शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
२२० ] [ श्री शारदा तिलक मरण को प्राप्त कर लेता है। देवी का ध्यान करके क्षुद्रादि—चोर— भूत आदि का विनाश कर दिया करता है ।३४। अब जय दुर्गा का मन्त्र बतलाते हैं प्रणव, दो बार दुर्गे पद, रेफ, अन्त में क्षकार, ईकार के सहित णकार और अन्त में दो ठकार—यह दश अक्षरों वाली जय दुर्गा जान लेनी चाहिए ।३५। तारादिदुर्गे हृदयं दुर्गे शिर उदाहृतम् । दुर्गायै स्याच्छिखा वर्म भूतरक्षिणि कीर्तितम् । तारादिदुर्गे युगलं रक्षिण्यस्त्रं समीरितम् ।३६ कालाभ्र भां कटाक्षं ररिकुलभयदां मौलिबद्धे दुरेखां शङ्खञ्चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपिकरैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम् । सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं ध्यायेद्दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः ।३७ बाणलक्षं जपेन्मन्त्रं घृतेन जुहुयात्ततः । दशांशं संस्कृते वह्नौ ब्राह्मणानपि भोजयेत् ।३८ लष्टाक्षारोपिते पीठे पूजयेत्पर्ववत्सुधीः । मन्त्रं जपन् विशेद्युद्धे शत्रून्हन्याद्विशेषतः ।३६ प्रजपेद्व्यवहारादौ तत्रापि विजयी भवेत् । अर्चयेदस्त्रशस्त्राणि जयार्थी विद्ययाऽनया ।४० ज्वलज्वलपदान्ते स्याच्छूलिनीति पदं वदेत् । दुष्टग्रहं हुमस्त्रान्तो वह्निजायावधिर्मनुः ।४१ भूतेन्द्रियाक्षरैः प्रोक्तो ग्रहक्षुद्रारिनाशकः । ऋषिर्दीर्घतमाः प्रोक्तः ककुप्छन्द उदाहृतम् ।४२ तारादि दुर्गे—यह हृदय है और दुर्गे—यह शिर कहा गया है। दुर्गायै-यह शिखा है—भूत रक्षिणि—यह वर्म कहा गया है ।३६। तारादि दुर्गे युगल और रक्षिणि—यह अस्त्र कहा गया है ।३६। अब ध्यान बताया जाता है—काले मेघ की आभा वाली—अपने कटाक्षों के द्वारा शत्रुओं के समुदाय को भय प्रदान करने वाली—मस्तक में इन्दु रेखा को धारण
दशम पटल ] [ २२१ करती हुई, तीन नेत्रों से युक्त, कर-कमलों के द्वारा शङ्ख, कृपाण, त्रिशिख को धारण करने वाली, सिंह के स्कन्ध पर अधिरूढ़, अपने तेज के द्वारा सम्पूर्ण त्रिभुवन को पूरित करने वाली, देवगणों से परि- वृत, सिद्ध कामों के द्वारा सेवित, जय नाम वाली दुर्गा का ध्यान करे ।३७। पाँच लाख मन्त्र का जप करे फिर घृत से होम करे। हवन संस्कार की हुई अग्नि में दशांश करना चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन करावे ।३८। सुधी पुरुष को चाहिए कि पूर्व की ही भाँति अष्टाक्षरोपित पीठ पर पूजन करे। मन्त्र का जप करते हुए युद्ध में प्रवेश करे तो विशेष रूप से शत्रुओं का हनन किया करता है ।३९। व्यवहार आदि प्रकृष्ट रूप से जप करे तो वहाँ पर भी विजय होता है ! इस विद्या के द्वारा जप का अर्थी अस्त्रों और शस्त्रों का अर्चन करे ।४०। ज्वल-ज्वल पदों के अन्त में शूलिनि—इस पद को कहे। दुष्टग्रह हैं—इस अस्त्र के अन्त वाला अन्त में स्वाहा होता है ।४१। भूतेन्द्रियाक्षरों के द्वारा कहा हुआ मन्त्र ग्रह-क्षुद्र शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसका ऋषि दीर्घतमा कहा गया है और इसका ककुप छन्द कहा गया है ।४२। शूलिनि देवता प्रोक्ता समस्तसुरवन्दिता । दुर्गे हृदवरदे शीर्ष विन्ध्यवासिनि तच्छिखा ।४३ वर्म्माऽसुरान्ते मर्द्दिनी युद्धपूर्वप्रिये पुनः । त्रासयद्वितयञ्चास्त्रं देवसिद्धसुपूजिते ।४४ नन्दिनी स्याद्रक्षयुगं महायोगेश्वरि क्रमात् । शूलिन्याद्या हुंफडन्ताः पञ्चांगमनवः स्मृताः ।४५ अध्यारूढां मृगेन्द्रं सजलजलधरश्यामलां हस्तपद्मैः शूलं वाणं कृपाणमरिजलजगदाचापपाशान्वहन्तीम् । चन्द्रोत्तंसा त्रिनेत्रां चतसृभिरसिना खेटकान् विभ्रतीभिः कन्याभिः सेव्यमानां प्रतिभटभयदां शूलिनि भावयामि ।४६
