्वमेकत्र रूपलावण्यभूषितम् ॥ १६१ ॥ सर्वदा चानयोर्विद्धि अन्योन्यत्वेन संस्थितिम्। एवमुक्तस्य मानादेः किञ्चिद्वैषम्येऽपि सौंदर्यातिशयविशिष्टं चेद् बिम्बमुपादेयम्, सौंदर्याभावेऽपि मानयुक्तं चेत् तदपि ग्राह्यम्। ताभ्यां द्वाभ्यामप्युज्झितं चेत्, तत्
५६६ सात्वतसंहिता त्याज्यमिति सलौकिकदृष्टान्तमाह—सुनिश्चितमिति सार्धैश्चतुर्भिः ॥ १६१-१६५ ॥ इस प्रकार पूर्व में कहे गये मान की अपेक्षा बिम्ब में मान की विषमता होने पर भी यदि वह सौन्दर्यातिशय से विशिष्ट है तो वह उपादेय (संग्राह्य) है । यदि सौन्दर्यादि गुण से रहित है किन्तु मान से प्रमाणित है तो उपादेय है । किन्तु सौन्दर्य एवं मान दोनों से रहित है तो वह त्याज्य है ॥ १६०-१६२ ॥ सुसौन्दर्यं तु मानस्य क्वचिदाक्रम्य वर्तते ॥ १६२ ॥ लावण्यस्य क्वचिन्मानं समाच्छाद्यावतिष्ठते । कहीं सुसौन्दर्य मान का अतिक्रमण कर विराजमान हो जाता है कहीं मान सुसौन्दर्य का अतिक्रमण कर विराजमान हो जाता है ॥ १६२-१६३ ॥ यथातिरूपवान् लोके दरिद्रोऽप्येति मान्यताम् ॥ १६३ ॥ विरूपोऽप्यतिवित्ताढ्यो नारूपो नैव निर्धनः । एवं द्वयोज्झितं बिम्बमनादेयत्वमेति च ॥ १६४ ॥ आदेयमेकयुक्तं च नित्यं यस्मान्महामते । जिस प्रकार दरिद्र होने पर भी अतिरूपवान् लोक में प्रतिष्ठित होता है अथवा अत्यन्त धनवान् होने से रूप रहित विरूप भी लोक में प्रतिष्ठित होता है । किन्तु जो अरूप है, निर्धन है, अर्थात् रूप और धन दोनों से रहित है, वह लोक में अप्रतिष्ठित रहता है । इसी प्रकार सौन्दर्य और मान रहित बिम्ब लोक में अनुपयोगी होता है ॥ १६३-१६५ ॥ सम्यङ्माने च सौन्दर्ये भक्तानुग्रहकाम्यया ॥ १६५ ॥ मान्त्रसन्निधिशक्तिर्वै सफला ह्यवतिष्ठते । सा सम्यक् प्रतिपन्नस्य बिम्बे दृग्गोचरस्थिते ॥ १६६ ॥ आमूर्ताह्लादयत्याशु ज्ञात्वैवं यत्नमाचरेत् । मानोन्मानप्रमाणानामथ सौन्दर्यसिद्धये ॥ १६७ ॥ एवं बिम्बस्य प्रमाणवत्त्वे सौन्दर्यवत्त्वे च "आभिरूप्याच्च बिम्बस्य" इत्युक्तरीत्या निरतिशयाह्लादजननी भगवत्सान्निध्यशक्ति(बि?र्बि)म्बे स्वत एवाविर्भूता सफलाऽवतिष्ठते, अतस्तदर्थं सुतरां यत्नः कार्य इत्याह—सम्यङ्माने चेति सार्धद्वाभ्याम् ॥ १६५-१६७ ॥ हे महामते सङ्कर्षण ! सौन्दर्य और मान इन दोनों में किसी एक से युक्त होने से बिम्ब निरतिशयाह्लाद जननी भगवत्सान्निध्य विष्णु शक्ति स्वतः आविर्भूत होकर सफला होकर प्रतिष्ठित हो जाती है । इसलिये साधक को वैसा ही प्रयत्न करना चाहिए ॥ १६५-१६७ ॥ ऋजोः सुसमपादस्य त्र्यङ्गुलं चरणान्तरम् ।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५६७ तद् वै विषमपादस्य अग्रात् तालसमं स्मृतम् ॥ १६८ ॥ समपादविषमपादबिम्बानां सूत्रेणावयवसाम्यपरीक्षामह—ऋजोः सुसमपादस्ये- त्यारभ्य बिम्बोत्थाऽवयवी स्थितिरित्यन्तम् ॥ १६८-१७४ ॥ समपाद एवं विषमपाद वाले बिम्बों का सूत्र से अवयव साम्य की परीक्षा— जिसका पैर सीधा हो, समतल हो, उसके चरणों का अन्तर तीन अङ्गुल होता है । विषमपाद के आगे का अन्तर एक ताल के बराबर होता है ॥ १६७-१६८ ॥ तत्पाष्णिर्द्वयमध्यात् तु परिज्ञेयं द्विगोलकम् । स्थित्यर्थं ब्रह्मनाड्या वै तथा मार्गद्वयस्य च ॥ १६९ ॥ सूत्रेण सुसमे कुर्याद् देहोत्थे दक्षिणोत्तरे । समपादस्य बिम्बस्य ललाटान्मेढ्रमस्तकम् ॥ १७० ॥ प्रसार्य सूत्रमाच्छाद्य तेन नाभिहृदन्तरम् । घ्राणाग्रमलकानां च सन्धिर्यस्तिलकोध्वंगः ॥ १७१ ॥ एवं विषमपादस्य दक्षाङ्गुष्ठाग्रगं नयेत् । गात्रसाम्यं समापाद्यं क्षेत्रात् क्षेत्रगतेन च ॥ १७२ ॥ सूत्रेण सर्वबिम्बानां वैषम्यविनिवृत्तये । चतुस्त्रिद्व्यश्रिपरितः परिशुद्धा यतः शुभाः ॥ १७३ ॥ अशुभाऽपरिशुद्धा तु बिम्बोत्थाऽवयवी स्थितिः। वही अन्तर उसके दोनों पाणि के मध्य से दो गोलक समझना चाहिये । ब्रह्मनाडी और उसके दोनों मार्ग की स्थिति के लिये देह के दक्षिण और उत्तर भाग को सूत्र के समान बनावे । समपाद वाले बिम्ब के ललाट से मेढ़ मस्तक तक नाभिहृदय को, घ्राणाग्र अलक की सन्धि, जो तिलक के ऊपर रहती है उसको, सूत को लम्बा कर उससे आच्छादित करे । इसी प्रकार समपाद एवं विषमपाद के सूत्र को भी दाहिने हाथ के अङ्गुष्ठ के अग्रभाग तक ले जावे । इस प्रकार क्षेत्र से क्षेत्रगत तक गात्रसाम्य की समता करे । उस सूत्र से सभी बिम्बों की विषमता की निवृत्ति के लिये चार, तीन एवं दो आवे तो वह चारों ओर से शुद्ध समझना चाहिये । वही शुभ है किन्तु बिम्ब से होने वाले अवयवी स्थिति अपरिशुद्ध एवं अशुभ है ॥ १६९-१७४ ॥ हयग्रीवबिम्बस्य मुखलक्षणकथनम् ललाटमश्ववक्त्रस्य विस्ताराद् द्वादशाङ्गुलम् ॥ १७४ ॥ अथ हयग्रीवबिम्बस्य मुखलक्षणमाह— ललाटमश्ववक्त्रेत्यादिभिः ॥ १७४-१८० ॥
