भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

२०८ ] [ श्री शारदा तिलक अनन्तो बिन्दुसंयुक्तो माया ब्रह्माग्नितारवान् । पाशादित्र्यक्षरो मन्त्रः सर्ववश्यफलप्रदः । ८२ ऋष्याद्याः पूर्वमुक्ताः स्युर्बीजेनाङ्गक्रिया मता । ८३ वराङ्कुशौ पाशमभीतिमुद्रां करैर्वहन्तीं कमलासनस्थाम् । बालार्ककोटिप्रतिमां त्रिनेत्रां भजेयमाद्यां भुवनेश्वरीताम् । ८४ सोलह पत्रों में पूर्व में वर्णित कराली आदि का पूजन करना चाहिए। उनके बाहिर अनङ्ग रूपा आदि का यजन करे। उनके बाहिर लोकपालों तथा उनके अस्त्रों का अर्चन करना चाहिए । ७८। इसी रीति से शास्त्रों में कहे गए मार्ग के द्वारा ही देवी की अराधना करे। इसका यह प्रभाव होता है कि साधक व्यक्ति इससे राजा को तथा मदालसा वनिताओं को अपने वश में कर लिया करता है । ७६। आज्य (घृत) से युक्त अन्न का होम करे तो अपना अभीष्ट धन प्राप्त कर लिया करता है । सुगन्धित पुष्पों के द्वारा हवन करके मनोवाञ्छित श्री की प्राप्ति कर लेता है ।८०। इस मन्त्र से अभिमन्त्रित अन्न का नित्य ही अशन करे तो नियत रूप से रोग से रहित होता है और दीर्घायु को प्राप्त किया करता है ।८१। अनन्त अर्थात् आकार जो बिन्दु से संयुत होवे- माया बीज से युक्त ककार-अग्नि-रेफ और प्रणव के संयुत-पाश आदि वाला तीन अक्षरों का मन्त्र होता है जो सबको वश्य करने के फल का प्रदान करने वाला है ।८२। इसके ऋषि आदि पूर्व में ही कहे गए हैं और बीज से अङ्ग क्रिया मानी गयी है ।८३। ध्यान बतलाया जाता है करकमलों के द्वारा वरदान, अंकुश पाश और अभयदान को धारण करने वाली, कमल के आसन पर विराजमान करोड़ों बाल सूर्यों के तुल्य तेज से समन्वित तीन नेत्री वाली उस आद्य भुवनेश्वरी देवी का मैं भजन करता हूँ ।८४। हविष्यभुग् जपेन्मन्त्रं तत्त्वयक्षं जितेन्द्रियः । तत्सहस्रं प्रजुहुयाज्जपान्ते मन्त्रचित्तमः ।८५

नवम पटल ] [ २०६ दधिक्षौद्रघृताक्ताभिः समिद्भिः क्षीरभूरुहाम् । तत्संख्यया तिलैः शुद्धैः पयोक्तैजुहुयात्ततः।८६ हृल्लेखाविहिते पीठे नवशक्तिसमन्विते । अर्चयेत्परमेशानी वक्ष्यमाणक्रमेण ताम् ।८७ हृल्लेखाद्या यजेदादौ कर्णिकायां यथाविधि । अङ्गानि केसरेषु स्युः पत्रस्था मातरः क्रमात् ।८८ इन्द्रादयः पुनः पूज्यास्तेषामस्त्राणि तद्बहिः । एवं संपूजयेद्देवीं साक्षाद्वैश्रवणो भवेत् ।८६ दृश्यते मकलैर्लोकैस्तेजसा भास्करोपमः । अनेनाधिष्ठतं गेह निशि दीपशिखाकुलम् ।६० दृश्यते प्राणिभिः सर्वैर्मन्त्रस्यास्य प्रभावतः । सर्षपैर्लोगसंमिश्रैराज्यक्तैर्जुहुयान्निशि ।६१ अपनी सब इन्द्रियों को जीत लेने वाला हविष्य का भोजन करने वाला पुरुष यन्त्र का चौबीस लाख जप करे । मन्त्रोंका ज्ञान रखने वाला जप के अन्त में उतना ही सहस्र होम करे । फिर दही, शहद और घृत से अक्त करके दूध वाले वृक्षों की समिधाओं से उसकी संख्या से शुद्ध तिलों के द्वारा जो पय से अक्त होवें हवन करना चाहिए और उसकी संख्याके ही अनुसार होम करे ।८५।८६। उस परमेशानी का आगे बताये जाने वाले क्रम से नव शक्तियों से समन्वित हृल्लेखाविहित पीठ पर अभ्यर्चन करना चाहिए ।८७। आदि में विधि के अनुसार कर्णिका में हृल्लेखा आदि का यजन करे । केसरों में अङ्ग होवें और मातृगण क्रमसे पत्रों में स्थित होनी चाहिए ।८८। फिर इन्द्र आदि का पूजन करे और उनके बाहिर उनके अस्त्रों का यजन करे । इस प्रकार से देवी का अर्चन करे तो साक्षात् वैश्रवण ही हो जाया करता है ।८६। वह मनुष्य तेजसे समस्त लोकों के द्वारा सूर्यके ही तुल्य दिखलाई दिया करता है । इसके द्वारा अधिष्ठित गेह रात्रि में दीप शिखा से समाकुल होता है ।६०। इस मन्त्र के प्रभाव से सभी प्राणियों के द्वारा वह ऐसा दिखलाई दिया