२२२ ] [ श्री शारदा तिलक मन्त्रमेनं जपेन्मन्त्री वर्णलक्षं विचक्षणः। सर्पिषान्नेन होमस्तु दशांशमितो भवेत् ।४७ प्रागुक्तं पूजयेत्पीठे वक्ष्यमाणेन वर्त्मना। विधाय पूजामंगानां पूज्याः पत्रेषु शक्तयः ।४८ दुर्गाद्या वरदाविन्ध्यवासिन्यसुरमर्दिनी। युद्धप्रिया पञ्चमी स्याद्देवसिद्धसुपूजिता ।४६ समस्त सुरगणों द्वारा वन्दित शूलिनि देवता बतायी गयी है। दुर्गे हृदय है—वरदे शीर्ष है और विन्ध्यावासिनी उसकी शिखा है-असुरान्ते और फिर मर्दिनि युद्ध पूर्व प्रिये—वर्म है। युद्ध प्रिये त्रासयत् द्वितीय अस्त्र है—देवसिद्ध सुपूजिते रक्ष युग, महायोगेश्वरि क्रम से नन्दिनी है। शूलिनी आदि में और हुँफट् अंत वाले—ये पांच अंग मन्त्र कहे गये हैं। ४३।४४।४५। ध्यान—मृगेन्द्र पर समारूढ़, जल से परिपूर्ण मेघ के समान श्याम वर्ण वाली—कर कमलोंके द्वारा शूल, वाण, कृपाण, जलज, गदा, चाप और पाश को वहन करती हुई, चन्द्र के उत्तंस वाली, तीन नेत्रों से संयुत, असि से युत खेटकों को धारण करती हुई चोर कन्याओं के द्वारा सेवित, प्रतिभटों को भय देने वाली शूलिनि की भावना करता हूँ ।४६। विचक्षण पुरुष को चाहिए कि इस मन्त्र का वर्णलक्ष जप करे अर्थात् मन्त्र में जितने वर्ण होवे उतने ही लाख जप करना चाहिए । उस जप का दशांश सर्पिष के सहित अन्न से हवन करे ।४७। आगे बताये जाने वाले मार्ग से पूर्व कहे हुए पीठ पर यजन करे । अङ्गों की पूजा करके पत्रों में शक्तियों की पूजा करनी चाहिए ।४८। आद्या दुर्गा है वरदा विन्ध्यवासिनी, असुर मर्दिनी, पाँचवी युद्ध प्रिया, देवसिद्ध सुपूजिता ।४६। सप्तमी नन्दिनी प्रोक्ता महायोगेश्वरी परा । दलाग्रेषु तदस्त्राणि शङ्खचक्रमसिं पुनः ।५० गदेषुचापशूलानि पाशं पश्चाद्दिदशाधिपान् । इत्थं जपादिभिः सिद्धः कुर्यात्कर्मनिजेप्सितम् ।५१
दशम पटल ] [ २२३ अष्टोत्तरसहस्रं यस्तिलैस्त्रिमधुराप्लुतैः । नित्यं तज्जुहुयात्तस्य शक्तिः स्यादतिमानुषी ।५२ अष्टोत्तरशता नित्यं सर्पिषा जुहुयान्नरः । वाञ्छितां वत्सरादर्वाक् प्राप्नुयान्महतीं श्रियम् ।५३ दूर्वाहोमो भवेन्नृन्वाञ्छितसिद्धिदः । छुरिकाद्यानि शस्त्राणि जप्तानि मनुनाऽमुना । संपाताज्यविलिप्तानि वितरन्ति जयश्रियम् ।५४ अश्वत्थार्कसमिद्भिर्वा तिलैस्त्रिमधुरोक्षितैः । होमो वशयति क्षिप्रमीप्सितान्मन्त्रिणोनरान् ।५५ उद्यदायुधहस्तां तां देवी कालघनप्रभाम् ध्यात्वाऽऽत्त्मानं जपेन्मन्त्रं स्पृष्ट्वाऽऽर्तं मुञ्चति ग्रहः ।५६ सप्तमी नन्दिनी कही गयी है—दूसरी महायोगेश्वरी है। दलो के अग्र भागों में उनके अस्त्रों का यजन करना चाहिए। शङ्ख, चक्र, असि, गदा, इषुचाप, शूल और पाश का यजन करे। इसके पीछे दिक्पालों का अर्चन करना चाहिए। इस रीति से जप आदि के द्वारा सिद्ध होता है और फिर अपना ईप्सित कर्म करना चाहिए ।५०।५१। जो एक सहस्र आठ बार मधुर से अक्त तिलों के द्वारा नित्य हवन करता है उसकी अतिमानषी शक्ति हो जाती है ।५२। जो मनुष्य अष्टो- त्तर शत घृत से आहुतियाँ देता है वह एक वर्ष से पहिले ही अपनी वाञ्छित महती श्री प्राप्ति किया करता है ।५३। दूर्वा से किया हुआ होम मनुष्यों के लिए सब वाञ्छितों की सिद्धि का प्रदाता होता है। इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित छुरिका आदि शस्त्र सम्पा- ताज्य से विलिप्त किये हुए जय श्री को वितरित किया करते हैं ।५४। पीपल और आक की समिधाओं से अथवा तीनों मधुरों में उक्षित तिलों से किया हुआ होम शीघ्र ही ईक्षित मन्त्रियों को और नरों को अपने वश कर लिया करता है ।५५। उठाये हुए आयुध के हाथ में ग्रहण करती हुई—काले मेघ के तुल्य प्रभा से समन्वित उस देवी का ध्यान
२२४ ] [ श्री शारदा तिलक करके आत्मा का स्पर्श करके मन्त्र का जप करे तो उसको ग्रह छोड़ दिया करता है ।५६ सर्पाखुवृश्चिकादीनां विषमाशु विनाशयेत् । मनुनानेन विध्वन्मन्त्रविद्देवताधिया ॥५७ मन्त्रेणाऽनेन सञ्जप्तान्बाणानादाय साधकः । विमुञ्चेत्प्रतिसेनायां सा द्रुत विद्रुता भवेत् ।५८ शूलपाशधरां देवीं ध्यात्वात्मानमनाकुलः । प्रविशेद्युद्धदेश यो जित्वाऽऽयाति स निर्व्रणः ।५६ जुहुयात्तिलसिद्धार्थलमेकं यथाविधि । नामयुक्तं जपेन्मन्त्रं यस्यासौ मृत्युमेष्यति ।६० गुटिका गोमयोत्पन्ना हुत्वाऽष्टशतसंख्यया । सप्ताहात्कुरुते मन्त्री विद्वेष स्निग्धयोर्मिथः ।६१ गृहीत्वा गोमयं व्योम्नि त्रिसहस्रं जपेत्ततः । गमिष्यतां द्वारदेशे निखातं स्तम्भनं भवेत् ।६२ बहुनोक्तेन किंसर्वं साधयेन्मनुनाऽमुना । उत्तिष्ठ पदमाभाष्य पुरुषि स्यात्पदं ततः ।६३ सर्प, चूहा, विच्छू आदि के विषको शीघ्र ही विनष्ट कर देता है। मन्त्र का ज्ञाता पुरुष इस मन्त्र के द्वारा देवता की बुद्धि से प्रयोग करे तो विषों की शान्ति होती है ।५७। इस मन्त्र के द्वारा भली भाँति जप किये हुए बाणों को साधक लेकर अपने शत्रु की सेना में यदि उनको छोड़े तो वह सेना बहुत शीघ्र ही भाग जाया करती है ।५८। अनाकुल होकर शूल और पाश को धारण करने वाली देवी का आत्मा में ध्यान करके जो कोई भी यदि युद्ध देश में प्रवेश करे तो वह व्रण रहित होता हुआ ही उसको जीत करके आता है ।५६। विधिके अनुसार एक लाख मंत्र का जप करके तिल और सिद्धार्थोंसे होम करे और नाम से युक्त मन्त्र का जप करें जिसका नाम रक्खे वह मृत्युको प्राप्त हो जाता है । गोमय से उत्पन्न गुटिकाओं की एक सौ आठ बार आहुतियाँ देवें तो मन्त्रधारी