५६८ सात्वतसंहिता अब हयग्रीव के मुख का लक्षण कहते हैं—हयग्रीव का ललाट विस्तार की दृष्टि से बारह अङ्गुल कहा गया है ।। १७४ ।। अष्टलोचनमायामाद् अग्रतश्चतुरङ्गुलम् । कलार्धसुषिरे घ्राणरन्ध्रे भागान्तरीकृते ।। १७५ ।। आयाम ( ) आठ लोचन कहा गया है, उसका अगला भाग चार अङ्गुल का तथा दो भागों में प्रविभक्त छिद्र घ्राणरन्ध्र कला का आधा कहा गया है ।। १७५ ।। अष्टाङ्गुले तु हनुके सृक्किण्यौ द्वेऽथ तत्समे । मध्यतः श्रोत्रशुक्ती द्वे द्व्यङ्गुले द्विकलोन्नते ।। १७६ ।। हनु आठ अङ्गुल का तथा दोनों सृक्किणी उसी के बराबर हो । श्रोत्र की दोनों शुक्ती मध्य से दो-दो अङ्गुल तथा दो कला ऊँची होनी चाहिये ।। १७६ ।। द्व्यङ्गुलं घ्राणवंशं तु तदूर्ध्वं द्विकलं स्मृतम् । विद्धि वक्त्रविकासं च द्वियवं चाग्रतः क्रमात् ।। १७७ ।। घ्राणवंश दो अङ्गुल का तथा उसकी ऊँचाई दो कला की होनी चाहिये । आगे की ओर किया जाने वाला मुख का विकास दो यव कहा गया है ।। १७७ ।। तमेव हि यवांशेन हन्वन्तं तनुतां नयेत् । घ्राणवंशस्य पक्षौ द्वौ मध्यनिम्नौ च संहतौ ।। १७८ ।। उसी मुख विकास को हनु पर्यन्त यवांस परिमाण में सूक्ष्म निर्माण करे । घ्राणवंश के दोनों पक्ष मध्य में निम्न बनावे और शेष को समान बनावे ।। १७८ ।। यवद्वयेन सार्धेन दृग्घ्राणाभ्यां तु चान्तरे । अथो दलं तु दृग्द्रोणेर्यवमानेन सन्ञ्चितम् ।। १७९ ।। ललाटं सालकं प्राग्वद् दृङ्मध्यं साङ्गुला कला । नेत्र और दोनों घ्राण का अन्तर सार्ध यव द्वय (२ ½ यव) रखे । अलक (केश) युक्त ललाट पूर्व की भाँति द्वादश अङ्गुल रखे । दोनों दृष्टियों का मध्य भाग एक अङ्गुल से युक्त कला परिमाण में निर्माण करे ।। १७९-१८० ।। श्रीनृसिंहवक्त्रलक्षणकथनम् नृसिंहस्य मुखे विद्धि परितश्चाष्टलोचनम् ।। १८० ।। ततोऽष्टकण्ठदेशाच्च कुर्यात् कर्णद्वयोज्झितम् । तत्कर्णद्वयमानेन ललाटान्तं नयेत् पुनः ।। १८१ ।। प्रमाणात् प्राक् प्रणीताच्च संरम्भाद्यातलक्षणम् । प्रफुल्लविकसच्छिद्रं घ्राणवंशान्वितं भवेत् ।। १८२ ।।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५६९ श्रीनृसिंहवक्त्रलक्षणमाह—श्रीनृसिंहस्येत्यादिभिः ॥ १८०-१८८ ॥ अब नृसिंह के मुख का परिमाण कहते हैं—नृसिंह का मुख चारों ओर आठ लोचन करे, दोनों कानों को छोड़कर कण्ठ देश से भी आठ लोचन बनावे। पुनः दोनों कानों के मान से भी ललाट पर्यन्त उतनी ही दूरी रखे। घ्राणवंश की दोनों नासिकाओं का छिद्र प्रफुल्ल और विकसित निर्माण करे ॥ १८१-१८२ ॥ तच्छिद्रे पूर्वमानाच्चाप्यस्य वै त्रियवाधिकम्। सगोलमुत्तराङ्गेषु सकलांशं च लोचनम् ॥ १८३ ॥ वे छिद्र पूर्वमान की अपेक्षा आप्य से तीन यव अधिक होने चाहिये। उत्तर अङ्ग में लोचन गोल एवं कलांश युक्त होना चाहिये ॥ १८३ ॥ अधरोष्ठं परिज्ञेयं सचतुर्यवमङ्गुलम्। सार्धं चतुष्कलं वक्त्रं शेषायामो हनोः स्मृतः ॥ १८४ ॥ अधरोष्ठ चार यव सहित एक अङ्गुल का समझना चाहिये। साढे चार कला का मुख होना चाहिये, शेष आयाम हनु का होता है ॥ १८४ ॥ तद्विकासः परिज्ञेयो नेत्रमानं यवाधिकम्। अग्रतो ह्रासमायाति सृक्किण्यन्तं हि चाङ्गुलम् ॥ १८५ ॥ सर्ववृत्तं तदर्धेन नेत्रयुग्मं सविस्मयम्। पूर्ववद् विस्तृतं श्रोत्रं कलाधोनं तदुन्नतेः ॥ १८६ ॥ वक्त्र का विकास एक तथा यव से अधिक नेत्र का मान होना चाहिये। आगे से सृक्किणी पर्यन्त वह एक अङ्गुल ह्रास हो जाता है। उसका आधा सर्ववृत्त कहा जाता है। वही विस्मय सहित होने पर नेत्र युग्म कहा जाता है। श्रोत्र पूर्ववत् विस्तृत बनाना चाहिये जो उसकी ऊँचाई से आधा कला कम होवे ॥ १८५-१८६ ॥ तुल्या चेन्दुकला युग्मयोगस्य भ्रूस्त्रिगोलका। तन्मध्यं तु कलामानं शङ्खावर्तोपमं महत् ॥ १८७ ॥ भागमानं सटावृत्तं कार्यं तच्छिरसि स्फुटम्। इन्द्रकला तुल्य बनानी चाहिये। भ्रू तीन गोलक होना चाहिये, भ्रू उसका मध्य कला मान का तथा महान शङ्खावर्त्त के समान होना चाहिये ॥ १८७-१८८ ॥ वराहवक्त्रलक्षणकथनम् दैर्घ्येण सार्धतालं च क्ष्माधरस्याननं स्मृतम् ॥ १८८ ॥ विस्तारेण ललाटाच्च तन्मानं द्व्यङ्गुलोञ्झितम्। सौम्यरूपस्य च विभोः प्रोद्यतस्य कलोञ्झितम् ॥ १८९ ॥ सा० सं० - 40
५७० सात्वतसंहिता अथ वराहवक्त्रलक्षणमाह—दैर्घ्येण सार्धतालं चेत्यादिभिः ॥ १८८-१९४ ॥ अब वराह के मुख का लक्षण कहते हैं—वराह का मुख लम्बाई में १ १/२ डेढ़ ताल होना चाहिये । विस्तार में ललाट तक उसका मान दो अङ्गुल कम होना चाहिये । सौम्य रूप पृथ्वी उद्धार के लिये उद्यत उन विभु का मुख एक कला रहित होना चाहिये ॥ १८८-१८९ ॥ तच्चतुर्थांशमानेन पोत्रदेशस्य विस्तृति । तस्योपरिष्टाद् बाहुल्यं तत्समं चाङ्गुलं त्वधः ॥ १९० ॥ उनके पौत्र देश का विस्तार मान में चतुर्थांश होना चाहिये । उसके ऊपर का बाहुल्य उसके समान होना चाहिये और नीचे का मान एक अङ्गुल होना चाहिये ॥ १९० ॥ हनुद्वयस्य वै मानं सार्धं सप्ताङ्गुलं स्मृतम् । शेषमाननरन्ध्रं तु सृक्किणीभ्यां यदन्तरम् ॥ १९१ ॥ वाराह के दोनों हनु का मान सात अङ्गुल कहा गया है । शेष मुख का छिद्र दोनों सृक्किणी में जितना अन्तर है उतना होता है ॥ १९१ ॥ तद्विकासश्च सार्धेन कलार्धेनाग्रदेशतः । स एवाङ्गुलमानेन विज्ञेयः सृक्किणीद्वयात् ॥ १९२ ॥ उसका विकास अग्रदेश से सार्ध कलार्ध मान का होता है, दोनों सृक्किणियों से वह विकास एक अङ्गुल मान का होता है ॥ १९२ ॥ घ्राणरन्ध्रं च वक्त्रोक्ते दंष्ट्रे द्व्यर्थकलोन्नते । नासावंशं यथापूर्वं कदलीनाडिपृष्ठवत् ॥ १९३ ॥ नाक का छिद्र मुख के दो दाँत द्वयार्ध कला उन्नत होना चाहिये । नासावंश (प्रशस्त नासिका) यथापूर्व केला की नाड़ी के पृष्ठभाग के समान करे ॥ १९३ ॥ श्रोत्रे वाजिमुखोक्ते तु कोटेः सप्तकलान्तरे । तत्तुल्ये लोचने किन्तु प्रान्ततीक्ष्णे यवोज्झिते ॥ १९४ ॥ दोनों श्रोत्र हयग्रीव के मुख के समान एवं दोनों किनारों का अन्तर सात कला का होना चाहिए । लोचन भी उतने ही बसबर जो दोनों प्रान्त में तीक्ष्ण और यव से कम होने चाहिये ॥ १९४ ॥ एतेषां विहिता ग्रीवा ह्यङ्गुलद्वितयेन तु । प्रत्येकदेशात् संयुक्ता सौम्यमूर्त्युदिता च या ॥ १९५ ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७१ अथ हयग्रीवादीनां ग्रीवाद्यवयवलक्षणानि त्रिचतुःपञ्चवक्त्रादिबिम्बस्य मुखाद्य- वयवलक्षणानि चाह— एतेषां विहिता ग्रीवेत्यारभ्य कृता भवति सिद्धिदेत्यन्तम् ॥ १९५-२१४ ॥ अब हयग्रीव के ग्रीवादि का लक्षण जो तीन, चार और पाँच संख्यक मुख वाला है, उस मुख बिम्ब के अवयवादि लक्षण कहते हैं—तीन, चार, पाँच मुख वाले हयग्रीव की ग्रीवा दो अङ्गुल होनी चाहिये। वह ग्रीवा सभी मुखों से संयुक्त है, उसकी मूर्त्ति सौम्य है ॥ १९५ ॥ विनोच्छ्रायेण नृहरेर्यस्य गात्रस्य या प्रमा। सा सा सवेष्टनाद् व्यासात् कलार्धेनाधिका भवेत् ॥ १९६ ॥ उन हयग्रीव की ऊँचाई के बिना जिस गात्र की जितनी प्रमा है, वह गोलाई व्यास से आधे कला से अधिक कही गई है ॥ १९६ ॥ वक्षःकट्युदरांसस्फिक्कलामानाधिकानि च। तथैव नखपत्राणि देहश्चास्य समांसलः ॥ १९७ ॥ हयग्रीव का वक्षःस्थल, कटिभाग, उदर और नितम्ब कलामान से अधिक है उसी प्रकार नख पत्र भी समझना चाहिये। इनका शरीर मांसल युक्त बनाना चाहिये ॥ १९७ ॥ सम्पूर्णो दक्षिणावर्त्तैर्लोमभिश्चातिकुञ्चितैः। त्रिचतुःपञ्चवक्त्रस्य विनैवोर्ध्वमुखेन तु ॥ १९८ ॥ इनका शरीर चिक्कन और अत्यन्त कुञ्चित दक्षिणावर्त्त लोम से युक्त होना चाहिये। ये तीन, चार, पाँच मुख वाले हयग्रीव ऊर्ध्वमुख से रहित हैं ॥ १९८ ॥ दक्षिणोत्तरवक्त्राभ्यां ह्रासं कुर्याद् द्विगोलकम्। विकासः सिंहवक्त्रोक्त उदग्वक्त्रस्य तत्र च ॥ १९९ ॥ दक्षिण और उत्तर वाले मुख को परस्पर दो गोलक कम करके निर्माण करे। उसमें उत्तर मुख का विकास सिंह के मुख के समान बनाना चाहिये ॥ १९९ ॥ समो दृक्सन्निवेशस्तु चतुर्णां मोक्षसिद्धये। अरोग्यभोगकैवल्यप्राप्तयेऽर्धाङ्गुलेन तु ॥ २०० ॥ चारो प्रकार की मोक्ष सिद्धि के लिये हयग्रीव के नेत्र का सन्निवेश समान रूप से करे। आरोग्य, भोग तथा कैवल्य प्राप्ति के लिये आधा अङ्गुल सन्निवेश करे ॥ २०० ॥ कुर्यात् सव्यापसव्याभ्यामधो दृक्सन्निवेशनम्।