प्रथमोऽष्टाक्षरो मन्त्रः ततः कामिनि रञ्जिनि ।

२१० ] [ श्री शारदा तिलक करता है। नमक से संमिश्रित सर्षपों से जो आज्य से अक्त होवें रात्रि के समय में हवन करना चाहिए ।६१। राजानं वशयेत्सद्यस्तत्पत्नीमपि साधकः । अन्नवानन्नहोमेन श्रीमान्पद्महुताद्भवेत् ।६२ राजवृक्षसमुद्भूतै पुष्पैर्हुत्वा कविर्भवेत् । अरोगी तिलहोमेन घृतेनायु॒रवाप्नुयात् ।६३ प्राक्प्रोक्तान्यपि कर्माणि साधयेत्साधकोत्तमः ।६४ आलिख्याष्टदिमर्गलान्यउदरगं पाशादिकं त्र्यक्षरं कोष्ठेष्वङ्गमनून् परेषु विलिखेदष्टाणर्मन्त्रद्वयम् । अच्पूर्वापरषट् कयुग्लयवरान् व्योमासनानर्गले- ष्वालिख्येन्द्रजलाधिपादिगुणशः पङ् क्तिद्वयं तत्परम् ।६५ कोष्ठेष्वष्टयुगार्णमात्मसहितां युग्मस्वरान्तर्गतां मायां केसरदिग्दलेषु विलिखे मूलं त्रिपङ्क्तिक्रमात् । त्रिःपाशाङ् कुशवेष्टितं लिपिभिरावीयं क्रमाद्वृत्तक्रमात । पद्मस्थेन घटेन पङ्कजमुखेनावेष्टितं तद्बहिः ।६६ घटार्गलमिदं यन्त्रं मत्रिणां प्राभृतं मतम् । पाशश्रीशक्तिकन्दर्पकामशक्तीन्दिरांकुशाः ।६७ प्रथमोऽष्टाक्षरो मन्त्रः ततः कामिनि रञ्जिनि । स्वाहान्तोऽष्टाक्षरः सद्भिर्परपरः परिकीर्त्तितः ।६८ साधक व्यक्ति तुरन्त ही ऐसा करने से राजा को अपने वश में कर लिया करता है और उनकी पत्नी को भी वश्य कर लेता है। अन्न के होम से अन्न वाला हो जाता है। पद्मोंके होम से श्रीमान् होता है ।६२। राज वृक्ष में समुत्पन्न पुष्पों से हवन करके कवि हो जाया करता है। तिलों के होम से रोग रहित और घृत के हवन करने से आयु को प्राप्त किया करता है ।६३। साधना करने वालों में उत्तम साधक व्यक्ति पूर्व में वर्णित भी कर्मों को करे ।६४। अब घटार्गल यन्त्र बतलाते हैं—आठ

नवम पटल ] [ २११ दिशाओं में अर्गलाओं को लिखकर उदरगं पाश आदि तीन अक्षरों को कोष्ठों में और दूसरों में अङ्ग मन्त्रोंको लिखें। आठ अक्षरोंके ये दो मंत्र हैं। अच पूर्वा पर षट्क से युक्त लयवरो को व्योमासनों को अर्गलों में लिखकर इन्द्र जलाधिप (वरुण) आदि के गुण से उससे परे दो पंक्तियों को लिखे ।८२। कोष्ठों में अष्ट युगार्ण को युग्म स्वरों के अन्तर्गत आत्म सहित मायाको केसर दिग्दलों में लिखना चाहिए। तीन पंक्तियों के द्वारा आवीत उसके बाहिर पद्म में स्थित पङ्कज मुख घट से आवेष्टित करे। ।८६। यह घटार्गल यन्त्र होता। जो मन्त्रधारियों का प्राभृत माना गया है। पद्म श्री शक्ति—कन्दर्प—काम शक्ति—इन्दिरा—अंकुश हैं। प्रथम आठ अक्षरों वाला मन्त्र होता है। इसके उपरान्त कामिनी— रञ्जिनि और अन्त में स्वाहा होता है—यह सत्पुरुषों के द्वारा दूसरा आठ अक्षरों वाला मन्त्र कीर्त्तित किया गया है ।८७।८८ ह्रीं गौरि रुद्रदयिते योगेश्वरि सवर्म फट्। द्विठान्तः षोडशार्णोऽयं मन्त्रः सद्भिरुदीरितः ।९९ लिखित्वा भूर्जपत्रादौ यन्त्रमेतद्यथाविधि। धारयेद्वामबाहौ वा कण्ठे वा निजमूर्द्धनि । १०० वशयेत्सकलान्मर्त्यान् विशेषेण महीपतिम्। नीलपट्टे विलिख्यैतद्गुटिकीकृत्य तत्पुनः । १०१ साध्यप्रतिकृतौ सिकथनिर्मितायां हृदि न्यसेत्। पात्रे त्रिमधुरापूर्णे-निःक्षिप्यैनां विधानतः ।१०२ सम्पूज्य गन्धपुष्पाद्यैर्बलि निःक्षिप्य रात्रिषु। मूलमन्त्रं जपेन्मन्त्री नित्यमष्टसहस्रकम् ।१०३ सप्ताद्वाहाच्छितां नारीमाहरेत्स्मरविह्वलाम्। भूर्जपत्रे विलिख्यैतत् गुटकीकृत्य तत्पुनः । १०४ लाक्षया ताम्ररजतकाञ्चनैर्वेष्टयेत्क्रमात्। तत्कुम्भे न्यस्य सम्पूज्य यथावद्भुवनेश्वरीम् । १०५

२१२ ] [ श्री शारदा तिलक 'ह्रीं गौरि रुद्र दयिते योगेश्वरि' वर्म के सहित फट् जिसके अन्त में दो ठकार होवें—यह सोलह वर्णों वाला मन्त्र सत्पुरुषों के द्वारा कहा गया है ।६६। इस मन्त्र को भोजपत्र आदि पर विधि के साथ लिखकर इसको साधक अपनी बांयी बाहु में अथवा कण्ठ में या अपने मस्तक में बाँधे तो वह सब मनुष्यों को वशमें कर लिया करता है और विशेष रूप से नृपति को अपने वशमें कर लेता है । नील पट्ट पर इसको लिखकर फिर गुटिका बनाकर सिक्य के द्वारा निर्माण की हुई साध्यकी प्रतिमा के हृदय में न्यस्त कर देवे । तीन मधुरों से परिपूर्ण पात्र में इसको निधान से निक्षिप्त कर देवे । गन्ध पुष्प आदि के द्वारा भली- भाँति पूजन करके रात्रि के समय में बलि का विक्षेपण करे । मन्त्रधारी को नित्य ही मूल मन्त्रका आठ सहस्र जप करना चाहिये । १००-१०३ एक ही सप्ताह में अपनी मनोवांछित काम वासना से विह्वल नारी का आहरण कर लेता है । भोजपत्र पर इसको लिखकर फिर उसकी गुटिका बनावे ।१०४। लाख से ताम्र, चाँदी, सुवर्ण से क्रम से इसको वेष्टित करे । उसको कुम्भ में न्यस्त करके भुवनेश्वरी देवी का यथा रीति से भली-भाँति अर्चन करना चाहिये ।१०५ संस्पृश्य तज्जपन्मन्त्रं दिवाकरसहस्रकम् । अभिषिच्य प्रियं साध्यं बध्नीयाद्यन्त्रमा शिखम् । १०६ कान्तिं पुष्टिं धरारोग्यशांति लभते नरः । भित्तौ विलिख्य तद्यन्त्रं पूजतेन्नित्यमादरात् ।१०७ भूतप्रेतपिशाचास्तं न वीक्षितुमपि क्षमाः । तद्विलिख्य शिरस्त्राणे साधितं धारयेद्भटः ।१०८ युद्धे रिपून् बहून्हत्वा जयताप्नोति पार्थिवः ।१०६ वज्राङ्किते वहिनपुरद्वये तां पाशांकुशाद्यभ्यामुदरस्थसाध्यम् । मध्येऽथकोणेष्ठवथ वाह्यवृत्ते पुनः पुनस्तां विलिलेत्स मन्तात् ।११० भूर्जे लिखितमेतत्स्यात्सर्ववश्यकरं नृणाम् ।