दशम पटल ] [ २२५ एक सप्ताह में दो परस्पर में अत्यन्त स्नेह वालेभी हों तो उसमें विद्वेष कर दिया करता है ।६०-६१। व्योम में गोमय को ग्रहण करके फिर तीन सहस्र जप करे और जाने वालों के द्वार देश में खोदकर गाड़ देने तो स्तम्भन हो जाता है ।६२। बहुत इसके विषयों में कहने से क्या लाभ है, साधक इस मंत्र के द्वारा सबका साधन कर लेता है । उत्तिष्ठ, इस पद को कहकर इसके अनन्तर पुरुष-यह पद होना चाहिए ।६३। पितामहः सनेत्रेन्दुः स्वपिषि स्याद्भयं च मे । समुपस्थितः मुच्चार्य यदि शक्यमनन्तरम् ।६४ अशक्यं वा पुनस्तन्मे वदेद्भगवति ततः । शमयाग्निवधूः सप्तत्रिंशद्वर्णात्मकोमनुः ।६५ ऋषिरारण्यकश्छन्दो प्रत्यनुष्टुपुदाहृतम् । देवता वनदुर्गा स्यात्सर्वदुर्गंविमोचनी ।६६ पादाष्टसन्धिषु गु०दलिङ्गाधारोदरेषु च । पार्श्वहृत्स्तनकण्ठेषु पुनवल्लिष्टसन्धिषु ।६७ मुखनासाकपोलाक्षिकर्णभ्रू मध्यमूर्द्धसु । मंत्राक्षराणि विन्यस्यद्देवताभावसिद्धये ।६८ षड्भिश्चतुर्भिरष्टाभिरष्टाभिः षड्भिरिन्द्रयैः । मंत्राणैरङ्गक्लुप्तिः स्याज्जातियुक्तैर्यथाक्रमम् ।६६ सौवर्णाम्बुजमध्यग त्रिनयनां सौदामिनीसन्निभां । चक्रं शंखवराभयानि दधतीमिन्दाः कलां बिभ्रतीम् ।७० ग्रैवेयाङ्गदहारकुण्डलधरामाखण्डलाद्यै स्तुतां । ध्यायेद्विन्ध्यनिवासिनीं शशिमुखीं पार्श्वस्थपञ्चाननाम् ।७१ इकार और विन्दुके सहित ककार-फिर स्वपिषि, यह पद है, फिर में भय समुपस्थित, यदि शक्यु में अथवा आशक्य होवे, इसके उपरान्त भगवति, यहपद कहे इसके आगे 'स्वाहा' कहे । और 'शमय' पद कहे । यह सैंतीस वर्णका मन्त्र होता है।६४-६५। इसकाऋषि आरण्यक है और इसका छन्द अनुष्टुप कहा गया है । इनका देवता वनदुर्गा है जो सभी
२२६ ] [ श्रीशारदा तिलक दुःखों का विनाश करने वाली है ।६६। पादों की अष्ट सन्धियों में, गुदा लिङ्गाधार, उदर में, पार्श्व, हृदय, स्तन, कण्ठ, में पुन वहिनष्ट संधियों में मुख, नासिका, कपोल, आंख, कान भौंहों का मध्य भाग मूर्धा में मन्त्र के अक्षरों का विन्यास करे जो देवता के भाव को सिद्धि के लिये करना चाहिये ।६७-६८। छै, चार, आठ और छै इन्द्रिया मन्त्र के वर्णों से जो जाति युक्त हो क्रमानुसार अंगक्लृप्ति होती है ।६६। ध्यान बतलाया जाता है-सौवर्ण कमल के मध्य में विराजमान, तीन नेत्रों से समन्वित, विद्युल्लता के तुल्य, करकमलों से शंख, चक्र, वरदान और अभयदान को धारण करतो हुई--मस्तक में चन्द्रमा की कला को वहन करने वाली, ग्रैवेय, अंगद, हार, कुण्डलो को धारण करती हुई-इन्द्रादि देवगणों के द्वारा स्तवन की हुई-जिसके समीप में सिंहस्थित है--ऐसी चन्द्रमुखी विन्ध्य वासिनी देवी का ध्यान करना चाहिए ।७०-७१। एव ध्यात्वा जपेल्लक्षाचतुष्क तद्दशांशतः । जुहुयाद्धविषा मत्री शालिभिः सर्पिषा तिलै ।७२ प्रागीरिते जपेत्पीठे देवीमङ्गदिभिः सह । अङ्गपूजा यथापूर्वं दलमूलेष्वमा यजेत् ।७३ आर्या दुर्गा च भद्राख्या भद्रकाली ततोऽम्बिका । क्षेमान्या वेदगर्भाख्या क्षेमङ्कर्य्यष्टशक्तयः ।७४ अस्त्राणि पत्रमध्येषु शंखचक्रासिखेटकान् । बाणकोदण्डशूलानि कपालान्तानि पूजयेत् ।७५ ब्राह्मयाद्याः स्युर्द्दलाग्रेषु लोकपालास्ततः परम् । सिद्धमन्त्रः प्रयोगेषु देवीमित्य विचिन्तयेत् ।७६ कालपावकसन्निभां कलिताद्धेचन्द्रशिरोरुहाम् । भालनेत्रविभूषणां भयदायिसिंह निषेदुषीम् । चक्रशंखकृपाणखेटकचापबाणरोटिकां, शूलवाहिभुजां भजे विजिताखिलासुरसैनिकाम् ।७७