५७२ सात्वतसंहिता सह पूर्वाननेनैव साम्यं प्रत्यङ्मुखस्य च॥ २०१ ॥ हयग्रीव के मुख का सन्निवेश बायें, दाहिने और नीचे की ओर करे। पूर्व के मुख के समान पश्चिम का मुख निर्माण करे ॥ २०१ ॥ निष्कासायामविस्तारघ्राणदृग्भ्रूश्रुतिष्वथ । ईषत्तिर्यक्क्षितिन्यस्तदृङ्मुखं दक्षिणं शुभम्॥ २०२ ॥ निष्कास तथा आयाम, विस्तार, घ्राण, दृष्टि, भ्रू तथा कानों में करे। कुछ तिरछापन लिये हुए पृथ्वी पर स्थित दक्षिण की ओर का नेत्र और मुख कल्याणकारी कहा गया है ॥ २०२ ॥ तद्वच्च पोत्रदृग्वक्त्रमुत्तरं सर्वसिद्धिकृत् । स्वकार्यसूचनान्न्यूनं तन्मन्त्रस्य च सन्निधिः॥ २०३ ॥ उसी प्रकार पोत्र, दृक् (नेत्र) और मुख उत्तर की दिशा में सभी सिद्धियों को देने वाले कहे गए हैं। अश्वग्रीव के मन्त्र की सिद्धि तब समझनी चाहिये जब वह आराधक के कार्य होने की सूचना प्रदान करे ॥ २०३ ॥ अतोऽन्यथा समाश्रित्य शान्तिमास्ते च मन्त्रराट् । नित्यं तत्सन्निधानाच्च भूतवेतालराक्षसाः॥ २०४ ॥ आ दर्शनात् पलायन्ते आविशन्ति च दर्शनात् । आदाय शिरसा मन्त्रिसमाज्ञां सम्प्रयान्ति ते॥ २०५ ॥ यदि सिद्धि नहीं होती तो ये मन्त्रराट् शान्त (चुपचाप) रहते हैं। इनके सन्निधान से, अथवा दर्शन से भूत, बेताल और राक्षस दूर भाग जाते हैं, अथवा दर्शन मात्र से स्थिर होकर खड़े रहते हैं और मन्त्रज्ञ की आज्ञा शिर से वहन करते हुए तदनन्तर जाते हैं ॥ २०४-२०५ ॥ अतः समाचरेद् यत्नाद् येन स्याद् बिम्बसन्निधिः। नहि तत्सन्निधानाद् वै कश्चिदारभते शुभम्॥ २०६ ॥ इसलिये आराधक ऐसा करे जिससे बिम्ब का सन्निधान बना रहे। उसके सन्निधान के बिना कोई भी शुभ कार्य का आरम्भ नहीं हो सकता ॥ २०६ ॥ वराहदंष्ट्रं सिंहाक्षं तथा चिपिटनासिकम् । विधेयं पञ्चमं वक्त्रं पञ्चवक्त्रस्य वै विभोः॥ २०७ ॥ इन विभु पञ्चवक्त्र का पाँचवाँ मुख वराह के समान दाँतों वाले हैं। सिंह के समान इनकी आँखें और नासिका चिपटी बनाना चाहिये ॥ २०७ ॥ अस्याधरोत्तराभ्यां त्वप्योष्ठाभ्यां समता भवेत् ।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७३ विभिन्नताऽङ्गुलाधैन ताभ्यां तन्मध्यगा स्फुटा ॥ २०८ ॥ इनके ऊपर और नीचे के दोनों ओष्ठ सम बनाना चाहिये, अथवा आधा अङ्गुल कम वेशी के मान से विभिन्न निर्माण करे । इनका मध्य भाग अधिक स्पष्ट होना चाहिये ॥ २०८ ॥ कार्या दशनपाली वै मूलमध्याग्रतः समा । कलार्धेनोल्बणं वृत्तं तद्गण्डद्वितयं ततः ॥ २०९ ॥ दर्शनपाली (मसूढों) का निर्माण मूल, मध्य तथा अग्र भाग में समान रूप से करना चाहिए । उनका दोनों गण्डस्थल आधे कला का उल्बण (उग्र) एवं वृत्ताकार बनावे ॥ २०९ ॥ द्विकलं चायतः श्मश्रु कला चार्धकला क्रमात् । सम्बद्धवेणिः पूर्वोक्तमानेन शुभकृद् भवेत् ॥ २१० ॥ आगे का श्मश्रु दो कला का, अथवा एक कला का, अथवा आधे कला का होना चाहिये । शिर से सम्बद्ध वेणी पूर्व में कहे गये मान से बनाने पर शुभकारक होती है ॥ २१० ॥ सिंहसूकरवाज्याख्यवक्त्राणां सौम्यतां नयेत् । प्रमाणं दृग्गताल्लक्ष्याद् व्यवहारमयात् तु वै ॥ २११ ॥ हयग्रीव के सिंह, सूकर तथा अश्व के समान मुख की सौम्यता निर्माण करे । उस बिम्ब का प्रकाश दृष्टि से देखे जाने वाले लक्ष के अनुसार तथा व्यवहार के अनुसार बनाना चाहिये ॥ २११ ॥ विकासश्चाश्ववक्त्रोक्तः सौम्यरूपस्य भूभृतः । तदाद्योक्तस्तु नृहरेः प्रागुक्तो यः स चोदितः ॥ २१२ ॥ यहाँ तक हयग्रीव के मुख का विकास कहा गया है । सौम्य रूप धारण करने वाले वराह के मुख का विकास पहले कह आये हैं । उसके भी पहले नृसिंह के मुख का विकास कह आये हैं ॥ २१२ ॥ तथा वक्त्राङ्गभावित्वे विभोः शक्तीश्वरस्य च । हारनूपुरवस्त्रस्रक्कटकाङ्गदभूषिता ॥ २१३ ॥ माल्योपवीतकेयूरमकुटाद्युपशोभिता । प्रतिमा मन्त्रमूर्तीनां कृता भवति सिद्धिदा ॥ २१४ ॥ ये सभी विभु शक्तीश्वर के मुख के अङ्ग है । इनकी प्रतिमा हार, नूपुर, वस्त्र, माला, कटक, अंगद से भूषित करनी चाहिये तथा माल्य, उपवीत, केयूर