नवम पटल ] [ २१३ आरोग्यैश्वर्यजननं युद्धेषु विजयप्रदम् ।१११ लिखेत्सरोजे स्वरकेसराढ्ये वर्गाष्टपत्रे वसुधापुरस्थे । पाशाङ्कुशाभ्यां गुणशः प्रबद्धां मायांलिखेन्मध्यगतांसाध्याम्११२ सर्वोत्तममिदं यन्त्रं धारितं कुरुते नृणाम् । आरोग्यैश्वर्यसौभाग्यविजयादीननारतम् ।११३ अभ्यर्चन करने के पश्चात् बारह हजार की संख्या में मन्त्र का जप करना चाहिये । प्रिय साध्य का अभिषेक करके यन्त्र को शिखा में बाँध लेवे ।१०६। इसके प्रभाव से मनुष्य कान्ति, पुष्टि, धरा, आरोग्य और शान्ति लाभ करता है । नित्य ही ही बहुत अधिक आदर से पूजन करना चाहिए ।१०७। भूत-प्रेत और पिशाच उसका अवलोकन करने में भी समर्थ नहीं हुआ करते हैं । फिर इसको साधित करके अपने शिरस्त्राण में लिखकर धारण करे ।१०८। राजा युद्ध में शत्रुओं का हनन करके विजय का लाभ किया करता है ।१०६। वज्र से अङ्कित वह्निपुर द्वय में पाश और अंकुश से संयुत उसको मध्य में और वाह्य वृत्त में कोण में उदरस्थ साध्य को वारम्बार चारों ओर लिखना चाहिये ।११०। भोजपत्र पर लिखा हुआ यह यन्त्र मनुष्योंको अपने वश्य करने वाला हुआ करता है । यह आरोग्य और ऐश्वर्य को उत्पन्न करने वाला है और युद्धों में विजय प्रदान करने वाला हुआ करता है ।१११। स्वर केसर से आढ्य वसुधापुर में स्थित वर्गाष्ट पत्र में सरोज में पाश और अंकुश से युक्त गुणों से प्रबुद्ध साध्य के सहित मध्यगता माया को लिखें ।११२। यह सबसे उत्तम यन्त्र है । यह धारण किया हुआ मनुष्यों के आरोग्य, ऐश्वर्य, सौभाग्य और विजय आदि को निरन्तर क्रिया करता है ।११३

२१४ ] [ श्री शारदा तिलक दशम पटल दुर्गा प्रकरण ततो दुर्गामनुं वक्ष्ये दृष्टादृष्टफलप्रदम् । मायाऽद्रिः कर्णविन्दाढ्यो भूयोऽसौ सर्गवान्भवेत् । १ पञ्चान्तकः प्रतिष्ठावान्मारुतो भौतिकहासनः । तारादिर्हृदयान्तोऽयं मन्त्री वस्वक्षरात्मकः । २ ऋषिश्च नारदश्छन्दो गायत्रं देवनामनोः । दुर्गा समीरिते। सदभिर्दु रितापन्निवारिणी । ३ नमस्कारयुक्तेन मूलमन्त्रेण साधकः । ह्रामाद्यैः सह कुर्वीत षडङ्गानि यथाविधि । ४ सिंहस्था शशिशेखरा मरकतप्रख्यैश्चतुर्भिर्भुजैः । शंखं चक्रधनुः शरांश्च दधतीं नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता । आमुक्ताङ्गदहारकङ्कणरणत्काञ्चीरणन्नूपुरा दुर्गा दुर्गतिहारिणी भवतु वो रत्नोल्लसत्कुण्डला । ५ वसुलक्षं जपेन्मन्त्रं तिलैर्मधुरलोलितैः । पयोऽन्धसा वा जुहुयात्तत्सहस्रं जितेन्द्रियः । ६ पीठमित्थं यजेत्सम्यक् नवशक्तिसमन्वितम् । प्रभा मया जया सूक्ष्मा विशुद्धा नन्दिनी पुनः । ७ सुप्रभा विजया सर्वसिद्धिदा नव शक्तयः । अर्चिर्ह्रस्वत्रयक्लीवरहितैः पूजयेदिमाः । ८ इसके अनन्तर दुर्गा के मन्त्र के विषय में बतलाऊँगा जो दृष्ट और अदृष्ट के फल को प्रदान करने वाला होता है। अब मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है—माया—शक्ति का बीज—हकार, ठकार, विन्दु से आढ्य हूँ, फिर विसर्गों से युक्त हुकार, पञ्चान्तक मकार आकार से युक्त गा, यकार, भौतिकहासन अर्थात् थे, मारुत से यकार जिसके आदि में प्रणव है और अन्त में हृदय है यह मन्त्र आठ अक्षरों वाला होता है

दशम पटल ] [ २१५ ।१-२। इस मन्त्र का ऋषि नारद है—गायत्री छन्द है और इस मन्त्र का देवता दुर्गा कही गई है, जिनको सत्पुरुषों ने बतलाया है। यह दुरितों और आपदाओं के निवारण करने वाला है। ३। साधक को चाहिये कि नमस्कार से रहित मूल मन्त्र से ह्रामाद्यों के सहित विधि- पूर्वक षट् अङ्गों को करे।४। ध्यान—सिंह के वहन पर विराजमान चन्द्र को मस्तक पर धारण करने वाली—मरकतप्रस्थ अपनी चार भुजाओं के द्वारा शङ्ख-चक्र-धनुध और शरों को धारण करने वालों है— तीन नेत्रों से शोभित—मोतियों के हार, अङ्गद, कङ्कण में से युक्त तथा झनकार करने वाली काञ्ची और नूपुरों वाली है—रण में उल्ल- सित कुण्डलों से विभूषित दुर्गादेवी आपके दुर्गों अर्थात् कष्टों का हरण करने वाली होवे ।५। इस मन्त्र का आठ लाख जप करे। इन्द्रियों को जीत लेने वाला साधक मधुर से लोलित तिलों के द्वारा अथवा पयोन्ध से लोलित किये हुओं से एक सहस्र आहुतियाँ देवे ।६। इस रीति से नौ शक्तियों से समन्वित पीठ को भली-भाँति पूजन करें—नौ शक्तियों के नामों को बतलाया जाता है—प्रभा, माया, जया, सूक्ष्मा, विशुद्धा, नन्दिनी, सुप्रभा, विजया और सर्व सिद्धिदा—ये नौ शक्तियाँ हैं। इनका ह्रस्वत्रयकनीवों से रहित अचों से यजन करना चाहिये ।७-८। प्रणवान्तरे वज्रनखदंष्ट्रायुधाय च । महासिंहाय वर्मास्त्रं नतिः सिंहमनुर्मतः ।६ दद्यादासनमेतेन मूत्ति मूलेन कल्पयेत् । तस्यां संपूजयेन्मूर्ती देवीमावाह्य मन्त्रवित् ।१० अङ्गावृत्तिं पुराभ्यर्च्य शक्तीः पत्रेषु पूजयेत् । जया च विजया कीर्ति प्रीतिः पश्चात्प्रभा पुनः ।११ श्रद्धा मेधा श्रुतिः प्रोक्ता स्वनामाद्यक्षरादिकाः । पत्राग्रेष्वर्चयेदष्टायुधानि यथाक्रमात् ।१२ चक्रशङ्खगदाखड्गपशांकुशशरान्धनुः । लोकेश्वरांस्ततो वाह्ये तेषामस्त्राण्यनन्तरम् ।१३