दशम पटल ६ २२७ ऐसा ध्यान करके चार लाख मन्त्र का जप करे । मन्त्रवादी उसका दशांश शाली, घृत और तिलों से ही हवि से हवन करे ।७२। पूर्व से कहे हुये पीठ पर अंग आदि के साथ देवी का यजन करे । पूर्व की ही भाँति अंग पूजा करे और दलों में निम्न वर्णित इनका पूजन करना चाहिये-आर्या, दुर्गा, भद्रा, भद्रकाली, अम्बिका, क्षेमा, वेदगर्भा, क्षेमं- करी—ये आठ शक्तियाँ हैं ।७३-७४। पत्रों के मध्य में शंख, चक्र, असि खेटक, बाण, कोदण्ड, शूल और कपालाम्त अस्त्रों का पूजन करे ।७५। दलों के अग्रभागोंमें ब्रह्माणी आदि का यजन करके इसके पश्चात् लोक- पालों का पूजन करना चाहिये। यह प्रयोगोंमें सिद्ध मन्त्र है। इस रीति से देवी का चिन्तन करे ।७७। ध्यान, कालाग्नि के सदृश, केशों में अर्ध चन्द्र शोभित हैं-भाल में नेत्र के भूषण वाली, भय देने वाले सिंह के ऊपर समारूढ, शंख, चक्र, कृपाण, खेटक, चाप और बाणों को करों में धारण करती हुई-शूल वाली भुजा से संयुत समस्त असुर सैनिकों र्गवजित करने वाली देवी का मैं ध्यान करता हूं ।७७। प्रातः स्नानरतो नित्यमष्टोत्तरसहस्रकम् । जपेत्तस्याशु सिद्ध्यन्ति धनधान्यादिसम्पदः ।७८ अनेनैव विधानेन ग्रहक्षुद्ररिपूञ्जयेत् । नाभिमात्रोदके स्थित्वा देवीमर्कगतां स्मरन् ।७६ जपेदष्टात्तरशतं लभेत महतीं श्रियम् । अयुतं वटवृक्षोत्थैः सश्रृङ्गैरर्चितेऽनले ।८० होमं समिद्धरैः कुर्यान्नाशयत्यापदां कुलम् । घोराभिचारान्भूतादीन् शमयेद्विधिनाऽमुना ।८१ अपामार्गसद्भवैर्वा तिलैर्वा काननोद्भवैः । सर्षपैर्वा कृतोहोमः क्षुद्रापस्मारनाशनः । ८२ अभीष्टसिद्धयै जुहुयादार्कंर्मन्थी समिद्वरैः । सहस्रमर्कवारादिदिवसास्न्देश संयतः ।८३
२२८ ] [ श्रीशारदा तिलक सारान् शुद्धान्समादाय शकलान्मन्तुनाऽमुना । जुहुयादेधिने वह्नौ सप्तरात्रमतन्द्रितः ।८४ प्रातःकाल में स्नान में रत होकर नित्य ही एक सहस्र आठ बार मन्त्र जप करे तो शीघ्र ही धन-धान्य आदि सम्पदायें सिद्ध हो जाती हैं ।७८। इसी विधान के द्वारा ग्रह और क्षुद्र रिपुओं पर विजय प्राप्त किया करता है। नाभि मात्र जलमें स्थित होकर सूर्य मण्डलमें विराज- मान देवी का स्मरण करे ।७६। इस प्रकार से एक सौ आठ बार जप करे तो यह जापक महती श्री को प्राप्त करता है । फिर समेधित अग्नि में मृङ्ग सहित वट वृक्ष की समिधाओं से दश हज़ार आहुतियाँ देवे तो आपदाओं के समुदाय का विनाश कर दिया करता है। इस विधि से परम घोर भूतादि अभिचारों का शमन कर दिया करता है । अथवा अपामार्ग की समिधाओं से या वन में समुत्पन्न हुए तिलों से अथवा सघर्षों के द्वारा होम करने वाला क्षुद्र अपस्मार का नाश करने वाला होता है ।८०-८२। मन्त्रधारी पुरुष को अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए आक की श्रेष्ठ समिधाओं से होम करना चाहिए । अर्क वार से आदि लेकर दश दिन तक परम संयत होकर होम करे ।८३। इस मन्त्र से शुद्ध सारों के खण्डो का समादन करे और तन्द्रा रहित होकर सात रात्रि पर्यन्त प्रज्वलित अग्नि में हवन करे ।८४। साधयेदखिलं स्वभीष्टं मन्त्रवित्तमः । कुमुदैर्वशयेद्विप्रान्नृपतीन्पद्महोमतः ।८५ तत्पत्नीरुत्पलै फुल्लैर्वैश्यान्कह्लारहोमतः । शूद्रान् लवणहोमेन जातीपुष्पैः समान (१) बुधः (पुनः) ।८६ व्रीहिभिर्जुहुयान्नित्यं वत्सराद्व्रीहिमान्भवेत् । दूर्वाहोमेन दीर्घायुर्मधुना रत्नवान्भवेत् ।८७ अन्नैरन्नसमृद्धिः स्यादाज्येन लभते धनम् । गोदुग्धेन गवां वृद्धिमाप्नुयान्नात्र संशयः ।८८
दशम पटल ] [ २२६ ज्वरे ग्रहे गरे सर्पे तर्जन्या संस्पृशञ्जपेत् । स्मृत्वा शूलकरां देवीं तत्क्षणादेव तान्हरेत् ।८६ गर्भितं साध्यनामानैः पत्रे मनुमिमं लिखेत् । कुलालमृत्कृतायां तत्प्रतिमायाँ हृदि न्यसेत् ।६० कृतप्राणप्रतिष्ठान्तां पूजितां कुसुमादिभिः । निधायाग्रे जपुम्मन्त्रष्टोत्तरसहस्रकम् ।६१ इसका प्रकार यह होता है कि वह मन्त्र का ज्ञाता पुरुष निरन्तर अपने सम्पूर्ण अभीष्ट को साधित कर लिया करता है। कुमुदों के होम से विप्रों को और पद्मों के हवन से नृपतियों को वश में कर लिया करता है ।८५। बुध पुरुष विकसित उत्पलों के होम से उनकी पत्नियों को और कल्हार के पुष्पों से वैश्यों को तथा लवण के होम स शूद्रों को और जाती पुष्पों के होम से समनरों को वश में कर लेता है ।८६। व्रीहियों के द्वारा नित्य हवन करे तो एक वर्ष में वह व्रीहि वाला हो जाता है। दूर्वा के होम से दीर्घ आयु वाला और मधु के होम से होम करने वाला रत्नों वाला हो जाया करता है ।८७। अन्न के होम से अन्न की समृद्धि होती है तथा आज्य के होम से धन का लाभ किया करता है । गाय के दूध से होम करने से गोओं भी वृद्धि हुआ करती है इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।८८। ज्वर में, ग्रह, में विष में और सर्प दंशन में अपनी तर्जनी के द्वारा स्पर्श करते हुए जप करना चाहिए उस समय में शूल कर में धारण करने वाली देवी का स्मरण करके ही स्पर्श करे तो उसी क्षण उन सबका हरण कर दिया करता है ।८६। साध्य के साथ के वर्णों से गर्भित पत्र में इस मन्त्र को लिखे । कुम्हार की मिट्टी से निर्मित की हुई प्रतिमा के हृदय में न्यास करे । उसकी प्राण प्रतिष्ठा करके पुष्प आदि के द्वारा पूजित करे । उसको अपने आगे रखकर के एक सहस्र आठ बार मन्त्र का जप करे ।६०-६१। सध्यास पक्षमात्रेण वशमायाति वाँछितम् । अभ्यर्च्य देवीमनले तीक्ष्णतैलेन मंत्रवित् ।६२