५७४ सात्वतसंहिता एवं मुकुट से शोभित करना चाहिये । इस प्रकार भूषित तथा शोभित की गई मन्त्र मूर्ति की प्रतिमा सिद्धि प्रदान करने वाली होती है ॥ २१३-२१४ ॥ विमर्श—सलक्षण, बिम्ब मान, हयग्रीव मुख लक्षण, नृसिंह मुख लक्षण, वराह मुख लक्षण, हयग्रीवादि के तीन, चार और पञ्चमुख लक्षणों को विष्णु- धर्मोत्तर पुराण तथा चतुर्वर्ग चिन्तामणि (हेमाद्रि) व्रतभाग के प्रथमखण्ड में देखिये । बिम्ब के अङ्गावयवों के लक्षण एवं पर्याय अमरकोशादि ग्रन्थों में द्रष्टव्य है । सत्यसुपर्णादिगरुडव्यूहादिलक्षण कथनम् यत्पुरा पञ्चधा प्रोक्तं वाहनं प्राणदैवतम् । तस्य बिम्बसमुत्थेन तालेन मुखमण्डलम् ॥ २१५ ॥ द्व्यङ्गुलं तु ललाटोक्तं जटाबन्धो द्विलोचनः । द्व्यङ्गुलेनोन्नतः कण्ठ उरः पञ्चकलं स्मृतम् ॥ २१६ ॥ अष्टाङ्गुलं तदुदरं कटिः पञ्चाङ्गुलोन्नता । नवाङ्गुलोन्नतावूरू जानुनी द्व्यङ्गुले स्मृते ॥ २१७ ॥ संत्यसुपर्णादिगरुडव्यूहलक्षणमाह—यत्पुरा पञ्चधा प्रोक्तमित्यारभ्य स्थितानाम- र्धलक्षणेत्यन्तम् ॥ २१५-२३४ ॥ अब सत्य सुपर्णादि गरुड़ व्यूह का लक्षण कहते हैं—पहले प्राण देवता वाले वाहन रूप गरुड़ को पाँच प्रकार का कहा गया है । उनके मुख मण्डल का मान बिम्ब के अनुसार एक ताल का होना चाहिए । ललाट दो अङ्गुल का होना चाहिये । जटाबन्ध दो लोचन का, कण्ठ दो अङ्गुल ऊँचा तथा वक्षःस्थल पाँच कला का होना चाहिये । उदर आठ अङ्गुल का और कटि पाँच अङ्गुल ऊँची होनी चाहिये । दोनों ऊरु नव अङ्गुल उन्नत तथा जानु दो अङ्गुल का निर्मित होना चाहिये ॥ २१५-२१७ ॥ अष्टाङ्गुलोच्छ्रिते जङ्घे द्व्यङ्गुले पादपिण्डके । शममेककलाहीनं तद्ग्रीवायाश्च वेष्टनम् ॥ २१८ ॥ दोनों जङ्घा आठ अङ्गुल ऊँची, पैर की पिण्डिका दो अङ्गुल, उस बिम्ब की ग्रीवा का वेष्टन (= गोलाई) एक कलाहीन कम परिमाण में निर्माण करे ॥ २१८ ॥ बिम्बतुल्या परिज्ञेया सर्वदाऽस्याङ्गविस्तृतिः । तद्विभागाधिकं विद्धि वेष्टनं हृदरस्य च ॥ २१९ ॥ इसके अंग का विस्तार सर्वदा बिम्ब के तुल्य समझना चाहिये । उदर का वेष्टन उसके विभाग से अधिक समझे ॥ २१९ ॥ परिधिः कटिदेशस्य चतुर्नेत्राधिकस्तु वै ।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७५ बिम्बोक्तसदृशं विद्धि तदूर्वोर्मूलवेष्टनम् ॥ २२० ॥ कटि देश की परिधि का मान चार नेत्र से अधिक मान में निर्माण करे । उस बिम्ब के ऊरु का वेष्टन (= गोलाई) पूर्व में कहे गये बिम्ब के सदृश समझना चाहिये ॥ २२० ॥ तदेव जङ्घामध्यस्य जङ्घान्तस्य तदेव हि । पादं पञ्चकलायामं चतुरङ्गुलविस्तृतम् ॥ २२१ ॥ वही परिमाण जङ्घा के मध्य का तथा वही परिमाण जङ्घा के अन्त का भी होना चाहिए । पैर पाँच कला लम्बा और चार अङ्गुल चौड़ा बनावे ॥ २२१ ॥ त्र्यङ्गुलं पाणिदेशाच्च अङ्गुष्ठोऽर्धकलासमः । विज्ञेया अङ्घ्रिदैर्घ्याच्च यवोनाङ्गुलयः क्रमात् ॥ २२२ ॥ पाणिदेश से तीन अङ्गुल दूर अङ्गुष्ठ का मान आधी कला का बनावे । अङ्गुलियाँ पैर की चौड़ाई से एक यव कम करे ॥ २२२ ॥ नाभिरन्ध्रं सुविस्तीर्णं ह्यर्धलोचनविस्तृतम् । मध्यमाङ्गुलिपर्यन्तं मणिबन्थान्नवाङ्गुलम् ॥ २२३ ॥ नाभि का छिद्र विस्तार युक्त तथा अर्धलोचन विस्तृत निर्माण करे । मणिबन्ध से मध्यमाङ्गुलि पर्यन्त दूरी नव अङ्गुल कही गई है ॥ २२३ ॥ त्रिकलः पाणिविस्तारस्तन्नखा निशितोन्नताः । तद्द्बाहुमस्तकं विद्धि उच्छ्रायेण द्विलोचनम् ॥ २२४ ॥ हाथ का विस्तार तीन कला का तथा नख अत्यन्त निशित (तीक्ष्ण) एवं समुन्नत होने चाहिये । बिम्ब का बाहु और मस्तक ऊँचाई में दो लोचन का बनाना चाहिये ॥ २२४ ॥ भुजोपभुजयुग्मं यत् तद् द्वितालसमं स्मृतम् । कलार्धेनाधिकं बिम्बं बाहोस्तद्द्बाहुवेष्टनम् ॥ २२५ ॥ दोनों भुजायें एवं दोनों उपभुज दो ताल के समान बनाना चाहिये । बिम्ब का एवं बाहु का बाहु-वेष्टन एक कला से अधिक निर्माण करे ॥ २२५ ॥ बिम्बोक्तां सद्धिधिं ह्येवं स्तनभूर्लोचनोल्बणा । वृत्तवैपुल्यमानेन लोचने पद्मपत्रवत् ॥ २२६ ॥ इस प्रकार बिम्ब की सुन्दर विधि कही गई । स्तन, भ्रू और लोचन उल्बण बनावे । दोनों नेत्रों को गोलाई तथा वैपुल्य के अनुसार कमल पत्र के समान विशाल बनावे ॥ २२६ ॥