२१६ ] [ श्री शारदा तिलक इत्थं जपादिभिर्मन्त्री मन्त्रे सिद्धे विधानवित्। कुर्यात्प्रयोगानेतेन मनुना स्वमनीषितान् । ९४ अब सिंह मन्त्र बतलाया जाता है, प्रणव के अनन्तर वज्रनख दंष्ट्रायुधाय—वह स्वरूप है, सिंहाय—यह स्वरूप है इसके अनन्तर हूँ फट् ओर अन्तमें नमः यह पद होता है । यही सिंह मन्त्र माना गया है । ।६। इस मन्त्र द्वारा आसन अर्पित करे और मूल मन्त्र के द्वारा मूत्ति की कल्पना करनी चाहिए । मन्त्र के ज्ञाता को चाहिए कि उसमें मूत्ति में देवी का आवाहन करके भली-भाँति उनका अर्चन करे । ९०। पहिले अङ्गावृत्ति का यजन करके फिर पत्रों में शक्तियोंका यजन करें । जया, विजया, कीर्त्ति, प्रीति, प्रभा, श्रद्धा, मेधा, श्रुति ये बताई गयी हैं । इनसे अपने नाम के आदि अक्षर का उच्चारण करे । पत्रों के अग्र भागों में क्रम के अनुसार आठ आयुधों का अर्चन करना चाहिए । ९१- ९२। ने आठ आयुध ये हैं—शंख, चक्र, गदा, खङ्ग, पाश, अंकुश, शर और धनुष । इसके उपरान्त बाहिर लोकेश्वरों का तथा उनके अनन्तर उनके अस्त्रों का पूजन करे । इस रीति से मन्त्रधारी जो विधान का ज्ञाता होवे जप आदि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर इस मन्त्र के द्वारा अपने मनीषित प्रयोगों को करे । ९३-९४। प्रतिष्ठाप्य विधानेन कलशान्नव शोभनान् । रत्नहेमादिसंयुक्तान्पदेषु नवसु स्थितान् । ९५ मध्यस्थे पूजयेद्देवीमितरेषु जयादिकाः । पूज्य गन्धपुष्पाद्यै रभिषिञ्चेन्नराधिपम् । १६ राजा विजयते शत्रून्साधकोविजयश्रियम् । रोगी दीर्घायुः सर्वव्याधिविवर्जितः । १७ वन्ध्याभिषिक्ता विधिना लभते तनयं वरम् । मन्त्रेणानेन सजाप्तमाज्यं क्षुद्रज्वरापहम् । गर्भिणीनां विशेषेण जप्तं भस्मादिकं तथा । ९८

दशम पटल ] [ २१७ मध्ये तारे बीजमन्तस्थसाध्यं पत्रेष्वष्टौ मन्त्रवर्णान्विलिख्य । त्रिष्टुब् वीतं वेष्टितं मातृकार्णैर्यन्त्रं दौर्गं भुपूरस्थं विदध्यात् ।१६ क्षुद्रभूतमहारोगचौरसर्प निवारणम् । विजयश्रीपदं पुंसां गर्भिणीना सुखप्रदम् ।२० भ्रान्तं वियतसनयनं श्वेतो मर्द्दिनि ठद्वयम् । अष्टाक्षरीयमाख्याता विद्या महिषमर्द्दिनी ।२१ इसके अनन्तर विधानके साथ परम शोभन नौ कलशोंकी प्रतिष्ठा, षित करके, जोकि रत्न औके सुवर्ण से संयुक्त होवें—नौ पदों में स्थित करे । जो कलश मध्य में स्थित है उसमें देवी का अर्चन करे और इतर कलशोंमें जया आदि का पूजन करना चाहिए । गन्ध पुष्पादि उपचारों के द्वारा भली-भाँति पूजन करके नराधिप का अभिषेक करे ।१५।१६। इससे राजा अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त किया करता है और साधक विजय श्री को प्राप्त किया करता है । जो रोगी हो वह दीर्घ आयु की प्राप्ति करता और समस्त व्याधियों से रहित हो जाया करता है ।१७। विधि से अभिषेक की हुई वन्ध्या नारी परम श्रेष्ठ सुत को प्राप्त करती है । इस मन्त्र से अभिमन्त्रित आज्य क्षुद्रज्वर के अपहरण करने वाला होता है । विशेष रूप से जप की हुई भस्म आदि लाभ किया करती है ।१८। अब मन्त्र बतलाते हैं-मध्य में, कर्णिका में, तार में ( प्रणव में ) अन्तःसम स छ अर्थात् मध्यास्थ्य साध्य साधक नाम कर्म के सहित दौर्ग बीज को लिखे और आठ पत्रोंमें मन्त्र के वर्णों का लेखन करे तथा त्रिष्टुप् से वीत और मातृका वर्णों से वेष्टित करे इस यन्त्र को भूपुर के मध्य में स्थित करना चाहिए ।१९। यह मन्त्र यन्त्र क्षुद्र भूत, महारोग, चारों ओर सर्पों का निवारण करने वाला होता है । पुरुषों को विजय और श्री के प्रदान करने वाला होता है । तथा गर्भिणियों के सुख का प्रदाता है ।२०। भान्त—मकार, विद्युत्—ढकार, सनयन—इकार के सहित, श्वेत—षकार, मर्द्दिनि—स्वरूप, दोठकार और स्वाहा —यह विद्या अष्टाक्षरों वाली महिष-मर्दिनी कही गयी है ।२१।