२३० ] [ श्रीशारदा तिलक हुत्वायुतं निधायाग्रे तीक्ष्णांस्त्रिंशच्छरान्पुनः । तेषु संपातयेद्भूयः स्पृष्ट्वा तन्नियुतं जपेत् । ६३ वेधयेत्परसेनायां क्षणान्नष्टा दिशो दश । प्राप्नुयान्नष्टसंज्ञा सा पलायनपरायणा ।६४ जपित्वा सितगुञ्जानां कुडवं कुलिकोदये । विकिरेच्छत्रु सेनायां गूढः तन्नापणादिषु ।६५ ज्वरमारी महारोगैः पीडिता सैन्यनायकैः । परस्परविरोधेन नश्येद्गच्छेन्म्रियेत सा । ६६ सेनासंस्तम्भने मंत्री कारस्करसमुद्भवैः । पुष्पैः सहस्रं जुहुयात्तत्पत्रै स्ता निवर्तयेत् । ६७ अंगारवारे कुलिके जप्त्वा भस्म चितोद्भवम् । विनिः क्षिपेद्रिमूर्ध्नि विद्विष्टो देशतो ब्रजेत् । ६८ सन्ध्या में जप करना चाहिये तो एक पक्ष भर में वाँक्षित वश में आ जाया करता है । मन्त्र का ज्ञाता अग्नि में देवी का अर्चन करके तीक्ष्ण तैल के द्वारा दश हजार आहुतियाँ देकर उसे अपने आगे निधा- पित करे । तीक्ष्ण तीव्र शरों को उनमें सम्मानित करे, फिर उनका स्पर्श करके नियुत जप करे । ६२-६३। उनसे शत्रु की सेना में वेध कर तो क्षण भर में दशों दिशाओं में सेना नष्ट हो जाती है । वह सेना नष्ट संज्ञा को प्राप्त होती है और पलायन करने में तत्पर हो जाया करती कुलिकोदय के समय में चार प्रस्थ सफेद गुंजाओं को जप करके शत्रु की सेना में विकीर्ण कर देवे और आप आपण आदि में गूढ होकर रहे ।६५। ज्वर भारी महारोगों से पीड़ित सेना नायक आपस में ही विरोध के द्वारा नष्ट हो जाते हैं गमन कर जाते हैं और मर ज ते हैं। ६६। सेना के संस्तम्भन करने से मन्त्रधारी कारस्कर से समुत्पन्न पुष्पों से एक सहस्र आहुतियां देवे और उनके पत्रे से होम करे तो सेना को निर्वात्तित कर दिया करता है। ६७। अंगार वार में कुलिक वेला में जप करके
· दशम पटल ] [ २३१ चिता की अद्भुत भस्म को शत्रु के मस्तक में निक्षिप्त कर देवे तो विद्विष्ट देश से गमन कर जाया करता है ।६८। मरुन्निपातितैः पत्रैः कारस्करसमुद्भवैः । तस्य पादरजोयुक्तैर्होमादुच्चाटयेदरीन् ।६६ कारस्करमयीं कृत्वा प्रतिमां च सुशोभनाम् । जप्तां प्रतिष्ठितप्राणां छेदयेदंगशः पुनः ।१०० काकोलूकवसायुक्तष्टोत्तरसहस्रकम् कृष्णपक्षचतुर्दश्यां श्मशाने हव्यवाहने ।१०१ जुहुयान्म्रियतेऽरातिरेवमेव दिनत्रयात् । उन्मत्तसमिधां होमान्नूताः स्युः शत्रवः क्षणात् ।१०२ उलूककाकयोः पत्रैः स्ववसारक्तसंयतैः । जुहुयान्निशि कांतारे शत्रुः कालातिथिर्भवेत् ।१०३ शत्रोः प्रतिकृति मंत्री प्रतिष्ठितसमीरणाम् । शोषणेन विलिप्तांगीमत्युष्णां निक्षिपेज्जले ।१०४ ज्वराक्रांतो भवेच्छीघ्रन्दग्धसेकाच्छम नयेत् । तर्जनीं त्रिशिख दोर्भ्याधारयन्तीं भयङ्कराम् ।१०५ रक्तां ध्यात्वा रवेर्बिम्बे प्रजपेद्यु तं मनुम् । मारये दचिरादेव रिपुन्बन्धुसमन्वितान् ।१०६ खड्गखेटकसन्नद्धां संक्रुद्धां भानुमण्डले । ध्यात्वा मंत्र जपेन्मंत्रो नाशये द चिरादरीन् ।१०७ वायु के द्वारा गिराये हुये कारस्कर से समुत्पन्न पत्रों से जो उसके चरणों की रज से युक्त होंवे, इससे होम करने से शत्रुओं का उच्चाटन करे ।६६। कारस्कर से परिपूर्ण सुशोभन प्रतिमा का निर्माण करके प्राण प्रतिष्ठा करके अभिमन्त्रित करे । फिर अंकुश से छेदन करे और काक तथा उल्लू की वसा से युक्त करके एक सहस्र आठ वार कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में अग्नि में श्मशान में हवन करे इससे तीन दिन में ही शत्रु की मृत्यु हो जाती है । उन्मत्त की समिधाओं के होम से एक ही क्षणमें