५७६ सात्वतसंहिता भ्रूयुगं नरसिंहोत्थं घ्राणाग्रं शुकचञ्चुवत् । कलार्धमानं दीर्घं च तद्वंशं गजपृष्ठवत् ॥ २२७ ॥ गरुड़ के दोनों भ्रू नरसिंह के समान और घ्राण का अग्रभाग सुग्गे के चञ्चु के समान होना चाहिए। घ्राणवंश कला को अर्धमान का दीर्घ तथा गज पृष्ठवत् निर्माण करना चाहिए ॥ २२७ ॥ स्वायामदीर्घं तत्पक्षयुगलं कुक्षिदेशगम् । तदेव दैर्घ्यादर्धेन विस्तृतं हंसपक्षवत् ॥ २२८ ॥ उनके कुक्षि में रहने वाला दोनों पक्ष लम्बाई के अनुसार चौड़ा बनावे। वह उसकी चौड़ाई, लम्बाई का आधा तथा हंस-पक्ष के समान विस्तृत बनावे ॥२२८॥ स्वपक्षमानाद् द्विगुणं तत्पुच्छं शतशाखकम् । सपक्षमिममायामं सात्यं त्ववयवान्वितम् ॥ २२९ ॥ उसका पुच्छ उसके पङ्क के मान से द्विगुणित तथा हजारों शाखा से युक्त बनावे। इस प्रकार यहाँ अवयव युक्त पक्ष सहित यह आयाम सत्य नाम सुपर्ण का कहा गया है ॥ २२९ ॥ सर्वेषां विद्धि सामान्यं विशेषाख्यमथोच्यते । ऊरुद्वयान्नयेद् ह्रासमङ्गुलानां त्रयं तथा ॥ २३० ॥ जङ्घाकाण्डोच्छ्रितेः कुर्याज्जङ्घाभ्यां चात्र वेष्टनम् । बिम्बाख्यं मणिबन्धस्य सममूलान्महामते ॥ २३१ ॥ जानुदेशात् तदर्धेन सह चार्धाङ्गुलेन तु । पादे जालं परिज्ञेयं विस्तारेण षडङ्गुलम् ॥ २३२ ॥ यहाँ तक जङ्घा काण्ड का सामान्य लक्षण कहा गया है। अब जो विशेष है उसे कहा जा रहा है। दोनों जङ्घाओं का वेष्टन दोनों ऊरु से तीन अङ्गल कम रखे। उसकी ऊँचाई जङ्घा काण्ड की ऊँचाई के समान रखे। हे महामते! उसका बिम्ब मणिबन्ध के मूल के समान रखे। जानुदेश से उसके आधे के समान अथवा आधा अङ्गल के समान पैर का जाल निर्माण करे, जिसका विस्तार छः अङ्गुल होना चाहिये ॥ २३०-२३२ ॥ शेषं सत्योदितं सर्वं सर्वेषां विद्धि सर्वदा । किन्तु पादोज्झितौ पक्षौ दैर्घ्यात् तद्दलविस्तृतौ ॥ २३३ ॥ शेष सब कुछ सत्य गरुड़ के लक्षण में कह दिया गया है किन्तु पैर रहित दोनों पक्ष लम्बाई से चार गुना विस्तृत बनावे ॥ २३३ ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७७ एषां चोड्डीयमानानां स्वायामा पक्षविस्तृतिः । पञ्चानां च परिज्ञेया स्थितानामर्धलक्षणा ॥ २३४ ॥ ये व्यूह जब उड़ने लगते हैं तब इनके आयाम के अनुसार इनके पक्ष भी बढ़ जाते हैं, इस प्रकार से स्थित पाँचों गरुड़ों की अर्धलक्षणा समझनी चाहिये ॥२३४॥ वामनलक्षणकथनम् एतदादाय मानं तु पुच्छभ्रूपक्षवर्जितम् । विद्धि वामनरूपस्य लक्षणं किन्तु लाङ्गलिन् ॥ २३५ ॥ ललाटनासावक्त्रेभ्यः समादायाङ्गुलत्रयम् । मस्तकस्योपरिष्टात् तु जटाबन्धं प्रकल्पयेत् ॥ २३६ ॥ वामनलक्षणमाह—एतदिति सार्धद्वाभ्याम् ॥ २३५-२३७ ॥ यही गरुड़ पञ्चव्यूहों का पुच्छ, भ्रू एवं पक्ष वर्जित मान वाला लक्षण वामन का भी समझना चाहिये । किन्तु हे सङ्कर्षण ! ललाट, नासिका और वक्त्र (मुख) से तीन अङ्गुल लेकर वामन के मस्तक के ऊपर जटाबन्ध का निर्माण करना चाहिए ॥ २३५-२३६ ॥ जटावसानमायामं यथा स्यात् पञ्चतालकम् । इत्युक्तं लेशतो बिम्बलक्ष्म पीठमथोच्यते ॥ २३७ ॥ वामन के जटा की लम्बाई पाँच ताल बनानी चाहिये । यहाँ तक लेश मात्र बिम्ब का लक्षण कहा गया, अब पीठ का लक्षण कहता हूँ ॥ २३७ ॥ पीठलक्षणकथनम् बिम्बानामुपविष्टानां चतुरश्रं तु तद् भवेत् । चतुरश्रायतं चैव प्रोत्थितानां सदैव हि ॥ २३८ ॥ वृत्तवृत्तायतत्वेन ह्यनयो रूपमन्यथा । याऽङ्गुलैः परमाणूत्थैराराधकमयैस्तु वा ॥ २३९ ॥ धत्तेऽर्चा तु सामायामं द्वाराद् वा मन्दिरोत्थितात् । तन्मानेन तु पीठस्य दैर्घ्यमर्धेन विस्तृतिः ॥ २४० ॥ द्वारोर्ध्वाच्च त्रिरन्तानि एकपूर्वाणि वै पुरा । उक्तनि(र्ग?ग)मनपूर्वकं पीठलक्षणमाह—इत्युक्तं लेशतो बिम्बमित्यारभ्य विलोमाद् विपरीतदम्'इत्यन्तम् ॥ २३७-२८१ ॥ बैठे हुए बिम्ब के लिये पीठ चौकोर बनानी चाहिये तथा खड़े रहने वाले बिम्ब के लिये चतुरस्र और आयत बनाना चाहिये । इन दोनों रूपों के अतिरिक्त