२१८ ] [ श्री शारदा तिलक महिषहिंसिके हूँ फट् हृदयं परिकीर्तितम् । महिषशत्रो शार्ङ्गि हूँ फट् शिरोऽङ्गं समुदाहृतम् ।२२ महिषं भीषयद्वन्द्वं हूँफडन्तः शिखामनुः । महिष हनयुग्मान्ते देवि हूँफट् तनुच्छदम् ।२३ महिषान्ते सूदिति हूँफडन्तमस्त्रसमीरितम् । मन्त्रैरेतैर्जातियुक्तैः पञ्चाङ्गानि प्रकल्पयेत् ।२४ गारुडोपलसन्निभां मणिमौलिकुण्डलमण्डिताम् । नौमिभालविलोचनां महिषोत्तमाङ्गनिषेदुषीम् ।२५ चक्रशंखकृपाणखेटकवाणकार्मुकशूलकान् । तर्ज्जनीमपिविभ्रतीं निजबाहुभिः शशिशेखराम् ।२६ अष्टलक्ष जपेन्मन्त्र तत्सहस्रं तिलैः शुभैः । हुत्वा प्रागीरीते पीठ यजेन्महिषमर्दिनाम् ।२७ संपूज्याङ्गानि पत्रेषु दुर्गाख्यां वरवर्णिनीम् । आर्याह्वां तृतीयां च चतुर्थी कनकप्रभाम् ।२८ पञ्चमीं कृत्तिकासंज्ञा षष्ठीमप्यभयप्रदाम् । कन्यां सुरूपां प्रभजेन्मन्त्रौ दीर्घस्वरैः क्रमात् ।२६ महिष हिंसि के हूँ फट्—वह हृदय कीर्त्तित किया गया है—महिष शत्रो शार्ङ्गि हूँ फट्—शिर अङ्ग कहा गया है ।२२। महिर्ष भीषयद्वन्द्वं हूँ फट्—शिखा मन्त्र है । महिष दो हन के अन्त में देवि हूँ फट्—यह तनुच्छद है ।२३। महिष के अन्त में सूदिनि हूँ फट्—यह अस्त्र कहा गया है । इन मन्त्रों से जातियुक्त हैं पञ्च अङ्गों को प्रकल्पित करना चाहिए ।२४। ध्यान—गारुडोपल के सदृश—मणि मौलि कुण्डलों से मण्डित—भाल में विलोचन वाली—महिष के उत्तम अङ्ग पर विराज- मान—शङ्ग, चक्र, कृपाण खेटक, वाण, कार्मुक और शूल को धारण करने वाली—मस्तक में चन्द्र को धारण करती हुई—तर्जनी को भी अपनी बाहुओंसे विभरण करने वाली को नसस्कार करता हूँ ।२५-२६ इस मन्त्र का आठ लाख जप करे । एक सहस्र शुभ तिलों से हवन करे

दशम पटल ] [ २१६ पूर्व में वर्णित पीठ पर महिष मर्दिनीका यजन करना चाहिए ।२७। पत्रों अङ्गों का पूजन करना चाहिए । दुर्गा, वरवर्णिनी, आर्या, चौथी कनक प्रभा, पाँचवी कृतिका, छटवीं अभयप्रदा, कन्या स्वरूप का मन्त्र धारी क्रम से दीर्घ स्वरों से प्रभजन करे ।२८-२६। यजेदग्रेष्वायुधानि चक्रशङ्खासिखेटकान् । वाणं बाणासनं शूल कपाल यादिभिः क्रमात् । ३० लोकपालाः पुनः पूज्यास्तदस्त्राणि ततः परम् । वशयेत्तिलहोमेन नरान्नृपतीनपि ।३१ सिद्धार्थैर्हुयान्मन्त्री रोगा-मुच्येत तत्क्षणात् । पद्मैर्हुत्वा जयेच्छत्रून्दूर्वाभिःशान्तिमाप्नुयात् ।३२ पलाशंकुसुमैः पुष्टिं धान्यैर्धान्यश्रियं व्रजेत् । काकपक्षैः कृतोहोमो द्वेषं वितनुते नृणाम् ।३३ मरीचहोमान्मरणं रिपुराप्नोति सर्वथा । क्षुद्रादिचोरभूताद्यान्ध्यात्वा देवीं विनाशयेत् । ३४ तारो दुर्गेयुं रक्तमन्त्यं ठान्तं सलोचनम् । द्विष्टान्ता जयदुर्गेयं विद्या वेद्या दशाक्षरी । ३५ आगे आयुधों का—शङ्ख चक्र का असि और खेटकों का—बाण— बाणासन—शूल—कपाल का यादि से क्रम से यजन करे ।३०। फिर लोक पालों का पूजन करे उनके आगे उनके अस्त्रों का यजन करना चाहिए । इस तरह से करने वाला साधक तिलों के होम से नरों और नर पतियों को भी अपने वश में कर लिया करता है ।३१। मन्त्रधारी सिद्धार्थों (श्वेत सर्षपों) से हवन कर के रोग ने तत्क्षण में ही मुक्त हो जाया करता है । पद्मों से हवन करके शत्रुओं पर विजय पाता है और दूर्वाओं से होम करके शान्ति को पाता है ।३२। पलाश के पुष्पों के द्वारा होम करके पुष्टि का लाभ किया करता है और धान्यों से हवन करके धान्य श्री को प्राप्त करता है । कौए के पक्षों से होम करने वाला मनुष्यों में द्वेषका विस्तार करता है ।३३। मिर्चों के होम से शत्रु सर्वथा

२२० ] [ श्री शारदा तिलक मरण को प्राप्त कर लेता है। देवी का ध्यान करके क्षुद्रादि—चोर— भूत आदि का विनाश कर दिया करता है ।३४। अब जय दुर्गा का मन्त्र बतलाते हैं प्रणव, दो बार दुर्गे पद, रेफ, अन्त में क्षकार, ईकार के सहित णकार और अन्त में दो ठकार—यह दश अक्षरों वाली जय दुर्गा जान लेनी चाहिए ।३५। तारादिदुर्गे हृदयं दुर्गे शिर उदाहृतम् । दुर्गायै स्याच्छिखा वर्म भूतरक्षिणि कीर्तितम् । तारादिदुर्गे युगलं रक्षिण्यस्त्रं समीरितम् ।३६ कालाभ्र भां कटाक्षं ररिकुलभयदां मौलिबद्धे दुरेखां शङ्खञ्चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपिकरैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम् । सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं ध्यायेद्दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः ।३७ बाणलक्षं जपेन्मन्त्रं घृतेन जुहुयात्ततः । दशांशं संस्कृते वह्नौ ब्राह्मणानपि भोजयेत् ।३८ लष्टाक्षारोपिते पीठे पूजयेत्पर्ववत्सुधीः । मन्त्रं जपन् विशेद्युद्धे शत्रून्हन्याद्विशेषतः ।३६ प्रजपेद्व्यवहारादौ तत्रापि विजयी भवेत् । अर्चयेदस्त्रशस्त्राणि जयार्थी विद्ययाऽनया ।४० ज्वलज्वलपदान्ते स्याच्छूलिनीति पदं वदेत् । दुष्टग्रहं हुमस्त्रान्तो वह्निजायावधिर्मनुः ।४१ भूतेन्द्रियाक्षरैः प्रोक्तो ग्रहक्षुद्रारिनाशकः । ऋषिर्दीर्घतमाः प्रोक्तः ककुप्छन्द उदाहृतम् ।४२ तारादि दुर्गे—यह हृदय है और दुर्गे—यह शिर कहा गया है। दुर्गायै-यह शिखा है—भूत रक्षिणि—यह वर्म कहा गया है ।३६। तारादि दुर्गे युगल और रक्षिणि—यह अस्त्र कहा गया है ।३६। अब ध्यान बताया जाता है—काले मेघ की आभा वाली—अपने कटाक्षों के द्वारा शत्रुओं के समुदाय को भय प्रदान करने वाली—मस्तक में इन्दु रेखा को धारण