२३२ } [ श्रीशारदा तिलक शत्रुओं की मृत्यु हो जाती है । १००-१०२। उल्लू और कौओं के पंखों से जो अपनी उनकी ही बसा और रक्त से संयुत होवे वन में रात्रि में होम करे तो शत्रु काल का अतिथि हो जाता है । १०३। मंत्रधारी शत्रु की प्रतिकृत करके उसकी प्राण प्रतिष्ठा करे फिर उसे शोषण से विलिप्त अङ्गों वाली करे । फिर अत्यन्त उष्ण जल में निक्षिप्त कर देवे ।१०४। इसका यह प्रभाव है कि वह शीघ्र ही ज्वराक्रान्त हो जाता है । दुग्ध के सेक से समन करे । दोनों बाहुओं से तर्जनी और त्रि- शिख का वहन करने वाली-भयंकर रक्ता का सूर्य के बिम्ब में ध्यान करे और दश हजार मन्त्र का जप करे । इसका यह प्रभाव है कि थोड़े ही समय में बन्धुओं से समन्वित शत्रुओंका मरण कर देता है ।१०५-१०६। खङ्ग और खेटक से सन्नट-बाहु और बहुत अधिक क्रुद्ध देवी का सूर्य मण्डल में ध्यान करके मन्त्रधारी जप करे तो थोड़े ही समय में शत्रुओं का विनाश कर दिया करता है ।१०७। चापबाणधरां भीमां सिंहस्थां ज्वलनोपमाम् । सृजन्तीं बाणनिवहान्धावन्ती ताहशं रिपुम् ।१०८ ध्यात्वा जपेन्मनुमिममयुतं तोयमध्यगः । रिपुं च परसेनां च द्रुतमुच्चाटयेद्ध्रुवम् ।१०६ आनित्यकृमसमिद्धोमान्मुच्यते रोगशोकतः । पुष्पैस्तदीयैर्वशयेन्मधुराक्तैर्मतङ्गजन् । ११० रक्षायै पञ्चगव्येन लिम्पेज्जप्तेन दन्तिनः । गव्याज्यतिलसिद्धार्थैरानित्यकसमिद्धरैः । १११ दुग्धान्नापञ्चगव्याभ्यां तण्डुलेन घृतेन च । एतैः पृथक् पृथक् द्रव्यैरष्टोत्तरसहस्रकम् । ११२
दशम पटल ] [ २३३ चाप-वण को धारण करने वाली—भीम—सिंह पर समारूढ़— अग्नि के तुल्य जाज्वल्यमान-बाणों के समुदाय का सृजन करती हुई और उसी भाँति के शत्रु की ओर धावन करती हुई देवी का ध्यान करके जल के मध्य में स्थित होकर इस मन्त्र का दश हजार जप करना चाहिए। इससे जापक व्यक्ति शत्रु को और पराई सेना को शीघ्र निश्चित रूप से उच्चाटन कर देता है ।१०८-१०६। आग्नित्यक की समिधाओं के होम से रोग और शोक से मुक्त हो जाता है। मधुर से अक्त उसके पुष्पों से होम करने पर मतंगजों को वश में कर लेता है। ।११०। रक्षा के लिये उप किये हुये पञ्चगव्य से रक्षा के लिये हाथियों का लिम्पन करे। गायका घृत तिल-सिद्धार्थ-आग्नित्यक की श्रेष्ठ समि- धाओं से दुग्धान्न, पंचगव्यों से—तण्डुल से और घृत से—इन द्रव्यों से अलग-अलग एक सहस्र आठ बार होम करना चाहिए ।१११-११२। जु याद्दिनशोविप्रान्भोजयेन्मधुरादिभिः । गुरवे दक्षिणां दद्याद्वस्त्राभरणसंयुताम् ।११३ मातङ्गाश्च तुरङ्गाश्च वर्द्धन्ते विधिनाऽमुना । सर्वव्याधिविनिर्मुक्ताः क्षुद्रपीडाविवर्जिताः ।११४ कारयेद्वग्नवृक्षेण शिल्पिनाऽऽयुधपञ्चकम् । शंखखड्गगदाङ्गाधि शार्ङ्गं कौमोदकीं क्रमात् ।११५ पंचगव्येषु निःक्षिप्य तानि स्पृष्ट्वा मनुं जपेत् । सम्यक् पंचसहस्राणि तेषु संपातयेत्पुनः ।११६ तावदब्जेन जुहुयान्न्यस्वैः स्वैः पूजयेत्क्रमात् । उद्धृत्य पञ्चगव्येभ्यः पूर्ववत्प्रजपेन्मनुम् ।११७ अवटान्पञ्च निखनेद्दिक्षु मध्यादिषु क्रमात् । अवटेष्वेषु पूर्णेषु पञ्चगव्येन साधकः ।११८ आयुधानि प्रजप्तानि पञ्च घोषपुरःसरम् । विन्यसेत्तेषु मध्यादिपूजां कुर्याद्यथापुरा ११६ और विप्रों को मधुर आदि के द्वारा भोजन करावे। अपने श्रो
गुरुदेव के लिये वस्त्रों और आभरणों से समन्वित दक्षिणा देवे ॥११३॥ इस मन्त्र के द्वारा हाथी और घोड़े बढ़ जाते हैं। वे सब व्याधियों से रहित होते हैं और क्षुद्र पीड़ा से वर्जित हुआ करते हैं ॥११४। ब्रह्म वृक्ष से किसी शिल्पी के द्वारा पाँच आयुधों का निर्माण करावे । क्रम से शंख, खंग, रथांग (चक्र), शांगं और कोमोदकी—ये पाँच आयुध हैं ॥११५॥ पंचगव्य में निक्षेप करके उनका स्पर्श करके मन्त्र का जप करना चाहिये । भली-भाँति पांच सहस्र जप करे और फिर उनमें सम्पातन करे ।११६। तब तक घृत से होम करे और क्रम से अपने २ मन्त्रों के द्वारा पूजन करे । पंचागव्य से निकालकर पूर्व की ही तरह मन्त्र का जप करना चाहिये ।११७। मध्यादि दिशाओं में क्रम से पाँच अवटों को खनन करे । साधक के द्वारा ये सब अवट पंचागव्य से परिपूर्ण होने पर ध्वनि के साथ पाँच आयुधों को मन्त्र के अभिमन्त्रित करें और उनको उन अवटों में डाल देवे अर्थात् विन्यस्त करे । और पहिले के समान मध्यहृत की पूजा करे ।११८-११६। बालुकाभिः समापूर्य मृद्भिः कुर्यात्समस्थलम् । बलिं च विकिरेत्तत्र तेषां मंत्रैर्यथाक्रमम् ॥१२० दिक् पतिभ्या बलि दत्वा ब्राह्मणाम्भोजयेत्ततः । दीनान्धकृपणादींश्च तोषयेद्भोजनादिभिः ।१२१ गुरुवे दक्षिणां दद्यादात्मवित्तानुसारतः । यत्रैवं विहिता रक्षा देशे वा नगरे पुरे ॥१२२ ग्रामे गेहेऽथवा तत्र वर्द्धन्ते सम्पदः सदा । अश्मपातादयो दोषा भूतप्रेतादिसंयुताः ।१२३ अभिचारकृताः कृत्यारिपुचौराद्युपद्रवाः । नेक्षन्ते तां दिशं भीतास्तर्जिता देवताज्ञया ।१२४ बालुका प्रभृति से समापूरित करके सिद्धि से उनको समस्थल कर देवे । उनके मन्त्रों के द्वारा क्रमानुसार वहाँ पर वलि का विकिरण करना चाहिये । दिक्पालों को बलि देकर फिर ब्राह्मणों को भोजन