५७८ सात्वतसंहिता अन्य रूप वाले विम्ब के लिये वृत्त, अवृत्त अथवा आयत पीठ का निर्माण करे। जो अङ्गुलियों से परमाणुओं के सहारे अथवा आराधकमय होकर अर्चा ग्रहण करे, उसे मन्दिर के द्वार के समान आयाम में निर्माण कर उसके मान के अनुसार पीठ को दीर्घ बनावे। उसके आधे मान से उसका विस्तार बनावे ॥ २३८-२४१ ॥ सन्त्यज्य द्वादशांशाद् वै अधः पीठोन्नतिस्त्रिभिः ॥ २४१ ॥ शेषेणास्त्रांशसङ्घेन प्रतिमा चोत्थिता भवेत् । अथवा वाहनारूढा न्यूना वा मध्यमोत्तमा ॥ २४२ ॥ नीचे से द्वादशांश त्याग कर तीन अंशों से पीठ की ऊँचाई निर्मित करे। शेष अस्त्रांश समूह से प्रतिमा खड़ी बनानी चाहिये, अथवा यदि वाहनारूढ़ प्रतिमा बनावे तो उसे न्यून, मध्यम एवं उत्तम रूप में निर्माण करे ॥ २४२ ॥ चतुर्भिर्द्वादशांशैस्तदुपविष्टस्य चोन्नतिः । विहिता चास्य सर्वत्र प्रतिमाध्रेन विस्तृतिः ॥ २४३ ॥ चार द्वादशांश से उपविष्ट प्रतिमा की ऊँचाई निर्माण करे। इसका विस्तार प्रतिमा के आधे भाग में सर्वत्र निर्माण करे ॥ २४३ ॥ तत् त्र्यंशपरिलुप्ता च चतुर्थांशोज्झिताऽथवा । परिवारवशेनैव चातुरात्म्यस्य वै पुनः ॥ २४४ ॥ पुनः चातुरात्म्य के परिवार वश से वह प्रतिमा तीन अंशों से पूर्ण बनाई जाय अथवा चतुर्थांश छोड़कर बनाई जावे ॥ २४४ ॥ अलुप्तांशं च विहितं पीठायामं च सर्वदिक् । चतुर्दिग्दृग्गतस्यैवम् एकदिग्दृग्गतस्य च ॥ २४५ ॥ सभी दिशाओं में पीठ का आयाम अंश लोप के बिना निर्माण विहित है। चारों दिशाओं में दिखाई पड़ने वाले पीठ को अथवा एक दिशा में दिखाई पड़ने वाले पीठ के लिये यही नियम है ॥ २४५ ॥ तदेव दैर्घ्यद्विगुणं लाञ्छनैरावृतस्य च। सार्धं चानावृतस्यैव तद्बाहुल्यं पुरोदितम् ॥ २४६ ॥ यदि वह लाञ्छन से आवृत है, तो उसे दीर्घ का दुगना निर्माण करे, यदि वह लाञ्छन से अनावृत है तो अढ़ाई गुना कर निर्माण करे। इसका बाहुल्य पहले कह आये हैं ॥ २४६ ॥ (चतुष्कमेकपीठानां केवलं लक्ष्मवर्जितम् ।) एकैकं लक्ष्मभेदेन तत्संख्यं विद्धि वै पुनः ।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७९ पीठसंख्याकथनम् अनन्तासनमाद्यं च द्वितीयं पक्षमन्दिरम् ॥ २४७ ॥ कमलाङ्गं तृतीयं तु चतुर्थं चक्रभूषणम् । एवं हि सर्वसामान्यं पीठानां हि द्विरष्टकम् ॥ २४८ ॥ एक पीठ के ही चार भेद होते हैं जो केवल लक्ष्म (चिह्न) से वर्जित होते हैं। फिर लक्ष्म (= चिह्न) के भेद से एक-एक क्रम से वे भिन्न हो जाते हैं। हे सङ्कर्षण ! अब पुनः उनकी संख्या सुनिये। पहले आसन (पीठ) का नाम अनन्त है, द्वितीय पीठ का नाम 'पक्ष मन्दिर' है। तृतीय आसन (पीठ) का नाम कमलाङ्ग है। चतुर्थ का नाम चक्रभूषण है। इस प्रकार सर्व सामान्य पीठों की संख्या सोलह कही गई है ॥ २४७-२४८ ॥ भेदभिन्नं समासेन पुनरेव निबोध तु। दिक्षु लक्ष्माणि पीठानां विद्धि कण्ठगतानि च ॥ २४९ ॥ अब पुनः भेद से भिन्न होने के कारण उन पीठों के विषय में सुनिये। आठो दिशाओं में पीठों के लक्ष्म (चिह्न) कण्ठगत होते हैं ॥ २४९ ॥ अन्योन्यसन्निवेशाच्च तेषां बाह्यात्मना पुनः। चक्राम्बुजाभ्यां तत्स्थाभ्यां लुप्ताभ्यामपि तत्क्षितेः ॥ २५० ॥ ताभ्यामन्योन्ययोगाच्च दिक्ष्वनन्तखगाश्रयात् । द्विद्वयात्मना द्वयात्मना वा बहुत्वमवधारय ॥ २५१ ॥ पद्मेनोर्ध्वगतेनैव द्वयं चक्रेण तद्बहिः । एवं ह्याधोगतेनैव परिज्ञेयं द्वयं द्वयम् ॥ २५२ ॥ उपरिष्टात् तु पद्माभ्यामधश्चक्रं द्वयं द्वयम् । द्वितयव्यत्ययाच्चान्यत् परिज्ञेयं महामते ॥ २५३ ॥ पुनः अन्योन्य के सन्निवेश से वे पीठ अधिक संख्या में हो जाते हैं। पीठ में स्थित चक्र और कमल के भेद से, उन दोनों के स्थापित करने के भेद से, दोनों को एक में मिलाकर स्थापित करने के भेद से, दिशाओं में अनन्त और गरुड़ के स्थापन करने से, इस प्रकार दो-दो को अलग-अलग स्थापित करने से, अथवा दोनों को एकत्र स्थापित करने से वे पीठ अनेक हो जाते हैं। हे सङ्कर्षण ! इसे समझिए। इस प्रकार पीठ के ऊपर पद्म स्थापन से, उसके बाहर चक्र स्थापन से और इसी प्रकार के नीचे स्थापन करने से उसके दो भेद हो जाते हैं। ऊपर दो-दो पद्मों के स्थापन से, इसी प्रकार नीचे दो-दो चक्र के स्थापन से दो-दो भेद होते हैं और दोनों के व्यत्यय से भी दो-दो भेद हो जाते हैं। हे महामते ! इस प्रकार पीठ के अनेक भेद हो जाते हैं ॥ २५०-२५३ ॥