दशम पटल ] [ २२१ करती हुई, तीन नेत्रों से युक्त, कर-कमलों के द्वारा शङ्ख, कृपाण, त्रिशिख को धारण करने वाली, सिंह के स्कन्ध पर अधिरूढ़, अपने तेज के द्वारा सम्पूर्ण त्रिभुवन को पूरित करने वाली, देवगणों से परि- वृत, सिद्ध कामों के द्वारा सेवित, जय नाम वाली दुर्गा का ध्यान करे ।३७। पाँच लाख मन्त्र का जप करे फिर घृत से होम करे। हवन संस्कार की हुई अग्नि में दशांश करना चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन करावे ।३८। सुधी पुरुष को चाहिए कि पूर्व की ही भाँति अष्टाक्षरोपित पीठ पर पूजन करे। मन्त्र का जप करते हुए युद्ध में प्रवेश करे तो विशेष रूप से शत्रुओं का हनन किया करता है ।३९। व्यवहार आदि प्रकृष्ट रूप से जप करे तो वहाँ पर भी विजय होता है ! इस विद्या के द्वारा जप का अर्थी अस्त्रों और शस्त्रों का अर्चन करे ।४०। ज्वल-ज्वल पदों के अन्त में शूलिनि—इस पद को कहे। दुष्टग्रह हैं—इस अस्त्र के अन्त वाला अन्त में स्वाहा होता है ।४१। भूतेन्द्रियाक्षरों के द्वारा कहा हुआ मन्त्र ग्रह-क्षुद्र शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसका ऋषि दीर्घतमा कहा गया है और इसका ककुप छन्द कहा गया है ।४२। शूलिनि देवता प्रोक्ता समस्तसुरवन्दिता । दुर्गे हृदवरदे शीर्ष विन्ध्यवासिनि तच्छिखा ।४३ वर्म्माऽसुरान्ते मर्द्दिनी युद्धपूर्वप्रिये पुनः । त्रासयद्वितयञ्चास्त्रं देवसिद्धसुपूजिते ।४४ नन्दिनी स्याद्रक्षयुगं महायोगेश्वरि क्रमात् । शूलिन्याद्या हुंफडन्ताः पञ्चांगमनवः स्मृताः ।४५ अध्यारूढां मृगेन्द्रं सजलजलधरश्यामलां हस्तपद्मैः शूलं वाणं कृपाणमरिजलजगदाचापपाशान्वहन्तीम् । चन्द्रोत्तंसा त्रिनेत्रां चतसृभिरसिना खेटकान् विभ्रतीभिः कन्याभिः सेव्यमानां प्रतिभटभयदां शूलिनि भावयामि ।४६

२२२ ] [ श्री शारदा तिलक मन्त्रमेनं जपेन्मन्त्री वर्णलक्षं विचक्षणः। सर्पिषान्नेन होमस्तु दशांशमितो भवेत् ।४७ प्रागुक्तं पूजयेत्पीठे वक्ष्यमाणेन वर्त्मना। विधाय पूजामंगानां पूज्याः पत्रेषु शक्तयः ।४८ दुर्गाद्या वरदाविन्ध्यवासिन्यसुरमर्दिनी। युद्धप्रिया पञ्चमी स्याद्देवसिद्धसुपूजिता ।४६ समस्त सुरगणों द्वारा वन्दित शूलिनि देवता बतायी गयी है। दुर्गे हृदय है—वरदे शीर्ष है और विन्ध्यावासिनी उसकी शिखा है-असुरान्ते और फिर मर्दिनि युद्ध पूर्व प्रिये—वर्म है। युद्ध प्रिये त्रासयत् द्वितीय अस्त्र है—देवसिद्ध सुपूजिते रक्ष युग, महायोगेश्वरि क्रम से नन्दिनी है। शूलिनी आदि में और हुँफट् अंत वाले—ये पांच अंग मन्त्र कहे गये हैं। ४३।४४।४५। ध्यान—मृगेन्द्र पर समारूढ़, जल से परिपूर्ण मेघ के समान श्याम वर्ण वाली—कर कमलोंके द्वारा शूल, वाण, कृपाण, जलज, गदा, चाप और पाश को वहन करती हुई, चन्द्र के उत्तंस वाली, तीन नेत्रों से संयुत, असि से युत खेटकों को धारण करती हुई चोर कन्याओं के द्वारा सेवित, प्रतिभटों को भय देने वाली शूलिनि की भावना करता हूँ ।४६। विचक्षण पुरुष को चाहिए कि इस मन्त्र का वर्णलक्ष जप करे अर्थात् मन्त्र में जितने वर्ण होवे उतने ही लाख जप करना चाहिए । उस जप का दशांश सर्पिष के सहित अन्न से हवन करे ।४७। आगे बताये जाने वाले मार्ग से पूर्व कहे हुए पीठ पर यजन करे । अङ्गों की पूजा करके पत्रों में शक्तियों की पूजा करनी चाहिए ।४८। आद्या दुर्गा है वरदा विन्ध्यवासिनी, असुर मर्दिनी, पाँचवी युद्ध प्रिया, देवसिद्ध सुपूजिता ।४६। सप्तमी नन्दिनी प्रोक्ता महायोगेश्वरी परा । दलाग्रेषु तदस्त्राणि शङ्खचक्रमसिं पुनः ।५० गदेषुचापशूलानि पाशं पश्चाद्दिदशाधिपान् । इत्थं जपादिभिः सिद्धः कुर्यात्कर्मनिजेप्सितम् ।५१