दशम पटल ] [ २३५ करावे। और भोजन आदि के द्वारा दीन अन्ध और कृपण आदि का तोष करना चाहिये ।१२०-१२१। अपने वित्त शक्ति अनुसार गुरुदेव के लिये दक्षिणा देवे। जहां पर इस प्रकार से रक्षा विहित होवे - देश में नगर में, पुर में, ग्राम में अथवा गृह में रक्षा की जावे वहां पर सदा ही सम्पदायें वृद्धि को प्राप्त हुआ करती है। अश्मपात आदि दोष--भूत- प्रेत से संयुत--अभिचार से किये हुये तथा कृत्या, रिपु और चोरों आदि के उपद्रव ये सब देवता की आज्ञा से तर्जित हुये उस दिशा की ओर देखते नही हैं ।१२२-१२४। पद्म भानुदलान्वितं प्रंविलिखेत्तत्कर्णिकायां पुनः स्तारं शक्तिबीजसाध्यसहितं तत्केसरेषु क्रमात् । मर्द्दिन्या मनुसंभवान् युगलशोवर्णान्पुनः पत्रगा । न्मंत्रार्णा गुणशो विभाग विलेखेदन्त्ये दले ।१२५ मातृकावर्णसंवीत भूपुरद्वयमध्यगम् । यंत्र वि ध्यनिवासिन्याः प्रोक्तं सर्वं समृद्धिदम् ।१२६ रक्षाकरं विवेषेण क्षुद्रभूतादिनाशकम् । राज्यदं भ्रष्टराज्यानां वश्यदं वस्यमिच्छताम् । १२७ सुतार्थिनां सुतद रोगिणां रोगशान्तिदम् । बहुनां किमिहोक्तेन यंतं तत्कामदीमणिः ।१२८ बारह दलों से समन्वित एक पद्म लिखकर उसकी कर्णिका में माया बीज में गन्तुक सनिसर्गं दोगं बीज दल रखकर उसमें साध्य के सहित प्रणव लिखे। महिषमर्दिनी के उसके केसरों में युगल शवर्णों को फिर लिखे। इस तरह से मूल मन्त्र के वर्णों की तीन आवृत्ति करे। अन्तिम एक अक्षर को अन्तिम दल में लिखे मातृका वर्णों से भूपुर मध्य में रहने वाले से संवीत करे। तह विन्ध्य निवासिनी का मन्त्र होता है जो सब समृद्धियों का प्रदाता है ।१२५-१२६। यह विशेष रूप से रक्षा के करने वाला है और क्षुद्र भूतादि का विनाशक होता है। यह भ्रष्ट राज्य
२३६ ] [ श्रीशारदा तिलक वालों को राज्य के देने वाला है और जो वश्य के इच्छुक हैं उनको वश्य करने वाला है ।१२७। सुत के चाहने वालों सुतप्रदाता होता है और रोगियों के रोग की शान्ति का देने वाला है। इसके विषय में बहुत कथन करने से लाभ है यही कहा जाता है कि यह मन्त्र कामना के देने वाली मणि ही है ।१२८।
एकादश पटल ॥ गणपति प्रकरण ॥ अथ वक्ष्ये गणपतेर्मन्त्रान्सर्वार्थसिद्धिदान् । याल्लँब्ध्वा मानवा नित्यं साधयन्ति मनोरथान् ।१ पंचान्तकः शशिधरं बीजं गणेपतेर्विदुः । गणकः स्यान्मुनिश्चन्दोनिचि॒त् विघ्नोऽस्य देवता । षड् दीर्घभाजा बीजेन कुर्यादङ्गाक्रियां मनोः ।२ सिन्दूराभं त्रिनेत्रं पृथुतरजठरं हस्तवद्भिर्द धानम् । दन्तं पाशाङ् कुशेट्टान्यरुकरविलसद्बीजपूराभिरामम् ।३ बालेन्दुद्योतिमौलिं करिपति-दनं दानपूरार्द्र गण्डं । भोगीन्दावद्धभूषं भजत गणपति रक्तावस्त्राङ्गरागम् ॥४ वेदलक्षं जपेन्मत्रं दश श जुहुयात्ततः । मोदकैः पृथुकैर्लाजैः जक्तुभिश्चेक्ष पर्वभिः ।५ नारिकेरैस्तिलैः शुद्धैः सुपक्कैः कदलीफलैः । अष्टद्रव्याणि विघ्नस्व कथित्रानि मनीषिभिः ।६ तीव्रादिशक्तिभिर्युक्ते पीठे विघ्नेश्वर यजेत् । { तीव्राख्या ज्वलिनी नन्दा भोगदा कामरूपिणी ।७ } इसके अनन्तर सब अर्थों की सिद्धियोंके देने वाले गणपति के मन्त्रों
एकादश पटल ] [ २३७ को बतलाया जायगा जिनको प्राप्त करके मानव नित्य मनोरथों का साधन किया करते हैं ।१। पंचात्मक, गकार, जो शशिवर अर्थात्-विन्दु युक्त हो वही गणपति का बीज होता है, उसका मुनि गणक है-छन्द निविद् है और इसका विघ्न देवता होता है। यह दीर्घ भाक् बीज से मन्त्र की अङ्ग क्रिया करनी चाहिए। अब ध्यान बतलाते हैं-गणपति सिन्दूर की आभा से युक्त है-तीन नेत्रों वाले हैं-इनका उदर बहुत बड़ा है —यह हस्त कमलों में दन्त, पाश, अंकुश और वरदानको धारण करने वाले हैं-उरुकर में बीजपुर से सुन्दर शोभित है, भालचन्द्र, से मस्तक द्युतिमान् है-गज के समान मुख से संयुत है तथा दान से पूर्ण और आर्द्र गण्ड स्थल वाले हैं-मोतियों से आबद्ध भूषा वाले हैं ऐसे रक्त वस्त्राँग राग वाले गणपति का भजन करो ।