५८० सात्वतसंहिता अन्तर्बहिःस्थितिवशाच्चक्रपद्मद्वयस्य च। व्यत्ययादनयोर्विद्धि ऊर्ध्वभागाच्चतुष्टयम्॥ २५४ ॥ भीतर बाहर चक्र और पद्म के आठ ऊर्ध्व भाग के व्यत्यय होने से इनके चार भेद हो जाते हैं ॥ २५४ ॥ अधोभागादेवमेव चतुष्कमपरं तु वै। पीठानामष्टकमिदमधस्तादूर्ध्वतस्तु वा॥ २५५ ॥ युक्तमेकेन वै कुर्याच्चक्रेण कमलेन वा। चक्राकारास्तु विहिता ह्येकभ्रमसमाश्रिताः॥ २५६ ॥ इसी प्रकार अधोभाग में भी व्यत्यय होने से एक और चार भेद हो जाता है। ये पीठ के आठ भेद नीचे और ऊपर होने के कारण हो जाते हैं। इस पीठ का निर्माण केवल चक्र से अथवा केवल कमल से अर्थात् दो में से एक ही से करना चाहिये ॥ २५५-२५६ ॥ बहवो हि दलास्तद्वदीषद् वै कर्णिकान्विताः। इति लाञ्छनसञ्चारो बहुधा ते मयोदितः॥ २५७ ॥ यस्मिन् प्रकृतिभूते तु पीठे तदधुना शृणु। कृत्वा द्विर्दशधा पीठं पुरायामात् समैः पदैः॥ २५८ ॥ केवल एक गोले में ही चक्राकार पीठ निर्माण करना चाहिये । इसी प्रकार बहुत दलों से युक्त थोड़े कर्णिकाओं से कमल द्वारा पीठ निर्माण करे । इस प्रकार पीठ के अनेक लाञ्छन युक्त सञ्चार का वर्णन मैने किया । अब जिस प्रकृतिभूत पीठ में (जो करना है) उसे सुनिये । पीठ का आयाम (लम्बाई) के अनुसार बराबर-बराबर भागों में बारह भाग करे ॥ २५७-२५८ ॥ एकेन चरणं जङ्घा-कलशौ च त्रिभिस्त्रिभिः । कण्ठवीथिमथैकेन षड्भिः कण्ठं तदूर्ध्वतः ॥ २५९ ॥ एक भाग में चरण, तदनन्तर जङ्घा और कलश तीन-तीन भागों में निर्माण करे । एक भाग से कण्ठ एवं वीथी बनावे और उसके ऊपर छः भागों में कण्ठ निर्माण करे ॥ २५९ ॥ भागेन कण्ठसूत्रं तु शक्तिकांशत्रयेण तु। उष्णीषं च तदूर्ध्वे तु कुर्यादंशद्वयेन वै॥ २६० ॥ शुक्ति के अंशत्रय भाग से कण्ठ सूत्र निर्माण करे और उसके ऊपर दो अंश से उष्णीश निर्माण करे ॥ २६० ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५८१ निर्गमः स्वदलेनैव विहितश्चरणस्य तु। चतुर्दिक्षु महाबुद्धे क्षेत्रतोऽभ्यधिकः स्मृतः॥ २६१ ॥ विहित चरण का निर्गम उसके भाग से ही करे। हे महाबुद्धे! इस प्रकार चारों दिशाओं में निर्गम क्षेत्र से अधिक बनावे ॥ २६१ ॥ सर्ववृत्तं घटं कुर्यात् पल्लवैर्वारिकैर्युतम्। परितोऽशद्वयेनैव कण्ठपीठं प्रवेशयेत् ॥ २६२ ॥ पत्तों तथा अस्त्रों से युक्त चारों ओर से गोला घट का निर्माण करे। दो अंश से कण्ठ पीठ बनाकर उस घट में प्रवेश करावे ॥ २६२ ॥ अन्तःप्रवेशमेकेन विध्यंशेन गलस्य च। कुर्याद् गलप्रवेशस्य समां सूत्रस्य निःसृतिम्॥ २६३ ॥ एक अंश से निर्मित गला का अन्तःप्रवेश करावे। गल-प्रवेश के समान सूत्र को उसमें से निकाल लेवे ॥ २६३ ॥ शुक्तेरधः कण्ठसूत्रभागात् पादेन निर्गतम्। वदनान्तं समासेन शुक्तेः संकोचमाचरेत्॥ २६४ ॥ शुक्ति के नीचे कण्ठसूत्र के भाग से एक पाद निकला हुआ मुख का भाग संक्षेप में शुक्ति से संकुचित करे ॥ २६४ ॥ उष्णीषघटजङ्घानामश्रिसाम्यं यथा स्थितम्। घटवद् भूषयेच्छुक्तिमरकैर्वाब्जपल्लवैः॥ २६५ ॥ तत्रोपरिष्टात् परिधिं चतुरंशकसम्मितम्। सन्त्यज्य निखनेद् द्रोणीमंशनिम्नां समन्ततः ॥ २६६ ॥ ऐसा करने से उष्णीष, घट और जङ्घा के कोण एक साम्य में स्थित हो जाएँगे। तदनन्तर शुक्ति को अरक तथा कमल पत्र से घट के समान भूषित करे। उसके ऊपर चार अंश की परिधि का भाग छोड़कर एक अंश गहरी द्रोणी चारों ओर (गड्ढा) खननी चाहिए ॥ २६५-२६६ ॥ विस्तृतैर्मध्यभागेऽथ स्वत्र्यंशेन च निर्गमम्। तन्मानं चतुरश्रं तु पीठक्षेत्राद् विनिर्गतम् ॥ २६७ ॥ मध्य भाग को विस्तृत कर उसके तीन अंश से निर्गम का पानी निकलने का स्थान खने। पीठ क्षेत्र से निकले हुए उस निर्गम (जल निकासी) का मान चतुरस्र (चौकोर) बनावे ॥ २६७ ॥ तच्चाग्रतस्त्रिधा कृत्वा पक्षभागौ क्षयं नयेत्।