दशम पटल ] [ २२३ अष्टोत्तरसहस्रं यस्तिलैस्त्रिमधुराप्लुतैः । नित्यं तज्जुहुयात्तस्य शक्तिः स्यादतिमानुषी ।५२ अष्टोत्तरशता नित्यं सर्पिषा जुहुयान्नरः । वाञ्छितां वत्सरादर्वाक् प्राप्नुयान्महतीं श्रियम् ।५३ दूर्वाहोमो भवेन्नृन्वाञ्छितसिद्धिदः । छुरिकाद्यानि शस्त्राणि जप्तानि मनुनाऽमुना । संपाताज्यविलिप्तानि वितरन्ति जयश्रियम् ।५४ अश्वत्थार्कसमिद्भिर्वा तिलैस्त्रिमधुरोक्षितैः । होमो वशयति क्षिप्रमीप्सितान्मन्त्रिणोनरान् ।५५ उद्यदायुधहस्तां तां देवी कालघनप्रभाम् ध्यात्वाऽऽत्त्मानं जपेन्मन्त्रं स्पृष्ट्वाऽऽर्तं मुञ्चति ग्रहः ।५६ सप्तमी नन्दिनी कही गयी है—दूसरी महायोगेश्वरी है। दलो के अग्र भागों में उनके अस्त्रों का यजन करना चाहिए। शङ्ख, चक्र, असि, गदा, इषुचाप, शूल और पाश का यजन करे। इसके पीछे दिक्पालों का अर्चन करना चाहिए। इस रीति से जप आदि के द्वारा सिद्ध होता है और फिर अपना ईप्सित कर्म करना चाहिए ।५०।५१। जो एक सहस्र आठ बार मधुर से अक्त तिलों के द्वारा नित्य हवन करता है उसकी अतिमानषी शक्ति हो जाती है ।५२। जो मनुष्य अष्टो- त्तर शत घृत से आहुतियाँ देता है वह एक वर्ष से पहिले ही अपनी वाञ्छित महती श्री प्राप्ति किया करता है ।५३। दूर्वा से किया हुआ होम मनुष्यों के लिए सब वाञ्छितों की सिद्धि का प्रदाता होता है। इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित छुरिका आदि शस्त्र सम्पा- ताज्य से विलिप्त किये हुए जय श्री को वितरित किया करते हैं ।५४। पीपल और आक की समिधाओं से अथवा तीनों मधुरों में उक्षित तिलों से किया हुआ होम शीघ्र ही ईक्षित मन्त्रियों को और नरों को अपने वश कर लिया करता है ।५५। उठाये हुए आयुध के हाथ में ग्रहण करती हुई—काले मेघ के तुल्य प्रभा से समन्वित उस देवी का ध्यान

२२४ ] [ श्री शारदा तिलक करके आत्मा का स्पर्श करके मन्त्र का जप करे तो उसको ग्रह छोड़ दिया करता है ।५६ सर्पाखुवृश्चिकादीनां विषमाशु विनाशयेत् । मनुनानेन विध्वन्मन्त्रविद्देवताधिया ॥५७ मन्त्रेणाऽनेन सञ्जप्तान्बाणानादाय साधकः । विमुञ्चेत्प्रतिसेनायां सा द्रुत विद्रुता भवेत् ।५८ शूलपाशधरां देवीं ध्यात्वात्मानमनाकुलः । प्रविशेद्युद्धदेश यो जित्वाऽऽयाति स निर्व्रणः ।५६ जुहुयात्तिलसिद्धार्थलमेकं यथाविधि । नामयुक्तं जपेन्मन्त्रं यस्यासौ मृत्युमेष्यति ।६० गुटिका गोमयोत्पन्ना हुत्वाऽष्टशतसंख्यया । सप्ताहात्कुरुते मन्त्री विद्वेष स्निग्धयोर्मिथः ।६१ गृहीत्वा गोमयं व्योम्नि त्रिसहस्रं जपेत्ततः । गमिष्यतां द्वारदेशे निखातं स्तम्भनं भवेत् ।६२ बहुनोक्तेन किंसर्वं साधयेन्मनुनाऽमुना । उत्तिष्ठ पदमाभाष्य पुरुषि स्यात्पदं ततः ।६३ सर्प, चूहा, विच्छू आदि के विषको शीघ्र ही विनष्ट कर देता है। मन्त्र का ज्ञाता पुरुष इस मन्त्र के द्वारा देवता की बुद्धि से प्रयोग करे तो विषों की शान्ति होती है ।५७। इस मन्त्र के द्वारा भली भाँति जप किये हुए बाणों को साधक लेकर अपने शत्रु की सेना में यदि उनको छोड़े तो वह सेना बहुत शीघ्र ही भाग जाया करती है ।५८। अनाकुल होकर शूल और पाश को धारण करने वाली देवी का आत्मा में ध्यान करके जो कोई भी यदि युद्ध देश में प्रवेश करे तो वह व्रण रहित होता हुआ ही उसको जीत करके आता है ।५६। विधिके अनुसार एक लाख मंत्र का जप करके तिल और सिद्धार्थोंसे होम करे और नाम से युक्त मन्त्र का जप करें जिसका नाम रक्खे वह मृत्युको प्राप्त हो जाता है । गोमय से उत्पन्न गुटिकाओं की एक सौ आठ बार आहुतियाँ देवें तो मन्त्रधारी