२-३-४। इस मन्त्र का चार लाख जप करे और उसका दृशांश मोदक-पृथुक-लाजासक्तु और ईख के पर्वों से तथा नारियल शुद्ध तिल और पके कदली फलों से हवन करे । ये आठ द्रव्य ही मनीषियों ने विघ्नेश्वर के कहे हैं ।५। तीव्र शक्तियों से युक्त पीठ पर विघ्नेश्वर का यजन करना चाहिए। शक्तियों के नामों का परिगणन करके उन्हें बतलाया जाता है-तीव्रज्वालिनी, नन्दा, भोगदा, कामरूपिणी ।७। उग्रा तेजोवती सत्या नवमी विघ्ननाशिनी । सर्वादिशक्तिकमलासनाय हृदयावधिः ।८ पीठमन्त्रोऽयनेतेन प्रदद्यादासनं विभोः । मूलेन मूर्तिं संकल्प्य तस्यां विघ्नेश्वरं यजेत् ।६। कर्णिकायां चतुर्दिक्षु प्रथमं पूजयेदिमान् । गणाधिपं गणेशानं तृतीयं गणनायकम् ।१० गणक्रीड पीमगौररक्तनीलरुचः क्रमात् । सर्वांन्नागेन्द्रभूषाढ्यान्भक्ष्यलक्षितपुष्करान् ।११ यथापूर्वं ततोभ्यर्चेत्केसरेष्वङ्गदेवताः । पत्रमध्येपु विधिवद्वक्रतुण्डादिकान्यजेत् ।१२
२३८ ] [ श्रीशारदा तिलक वक्रतुण्डमेकदंष्ट्र महोदरगजाननौ । लम्बोदराख्यं विकटं विघ्नराजमनंतरम् ।१३ धूम्रवर्णं दलाग्रेष ब्राह्मयाद्याः पूजयेत्ततः । लोकपालास्तदस्त्राणि देवमित्थं समर्चयेत् ।१४ उग्रा, तेजावती, संस्था, विघ्न नाशिनी, सर्वाद्दिशक्ति कमलासन के लिये हृदयावधि यह पीठ मन्त्र है । इससे विभु को आसन देना चाहिये । मूलमन्त्र से मूर्ति की भली-भाँति कल्पना करके उसमें भग- वान् विघ्नेश्वर का यजन करे ।८-६। कणिका में चारों दिशाओं में सर्व प्रथम इनका पूजन करना चाहिये । गणाधिक, गणेशान, तुरीय, गण- नायक, गमक्क्रीड़, इनको क्रम से पीत, गो रक्त और नील रुचि वालों का जो सभी नागेन्द्रोंके भूषणों से युक्त तथा भक्ष्य लक्षित पुष्करो वालों का पूर्व की ही भाँति केसरों में अंग देवताओं का अर्चन करे । पत्रों के मध्य में विधि के सहित वक्र तुन्ड आदि का अर्चन करना चाहिये १०-१२। वक्र तुण्ड, एकदृष्ट, महोदर, गजानन, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज और धूम्रवर्ण का यजन करे । दलों के अग्रभागों में फिर ब्राह्मणी आदि का पूजन करना चाहिये । फिर लोक पालों का तथा उनके अस्त्रों का यजन करके इसी रीति से देव का अभ्यर्चम करे । १३-१४। सिद्धमंत्रः प्रकुर्वीत प्रयोगान्कल्पचोदितान् । तर्पयेत्सलिलैः शुद्धैर्दिनशो गणनायकम् ।१५ चतुश्चत्वारिशदाद्यं चतुः शतममन्द्रितः । प्राप्नुयान् मण्डलादर्वागभीष्टमधिकं नरः ।१६ नारिकेलैः कृतो होमश्चतुर्थ्यां श्रीप्रदो भवेत् । शुक्लपक्षप्रतिपदभारभ्यदिनशः सुधीः ।१७ चतुर्थ्यन्तं नारिकेलसक्तुलाजातिलैः क्रमात् । चतुः शतः प्रजुहुयाद्वश्याः स्युः सर्वजन्तवः ।१८ सतिलैस्तेण्डुलैर्होमो लक्ष्मीवश्यप्रदो भवेत् ।
एकादश पटल ] [ २३६ लजैस्त्रिमधुरोपेतैर्होमः कन्या प्रयच्छति ।१६ अनेन विधिना कन्या वरमाप्नोति वाँछितम्। आज्यःक्तहविषा होमः साधयेदीस्पितं नृणाम् ।२० दध्ना विलोलि (१) तैर्लोणैर्होमो निशि चतुदिनम्। संवादं कुरुते तद्वश्यं वितनुते सदा ।२१ यह सिद्ध मन्त्र है फिर कथ्य प्रेरित प्रयोगों को करे। दिनो दिन शुद्ध जलो के द्वारा गणनायक तर्पण का करना चाहिये । अतन्द्रित रह- कर चारसौ चोवालीस दिन करे तो मण्डल के पूर्व ही मनुष्य अधिक अभीष्ट की प्राप्ति किया करता है ।१५-१६। नारियलो के द्वारा होम किये जाने वाला पुरुष जोकि चतुर्थी में करे तो यह श्री का प्रदाता होता है। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ करके दिन में सुधी चतुर्थी के अन्त तक नारियल, सक्तु, लाजा ओर तिलों से क्रमश- चारसौ आहुतियां देवे तो सभी जन्तुगण वंश्य हो जाते हैं ।१७-१८। तिलो के सहित तण्डुलों के द्वारा किया होम लक्ष्मी के वश करने वाला होता है तीन मधुरों से अक्त लाजाओ से किया गया होम कन्या को दिया करता है ।१६। इस विधान में कन्या अपने अभीष्ट वर को प्राप्त किया करती है। मनुष्यों के दोरिपत को आज्य से अक्त हवि से किया हुआ होम साधित कर देता है ।२०। हवि से लोलित लोण से रात्रि मे चार दिन तक किया हुआ होम सम्वाद करता है उस भाँति अवश्य ही सदा विस्तार करता है ।२१। श्वेतार्कभवमूले रक्तचंदनदारुणा । इभभज्जेन निम्बेन दान्तदन्तेन वा कृतम् ।२२ विघ्नेश्वर समभ्यर्च्य शीताँशुग्रहणे जपेत् । स्पृष्ट्वा मंत्री निराहारस्त शिखायाँ समुद्वहन् ।२३ युद्धेषु व्यवहारादौ विजयश्रियमाप्नुयात् । मन्त्रेधानेन सजप्ता रोचना मदसयुतां ।२४ तिलकक्रियया सर्वान्वशं नयति मानवान् ।