दशम पटल ] [ २२५ एक सप्ताह में दो परस्पर में अत्यन्त स्नेह वालेभी हों तो उसमें विद्वेष कर दिया करता है ।६०-६१। व्योम में गोमय को ग्रहण करके फिर तीन सहस्र जप करे और जाने वालों के द्वार देश में खोदकर गाड़ देने तो स्तम्भन हो जाता है ।६२। बहुत इसके विषयों में कहने से क्या लाभ है, साधक इस मंत्र के द्वारा सबका साधन कर लेता है । उत्तिष्ठ, इस पद को कहकर इसके अनन्तर पुरुष-यह पद होना चाहिए ।६३। पितामहः सनेत्रेन्दुः स्वपिषि स्याद्भयं च मे । समुपस्थितः मुच्चार्य यदि शक्यमनन्तरम् ।६४ अशक्यं वा पुनस्तन्मे वदेद्भगवति ततः । शमयाग्निवधूः सप्तत्रिंशद्वर्णात्मकोमनुः ।६५ ऋषिरारण्यकश्छन्दो प्रत्यनुष्टुपुदाहृतम् । देवता वनदुर्गा स्यात्सर्वदुर्गंविमोचनी ।६६ पादाष्टसन्धिषु गु०दलिङ्गाधारोदरेषु च । पार्श्वहृत्स्तनकण्ठेषु पुनवल्लिष्टसन्धिषु ।६७ मुखनासाकपोलाक्षिकर्णभ्रू मध्यमूर्द्धसु । मंत्राक्षराणि विन्यस्यद्देवताभावसिद्धये ।६८ षड्भिश्चतुर्भिरष्टाभिरष्टाभिः षड्भिरिन्द्रयैः । मंत्राणैरङ्गक्लुप्तिः स्याज्जातियुक्तैर्यथाक्रमम् ।६६ सौवर्णाम्बुजमध्यग त्रिनयनां सौदामिनीसन्निभां । चक्रं शंखवराभयानि दधतीमिन्दाः कलां बिभ्रतीम् ।७० ग्रैवेयाङ्गदहारकुण्डलधरामाखण्डलाद्यै स्तुतां । ध्यायेद्विन्ध्यनिवासिनीं शशिमुखीं पार्श्वस्थपञ्चाननाम् ।७१ इकार और विन्दुके सहित ककार-फिर स्वपिषि, यह पद है, फिर में भय समुपस्थित, यदि शक्यु में अथवा आशक्य होवे, इसके उपरान्त भगवति, यहपद कहे इसके आगे 'स्वाहा' कहे । और 'शमय' पद कहे । यह सैंतीस वर्णका मन्त्र होता है।६४-६५। इसकाऋषि आरण्यक है और इसका छन्द अनुष्टुप कहा गया है । इनका देवता वनदुर्गा है जो सभी

२२६ ] [ श्रीशारदा तिलक दुःखों का विनाश करने वाली है ।६६। पादों की अष्ट सन्धियों में, गुदा लिङ्गाधार, उदर में, पार्श्व, हृदय, स्तन, कण्ठ, में पुन वहिनष्ट संधियों में मुख, नासिका, कपोल, आंख, कान भौंहों का मध्य भाग मूर्धा में मन्त्र के अक्षरों का विन्यास करे जो देवता के भाव को सिद्धि के लिये करना चाहिये ।६७-६८। छै, चार, आठ और छै इन्द्रिया मन्त्र के वर्णों से जो जाति युक्त हो क्रमानुसार अंगक्लृप्ति होती है ।६६। ध्यान बतलाया जाता है-सौवर्ण कमल के मध्य में विराजमान, तीन नेत्रों से समन्वित, विद्युल्लता के तुल्य, करकमलों से शंख, चक्र, वरदान और अभयदान को धारण करतो हुई--मस्तक में चन्द्रमा की कला को वहन करने वाली, ग्रैवेय, अंगद, हार, कुण्डलो को धारण करती हुई-इन्द्रादि देवगणों के द्वारा स्तवन की हुई-जिसके समीप में सिंहस्थित है--ऐसी चन्द्रमुखी विन्ध्य वासिनी देवी का ध्यान करना चाहिए ।७०-७१। एव ध्यात्वा जपेल्लक्षाचतुष्क तद्दशांशतः । जुहुयाद्धविषा मत्री शालिभिः सर्पिषा तिलै ।७२ प्रागीरिते जपेत्पीठे देवीमङ्गदिभिः सह । अङ्गपूजा यथापूर्वं दलमूलेष्वमा यजेत् ।७३ आर्या दुर्गा च भद्राख्या भद्रकाली ततोऽम्बिका । क्षेमान्या वेदगर्भाख्या क्षेमङ्कर्य्यष्टशक्तयः ।७४ अस्त्राणि पत्रमध्येषु शंखचक्रासिखेटकान् । बाणकोदण्डशूलानि कपालान्तानि पूजयेत् ।७५ ब्राह्मयाद्याः स्युर्द्दलाग्रेषु लोकपालास्ततः परम् । सिद्धमन्त्रः प्रयोगेषु देवीमित्य विचिन्तयेत् ।७६ कालपावकसन्निभां कलिताद्धेचन्द्रशिरोरुहाम् । भालनेत्रविभूषणां भयदायिसिंह निषेदुषीम् । चक्रशंखकृपाणखेटकचापबाणरोटिकां, शूलवाहिभुजां भजे विजिताखिलासुरसैनिकाम् ।७७

दशम पटल ६ २२७ ऐसा ध्यान करके चार लाख मन्त्र का जप करे । मन्त्रवादी उसका दशांश शाली, घृत और तिलों से ही हवि से हवन करे ।७२। पूर्व से कहे हुये पीठ पर अंग आदि के साथ देवी का यजन करे । पूर्व की ही भाँति अंग पूजा करे और दलों में निम्न वर्णित इनका पूजन करना चाहिये-आर्या, दुर्गा, भद्रा, भद्रकाली, अम्बिका, क्षेमा, वेदगर्भा, क्षेमं- करी—ये आठ शक्तियाँ हैं ।७३-७४। पत्रों के मध्य में शंख, चक्र, असि खेटक, बाण, कोदण्ड, शूल और कपालाम्त अस्त्रों का पूजन करे ।७५। दलों के अग्रभागोंमें ब्रह्माणी आदि का यजन करके इसके पश्चात् लोक- पालों का पूजन करना चाहिये। यह प्रयोगोंमें सिद्ध मन्त्र है। इस रीति से देवी का चिन्तन करे ।७७। ध्यान, कालाग्नि के सदृश, केशों में अर्ध चन्द्र शोभित हैं-भाल में नेत्र के भूषण वाली, भय देने वाले सिंह के ऊपर समारूढ, शंख, चक्र, कृपाण, खेटक, चाप और बाणों को करों में धारण करती हुई-शूल वाली भुजा से संयुत समस्त असुर सैनिकों र्गवजित करने वाली देवी का मैं ध्यान करता हूं ।७७। प्रातः स्नानरतो नित्यमष्टोत्तरसहस्रकम् । जपेत्तस्याशु सिद्ध्यन्ति धनधान्यादिसम्पदः ।७८ अनेनैव विधानेन ग्रहक्षुद्ररिपूञ्जयेत् । नाभिमात्रोदके स्थित्वा देवीमर्कगतां स्मरन् ।७६ जपेदष्टात्तरशतं लभेत महतीं श्रियम् । अयुतं वटवृक्षोत्थैः सश्रृङ्गैरर्चितेऽनले ।८० होमं समिद्धरैः कुर्यान्नाशयत्यापदां कुलम् । घोराभिचारान्भूतादीन् शमयेद्विधिनाऽमुना ।८१ अपामार्गसद्भवैर्वा तिलैर्वा काननोद्भवैः । सर्षपैर्वा कृतोहोमः क्षुद्रापस्मारनाशनः । ८२ अभीष्टसिद्धयै जुहुयादार्कंर्मन्थी समिद्वरैः । सहस्रमर्कवारादिदिवसास्न्देश संयतः ।८३